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गाँधीजी का न्यासिता (ट्रस्टीशिप) संबंधी सिद्धांत

January 31, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Udan Tashtari

गाँधी जी पुण्य स्मरण करते हुये आज की चर्चा प्रारंभ कर रहा हूँ.

१२ जनवरी से शुरु हुई जद्दो जेहद को आज अंजाम पाते देख खुशी से आँख छलक आई. इसे कहते हैं कि अगर जज्बा हो तो मंजिल पाने से( या मंजिल पर वापस लौटने से) कोई नहीं रोक सकता. भाई श्रीश शर्मा उर्फ पंडित जी १२ तारीख से विचारे, फिर वर्ड प्रेस को विदा कहे, फिर नये घर आकर( मात्र चार पोस्टों में) ही माने. बधाई, नये घर की. हम तो बीच में हिम्मत हार ही बैठे थे कि बंदा अब यही सब लिखता रहेगा, कि जा रहा हूँ, जाऊँ कि न जाऊँ, अब चल पड़ा हूँ, अब रास्ते में हूँ, अब रास्ता भूल गया हूँ. मगर नहीं, हिम्मती पंडित जी पहुँच ही गये ब्लागर धाम. बधाई. लड्डू बंट रहे है और बताया जा रहा है कि नये और पुराने घर में क्या अच्छा है और क्या बुरा. बधाई, भाई, बधाई.

हम तो बधाई दे रहे हैं मगर जीतु भाई को देखो, क्या नेक सलाह दे डाली:

अब तुम्हरा का कहें, इधर उधर भटक रहे हो बार बार, लगातार। अब कल को कोई तीसरा कुछ नयी चीज लगाएगा तो वहाँ टहल जाओगे? तुम्हारा हाल अगर नटशैल मे कहा जाए तो फिल्म खून भरी मांग वाले कबीर बेदी की तरह हो गया है।
रेखा------>सोनू वालिया------->रेखा
अपने घर मे जाओ, सबसे ज्यादा सुखी। पूरी आजादी, लेकिन जिम्मेदारी बढ जाती है। खैर, भैया, कभी ना कभी तो घर बसाना ही पड़ता है, आज नही कल, कभी ना कभी तो मोह भंग होगा ही इस ब्लॉगर से भी।



उधर हमारे फुरसतिया जी भी जनता की भारी मांग पर हाथ मुँह धोकर बेहतरीन नयी पोस्ट लेकर आये हैं: गाँधी जी, निराला जी और हिंदी पोस्ट लंबी होने के बावजूद एक सांस में पढ़वाने की काबिलियत रखती है.


निराला जी विलक्षण, स्वाभिमानी व्यक्ति थे। वे जिन लोगों का बेहद सम्मान करते थे उनसे भी अपनी वह बात कहने में दबते न थे जिसे वे सही मानते थे। किसी का भी प्रभामंडल उनको इतना आक्रांत न कर पाता था कि वे अपने मन की बात कहने में हिचकें या डरें।


आगे निराला जी कि गांधीजी से बातचीत बता रहे हैं:


महात्माजी ने पूछा-”आप किस प्रांत के रहनेवाले है?”
इस प्रश्न का गूढ़ संबंध बहुत दूर तक आदमी को ले जाता है। यहां नेता,राजनीति और प्रांतीयता की मनोवैज्ञानिक बातें रहने देता हूं, केवल इतना ही बहुत है, हिंदी का कवि हिंदी-विरोधी बंगली की वेश-भूषा में क्यों?
मैने जवाब दिया-” जी मैं यहीं उन्नाव जिले का रहनेवाला हूं।”
महात्माजी पर ताज्जुब की रेखाएं देखकर मैने कहा-”मै बंगाल मे पैदा हुआ हूं और बहुत दिन रह चुका हू।”
महात्माजी की शंका को पूरा समाधान मिला। वह स्थितप्रज्ञ हुए, लेकिन चुप रहे; क्योकि बातचीत मुझे करनी थी, प्रश्न मेरी तरफ़ से उठना था।


आगे आप उनकी पोस्ट पढ़ें .

सृजन शिल्पी जी जहाँ अपने चिट्ठे की वर्षगांठ मना रहे हैं, वहीं एक शानदार पोस्ट भी लेकर आये हैं गाँधी जी ट्रस्टीशिप के सिंद्धांत पर और आप सब से आव्हान कर रहे हैं :


गाँधीजी के न्यासिता संबंधी सिद्धांत का एक नया व्यावहारिक मॉडल भी मैंने तैयार किया है, जो किशोरलाल मश्रुवाला और नरहरि पारीख द्वारा तैयार किए गए और कुछ संशोधनों के साथ स्वयं महात्मा गाँधी द्वारा अनुमोदित सूत्रों पर आधारित है। इससे पहले कि मैं आपके समक्ष न्यासिता का वह मॉडल पेश करूँ, बेहतर होगा कि हम न्यासिता के सिद्धांत और उसके अर्थशास्त्र को गाँधीजी के शब्दों में ही ठीक से समझ लें। गाँधीजी अपनी बात को सरलतम शब्दों में व्यक्त करते थे, इसलिए उसकी अलग से व्याख्या करना मेरे ख्याल से आवश्यक नहीं है।
मेरा आपसे अनुरोध है कि न्यासिता के इस सिद्धांत के बारे में आप अपनी राय से जरूर अवगत कराएँ और यह भी बताएँ कि क्या आप इस सिद्धांत को अपने जीवन में किसी हद तक व्यवहारिक रूप से अपनाने लायक मानते हैं।



अभी इनकी वर्षगांठ की दावत उड़ाकर निकल ही रहे थे कि जीतु भाई का सालाना सिरियल का अंक देखने को मिला. जिसका गतांक आज से ठीक एक वर्ष पहले आया था, इस अंक में वो अपने वीजा के झमेले के बारे में बता रहे हैं. आशा की जा रही है, कि इसका अगला अंक जल्द ही लाया जाये, वरना पहले वाला तो भूल ही जाते हैं और फिर से पढ़ना पड़ता है. अच्छा लगता है क्या ऐसे जुल्म करते हुये.

कल और परसों के चिट्ठा चर्चा पर प्रेमलता जी टिप्पणी देखकर मुझे लग रहा है कि कोई उनके नाम से टिप्पणी कर गया है. अन्यथा जिन प्रेमलता जी को मै जानता हूँ, उन्होंने तो मुझे निरुत्साहित करने वाली कविताओं को छोड़ उत्साहपूर्ण कविता लिखने की ओर मोड़ा था. अरे भाई, ऐसा मजाक मत करो आप लोग. इतना बेहतरीन चल रहा है ज्योतिष पर जानकारी का सिलसिला. वैसे एक बात जरुर कहना चाहूँगा कि किसी भी चिट्ठाचर्चाकार का यही प्रयत्न होता है कि अधिक से अधिक चिट्ठों के बारे में लिखे और मै नहीं समझता कि कोई भी किसी को जानबूझ कर नजर अंदाज करता है. नारद पर भी सब कुछ स्वचालित है, मगर किन्हीं कारणोंवश कभी कोई पोस्ट आते ही पिछले पन्नों पर चली जाती है और अगर आप मेरा चिट्ठा पढ़े तो मेरी पिछली पोस्ट की शुरुवात मैने इसी मुद्दे को लेकर की थी. राकेश खंडेलवाल जी भी इन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं और परेशान भी रहे. मगर हम सब समझ रहे हैं कि किन्हीं तकनिकी कारणों से ऐसा हो रहा है. आशा है प्रेमलता जी, अगर वाकई उन्होंने यह टिप्पणियां की हैं तो, अपने फैसले पर पुनर्विचार करेंगी और अपने बेहतरीन लेखन को जारी रखेंगी. कभी हमने आपकी बात मान कर निराशावादी कविता लिखना कम कर दिया था तो आज आप हमारी बात मान कर लेखन जारी रखें, यही गुजारिश है. :)


हमेशा की तरह हमारे नितिन हिन्दुस्तानी जी दो दो ज्ञान की बात बता रहे हैं, एक तो ब्लागर में लेबल कैसे लगायें साइड बार मेनु बनाने के लिये और दूसरा अपने चिट्ठे की गूगल रेकिंग कैसे चेक करें. हम कर आये, बताने लायक नहीं है. बस ४ है इसलिये नहीं बता रहा हूँ. :(

इसी तरह की ज्ञानधारा आशीष जी अंतरीक्ष की जानकारी दे देकर बहाये हुये हैं और हम भी हर बार उन्हें उत्साहित करके इसी में फंसायें है और इसमें हमारा साथ देने टिप्पणी सम्राट संजय भाई और माननीय फुरसतिया जी भी जुटे हैं ताकि कहीं वो अपनी हंसी मजाक वाली पोस्ट पर वापस न आ जायें वरना हमें कौन पढ़ेगा. जब तक वो वहाँ उलझे हैं, सोचता हूँ अपनी आठ दस पोस्ट सटका देता हूँ. आशीष भाई, बहुत अच्छी और ज्ञानवर्धक जानकारी दे रहे हो, लगे रहो, साधुवाद.

रचना जी ने भारतीय राजनीतिक परिदृष्य दिखाया तो आँखें खुली रह गई और तब तक महाशक्ति एक और गजब की खबर लेकर भागते चले आये कि सास को लेकर दामाद भाग गया. लेकिन इस बात का राजनीति से कुछ लेना देना नहीं है, यह पहले बता दिया जा रहा है.

वाह वाह, रवि रतलामी भाई भी क्या खबर लायें हैं, इंडीब्लॉगीज़ 2006 पुरस्कारों के लिए नामांकन प्रक्रिया प्रारंभ हो गई है. अब चहल कदमी शुरु करना पड़ेगी. अभी तो पिछली थकान नहीं उतरी.


इंडीब्लॉग़ीज - भारत के पहले, और असली (माइक्रोसॉफ़्ट इंडिक अवार्ड की तरह नक़ली नहीं, जिसे ईनामों की घोषणा तो की, परंतु ईनाम अब तक नहीं दिए!) इंडिक ब्लॉग पुरस्कार वर्ष 2006 के लिए नामांकन प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है. भारतीय भाषाओं के चिट्ठाकारों को इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कार प्रदान करने का यह लगातार चौथा गौरवशाली वर्ष है, जिसे पुणे स्थित सॉफ़्टवेयर सलाहकार देबाशीष चक्रवर्ती अंजाम दे रहे हैं.


बाकी प्रक्रिया और अधिक जानकारी के लिये यहाँ देखें.

अफलातून जी ने बताया गांधी-सुभाष: भिन्न मार्गों के सहयात्री के विषय में और अनुराग जी बोले कभी भी प्लास्टिक के बर्तन में रख कर माइक्रोवेव में खाना ना गर्म करें। स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। सिर्फ चीनीमिट्टी के बर्तनों का ही प्रयोग करें।

मना तो कर गये तब रा.च. मिश्र जी पूछे- क्यों और कैसे? तब से अनुराग मिल नहीं रहे हैं.

मनीष जी अब गीतमाला की ११ वीं पायदान तक पहुँच गये हैं, सुनें मधुर संगीत.

प्रतीक भाई तो हमेशा से एक से एक तस्वीर लाते रहे हैं, देख तो सभी लेते हैं मगर कुछ टिप्पणी करने में जरा शरमा से जाते है, कभी डर से तो कभी, हाय, लोग क्या कहेंगे. उसी तर्ज पर आज बेनजीर भुट्टो की नये अंदाज की तस्वीर लायें है. हमने देख ली है और टिप्पणी नहीं की, यही सोचकर- हाय, लोग क्या कहेंगे.

राजसमुन्द वाले जीतु भाई ने एप्पल के आई फोन की कथा सुनाई.

आज ज्यादा कविता नहीं हुई मगर जो हुई हैं वो बड़ी उच्च कोटि की हैं, एक तो गीतकार की कलम से : मौन की अपराधिनी और दूसरी, मै प्रतीक्षित-कोई तो हो:


जानता हूँ स्वप्न सारे शिल्प में ढलते नहीं हैं
यज्ञ-मंडप में सजें जो पुष्प नित खिलते नहीं हैं
कल्प के उपरांत ही योगेश्वरों को सॄष्टि देती
औ' उपासक को सदा आराध्य भी मिलते नहीं हैं

किन्तु फिर भी मैं खड़ा हूँ, दीप दोनों में सजा कर
कोई तो आगे बढ़ेगा, आज मैं आवाज़ दूँ जब


२७ जनवरी २००७, संयुक्त राज्य अमेरिका की सिएटल नगरी में डा बृजेन्द्र अवस्थी को श्रद्धान्जलि देते हुए कार्यक्रम "कुछ संस्मरण कुछ स्मृतियाँ - महान राष्ट्रकवि डा बृजेन्द्र अवस्थी" का आयोजन किया गया। इसकी रिपोर्ट पेश की निनाद गाथा पर भाई अभिनव शुक्ल जी ने.

आज की चर्चा में बस इतना ही. जो चिट्ठे चर्चा से रह गये हों, उनसे क्षमा प्रार्थना. आप यहाँ टिप्पणी के माध्यम से भी अपनी प्रविष्टी की सूचना दे सकते हैं, यकिन मानिये लोग टिप्पणियां भी बड़ी दिलचस्पी से पढ़ते हैं, जब भी आ जाती हैं तब!!!

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मध्यान्हचर्चा दिनांक : 30-01-2007

January 30, 2007 को प्रकाशित। लेखकः संजय बेंगाणी

संजय लैपटॉप पर चिट्ठा-दंगल का हाल देख रहे थे तो दुसरी ओर धृतराष्ट्र भी अपनी कोफी क आनन्द लेते हुए चर्चा के शुरू होने कि प्रतीक्षा कर रहे थे.

धृतराष्ट्र : बताओ संजय, क्या दिख रहा है? सब कुछ शांत है या एक दूसरे से उलझे पड़े है?

संजय : सभी लिखने में व्यस्त लग रहे है, हाँ इन दिनो गाँधी पर ज्यादा लिखा गया तथा आसार है की अभी यह क्रम जारी रहेगा.

धृतराष्ट्र : ठीक है. फिलहाल कौन-क्या-कहाँ-कैसा लिख रहा है?

संजय : दिवंगत कमलेश्वरजी पर घड़ीयाली आँसू बहाए जाने की पेज-थ्री खबर दे रहे हैं, अभिषेकजी.

वहीं नेताओ की भूल से विभाजन के शिकार अनाम शहीदो पर आँसू बहने के लिए कह रहे है, जोगलिखी.

अनूप भार्गवजी भी दुःखी हैं, दो राजनैतिक दलों के बीच राजघाट पर झगड़ा हुआ तो लगा गाँधीजी की दुसरी हत्या की जा रही है.

धृतराष्ट्र : गाँधी के नाम को जितना भूना सको भूना लो. गाँधी नाम की माया है...

संजय : इसे ही कहते है हरि से बड़ा हरि नाम. यह कहना है समीरलालजी का.

धृतराष्ट्र : सभी ओर हाय-हाय मची हुई है या कोई प्रेम की बात भी कर रहा है. कवियों को देखो. आदमी प्रेम में कवि होता है या फिर कवि ही प्रेम के गीत गाता है.

संजय : कवियों से पहले, जो कह ना सके वह सुनीलजी बता रहे है, प्रेम की परिभाषा. एक सुन्दर चित्रकारी जिसे अश्लील समझा गया था, उसमें दरअसल प्रेम का दर्शन छुपा हुआ है.

वहीं लगता है, सुरेशजी प्रेम की शुरुआत प्रेमपत्र से करना चाहते है. सुनिये उनसे प्रेमपत्र की परिभाषा.

प्रेम-पत्र की बात सुन अनुभवी नज़ीर अकबराबादी भी कह उठे क्या दिन थे यारों.

मगर सावधान कवि जहाँ पिता के रूपांतरण को देख सकते हैं वहीं कवि आपको अवसादग्रस्त भी कर सकते है.

धृतराष्ट्र : यह अवसाद हमें घेर लेगा, यहाँ से आगे बड़ो.

संजय : जी, महाराज. आप लिनेक्स बनाम वीस्टा एवं मैकिन्टॉश की तुलना देखते हुए हरी धनिया ताजी रखने का नुस्खा देखें.

मैं होता हूँ लोग-आउट.

को प्रकाशित। लेखकः राकेश खंडेलवाल

आज चिट्ठों की चर्चा शुरु जो करी,
सोच में पड़ गया कि कहां से करूँ
किस को छोड़ूँ, किसे मैं समेटूँ यहाँ
और किसको कहाँ पर उठा कर धरूँ
एक चिट्ठे पे कोई नहीं पोस्ट है
लिख के ये पोस्ट वो कर गये देखिये
और जिसने लिखीं तीन टुकड़ों में है
आप बतलाईये,उसका मैं क्या करूँ

जो न जाना कभी छंद को काव्य को
खुद को अच्छा कवि वो बताने लगा
मिल गये राह में जब प्रतीक एक दिन
बन के अवसाद उनको सताने लगा
काव्य की राह का वो भगत सिंह बने
निर्णय् पांडेय जी ने लिया अंत में
उस घड़ी से कहानी की बाजीगरी
का सितारा गगन जगमगाने लगा

जगमगाते हुए ढेर तारे लिये,
यान पर ले चले साथ आशीषजी
और मन को लुभा ले जो वो साथ में
ले के आये हैं दो दो ये तस्वीर भी
जोगलिखी खबर ये भी आई यहाँ
इक नया शब्द का कोश उपलब्ध है
और अपना किचन लाये जर्मन,क्षितिज
पकती टर्की जहां पर मलाई भरी

जिनका तकनीकियों से न परिचय अधिक
लाये हैंउनकी खातिर नितिन कुछ नया
अपने चिट्ठे पे लेबल् लगा लीजिये
काम सारा ये झटपट ही पूरा हुआ
काम अब शेष नारद के जिम्मे रहा
किसको किस पॄष्ठ पर वो सजा कर रखे
अब चलूँ मैं भी शुभ रात्रि कह आपको
आज चर्चा का यह काम पूरा हुआ.


आज की टिप्पणी: मेरा हिन्दी चिट्ठा पर


बनवारी ही गया इस दुनिया से, ऐसा जान पड़ता है. नई ब्लाग की कोई सूचना तो दिख नहीं रही. :)अब आपसे मिलने के पहले हवलदार को साथ लायेंगे, ऐसा तय पाया गया है. :)
By उडन तश्तरी, at 11:57 PM


आज की फोटॊ:-

क्योंकि हर कोई बर्फ़ और सर्दी की बात कर रहा है


अंतर्जालीय चेंगड़ों का दिवंगतों को श्रद्धा सुमन

January 29, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami


भारत के सृजनाकाश के कुछ चमकते सितारे पिछले दिनों अस्त हो गए. हिन्दी साहित्य के - डॉ. ब्रजेन्द्र अवस्थी का इंतकाल पिछले हफ़्ते हुआ. इधर महान साहित्यकार, संपादक व पत्रकार कमलेश्वर के इंतकाल की खबर आई ही थी कि भारत के एक महान संगीतकार ओ.पी.नैयर के स्वर्गवास की खबर आई. चिट्ठाचर्चा की ओर से दिवंगतों को श्रद्धा सुमन.

ओ.पी.नैयर को अपने चिट्ठों के माध्यम से श्रद्धासुमन अर्पित कर रहे हैं - मनीष, नीरज, और जगदीश

बड़े दिनों बाद लाल्टू नजर आए नेवला लेकर. उम्मीद करते हैं कि अब उनका संपेरा नित्य रचनाओं की बीन बजाया करेगा. एक नया अनगढ़ कच्चा चिट्ठा अवतरित हुआ है और इस चिट्ठे से, इसके नाम के विपरीत, बहुत सी गढ़ी और गूढ़ बातें नित्य पढ़ने को मिलेंगीं.

आज का चर्चित चिट्ठा रहा फ़ुरसतिया का लिखा - काव्यात्मक न्याय और अंतर्जालीय ‘चेंगड़े'

यह चिट्ठा वैचारिक भिन्नताओं को लेकर व्यक्तिगत स्तर पर की गई टिप्पणियों का प्रत्युत्तर स्वरूप लिखा गया है. इस चिट्ठे को पढ़कर, हिन्दी ब्लॉगर टिपियाते हैं -

अंतर्जालीय चेंगड़ा विवाद पर आपका लंबा पोस्ट पढ़ कर यही लगा कि इस पर इतनी ऊर्जा ख़र्च करने की ज़रूरत नहीं थी. सच कहूँ तो आपका ताज़ा पोस्ट कमलेश्वर जी पर केंद्रित रहने की अपेक्षा थी.

कुछ इन्हीं मायनों के साथ अनूप की टीप है-

विवाद में कौन सही है और कौन गलत , ये तो नहीं जानता और ना ही ये जानना मायने रखता है लेकिन यदि ऐसी बातों से खिन्न हो कर आप के लेखन पर प्रभाव पड़े या आप का लेखन कम हो जाये तो यह हिन्दी ब्लौग जगत की क्षति होगी । इस आशा के साथ कि ऐसा नहीं होगा ।

एक और टिप्पणी पड़ी है संजय की :

अखरी तो केवल एक बात कि इस लेख में वो वाली व्यंग्यात्मक पुट नहीं थी, जिससे कायल हो आपकी लम्बी-लम्बी पोस्टें पढ़ते रहे है.

मेरी कोई टिप्पणी नहीं है वहाँ. अगर मैं कुछ टिपियाता तो इनमें से कोई एक या ऐसा ही कुछ टिपियाता.

मेरे विचार में, हिन्दी चिट्ठाकार जगत में फ़ुरसतिया बहुतों के बड़भैया हैं, और रहेंगे. और, उनके बहुत से विचारों के लिए तो मैं भी उनका सगर्व चेंगड़ा हूँ. पहले भी उन्होंने चिट्ठाकारों के आत्मसम्मान के बहुत से विवाद चुटकियों में सुलझाए थे, और भविष्य में भी सुलझाते रहेंगे.

वैचारिक भिन्नताएँ हम सब में होती हैं. एक जैसे विचार, रूप रंग तो पत्थरों के भी नहीं होते, और हम तो मनुष्य हैं. अपनी-अपनी वैचारिक भिन्नताओं को समक्ष रखना और प्रस्तुत करना भी जरूरी है. उससे भी जरूरी यह बात है कि उन भिन्नताओं को सार्वजनिक स्थल पर रखते समय व्यक्तिगत स्तर पर छींटाकसी या भाषा के अनर्थक प्रयोग से बचाया जाए.

दूसरी बात, व्यक्तिगत वैचारिक भिन्नताओं को जगजाहिर करने से भी बचा जाना चाहिए. कुछ अरसा पहले मेरे कुछ विचार मेरे कुछ चिट्ठाकार मित्रों को नहीं जमे. उन्होंने सार्वजनिक स्थल पर इसकी आलोचना की. आलोचना की भाषा के सवाल पर कुछ प्रश्न भी उठे. मैंने उनका प्रत्युत्तर सार्वजनिक रूप से ही दिया, परंतु अप्रत्यक्ष, संयत रूप से दिया. किसी अन्य को इस उत्तर प्रत्युत्तर के सिलसिले के बारे में भनक ही नहीं पड़ी. सार यह कि अपनी बातें कहते समय भाषा का प्रयोग संयत रूप से रखना ही होगा. संयत भाषा में कही गई कड़वी से कड़वी बात भी आदमी पचा लेता है, परंतु असंयत भाषा में प्रेम का इजहार भी असह्य होता है.

तीसरी बात, हिन्दी चिट्ठों की लोकप्रियता और उसकी बढ़ती संख्या के मद्देनजर इस तरह की समस्याओं से चिट्ठाकारों को भविष्य में जूझना पड़ सकता है. एक सार्वजनिक निवेदन तमाम चिट्ठाकारों से यह है कि वे अपने चिट्ठों में व्यक्तिगत आक्षेप को लेकर की गई टिप्पणियों के हिस्सों को मिटा दें - इससे बेवजह विवाद बढ़ने का खतरा रहता हैं. रहा सवाल व्यक्तिगत आक्षेप वाले चिट्ठा पोस्टों का, तो अभी तो ऐसी कोई गंभीर बात हुई नहीं है, और अगर कभी ऐसा हुआ भी तो नारद जैसे सार्वजनिक स्थलों पर उसका भी बहिष्कार किया जाना चाहिए.

मुझे लगता है कि गांधी से शुरू विवाद अनावश्यक लंबा खिंच गया है. इसे अब यहीं समाप्त किया जाना चाहिए, वह भी गांधीगिरी से. तो आइए, हम सभी चिट्ठाकार बंधु आपस में एक दूसरे को जादू की झप्पी देते हैं और अपने विवादों को भूल कर अपने काम धंधे (चिट्ठा लेखन, टिप्पणी आदान-प्रदान) में लग जाते हैं.

व्यंज़ल

**-**

रूप भले ही धर लूं चेंगड़ों का

व्यवहार कैसे बदलूं केकड़ों का


दम की बात तो कर लूँ मगर

क्या करूँ इन दूषित फेफड़ों का


कोई एक गिला हो तो बात करूं

यहाँ पर तो मुद्दा है सैकड़ों का


दौड़ में मैं अकेला पिछड़ा पैदल

जमाना आ गया है लंगड़ों का


मैं तो बन गया हूँ शिकार रवि

बिना काम पाले हुए लफड़ों का

**-**

चित्र: माई इमेजेस से

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कमलेश्वर : भावभीनी श्रृद्धांजलि

को प्रकाशित। लेखकः Jitendra Chaudhary

साथियों मै प्रस्तुत हूँ, शनिवार के चिट्ठों अर्थात दिनांक २७ जनवरी के चिट्ठों की चर्चा लेकर। आप लोग तैयार है ना?

आगे बढने से पहले, एक दु:खद समाचार, हिन्दी के जाने माने साहित्यकार कमलेश्वर जी आज हमारे बीच नही रहे। कमलेश्वर जी का शनिवार की रात साढ़े आठ बजे हृदय गति रुक जाने के कारण निधन हो गया। वे ७५ वर्ष के थे। कमलेश्वर जी के निधन से हिन्दी साहित्य, फिल्म, टेलीविजन और पत्रकारिता को अपूरणीय क्षति हुई है। मै हिन्दी चिट्ठाकरों की तरफ़ से उन्हे भावभीनी श्रृद्धांजलि अर्पित करता हूँ। हिन्दी ब्लॉगर ने अपने ब्लॉग देश दुनिया मे कमलेश्वर जी को श्रृद्धांजलि अर्पित करते हुए लिखा है :

कमलेश्वर जी संभवत: भारत के एकमात्र साहित्यकार थे जिन्हें विशुद्ध साहित्य और फ़िल्म, दोनों ही क्षेत्रों में पूरी सफलता मिली. साथ ही पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उन्होंने महती काम किया था.कमलेश्वर जी ने अपनी रचनाओं में कस्बाई और महानगरीय ज़िंदगी, दोनों ही को बहुत बारीकी से उतारा है.


आज की सबसे धमाकेदार पोस्ट रही हिन्द, हिंदी और हिन्दुस्तानी, ईस्वामी द्वारा लिखे गए इस विचारोत्तेजक लेख में ईस्वामी ने कुछ बुनियादी सवाल उठाएं है। इस बारे मे आप वहीं पर पढिए तो ज्यादा मजा आएगा, ईस्वामी कहते है :
मैं मन ही मन सोचता हूं की यार काश भाषा-प्रेम का ऐसा जज़्बा हमारे देसियों मे होता तो मेरे ब्लाग पर कितनी अधिक हिट्स पडतीं!

साथ ही ईस्वामी जी ने नास्डेक पर फहराए तिरंगे पर भी एक विशिष्ठ नज़रिया पेश किया है, ईस्वामी कहते है:

मुझे क्यों लगता है की ये भारत की सफ़लता नहीं है, ये अमरीका की सफ़लता है. भारत का कोई भय नहीं है, उस से कोई स्पर्धा नहीं है वो पालतू हो गया है - जैसे कोई निरीह नवयौवना किसी ड्रैकुला से खून चूसवाने को अपनी गर्दन आगे बढा दे! और निश्चिंत ड्रैकुला दांत गडाते हुए कहे “आज तुम्हारी ड्रेस खूबसूरत लग रही है”! नवयौवना बोले “थेंक्यू” … बिल्कुल वैसा मामला है - अपने बाज़ारों पर जैसे पकड हो रही है उप्पर वाला ही मालिक है,बीच में तो बॉम्बे स्टाक एक्सचेंज में नेस्डेक और एनवाईएसई द्वारा निवेश करने की खबरें उड रहीं थी! इनकी असली स्पर्धा तो है संयुक्त यूरोप से, चीन से. उधर किसानों की आत्महत्याएं और त्सुनामी प्रभावित नाविकों के किडनी बेचने की खबरें कहां और कहां न्यूयार्क के चौराहे पर तिरंगा! इस से बडी विसंगती नहीं हो सकती!


तरुण ने अनुराग द्वारा आयोजित वर्जीनिया रेडियो पर प्रसारित हिन्दी ब्लॉगिंग वार्ता के अंश अपने ब्लॉग पर पेश किए है जरुर देखिएगा/सुनिएगा। साथ ही वे बता रहे है उत्तरांचल के चार सपूतों को पद्मश्री पुरस्कार दिया जा रहा है। भोला जो बहुत काफी दिनो बाद, कहा जाए तो अपनी दूसरी पारी की चिट्ठाकारी मे सक्रिय हुए है, आजकल अपने पसंदीदा विषय क्रिकेट को छोड़कर तकनीकी ज्ञान बाँटने मे लगे हुए है, आज वे पिकासा चलचित्र मैनेजर के बारे मे बता रहे है। नारायण अंग्रेजी फिल्म वार आफ द वर्ल्ड के समीक्षा लिख रहे है। लोकमंच पर बिहार के किसानों की बात करते हुए लिखा गया है :
बिहार के किसान परिवारों की स्थिति प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ के होरी परिवार जैसी है। होरी किसानी करता है और उसका बेटा गोबर शहर में मजदूरी करता है। अभी बिहार में भी बुजुर्ग किसानी कर रहे हैं और युवा वर्ग बाहर जाकर मजदूरी कर रहा है या नौकरी। यह विस्थापन कुशल एवं अकुशल दोनों प्रकार के मजदूरों का हो रहा है। यही प्रवृत्ति इन्हें बचाए हुए है। राज्य सरकार की अकर्मण्यता की वजह से पलायन की प्रकृति और तेज हो गई है। कृषि एवं गांव की खराब स्थिति इसे और बढ़ा रही है। इस प्रकार बिहार में किसानों का जो मर्ज है वही उनके लिए दवा बन गयी है।

सुनील भाई २६ जनवरी पर स्वतंत्र पत्रकारिता पर अपने लेख 'विचारों की आजादी' मे लिखते है:
आजकल सरकारी सेंसरशिप का नया काम है अंतर्जाल पर पहरे लगाना ताकि लोगों की पढ़ने और लिखने की आज़ादी पर रोक लगे. सीविप इन देशों को "काले खड्डे" (Black holes) का नाम देती है और इनमें सबसे पहले स्थान पर है चीन, जहाँ कहते हैं कि 30,000 लोग सरकारी सेसरशिप विभाग में अंतर्जाल को काबू में रखने का काम करते हैं. कहते हें कि चीन में अगर आप किसी बहस के फोरम या चिट्ठे पर कुछ ऐसा लिखे जिससे सरकार सहमत नहीं है तो एक घंटे के अंदर उसे हटा हुआ पायेंगे. जिन अंतर्जाल स्थलों को चीन में नहीं देख सकते उनमें वीकीपीडिया भी है.


स्वागत और तारीफ़ करिए, नवोदित चिट्ठाकार सुरेश चिपलूकर अपने चिट्ठे, अनगढ कच्चा चिट्ठा, को लेकर प्रस्तुत हुए है। साथ ही कैलकूलेटर लेकर तैयार हो जाइए, क्योंकि सागर चंद नाहर संयुक्त परिवार पेचीदे रिश्तों की खिचड़ी पर एक लेख लेकर प्रस्तुत है। रचनाकार मे प्रस्तुत है राजकुमारी श्रीवास्तव की कहानी साहसी राजन । गिरिन्द्र झा मीडिया के अन्दर की बात बता रहे है, चुपचाप सुनिए।

आने वाले बजट के बारे मे जगदीश भाटिया का जानकारी पूर्ण लेख पढिए, फुरसतिया जी के ब्लॉग पर पढिए परसाई जी का एक प्रसिद्द व्यंग लेख पहिला सफेद बाल । आशीष द्वारा, ब्रम्हाण्ड की विस्मित कर देने वाली सस्वीरों और जानकारी के साथ पढिए, ब्रम्हाण्ड मे एक समुद्री बीच। मोहल्ला मे पढिए एक पत्र पागलखाने से, प्रस्तुत है इस लेख की कविता एक अंश : ( टंकण मे हुई अशुद्दिया खलती है)

ये दीवारें इतनी ख़ाली क्‍यों हैं?
न कोई दर्पण, न चित्र, न ही धब्‍बे
बच्‍चों के हाथों के निशान तक नहीं
केवल डरावनी सफेदी


आज की टिप्पणी : सृजनशिल्पी द्वारा, देश दुनिया पर
कमलेश्वर जी के निधन से हिन्दी साहित्य, फिल्म, टेलीविजन और पत्रकारिता को अपूरणीय क्षति हुई है। वह इस दुनिया को छोड़ कर चले गए हैं लेकिन अपनी रचनाओं में वह जो अपनी अमिट छाप कर गए हैं उससे पाठकों को हमेशा नया सोचने और समझने के लिए प्रेरणा मिलती रहेगी। परमपिता से हम दिवंगत आत्मा को परम मुक्ति प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं।



पिछले वर्ष इसी सप्ताह:
मसला ए रिहाइश, चौधरी साहब अपनी कुवैत की कहानी सुनाते सुनाते इस ब्लॉग को अनाथ करके, अचानक पता नही कहाँ, गुम हो गए, शायद आज चर्चा मेँ इनको उलाहना देने से इनकी अधूरी कहानी आगे बढे।

सिंहासन पर बैठा, उनके तमगे कौन लगाता है?

January 28, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Debashish

मित्रों चिट्ठा चर्चा में आये अवरोध के लिये क्षमाप्रार्थी है यह दल। मेरी ओर से प्रस्तुत हैं २६ जनवरी के चिट्ठों की संक्षिप्त चर्चा।

गणतंत्र दिवस के अवसर पर अनूप ने प्रकाशित किया हरिशंकर परसाई का लेख ठिठुरता हुआ गणतंत्र, कितने ही साल पहले लिखा गया पर आज भी प्रभावी।

प्रधानमंत्री किसी विदेशी मेहमान के साथ खुली गाड़ी में निकलती हैं। रेडियो टिप्पणीकार कहता है, "घोर करतल-ध्वनि हो रही है।" मैं देख रहा हूं, नहीं हो रही है। हम सब तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं। बाहर निकालने का जी नहीं हो रहा है। हाथ अकड़ जायेंगे। लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं, फिर भी तालियां बज रहीं हैं। मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं, जिनके पास हाथ गरमाने के लिये कोट नहीं है। लगता है, गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है। गणतन्त्र को उन्हीं हाथों की ताली मिलतीं हैं, जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिये गर्म कपडा़ नहीं है।

नैस्डैक के भवन पर भारतीय तिरंगे की छटा दिखा रहे हैं जीतेंद्र पर रचना संशय में हैं

हर दिन की मुश्किल से आम आदमी परेशान है,
आज तक भी गुम नारी की पहचान है,
नौकरी विहीन निराश नौजवान है,
फिर कैसे कह दें? ये देश महान है!

लोकमंच पर पढ़िये सिंगूर का सच और पानी पर राजनीति के शिकार राजस्थान के किसानों की व्यथा

मानव मन भी अद्भुत है। बालपन में माँ बाप उलाहना देते रहते हैं, "क्या छोटे बच्चों की तरह बिहेव कर रहे हो!" जब बड़े हो जाते हैं तो ताने सुनने को मिलते हैं, "आप का तो बचपना अब तक नहीं गया"। तो उमर का तकाज़ा भले हो कि उमर पहचानी जाय, पर उमर बढ़ रही है यह पहचानने में उमर बीत जाती है। गीतकार जी बढ़ती उमरिया की पहचान का लिटमस परीक्षण प्रस्तुत करते हुये कहते हैं

तन की बिल्डिंग की छत पर जब उग आयें पौधे कपास के
बिस्तर पर जब गुजरें रातें, करवट लेकर खांस खांस के
जब हिमेश रेशमिया की धुन, लगे ठठेरे की दुकान सी
याद रहें केवल विज्ञापन जब झंडू की च्यवनप्राश के
बाहर से ज्यादा अच्छे जब दॄश्य लगें घर के अंदर के
सपनों के यायावर, ये हैं लक्षण ढलती हुई उमर के

मनीशा बता रही हैं की तिरुमला मंदिर के चढ़ावे में भगत जाली नोट दे रहे हैं। "देते हैं भगवान को धोखा इंसां को क्या छोड़ेंगे?" पर समीर ने दो टूक टिप्पणी की, "जब अपने आराध्य तक पहूँचने का मार्ग भी पैसा बन जाये तो क्या सच्चा और क्या झूठा. गलत ही सही, मगर वो दर्शन तो कर पाया वरना २४ घंटे लाईन में लगने के बाद भी मात्र ३ सेकेंड के दर्शन होते"

कृष्ण विवर यानि ब्लैक होल, न्यूट्रॉन और पलसर जैसे शब्द यदि आपको उत्साहित करते हैं तो पढ़िये अंतरिक्ष चिट्ठे पर आशीष का यह रोचक आलेख

अंत में एक छोटा सा सवाल, इस प्रविष्टि के शीर्षक को किन लेखक की रचना से लिया गया है? बिना गूगल किये बता सके सकें हों तो हम सब की दाद स्वीकारें।

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उफ्फ!!ये कहाँ आ गये हम

January 25, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Udan Tashtari

सन १९८१ में एक फिल्म आई थी 'सिलसिला'. अमिताभ और रेखा मुख्य कलाकार थे. याद आता है वो कशिश भरा गीत, जब अमिताभ अपनी स्थितियों को यूँ शब्द देते हैं:

मैं और मेरी तन्हाई, अक्सर ये बातें करते हैं,
तुम होती तो कैसा होता, तुम ये कहती, तुम वो कहती.....


फिर बैग्राऊंड से रेखा और अमिताभ को दिखाते हैं, सुंदर स्विटजरलैंड की फूलवती वादियों में:

अब रेखा गा रही है:

ये कहाँ आ गये हम, यूँ ही साथ साथ चलते
तेरी बाँहों में है जानम, मेरे जिस्म-ओ-जान पिघलते....


सब तरफ फूलों की खुशबू फैली है, प्राकृतिक सौंदर्य है, कलकल नदी बह रही है, झरना है और वाह क्या महौल है, कोई भी गा उठे....ये कहाँ आ गये...

ऐसी ही टाईप की चरमगति की प्राप्ति हर इस तरह के स्थल पर होती है. अब रचना जी को देखिये, उनकी यही गति हिन्दी चिट्ठाकारी के मैदान में आकर हो गई. हाँलाकि यहाँ सोलो चल रहा है, उन्होंने दोनो रोल खुद ही निभाये-

पहले अमिताभ:

किसको छोडूँ, क्या पढ डालूँ!
यहीं रहूँ या विदा कह दूँ!!



फिर बैकग्राऊंड से रेखा और अमिताभ-

और शूटिंग के समय शायद गर्मी बहुत रही होगी और कागज के फूल मूल सजा लिये होंगे तो खुशबू भरा महौल भी नहीं होगा...झरने के नल का पानी चला गया होगा..रेखा गा रही है:

उफ्फ!!ये कहाँ आ गये हम

अरे जी, कहीं नहीं आ गये, यही है हिन्दी चिट्ठाकारी का मैदान. अब चाहे उफ्फ हो या आह या वाह!! जो है सो ये ही है, और है भी बड़ी लती जगह. किसी से पहले के जमाने में बदला लेना होता था तो लोग उसे शतरंज खेलने की आदत डलवा देते थे. लो अब हो गये शतरंजी, अब किसी काम के नहीं. जब तक खेले खेले फिर बाकि समय भी चाल ही सोच रहें हैं कि अगली बार ऐसा खेलूंगा. वैसा ही है ये मैदान भी. आदमी अभी पढ़ता है और नहाते समय हँसता है याद कर कर के, घर वाले पागल समझते हैं और ....हे भगवान, न घर का ख्याल रह जाता है, न अचार का, न मुरब्बे का. बाजार से खरीद लाओ बना बनाया, और घर की शीशी में भर कर खिला दो. हमें तो यही रास्ता समझ आता है. कविता भी लिख मारी वो भी इस उहापोह की अवस्था में:

किसको छोडूँ, क्या पढ डालूँ!
यहीं रहूँ या विदा कह दूँ!!


एक एक चिट्ठाकार को पकड़कर लपेटा गया है जैसे खेत में मवेशी घुस आये हों और सबको डंडा लेकर दौड़ा रहे हैं. और यह मजाकिया और बेहतरीन हंसोड़ बात करने वाला और कोई नहीं बल्कि एक ऐसा शक्स है जो एक महिने पहले नवम्बर ३०, २००६ को जान पहचान के तहत यह कहता था कि :



वैसे कुछ लोग यहाँ हैं जो मुझे पहचानते भी हैं, उनसे गुजारिश है कि अगर वे मेरे या इस चिट्ठे के बारे मे कुछ कहना चाहें तो जरूर कहें.सिर्फ दो बातों का ध्यान रखें-
१. मै किसी भी मजाक का बुरा मान सकती हूँ!!
२. मैं किसी भी बात को मजाक मान सकती हूँ!!!




वाह भाई, हिन्दी चिट्ठाजगत, क्या परिवर्तन लाता है आपके अंदर. संपूर्ण हृदय परिवर्तन. खैर जो इच्छा हो, जैसी हो वैसा करें, हम तो हमेशा की तरह चुपचाप निकल जाते हैं.

एक नया महौल और चल पड़ा है इस शूटिंग वाले महौल के साथ और वो है विवादों का अखाडा. कितनी बार कहा जा चुका कि न तो अब गाँधी जी हैं, न सुभाष चन्द्र बोस, न भगत सिंग, न नेहरु और फिर हमारे सागर भाई ने भी बताया कि उनकी तबियत भी कुछ ठीक नहीं चल रही मगर जरा इन महारथियों में से किसी एक पर भी लिखिये तो सही या फिर जरा राजनिति पर लिखने की कोशिश करें, बस फिर नगाडे की धुन शुरु..ढमर कड़कड़ ...ढमर किड़िकिड़ ....ढमर कड़कड़ ...ढमर किड़िकिड़.. और कुश्ती चालू..अक्सर विचारों की कुश्ती तक सिमित रहता यह मंजर व्यक्तिगत होता नजर आने लगता है, यहाँ तक कि आज तो आज, पहले कही गई बात भी थाली पत्तल में सजाकर बारात निकाली जाती है. कुछ लोग सड़कों पर निकल कर नाचते हैं तो कुछ घर के भीतर ही. मजा सबको आता है. अभी पिछली बारात का खाना पचा नहीं है तब तक नई बारात और कुश्ती का आयोजन होने लगता है. इस आयोजन के प्रायोजक बनने के लिये आपको कुछ नहीं करना होता, बस उपरोक्त उल्लेखित किसी भी मुद्दे पर एक सनसनाती पोस्ट लिख दें, जैसे कि सृजन शिल्पी जी की पोस्ट-भारतीय सवतंत्रता संग्राम के कर्ण और बाकी आयोजन खुद हो जायेगा. बाराती आ जायेंगे, अखाड़े खुद जायेंगे, और फिर समय रहते सारा सामान लपेट कर अगली बारात की तैयारी. अगर आप इस आयोजन को अपने स्थली पर नहीं कराना चाहते तो जहाँ भी यह चल रहा हो वहाँ जाकर यज्ञ में आहूति डाल सकते हैं. कई बार लोगों को ऐसी जगह देर से पहुँचने पर अफसोस मनाते भी देखा है क्योंकि तब तक सब कुछ लपेटा जा चुका था. इसलिये समय का विशेष ध्यान दें, जितना जल्दी पहू~ण्चेंगे, उतना ही यज्ञ मे ज्यादा आहूति दे पुण्य प्राप्त कर सकते हैं. वैसे तो वाद विवाद एक अति स्वस्थ परंपरा है, इसके लिये, ज्ञान, उर्जा और अध्ययन की आवश्यकता है और अन्य पाठकों का ज्ञानवर्धन भी होता है मगर जब यह व्यक्तिगत आक्षेपों और अलंकरणों पर आ जाये, तब तकलीफ और दुख होता है. अब हम तो निकलते हैं यहाँ से, घर के अंदर ही नाच कर बारात का मजा ले लेंगे.

अभी हम दबे छिपे निकल ही रहे थे कि कोई देख न ले. बस, फुरसतिया जी ने देख लिया, बोले कहाँ चले, हमको नहीं सुनोगे. हमने कहा, भाई, अभी आप ही को और उसके भी उपर आपके बारे में सुनकर चले आ रहे हैं, अब जाने दो हमें. कहने लगे तुम भी उसी टाईप के हो कि छेड़ दो तो दुखी, काहे छेड़ दिया और न छेडो तो दुखी कि काहे नहीं छेडा. सबको छेडा हमको नहीं. इतने भी खराब नहीं दिखते हम. तो सुनो, कल जब निराला जी के बारे में सुनाये थे तो बहुते हिट गया टापिक. कई बार जब टापिक नहीं समझ आता तब भी हिट हो जाता है और लोग भीड़ लगाते हैं कि कहीं लोग हमें अनपढ़ न समझ लें. तो उसी पर जन आग्रह पर अगला भाग लाये हैं, पढ़ लेना. हमने कहा, जरुर पढ़ लेंगे और अब जायें. बोले झूटमूठ टिप्पणी मत करना, उसी में से कुछ बातें पूछूंगा बाद में. अब क्या, एक बार निराला जी को दसवीं की परीक्षा मे ध्यान से पढा था और अब आज. मगर आज वाला बहुते जीवंत है, बिल्कुल जोर नहीं लगा और मजा भी बहुत आया. वाह वाह..सही लिखते और सही लेखन लाते हो, भाई फुरसतिया. अब जो पूछना हो तो पूछ लेना. याद है हमें सब.


इतनी भगदड़ रही कि अब हंसना जरुरी हो गया बिना इसके, हमारे जैसे रक्तचाप के रोगी की तो चर्चा खतम करने के पहले ही लाई लूट जाये.

भला हो भाई प्रमेन्द्र का जो हमें इतना मानते है कि न सिर्फ़ इतमिनान से बैठकर ११ (धार्मिक अंक है) चुटकुले सुनाये, बल्कि ११ बार बसंत पंचमी के स्नान की डुबकी भी हमारी तरफ से लगाये और सबूत के तौर पर फोटू भी भेजी है- भाग १ और भाग २.

हम हंसे, आभारी हुये और चले तो अनुराग ईंग्लिश ईस्कूल का अंतिम भाग ले आये, इतना हंसाये, इतना हंसाये कि हम सोचने लगे कि अच्छा हुआ यह आखिरी किश्त थी, नहीं तो अबकी रक्तचाप का दोष हँसी पर स्थान्तरित हो जाता. फिर चाहे रवि भाई चिट्ठों के हैक्स लाते या रमण जी का एक और ब्लागर जुगाड़ या दिव्याभ जी सत्य संकेत दिखाते, हम तो होते ही न पढ़ने को और अविनाश भाई को भी मौका न लगता कहने का कि अगर तुम न होते. क्योंकि हम तो वाकई नहीं होते.

अब चलते चलते, एक गीत याद आया- हम लाये हैं तूफानों से किश्ती निकाल के.......उसी तर्ज पर यह आज की टिप्पणियां लायें हैं, पढ़ें...कुछ भी अन्यथा न लिया जाये. स्माईली. :)

कल की चर्चा पर आप सबका उडेला गया टिप्पणी रुपी स्नेह ने इतना भाव विभोर कर दिया कि आज फिर चर्चा करने आ गये वरना आज के नम्बरी तो फुरसतिया जी थे, तो अगर कुछ खराब लगा हो तो फुरसतिया जी को कोसें, न वो हमे लिखने देते न हम लिखते. हाँ, तारिफ के बंदा हाजिर है टिप्पणी द्वार पर पलक पावड़े बिछाये. जो छूट गये हैं वो सूचित करें टिप्पणी के माध्यम से सूचित करें, कल संजय भाई मध्यांतर मे कवर कर लेंगे. :)


आज की पोस्टनुमा टिप्पणियाँ सृजन शिल्पी जी के चिट्ठे के सौजन्य से:

अनूप शुक्ला:

मैं अब भी यही कह रहा हूं कि इन विचारों से यह लगता है कि गांधी-नेहरू राष्ट्रनायक न होकर एकता कपूर के सीरियल के कोई कलाकार थे जो तमाम दूसरे लोगों को अपने रास्ते से हटाने की जुगत में ही लगे रहे। और मैंने जो इतिहास के
अध्ययन की बात लिखी थी उसमें मेरी अज्ञानता छिपी थी और है भी। मैंने इन लोगों के बारे में जो पढ़ा वह एक आम आदमी की तरह पढ़ा। किसी विद्वान की तरह नहीं और मेरी सीमित जानकारी में ये सभी लोग आम आदमी से ऊपर मानसिकता के लोग थे। इनके बारे में यह सुनना कि ये लोग एक दूसरे को उठाने-गिराने में इस कदर लगे रहे, कम से कम मुझे यकीन नहीं होता। गांधी, नेहरू, सुभाष, भगतसिंह में महाभारत के पात्र खोजने का तरीका वह तरीका है जिसमें आप पहले कद तय कर लेते हैं और तब उसके लिये उपमा तलासते हैं। कर्ण अभिशप्त महारथी थे, कुंवारी कन्या की कोख से पैदा हुये थे उनके कौन से साम्य
थे सुभाषजी से? कम से कम आजादी की लड़ाई तक दोनों के दुश्मन साझा थे -वे अंग्रेज थे। जबकि कर्ण और दूसरे पांडव एक दूसरे के खिलाफ़ थे। बहरहाल, संभव है आपका विस्तार से सालों का किया अध्ययन इस बात का प्रमाण देता हो आपको लेकिन मेरा दिल इनमें से किसी महापुरुष को इतना घात-प्रतिघात में संलग्न होने की बात से सहमत नहीं हो पाता। नेहरू सत्ता लोलुप थे या नहीं यह भी व्यक्तिगत सोच की बातें हैं। जो शक्स पूरे १६ देश का नीतिनिर्धारक रहा और एकमात्र जननायक रहा उसके लिये, बावजूद तमाम उनकी गलतियों के, यह सोचना कि उसके सारे काम सत्तालोलुपता से संचालित थे , कम से कम मेरा मन ऐसा मानने के लिये तैयार नहीं होता।
आशा है कि आगे भविष्य में कुछ और ज्ञानभरी बाते पता चलेंगी जब आपके पास अपने सालों के अध्ययन को लिखने का पर्याप्त समय होगा!
नेताजी हमारे देश के महान सपूत थे। उनकी जन्मदिन पर उनको विनम्र होकर याद कर रहा हूं। आपकी पोस्ट इसका माध्यम बनी इसके लिये आपका आभार!




प्रियंकर:



सृजन शिल्पी द्वारा की गई तुलना –सुभाष बाबू की पौराणिक चरित्र कर्ण से तुलना रोचक लगी .
इसके साथ ही दिनकर का सुप्रसिद्ध काव्य ‘रश्मिरथी’ और मराठी उपन्यासकार शिवाजी सावंत का कर्ण के चरित्र पर लिखा कालजयी उपन्यास ‘मृत्युंजय’ मन-मस्तिष्क में तैरने लगे . कैसा उदात्त चरित्र और उसका कितना उत्कृष्ट निरूपण . तुलना सर्वथा उपयुक्त है . प्रतिभा की अवमानना और अपमान के ऐसे अवसर मानव संस्कृति के इतिहास में विरल ही होते हैं, और जब होते हैं तो जनता की सामूहिक स्मृति — लोक-मानस — उन्हें शताब्दियों तक याद रखता है . और अपनी स्मृति कोशिकाओं में रची-बसी अनोखी न्याय तुला पर तौल कर ऐसा पोएटिक जस्टिस — काव्य न्याय — करता है कि उनकी लोकप्रियता की सीमा नहीं रहती . इतिहास का कोई भी सफ़लतम व्यक्ति उनकी लोकप्रियता के सामने बौना हो जाये , वे ऐसी किंवदंती बन जाते हैं . इस तरह ‘लोक स्मृति’ इतिहास द्वारा किये गये अन्याय को अपने ढंग से न्याय में परिवर्तित कर देती है.
सुभाष बाबू के साथ भी कुछ ऐसा ही अन्याय हुआ था. पर यहां अन्याय करने वाला ‘चिन्हित’ नहीं है. गांधी के व्यक्तित्व को देखते उन पर इस तरह के आरोप वैसे भी टिकते नहीं हैं . तो क्या उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का कोई दोष था सुभाष बाबू के राजनैतिक फ़ैसले जिसके प्रतिरोध में खड़े पाये गये ? गांधी के विशाल व्यक्तित्व की छाया में बहुत से प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों को वैसा खुला मंच नहीं मिला जैसा गांधी की अनुपस्थिति में मिल सकता था . पर क्या इसमें गांधी का कोई दोष है ? गांधी के राजनैतिक निर्णयों की समीक्षा करने पर हमें कहां-कहां भावनात्मक दबाव और परिस्थितिजन्य निरंकुशता के छींटे दिखाई देते हैं ? तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों, सुभाष बाबू के तात्कालिक राजनैतिक अतिउत्साह और समय से पहले लिये गये निर्णयों के अलावा क्या सुभाष बाबू के साथ हुए अन्याय का कुछ दोष गांधी पर भी आता है?
सुभाष बाबू की मौत के रहस्य ने इस अध्ययन को और भी मुश्किल और चुनौतीपूर्ण बना दिया . सृजन शिल्पी अपने अध्ययन द्वारा इस गुत्थी को समझने का प्रयास करते और समस्या के मुख्य कारकों को चिन्हित करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं . उनके निर्णयों से नाइत्तफ़ाकी रखते हुए भी इतना स्वीकार करने की बौद्धिक ईमानदारी तो हममें होनी ही चाहिये .
अनूप जी से वैचारिक सहमति रखते हुए भी और सबको ‘सन्मति दे भगवान‘ जैसे अच्छे हस्तक्षेप के बावजूद गांधी पर हुई बहस में उनका रुख प्रारम्भ से ही कुछ संदिग्ध सा लगता रहा है .
सृजन शिल्पी का विश्लेषण सही हो या न हो पर निराधार नहीं है . यह ऐसा धुआं नहीं है जिसके पीछे आग बिल्कुल भी न हो . इसे अनूप जी जैसे होशियार आदमी से बेहतर भला और कौन जानेगा .
पर इन्हीं अनूप जी को, गांधी के विरुद्ध बात-बात में गोडसे को उद्धृत करने वाले गोडसे-भक्त नाहर जी के यह विचार कि ‘देश का जितना नुकसान गांधीजी के सिद्धांतों और नेहरूजी की वजह से हुआ उतना किसी और वजह से नहीं हुआ’ न केवल विरोध के लायक नहीं लगे बल्कि ‘पठनीय’ लगे और प्रमेन्द्र का यह बयान कि ‘ देश को गांधियों के चंगुल से मुक्त कराना होगा’ (मानो गांधी कोई माफ़िया सरगना हों) उन्हें ‘ओजस्वी’ लगा . ऐसे में उनकी मुंह देखकर तिलक करने की प्रवृत्ति, उनकी चुनी हुई चुप्पी, यहां तक कि उनकी सधी हुई सदाशयी टिप्पणियां भी चिट्ठाकारों को सृजनशिल्पी के निष्कर्षों से ज्यादा ‘मायावी’ और ‘मायालोकीय’ प्रतीत होती हैं . सो वे माया-मोह से थोड़ा ऊपर उठेंगे ऐसी आशा रखना अन्यथा न होगा.
कई बार लगता है कि उनका अभिजात्य उन्हें अंतर्जालीय ‘चेंगडों’ से दो-दो हाथ करने से रोकता है . और सज्जनों को सीख देते समय वे सौरव गांगुली की तरह फ़ॉर्म में आ जाते हैं. इस मामले में वे बाबा तुलसीदास की परम्परा में हैं जो कहते हैं: ‘बंदउं संत असज्जन चरना’ . असज्जन की वंदना इसलिये कि दुष्ट आदमी दो मिनट में आपके अभिजात्य को छियाछार कर सकता है — उस अभिजात्य को जिसे आपने परत-दर-परत बरसों से बड़े जतन से अपने व्यक्तित्व पर चढाया है.
अनूप जी से करबद्ध अनुरोध है कृपया वे कुछ समय इस बात की समीक्षा के लिये भी निकालें कि सृजन शिल्पी द्वारा गांधी पर शुरु की गयी बौद्धिक बहस सागरचंद नाहर से होती हुई जब प्रमेन्द्र तक पहुंचती है तो