October 31, 2006 को प्रकाशित। लेखकः राकेश खंडेलवाल
फिर मंगल आ गया सामने चर्चा करने आना है इधर उधर से ढूँढ़ ढांढ कर फोटू भी चिपकाना है लिखना क्या है सोच सोच कर कलम सरकती हाथॊं से किसका चिट्ठा छोटा है, किस पर लंबा अफ़साना हैचिट्ठा चर्चा से पहले चर्चाकारों से मिलते हैं जिनके कारण ही रोजाना चर्चा के गुल खिलते हैं कितनी मेहनत करते हैं, शब्दों में बांध नहीं पाता हमको तो पढ़ने में ही लगता है पापड़ बिलते हैं एक फ़ुरसतिया आख्यान जिसने पढ़ा वो वहीं का वहीं रह गया फिर खड़ा टिप्पणी को मचलने लगे सब गणक कुंजियों के पटल खड़खड़ाने लगे
एच ओ वी लेन में मिल गया था टिकट थे अकेले तभी, यह समस्या विकट कोई सहयोगी बन कर चले साथ में रोज ही अपनी जुगतें भिड़ाने लगे
एक स्पर्श जो कि रतलाम से आ गया यों लगा पूरे ही जाल पर छा गया ऐसा है उस छुअन का नशीला असर जाल पर जा गणक लड़खड़ाने लगे
एक नारद से जो खत पठाता रहा वो घटाओं सा घिर घिर के छाता रहा जब से कासिद को जीवन दिया दूसरा सब ब्लागी कबूतर उड़ाने लगे
एक तरकश है, है इक उड़नतश्तरी जान पाये न कितनी विधायें भरी ली कलम हाथ में, कुछ लिखूँ, क्या हुआ कोष के शब्द सब गड़मड़ाने लगे
जब से भाषाओं के सिलसिले जुड़ गये कुछ इधर आ गये, कुछ उधर मुड़ गये एक ये जो कभी बन के पुरवा बहे तो कभी बन घटा तड़तड़ाने लगेलम्बी चर्चा में दोषी नहीं मैं तनिक क्या लिखूंगा न इसकी भनक थी तनिक कैद होकर जो माऊस की क्लिक में रहे खूँटे वे शब्द, सब अब तुड़ाने लगेछुट पुट बतलाते हैं हमको ओपन सोर्स कहां से आया किसने इस पर काम किया है किसने इससे नाम कमाया उत्तर भारत क्यों कर फिछड़ा, दक्षिण भारत है जो आगे अपने चिट्ठे पर बिन उत्तर दिये, प्रश्न यह एक उठाया रत्ना की रसोई तकनीकी और अधिक कुछ होती जाती ढूँढ़ ढाँढ़ कर इधर उधर से अब सबको चलचित्र दिखाती बना बना कविता की गुझिया पहले तो परोस देती हैं फिर खुद ही उसमें मिस्रण की कितनी हैं कमियां गिनवाती और रात जो सपना देखा वह मध्यान्ह तलक बाकी था इसीलिये कुछ नजर न आया, इतनी ज्यादा चढ़ी खुमारी दूरबीन को लगा लगा कर, जाल, जाल पर फेंके मैने कोई ऐसा मिला न मुझको जो हो चर्चा का अधिकारी
आज की टिप्पणी:- और टिप्पणी एक आज की रत्ना की रसोई पर पाई जो समीर ने लिखी" वाह क्या बात खोज कर लेकर आईं मजा आ गया, दाद कबूलें, रखें रसोई अपनी चालू इसी बहाने हम सब खायें नई नई हर रोज मिठाई वाकई, शायर/कवि साहब का अंदाज़ और आत्मविश्वास देखने लायक है। क्या बात खोज कर लाईं हैं, इस पर तो आप दाद कबुल करें, मजा आ गया. ऐसे ही परोसते रहें, सच में, कोई शिकायत नहीं रहेगी.आज का फोटो:- भात बाजी से

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October 30, 2006 को प्रकाशित। लेखकः संजय बेंगाणी
यह किसी भी चिट्ठाचर्चाकर्ता के काम में टाँग घुसेडने का प्रयास नहीं हैं. हमे ऊपर से आदेश हुआ था कि इस प्रकार का कोई प्रयास करो. यानी अगर पुरा भोजन न परोस सको तो बीच-बीच में अल्पाहार ही करवाते रहो. तो यह मध्याहन चर्चा हैं, फूलमफूल चर्चा नियमित चर्चाकार करेंगे ही.आधुनिक धृतराष्ट्र के सामने संजय लेपटोप लिए बैठे हैं. अचानक महाराज का आदेश हुआ की उन्हे चिट्ठादंगल में कौन-कौन अपनी कलमे भाँज रहा हैं बताया जाए. आदेश आखिर आदेश होता हैं, संजय ने अपनी उँगलीया कुंजीपटल पर चलानी शुरू की. नारदजी के करतालो की ध्वनि कानो से टकराई साथ ही चिट्ठादंगल का दृश्य स्पष्ट उभरने लगा. संजय: महाराज जितेन्द्र चौधरी नामक यौद्धा कुछ मुफ्त के कुछ अस्त्र बटोर कर लाए हैं तथा यहाँ बाँट रहे हैं. जरूरतमंद यौद्धा लाभ ले. धृतराष्ट्र : ठीक हैं, अब आगे कौन हैं? संजय : महाराज आगे मैं देख रहा हूँ रमाजी फिरंगी भाषा में अपना श्रृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन विस्तार से कर रहे हैं, "ब्रह्मा जी ने श्रृष्टि रचने का दृढ़ संकल्प किया और उनके मन से मरीचि, नेत्रों से अत्रि, मुख से अंगिरा, कान से, पुलस्त्य, नाभि से पुलह, हाथ से कृतु, त्वचा से भृगु, प्राण से वशिष्ठ, अँगूठे से दक्ष तथा गोद से नारद उत्पन्न हुये। “ महाराज अधिक जानने के लिए यहाँ चटका लगाएं. धृतराष्ट्र : ठीक हैं, तुम आगे बढ़ो. संजय : जी महाराज. नए यौद्धाओं के लिए उपयोगी कड़ीयो का संकलन प्रश्नोत्तरी के रूप में हिन्दी-चिट्ठे एवं पोड्कास्ट पर किया गया हैं. धृतराष्ट्र : हूँ... यह अच्छा काम हुआ हैं. संजय : महाराज बेजी इंडीया अपनी कटपुतलियों के साथ जुगलबन्दी करते नजर आ रहे हैं, आप भी आनान्द ले “गीत है........ साँसें साँसों में घुल........... संगीत है........ रब़ भी हो चला मगन रे.........”
धृतराष्ट्र : अच्छा आज इतना ही. बाकी हम नियमित चर्चाकार से सुनेंगे. संजय : जी महाराज.
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को प्रकाशित। लेखकः अनूप शुक्ल
यही तो प्यार है आज की चिट्ठाचर्चा कुछ देरी से काहे से आज हफ्ते का पहला दिन है। सोमवार पर इतवार की खुमारी का कब्जा है। कल रात जब कंप्यूटर को शुभरात्रि बोलने जा रहे थे कि रवि रतलामी जी ने बताया कि आज की चर्चा हम करें या करायें। सो हम जिम्मेदारी वीरता पूर्वक अपने कंधों पर ऒढ़कर सो गये। सबेरे उठे तो अलार्म बज चुका था, सब कुछ बज चुका था सो हम नमस्ते का बोर्ड लगाकर चले गये आफिस और अब जब आये हैं खाना खाने तो वायदा निभाने के लिये लिखने के लिये तैयार हैं। शुरुआत भावना कंवर की कविता से जो उन्होंने बाल दिवस के अवसर के लिये लिखी है/थी:- खुद तो लेकर भाव और के बात सदा ही कहते हैं ऐसा करने से वो खुद को भावहीन दर्शाते हैं।
हैं कुछ ऐसे उम्र से ज्यादा भी अनुभव पा जाते हैं और हैं कुछ जो उम्र तो पाते अनुभव न ला पाते हैं।
साथ की फोटो देखकर निदा फाजली का शेर याद आता है:- यूं जिंदगी से टूटता रहा, जुड़ता रहा मैं, जैसे कोई मां बच्चा खिलाये उछाल के।
दीक्षा भूमि लगे हाथ आप महाभारत कथा में यदुवंश का नाश भी देख लें जो दिखा रहे हैं जी के अवधिया जी। इसी क्रम में मिर्ची सेठ ने निहंग सिख के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी। शैलेश अपने प्रिया को आते देख कन्फ्यूजिया गये कि उनका स्वागत कैसे करें:- प्रिये, कल रात एक सपना देखा देखा तुम उतर रही हो आसमान से पंखों के आसन पर बैठी हो तुम हाथ में केवल आशीर्वाद है शायद वह 'क्रिसमस' का दिन था मैं दौड़ने लगा था इधर-उधर कहाँ से लाऊँ फूल कहाँ से लाऊँ सुगन्ध कहाँ से लाऊँ स्वागत-मालिका किस-किस को बुलाऊँ किसको ना बुलाऊँ? समोसे गरम हितेंद्र बता रहे हैं साइट के बारे में जो हिंदी में विज्ञान प्रसार का काम करती है लेकिन लोग बताते हैं कि उसकी भाषा में कुछ लोचा है और वैज्ञानिकों की की जीवनी के लिये हल्की भाषा का उपयोग किया हुआ है। लेकिन आप वो सब छोड़िये और चलिये सैर पर मनीष के साथ पचमढ़ी के लिये। वहां आप वह जगह भी देखिये जहां भगवान बुद्ध ने बौद्ध धर्म में दीक्षा ली थी। समोसे वाले की दुकान देखकर आपका मन करेगा कि पहले खा लें फिर आगे बात करें। और जब आप गर्म समोसे से निपटेंगे तो आपको मल्लिका शेरावत मिलेंगीं जिनकी उमर प्रतीक को भी नहीं पता। लेकिन आप कुछ भी कर लो, कुछ भी दिखा लो निठल्ले यही कहेंगे कि मजा नहीं आया। इस पर नीरज दीवान ने एक जांच बैठा दी और फैसला भी दिया कि असली क्या है नकली क्या है? उधर उन्मुक्त गायब होने का वरदान के बारे में बता रहे हैं। अब मिसिर जी की दुविधा आप उनके ही मुंह से सुने:- आजकल कुछ दिनो से लगता है, कुछ तो हुआ है क्योंकि हिन्दी ब्लाग जगत मे कविता लिखने पढ़ने का शौक जोरों पर है, यहाँ तक कि बहुत सारे ब्लागर तो टिप्पणियाँ भी इसी विधा मे करने लगे हैं। इसी धुन मे मैने अपनी एक मित्र को एक कविता सुना डाली तो अब अक्सर फ़रमाइश हो जाती है :(। तभी पता चला कि श्वेता जी भी कवितायें लिखती है..तो लगे हाथों हमने भी फ़रमाइश कर डाली, कविता तो आ गयी इस आदेश के साथ कि Now u have to listen to me. That is I want ur detailed reaction about the poem, even if u dont like it. ok?
मिसिरजी को लगता है बात समझ में आ गयी और उन्होंने कविता पेश कर दी:- कविता की तारीफ समीरलाल जी ने कर दी और अपनी कुंडलिया भी सुना दी:- चैंम्पियन ट्राफी में हुआ, यह कैसा अत्याचार पाकिस्तान पहले गया, फिर भारत का बंटाधार फिर भारत का बंटाधार कि अब खेलो गुल्ली डंडा ग्रेग गुरु ही बतलायेंगे,जीत का फिर से हथकंडा. कहे समीर कवि कि बैठ कर अब पियो शेम्पियन गुल्ली डंडे के खेल में,बनना तुम विश्व चैंम्पियन. कुंडलिया से निपटे से हायकू का रन भी चुरा लिया:- खेलें क्रिकेट गुरु ग्रेग हों संग रंग में भंग.
अब इसके बाद सारे चिट्ठे आउट हो गये और हमारी पारी घोषित। कल की बागडोर रहेगी राकेश खंडेलवाल के हाथ। आप और कुछ पढ़ें तब तक यह देख लें कि पिछले साल इसी हफ्ते क्या छपा था चिट्ठों में। आज की टिप्पणी:-इस पत्रिका के जीवनी वाले विभाग में जाकर वैज्ञानिकों की की जीवनी पढिये किस तरह की घटिया भाषा का उपयोग किया हुआ है। उदाहरण देखिये ये जगदीश चन्द्र बोस के लिये लिखे लेख में किन शब्दों का प्रयोग हुआ है- बोस अपनी छुट्टियां सुरम्य सुन्दर एतिहासिक स्थानों की यात्रा करने और चित्र लेने में बिताता था और पूर्ण-साइज़ कैमरा से सुसज्जित रहता था। अपने कुछ अनुभवों को उसने सुन्दर बंगाली गद्य में लिपिबद्ध किया। अपने पिता के उदाहरण का अनुसरण करते हुए उसके सामने सहज विकल्प प्रसिद्ध भारतीय सिविल सेवा में भरती होना था। तथापि उसका बाप नहीं चाहता था कि वह सरकारी नौकर बने जिसके बारे में उसने सोचा कि उसका बेटा आम जनता से परे चला जाएगा। इसके फलस्वरूप उसकी नियुक्ति को पूर्वव्याप्ति से स्थायी बना दिया। उसे गत तीन वर्ष का वेतन एकमुश्त दे दिया गया जिसका इस्तेमाल उसने अपने बाप का ऋण उतारने के लिए किया। इस के बारे में मैने पहले भी जुगाड़ वाली पोस्ट में लिखा है। देखिये भारत सरकार के इस जाल स्थल में डॉ ए पी जे कलाम के लिये शब्दों का प्रयोग देखिये, मानों यह लेख एक देश के राष्ट्र्पति के बारे नहीं किसी ऐरे गैरे इन्सान के लिये लिखा गया हो। इस लेख को तो पढ़ा भी नहीं जाता http://nahar.wordpress.com/2006/10/26/abtakkejugad/ आज की फोटो:-आज की फोटो घुमक्कड़ के कैमरे से जो रामचंद्र मिश्र जी को सबसे ज्यादा पसंद आयीं। क्या खूबसूरती है क्या खूबसूरती है
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October 29, 2006 को प्रकाशित। लेखकः Jitendra Chaudhary
तो भई, हम फिर से हाजिर हूँ, चिट्ठा चर्चा के लिए। एक तो ये ब्लॉगरवा (ब्लागर डाट काम) आज बहुत नटखटिया रहा है, ऊपर से ले दे कर गिनती के पाँच सात चिट्ठे। अब अनूप भाई ने बहुत कम स्कोप रखा है, क्योंकि काफी चिट्ठों की तो वो चर्चा कर ही चुके है, फिर भी हम कुछ चिट्ठे तो बाँचगे ही। आखिर हमारी भी दिहाड़ी का सवाल है। तो भई शुरु करें? (तनिक आवाज दे दोगे तो क्या बैंक बैलेन्स खाली हो जाएगा?) शनिवार २८ अक्टूबर, २००६ हाँ तो यजमान, आज शनिवार का दिन था, जैसे हिन्दी चिट्ठा संसार मे छुट्टी का दिन। सबसे पहले तो अवधिया जी ने भगवान के विराट रूप के दर्शन कराए, धन्य हो अवधिया जी। जीवन सफल कर दिया हमार। उधर हमारे वरिष्ठ चिट्ठाकार रमण कौल जी टी वी के छोटे नवाब वाले कार्यक्रम सारेगामापा के लिए कहते है: इस सीज़न में चल रहा है लिट्ल चैंप्स का मुकाबला, और सीज़न के अन्त में बचे हैं तीन फाइनलिस्ट - दिल्ली का दिवाकर, मुंबई का समीर और कोलकाता की संचिता। मुकाबले में इस से पहले के दौर में कई बढ़िया बाल कलाकार बाहर हो गए। शुक्र है कि एक उत्कृष्ट गायिका अभी भी बची हुई है - संचिता। रमण भाई, आपने खूब पहचाना, अभी अभी ख़बर मिली है कि संचिता ने यह प्रतियोगिता जीत ली है।उन्मुक्त हरिवंश राय बच्चन आत्मकथा का तीसरा भाग प्रस्तुत कर रहे है। उन्मुक्त जी, देख लीजिएगा, शायद बच्चन साहब की आत्मकथा कापीराइट की श्रेणी मे आती है, कंही लेने के देने ना पड़ जाएं।बच्चन साहब कहते है: इलाहाबाद की मिटटी में एक खसूसियत है – बाहर से आकर उस पर जमने वालों के लिये वह बहुत अनुकूल पडती है । इलाहाबाद में जितने जाने-माने, नामी-गिरामी लोग हैं, उनमें से ९९% आपको ऐसे मिलेंगे जो बाहर से आकर इलाहाबाद में बस गए, खासकर उसकी सिविल लाइन में - स्यूडो इलाहाबादी । और हां, एक बात और गौर करने के काबिल है कि इलाहाबाद का पौधा तभी पलुहाता है, जब वह इलाहाबाद छोड दे । अरे ये क्या? यजमान पंकज बेंगानी छुट्टियां मना रहे है, अकेले नही वो भी पूरे गुजरात के साथ कहते है: क्या कहुँ... सब सुना सुना है। गुजरात का भी बडा भारी काम है भाई। दिवाली क्या आई... सब भाग गए। छुट्टियाँ जो आ गई। दिवाली के बाद लाभ पंचमी तक सब बन्द। सब बन्द यानि सब बन्द। पुरे हफ्ते ऐसा लगता है जैसे शहर में कर्फ्यु लगा है। सडकें सुनी, दुकानों मे ताले... और जीवन के लाले। सच में लाले पड जाते हैं। आप कन्फ़यूजिआए नही, ये गुजराती हिन्दी है, इन्हे सब सूना सूना लगता है, ना कि सुना सुना। वो आपको चुटकुला नही पता, एक गुज्जू भाई ने अपने (ड्राइंग)हॉल के लिए इन्टीरियर डेकोरेटर को फोन किया और बोले "जल्दी आ जाइए, हमे अपने 'होल' को डेकोरेट कराना है।" उधर आगरा मे प्रतीक भाई, हिन्दी भाषा का रोमन लिपि मे भविष्य तलाशने पर बहस कर रहे है। जितेन्दर जी कहते है नैणों की मत सुनना, बहुत ठगी होते है कौन जितेन्दर, अरे नही यार! नैणा। प्रभाकर जी भी शेर सुनाने मे पीछे काहे रहें। गिरिराज जी अपने बिखरे शब्दों की समीक्षा कर रहे है। बिखरी जुल्फें तो सुना था, बिखरे शब्द पहली बार सुन रहे है, समझने के लिए पोस्ट को पढना जरुरी है भई। कालीचरण को फिर कब्ज की शिकायत हो गयी है। टॉयलेट मे लिखते लिखते ये उनकी पोस्ट का सैकड़ा हो गया। प्रतीक एक बहुत ही बेहतरीन दिखाने की चीज दिखा रहे है, जरुर देखिएगा। हिन्दी चिट्ठे और पॉडकास्ट वालो को भी देखिए। आज का चित्र प्रतीक के ब्लॉग पर देखिए, हमे तो बहुत पसन्द आया, यहाँ इसलिए नही चिपका रहे है कि कंही शुकुल दौड़ा ना ले। पिछले साल इसी सप्ताह: हमारी कुवैत डायरी के कुछ अंक , अजनबी देश अन्जाने लोग ये चिट्ठा भी भूले बिसरे मे चला गया है। एक और ब्लॉग है सुधीर शर्मा का, उनकी एक पोस्ट विलय की नीति जरुर देखिएगा। पिछले साल शशि सिंह छठ की धूम धाम दिखाए थे, अब वो भी टहल गए है, कंही पकड़ मे आएं तो पानी मे दुई ठो डुबकी लगवाकर चार ठो, पोस्ट जरुर लिखवाइएगा। सभी बिहारी साथियों को छठ के त्योहार की शुभकामनाओं के साथ।
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October 28, 2006 को प्रकाशित। लेखकः अनूप शुक्ल
वैसे तो काम भर के चिट्ठों की चर्चा मैं सबेरे कर चुका था लेकिन कुछ रह गये। रह इसलिये गये कि उनकी चर्चा करने के लिये समय कम पड़ गया। सो अब यह एरियर चिट्ठा लिख रहा हूं। कारण यह है कल जब जीतेंद्र छुट्टी से लौटकर चिट्ठाचर्चा करें तो हलके महसूस करें। आज जब कि पूरा देश सा रे गा मा देखने में जुटा है तो रमन कौल अपना वोट तो संचिता को देने की बात कर ही रहे हैं, आपसे भी अनुरोध करते हैं कि अपना वोट संचिता को ही दें। इसके पहले वे पूंजीवादी बनाम समाजवादी सर्वेक्षण कर चुके हैं। आज जब पूंजीवाद और समाजवाद में नाम के अलावा भेद कर पाना मुश्किल होता जा रह है तो ऐसे सर्वेक्षण में कैसे वोटिंग की जाये ! क्या खूबसूरती है ये बेचारे क्रिकेट के मारे आज की एक बेहतरीन पोस्ट रही। मुरैना के भुवनेश धीरे-धीरे करके जमते जा रहे हैं हास्य-व्यंग्य लेखन में। राष्ट्रपति कलाम की तुलना में सचिन का देश के विकास में ज्यादा योगदान है यह बात व्यंग्य भी है और विडंबना भी:- लोग राजनीति में नैतिकता और इसमें अच्छे लोगों को आना चाहिए जैसी कुछ बातें कर रहे थे। इतने में एक महाशय को राष्ट्रपति कलाम साहब का खयाल आया और उसने उनके सादा जीवन, उच्च विचारों और देश के लिए उनके योगदान की तारीफ़ कर दी। अन्य लोगों ने भी उसकी हाँ में हाँ मिला दी। जब ऐसी बातें सुन-सुन कर इनके कान का दर्द बहुत बढ़ गया तो ये उबल पड़े- " किसने कहा आपसे कि कलाम ने देश का सबसे ज्यादा भला किया है, सचिन को तो लोग ऐसे भुला देते हैं जैसे उसने कुछ किया ही ना हो। जितना योगदान सचिन ने इतनी छोटी सी उम्र में देश के लिए दिया है उतना कोई माई का लाल सात जन्मों में भी नहीं दे सकता!" किसी ने उनसे पूछ लिया कि- "बताईये सचिन का देश के विकास में क्या योगदान है उसने तो सिर्फ़ अपना ही भला किया है पैसे कमाकर।" ये भड़क गये बोले- " अच्छा आपको उसका योगदान ही नजर नहीं आ रहा उसने कितने मैच जिताये सब भूल गये, आजकल के पढ़े लिखे लोग भी ये बात नहीं समझते। लानत है। "
भेड़ाघाट लेकिन इस सब हास्य व्यंग्य से अलग पंकज बेंगाणी अपनी दुकान खोले बैठे हैं। प्रतीक ने एक नयी बात उठायी कि अगर हिंदी को देवनागरी की जगह रोमन लिपि में लिखा जाये तो कैसे रहेगा। बहुत बाहियात बात है यह कुछ ऐसा विचार है पंकज बेंगाणी का जो कहते हैं:- बकवास बात है। हिन्दी को देवनागरी में ही लिखा जाना चाहिए। जो है वही है। देखिए पहली बात जो जिसकी चीज उसीको सोहे... रोमन में हिन्दी कभी ढंग से पढी नहीं जा सकती.. sms ya email तक ठीक है। बाकि हिन्दी देवनागरी लिपि में ही बेहतर है।
जो लोग हिन्दी को रोमन लिपि में लिखने के पैरोकार हैं उनकी मानसिकता गुलामी की है। हिन्दी की अपनी लिपि है और वही रहनी चाहिए... आज युनिकोड आने के बाद इतने सारे संजाल हिन्दी में भी बन गए हैं। तो रोमन में लिखने की क्या जरूरत है? और हमारी तो खुद की लिपि है.. कोई फ्रेंच या जर्मन या स्पेनिश थोडे ही है। भेड़ाघाट उन्मुक्त हरिवंशराय बच्चन के इलाहाबाद के बारे में विचार बता रहे हैं और उधर जीतेंद्र को नैनों ने ठग लिया । अब यह बात जीतेंद्र को हम कैसे बतायें कि उनके ब्लाग के नये रंग रूप ने हमें ठग लिया है और हम यही नहीं समझ पाये अभी तक कि टिप्पणी कहां / कैसे करनी है। गिरिराज जोशी आजकल बहुत सक्रिय हैं। परिचर्चा में हुये कवितागीरी का हवाला देने के साथ-साथ अपने कुछ पसंदीदा शेर पेश किये। हमारी बात वे अपने शब्दों में कहते हैं:- हमने गुजार दी ताउम्र जिनकों समझने में वो कहते है नहीं कोई सुलझा हुआ हमसा ॰॰॰ रीतेश अपनी कविता में जीवन के अकेलेपन को दूर करने की बात करते हैं:- तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो अकेले फ़ूल से उपवन नहीं बना करते सात रंगों के साथ से बनता है इन्द्र्धनुष जीवन गुलशन कर लीजिये इस बेखुदी में क्या रख्खा ह रजनीजी जिंदगी का खाका खींचते हुये कहती हैं :- इस कोने से उस कोने तक इस मकान से उस चौराहे तक हर रोज़ बाँग लगाती है ज़िन्दगी गली में कस्बे सी समाती है ज़िन्दगी प्रभाकर पांडेय ने भी अपने कुछ पसंदीदा शेर पोस्ट किये मुझे जो सबसे ज्यादा जमा वो है:- अगर ये जिद है कि मुझसे दुआ सलाम न हों, तो ऐसी राह से गुजरो जो राहे आम न हो ।
आपने ये जो ऊपर के फोटू देखे वे हमारे कालीचरण भोपाली जी के खींचे हुये हैं। बाकी फोटू भी आप यहां देख सकते हैं। आज की टिप्पणी:-1. यह शो देखता रहा हूँ, जहाँ नन्हे गायको को सुनना काफी अच्छा लगता हैं, वहीं झुठी नौक-झौंक तथा अभिजीत का लहरी से विवाद मन को खट्टा करता रहा हैं. जजो में पक्षपात भी देखने को मिला.ऐसे शो में वोटींग कमाई का माध्यम हैं जो विजेताओं के चयन को बुरी तरह से प्रभावित करता हैं. कई अच्छे गायक बाहर हो गए तो कुछ उतने अच्छे न होते हुए भी बने हुए हैं. हालमें संचिता जीत की हकदार हैं पर निर्णय वोट से होना हैं. संजय बेंगाणी2.सा रे गा मा मेरा भी पसंदीदा कार्यक्रम है । २००५ में हिमानी, विनीत, देबजीत और हेमचन्द्र के गाये गीतों का बहुत लुत्फ उठाया था हम सब ने । http://indianspirit.blogspot.com/2005/12/sa-re-ga-ma-challange-2005.html हालांकि बच्चों वाला सिलसिला मुझे २००५ के शो की तुलना में काफी फीका लगा । रही बात जजों की नौटंकी की तो रियाल्टी शो के नाम पर ये लोग संगीत सुनने का मजा बिगाड़ देते हैं और भाग लेने वालों के साथ जो होता है उसकी बानगी तो आपने बखूबी पेश की ही है । सन २००५ के सा रे गा मा के विजेता के चुनाव के पहले देबजीत को असम से मिलने वाले वोटों का नाटकीय ढंग से दिखा कर सनसनी पैदा करना हो या इंडियन आइडल - I में पंजाब के एक प्रतिभागी की वेश भूषा को ले कर की गई फराह खान की तल्ख टिप्पणी हो ये भोंडापन संगीत प्रतिस्पर्धाओं का अभिन्न अंग बनता जा रहा है। इस बारे में गुस्से में आकर ये पोस्ट लिखी थी http://indianspirit.blogspot.com/2005/09/are-we-really-entertained-on_25.html मनीषआज की फोटो:-आज सबेरे जब मैंने कुछ फोटो लगाये थे तो संजय बेंगाणी की टिप्पणी थी कि दो ही (बंदर) क्यों दिखाये। उनकी शिकायत दूर करने के लिये मैं बाकी साथियों के फोटो भी लगा रहा हूं ये भी घुमक्कड़ ने ही खींचे हैं:- पियो जी खोलकर वे दो हैं और हम तीन
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को प्रकाशित। लेखकः पंकज बेंगाणी
बहुत दिन हो गए कुछ लिखा ही नहीं। छुट्टियाँ खत्म हो गई दिवाली कि पर ये गुजराती लोग भी कमाल के होते हैं। अब कहते हैं कि चलो ना यार सोमवार से ही काम पर लौटते हैं। वैसे भी आधा गुजरात तो बाहर घूम रहा है। कोई सिंगापुर तो कोई मलेशिया तो कोई उत्तरांचल तो कोई केरल। आधे मेरे जैसे हैं जो अभी तक यहीं है और आलस उडाने के उपाय खोज रहे हैं। दिवाली आते ही यहाँ छुट्टियों का ऐसा मौसम आता है कि लगता है जैसे गाडी पटरी पर आएगी ही नहीं। खैर उम्मिद पर दुनिया कायम है और मेरा अनुमान है कि सोमवार तक सब बेक टु पवैलियन हो जाएंगे। मैं कहीं घुमने तो गया नहीं तो सोचा गुजराती चिट्ठों के संसार में ही थोडा मन बहला आऊँ, आप भी चलिए: एक जनाब मौलिक सोनी हैं, उनको तकलीफ है कि उन्हें प्रसिद्ध गुजराती लोकगीत के एक प्रकार "सनेडो" के बारे में जानकारी चाहिए और जो इंटरनेट पर पुरी उपलब्ध नहीं है। मैं सबसे जानकारी मांग रहे हैं। मै जोडना चाहुंगा कि सनेडो शैली के गीत ग्रामिण गुजरात में अत्यंत लोकप्रिय हैं। कुछ दिन पहले ही सनेडो फेम सुपरस्टार मणीराज बारोट का निधन हुआ था। उनके जाने से सनेडो गाने वाले उत्कृष्ट गायकों की कमी सी हो गई है। सुरेश जानी आज़ादी का महत्व बता रहे हैं। उन्होने इसपर पुरी श्रृंखला शुरू की है। वे इसका प्रारम्भ इस शेर से करते हैं: બની આઝાદ જ્યારે માનવી નિજ ખ્યાલ બદલે છે, સમય જેવો સમય આધીન થઇને ચાલ બદલે છે. और इसका अनुवाद: होकर आज़ाद जब मानव अपने खयाल बदलता है, समय जैसा समय भी अधिन होकर चाल बदलता है।
सुरेश भाई ने एक बहुत अच्छी बात की कि आजादी का अहसास होना निसन्देह बहुत ही सुखद अनुभव है पर ये इतनी आसानी से हासिल नही होता. हमे मन से, विचारों से और प्रतिभावों के प्रति सचेत भी होना पडता है। वे आगे कहते हैं आकाश में उडना है तो पंख तो फडफडाने ही पडेंगे। एक हैं श्री कार्तिक सोनी। बडी दुविधा में हैं, कुछ लिखना भी पर क्या लिखें तो इतना लिखा कि भई कुछ लिखना तो है, पर क्या लिखें तो यही लिखा है कि बस कुछ लिखा है। कमाल है। " अंतर नी वाणी" में सुरेश भट्ट विनम्रता का महत्व समझा रहे हैं। भगवान बुद्ध और एक किसान के वार्तालाप को प्रेषित करते हुए वे नम्रता के महत्व को समझा रहे हैं। તથાગત એક વખત કાશીમાં એક ખેડૂતને ઘેર ભિક્ષા માંગવા ગયા. ખેડૂતે ખૂબ પરિક્ષમ કરી હમણાં જ ખેતરેથી આવ્યો હતો. થાકેલો હતો. તેણે તથાગતનું પગથી માથા સુધી નિરિક્ષણ કર્યું પછી કતરાતા સ્વરે બોલ્યો – હું તો ખેડૂત છું – પરિક્ષમ કરી મારું અને પરિવારનું પેટ ભરું છું. તમે મહેનત કર્યા વિના ભોજન મેળવવા કેમ ઇચ્છો છો ? બુદ્ધે તદ્દન શાંત સ્વરે જવાબ આપ્યો – ભાઇ, હું પણ ખેડૂત છું અને ખેતી કરું છું. ખેડૂતે કહ્યું – તો પછી ભિક્ષા કેમ માગો છો ? બુદ્ધે સ્પષ્ટતા કરી, અને ખેડૂતની શંકાનું સમાધાન કરતા બોલ્યા – “ વત્સ ! હું આત્માની ખેતી કરું છું. હું જ્ઞાનના હળથી શ્રદ્ધાનાં બી વાવું છું. તપસ્યાના જળથી એ બી નું સિંચન કરું છું. વિનય મારા હળનું લાંબુ લાકડું, વિચારશીલતા ફાલ અને મન નારિયેળની કાચલી છે. સતત અભ્યાસનું વાહન મને લક્ષ્ય તરફ લઇ જઇ રહ્યું છે. જ્યાં નથી દુઃખ, નથી સંતાપ. મારી ખેતીમાં અમરત્વનો ફાલ લહેરાય છે. તમારી ખેતીના ભાગમાંથી થોડો ભાગ આપો, હું મારી ખેતીમાંથી તમને કેટલોક ભાગ આપીશ…..સોદો બરાબર છે ને ?” ખેડૂતને બુદ્ધનો પરિચય થયો અને ચરણોમાં નમી પડ્યો.
भावार्थ:
तथागत एक बार एक किसान के यहाँ भिक्षा लेने आते हैं। किसान कहता है- मैं किसान हुँ, धूप में खेती करके मेहनत करके अपने परिवार का पालन करता हुँ। आप तो मुफ्त में खाना ले जाते हैं।
बुद्ध कहते हैं: भाई मैं भी किसान हुँ। आत्मा की खेती करता हुँ। ज्ञान के हल से श्रद्धा के बीज बोता हुँ। मेरी खेती से अमरत्व की फसल लहलहाती है। थोडी फसल आप दिजीए, थोडी मैं देता हुँ।
किसान नतमस्तक हो जाता है।
और अंत में उर्मी सागर एक बार फिर एक उम्दा गज़ल लेकर आई हैं: ચાહું તો છું કે આ પરદો ઉઠે ને એ સનમ નીકળે,મગર ડર છે - ન નીકળે કોઇ ને મારો ભરમ નીકળે. તો નક્કી માનજો - મેં રાતે એનું ખ્વાબ જોયું છે,સવારે આંખ હું ખોલું અને એ આંખ નમ નીકળે. બધા પર્વત સમા છે, બોજ દિલનો થઇ રહ્યો છે એ,નદી જેવા નથી કે આંસુ વાટે મારા ગમ નીકળે. ત્રણે ત્રણ કાળને ભૂલવા હું આવ્યો છું સુરાલયમાં,ન એવું થાય સાકી, જામ મારો જામે જમ નીકળે. પ્રણયને પાપ કહેનારા, થશે તારી દશા કેવી?કદાચ અલ્લાહને ત્યાં એ જ જો દિલનો ધરમ નીકળે? જગત જો ગોળ છે તો ચાલવામાં રસ પડે ક્યાંથી?ગણું છું જેને આગેકુચ એ પીછે કદમ નીકળે. બધાનાં હાથમાં લીટા જ દોર્યા છે વિધાતાએ,પછી ક્યાંથી કોઇ વાંચી શકે એવા કરમ નીકળે? ફક્ત એથી જ કોઇની મદદ માંગી નથી શકતો,શરમથી હાથ લંબાવું અને એ બેશરમ નીકળે. કદી મારા જિગરમાં એ રીતે ના આવશો કોઇ,તમે જ્યાં છાપ પાડી હોય ત્યાં મારા જખમ નીકળે. બીજો સામાન તો ક્યાં છે કવિ બેફામના ઘરમાં?કે લૂંટવા જાઓ તો થોડાક કાગળ ને કલમ નીકળે. कुछ पंक्तियों के अनुवाद: चाहता तो हुँ कि ये पर्दा उठे और सनम निकले, पर डरता हुँ कि ना निकले और मेरा भरम निकले। तो यह तो तय है कि मैने एक ख्वाब है देखा, कि सुबह आँख खोलुँ और वो नम निकले। दुनिया जो गोल है तो चलने में क्या रखा है, लगे जो है आगे की कूच वो पीछे के कदम निकले। सबके हाथों में लकिरें ही खिंची है रब ने, कोई क्या पढे अब क्या करम निकले। इसिलिए तो किसी से मदद नहीं मांगता, कि शरम से हाथ बढाऊँ और वो बेशरम निकले। सामान तो कहाँ है कवि "बेफाम" के घर में, कि ढुंढने जाओ तो काग़ज और कलम निकले।
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को प्रकाशित। लेखकः अनूप शुक्ल
अतुल अपने लेखन में नित नये आयाम जोड़ते चले जा रहे हैं। कल उन्होंने बैट-बाल खेलते हुये चिट्ठाचर्चा की। इस मामले में वे क्रिकेट गुरू ग्रेग चैपेल के अंदाज़ में काम कर रहे हैं नित नये प्रयोग। अब ये अलग बात है कि अपने प्रयोगों के कारण बेचारे चैपेल तौलिये से पसीना पोछ रहे हैं जबकि अतुल उसी तरह की तौलिये से अपनी मुस्कान छिपा रहे हैं। किस्सागोई और कल्पनाशीलता का अद्भुत संगम रही कल की अतुल चिट्ठाचर्चा लेकिन हमारे लिये परेशानी का कारण बन गयी। यह होता है कि अगर कोई कवि शानदार कविता पढ़कर गया है तो अगले को बहुत मेहनत करने पढ़ती है वर्ना उसके हूट होने की सम्भावना निश्चित होती है। आज की कुछ खास पोस्टों के जिक्र की शुरुआत शुऐब की पोस्ट से। शुऐब जब लिखते हैं तो अपना पूरा दिल अपने लेख में नत्थी कर देते हैं। अपनी बात भारत के त्योहार प्रधान देश होने की बात से शुरू करते हैं:- क्या अजीब देश है हमारा, यहां कभी त्योहार खतम होने का नाम ही नही लेते कभी दीपावली की खरीदारी तो कभी रमज़ान की गहमा गहमी, कभी दशहरा तो कभी दर्गाग पूजा। पिछले चंद महीनों मे त्योहारों का जैसे एक सिलसिला चल रहा है।
त्योहारों के मेले में होते हुये वे धर्म की दुकान की पड़ताल करने पहुंच जाते हैं और अपने दिल का बटुआ खोलना शुरू करते हैं :- भारत कोई ऐसा वैसा देश नही जहां हिन्दू-मुसलमानों के बीच सिर्फ दंगे ही होते हैं - भारत के हिन्दू और मुसलमान अपस मे लडते ज़रूर हैं मगर एक दूसरे के बगैर रह भी नही सकते। वैसे तो मैं सिर्फ नाम का मुसलमान हूं और हर दिन मुसलमानों मे उठता बैठता हूं लेकिन अपने देश के कल्चर को ही अपना धर्म और भारत को अपनी मां सम्मान मानता हूं। मैं ने हमेशा से हिन्दू को हिन्दू नहीं बल्कि अपना भाई माना है हालांकि दंगों के वक्त अपने हिन्दू भाईयों से मार भी खा चुका हूं।
लेकिन सच बात तो यह है कि वे अपने दोस्त से मिलवाना चाहते हैं आपको:- यहां दुबई मे कहने को बहुत सारे दोस्त हैं मगर अपना जो सच्चा दोस्त है वो एक हिन्दू है, ज़रूरतों पर काम आने वाला, खुशी और दुःख मे साथ देने वाला हालांकि वो अभी तक मुझे मुसलमान ही समझता है फिर भी अपनी सच्ची दोस्ती निभाता है। हम पिछले चार वर्षों से साथ हैं लेकिन आज तक उस ने मुझ से ये नही पूछा कि दूसरे मुसलमानों की तरह तू नमाज़ क्यों नही पढता? जबकि मैं ने उस से पूछ डाला तू पूजा पाठ क्यों नही करता? उसने जवाब दियाः “हालांकि मेरे माता-पिता हिन्दू हैं और पूजा भी करते हैं लेकिन जब से मैं ने दुनिया देखा धर्म पर से विश्वास उठ गया। ये सारे लोग झूठे हैं जो सुबह शाम राम अल्लाह का नाम लेते हैं और छुप कर गलत काम भी करते हैं लेकिन मैं राम अल्लाह का नाम नही लेता सिर्फ अपने दिल की सुनता हूं जो बुरा लगे वो बुरा और जो अच्छा लगे वो अच्छा।” यह पढ़कर भाटिया जी का दिल भर आया और संजय बेंगाणी मुस्करा उठे। रत्नाजी मुनव्वर राना के बारे में लिखने से बचना भले न चाह रहीं हों लेकिन जाने-अनजाने टाल जरूर रहीं थीं। लेकिन पाठकों के दबाव और सूचना के अधिकार के आगे उनकी एक न चली और उनको मुनव्वर राना की शायरी के बारे में लिखना पड़ा। रसोई के खाने का मजा रसोई में ही है इसलिये आप बेहतर होगा कि रत्नाजी की पोस्ट पढकर ही मुनव्वर राना की शायरी का मजा लें लेकिन कुछ ऐसे शेर यहां मैं दे रहा हूं जिनको पढ़कर मुझे डर है कि आप आगे की चर्चा पढ़े बिना रसोई की तरफ़ जा सकते हैं:- मैं इक फकीर के होंठों की मुस्कुराहट हूँ किसी से भी मेरी कीमत अदा नहीं होती।
हम न दिल्ली थे न मज़दूर की बेटी लेकिन काफ़िले जो भी इधर आए हमें लूट गए।
दिल ऐसा कि सीधे किए जूते भी बड़ों के ज़िद इतनी कि खुद ताज उठा कर नहीं पहना।
मियां मै शेर हूँ शेरों की गुर्राहट नहीं जाती मैं लहजा नरम भी कर लूँ तो झुंझलाहट नही जाती।
इश्क में राय बुज़ुर्गों से नहीं ली जाती आग बुझते हुए चूल्हों से नहीं ली जाती।
अब मुझे अपने हरीफ़ों (प्रतिद्वंदी)से ज़रा भी डर नहीं मेरे कपड़े भाइयों के जिस्म पर आने लगे।
ना कमरा जान पाता है न अंगनाई समझती है कहाँ देवर का दिल अटका है भौजाई समझती हैं। रत्नाजी की रसोई में जितना अच्छा बनता है उससे अच्छा यह भी है कि परसने में कोई कंजूसी नहीं - कहां भूखे का दिल अटका है, रसोई समझती है। सृजन शिल्पी ने व्यंग्य के प्रतिमान और परसाई में हरिशंकर परसाई के लेखन और उनकी सोच के बारे में विस्तार से चर्चा की है। व्यंग्य के बारे में लिखते हुये वे कहते हैं:- व्यंग्य वही कर सकता है जो जगा हुआ है और अपने संस्कार एवं चरित्र से नैतिक है। हर कोई व्यंग्य नहीं कर सकता। व्यंग्य मजाक या उपहास नहीं होता, कटाक्ष भी नहीं होता और यह किसी का अहित चाहने की भावना से नहीं किया जाता। व्यंग्य में सुधार की दृष्टि अनिवार्य रूप से होनी चाहिए, यदि यह दृष्टि उसमें नहीं है तो वह कुछ और भले हो, परंतु व्यंग्य वह नहीं हो सकता। मनीष एक खूबसूरत गजल के शेर सुना रहे हैं :- पुराने ख्वाब पलकों से झटक दो सोचते क्या हो मुकद्दर खुश्क पत्तों का, है शाखों से जुदा रहना
डा. रमा द्विवेदी कुछ अलग-अलग परिभाषायें देती हैं:- कोई खुश है परिश्रम की रोटी कमाकर, कोई खुश है हराम की कमाई पाकर। कोई खुश है बैंक बैलेन्स बढाकर, कोई खुश है अपनी पहचान बनाकर॥
इन परिभाषाऒं के बाद वे कुछ रिश्ते परिभाषित करती हैं:- पल-पल रिश्ते भी मुरझाते हैं, उम्र बढते-बढते वे घटते जाते हैं। मानव कुछ और की चाह बढाते हैं, इसलिए वे कहीं और भटक जातेहैं॥
इन रिस्तों तक तो प्रधानमंत्री जी नहीं पहुंचे लेकिन उनको लगे रहो मुन्ना भाई बहुत पसंद आयी जैसे कि प्रतीक ने खबर दी। खबर तो गूगल की रोटी वे भी अधपकी के बारे में भी छपी है न मानो तो देख लो राजेश की बूंदे और बिंदु। आजकल के बच्चे कमउम्र में जवान हो जाते हैं। प्रत्यक्षा अभी कल अपना जन्मदिन मनाया(कौन सा यह नहीं बताया और इसपर नया ज्ञानोदय में छपी उनकी ताजा कहानी के परिचय में रवींन्द्र कालिया ने लिखा है- प्रत्यक्षा ने अपनी उम्र नहीं बतायी) और आज अपने बच्चे के भविष्य की चिंता में लग गयीं। बच्चे की पेंटिंग देखकर वे वैसे ही चकित रह गयीं जैसे कभी हम लोग उनकी पेंटिंग देखकर हुये थे । और यही सब बताते हुये वे आलस्य के पल पीने लगीं (क्या च्वाइस है!):- ऊन के गोले गिरते हैं खाटों के नीचे सलाईयाँ करती हैं गुपचुप कोई बातें पीते हैं धूप को जैसे चाय की हो चुस्की दिन को कोई कह दे कुछ देर और ठहर ले इस अलसाते पल को कुछ और ज़रा पी लें जिन्दगी के लम्हे कुछ देर और जी लें
आज की चर्चा में अभी इतना ही। बाकी बचे चिट्ठों के बारे में चर्चा देखिये दोपहर तक। तब तक अपने विचार ही व्यक्त कर दीजिये कैसी लगी इतनी चर्चा! आज की टिप्पणी:-१.बहुत बढ़िया सोच है आप की। आप का पढ़ता हूँ तो लगता है, अपना ही पढ़ रहा हूँ — अब तो अपने चिट्ठों का रंग भी एक ही है। धर्म के ढ़ोंग से दुनिया का कोई कोना नहीं बचा, अच्छा तब हो जब यह ढ़ोंग व्यक्तिगत क्रिया कलापों तक ही सीमित रहे और दूसरों को बदलने या मारने पीटने तक न पहुँचे। त्यौहारों का दौर अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों में भी शुरू हो चुका है। यहाँ अभी हालोवीन है, फिर थैंक्सगिविंग, फिर क्रिस्मस, हानक्का… नव-वर्ष तक यही दौर चलता रहेगा। इस बार दीवाली और ईद के साथ मेरी पिछले साल की कुछ ग़मग़ीन यादें जुड़ी हुई हैं। रमन कौल२.मौका ये त्योहार का, मची हर तरफ है धूम क्या हिन्दु क्या मुसलमां, सभी रहे हैं झूम. सभी रहे हैं झूम कि नेता सब खुशी से आते मिठाई दिवाली की और ईद की दावत खाते कहे समीर कि इनको देख है हर कोई चौंका गले मिल ये ढ़ूंढ़ते, कल लड़वाने का मौका. समीरलालआज की फोटो:-आज की फोटो घुमक्कड़ की नजर सेक्या ये भी ब्लागर हैं हम फूल हैं
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October 27, 2006 को प्रकाशित। लेखकः Atul Arora
कमेंट्रेटरः भाईयो और जीतू भाई की बहनों आप सबका चिठ्ठाऐ मैदान में स्वागत है। अभी अभी समीर लाल जी और फुरसतिया जी की जोड़ी अविजित शतकिय पारी निभा कर पैवेलियन वापस गई है। धुरंधर बैटिंग के छक्के चौको के मध्य एक जोरदार अपील भी कर दी गई। अपील पर अंपायर बकनर ने फैसला दिया है कि लगे रहो प्रेमेन्द्र भाई। और प्रेमेन्द्र भाई है कि सिर्फ एक दो अंपायरो के अलावा सारे अंपायरो को आईसीसी पैनल से रूखसत करवाने का परवाना तलाश रहे हैं। भरोसे और विश्वास पर पूरा संसार टिका है और कुछ लोगों ऐसे है, जिन पर मै अपने से ज्यादा भरोसा करता हू। पर मानवीय भूल भी कुछ होती है। मैने अपनी पोस्ट दीवार मे सेध की सूचना चिठ्ठा चर्चा को दी थी पर उसका कही भी जिक्र नही हुआ। तब मै कैसे विश्वास कर लू? एक दो चिठ्ठाचर्चाकारो पर तो विश्वास हे कि मेरे लेख और कविता को इस चर्चा पर जगह देगें पर सब पर नही है। खैर अब देखते हैं कि कौन से नये खिलाड़ी आज मैदान पर हैं। अरे बाप रे , यह कौन शोएब अख्तर है जिसकी बाऊँसर अपने सिर के ऊपर से निकल गई। हमारे एक्सपर्ट कमेंटेटर स्वामी जी भी साथ है। स्वामी जी आपका क्या कहना है मिसिर जी के ताबड़तोड़ कवर ड्राईव पर? स्वामीः अरे यार मिसिर ने न्यू दिल्ली टाईम की डीवीडी देख ली है, जिसमे डायलाग है " हम इस उम्मीद में छींकते है कि सरकार को जुकाम हो जाये।" जब तक यह खासी जुकाम अखबारी खबरचियो तक था , सरकार मीसा वगैरह के जरिये निपट लेती थी। अब तो ब्लाग वगैरह से पूरा देश छींकना शुरू कर दिया है तो ये बैन वगैरह ही लगायेगी सरकार। कमेंट्रेटरः हम्म,तो भाईयो और जीतू भाई कि बहनो अगली बाल, फुलटॉस और इसे हुक कर दिया है फुरसतिया जी ने हमेशा की तरह इस बार भी मनचाही दिशा में। फुरसतिया जी की बैटिंग की खासियत है , बाल चाहे आन साईड से आये चाहे आफ साईड से , उनके हुक और पुल उधर ही पड़ते है जिधर उन्हें बाल बेजने होती है। स्वामीः बिल्कुल सही, फुरसतिया जी का शॉट सीधा प्रत्यक्षा जी के आँगन मे गिरा है और सारे ब्लागर बाल उठाने साथ साथ जा रहे हैं, बिना बधाई दिये बाल नही मिलने वाली। कमेंट्रेटरः और ये अगली दो टप्पे वाली गुगली फेंकी है जीतू भाई ने। स्वामीः ये जो जीतू हैं, उनकी गुगली आजकल मिर्जा और छुट्टन बहुत शिद्दत से याद करते हैं। पर जीतू भाई क्या करे, कोच चैपल ने उन्हें टॉप आर्डर में परिचर्चा , जुगाड़ और नारद के चौके छक्के लगाने को भेज दिया है। स्वामी जी आप कौन सी गहन सोच में पड़ गये? स्वामी जीः जैसे भाटिया जी बाल से खाल निकालने की कोशिश कर रहे हैं कुछ वैसा ही फितूर हमारे दिमाग मे भी है। कमेंट्रेटरःक्या आप हमारे दर्शको को नही बताना चाहेंगे? स्वामीः अब क्या बतायें,पहले जीतू भाई की यह लाइन देखो। एक सेक्सोलाजी एक्सपर्ट: काहे का एक्सपर्ट, साले के कन्सलटिंग आफिस मे मक्खियां भी नही आती फिर उनकी यह पोस्ट पढ़ो अब दोनो मे कनेक्शन लगाओ तो पहला सवाल यह आया कि जीतू भाई को बिना सेक्सोलाजिस्ट के आफिस जाये कैसे तो यह पता नही लग सकता कि सेक्सोलाजिस्ट के कन्सलटिंग आफिस मे मक्खियां भी नही आती! हमको तो यही लगता है कि हमेशा कमर में मोबाइल खोंसकर सारी दुनिया को टिप्स देने के चक्कर में जीतू भाई को कुछ शकोसुबहा हो गया होगा तबही वो सेक्सोलाजिस्ट डा. झटका के पास गये , वहाँ उसे मक्खी उड़ाते देख कर लौट आये और सारी दुनिया को बता रहे हैं कि ...., अब यार ज्यादा मुँह न खुलवाओ, यह काम शुकुल बढ़िया करते हैं। कमेंट्रेटरः स्वामी जी, वह देखिये, टीम के तेज गेंदबाज आपके नामभाई ईस्वामी कभीअलविदा वाले शाहरूख की तरह लंबा रनअप ले रहे हैं। शेन बांड की तरह तेज गेंद फेंकते हैं। बहुतो की खोपड़िया के ऊपर से निकल जाती है। और यह उनकी अगली गेंद और यह क्या वाईड बॉल! स्वामी जी यह क्या? स्वामीः ये अपने ईस्वामी जी ने बहुत दिन से गेंदबाजी नही की है न, इसलिये थोड़ा रस्टी हो गये हैं, खुद ही कबूले हैं कि यार अब तो ऑफ़िशियली उम्रदराज़ तो हो ही गये हैं हम इनको एक ओवर में छः अलग अलग तरह की बॉल न डालकर एक तरह की बॉल डाले तो कयामत ढा सकते हैं। कमेंट्रेटरः जरा खुलासे से बताइये स्वामी जी। स्वामीः भई अब या तो नोस्टालजिया लो, या नई तकनीक का बखान कर लो, या फिर फिल्म चर्चाकर लो, पिछले सारे महीनो की खसलत एक पोस्ट में दाखिल खारिज करोगे तो पब्लिक के सर के ऊपर से जायेगी कि नही? कमेंट्रेटरःअगले ओवर से पहले एक नानकामर्शियल ब्रेक लेते हैं , सुनिये यह कविता मोहन राणा से। मैं एक बूढ़े आदमी को सुन रहा हूँ कला दीर्घा की छत पर सीले हुए अँधरे में केवल देख रहा हूँ अपने को थोड़ी देर पहल कमेंट्रेटरः और अब अगला विज्ञापन इंटरनेट रेडियो कंपनी के सेल्समैन नाहर जी से सुनिये। कमेंट्रेटरः इसको कहते है अब्दुल कादिर वाली गुगली। बॉल जाती दिख रही थी ईरान, पहुँच गयी तूरान और बल्लेबाज पढ़ने वाले क्लीन बोल्ड! स्वामीः वैसे एक बात तो है , ईस्वामी और दादा, जैसे बैट्समैन चाहे क्रीज पर जितनी देर भी रहे, बल्लेबाजी मनलुभावन करते हैं। आज दादा बहुत दिन बाद बैटिंग को आये तो लोगो को शाट अच्छे लग रहे हैं। कमेंट्रेटरः प्यारे दर्शको अगर आपको किसी भी बॉलर की गति नापनी हो आज शाम को क्रिकेट स्पेशल देखना न भूलिये, इस एक्सपर्ट ने सबकी च | |