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बिहार में सत्ता परिवर्तन ब्लागर्स के विचार

November 25, 2005 को प्रकाशित। लेखकः Debashish

बिहार में सत्ता परिवर्तन पर लोग मुखर हो उठे। आशीष गर्ग , प्रिय रंजन झा तथा प्रतीक ने इस पर अपने चिट्ठे लिखे। आशीष गर्ग तथा नितिन बागला ने बताया की वे फिल्में किस लिये देखते हैं। सन्यास योग के स्वामी आशीष श्रीवास्तव का दिल किसी कन्या ने तोड़ दिया तो बांके बिहारी लाल सुपुत्र अतुल अरोरा कन्या को देख के बोले वाऊ...अनुनाद सिंह कुछ जानकारी दे रहे हैं नेट पर उपलब्ध हिंदी कड़ियों की। बधाई देते हुये शशि सिंह के सीएनबीसी द्वारा लिये इन्टरव्यू की जानकारी लें तथा फुरसतिया की कवितायें फिर से पढ़ें रचनाकार में।
बदला राज
कुछ नया होगा या
कोढ़ में खाज!

सिनेमा हम
काहे को देखते हैं
हमें का पता!

शशि देते हैं
साक्षात्कार चौकस
टनाटन है!

लड़की देखी
वाया बांकेबिहारी
क्या अदाये हैं!

शादी कर ले
फिर न जाने क्या हो
आशीष भाई!

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Posted by अनूप शुक्ला at 11/25/2005 12:36:00 AM

एक बेघर आवारा कण

November 23, 2005 को प्रकाशित। लेखकः Debashish

आजकल हिंदी चिट्ठाजगत हजामत का दौर सा चल रहा है। फुरसतिया के गुम्मा हेयर कटिंग सैलून को देखकर अतुल भी रंगीला हेयर ड्रेसर में घुस गये तथा वहां से बेआबरू हो के ही निकले तथा सीधे जुड़ गये प्रिंट मीडिया से। इस बीच प्रत्यक्षा ने होशियारी से फुरसतिया से मौज ले ली। इधर सुनीलजी, जीतू, पंकज ने अपने अनुगूंज के लेख लिखे हम फिल्में क्यों देखते हैं? रवि रतलामी ने विज्ञापन जगत में अंग्रेजी के बोलबाले तथा राजनीति में अतार्किकता के फैलते प्रसार के बारे में बताया। सुनीलजी ने रामायण के पात्रों में बहन की जरूरत के बारे में लिखा अपना अतीत और शहर का इतिहास टटोला।

गणित का हल्ला भी रहा ब्लागजगत में। अनूप भार्गव ने सामान्तर रेखाओं के लगाव के बारे में लिखा तो फुरसतिया ने गणितीय कवि सम्मेलन कराया। लक्ष्मी गुप्त जी ने बताया कि राम-रावण दोनों बहुरुपिये थे। लाल्टूजी तथा कन्हैया रस्तोगी लगातार सार्थक पोस्ट कर रहे हैं। प्राचीन भारत की तौल प्रणाली के बारे में लिखा कन्हैया ने। मानसी फिर से कविता के मैदान में आ गईं तथा आवारा कण कविता लिखी
मैं एक बेघर आवारा कण हूं
सीप की गोद में आ ठहरा हूं
बरसों बाद मोती बन कर
तुम्हारी पलकों में सजूंगा
और किसी शाम को चुपके से
ढुलक पडूंगा तुम्हारे गालों पर
किसी एक भंवर में उलझ कर
तुम्हारी हंसी को छेडूंगा फिर
बज उठती थी बार बार जो
मेरे झांकने पर पलकों से
एक प्रेम की पाति लिख जाऊंगा
सूखा चिह्न एक छोड जाऊंगा
छू के उसको तब हंस लेना
रेत का कण समझ झटक देना
मेरा क्या जो खो भी जाऊं
मैं तो एक आवारा कण हूं

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Posted by अनूप शुक्ला at 11/23/2005 05:30:00 PM

कालीचरण कविता करने लगे

November 20, 2005 को प्रकाशित। लेखकः Debashish

कुछ दिन से चर्चा ठहरी रही। इस बीच और लोग जुडे़ चिट्ठाकारी जगत से। मूलत: बिहार की रहने वाली जयाझा आई.आई.एम लखनऊ से एम बी ए करते हुये हिंदी में अपनी पसंदीदा कविताओं तथा गज़लों को अपने ब्लाग पर पोस्ट करती हैं। आशा है कि जल्द ही वे अपना लिखा भी पोस्ट करेंगी।इसके पहले लाल्टू जी ,जो मेरे ख्याल से चर्चित कथाकार हैं हिंदी के,ने भी अपने विचारोत्तेजक लेख लिखने लिखने शुरु किये।रमन कौल ने लाल्टूजी के बारे में लिखा है। अपने सुनीलजी तो दिन ब दिन दनादन लिख रहे हैं। वे कुछ छिपाते नहीं ।बताया कि कितने भुलक्कड़ प्रेमी हैं।कमबख्ती(?) से भी वे मुंह नहीं छिपाते। खिंचाई अब फुरसतिया का एकाधिकार नहीं रही। फुरसतिया की खिंचाई को नहला मानते हुये प्रत्यक्षा ने दहला मारा है। मानसी ने सहयोग किया है। अभी तो वो मजा नहीं आया है आगे देखते हैं क्या होगा। पर यह अच्छी बात है कि प्रत्यक्षा,मानसी,सारिका ने कविता के साथ साथ अब गद्य भी लिखना शुरु किया है जो कि उनकी कविताओं से कम बेहतर नहीं हैं। सारिका की बचपन की यादें इसका प्रमाण हैं। जब ये 'मचिकग' कविता से लेख पर आ रहे हैं तब भोला उल्टी गंगा बहा रहे हैं वे कविताईपर उतर आये हैं। उनका जीवन चलायमान हो गया है।

मिर्चीसेठ का मन एक बार फिर बेचैन होकर जहाज के पक्षी में तब्दील हो गया है।
टिप्पणी भी खतरनाक हो सकती हैं यह बता रहे हैं नितिनबागला। फुरसतिया जानकारी दे रहें तेज चैनलों की।

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Posted by अनूप शुक्ला to gupt at 11/20/2005 07:22:00 AM

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