March 29, 2007 को प्रकाशित। लेखकः गिरिराज जोशी
चिट्ठाचर्चा सूनसान पड़ा, चर्चा कहाँ गायब अनुपजी से बतलाया यूँ, तुम ही करो अब जीतू का टर्न था, वे गये छूट्टियाँ मनाने फ्री तो हूँ ‘कविराज’, पर नहीं मेरा मन तुम्ही हो कर्णधार इसके, कहकर फुसलाया ख़बर लेने का मौका है, धिरे से समझाया उनकी यह चाल अनोखी मैं समझ न पाया ऐसे वक्त में नारद ने भी मुझे अंगुठा दिखलाया इस बुरे वक्त में गुरूदेव ने धैर्य न खोने का संदेश भेजा, जिसमें लिखा था कि वे मेरे साथ हैं। मैने अपने आपको हल्का महसूस किया और सोचा गुरूदेव निश्चय ही 70 फिसदी चर्चा लिखकर भेज देंगे। मगर उन्होने जो मेल भेजा, उसमें यह निकला :(
नारद को फिर देखिये, नज़र लगी है आज होगी अब कविराज कि कुछ तो रस्ता होगा चर्चा तो कर पायेंगे, जब नदारत रहें नारद. (गुरूदेव के सौजन्य से...) हिन्द-युग्म पर सामूहिक कविता लेखन का प्रयास हुआ है। एक ही विषय पर दस रचनाकारों द्वार लिखी रचनाएँ कहीं ना कहीं एक दूसरे से गुंथी हुई नज़र आ रही है। शैलेशजी जरूर थोड़े अलग-थलग दिखाई दे रहे हैं। काव्य-पल्लवन नाम से शुरू किया गया यह प्रयास कितना सफल हुआ है यह तो पाठक तय करेगा मगर प्रयास अच्छा है। गुरूदेव के शब्दों में कहूँ तो प्रयास हमेशा ही अच्छा होता है, कैसा भी हो, प्रयास होना चाहिये। अब तू ही बता , तेरे कृष्ण की बंसी जैक्सन की चिल्ल-पों के आगे क्या है ? गोकुल की सारी गोपियाँ संस्कृति के उबाऊ कपड़े फाड़-फेंककर ' बेब' हो गयीं और तू, राधिका, गँवार हो गयी।
कमल शर्माजी तेल के खेल पर अच्छा लेख लिखे हैं और राजेश कुमारजी समुन्द्र तट के कुछ शानदार पोज लेकर लाये है। आशीष शर्मा जी प्रेम-प्रेरित-कविता लेकर आये हैं – प्रेम में सबकुछ अच्छा लगता है बेगाने भी अपने लगते हैं और प्रेम में सब दिवाने लगते हैं सब मर्ज की एक दवा करो प्रेम सभी से पड़ोसी से लेकर पड़ोसी मुल्क तक बातें हो सिर्फ प्रेम
कविराज हेल्प-हेल्प करते दौड़ रहें है, समस्या भी अजीब दिखती है मगर उससे भी अजीब है ओसामा के हाथ में कमण्डल!, बच्चा है क्या करें? बड़ी-बड़ी दाढ़ी देखकर बाबा समझ बैठा और थमा दिया। बहुत ही रोचक काव्य- प्रस्तुति है दूबेजी की – उसने आज भी चित्र बनाये हैं- बापू के हाथ में लाठी की जगह फरसा सुभाष के हाथ में हथगोला और लादेन के हाथ में कमन्डल और माला। शायद बडी हुई दाढी ने उसे भ्रमित किया है।
अन्य प्रविष्टियाँ -
नारद की अनुपस्थिति में जितने चिट्ठे दिखे उनकी चर्चा का प्रयास मैने किया है मगर मैं जानता हूँ कि बहुत से चिट्ठे छूट गये हैं, इन चिट्ठों को कल सवेरे सागर भाई कवर करने का प्रयास करेंगे, क्यों! सागर भाई करेंगे ना?
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March 28, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Udan Tashtari
सभी पाठकों को रामनवमीं की शुभकामनायें. इस अवसर पर संबंधित लेखन लेकर आये हमारे संजय भाई, कहते हैं हैप्पी बर्थ डे, रामजी, अभय तिवारी जी कहते हैं कहाँ रहें राम? और इसी अवसर पर यह भी खुब रही पर प्रयास अनुठे रामभक्त हनुमान के विषय में. खैर, यह उत्सव तो पूरा हुआ, मगर दूसरा उत्सव, गीतकार का मुक्तक महोत्सव के रुकने से उड़न तश्तरी दुखी हो गई और पूछ रही है कि क्या भाई!! अकेला देख हड़काते हो? समर्थन में साथी टिप्पणियों के माध्यम से गीतकार जी को उत्सव नये फारमेट में फिर से शुरु करने की गुहार कर रहे हैं. इस पर गीतकार जी ने कहा- मुक्तक नहीं, एक प्रश्न और फिर गीत कलश पर हम किसको परिचित कह पाते : हम अधरों पर छंद गीत के गज़लों के अशआर लिये हैं स्वर न तुम्हारा मिला, इन्हें हम गाते भी तो कैसे गाते
अक्षर की कलियां चुन चुन कर पिरो रखी शब्दों की माला भावों की कोमल अँगड़ाई से उसको सुरभित कर डाला वनफूलों की मोहक छवियों वाली मलयज के टाँके से पिघल रही पुरबा की मस्ती को पाँखुर पाँखुर में ढाला....................
खैर, मुझे लगता है (वैसे तो मालूम है) कि कल से गीतकार जी रुका महोत्सव नये फार्मेट में फिर से शुरू होगा मगर उनका नैतिकता के आधार पर लिया गया निर्णय चिठ्ठा जगत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज किया जायेगा, यह मेरा विश्वास है. माना सब इसी तरह के बनाये गये मानकों से सीखेंगे मगर यह भी तय है, बकौल अभिनव, कि ज़िन्दगी भी बहुत से दाँव सिखा देती है : हर सबक कैद नहीं होता है किताबों में, ज़िन्दगी भी बहुत से दाँव सिखा देती है।
वैसे भी अभिनव इतनी सुंदर कविता रचता है कि अगर वो लिखे और हम जिक्र न करें, यह संभव नहीं. लिखते तो और भी लोग बहुत प्यारा है और हम उन्हें पुनः न प्रस्तुत कर सुन सुना चुके हैं मगर भईया, मान जाओ, बिना कट पेस्ट के हम कोशिश कर भी उनके अंश नहीं पेश कर पाते, जैसे कि आज हिन्द युग्म पर : आमचो बस्तर, किमचो सुन्दर था... राजीव रंजन देश निकाला- मोहिन्दर कुमार यह कवि महोदय, चर्चा के लिये अपनी साईट पर इन्हें कट एण्ड पेस्ट के लिये खुला छोड़ दें तो हम वहाँ से ले लेंगे. अच्छा बुरा जो लगे लगा करे, मगर यार, हम फिर से टाईप न कर पायेंगे...और जो हमसे इस उम्मीद को लगाये बैठे हैं वो खुद चर्चा लिखने के आग्रह से शरमाये बैठे हैं और आगे आते ही नहीं और गुनाहों पे लज्जत कि सलाह हजारों हैं. आज बहुत अंतराल के बाद अनामदास को इत्मिनान से पढ़ा...बिना इसके मजा भी तो नहीं. वाकई आनन्द आ गया. नियती और कर्मठता को आंकता उनका आलेख काबिले तारिफ है, इसी को तौलते.. वो बताते है कि कैसे निबू खरीदकर वो पत्रकार बन गये, वाह भाई, ऐसी साफगोई तो शायद ही आगे भी देखने को मिले, पहले भी नहीं देखी.. बहुत खूब. उनको सुन, बेजी भी अपनी एक पुरानी रचना सुना रहीं हैं, जो कि एक पोस्ट होने की काबिलियत रखती है. बेजी से उम्मीद है कि वो इसे एक अलग पोस्ट के माध्यम से भी प्रेषित करें: गुब्बारे में भरी हवा का भार क्या है ? माँ की साँसो की गुनगुन का सुरताल क्या है ? वो आँसू जो आँखों मे सूखा उसका माप क्या है ? मिट्टी की सौंधी खुशबू का नाम क्या है ? बुलबुले के जीवन का अर्थ क्या है ? उसमें तैरते इन्द्रधनुष की जरूरत क्या है
चलो, अब बेजी की जो इच्छा हो मगर आजकल लावण्या जी बड़ी सक्रियता से लिख रही हैं: आज उन्होंने मानवता के बारे में लिखा और हमारे निठल्ला चिंतक ले कर बैठे है अपने द्वारा निर्मित शो.. प्रेटी वूमेन ...सृजनता और कल्पनाशीलता बहुत खूब है. मगर उससे क्या होता है, यूँ तो सीमा जी भी निफ्ट की तस्वीरें दिन भर बदल बदल कर दिखाती रहीं और हमारे मनीष भाई, फैज की कल्पनाजगत की सैर कराते रहे मनीष भाई को बहुत बधाई, उनकी प्रस्तुति क्षमता अपने आप में अनोखी है और हम उसके कायल.उपमा जैसे व्यंजन को मां के प्यार और मम्त्व से बांध देने का सफल प्रयास किया भाई रितेश ने और हमारी घघुती बसुती जी एक अलग अंदाज में अपनी दुख भरी दास्तां सुना रहीं हैं. इन सब से बेखबर, हमारे प्रतीक भाई लाये हैं, लॉफ्टर चैलेंज वाली पारिजाद की तस्वीरें :) अभी कोई जरुरी समाचार आ गया और मुझे जाना होगा....आना होगा में वादा करके संजय नहीं आये तो जाने में हम काहे शरमाये मगर जाते जाते एक जरुरी बात बता जायें: तरकश हाटलाईन पर इस बार पेश हैं कटघरे में रवि रतलामी और साथ ही सुनिये उनकी पत्नी रेखा रतलामी से अंतरंग बातचीत. मै संजय भाई से आग्रह करुंगा कि वो बचा और छुटा हुआ हिस्सा सुबह कवर कर लें..ताकि अगला चर्चाकर निश्चिंत हो उसका हिस्सा कवर करे. Labels: chithha charcha, sameer lal, चिट्ठा चर्चा, चिट्ठा-चर्चा, समीर लाल
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March 26, 2007 को प्रकाशित। लेखकः राकेश खंडेलवाल
फिर आई रुत चर्चा की वाह मनी, माडल नाओमीकिसके उतरे कपड़ेटिंचर का उपयोग कहां है कुछ बातें सूरज सेकहां कहां पर गईं कटारेंक्या है लिये तुम्हारेकौन किसे देता शाबासीखोल ह्रदय के द्वारे हिन्दी ल्के चिट्ठे देखो है हिन्दी का सम्मेलनएक डायरी, किन्तु सत्य काकरता कौन विवेचन इन्द्रधनुष में खबर कोश में कविता के हैं आँसूधर्म, साम्प्रदायिकता की आध्यात्मिकता है धांसू खेद रुका है एक महोत्सवमहाकुम्भ मुक्तक कायहां पढ़ें, कारण क्या क्या थे कहां कहां क्या अटका देखें कहाँ हुए हैं नर्वसअपने रवि रतलामी क्या क्या मन की बात बताते किसको करें सलामी फ़ुरसितियाजी ने बतलाईं थीं आयुध की बातेंबजट कटे तो क्या होता है चित्र बोलता बातें:-

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को प्रकाशित। लेखकः masijeevi
लीजिए हाजिर है कैफे चिट्ठा-चर्चा के इस नए बावर्ची की यह पाक विधि जिसमें मैं आपको बताउंगा कि चिट्ठा चर्चा कोरमा कैसे तैयार किया जाता है। लेकिन उससे पहले आज की सारी पोस्टों के पकवानों की सूची यहाँ देंखें। हाँ तो पेश है - चिट्ठाचर्चा कोरमा सबसे पहले बीस साल तक पराठें में भिंडी लपेट कर रखें इससे आम आदमी तैयार हो जाएगा। 100 ग्राम चुटकले लें और उन्हें सपनों में भिगोकर एक ओर रख दें। इससे कोई पंगा न लें नहीं तो परांठें में रोटी सा स्वाद आएगा और आपको कहना होगा- रोटी समस्या नही
रोटी तो बँट जाएगी
इसके बाद के.एफ.सी. का चिकेन मेरे यहॉं से मँगा लें, पर सावधानी बरतें, क्यों- ये तो देबाशीष बता ही रहे हैं। (अरे भई ध्यान से रेसिपी सुनिए ओर भूलने का डर हो तो स्याही में लिख लें जिसका इस्तेमाल अब इंक ब्लॉंगिंग में होता है सागर साहब कर चुके हैं जहाँ श्रीष ने बताया कि वे चूक गए) हाँ तो जब तक पाक सामग्री तैयार हो आप या तो सपने ले सकते हैं या फिर सुहाने सफर पर निकल सकते हैं जहॉं स्पगेटी टॉप और नाभि के काफी नीचे की स्कर्ट सब कुछ है। या आप कविताएं पढ़ लीजिए, रंजना की- ज़िंदगी भर जो होता साथ हमारा तो मेरा दिल यूँ ना होता बंजारा
या राज गौरव की (पोस्ट स्लग किया करो मित्र) जीना.. तेरे बिना जीना.. मौत लगे.. हम तो जिये तेरे बिन.. आजा अब तो आजा, तू कहीं से..
आपका सारा ज्ञान बेकार है, आपका अखंड ब्रह्मचर्य व्यर्थ है
आपकी वीरता बेमानी है, आपकी पितृभक्ति अनुकरणीय नहीं है
आप किसी काम के नहीं हैं
यह सब करने का मन ना हो तो जो मन हो वह करें मसलन बकरी की लेंड से उत्सर्जित जुगुप्सा का आनंद लें। अन्यथा यदि आप पत्रकार हैं तो जाहिर है सोचना छोड़ चुके होंगे इसलिए जरा सोचें। लेकिन समय ना भी कट रहा हो तो भी ताव में आकर गड़बड़ ना करें वरना आपकी भी कहानी भंड हो जाएगी जैसे कि पीयुष की हो गई थी। हाँ तो तैयार स्वप्न सिक्त चुटकले व भिंडी लिप्त आम आदमी को लेकर तल लें, मुर्ग भून लें इस तैयार चिठ्ठाचर्चा कोरमा को लें और ज्ञानदत्त पांडेय जी की बैटरी वाली साईकल पर बैठकर हमारे यहाँ आ जाएं। इस साईकल के लिए पैसे का एप्रोवल उन्हें मिल गया है क्योंकि धन के लिए गुरू अरविंद ने कहा ही कि धन एक विश्वजनीन शक्ति का स्थूल चिन्ह है. यह शक्ति भूलोक में प्रकट हो कर प्राण और जड़ के क्षेत्रों में काम करती है. बाह्य जीवन की परिपूर्णता के लिये इसका होना अनिवार्य है. इसके मूल और इसके वास्तविक कर्म को देखते हुये, यह शक्ति भगवान की है. परंतु भगवान की अन्यान्य शक्तियों के समान यह शक्ति भी यहां दूसरों को सौप दी गयी है। इन्हीं सब बातों पर चिंतन करते हुये हम ने निर्णय लिया कि यह महोत्सव, जो कि पाठकों की फरमाईश पर मनाया जा रहा था, उसका स्वरुप उन्हीं पाठकों की सहूलियत और संसाधनों की सीमितता को देखते हुये बदल दिया जाये ताकि सभी को नारद के इस्तेमाल का बराबरी का मौका मिले. इस कोरमा को डकारते हुए हम इराकी फिल्मों और भगत सिंह नास्तिक होने और राजकिशोर की भगत सिंह पर राय पर भी दिमाग लगाएंगे। इस पाकविधि से बने चिट्ठाचर्चा कोरमा को खाने के बाद यदि बावर्ची से खुश हों तो डकार लें और आगे बढ़ें लेकिन स्वाद पसंद ना हो तो नीचे टिप्पणी में उगल दें। :) चित्र उन्मुक्त के चिट्ठे से
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को प्रकाशित। लेखकः अनूप शुक्ल
अपने ब्रेक को ब्रेक करके हम फिर से आपके सामने हाजिर हैं। पहले आज प्रकाशित हुये सारे चिट्ठे देख लें यहां!इसके बाद कुछ कविता-सविता हो जाये। तो भैया कविता तो एक बड़ी धांसू लिखी है तन्हा कवि ने- अश्कों से इश्क की है यारी , क्या कहें, यही शौक , है यही दुश्वारी , क्या कहें।
कीमत खुदा की बेखुदी में भूलता रहा, उसने भी की रखी थी तैयारी , क्या कहें। भैये तन्हाई का ये रोना तो होगा ही। इससे अच्छा तो उड़ने की कोशिश करो तुषार जोशी की तरह फिर चाहे गिर ही पड़ो। मान्या ने अपने दोस्त को शुक्रिया अदा करते हुये बहुत अच्छी कविता लिखी। उस पर जीतू ने किसी की कविता सुना दी यह कहते हुये कि दोस्तों को शुक्रिया नहीं दिया जाता। कविवर गिरिराज जोशी ने हिंद युग्म की लोकप्रिय कवियत्री अनुपमा चौहान के जन्मदिन पर शुभकामनायें देते हुये एक कविता पेश की। आप भी अनुपमाजी को हैप्पी जन्मदिन करिये न! तुषार,गिरिराज,तान्या की कवितायें कापी नहीं हो पायीं लिहाजा नमूने के लिये इनकी साइट ही देखें। गीतकार राकेश खंडेलवालजी आजकल मुक्तक वर्षा कर रहे हैं जनता की बेहद मांग पर। आज के मुक्तकों में से एक है- भोर की पालकी बैठ कर जिस तरह, इक सुनहरी किरण पूर्व में आ गई सुन के आवाज़ इक मोर की पेड़ से, श्यामवर्णी घटा नभ में लहरा गई जिस तरह सुरमई ओढ़नी ओढ़ कर साँझ आई प्रतीची की देहरी सजी, चाँदनी रात को पाँव में बाँध कर, याद तेरी मुझे आज फिर आ गई और मुक्तकों का आनंद उठाने के गीतकार के पास आइये न! बेजीजी ने सवाल उठाया था पत्रकार क्यों बने ब्लाकर ! आज वे अपने सवाल के निष्कर्ष बताती हैं। इसी क्रम में फुरसतिया पर पोस्ट के मजे से पढ़ती हुयी योगिता बाली प्रमोद सिंह को भी जबरिया पढ़वा देती हैं फुरसतिया का लेख।अनिल रघुराज सुनवाते हैं प्यार के दो बेहतरीन गाने और उठाते हैं भारतीय टीम की हार से जुड़ा एक अहम सवाल।आपका लिखने में मन करता है लेकिन सूत्र वाक्य में लिखना चाहते हैं तो देबाशीष बताते हैं उपाय-टंबललाग। उधर रवि रतलामी बता रहे हैं मोबाइल ब्लागिंग के गुर और पेश कर रहे हैं देबाशीष के साक्षात्कार का हिंदी अनुवाद! रचनाकार में आज रवि रतलामीजी पेश करते हैं मनोज सिंह की रचना जिसमें सफलता के शिखर पर चढ़ते लोगों के अकेले पन के बारे में विचार व्यक्त किये गये हैं- ऐसा कम ही होता कि जब आपको घेरे हुए लोग आपकी उंचाइयों को नि:स्वार्थ स्वीकार करें, आपकी प्रशंसा करें, आपसे प्रभावित हों, आपसे प्रेरित हों, आपको दिल से चाहें। और इसीलिए आपके शीर्ष से उतरते ही वे दूर हो जाते हैं। यह एक नग्न सत्य है। और इससे बड़ा सच है कि दोस्त तो कोई होता नहीं ऊपर से दुश्मनों की संख्या बेवजह असंख्य हो जाती है। नंदीग्राम पर आजकल काफ़ी कुछ लिखा गया। आज ज्ञानचन्द पाण्डेयजी और रियाजुल हक़ इस पर कुछ जानकारी दे रहे हैं। मसिजीवी २३ मार्च के बाद अपने बालकों को अंक प्रसाद बांट के खचेढू़ चाचा के पास टाइम पास करने चले गये इससे नीलिमाजी चिंतन करने लगीं- व्यवस्था से संवेदना की उम्मीद नहीं की जा सकती बल्कि व्यवस्था हमें सिखाती है स्वयं की तरह ही संवेदनहीन होना। व्यवस्था के लिए व्यक्ति मात्र उपकरण होता है--व्यवस्था रुपी मशीन का यंत्र मात्र ।यंत्र के लिए जरुरी है --यांत्रिकता। संवेदनाओं का यहां काम ही क्या?व्यवस्था के लिए व्यक्ति नामहीन है या यों कहें कि उसके लिए व्यक्ति एक नंबर भर है । इस बीच सुरेश चिपलूनकर ने हारी हुयी भारतीय टीम को नोबेल पुरस्कार के लिये नामांकित कर दिया। टेलीग्राम आज भले अप्रासंगिक हो गये हैं लेकिन कभी ये सूचना का सबसे तेज माध्यम रहे हैं। कमल शर्मा लिखते हैं- अब एसएमएस, ईमेल, मोबाइल, फोन सेवाओं के हुए तगड़े विस्तार ने टेलीग्राम को हमसे दूर कर दिया या लोग भूल से गए हैं। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई जैसे बड़े एवं मध्यम शहरों में जहां पहले तार घरों में लंबी लंबी लाइनें दिखाई देती थी, वहां अब दिन भर में मुशिकल से कोई आ पाता है। अमरीका के सैम्युल मोर्स ने 1844 में मोर्स कोड की खोज की थी तो संचार जगत में बड़ी क्रांति आ गई थी लेकिन ईमेल और एसएमएस ने तो समूची दुनिया ही बदल दी। औरतों की पत्थर मार मार कर हत्या करने की प्रथा और उसके खिलाफ़ बनती हवा के बारे में जानकारी दे रहे हैं पंकज पारासर! तरुण का नारद के बारे में सुझाव है कि इसकी फ़ीड को दो ग्रुपों में बांट दिया जाये उधर धुरविरोधी बता रहे हैं एक हिन्दी ब्लाग फीड एग्रिगटर!के बारे में। आज प्रतीक टाइमपास में पढ़ा रहे हैं एक महिला का खत!हिंदी ब्लागिंग में पहले से ही तमाम पंगेबाज हैं अब एक और पंगेबाज आ गये। स्वागत करें। प्रमोद सिंह अपनी सिनेमा साइट में आज ईरान की फिल्मों के बारे में सच की अनगिन परते गिन रहे हैं। भगतसिंह पर राजकिशोर के लेख का विरोध कर रहे हैं शब्दसंघर्ष!कल के देबाशीष के आवाहन पर कुछ और चर्चाकार साथी जुड़े हैं! मसिजीवी, नीलिमाजी और सृजन शिल्पी। मसिजीवा और नीलिमाजी के लिये इतवार का दिन तय है। यह इन साथियों की जिम्मेदारी है कि ये आपस में बातचीत करके इतवार के चर्चा करें। कल के दिन रवि रतलामी बाहर रहेंगे इसालिये मसिजीवी अपनी पारी शुरू करेंगे। नीलिमाजी पहली महिला चिट्ठाचर्चाकार हैं। सृजन शिल्पी अनियमित समीक्षा करेंगे। जब उनकी मर्जी आयेगी तब। आज उन्होंने एक समीक्षा करके शुरुआत कर दी है। अपने साथियों का स्वागत करते हुये हमें आशा है कि इन साथियों के जुड़ने से चिट्ठाचर्चा में गुणात्मक सुधार होगा।
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March 25, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Srijan Shilpi
जब पढ़ने को बहुत कुछ हो और समय उस अनुपात में कम उपलब्ध हो तो क्या पढ़ा जाए और क्या छोड़ दिया जाए, यह तय करने के लिए फ्रांसिस बेकन का प्रसिद्ध स्वर्णिम नियम अत्यंत उपयोगी माना जाता है: Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested; that is, some books are to be read only in parts; others to be read out curiously, and some few to be read wholly, and with diligence and attention.
(कुछ पुस्तकें स्वाद लेने के लिए होती हैं, कुछ निगलने के लिए और बहुत कम ही ऐसी होती हैं जो चबाकर पचाने लायक होती हैं अर्थात् कुछ किताबें आंशिक रूप में ही पढ़े जाने लायक होती हैं, कुछ अन्य उत्सुकतावश पढ़ी जा सकती हैं और बहुत कम ही ऐसी होती हैं जिन्हें समग्रता में परिश्रमपूर्वक और सजग होकर पढ़ना जरूरी होता है।) यह नियम मुझे नारद पर लगातार अपडेट होते रहने वाली प्रविष्टियों में से पठनीय का चयन करने में बहुत मदद करता है। ऐसा नहीं है कि इस नियम का पालन मैं कोई सचेत भाव से करता हूँ। दरअसल, संपादन के क्षेत्र में कई वर्षों के प्रशिक्षण, अभ्यास और अनुभव से यह एक सहज आदत बन चुकी है। फिर भी, अपने चिट्ठे पर अपनी सुविधा के लिए मैंने पठनीय चिट्ठों की एक सूची बना ली है जिसे समय-समय पर अपडेट करता रहता हूँ। तेजी से बढ़ रही चिट्ठों की संख्या और चिट्ठाकारों द्वारा दिखाई जा रही सराहनीय सक्रियता को देखते हुए पठनीय चिट्ठों का चयन करना जरूरी भी हो गया है। संख्या के साथ-साथ गुणवत्ता की भी फिक़्र करना हमारे लिए बहुत जरूरी है। वरना, कुछ लोग इस नतीजे पर पहुँचते ही रहेंगे कि " अभी हिंदी में कोई बात करने लायक ब्लॉग नहीं है"। भले ही इस नतीजे पर वे अपनी गफ़लत या मुगालते की वजह से पहुँचें। चिट्ठों की पठनीयता और गुणवत्ता को लेकर अपनी फिक़्रमंदी यदा-कदा मैं चिट्ठा चर्चा के मंच की भूमिका के संदर्भ में जाहिर करता रहा हूँ। चिट्ठा चर्चा का जो स्वरूप रहा है उसमें चिट्ठाकारों को उनके लेखन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने हेतु सहज भाव से प्रेरित कर सकने की गुंजाइश नहीं है। हालांकि चर्चाकारों की टीम में एक से एक प्रतिभावान और अनुभवी चिट्ठाकार शामिल हैं और इसके लिए वे सभी एक नियमित क्रम में प्रतिबद्धतापूर्वक समयदान भी करते हैं। फिर भी, कई चिट्ठाकारों को, जिनमें मैं भी शामिल हूँ, यह महसूस होता रहा है कि इस मंच की भूमिका का और अधिक विस्तार किए जाने की जरूरत है और चिट्ठों की चर्चा के साथ-साथ उनकी समीक्षा का प्रयास भी होना चाहिए। लेकिन जैसी कि कहावत है, पर उपदेश कुशल बहुतेरे - दूसरों को उपदेश देना जितना आसान है, खुद कुछ करके दिखाना उतना ही कठिन। जो दूसरों को सुझाव देने के मामले में आगे रहता है उसे आगे बढ़कर जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए। अनूप शुक्लाजी कई बार चिट्ठा चर्चाकार मंडली में शामिल होने के लिए मुझे कहते भी रहे हैं। लेकिन समयाभाव और दूसरी प्राथमिकताओं के चलते अब तक यह टलता ही रहा था। लेकिन अब मैंने अपने आप को इस भूमिका के लिए तैयार कर लिया है और उनके आमंत्रण को स्वीकार करते हुए इस मंडली में शामिल हो चुका हूँ। मेरे साथ कुछ अन्य चिट्ठाकार साथी भी इस मंडली में शामिल हुए हैं -- मसिजीवी और नीलिमा। प्रियंकर जी भी इसमें शीघ्र शामिल होने वाले हैं। चिट्ठा चर्चा का मूल स्वरूप तो पहले की तरह ही रहने वाला है, लेकिन उसमें एक फीचर अब बढ़ जाएगा। अब उस पर चिट्ठा-प्रविष्टियों की समीक्षा भी हुआ करेगी। प्रियंकरजी कविताओं की समीक्षा किया करेंगे और मैं वैचारिक लेखों की। मेरी इच्छा है कि तकनीकी और हास्य-व्यंग्य की श्रेणियों के लिए भी दो चिट्ठाकार आगे आएँ ताकि हम नारद पर आने वाली सभी तरह की चिट्ठा-प्रविष्टियों को वैचारिक, कविता, तकनीकी और हास्य-व्यंग्य की चार श्रेणियों में बाँटकर उनकी विस्तृत समीक्षा कर सकें। आज तो बस यह भूमिका ही सामने रख रहा हूँ। समीक्षा का नियमित क्रम अगले सप्ताह से शुरू हो जाएगा। आओ सिंहावलोकन करें 'पत्र' और 'चिट्ठा' शब्द आपस में लगभग समानार्थी हैं। 'लगभग' इस अर्थ में कि एक में तत्सम का अभिजात्य झलकता है तो दूसरे में देशज ठाठ। लेकिन जब ये 'कार' से जुड़कर क्रमश: 'पत्रकार' तथा 'चिट्ठाकार' बनते हैं, तो एक बहुत बड़ी बहस के निमित्त कैसे बन जाते हैं, यह हम पिछले सप्ताह चली हिन्दी चिट्ठाकारों की बहस में देख चुके हैं। यदि हम आज से लगभग पचास वर्ष पहले बालमुकुंद गुप्त (1922-1964) द्वारा लिखित शिवशंभु का चिट्ठा की भाषा, शैली और शिल्प को देखें तो ऐसा लगता है कि आज के हिन्दी चिट्ठाकारों द्वारा लिखे जा रहे चिट्ठे उसी की परंपरा में ही हैं। केवल माध्यम बदल गया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा हिन्दी साहित्य का इतिहास में उद्धृत शिवशंभु का चिट्ठा के एक अंश पर गौर फरमाएँ: इतने में देखा कि बादल उमड़ रहे हैं। चीलें नीचे उतर रही हैं। तबीयत भुरभुरा उठी। इधर भंग, उधर घटा -- बहार में बहार। इतने में वायु का वेग बढ़ा, चीलें अदृश्य हुईं। अँधेरा छाया, बूंदे गिरने लगी। साथ ही तड़तड़ धड़धड़ होने लगी। देखा ओले गिर रहे हैं। ओले थमे, कुछ वर्षा हुई, बूटी तैयार हुई। बमभोला कहकर शर्माजी ने एक लोटा भर चढ़ाई। ठीक उसी समय लालडिग्गी पर बड़े लाट मिंटो ने बंगदेश के भूतपूर्व छोटे लाट उडबर्न की मूर्ति खोली। ठीक एक ही समय कलकत्ते में यह दो आवश्यक काम हुए। भेद इतना ही था कि शिवशंभु शर्मा के बरामदे की छत पर बूँदें गिरतीं और लार्ड मिंटों के सिर या छाते पर।
भंग छानकर महाराजजी ने खटिया पर लंबी तानी और कुछ काल सुषुप्ति के आनंद में निमग्न रहे। हाथ पाँव सुख में, पर विचार के घोड़ों को विश्राम न था। वह ओलों की चोट से बाजुओं को बचाता हुआ परिंदों की तरह इधर उधर उड़ रहा था। गुलाबी नशों में विचारों का तार बंधा था कि बड़े लाट फुरती से अपनी कोठरी में घुस गए होंगे और दूसरे अमीर भी अपने अपने घरों में चले गए होंगे। पर वही चील कहां गई होगी? हाँ, शिवशंभु को इन पक्षियों की चिंता है, पर वह यह नहीं जानता कि इन अभ्रस्पर्शी अट्टालिकाओं से परिपूरित महानगर में सहस्रों अभागे रात बिताने को झोपड़ी भी नहीं रखते। उपर्युक्त अंश को पढ़ते हुए फुरसतिया, लाईफ इन ए एचओवी लेन, मेरा पन्ना, आईना, बिहारी बाबू कहिन, अज़दक, आदि कई हिन्दी चिट्ठे मेरे जेहन में तैरने लगे। तभी मेरे मन में ख्याल आया कि 'ब्लॉग' के लिए 'चिट्ठा' शब्द का पहली बार प्रयोग करते हुए आलोक जी के मन में क्या रहा होगा। इसकी पड़ताल के लिए आज बहुत दिनों बाद हिन्दी के पहले चिट्ठे 9-2-11 पर गया, जो 21 अप्रैल, 2003 को अस्तित्व में आया था और वहाँ इतिहास को कुछ इस तरह दर्ज पाया, जब उन्होंने पहली बार इस शब्द का इस्तेमाल किया था: जाल चिट्ठा, यानी वॅब्लॉग? ... यह अनुवाद कैसा है? पता नहीं। वैसे मुझे तो सिर्फ़ चिट्ठा ही जम रहा है। तो इस चिट्ठे को आगे बढ़ाएँ।
आलोक जी ब्लॉगस्पॉट के मुफ्त खाते पर बने पहले हिन्दी चिट्ठे को छोड़कर 28 नवम्बर, 2003 को उसी नाम से अपने स्थायी पते पर स्थानांतरित हो गए। जब-जब उनके चिट्ठे पर गया हूँ, कंप्यूटर के लिए हिन्दी के नए-नए औज़ारों की तलाश और उनके प्रयोग को लेकर उनके मन में चलने वाला कौतूहलपूर्ण आह्लाद मुझे हर्ष से भर देता है। अगले माह 21 अप्रैल, 2007 को हिन्दी चिट्ठाकारी के चार वर्ष पूरे हो जाएंगे। मेरा प्रस्ताव है कि तरुण द्वारा आयोजित किए जा रहे वर्तमान अनुगूँज की अवधि (31 मार्च, 2007) बीत जाने के बाद अगली अनुगूँज चिट्ठाकारी के चार वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित हो। इससे जहाँ पुराने चिट्ठाकारों को अब तक के सफर पर विहंगम दृष्टि डालने का महत्वपूर्ण अवसर मिलेगा, वहीं नए चिट्ठाकारों को चिट्ठाकारी के विकास-क्रम और अब तक की विरासत को समझने का मौका भी मिलेगा। चिट्ठा चर्चाकारों तथा तमाम चिट्ठाकारों के सुझाव सादर आमंत्रित हैं। Labels: criticism, Srijan Shilpi, समीक्षा, सृजन शिल्पी
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को प्रकाशित। लेखकः अनूप शुक्ल
कल का दिन भारत के विश्वकप से निकलने पर स्यापे के नाम रहा। स्यापा टसुये बहाकर नहीं खिलखिलाते हुये किया गया। यह आधा भरा हुआ गिलास देखने की आशावादी नजर थी। साथियों ने भारत की हार में अच्छाइयां तलाशी। सबसे पहले निद्रा प्रेमी मृणाल ,जो कि आमतौर पर सबेरे चार बजे तक नेट पर दिखते हैं, ने इससे नींद के घंटे बढ़ जाने के खुशी जाहिर की। तरुण बोले जो हारा सो चुकन्दर। इस पर अनुनाद ने कहा -जीतने की कुछ टिप्स भी तो दो। आशीष को इंतजार है कि कब बीसीसीआई पर ताला लगे। इसी को देखते हुये संजय बसाक बो बीसीसीआई को बंद काहे नहीं कर देते? अरे ये संजय कनपुरिया हैं और अभी तक भेंटाये नहीं हमलोग! ये कैसा जुलुम है भाई। अपन मोहल्ला पता बताओ मिलते हैं। बात मोहल्ले की चली तो देखिये मोहल्ले वाले भी दुखी हैं भारत के निकलने की खबर से। उमाशंकर सिंह सचिन और धोनी को शून्य पर आउट होने की बधाई देते हुये कहते हैं- तुम जैसा खेल सकते थे, वैसा ही खेले। अपना बेहतरीन जो दे सकते थे, दिया। तुम्हारी इस भूल से अब हमें सीखने को मिलेगा। हम अब तुम्हें शायद इतनी जगह नहीं दे पाएंगे। दो चार दिन लानत मलामत झेल लो, फिर हम अपनी ज़िम्मेदारियों पर आ जाएंगे। तुम भी अपने रेस्टोरेंट और बाकी के कारोबार में लग जाना। और कभी अच्छा क्रिकेट मत खेलना। तुम लोगों का ये खेल हमारी भूख भुला देता है, भ्रष्टाचार भुला देता है। तुम लोग तो हार के भी करोड़ों में खेलते हो, कभी कभार की तुम्हारी जीत में नाच कर भी करोड़ों भूखे सोते हैं। अच्छी-अच्छी चीजें लिखने वाली मनीषा तो हारने के लिये एक अच्छा प्रस्ताव भी पेश करती हैं। लेकिन हार से सबसे तार्किक खुशी खोजी है अपने बिहारी बाबू प्रियरंजनझा ने। इस हार को पाजिटिव तरीके से लेते हुये वे- कैसे बाल धूप में सफ़ेद हो सकते हैं से लेकर बच्चों का हित, आफिस में चैन , नींद के घंटे बचने की बात कहते हुये देश के काम के करोड़ों घंटे बचने की खुशी खोजते हैं- और अब जबकि भारत विश्व कप से बाहर हो गया है हमारे-आपके जैसे करोड़ों लोग क्रिकेट को भूल अपने काम को ढंग से अंजाम दे पाएंगे, यानी क्रिकेट के निठल्ले चिंतन से बचने का मतलब है देश के लिए श्रम के करोड़ों घंटे बचा लेना! है न खुशी की बात! आखिर इससे आप ही के देश की प्रगति होगी न। हमें डर है कि कौनौ मंत्री ई पोस्टवा देख लिहिस तो कहो अनाउंस कर दे- देश के जे है न से करोड़ों घंटे बचाने के लिये हर साल बर्ल्ड कप इंडिया में कराया जायेगा। हर बार इंडिया हारकर करोड़ों घंटे बचायेगा। घंटे कम बचे तो साल में दू-दू बार बर्ल्ड कप कराया जायेगा। अब ये रोना-गाना हो गया। इसके आगे की चर्चा के लिये देखते रहिये चिट्ठाचर्चा। आज ही करेंगे। कहीं जाइयेगा नहीं। वर्ना मिस हो जायेगा। फिर आपकी मिसेज हड़कायेंगी। फिर हमसे मत कहियेगा कि बताया नहीं। तो फिर मिलते हैं ब्रेक के बाद! मिलेंगे न!
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March 24, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Debashish
हिन्दी चिट्ठाकारी में पत्रकारों के पदार्पण पर अनूप के चिट्ठे ने मानो हम सब के मन की बात कह दी हो। मेरा ख्याल है कि अब इस कांड पर पटाक्षेप हो जाना चाहिये। ये पहला ऐसा मौका नहीं होगा जहाँ विधा का कद कलाकार से ज्यादा हो गया। चिट्ठाकारी की मूख्याधारा में मिडिया की च्रचा से काफी बवाल खड़ा हुआ पर सबसे हास्यास्पद बात लगी नारद पर लगाये नियमों की व्याख्या पर। नारद शब्द ही फसाद से जुड़ा है। मेरे ख्याल से ज़्यादातर लोगों ने खामख्वाह इस मुद्दे को पीटा ये जानते हुये भी कि नारद के संचालक जो चाहें वो नियम बनाने को स्वतंत्र हैं। ये बेसिरपैर का प्रलाप बंद करें, नंदीग्राम पर नहीं तो पास्ता के उपर ही लिखें। अफ़लातून नंदीग्राम की घटना की विवेचना करते हुये लिखते हैं, "जो कम्युनिस्ट कल तक हर मामले में कारण-अकारण टाटा-बिड़ला को गाली देते थे, उन्हीं की सरकार आज टाटा के साथ गले में हाथ डालकर खड़ी है और किसानों-मजदूरों-बटाईदारों पर लाठी-गोली चला रही है।" चौपटस्वामी का आकलन है कि इसी लिए चाह कर भी जागृत और सचेतन बंगाल बुद्धदेव भट्टाचार्य को नरेंद्र मोदी होने नहीं देगा। ब्लॉगजगत में नये हस्ताक्षरों में रवीश सबसे ज्यादा आकर्षित करते हैं। हर बार चर्चा के समय सोचता हूँ कि पेशेवर लेखकों को कम फुटेज देना चाहिये, जी ये मेरा एक पूर्वाग्रह है। पर रवीश के लेखन में कोई कैमोफ्लॉज नहीं है। मेरे ख्याल से वो स्वयं भी यह जानते हैं, अपना मन उढ़ेल कर रख देते हैं, कई बार पाठकों का मन नम करने के लिये। मीरा नायर की नई फ़िल्म नेमसेक के बारे में लिखा, समीक्षा नहीं वरन फिल्म की तर्ज़ पर। अपनी जड़ों से ये लगाव मेलोड्रामाटिक लगता है, बकौल रवीश "यह कोई साहित्यिक नोस्ताल्ज़िया नहीं है"। सचाई भी यह है कि कंक्रीट के जंगलों में गुम हम में से उन सब को ये दर्द सालता रहता है जो ऐसी जगहों से आये हैं जो महानगरों में एलएस कहलायेंगी, जंगल जहाँ पर बच्चे सुराही और गौरैया नहीं पहचानते, अमरूद के पत्तों का स्वाद नहीं जानते और न जानते हैं बेशरम की सूखी डंडी से साईकिल का टायर चलाना। सागर ने गुलज़ार की पंक्तियाँ क्या खुब उद्धत कीं लवें बुझा दी है अपने चेहरों की, हसरतों ने कि शौक पहचानता ही नहीं है। मुरादें दहलीज ही पे सर रख कर मर गई हैं मैं किस वतन की तलाश में यूँ चला था घर से कि अपने ही घर में भी अजनबी हो गया हूँ आकर। भारत के चुकंदर बनने से ख़ुमार कुछ उतरा होगा, मैं तो छटवां विकेट गिरने पर ही टीवी बंद कर बैठा था। यह खेल इंडिया का नया धर्म है, विज्ञापनदाताओं ने ये धर्मावतरण करवाया है। हम क्रिकेट फैनाटिक बन बैठे हैं। खीज ऐसी कि बीसीसीआई तक को भंग करवा दें। अब फिर किसी के घर को तोड़ेंगे और किसी की तस्वीर पर जूतों का हार चढ़ायेंगे। पर विज्ञापन चलते रहेंगे। सट्टेबाजों से लेकर प्रसारकों की तिजोरियों भर रही हैं। पैसे की ही बिसात पर बॉब वुल्मर जान दे बैठे। प्रमोद चैपल को मशवरा देते हैं, "हुज़ूर, होटल के कमरे में अकेले मत सोइयेगा, और सोना ही पड़े तो तकिये के नीचे एक पिस्तौल रखकर सोइयेगा"। रवीश को कहना पड़ा कि "कृपया क्रिकेट को धर्म या राष्ट्र मत बनाइये। इन दो रास्तों से सिर्फ धोखाधड़ी करने वाले घुसते हैं। जो ईमानदार हैं वो सीमा पर पहरा दे रहे हैं।" कमल शर्मा रियेल्टी के निवेशकों को चेतावनी दे रहे हैं। लिखते हैं, "निवेश गुरु जिम रोजर्स का कहना है कि रियॉलिटी में काफी सट्टेबाजी हो चुकी है और सारी खरीद तो सट्टात्मक थी। यानी सच्चाई से दूर।" हमने निरंतर में काफी पहले ही इस बुलबुले के बारे में लिखा थाबायिंग फ्रेंज़ी के शिकार सुनें तब ना। सेठ होशंगाबादी ने अपनी कंटीजेंसी योजना का खुलासा किया, मंदी की आशंका से सहमकर मैंने तो योजना बना ली है। बचत तो कुछ नहीं है, बस पीएफ का पैसा थोड़ा बहुत। सेठगिरी छोड़कर, बस दो भैंस व दो बकरी खरीदूंगा, शायद मंदी काट लूं। भगत सिंह की जन्म शताब्दि पर तिर्यक विचारक लिखते हैं, "मुझे नहीं पता कि 23 मार्च को भारत के शहरी युवा क्या कर रहे होंगे...सोचता हूं इस बार पता करूं कि भगत सिंह को याद रखने वाले हमारे देश में कितने मुक्तिकामी नौजवान बचे हैं"। अनिल का मत है कि क्रांति कोई अचानक हुआ विस्फोट नहीं है। वह तो एक सतत प्रक्रिया है। भारत की हर समस्या के नेपथ्य में जिस नाईं विदेश मंत्रालय इस्लामाबाद को देखता है वैसे ही लोकमंच विश्व के हर त्रास के पीछे इस्लामवाद को। अब डॉ. डैनियल पाइप्स को खींच लाये है खेमे में, जो लाख कुरेदने पर भी बोल पड़ "दीर्घकालावधि में समय-समय पर आतंकवाद इससे सम्बद्ध रहा है...परन्तु ऐतिहासिक रूप से आतंकवाद इस्लाम के साथ सम्बद्ध नहीं रहा है।" और चलते चलतेः चिट्ठों की और खासकर अच्छे चिट्ठों की संख्या तेज़ी से बढ़ती जा रही है और मेरे ख्याल से चर्चा मंडळी मानेगी की काम काफी कठिन होता जा रहा है। निश्चित ही हमें और हाथों की दरकार है। यदि आप में से कोई चर्चादल में शामिल होना चाहता है तो टिप्पणी द्वारा संपर्क करें। Labels: debashish

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