December 31, 2006 को प्रकाशित। लेखकः Jitendra Chaudhary
लो जी जनाब! २००६ कब आया और कब चला गया, पता ही नही चला। यूं तो प्रत्येक वर्ष अपने साथ कुछ ना कुछ नया जरुर लाता है। यही हुआ भी हमारे चिट्ठा जगत के साथ। २००६ मे हमारे परिवार मे ४० से ज्यादा चिट्ठाकार शामिल हुए है। इन नये चिट्ठाकारों की लेखन शैली भी कमाल की है। ऊर्जा और जोशोखरोश तो हम बुजुर्गों से ज्यादा तो है ही। तो भई इस वर्ष तरकश वाले संजय जी के आह्वान पर हिन्दी चिट्ठाजगत तीन उदीयमान चिट्ठाकारों को सम्मानित करने जा रहा है। पूरी तैयारियां हो गयी है, बिगुल बज चुका है, आप भी शामिल हो जाइए, चिट्ठाकारों को चुनने में। पूरी जानकारी इधर है। आइए पहले हम अपना दिहाड़ी वाला काम निबटा लें, दिन शनिवार, दिनांक ३० दिसम्बर, २००६, साल खतम होने की तरफ़ बढ रहा था। लोग बाग, छुट्टियां मनाने, इधर उधर हो लिए,लेकिन अपने रवि भाई अपना तकनीकी ज्ञान बदस्तूर बाँटते नजर आए। रवि भाई जमजार के बारे मे बता रहे है, रवि भाई कहते है: जमजार - वैसे तो एक ऐसा ऑनलाइन दस्तावेज़ परिवर्तक है जिसके जरिए आप कई किस्म के दस्तावेज़ों को कई अन्य किस्म के दस्तावेज़ों में मुफ़्त में परिवर्तन कर सकते हैं, परंतु यह हिन्दी भाषा के वर्ड फ़ाइलों को बखूबी पीडीएफ़ फ़ॉर्मेट में बदलता है. अभी कुछ दिन पहले पता चला था कि चिट्ठाकारों को लैपटाप बाँटे जा रहे है तो हम भी खुश हो लिए, चेहरा साफ़ सूफ़ करके,इमेल का इन-बाक्स खोलकर, फोन के पास बैठ गए कि पता नही कहाँ से कॉल आ जाए, कि आओ भैया अपना लैपटाप ले जाओ। लेकिन मार पर इस उन्मुक्त को अब इ खबर दे रहा है कि लैपटाप वापस लिए जा रहे है। इसे बोलते है, सपनो पर कुठाराघात, इसी सदमे से हम आज की चिट्ठा चर्चा देर से किए। गिरिन्द्र याद कर रहे है मरहूम मिर्जा ग़ालिब को। गिरिन्द्र लिखते है: गालिब का जन्मोत्सव जोश के साथ दिल्ली मे मनाया गया.पुरानी दिल्ली से लेकर निजामुद्दीन तक गालिब के नज्म महकते रहे.देश और विदोशो से आए शायर दिल्ली की वही रोनक लौटाने की कोशिश करते नज़र आए जैसा गालिब चचा किया करते थे.पाकिस्तान के मशहुर शायर फरहाज़ अहमद ने समां को बनाये रखा.वही विख्यात डांसर उमा शर्मा ने गालिब की गज़लो और शायरी के साथ बेले डांस पेश किया तो गालिब की ये चंद लाईने जुबां पे आ गयी- इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया वर्ना हम भी आदमी थे काम के....
मिर्जा ग़ालिब का जन्म आगरा मे हुआ था, आगरा मे उनके मकान के बारे मे प्रतीक लिखते है: ग़ालिब से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम १९६० तक बाक़ायदा वहीं आयोजित किए जाते रहे हैं। ट्रस्ट द्वारा बड़े पैमाने पर की गई तोड़-फोड़ और निर्माण के चलते अब भवन काफ़ी बदल चुका है। विख्यात शायर फिराक़ गोरखपुरी और अभिनेता फ़ारुक़ शेख़, जिन्होंने ग़ालिब पर एक फ़िल्म का निर्माण किया था, भी इस इमारत को देखने आए थे। ऐतिहासिक तथ्य पुख़्ता तौर पर इशारा करते हैं कि वही भवन मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्मस्थल है, जहाँ आज एक गर्ल्स इंटर कॉलेज चल रहा है। हालाँकि इस बारे में अभी और शोध की ज़रूरत है कि क्या वही इमारत ग़ालिब की पुश्तैनी हवेली है।
रचनाकार मे पढिए, रवीन्द्र नाथ त्यागी की रचना, किस्से अदालतों के। शशि भाई सबको नववर्ष की बधाई दे रहे है तो उधर प्रमेन्द्र सद्दाम हुसैन को फांसी दिए जाने से दु:खी है। इसी विषय पर संजय भाई लिखते है: सद्दाम को मरना तो था ही. ऐसे नहीं तो किसी इराकी की गोली का निशाना बनता. तानाशाहो का यही अंजाम होता रहा है. पर यहाँ फाँसी देने वाले तथा खाने वाले दोनो ही कायर लग रहे है. असल बहादुरी यह होती की सद्दाम लड़ते हुए मरता. लेकिन जैसा की कहते है तानाशाह कायर होते है, सत्ता के लिए शंकास्पद लोगो पर अत्याचार करते हुए एक दिन खुद फाँसी के तख्ते तक पहूँच जाते है. आज इराक में एकता व शांति सबसे महत्वपूर्ण है. क्या सद्दाम को मार कर इसे प्राप्त किया जा सकेगा ?
मनीषा बता रही है मिस इन्डिया यूएसए के बारे में। साथ ही बता रही है जर्मनी की गर्भवती महिलाएं क्यों अपने बच्चे को २००७ मे जन्म देना चाहती है। उधर सागर चन्द नाहर भाई से हम पतियों की खुशियां बर्दाश्त नही हो रही है इसलिए सभी औरतों का आहवान करते हुए कहते है " पति से झगड़ो, लम्बी उम्र पाओ" । अमां सागर भाई, मुसीबत जितनी छोटी हो उतनी ही अच्छी, आप तो उनकी लम्बी उम्र की दुवाएं कर रहे हो। जस्ट किडिंग... देबाशीष लाए है इस हफ़्ते के जुगाड़, उधर अमित निकल लिए, नये साल के नए सफ़र पर भाई अफलातून से सुनिए बापू की यादें। इधर मास्साब के बन्दर को फोटू खिंचवाने का शौंक चर्राया है। आज का कार्टून देखिए, देसीटून्स पर । सुख-सागर मे खांडव वन का दहन पढिए। इसके अतिरिक्त मन की बात , समीर लाल की उड़नतश्तरी और कानपुर ने नवोदित चिट्ठाकार अनिल सिन्हा द्वारा नववर्ष की मंगल कामना पढिए। तुषार जोशी की कविता तुम्हारा ख्याल देखिए। आज का चित्र शशि के ब्लॉग से:  आज की टिप्पणी :डा. प्रभात टन्डन द्वारा, महाशक्ति पर: अगर सद्दाम को 148 शियायों की हत्या के एवज मे फ़ांसी दी जा सकती है तो बुश को लाखों अफ़गानी और तमाम निर्दोष इराकियों के कत्लेआम का भी सजा झेलने के लिये तैयार रहना चाहिये। - डा. प्रभात टन्डन अब दुकान बढाने का समय हो गया, जिन मित्रों का उल्लेख छूट गया हो वे मेरी गलती को नज़रान्दाज करते हुए, अपने नववर्ष को मनाने मे कोई कमी ना रखें। जाने से पहले, हिन्दी चिट्ठाकारों के परिवार की तरफ़ से आपको और आपके परिवार को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।
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December 30, 2006 को प्रकाशित। लेखकः Debashish
वर्ष 2006 हिन्दी चिट्ठाजगत के लिये 2007 की संभावनाओं का बिगुल बजाते हुये जा रहा है। यह साल हिन्दी के जाल पर फैलाव की नींव का पत्थर साबित होगा, मेरा अनुमान है कि चिट्ठाकारों की संख्या इस साल करीब 60 प्रतिशत बढ़ी जो जाल पर भारतीय भाषाओं के प्रयोग की कथित मुश्किलातों के मद्देनज़र उल्लेखनीय संख्या है। पिछले साल तक ब्लॉगमंडल पर चर्चा होती थी कि युनीकोड की राह न चलने के कारण कितने ही हिन्दी जालस्थल, जिनमें प्रमुखतः प्रोपायटरी या अन्य ट्रूटाइप फाँट्स प्रयोग करने वाले समाचार साईट हैं, डायनोसार होने की कगार पर हैं पर पद्मा और मेधास जैसे प्रयासों से अयूनिकोडित जालस्थलों के युनीकोड स्वरूप को देखना अब संभव है। हालांकि ये जानकारी आन दी फ्लाई यानि तुरतफुरत परिवर्तित हो कर दिखती है और यदि यूनीकोडित सामग्री को ये परिवर्तक स्टोर कर भी रखें तब भी मुझे अनुमान नहीं कि ये जुगाड़ लंबी दूरी की कवायद में कहाँ आ रुकेंगें और गूगल इस यूनीकोडित सामग्री को खोज पायेगा कि नहीं। पर जैसा की बांगला में कहावत है, नहीं मामा से काना मामा अच्छा। यूनीकोड के जाल पर उपयोग और समाचार माध्यमों की इस पर निर्भरता को देखते हुये उनका इस ओर बढ़ना ज़रुरी है और इस पर किया जाने वाला खर्च लाभप्रद ही साबित होगा। जाल पर हिन्दी में लिखना अब कहीं आसान है, अनुनाद के चिट्ठाकार समूह पर समय समय पर प्रेषित कड़ियों से यह यात्रा दिखती है, ढेरों उपाय हैं, और अब अगर कोई ये कहे कि पर्याप्त जुगाड़ नहीं हैं तो मैं इसे महज़ बहानेबाज़ी ही मानुंगा। वर्डप्रेस जैसे माध्यमों में सीधे हिन्दी में टिप्पणी लिखने के लिये प्लगईन आ गये हैं शायद कुछ दिनों में पोस्ट सीधे लिखने के हिन्दी संपादित्र का भी आ जाय। ब्लॉगर, जिसका अब भी अधिकांश लोग प्रयोग करते हैं और वर्डप्रेस की ५० एमबी की डेटा सीमा के मद्देनज़र आगे भी करेंगे, के लिये अगर कोई ऐसा सीधा जुगाड़ बन सके तो कितना अच्छा हो। तरकश निश्चित ही चिट्ठाजगत की शान में इज़ाफा करने वाले प्रकल्पों में से है। उभरते चिट्ठाकारों के पोल में नामांकित चिट्ठाकारों की सूची देखकर खुशी होती है, इनमें से कई न केवल अच्छा लिखते हैं वरन नियमित लिखते हैं और दुसरे का लिखा टिप्पणियों से सराहते भी हैं। गाँधी पर चिट्ठामंडल पर जो बहस हुई वह स्वस्थ चिट्ठामंडल का परिचायक है और आगे भी ऐसी चर्चायें जारी रह सकें इस लिये ज़रूरी है कि व्यक्ति नहीं विचारों की बात हो, आक्षेप निजी स्तर पर न हों और समर वैचारिक हों। अच्छा यह भी हो कि परिचर्चा जैसे फोरम में होने वाली बहसों को चिट्ठों के द्वारा भी उठाया जाय ताकि ये संवाद केवल चिट्ठाजगत ही नहीं एग्रीगेटरों के माध्यम से हिन्दी चिट्ठाजगत के बाहर भी गुंजायमान हों। ग्लोबल वायसेस आनलाईन की एक प्रतिनिधि से हाल ही में चर्चा हुई और यह पता चला कि वे भारतीय भाषाओं के संवाद में रुची रखते हैं पर यह मानते हैं कि ये समुदाय बाहरी ब्लॉगमंडल से जुड़े नहीं है। मैं और अनूप यह प्रयास कर रहे हैं कि जीवी जैसे माध्यमों से हम हिन्दी चिट्ठा जगत की उल्लेखनीय चर्चाओं को कुंयें के बाहर भी परोंसे। जीवी जैसे माध्यम भले हमें खास हिट न दे सकें पर मुख्यधारा का मीडिया ऐसे समाचार श्रोतों पर नज़र रखता है और हमे इसका लाभ लेना चाहिये। किंचिंत व्यक्तियों पर आधारित प्रकल्पों की आयु अधिक नहीं हो सकती, निरंतर के साथ मैंने यह महसूस किया है और चिट्ठाचर्चा के साथ अनूप ने यह साबित कर दिखाया है कि भागीदारी की ईंट से चिट्ठाचर्चा जैसी भव्य और टिकाउ ईमारत खड़ी की जा सकती है। हालांकि हर प्रकल्प के साथ रिंगमास्टर की उपस्थिति और रुचि चाहिये भी और अनुगूँज के लिये हमें ऐसे रिंगमास्टर की तलाश है जो इसे अपना कर समृद्ध कर सके। देसीटून्ज़ भी ऐसा एक प्रयास रहा जिसमें हम आपकी भागीदारी की भी उम्मीद करते हैं, अगर आप गंभीर या औपचारिक लेखन में रुची रखते हैं तो बुनो कहानी, निरंतर और तरकश जैसे माध्यम भी हैं। हिन्दी चिट्ठे बाँचने के लिये और नवीनतम चिट्ठों की जानकारी के लिये अब अनेक माध्यम हैं और यह सूची शायद् 2007 में भी आपके काम आयेः http://narad.akshargram.com http://chitthacharcha.blogspot.com http://groups.google.com/group/charcha http://www.hindiblogs.com http://hindi-blog-podcast.blogspot.com http://hindi-b-h.blogspot.com/ http://www.technorati.com/faves/Indiblogger http://www.myjavaserver.com/~hindi/ (फिलहाल बंद है) http://feedraider.com/u/debashish/r/dpf9x/ आप सभी के लिये नववर्ष की हार्दिक मंगलकामनायें! Labels: debashish
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December 28, 2006 को प्रकाशित। लेखकः अनूप शुक्ल
आज जब मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं तो साल का आखिरी हफ्ता चल रहा है। एक तरह से मेरी नियमित चर्चा की यह आखिरी पोस्ट है। साल की समापनी पोस्ट जीतेंद्र लिखेंगे क्योंकि उस दिन उनकी ही बारी है। चर्चा की शुरुआत जब हुयी तो इसे नियमित जारी रख पाना मुश्किल लग रहा था। लेकिन फिर साथियॊं के सहयोग से ऐसा हुआ कि अब नियमित चर्चा हो रही है। सच पूछा जाये तो चर्चा का आलम यह है कि पोस्ट कम पड़ जाती हैं जिनकी चर्चा की जाये। लिखने वालों में अतुल और देबाशीष कभी-कभी देर कर देते हैं(हमारी देरी, देरी थोड़ी मानी जायेगी) । अतुल कुछ अपने काम के सिलसिले में व्यस्त हैं। जबकि देबाशीष निरन्तर, इंडीब्लागीस के अखाड़े को सजाने में लगे हैं। राकेश खंडेलवाल जी का कविता में चर्चा करने का मेरे ख्याल में अनूठा है। बीच में समीर जी की कुंडलियामय चर्चा का बेसब्री से इंतजार होता रहा। हालांकि कुछ साथियों ने यह शिकायत भी की कि हर जगह कविता धंसी है। लेकिन मुझे लगता है विविधता इस चर्चा की खाशियत है और इसे बने रहने चाहिये। तुषारजोशी कुछ ठंडे से पड़ गये मराठी चर्चा से और पंकज को लगता है चुनाव ने बुखार ने जकड़ लिया इसीलिये गुजराती चिट्ठाचर्चा भी कुछ ढीली है। निठल्ले साथी अब देखते हैं आगे कितनी जल्दी-जल्दी लिखना शुरू करते हैं। चिट्ठाचर्चा में अभी तक कोई मानक अंदाज नहीं बन पाया। अतुल, जीतेंद्र और अभी रविरतलामीजी की केबीसी-III स्टाइल में पेश की गयी आखिरी पोस्ट के पेश करने का अंदाज लोगों ने बहुत पसंद किया। संजय के हाथ में काफ़ी का मग लिये चिट्ठादंगल के किस्से का लुत्फ लेने का अलग ही मजा है। लेकिन कभी-कभी मुझे यह भी लगता है कि इस शानदार अंदाज में पोस्ट जिसका किया जा रहा है वह गौड़ सी हो जाती है। शायद आगे आना वाला समय इसका व्याकरण तय करे लेकिन यह मेरी फिलहाल की सोच है। एक बात कभी-कभी इस बारे में उठती है कि मेरी चर्चा के लिये चिट्ठे नहीं हैं या मेरा चिट्ठा छूट गया। पहले चिट्ठा छूट जाने की बात। आम तौर पर चर्चा करने वाले साथी देखते हैं कि नारद में जिस चिट्ठे तक कवरेज हो गया है उसके बाद के चिट्ठे के बारे में लिखा जाये। लेकिन अक्सर होता है कि चिटठे की वह पोस्ट दिखती नहीं। यह या तो इसलिये होता है कि नारद में ब्लाग है नहीं या फिर इसलिये कि आपने जब अपनी पोस्ट लिखनी शुरू की तबसे और पोस्ट पोस्ट करने में एकाध दिन का समय हो जाता है। और इसी चक्कर में जब आपकी पोस्ट आती है तो वह दूसरे पेज पर चली जाती है। इसलिये यह अच्छा रहेगा जब आप अपनी कोई पोस्ट लिखें तब अपने ड्राफ्ट को फाइनल करके नयी पोस्ट में ही डालें!ड्राफ़्ट को ही प्रकाशित करने से पोस्ट पुरानी पोस्टों में चली जायेगी। खासतौर से ब्लागस्पाट वाले साथी इस पर ध्यान दें। चर्चा के लिये चिट्ठे न होने की बात भी पर भी मुझे यह लगता है कि अगर चर्चा के लिये पर्याप्त पोस्ट नहीं हैं तो अगर ठीक समझें तो उस पोस्ट की चर्चा विस्तार से की जा सकती है जिसे किसी चर्चा में अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाया या किसी कारण वश वह छूट गयी। जीतेंद्र ने पिछले साल की पोस्ट भी लिखनी शुरू की थी। तो ऐसे में जबकि आज के अधिकांश चिट्ठों की चर्चा हो चुकी हैं हम साल के इस आखिरी सप्ताह की अपनी चर्चा पोस्ट पेश करने जा रहे हैं। कुछ और लिखने के पहले बता दें कि वर्ष २००६ के सबसे अच्छे चिट्ठाकार के चुनाव नजदीक आ गये हैं। कुल ३० चिट्ठाकारों के नामांकन आ चुके हैं। उसमें से १० अच्छे चिट्ठों का चयन निम्न लोग करेंगे:- १.रवि रतलामी २.अनूप शुक्ला ३.जीतेंद्र चौधरी ४.संजय बेंगाणी ५.प्रतीक पांडेयइसके बाद वोटिंग का दौर शुरू होगा। तब तक आप अपने सबसे अच्छे चिट्ठाकार के बारे में निर्णय लेने का काम शुरू कर दीजिये। आज की पोस्टों में सबसे चर्चित रही श्रीश जी पोस्ट जिसमें उन्होंने शहीद उधम सिंह को याद किया है। शहीद उधम सिंह के बारे में लिखते हुये श्रीश लिखते हैं:- आज फैशन है कि गांधीवाद का, गांधीगिरी का भगवान को गाली दो लेकिन गांधी की जरा भी आलोचना न करो। अब आप कहेंगे कि इसमें गांधी का क्या कसूर है, है कसूर लेकिन उसकी बात कभी बाद में अलग से करुँगा। हमें पढ़ाया जाता है, बताया जाता है यही सब। गांधी जी ने अफ्रीका से आने के बाद अंग्रेजों की कभी एक लाठी भी न खाई। मजे की बात है कि इतने के बावजूद जब आशीष लिखते हैं :- लेकिन मेरी समझ मे ये नही आता कि उधमसिंह की महानता गांधी नेहरू की आलोचना करने से कैसे बढ जायेगी ? क्या किसी भी शहीद को महान सिद्ध करने के लिये उसे किसी और से तुलना करना(किसी और की आलोचना) जरूरी है ? तो पंडितजी बड़े आत्मविश्वास से कहते हैं:- आशीष भाई, पोस्ट ध्यान से पढिए। मेरा निशाना गांधी नहीं उनके तथाकथित चेले हैं जो जानबूझकर अन्य शहीदों का अपमान करने पर तुले हैं। इसका एक सामान्य उदाहरण था अंडमान-निकोबार में वीर सावरकर का चित्र हटाया जाना। अब जब तक आशीष ध्यान से पढ़ें तब तक आप शहीद उधमसिंह के बारे में जानकारी प्राप्त कर लें:- क्रांतिवीर उधम सिंह का जन्म पंजाब-प्रांत के ग्राम सुनाम (जनपद - संगरुर) में २६ दिसंबर १८९९ को हुआ था। इनके पिता का नाम टहल सिंह था। वर्ष १९१९ का जलियांवाला बाग का जघन्य नरसंहार उन्होंने अपनी आँखों से देखा था। उन्होंने देखा था कि कुछ ही क्षणों में जलियांवाला बाग खून में नहा गया और असहाय निहत्थे लोगों पर अंग्रेजी शासन का बर्बर अत्याचार और लाशों का अंबार। उन्होंने इसी दिन इस नरसंहार के नायक जनरल डायर से बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी। प्रतिशोध की आग में जलते हुए यह नर-पुंगव दक्षिण-अफ्रीका तथा अमरीका होते हुए वर्ष १९२३ में इंग्लैंड पहुँचा। वर्ष १९२८ में भगतसिंह के बुलाने पर उन्हें भारत आना पड़ा। १९३३ में वह पुनः लंदन पहुँचे। तब तक जनरल डायर मर चुका था, किंतु उसके अपराध पर मोहर लगाने वाला सर माइकल-ओ-डायर तथा लॉर्ड जेटलैंड अभी जीवित था। आगे शहीद उधमसिंह की वीरता और बलिदान का जिक्र करते हुये श्रीशजी ने लिखा:- आज जिस लोक में वे हों क्या उन देशभक्तों को उनकी उपेक्षा पर दुख हो रहा होगा ? बिल्कुल नहीं क्योंकि उनका जीवन गीता के निष्काम कर्म का जीवंत उदाहरण था। उनकी खासियत ही यही थी कि उन्हें बस सरफरोशी की तमन्ना थी बदले में कुछ चाहते होते तो कांग्रेसियों की तरह धरने-सत्याग्रह करते और नेता बनते। आज की दूसरी उल्लेखनीय पोस्ट है शैशव में सफाई के महत्व को रेखांकित करती हुयी पोस्ट! इसमें गांधीजी कहते हैं:- 'मेरा बस चले तो उस रास्ते को झाड़ू लगाकर साफ-सुथरा कर दूँ। इतना ही नहीं, बल्कि वहाँ फूल के पौधे लगा दूँ। रोज पानी दूँ और आज जहाँ घूरा है , वहाँ सुन्दर-सा बगीचा बना दूँ। सफाई का काम एक कला है, कला।’ अफलातूनजी आगे बताते हैं:- बापू ने जिन संस्थाओं की स्थापना की , उनका मुख्य दफ्तर उस क्षेत्र की एक प्रयोग-शाला ही बन जाती थी। मगनवाड़ी में एक तरफ तेल घानी चलती थी , तो दूसरी तरफ हाथ - कागज बन रहा था। वाड़ी में जगह - जगह मधुमक्खी - पालन की पेटियाँ दिखाई दे रही थीं। विविध प्रकार की आटा पीसने की चक्कियों के प्रयोगों में खुद बापू भी भिड़ जाते। इन उद्योगों के साथ-साथ ग्रामोद्योगों की तालीम देने के लिए विद्यालय भी चलाया जा रहा था। देश - विदेश में अर्थशास्त्र की विद्या पढ़ने के बाद , ‘ भारत के अर्थशास्त्र की कुंजी तो ग्रामोद्योगों में ही है संजय बेंगाणी बाजार की ताकत के बारे बताते हुये कहते हैं:- बाजारबाद धन्य है, जो काम ईसाई मिशनरीयाँ शताब्दीयों तक काम कर नहीं कर पाती वह बाजार ने कर दिखाया. जो रौनक दीपावली-ईद पर नही दिखती वह एक ब्लॉगर को क्रिसमस में दिखी. मुझे किसी धर्म से कोई बैर नहीं, बस जो देखा वह लिखा.बाजार का ही प्रभाव है जो, सेलिब्रिटी लोग जिन्हे कम से कम हिन्दी तो नहीं ही आती या फिर अपने स्टेटस को बनाए रखने के लिए उन्हे हिन्दी को भूलने जैसे बलिदान करना पड़ता है वे भी हिन्दी में बोलने पर मजबूर है. कैसे? इस पोस्ट की तारीफ़ करने के साथ-साथ यह भी कहना चाहूंगा कि अगर संजय भाई साल के शुरूआत में कुछ प्रण-षण करने के चोचले में पड़ते हों और समझ न आ रहा हो कि क्या करें इस साल तो यह सोचें कि लिखने में वर्तनी की अशुद्धियां कम करने का प्रयास करेंगें। तब तक चला लेंगे और 'बाजा़र' की जगह 'बजार', ' मिशनरियाँ' की जगह 'मिशनरीयाँ' और 'शताब्दीयों' की जगह 'शताब्दियों' से काम चला लेंगे। इसमें हम मुस्कराहट के निशान के चक्कर के चोचले में नहीं पड़ रहे हैं। कविता रीतेश जी लिखी है। कुछ प्रेम से संबंधित है। लेकिन भाव अस्पष्ट से हैं। शायद मुझे ही ऐसा लगा हो। आप लोग भी देखें:- बस नाम के ही प्रेम हैं मिलते यहाँ पर नहीं मिलता रामसेवक और कर्मवीर यहाँ नाम से छोटे हुए आज मेरे कर्म भी है हमें विस्तार की जरूरत यह सुकुड़ते नाम का युग है हालांकि इसका जिक्र हो चुका है लेकिन यदि किसी ने न पढ़ी हो तो समीरलाल जी की गीता सार वाली पोस्ट पड़ ले। मजे की बात यह हल्की-फुल्की मौज-मजे की पोस्ट हमने अभी-अभी पढ़ी। जिसमें समीरलाल कहते हैं:- एक पोस्ट पर ढ़ेरों टिप्पणियां मिल जाती है, पल भर में तुम अपने को महान साहित्यकार समझने लगते हो. दूसरी ही पोस्ट की सूनी मांग देख आंख भर आती है और तुम सड़क छाप लेखक बन जाते हो.
टिप्पणियों और तारीफों का ख्याल दिल से निकाल दो, बस अच्छा लिखते जाओ... फिर देखो- तुम चिट्ठाजगत के हो और यह चिट्ठाजगत तुम्हारा है. यह सरलता से मौज लेने का अंदाज समीर भाई की खाशियत है। उन्मुक्तजी ने पंत-बच्चन विवाद की आखिरी पोस्ट लिखी। अपने विचार बताते हुये उन्होंने लिखा:- मैंने इस विवाद के बारे में संक्षेप में लिखा। इस भाग में, इस विवाद के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। जिसे न मैं उचित समझता हूं, न ही उसका इससे अधिक जिक्र करना - पढ़ने के बाद दुख हुआ। शायद बड़ा व्यक्ति होने के लिये केवल बड़ा साहित्यकार होना जरूरी नहीं, इसके लिये कुछ और होना चाहिये। चलते-चलते आप रतलामी के द्वारा पेश किये गये आज के देशी कार्टून देख लें और महाभारत कथा में जी के अवधिया जी के माध्यम से द्रौपदी स्वयंवर की कथा सुन लें। दफिलहाल चिट्ठाचर्चा में इतना ही। आगे की चर्चा अतुल करेंगे अगर पिछली बार की तरह व्यस्त नहीं रहे। इसके बाद देबाशीष और जीतू इस साल की चर्चा करेंगे। बेंगाणी बन्धु भी साल के जाते-जाते कुछ लिखेंगे ही। यह बात तुषार जोशी जी से भी कह सकता हूं। आज की टिप्पणी:-1.गीता की नवीनतम व्याख्या के लिये श्री श्री श्री 007 समीर लाल जी महाराज के चरणो मे उनके भक्त श्री 420 प्रमेन्द्रानन्द के द्वारा उनके चरण कमलो मे उनके ज्ञान द्वारा एक तुच्छ व्यायाख्या........ तुम क्यो खडे हो किसके लिये खड़े हो। यहॉं तुम्हारा कौन है। कभी खुद से चिन्तन किया कि कभी किसी को टिप्पणी की नही दूसरे से क्या अपेक्षा रखते है। कभी अपने घर का वोट पाया है, क्या तुम्हारी बात को तुम्हारे सगे सम्बन्धियों ने तुम्हारा सर्मथन किया है तो बीच बाजार आ कर वोट मागने खडे हो गये हो। अपने आप को देखो तुम्हे नही लगता कि अपनी कविताओं को सुना कर तुमने कितने अनगिनत पाप किये है। कितने अबोध विद्याथियों का श्राप (अपना तो लिख गये, और हमारे सिर पर मढ गये)तुम्हारे सिर उठाये हुये हो, उनके मुँह से निकली एक एक आह तुम्हे चैन से नही मरने देगी। प्रेमेन्द्र२.इस 'चिट्ठा-गीता' ने मन के दर्पण पर जम रही सारी धूल पौंछ डाली . प्रवचन से समझ पाया कि यह 'चिट्ठा-जगत' आभासी है और 'चिट्ठा-जीवन' नश्वर . अपने चिट्ठे के प्रति माया-मोह के सारे बंधन कट गये . अब ज्ञान की मुक्तावस्था में विचरण कर रहा हूं . गुरु उड़नस्वामी को प्रणाम! प्रियंकर
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December 27, 2006 को प्रकाशित। लेखकः संजय बेंगाणी
संजय एक लम्बे अंतराल के बाद कक्ष में कदम रख रहे थे. धृतराष्ट्र का नाराज होना स्वभाविक था. धृतराष्ट्र कोफी का घूँट लेते लेते रूके. धृतराष्ट्र : तुम लम्बी-लम्बी छुट्टियाँ मारने लगे हो. संजय : क्या फर्क पड़ता है, महाराज? आपने देखा होगा मैं आँखे फाड़ फाड़ कर हाल सुनाता हूँ, पर कोई टिप(णी) नहीं देता. वे अगर कह दे की आज नहीं फिर कभी लिखेंगे तब भी वाह-वाह करते हुए टिप(णी) दी जाती है. धृतराष्ट्र : पर तुम्हारा जो काम है, वह तो करना ही है. संजय : सही है. पर जब कोई यह लाँछन लगा कर की सारा काम तो इसने निपटा दिया, हम क्या करते. इसलिए नहीं लिखा. और टिप(णी) पर टिप(णी)..... धृतराष्ट्र : देखो संजय, अभी अपना स्तर ठीक करने पर ध्यान दो.... जब तुम अनुप, समीर, जीतु, खंडेलवाल.... इनके आस-पास भी पहुँच गए सबसे पहले मैं टिप(णी) दुंगा. अभी मेहनत करो, सिखो... संजय : आप शायद सही कह रहें है. धृतराष्ट्र : तो अब राजी मन से चिट्ठा-दंगल का हाल सुनाओ. संजय : महाराज यहाँ आकर सब नत-मस्तक हो रहे हैं. पण्डितजी याद दिला रहें है शहीद उधमसिंह की. अफ्लातुनजी भी अपने शैशवकाल को याद करते हुए महानायक की प्रयोगशाला को याद कर रहे हैं. धृतराष्ट्र : राष्ट्र-नायको को नमन. संजय : महाराज, चाहे कुछ भी हो जाए हम क्रिकेट को नहीं भूल सकते. एक मैच हुआ अधिवक्ताओं का, और हाल सुना रहें हैं महाशक्तिजी. इधर वर्तमान घटनाक्रम पर बड़ी उम्मीदों से कार्टून बनाया है, रविजी ने और भविष्य की सम्भावनाओं पर कार्टून पेश किया है राजेशजी ने. बात भविष्य की है तो, हिन्दी का भविष्य बाजार के हाथो उज्जवल दिख रहा है जोगलिखी पर. धृतराष्ट्र : अच्छी बात है, अब जरा कवियों को टंटोलो. संजय : महाराज नए साल का स्वागत हाईकु से कर रही हैं पूनमजी. तापसजी आत्म-संवाद में लीन मन को रणभूमि बनाये हुए हैं तो, राजेशजी जिन्दगी की वेदना से जूझ रहे हैं. धृतराष्ट्र ने कोफ़ी का घूँट भरा. संजय ने आँखे उठाकर देखा फिर अपना ध्यान लैपटोप की स्क्रीन पर लगा दिया. संजय : महाराज सुख सागर में आज द्रोपदी का स्वयंवर हो रहा है. वर्षांत में फिल्म देखने का कोई कार्यक्रम हो तो काबुल एक्सप्रेस तथा भागम-भाग की समीक्षा पढ़ कर जाना श्रेयकर रहेगा. रोचक विज्ञापन देखने की इच्छा हो रही हो तो यहाँ आपका स्वागत है.
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को प्रकाशित। लेखकः Udan Tashtari

अब लो कर लो बात, हमारे ई-पंडित जी अपने होनहार छात्रों से आपका परिचय करवाने लाये हैं, पूरी उत्तर पुस्तिका के साथ. बालक बड़े ही होनहार हैं और इन हाथों में देश का भविष्य उज्जवल दिखाई दे रहा है. आप भी देखें: प्रश्न: रंगीन काँच किस प्रकार बनाया जाता है ? उतर: रंगीन काँच बनाने के लिए काँच को पिघलाकर उसमें अनेक प्रकार के रंग मिलाकर रंगीन काँच बनाया जाता है।(इटस सो सिम्पल यार)
बाकि की उत्तर पुस्तिका तो पंडित जी पाठशाला में ही देखें. जबाब पसंद आयेंगे, न आये तो पाठशाला की फीस माफ और साथ में फ्री जुगाड़ी लिंक की व्यवस्था आपके लिये अलग से की जायेगी. अरे भई, आप तो सिरियस हो गये कि फीस माफ कराओ अब!! अरे, ऐसा क्या बिगड़ गया जो इतना हल्ला मचाते हो, क्या लाये थे जो लुटा आये इतनी सी १० लाइन पढ़ने में. पूरी गीता तुम्हें यही समझाने के लिये लिखी गई और तुम हो कि समझते नहीं. यह देखो, फिर से गीता सार, सिर्फ तुम्हारी इन्हीं हरकतों की वजह से उड़न तश्तरी ने इतनी वजनी किताब का सार निकाला गया है ताकि थोड़ा पढ़ो ज्यादा जानो की तर्ज पर कुछ तो समझ ही जाओगे: कल टिप्पणी नहीं मिली थी, बुरा हुआ. आज भी कम मिली, बुरा हो रहा है. कल भी शायद न ही मिले, वो भी बुरा होगा.
व्यस्तता का दौर चल रहा है... बाकी वहीं जाकर पढ़ो, फायदा करेगा यह ज्ञान, इसी चिट्ठाजगत के लिये है. जब पढ़कर आप ज्ञानी हो जायें तब राजीव जी की प्रेम के प्रति आस्था देखने पहूँचें. तभी ठीक से समझ आयेगी. ज्यादा गहराई में उतरना हो तो पढ़ो सृजन शिल्पी की पेशकश शमशेर की कवितायें और फिर टटोलें, रंजु जी का बंजारा दिल वो भी तन्हा तन्हा. वैसे नया कम्बो स्पेशल है बंजारा दिल और तन्हा तन्हा.खैर, गहराईयों की कमी नहीं है, चाहिये मात्र एक बेहतरीन गोताखोर. तो देखिये हमारे डिप गोता एक्सपर्ट डॉ प्रभात टंडन, दवाखाना छोड़ ओशो के प्रवचनों में डूबे बैठे हैं और ज्ञान गंगा का पूरा पानी, डैम फोड कर बहा रहे हैं. संभल कर जाना, करंट बहुत तेज है, कहीं बह ही न जाओ. जाने के लिये अगर रेलगाडी से जाना हो, तो रास्ते के लिये कुछ चुटकुले लेते जाओ, जीतू भाई से. रवि रतलामी के देसीटून्ज़ का मजा लो और जब मजा आ जाये, तो हँसी मजाक छोड़ थोड़ा ज्ञान भी वहीं से उठा लो ब्याज में- मॅड्रिवा लिनक्स पर हिन्दी. सुनामी की विभीषिका की याद अभी भी एकदम ताजी है हर दिल दिमाग पर, तो सुने रचना जी दो वर्ष पूर्व इससे व्यथित हो क्या लिखा था. उन्मुक्त जी के बच्चन-पंत विवाद और तपस की रणभूमि से दूर राकेश खंडेलवाल जी अपना ही एक अलग गीत गुनगुनाने में व्यस्त हैं- बस एक नाम, वह नाम एक वह चेतन और अचेतन में वह गहन शून्य में टँगा हुआ विस्तारित क्षितिजों से आगे है रँगविहीन, पर रँगा हुआ जीवन पथ का वह केन्द्र बिन्दु जिसके पगतल में सप्त सिन्धुव ह प्राण प्रणेता, प्राण साध्य वह इक निश्चय, अनुमान एक
बस एक नाम वह नाम एक
और शैशव पर देखें बापू की प्रयोगशाला का भाग ८ और दिल्ली से मनीषा जी कह रही है कि अगले साल भी रहेगी निवेशकों की मुस्कान. हम तो सभी यही चाहते हैं कि अगले साल ही क्यूँ-यह सिलसिला तो हर साल कायम रहे. अब चलते चलते रत्ना जी को भी ढ़ेरों शुभकामनायें उनके इस दृढ़ प्रतिज्ञा के लिये कि हम होंगे कामयाब. अब चलने की तैयारी. सभी को नमन.आज की टिप्पणी:संजय बेंगाणी - डॉ प्रभात टंडन के चिट्ठे पर: साधूवाद. उम्दा लिखा है. परिवार नियोजन का विरोध खुदा की मर्जी का वास्ता देकर करने वाले, बिमार पड़ने पर या दूर्घटना होने पर दवाईयाँ न ले कर दिखाए. आखिर खुदा की मर्जी जो तुम्हे बिमार किया, बचाना होगा तो बच जाओगे. दवाई लेकर खुदा के काम में टाँग काहे डाल रहे हो?
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December 26, 2006 को प्रकाशित। लेखकः राकेश खंडेलवाल
क्रिसमस का दिन समय बहुत कम,चिट्ठा चर्चा करनी है यही सोचकर आया, लेकिन चिट्ठाकार नदारद थे इधर नजर दौड़ा कर देखा, और उधर नजरें डालीं लेकिन केवल तीन संदेसे लेकर आये नारद थे सबसे पहले,खुशी नहीं है महाशक्ति ने बतलाया यद्यपि तिहरा शतक एक उनके ही हिस्से में आया ढूँढ़ रहे चेतना, कल्पना में दिव्याभ व्यस्त होकर लोकतेज ने बेघर होने का इक किस्सा बतलाया इसके बाद घिरी जो बदली,उससे बून्द नहीं टपकी घिरा अँधेरा और न कुछ भी चिट्ठों पर आकर बरसा अब छुट्टी के बाद लिखेंगे उड़नतश्तरी के तेवर उनको ही अंबार मिलेगा चिट्ठों का रत्नाकर सा आज का चित्र: वाशिंगटन डीसी में २००६ का राष्ट्रीय क्रिसमस वॄक्ष

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December 25, 2006 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami
 (चित्र- दर्पण) चिट्ठाकारों को, पता नहीं कैसे, किंग खान द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले केबीसी -3 के कुछ एपीसोड के सवाल जवाब हाथ लग गए. प्रश्नोत्तरी आपके लाभार्थ निम्नानुसार प्रस्तुत की जा रही है. केबीसी: पृथ्वी का सर्वाधिक खूंखार जानवर कौन है? उत्तर : ... बंदरो के वंशज मनुष्य ...। इसके पास न तेज दांत, न जहर, न पंजे, न मजबूत शरीर है। पर फिर भी पृथ्वी पर कोई अन्य प्रजाति इसके कहर से मुक्त नहीं। यह अन्य प्रजातियों के लिए ही नहीं स्वयं अपनी ही प्रजाति को मारने, बंदी बनाने और पीड़ा देने से नहीं कतराता। यह भूख और सुरक्षा के लिए ही नहीं मज़े और विश्वास के लिए भी मारता है। सिर्फ यह ही एक ऐसा प्राणी है जो एक साथ हजारो, लाखों को मारने की शक्ति रखता है। इसके कहर की कोई सीमा नहीं। कोई ईश्वर पृथ्वी को मनुष्य से नहीं बचा सकता। केबीसी: मनुष्य कौन है? उत्तर: अब इक्कीसवीं सदी में सुपर कंप्यूटर की सहायता से प्रमाणित हुआ है कि वास्तव में मनुष्य के ९८.८ प्रतिशत जीन्स चिम्पांजी (बन्दर जाति का सदस्य) के समान है, ६० प्रतिशत जीन्स चूहे के और 0.5 प्रतिशत जीन्स बैक्टीरिया के समान है। केबीसी : आज का आह्वान क्या है? उत्तर: बहुत आसान है:
चल उठा तलवार फिर से,ढूंढ फिर से कुछ वजह धर्म का फिर नाम ले तोड़ो इमारत बेवजह फिर मचे कोहराम और फिर आग उठे हर गली डूबने पाये शहर का, नाम फिर न इस तरह.
केबीसी: हाथी और आदमी में क्या समानता है? उत्तर: पूरी समानता है:
....न्यायमूर्ति डॉ. कोठारी ने हथिनी को मानव के समकक्ष होने का निर्णय दिया....
केबीसी: रोग भगाने का सबसे मजेदार उपाय क्या है? उत्तर : गाना सुनिए. केबीसी: तोप के गोले कितने मिमी आकार के होते हैं: उत्तर : आजकल विश्व में जिन गोलों का सबसे ज्यादा चलन हैं वे १५५ मिमी व्यास के होते हैं। पुरानी तोपों के लिये १०५ मिमी,१२५ मिमी, १३० मिमी के गोले भी बनते हैं। सारी दुनिया धीरे-धीरे १५५ मिमी तोप की तरफ बढ़ रही है। केबीसी : गूगल की टक्कर का सर्च इंजिन कौन सा है? उत्तर : टक्कर का अभी तो नहीं है, पर भविष्य की कौन कहे?
केबीसी : कूड़े का ढेर का दूसरा अर्थ क्या है? उत्तर : धूम - 2 केबीसी : सर्वज्ञ के लिए एंटीपिक्सेल बटन किसने बनाया? उत्तर : मिर्ची सेठ को मालूम होगा.
केबीसी : किसी व्यक्ति के हस्तरेखा को देख कर क्या पता लगाया जा सकता है? उत्तर : उसकी हथेली की रेखाओं को देखकर यह बता पाना कि उस व्यक्ति की शादी कब होगी, वह कितनी शादियां करेगा, कितने बच्चे होंगे, या नहीं होंगे। यह सब बता पाना नामुमकिन है। यह सब भी ढकोसला है। दूसरे राउंड का रेपिड फ़ायर सवाल- जवाब: केबीसी : अंतिम पंक्ति में खड़े होने का साहस कौन कर सकता है? उत्तर : नीरज दीवान केबीसी : किसी भी चुनाव में भाग लेने वाले प्रत्याशियों के उत्साह का क्या राज होता है? उत्तर : मैं भी सोचने को मजबूर हूँ... केबीसी : दिल में कसक कब जगती है? उत्तर : जब बारिश की बूंदें टपकती हैं केबीसी : किस किताब के जरिए उस्ताद को जान सकते हैं? उत्तर : इस किताब के जरिए. केबीसी : हाइकु दिवस समारोह कब मनाया जाता है? उत्तर : कब का तो पता नहीं, पर यहाँ मनाया जाता है. केबीसी : सर्वोपरि क्या है? उत्तर : मानवता केबीसी : गुरुओं का गुरु कौन है? उत्तर : ओये गुरू केबीसी : जयपुर में किसकी शादी का निमंत्रण है? उत्तर : कुत्तों की. केबीसी : बापू की गोद में क्या बीता? उत्तर : शैशव केबीसी : लोग समय कहाँ नष्ट करते हैं? उत्तर : ऑरकुट में **-** Labels: hindiblogs, चिट्ठा चर्चा, हिन्दी, हिन्दी चिट्ठाचर्चा
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December 24, 2006 को प्रकाशित। लेखकः Jitendra Chaudhary
चुनावों के इस दौर मे २३ तारीख का चिट्ठा लेकर हम हाजिर हूँ। अरे इ का? हम तनिक लेट हुई गए तो देबाशीश ने दन्न से २४ तारीख की चिट्ठा चर्चा भी कर दी। अरे दादा! इत्ती जल्दी का थी, क्रिसमस मनाने जा रहे हो का? खैर हम तो अपनी दिहाड़ी मजबूत करें, नही तो शुकुल दनदानाते हुए तगादे का फायर कर देंगे। तो भैया शुरुवात करते है, मिसरा जी के क्रिसमस पूर्व भोज की तस्वीरों से, मिसरा जी, जम के माल छान रहे है, तनिक देखा जाए। हमरी तरफ़ से भी सबको सुर में मैरी क्रिसमस बोला जाए। अरे इ का, इधर बबुआ अमित बदलते समय के बदलते त्योहारों से नाराज होइ गवा है, हम पर नही रे, हम पर होता तो हम का चर्चा करने लायक रहते? ये तो इन ससुरी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर नाराज है। बहुत देर धकापेल नाराजगी जताने के बाद, कहता है: मुझे क्रिसमस पर कोई आपत्ति नहीं है, त्योहारों का मकसद खुशियाँ मनाना होता है, और खुशियाँ किसी एक संप्रदाय या धर्म आदि की जाग़ीर नहीं। उन पर सभी का अधिकार है। इसलिए चाहे दीपावली हो या ईद या क्रिसमस, अपन तो हर वक्त खुशी मनाते हैं। लेकिन यह बर्ताव थोड़ा अजीब सा लगा कि ये तथाकथित हाई-फ़ाई बड़ी दुकानें केवल पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण करते हैं। जिस बाज़ार में हैं वहाँ के लोकल ज़ायके का भी ख़्याल रखना चाहिए।
अरे अमितवा नाराज ना हो, इ तो पूंजीवाद है, ससुरा जो चीज बिकने वाली होगी, बिकबै करि। का तीज त्योहार, राष्ट्रीयता, धर्म, समाज, जो कुछ भी होगा, उस पर बाजार लग जाएगा। तुम अपन स्वास्थ्य का खयाल रखो, इत्ता मत सोचों, कही चिन्ता मे अपना वजन कम कर दोगे, तो तकलीफ़ हो जाएगी, ऊ का है कि वजन बहुत जरुरी है। इधर महाशक्ति वाले प्रमेन्द्र बबुआ फिर लोगो से माफी मांग रहे है काहे? आप खुदैई पढ लो। चुनाव के दौर मे घोषणा पत्रों का दौर चालू है, जनप्रतिनिधि, राजनीतिक समीकरणो के गणित लगाकर, देश की जनता से राम और अल्ला के नाम पर वोट मांगते है। ऊपर से आशवासान भी देते है कि कि बुनकरों के दिन फिरेंगे, आखिर रोजगार देने मे भारत सबसे आगे है। ना ना, ये चुटकुला नही था, ये तो खबर थी, चुटकुला तो इधर मुन्ना भाई सुना रहे है, तो इधर ससुरी मुर्गी बदलचल निकली, मुर्गा अब सनम बेवफ़ा का गाना गाएगा। अब बेचारा मुर्गा आखिर कब तक, अपने बीते हुए पलों के एहसास मे जिए। आज पौराणिक कथाओ मे बकासुर वध पढिए और हास्य व्यंग के लिए राग-दरबारी का अगला अंक। देबाशीष आपके लिए स्वादिष्ट पुस्तचिन्ह लाए है तो रवि भाई सवाल ठोक दिए कि, बूढी गइया किसके काम की होती है? आप भी जवाब दे दीजिए। शशि के अभी भोजपुरी लोकगीत चल रहे थे उधर से भोजपुरी कहावतों का जवाबी कीर्तन भी चालू है। आज की तस्वीर का शीर्षक है खाना कब चालू होगा? आज की टिप्पणी : उड़नतश्तरी द्वारा, उन्मुक्त के ब्लॉग परआप चुनाव में विजयी हों-हमारी शुभकामनायें. और यदि प्रतिद्वन्दी की शुभकामना पाकर दिल भर आया हो, आँखें न | |