September 30, 2006 को प्रकाशित। लेखकः अनूप शुक्ल
जब पूरा देश डूबा है नवरात्र,दुर्गा-पूजा और दशहरा के धमाल में और हमारे साथी खो रहे हैं मेले-ठेले में अकेले-दुकेले तब हमारे पास यह जिम्मा है कि आपको सुनायें नवीनतम हाल-चाल चिठ्ठों की दुनिया का। दोपहर हो चुकी है भारत में और दुनिया के दूसरे हिस्से में रात सरक गयी होगी आधी से ज्यादा ऐसे में लगभग सारे पाठक बिस्तर से सबसे कम दूरी पर होंगे। कुछ सो गये होंगे, कुछ सोने की तैयारी में होंगे कुछ जगने की लाचारी में, कुछ नींदे होंगे कुछ उनींदे। लेकिन हम जाग रहे हैं और दुपहरिया चाय की चुस्की लेते हुये चिठ्ठा-चुस्की के लिये कमर कसके जुट गये हैं। हमारे रोजनामचा नरेश अतुल से कल चिठ्ठाचर्चा लिखने में देर हुयी सो बेचारे हायकू में हाथ आजमाये। हायकू हमें और समीरलाल को तो पसंद आने ही थे काहे से कि हम लोग तो एक ही बैंड के आदमी हैं लेकिन रत्नाजी को ये हायकू अपनी पोस्ट से ज्यादा भाये। पर क्या बतायें कि कविवर गिरिराज जोशी अपना हायकू मीटर(५-७-५) लेकर हर हायकू की गरदन नापने लगे और तमाम हायकू को उसी तरह बदलकर नया कर दिये जैसे मुख्यमंत्री लोग नये-नये आने पर जिलों के नाम बद्ल कर पुराने या नये कर देते हैं। उनकी मात्रा की बात तो सही है लेकिन हायकू विद्वान कहते हैं कि किसी और कविता की तरह हायकू में भी मूल प्रवाह मूल तत्व है उस लिहाज से अतुल का प्रथम हायकू प्रयास लगे रहो अतुल भाई टाइप का है। अतुल को अन्दाजा भी नहीं होगा कि जहां वे छिद्रान्वेषियों का आवाहन करेंगे वैसे ही विनय अपना मोर्चा संभाल लेंगे। वैसे व्याकरण में कुछ फिसलन जानबूझकर होती है और कुछ अनजाने में जैसे यहीं पर टिप्पणी में विनय ने अतुल की जगह राजीव लिखा! लगता है कि बेंगानी परिवार हिंदी में सबसे ज्यादा चिठ्ठे लिखने वाला परिवार बनने का कीर्तिमान अपने ही पास रखना चाहता है। अभी अपने ब्लाग पर मिली टिप्पणियों से उत्कर्ष का खुशी से नाचना बंद नहीं हुआ था कि खुशी अपना चिठ्ठा लेकर हाजिर हैं। यह खुशी की बात है कि उनके ब्लाग का नाम भी खुशी की बात ही है। खुशी को नियमित लेखन के लिये शुभकामनायें। खुशी की बात के साथ-साथ बधाई की भी कुछ बात। हिमानी भार्गव के बारे में हमने लिखा था अपनी एक पोस्ट में जब वे अपने जीजा अनूप भार्गव के साथ लखनऊ में मिलीं थीं। अपनी बच्ची प्रियम के नाम पर उन्होंने अपना ब्लाग शुरू किया और बच्ची के दांत निकलने की ऐतिहसिक घटना का विवरण बताया:- यही वो पहला दाँत है जो बाकी दाँतो के साथ न जाने कितनी टाफियाँ और चोकलेटस काटेगा.यही वो पहला दाँत है जो बाकी दाँतो के साथ न जाने कितने आलू के चिप्स के पैकिटस खोलेगा यही वो पहला दाँत है जो बाकी दाँतो के साथ कभी सर्दी मे या कभी बुखार मे किटकिटायेगा यह पहला दाँत,छोटा सा दाँत ,इस बात का सूचक है,कि ज़िन्दगी फिर से शुरू हो रही है,बचपन फिर से दिल पर दस्तक दे रहा है,यह वह पहला दाँत है जो बाकी दाँतो के साथ उस धागे को काटेगा जिससे प्रियम अपने पापा की कमीज़ पर बटन टाँकेगी।
मूलत: कविमना हिमानी ने इसके पहले अपनी पोस्ट में लिखा:- तुम्हारे बालो मे उंगलियां मेरी भटक गयी हैं रास्ते हाथ पकड़ के मेरा इन्हें ढूंढ लाइये.
भूल जाइयॆ शिकवे गिले दरकिनार कीजिये फिर से मुहब्बत का आगाज़ कीजिये. अब आप पूछेंगे कि इसमें बधाई की क्या बात यहां तो स्वागत की बात है। लेकिन नहीं भाई बात तो असल में बधाई की ही है। कारण यह कि आज ही हिमानी का जन्मदिन है। हमारी तरफ़ से ब्लाग लेखन प्रारम्भ करने और जन्मदिन की हिमानी भार्गव को बधाई। आशा है कि वे नियमित लेखन करती रहेंगी और अपने जीजा अनूप भार्गव की तरह नहीं करेंगी जो अपनी भारत यात्रा,हिंदी प्रसार सम्मान,गुड़गांव-बफैलो कवि सम्मेलन के उकसावे के बावजूद उनके बारे में कुछ न लिखकर पुरानी की गयी जगलबंदियों को दोहरा रहे हैं। ऐसी भी क्या व्यस्तता महाराज! 2 अक्टूबर आने वाला है और देश में हर जगह गांधीगिरी की तैयारी चल रही है। ऐसे में राकेश खंडेलवाल अपनी पुरानी यादों में खो हये हैं। ये यादें चरखे, तकुआ, पूनी के बारे में हैं और बात कही गयी है मालिन,ग्वालिन,धोबिन,महरी की:- एक एक कर सहसा सब ही संध्या के आँगन में आये किया अजनबी जिन्हें समय ने आज पुन: परिचित हो आये वर्तमान ढल गया शून्य में खुली सुनहरी पलक याद की फिर से लगी महकने खुशबू पूरनमासी कथा पाठ की शीशे पर छिटकी किरणों की चकाचौंध ने जिन्हें भुलाया आज अचानक एकाकीपन, में वह याद बहुत हो आया.
आजकल मीडिया की महिमा न्यारी है। वह मतलबी यार किसके,काम निकाला खिसके वाले अंदाज़ में हरकते करता है। यह मानना है बालेंदु शर्मा का। डरावनी पिक्च्ररों में से एक के बहाने कुछ सवाल खड़े कर दिये आशीष गुप्ता ने अपनी कतरनों मैं। मनीष अपने इंटरव्यू की दूसरी किस्त लेकर हाजिर हैं तो रविरतलामी अपना 'पच्चीस साल'पुराना गज़ल का स्टाकलेकर आ गये हैं:- कर उनसे कोई बात जिगर थाम के उनका जल्वा ए हुस्न देख जिगर थाम के
मर ही गए उनपे क्या बताएँ कैसे डाली थी नजर उनपे जिगर थाम के
इतना तो है कि बहकेंगे हम नहीं पी है मय हमने तो जिगर थाम के
पता नहीं महफ़िल में बहक गए कैसे पी थी मय हमने तो जिगर थाम के
मेरी आवाज लौट आती है तेरे दर से चिल्लाता हूँ बार-बार जिगर थाम के
वो दिन भी दूर नहीं जब तू आएगी इंतजार है कयामत का जिगर थाम के
रवि ये इश्क है जरा फिर से सोच ले चलना है इस राह पे जिगर थाम के रविरतलामी के इस गज़ल के प्यारे तेवर देखकर एक शेर याद आता है:- जवानी ढल चुकी,खलिस-ए-मोहब्बत आज भी लेकिन, वहीं महसूस होती है,जहां महसूस होती थी। बिहारी बाबू बता रहे हैं आजकल के रावणों के बीच पुराने रावण का रोना:- देखो जरा इन्हें, हमने तो वरदान में सोने की लंका पाई थी, लेकिन इनमें से बेसी रक्तपान के बाद बनी महलें हैं। ईमानदारी से कमाकर तो कोइयो बस अपना पेट ही भर सकता है, अट्टालिकाएं खड़ी नहीं कर सकता। क्या हमारी लंका से ज्यादा अनाचार नहीं है यहां? अगर ये सदाचारी होते, फिर तो दिल्ली झोपडि़यों की बस्ती होती। ये हमसे खुशकिस्मत हैं कि इन्हें मारने वाला कोई राम नहीं मिल रहा है। वरना इनकी दशा भी हमारी तरह ही होती। ऐसे में रावण का रोना सुनकर कोई ताज्जुब नहीं कि कोई हीरो आये और पूरे देश को ठीक करने के वैसे तरीके अपनाये जैसे लगान और रंग दे बसन्ती में बताये गये हैं। बिना व्यवस्था में बदलाव लाये देश सुधार की बात करना खामख्याली है यह बात परसाईजी ने अपने लेखों उखड़े खम्भे और सदाचार का ताबीज में कही है। लगान और रंग दे बसन्ती की कथा की अतार्किता को कथा के ही माध्यम से परख रहे हैं लखनवी अतुल श्रीवास्तव। इन सबके अलावा और भी बहुत कुछ है कल की पोस्टों में। इनमें डा.टंडन की दवायें हैं, कैलाश मोहनकर के माध्यम से पेश की गयी गज़लें हैं और है क्षितिज की बर्लिन की ट्रेन कंपनी का पोस्ट्रर और इसके अलावा सबसे खास है फुरसतिया का पुस्तक चर्चा का प्रस्ताव। न देखा तो देखिये और अपने सुझाव दीजिये। फिलहाल इतना ही।बाकी की कहानी कल व्यंजल नरेश- रवि रतलामीं से। आज की टिप्पणीअपराधी को सज़ा देने का एक कारण यह भी है कि वह दोबारा फ़िर से वैसा काम न करे. यादाश्त खोने के बावजूद अगर उसका व्यक्तित्व नहीं बदला और वह दोबारा से वैसा ही अपराध कर सकता है. मैं यह मानता हूँ कि कुछ लोग ऐसे होते हैं कि दूसरों की जान के लिए खतरा होते हैं, मेरे विचार तक उन्हे लम्बे समय तक जेल में ही रहना चाहिए पर मुझे मृत्युदँड का विचार अच्छा नहीं लगता. सुनील दीपकआज की फोटो आज की फोटो क्षितिज के ब्लाग से

 | »
September 29, 2006 को प्रकाशित। लेखकः Atul Arora
व्याकरण ज्योति की मशाल अब आलोक से विनय ने थाम ली है अपनी बात कहूँ तो अगर अँगरेज़ी के किसी चिट्ठे में मुझे इस क़दर वर्तनी अशुद्धियाँ मिलें तो मैं एक पैरे से आगे न बढ़ूँ और उस चिट्ठे पर लौटूँ तक नहीं. अक्सर कई हिंदी चिट्ठों के साथ भी ऐसा करने की इच्छा होती है, और कुछ के साथ किया भी है, पर कुछ मजबूरी में और कुछ लत की वजह से चलता रहता है. यह एक सार्थक कदम की शुरूआत है। यहाँ एक प्रसंग का उल्लेख करना सार्थक होगा। ब्लागिंग के शुरूआती दिनो में इस नाचीज को अपनी किस्सेबाजी के दस्तावेज "लाईफ इन ए एचओवी लेन" पर एक टिप्पणी मिली "अगर अरोरा और नरूला ऐसी हिंदी लिखेंगे तो शर्मा, पाँडे और द्विवेदी वगैरह का क्या होगा?" ऐसी टिप्पणियों पर फूल कर कुप्पा होना स्वाभाविक है। पर गलतियाँ हमसे भी होती है। लाईफ इन ए एचओवी लेन को सैकड़ो ने पढ़ा होगा पर एक गलती की ओर ध्यान दिलाया श्री राजीव टँडन ने। गलती यह कि शीर्षक "लाईफ इन एन एचओवी लेन" होना चाहिये। राजीव जी ने यह जोड़ना न भूला कि भई गलती सुधर सके तो सुधार लो पर इसे परछिद्रान्वेषण न समझ लेना। मैं यह बताते हुये गर्व महसूस करता हूँ कि श्री राजीव मेरे अध्यापक रहे हैं कंप्यूटर साइंस में । उनकी हिंदी पढ़कर लगता है कि अभी भी बहुत कुछ सीखना शेष है और ऐसे "छिद्रान्वेषण" को तो मैं अपना अहोभाग्य समझता हूँ और अपेक्षा करता हूँ कि साथी चिठ्ठाकार ऐसी "छिद्रान्वेषी" टिप्पणीयों को सकारात्मक भाव से ग्रहण करेंगे। आजतक अब तक हत्यारा था अब अहसानफरामोश भी बन गया, जानिये बालेंदु शर्मा से। बालेंदु का खबर देने वालो की खबर लेने का अँदाज काबिले तारीफ है। कभी हिंदी ब्लागजगत में श्रेणीआधारित सामूहिक ब्लाग की चर्चा हुई थी, पर साहित्य के अलावा ज्यादा वैविध्य नही दिखता था। इक्का दु्क्का लेख दिख जाते थे विज्ञान , वाणिज्य पर । लेकिन अब पत्रकारिता पर बालेंदु और तकनीकी पर उनमु्क्त एवं रवि जैसे लेखको के नियमित लिखने से हिंदी चिठ्ठाकारिता के इँद्रधनुष के रंगो में बढ़त्तोरी होते दिखना हर्षदायक है। पालतू चूहा दिल फेंक आशिक बदलो दिल
इस्त्री लाया कनऊ चपरासी सत्यानास
काली बिल्ली काट गयी रास्ता हे भगवान!
लाल ड्रैगन कराये है वोटिंग रत्ना हैरां अब यह क्या है? रत्ना जी से समझिये। कुँडली नरेश जी से सुनिये कवि सम्मेलन का सीधा प्रसारण। लेक ऎरी की तीर पर, भई कविजन की भीड़ रचना अब कोई और लिखे, तबहिं पढ़ें समीर. लगता है कविता रस का मीठी नदियाँ अब उत्तर भारत से खिसक कर अमेरिका के उत्तरी सिरे पर बहने लगी हैं। यकीन नही होता! कुँडली नरेश जी के साथ साथ डा. लक्ष्मी गुप्ता के कविता रस की बौछार से तो यही लगता है। या कलजुग माँ मोहन का माखन ना भायो रे। पीज़ा हट में पीज़ा खावैं गोपिन का खिलायो रे।। पँकज भईया के पिटने के दिन आ गये हैं। अब गरबे में घरवाली को लेजाकर भीड़ में गुमा देंगे और बाहरवालियो के सँग नैनमटक्का करने की फिराक में रहने वालो का अँजाम क्या होगा, आप ही बताइये। चलते चलते कछुवा, खरगोश और ओपेन सोर्स पढ़ना न भूलियेगा।
 | »
September 28, 2006 को प्रकाशित। लेखकः अनूप शुक्ल
नारद ने गारद किया, सब चिट्ठों का कारोबार ठहरे से सबके ब्लाग हैं, है बोझिल सन्नाटे की मार है बोझिल सन्नाटे की मार कि सबने लिखना छो़ड़ दिया लिखना छूटा,पढ़ना भूला,तारीफौ से नाता तोड़ लिया कह 'फुरसतिया' सुनो अब कष्ट मिटेंगे जल्दी शायद, चिट्ठाचर्चा का तुत्फ उठाऒ, आयेंगे जल्दी खबरी नारद।यह जलेबी हमने समीरलाल के बचे मसाले से बना ली काहे से कुछ लोगों को उनका यह आइटम बहुत पसंद आता है। पसंद आये तो उडनतस्तरी को वाह-वाह कर दीजियेगा और अगर न पसंद आये तो इसपर विस्तार से एक पोस्ट लिखियेगा ताकि जब कल अतुल चिट्ठाचर्चा लिखें तो उसके बारे में लिख सकें। उत्कर्ष हां तो हम कह ये रहे थे कि उत्कर्ष ने अपनी दूसरी पोस्ट लिखी और अपना परिचय भी दिया। रविरतलामी को बच्चा जहां दिखा वहीं उसको अपना पाठक बनाने के लिये तुरंत बच्चे के लिये मर्फी के नियम लगा दिये अपनी ब्लाग पोस्ट पर। बताऒ भला कहीं ऐसा होता है कि नया-नया बच्चा आया ब्लाग लिखने के लिये और आप उसके लिये नियम दिखाने लगे। चलिये अच्छा देख ही लिये जायें क्या हैं नन्हें मुन्नों के लिए मरफ़ी के नियम:- • एक अभिभावक जितना जोर से चिल्लाकर, जितना ज्यादा देर तक और बारंबार समझाने की कोशिश करेगा किसी बच्चे के द्वारा उसे समझे व अपनाए जाने की संभावना उतनी ही कम होगी. • किसी भोजन को बनने में जितना ज्यादा ऊर्जा, सामग्री व समय लगता है, किसी बच्चे के द्वारा उसे खाए जाने की संभावना उतनी ही कम होती है.
अब नीरज दीवान को भी क्या सूझी कि ब्लागरों के लिये भी मर्फी के नियम पूछने लगा। अरे भाई जो नियम फुरसतिया बता चुके हैं वो आप मर्फी से काहे पूछते हैं । ये लीजिये जमकर पढ़िये बकौल रवि रतलामी झन्नाटदार ब्लाग,ब्लागर,ब्लागिंग के फुरसतिया के नियम। हीतेंन्द्र के बहुत मेहनत करके कथासम्राट प्रेमचंद की कहानियां आपके लिये पोस्ट की हैं। ये कालजयी कहानियां हैं- बड़े घर की बेटी, दुर्गा का मंदिर, पंच परमेश्वर, शंखनाद और नागपूजा। उधर उन्मुक्त जी हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा से वो अंश आपके लिये पेश कर रहे हैं जिसमें बच्चन जी ने जब इंदिरा गांधीजी से मित्रता का जिक्र किया है। आप यहां पढते-पढते थक गये होंगे। अगर ऐसा है तो डा.प्रभात टंडन की होम्योपैथिक दवायें लें जोकि आपकी तकलीफ का शर्तिया इलाज हैं। अगर आपको दवा से आराम न मिले तो चिंता न करें,इलाज और भी हैं । आप ऐसा करें कि गिरिराज जोशी की ख्वाबों की रानी से मिल लीजिये। रानी का हुलिया और हरकतें कुछ यूं हैं:- वो बला सी खूबसूरत, ख्वाबों की रानी है थोड़ी नटखट, थोड़ी मासूम, थोड़ी सी सयानी है। 'सुमन' सा चेहरा, खुशबु सा बदन उसका मोहब्बत की मूरत वो थोड़ी सी दिवानी है। आँखे नशीली, होंठ रसीले और खाक करता हुश्न नाजुक सा बदन उसका उफ् क्या मदमस्त जवानी है। चाहत की अंगड़ाई लेती फिर पलटकर मुस्कुराती है बाहों में है जन्नत उसके वो नजरों से शर्माती है।इसका असर होगा क्योंकि पंकज को सोने की इच्छा हुई है तो आपको भी नींद आना चाहिये और एक बार नींद मार लिये तो फिर क्या ,सब चकाचक है। जब नींद खुले तो कुछ काम निपटाइये और विवादों की बरसी मनाइये। अरे अकेले नहीं भाई साथ में बिहारी बाबू हैं जो ये विवाद लेकर आये हैं। अल्लेव हम उधर विवाद में फंस गये इधर राजगौरव के साथ लफड़ा हुई गवा और उनको जो है सो क्या हुआ कि:- सीली हवा छू गयी, सीला बदन छिल गया.. नीली नदी के परे, पीला सा चांद खिल गया..
इधर इनका बदन छिल गया और उधर शुऐब मौज लेते हैं:-
क्या आप भी किसी के इश्क मे फंसे हुए हैं? आपके लेख से यही लगता है वैसे याहां UAE मे वर्षा कभी नही होती मगर अचानक कभी कभी एक दिन चंद बूंदे टपक जाती हैं राज गौरव बोले -इश्क का तो पता नहीं लेकिन बुखार में फंस गया हूं । अवधिया जी ने पुराने जमाने की मशहूर अभिनेत्री पद्मिनी निधन की जानकारी दी । पद्मिनीजी को हमारी भी श्रद्धांजली। अफलातून देसाई ने परिचर्चा में हुई हिंदी चर्चा को अपने ब्लाग में पोस्ट किया । इसके अलावा अफलातून जी ने एक और काम शुरू किया जो कि अगर मीडिया वाले अंदाज में कहा जाये कि खासतौर पर चिट्ठाचर्चा में प्रकाशित खबर के कारण किया। हमने चिट्ठाचर्चा में अनुरोध किया था कि अफलातून जी बनारस और खासकर बी.एच.य. के बारे में लिखें। उन्होंने हमारे अनुरोध पर बना यही है वह जगहलिखना शुरू किया। शुरुआती पोस्ट में बीएचयू पर कवि राजेंद्र राजन की लिखी कविता है :- यही है वह जगह जहां नामालूम तरीके से नहीं आता है वसंतोत्सव हमउमर के तरह आता है आंखों में आंखे मिलाते हुए मगर चला जाता है चुपचाप जैसे बाज़ार से गुज़र जाता है बेरोजगार एक दुकानदार की तरह मुस्कराता रह जाता है फूलों लदा सिंहद्वार इस बार वसंत आए तो जरा रोकना उसे मुझे उसे सौंपने हैं लाल फीते का बढता कारोबार नीले फीते का नशा काले फीते का अम्बार कुछ लोगों के सुभीते के लिए डाली गई दरार दरार में फंसी हमारी जीत - हार किताबों की अनिश्चितकालीन बन्दियां कलेजे पर कवायद करतीं भारी बूटों की आवाजें भविष्य के फटे हुए पन्ने अगली पोस्ट में काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के बारे में जानकारी है:- यादगार और ऐतिहासिक स्थापना दिवस तो पहला ही रहा होगा.विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना मालवीय ने अंग्रेज अधिकारियों के अलावा गांधीजी ,चंद्रशेखर रमण जैसे महानुभावों को भी बुलाया था.
गांधी जी का वक्तव्य हिन्दी में हुआ .मालवीयजी को दान देने वाले कई राजे -महाराजे आभूषणों से लदे विराजमान थे .गांधी ने उन पर बेबाक टिप्पणी की .उस भाषण को सुन कर विनोबा ने कहा कि ‘इस आदमी के विचारों में हिमालय की शान्ति और बन्गाल की क्रान्ति का समन्वय है’.लोहिया ने भी उस भाषण का आगे चल कर अपनी किताब में जिक्र किया.
गांधी एक वर्ष पूर्व ही दक्षिण अफ़्रीका से लौटे थे और भारत की जमीन पर पहला सत्याग्रह एक वर्ष बाद चंपारन में होना था.’मालवीयजी महाराज’ (गांधीजी उन्हें यह कहते थे) की दूरदृष्टि थी की भविष्य के नेता को पहचान कर उन्हें बुलाया.आशा है आगे अफलातूनजी के सौजन्य से रोचक जानकारियां मिलेंगीं बनारस और बीएचयू के बारे में । शरद के आगमन के पहले प्रेमलता जी बताती हैं ग्रीष्म के बारे में फिर शरद के बारे में:- नदियाँ ग्रीष्म में महिला मजदूर की भाँति थकी सी लगती हैं तो वर्षा में प्रलय का स्वरुप लगतीं हैं पर शरद में फिरोज़ी परिधान पहने स्नेह छलकाती माँ के समान प्रतीत होती हैं।
शरद-ऋतु कोमलता और सुन्दरता अर्थात माधुर्य-गुण की परिचायक है। प्रकृति की शांत और मोहक छवियाँ अन्तःस्थल की सूक्ष्मपरत तक प्रभावित करती हैं। कहते हैं शरद-चाँदनी में ही राधा-कृष्ण और ब्रज गोपियों ने महारास (जिसे भक्ति,प्रेम और सौन्दर्य की सर्वव्यापकता की अभिव्यक्ति माना गया है) किया था।
आज अपने देश की साम्राज्ञी लताजी का जन्मदिन है उनको हमारी तरफ से जन्मदिन की शुभकामनायें।
आज की टिप्पणी:-१.वुधवार की चिट्ठाचर्चा की जिम्मेदारी समीरलालजी कि है, यह बराबर याद रहता हैं क्योंकि शुरूआत में ही गर्मागरम जलेबी (कुण्डली शब्द का स्वादिष्ट विकल्प) खाने को मिल जाती हैं.समिक्षा की आपकी इस्टाइल के हम कायल हैं. संजय बेंगाणी
समीरजी, आप ही से प्रेरणा लेकर आप सब 'चिट्ठा- चर्चा'लिखने वाले लेखकों के लिये ये पन्क्तियाँ लिखी हैं- -"रात को चिट्ठा लिखकर के, सुबह यहाँ वो आये, ये चर्चा देखे बिना उससे रहा न जाए, अपनी चर्चा देखकर मंद-मंद मुस्काए, पढकर फिर चलता बने, टीप्पणी से कतराए!! आप सब का धन्यवाद,सुरूचिपूर्ण प्रस्तुति के लिये.. रचनाबजाजआज की फोटो:- आज की फोटॊ एक बार फिर सुनील दीपक की छायाचित्रकार पोस्ट से

 | »
September 27, 2006 को प्रकाशित। लेखकः Udan Tashtari
थोडे से मिल पाये हैं, फिर से चिठ्ठे आज गली गली मे घूमते, हम तो थे दिन रात. हम तो थे दिन रात कि बिल्कुल सो न पाये जहां जहां भी पहुँचे, वहां इतिहास ही पाये. कहे समीर कि नारद जब से साथ हैं छोडे पढने के लिये चिठ्ठे भी, रह गये हैं थोडे.--समीर लाल 'समीर' सुबह सुबह ही सागर भाई ने एक दुखद समाचार दिया. 'मीरा बाई के भजन के नाम से लिखने वाली चिट्ठाकार और मेरी पत्नी श्रीमती निर्मला सागर की बुवा की १६ वर्षीय पुत्री निशा का आज सुबह सूरत में प्रात: १०.०० बजे निधन हो गया।समस्त चिठ्ठा परिवार की ओर से हम परम पिता परमेश्वर से मृत आत्मा की शान्ति हेतु तथा सब परिजनों को इस दुखद घडी को सहने की शक्ति प्रदान करने के लिये प्रार्थना करते हैं . आगे बढे तो नितिन बगला अपनी इन्द्र धनुषी खानपान की व्यथा कथा लिये पूरी रसोई बिगराये बैठे थे और एक से एक व्यंजनो की याद मे आंसू बहा रहे थे: 'और हाँ, कुछ चीजें जिनकी खूब याद आती है..गरमागरम पोहा-जलेबी, दाल-बाटी, सादा रोटी-सब्जी 'आधा दर्जन से भी दो अधिक ज्यादा लोग उन्हे ढाढस बंधाते नजर आये. अब खाने की बात चली, तो लक्ष्मी जी भी पालक के बिछोह मे टेसू बहाते नजर आये: धोने से नहीं धुलता है, उबालने से नहीं उबलता है, अजर अमर यह बैक्टीरिया हमें बीमार करता है। पालक प्रेमियों पर आफ़त आई है।खैर हम तो खुश हैं, इसी बहाने पालक से बचे, नही तो हरी सब्जी की दुहाई देकर बनाने मे सबसे सरल आईटम हफ्ते मे दो बार तो टिकाया ही जा रहा था हमारे घर पर. उधर उन्मुक्त जी अपने वही शिगुफाई अंदाज मे आवाज लगाते दिखे: The week मनोरमा ग्रुप के द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी की पत्रिका है। इसके सबसे नये अंक (सितम्बर २५ – अक्टूबर १) के अंक में ब्लौगिंग के ऊपर लेख blogger's park निकला है। इसमें इस बात की चर्चा है कि हिन्दुस्तान में अंग्रेजी में चिट्ठे लिखने वाले कैसे पैसा कमा रहें हैं। क्या हिन्दी चिट्ठेकारों के भी दिन फिरेंगे।अब अभी तो फिरे नही हैं, जब फिर जायें तो आप तो हईये हैं बताने के लिये, तब हम भी लाईन मे लग जायेंगे. तब तक जैसा चल रहा है वैसे ही हांके हुये हैं. रास्ते मे ही जीतू भाई जुगाड लिंक मे एक ठो जुगाड लिये खडे थे, बिल्कुल सरकारी हिसाब किताब सा, एक जुगाड बताने के लिये एक पूरा पन्ना निपटा दिये. उससे ज्यादा तो उसे यहां कवर करने को लिखना पड रहा है. खैर, छोडा जाता है क्योंकि जुगाड है बेहतरीन. शैलेष भारतवासी पता नही क्या क्या नाप रहे थे, आप खुद ही देखें: सागर की सीमा आकाश की ऊँचाई और पाताल की गहराई भी नापी जा सकती हैसुनील दीपक जी सबके सामने बडी गहरी बात करते हुये मिले: बहुत साल पहले अभिनेत्री नीना गुप्ता ने अपने बिन ब्याही माँ होने की बात को खुले आम स्वीकार किया था. केवल किसी एक के कहने से, सब के सामने खुल कर आने से समाज नहीं बदलता, पर शायद उससे बहुत से लोग जो उस स्थिति में छुप कर रह रहे हैं, उन्हें थोड़ा सहारा मिल जाता है कि वह अकेले नहीं.अनुभूति कलश पर डा.रमा द्विवेदी गीत गा रही हैं: तुम मेरे साथ रहो घर में उजाला बनकर, यूं मुझे दर्द न दो दिल का अंधेरा बनकर.मन की बात पर शरद ऋतु का आन्न्द और हर्षोल्लास मिला: सच में शरद उल्लास का समय है। त्योहारों और उत्सवों की रौनक़ मन -हंस को भू-सरोवर में प्रकृति के सुंदर दृश्य रुपी मोती चुगवाती है। जन्म दिन मनाने का एक और नजरिया देखने को मिला क्षितिज कुलश्रेष्ठ से: काश २४ या २५ साल की उम्र के बाद ये बढ़ना रुक जाए तो कितना अच्छा हो। उससे पहले मैं जल्दी बड़ा होना चाहता था। अब २७ के साथ लगता है कि ३० कितना करीब है। राज वाकई एक अकेला इस शहर मे लगने लगे हैं, और बारीश के चक्कर मे पडे हैं और लगे गाना सुनाने. गरम चाय के साथ लुत्फ उठाया गया पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ की किताब पर बातचीत करते हुये: "क्या राष्ट्रपति को ऎसे राष्ट्रीय रहस्यों का खुलासा करने का अधिकार है जो कानूनन 30 वर्षों तक बाहर नहीं लाए जा सकते? जाहिर है, उनकी बातें एकपक्षीय होंगी और जिन बातों के बारे में उन्होंने लिखा है वे पुख्ता सबूत तथा दस्तावेजों के अभाव में विवाद को जन्म देंगीं।"और यात्रा की अंत मे हितेन्द्र ने तिरछी नजरिया से कुछ जानी मानी हिन्दी कवितायें सुनाई. आज की टिप्पणी:रवि रतलामी--> छुटपुट पर: दरअसल, मैंने जो कुछ भी नया प्रयोग अपने चिट्ठे में पैसे कमाने हेतु - बड़े ही एग्रेसिव अंदाज में विज्ञापनों को चिपकाने का किया है जिससे कई चिट्ठाकार बंधु इत्तेफ़ाक नहीं रखते, अमित अग्रवाल की साइट से प्रेरणा लेकर तथा उसमें दिए गए युक्तियों के आधार पर ही किया है. हाँ, सामग्री की बात है, तो वह धीरे से आएगी. और यह भी तय है कि आपकी सामग्री अगर ठीक नहीं होगी तो पाठक बेवकूफ़ नहीं है जो आपको पढ़ने के लिए दोबारा आएगा. मेरी कोशिश जारी है…. संजय बैगाणी इसी को आगे बढाते हैं: पैसा कमाने के लिए पहले इस क्षेत्र को थोड़ा विकसित भी करना होगा. बीजो की बुवाई करो, सिंचाई करो फिर काटो वाला सिद्धांत यहाँ भी लागु होता हैं. आज का चित्र:पुनः सुनील दीपक, छाया चित्रकार की डायरी से:

 | »
September 26, 2006 को प्रकाशित। लेखकः अनूप शुक्ल
मार्टीना हिगिंसा कल कुछ ऐसा हो गया कि हमारे रवि रतलामी जी के साथ वो हो गया जिसे कहते हैं अन्याय। बेचारे दिन भर घर पुतवाये और रात में लिखने बैठे चिट्ठाचर्चा। बहरहाल मेहनती आदमी होंने के नाते उन्होंने आंखे मुंदने तक लिखा और जब सो गये तो उनके नेट जीवन की तपस्या के प्रभाव से लेख अपने आप प्रकाशित हो गया। जो हुआ उसे गजल में अगर कहना हो तो ऐसे कहा जा सकता है क्या!- कल रात एक अनहोनी बात हो गई मैं तो जागता रहा खुद रात सो गई ।इसमे मैं की जगह रात और रात की जगह मैं पढ लें तो मामला समझ में आ जायेगा काहे से कि कविता बनेगी:- कल रात एक अनहोनी बात हो गई मैं तो सो गया रहा खुद रात जाग गई ।वैसे य्ह बता दें कि यह लाइन अनूप भार्गव ने लिखी है जो आजकल परेशान हैं जिसे देखो वही उनको सेलेब्रिटी बना डालता है। वो तो कहो शरीफ आदमी हैं जो बनाया जाता है बेचारे चुपचाप बन जाते हैं वर्ना कोई और हो तो बुरा मान जाये। अनूप भार्गव के गुड़्गांव प्रवास के किस्से,उनकी कवितागीरी के बारे में विस्तार से बताया प्रत्यक्षाजी ने अपने लेख धूप जनवरी की ,फूल दिसम्बर के में। वैसे लेख का शीर्षक पढ़कर अमर ट्रक साहित्य बरबस याद आ जाता है- बत्तीस के फूल चौंसठ की माला,बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला।
इधर गुड़्गांव में जब कवि सम्मेलन हुये तो बफैलो में काहे न हों! हुआ और जमकर हुआ.हमारे समीरलाल ने भी वहां जमकर शिरकत की और बाकी दिग्गज कवियों की तरह मामला गोपनीय नहीं रखा बल्कि पूरा खुलकर बताया.अपने कवितापाठ की बानगी देते हुये समीरलाल ने बताया:- विराजमान हैं मंच पर, सब दिग्ग्ज पीठाधीश हमउ तिलक लगाई लिये, अपनी खड़िया पीस. अपनी खड़िया पीस कि बिल्कुल चंदन सी लागे हंसों की इस बस्ती मे, बगुला भी बाग लगावे. कहे समीर कि भईया, ये तो बहुत बडा सम्मान इतनी ऊँची पैठ पर, आज हम भी विराजमान.
और विस्तार से जानने के लिये उड़नतस्तरी पर सवारी करिये.शादी अगर एक बबाल है तो जो आदमी जानते-बूझते हुये शादी से बचने की कोशिश करेगा उसे और बबाल घेरेंगे यह शाश्व्त सत्य आशीष के ऊपर भी लागू होता है। जो आजकल एक नहीं तीन बबालों में फंसे हैं और रायसुमारी कर रहे हैं। जनता की राय क्या है आप खुद ही देख लीजिये। लेकिन कुंवारों के दुख भी एक नहीं होते तभी तो प्रेमेंन्द्र को समझ में नहीं आता कि वो सानिया सनसनी को समर्थन दें या हिंगिस को। इन दो क्न्यायों ने उनके घर में बंटवारा करवा दिया,तालियों की दीवार उठवा दी:- आज मेरे समाने एक और असमजंस था एक तरफ सानिया तो दूसरी तरफ स्विस मिस हिगिंस किसका सर्मथन करू ? एक तरफ भारत की सानिया तो दूसरी तरफ हिगिंस जिसका मैने हर पल 1997 से सर्मथन करता चला आया। अत: मैने हिगिंस का सर्मथन करना उचित समझा क्योकि जिसका मैने हर पल सर्मथन किया है उसका साथ मै नही छोड सकता। मेरे घर मे दो गुट बन गये थे एक तरफ भइया सानिया को भारत की होने के कारण उसके शाटों पर ताली बजा रहे थे तो दूसरी तरफ़ मै हिगिंस के शाटों पर मै परन्तु ताली मैने ही सर्वाधिक बजाई और फाईनल तक बजाता रहा।सिनेमा जगत में जहां सुनील दीपक की नजर आमिर खान की हरकतों पर थीं वहीं नीरज दीवान की नजरें ऐश्व्रर्या राय पर टिकीथीं। इस सबसे अलग शुऐब देख रहे थे पाकिस्तान के अंधेरे को जहां सभी पाकिस्तानियों ने अंधेरे की वजह से मुशर्रफ को लम्बी लम्बी गालियाँ देते हुए पहला रोज़ा पकडा। और जिया कुरैशी छतीसगढ़ में चली ताजा हवा की जानकारी दे रहे हैं। बालेंदु शर्मा जी की नजर है उस विज्ञापन पर जिसमें कहा गया है कि देखिए नीतिश कुमार की सरकार ने राज्य को नंबर वन बना दिया है। संजय संथारा पर छिड़ी बहस को आगे बढ़ाते हुये मृत्यु के तरीकों/मार्गों की जानकारी दे रहे हैं लेकिन पंकज इस सबसे बेखबर नवरात्रि के मौके पर युवा वर्ग में मौज-मजे की कहानी बता रहे हैं । मौज-मस्ती और निरोध की बढती बिक्री की बात से लगता है कि कल को मौज-मस्ती की मात्रा परिभाषित करने के लिये कंडोम इंडेक्स या गर्भपात इंडेक्स न बन जाय। खास खबर:- दुनिया में तमाम बातें पहली बार होती हैं। पहली हिंदी ब्लागजीन निकलती है, पहला समूह ब्लाग बनता है, पहला ब्लागनाद होता है तो भला पहला बाल-ब्लाग काहे नहीं हो सकता? हां हो सकता है । यह पहला बाल-ब्लाग शुरू किया है संजय बेंगानी के सुपुत्र उत्कर्ष बेंगानी ने जो नौ के हो चुके हैं और अभी पांचवी में आये हैं। अपनी दुनिया की बिना किसी लाग-लपेट के जानकारी देते हुये वे बताते हैं:- इसी साल मै पांचवी मै आया हुँ। उसके चार-पाँच दिन बाद एक लडकी आई । मुझे लगा कि वह मेरी दोस्त बन सकती है। पर कुछ दिन बाद वह मुझे अच्छी नही लगी क्योंकि वह गाली बहुत देती है। अब आप समझ सकते हैं कि उत्कर्ष से दोस्ती करने की शर्तें क्या हो सकती हैं। अपनी दुनिया की शुरुआत करने के लिये उत्कर्ष को शुभकामनायें और जारी रखने के शुभाशीष। आज की टिप्पणी१.उत्कर्ष…….??? नाम सुना हुआ लगता है, शायद एक बार पंकज या संजय भाई के चिट्ठे पर कहीं पढ़ा था, कहीं छोटे संजय तो नहीं? अगर आप उत्कर्ष बेंगानी ही हो तो कहना पड़ेगा कि पूत के पाँव पालने में ही दिखने लगे हैं। કાં પછી એમ પણ કહી શકાય કે ” મોર ના ઈંડા ચિતરવા ના પડે” सागर चंद नाहर२.मुझे भी अजीब-सा लगा. आमिर ख़ान के इस कृत्य पर मुझे हैरानगी है. बाज़ार ने हमारी वैचारिक स्वतंत्रता को जकड़ लिया है. अब लगता है कि ब्रांड बड़ा है विचार नहीं. झूठ क्या है सच क्या है ये तो तभी तय होगा जब भारत सरकार शीतलपेय के लिए मानक तय कर दे. रिश्वतखोरों ने इसे लागू करने में बहुत देर कर दी है. मुझे इंतज़ार है कि कोई इन पर लगाम लगाए. वरना तब तक क़ानून कुछ नहीं कर सकेगा और आम जनता को इन दैत्याकार कंपनियों की मनमानियां झेलनी ही पड़ेगी. नीरज दीवान३.झेल रहे हैं बैठ कर, तुकबंदी हम श्रीमान मकसद पूरा कर लिये, आप बहुत महान. आप बहुत महान,जो भी कुछ करना चाहो सफल रहोगे हरदम,चाहे कितना झिलवाओ. कहे समीर कविराय, तेरे गजब रहे हैं खेल जो भी तू लिख देगा, सारे ब्लागर लेंगे झेल. समीरलालआज की फोटो:-आज की फोटो समीरलाल जी के ब्लाग से कवि हैं श्रोता हैं कौन हैं ये आप पहचानने का प्रयास करें. कवि सम्म्लेन के कवि-श्रोता
 | »
को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami
खुद ही तकदीर बनानी होगी खुद ही तकदीर बनानी होगी. सच है. अपनी तकदीर तो हमें खुद ही बनानी होगी. आप अपनी तकदीर नहीं बनाएंगे तो और कौन बनाएगा? शायद ईश्वर भी नहीं. अनुभूति कलश में रमा द्विवेदी लिखती हैं - खुद ही तुम्हें अपनी, तस्वीर बनानी होगी। खुद ही तुम्हें अपनी, तकदीर बनानी होगी॥ न रहना इस भ्रम में, कोई साथ देगा तुम्हें। साथ तो देगा नहीं, हरदम मात देगा तुम्हें॥
भारतीय सिनेमा में शंकर जयकिशन के बारे में कुछ चर्चा की जा रही है. हिन्दू जागरण पर बुश पर बढ़ते दबाव के बारे में विस्तृत चर्चा की गई है. उन्मुक्त वंदेमातरम के इतिहास पर शोध करने लगे हैं. उनका ताजा आलेख वंदेमातरम् और कानूनी मुद्दों के बारे में है, और शोध परक है. भावनाएँ में इस दफ़ा बम युक्त भावनाएँ हैं - मरते सपने, मरते अपने और मरती किलकारी है । नये समय की नयी समस्या विपदा यह अति भारी है ।
फ़ुरसतिया की कलम पुरानी डायरी के पन्नों को पलटते हुए चली . उन्हें मलाल है कि महज दो साल की ब्लॉग गिरी से ही जब उन्हें महाब्लॉगर की पदवी मिल गई तो पंद्रह साल पुरानी लिखी रचनाओं में आखिर क्या कमी रह गई थी? चाह गयी चिंता मिटी,मनुआ बेपरवाह, जिनको कछू न चाहिये सोई शाहंशाह।
आगे वे बढ़िया सूफ़ियाना गोठियाते हैं -
चाहत को बरकरार रखने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है। सचमुच. चिट्ठा चर्चा लिखने की चाहत को बरकरार रखने में भी बहुत मेहनत करनी पड़ती है. अगर आप चाहते हैं कि आप भी चिट्ठा चर्चा लिख सकते हैं तो आपका इस मंडली में स्वागत है. सार्वजनिक एक टिप्पणी दे मारिए, या फिर सार्वजनिक कहने में शरमाते हैं तो फिर ईमेलवा दे मारिए मुझे या अनूप को या इस दल में जुड़े किसी को भी. वैसे, अगर यह खयाल आता है कि आपका खुद का या किसी का खास चिट्ठा यहाँ चर्चा में आने से रह गया तो फिर आपके लिए यह एक सही मौका है उस चिट्ठे को न्याय दिलाने का. आप भी लिखिए चिट्ठा चर्चा. स्वागत है आपका. बहरहाल, आगे चर्चा करते हैं. संजय बेंगाणी (सही उच्चारण लिखा है न?) ने तरकश में जैन धर्म के एक अति विचित्र रस्म के बारे में लिखा है. संथारा - एक तरह की इच्छा मृत्यु है जिसमें धर्म का सहारा लेकर व्यक्ति अन्न जल त्याग कर मृत्यु का वरण करता है. मृत्यु अकाट्य है. परंतु इसे वरण करना? चलिए, संजय यही तो चाहते हैं - आप इस विषय पर अपने-अपने तर्क और विचार रखें. संथारे तथा आत्महत्या में अंतर: "आत्महत्या करने के पीछे मन में द्वेष का भाव होता हैं या फिर घोर निराशा। ऐसा हो सकता हैं अवसर मिलने पर व्यक्ति आत्महत्या का इरादा त्याग दे तथा अपने कृत्य पर पछतावा भी हो। जबकि संथारे में तत्काल मृत्यु नहीं होती यानी सोचने समझने तथा अपने उठाए कदम पर पुनर्विचार करने का पर्याप्त समय होता है। संथारे में जीवन से निराशा तथा किसी भी प्रकार के द्वेष का कोई स्थान नहीं होता। इसलिए इसे आत्महत्या से अलग माना जाना चाहिए। संथारा की तुलना सति प्रथा से करना भी गलत हैं, संथारा लेना हिन्दू धर्म के समाधि ले कर मृत्यु को प्राप्त होने जैसा है। शिवाजी महाराज के गुरूजी ने तथा रामदेव पीर ने समाधि ली थी। सीताजी ने भी समाधि ली थी। मेरा निजि मत हैं की धर्म में दखल न मानते हुए इस विषय पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए। अगर हम चाहते हैं की सभी का जीवन सुखद हो तो हमें सभी के लिए सुखद मृत्यु की कामना भी करनी चाहिए। (मेरी परदादीजी ने भी संथारा लिया था, मेरे पिताजी की मौसीजी ने भी संथारा लिया था. और जो विमलादेवी चर्चा में हैं वे भी मेरी दूर की रिश्तेदार हैं.)" वहीं तरकश में संजय नवरात्रि पर्व के बारे में बताते हैं - खासकर गुजरातियों के बारे में - "हालाकि अब शहरों मे गरबो का व्यवसायीकरण हो गया है। आयोजक बङे पैमाने पर पार्टीप्लोट तथा क्लबों में गरबो का आयोजन करते है, इनमें हिस्सा लेने के लिए महंगी टिकीटे खरीदनी पड़ती हैं पर जिस प्रोफेशनल तरीके से आयोजन होता हैं, पैसे वसूल हो जाते हैं। यह बात और हैं की इनमे परंपरागत गरबो का मुल स्वरूप ही गायब सा हो गया है। फिर भी शुरूआत दुर्गा की आरती से ही होती है बाद में गरबे शुरु होते है जिसका स्थान जल्दी ही डांडीया ले लेते है. नवरात्रि एक ऐसा त्योंहार है जिसमे युवावर्ग सबसे ज्यादा उत्साह के साथ हिस्सा लेता है. न रोक न टोक, बस पुरी रात नाचो गाओ।. ऐसे मे प्रेमी पंखीओ को उड़ने के लिए मुक्त आकाश मिल जाता है। गुजराती समाज में खुलापन है इस लिये नैतिकतावादीयों की चिल्लापो नही सुनायी देती। आपको आश्चर्य होगा देर रात तक अकेली लङकीयां बेखोफ सड़को पर घूमती नजर आयेगी पर छेड़छाड़ जैसी कोई घटना नही होती।" इस चर्चे का चित्र - सुनील के कैमरे से - इल्हा का किला
मित्रों, इस चिट्ठा चर्चा को रात्रि 12.59 पर लिखा जा रहा है जबकि निद्रा देवी पलकों पर आसन जमाने को तत्पर है. रेडियो पर मोर गिरधारी नजरिया गीत बज रहा है - भोजपुरी गीत. और आगे मुझे समझ नहीं आ रहा है. इसीलिए व्यंज़ल का डोज़ अगले हफ़्ते. और, अगर चर्चे में आपके चिट्ठे छूट गए हों तो माफ़ी चाहता हूँ, और उम्मीद करता हूँ कि अगले चिट्ठाचर्चाकार उन्हें अवश्य शामिल करेंगे. वैसे, आपके लिए भी निमंत्रण तो मैं पहले ही दे चुका हूँ :) इस दफ़ा की टिप्पणी - संजय (क्या बात है संजय, तीन दफ़ा अवतरित हो गए?) को ईर्ष्या हो रही है -
सुनील के चिट्ठे छायाचित्रकार पर -
आपके भाग्य से ईर्ष्या होने लगी हैं, आप सारा जहाँ घूम सके हैं और ऐसे अद्भुत नजारे कैमरे में कैद कर सके हैं.
 | »
September 24, 2006 को प्रकाशित। लेखकः अनूप शुक्ल
पितर पक्ष समाप्त हुये.नवरात्र की शुरूआत हुयी.रमजान की शुरुआत के साथ रोजे भी शुरू.यह अपने देश का सबसे ज्यादा त्योहारों वाला समय है.एक तरफ गुजरात,दिल्ली,मुंबई और बाकी हिस्सों में डांडिया की धूम है तो दूसरी तरफ़ बंगाल में दुर्गा पूजा की तैयारियां शुरू हो गयीं. रामलीला के मंच भी चहल-पहल में डूबने लगे हैं.रावण के पुतले बनने लगे .कवि सम्मेलन और मुशायरों के दिन आये.ये दिन कवियों और शायरों की सहालग के दिन है. ऐसे ही एक मुशायरे में प्रख्यात शायर राहत इन्दौरी पढ़ रहे थे:- सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में किसी के बाप का हिंदोस्तान थोड़ी है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अपने आप में खास है.इसके विभिन्न पहलुऒं के बारे में जानकारी दे रहे हैं अरविंद दास:- विश्वविद्यालय सही मायनों में अखिल भारतीय स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है। केरल से लेकर कश्मीर तक और उत्तर-पूर्व राज्यों से लेकर मध्य भारत के कोने-कोने से यहाँ छात्र शुरूआती दिनों से आते रहे हैं। यह आवासीय परिसर छात्र – छात्राओं को एक-दूसरे को नजदीक से जानने का अवसर देता है। जो कुछ भी भ्रांतियाँ या पूर्वग्रह अन्य जाति या धर्म के प्रति रहते हैं, धीरे-धीरे खत्म होने लगते हैं। अरबी भाषा और साहित्य में शोधरत अताउर रहमान कहते हैं:‘मदरसा से पढ़ने के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया में जब मैंने दाखिला लिया, वहाँ अपनों के बीच ही सिमटा रहा। यहाँ आकर पहली बार दुनिया को दूसरों की नजर से देखा।’ पूरा लेख जे एन यू के विविध पहलुऒं के बारे में बताता है. आशा है कि आगे की पोस्टों में अरविंद जी वहां के छात्र नेताऒं की मन:स्थिति और सोच के बारे में बतायेंगे तथा यह भी कि बिहार में मारे गये जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष चंद्रशेखर को लोग वहां किस तरह याद करते हैं. अफलातून देसाई जी से भी गुजारिश है कि कुछ बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के बारे में बताते रहें.फिलहाल तो अफलातूनजी परिचर्चा में हो रही हिंदी पर बहस की बातें आपको बता रहे हैं.हिंदी के बारे में अपने विचार जनता जनार्दन को बताते हुये आशीष गुप्ता कहते हैं:- मैं भाषा के स्वतः विकास का समर्थक हूँ। अगर किसी समय हिन्दी की बजाय अन्य भाषा प्रचलित हो जाती है तो जबरजस्ती हिन्दी पढ़ाने का ना मैं शौकीन हूँ ना यह कारगर तरीका है। भाषा विचारों का माध्यम है और कुछ नही (कम से कम सामान्य लोगों के लिये तो)। मेरे महाविद्यालय में एक समूह संस्कृत भाषा के विस्तार में कटिबद्ध था और गावों में स्थानीय तमिल की जगह संस्कृत का उपयोग प्रचलित करने के प्रयास करता था। मुझे उनके प्रयास समय और साधनो की व्यर्थतता ही लगे। भारतीय भाषायें मूलतः संस्कृत की संतति हैं। कौन माँ चाहेगी कि उसकी कीर्ती के लिये उसकी संतान का हनन किया जाये? ये आशीष जी के विचार हैं लेकिन लोग बताते हैं कि मामला हिंदी बनाम अंग्रेजी का नहीं है वरन अंग्रेजी बनाम भारतीय भाषाऒं का है. अंग्रेजी यहां लदी हुयी है इसलिये नहीं कि अंग्रेजी का यहां स्वत: विकास हुआ यह साजिशन है जो अभी भी काम-धाम की भाषा यह बनी हुयी है. बालेंदु शर्मा बता रहे हैं समाचार पत्रों की भेड़चाल के किस्से जो अंग्रेजी मिश्रित हिंदी प्रयोग करनें जुटे पड़े हैं:- नवभारत में तो इस तरह के प्रयोग कम हो गए हैं लेकिन दूसरे अखबारों ने (जो बड़े अखबारों का अंधानुकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ते), इसे अपना लिया है। इनमें से कुछ तो अपने लेखों और खबरों में इतनी अंग्रेजी (कहीं देवनागरी लिपि में तो कहीं रोमन में भी) का प्रयोग कर रहे हैं कि लगता है भाषा के भ्रष्ट होने की यही गति जारी रही तो कुछ साल में ये अखबार देवनागरी लिपि में छपे अंग्रेजी अखबार बन कर न रह जाएं। रमजान का महीना शुरू हुआ और शारजाह दुल्हन की तरह सज गया लेकिन शुऐब उसका मकसद भी बताते हैं:- हर वर्ष दुबई मे शॉपिंग फेसटिवल मनाया जाता है और शारजाह मे रमज़ान का फेसटिवल मनाने की रिवायत है मानो मुखतलिफ फेसटिवलों को इस देश के सात राष्ट्रों ने आपस मे बांट रखा है। कोई भी फेसटिवल हो मकसद एक ही है पैसा कमाना और दबा कर कमाना।
ये मौसम ही कुछ ऐसा है कि मच्छर तक मस्त हैं और आपस में गपिया रहे हैं जिसको सुनकर बता रही हैं शिल्पा अग्रवाल:- एक नुकीली मूँछ वाले सुडौल मच्छर का स्वर हमार कानों से टकराया- ” हम जिन शर्मा जी के यहां आज कल डेरा जमाये हुए हैं, उनके केबल आपरेटर ने उन्हें अपनी सेवाएँ देना बंद कर दिया है| अब बिना अबतक और सीन्यूज़ की खबरों के हमारा जी वहाँ नहीं लगता है| अब सोच रहे हैं कि मुनिसिपल कार्पोरेशन के बाजू वाली गली के गुप्ताजी के यहाँ पलायन कर लिया जाए| वहाँ की सङक पर काफी पानी रहता है, इससे मुझे बहुत आराम होगा|अरे भैया, तुम्ही बताओ कि कल के विशेष बुलेटिन में क्या मसाला था|”
इधर भारत क्रिकेट में हारा नहीं कि सवाल उठने लगे कि जब यही हाल होना है तो बेचारे गांगुली क्य | |