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हर तरफ हर जगह है उसी का नूर...

April 19, 2008 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami

इस चिट्ठा प्रविष्टि पर आज नजर पड़ी तो लगा कि इसे तमाम दुनिया को बताना चाहिए कि इसे अवश्य देखें. गीत सम्मोहक तो है ही, वीडियो संयोजन अत्यंत सम्मोहक.

तमाम दुनिया को आप भी फारवर्ड करें, उन्हें बताएं, देखें-दिखाएं व सम्मोहित हों...

चिट्ठे की कड़ी है - http://lifeteacheseverything.blogspot.com/2008/04/blog-post_18.html

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हिन्दी का पहला ब्लॉग गीत और ब्लॉग गान...

November 16, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami

आज जब ये ब्लॉग गान पढ़ने में आया तो हिन्दी का पहला ब्लॉग गीत याद आ गया.

ब्लॉगिंग बिना चैन कहाँ रे....

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बया में रवीशी, अजदकी और अनामदासिया बयां

August 25, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami

बया के नवीनतम अंक में हिन्दी ब्लॉगजगत् के बारे में अरविन्द कुमार का आलेख आपने संभवतः पढ़ा होगा. इसी अंक के संपादकीय में कहीं पर यह लिखा है
"...ग़ौरतलब है कि प्रस्तुत व्यंग्य कथाओं में से तीन हिन्दी के ब्लौगों से प्रिंट माध्यम में पहली बार आ रही हैं."
ये व्यंग्य कथाएँ कौन सी हैं, ये हैं - हिन्दी ब्लॉग जगत् के दिन अब सचमुच में बहुर गए हैं. क्या आपको ऐसा नहीं लगता :)

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मोहल्ले में भाषा कर्मी अरविन्द कुमार

August 17, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami

दोस्तों,

यदि आपने मोहल्ले पर प्रकाशित अरविंद कुमार के इस लेख को अब तक नहीं पढ़ा है तो अवश्य पढ़ें. अरविन्द कुमार ने हिन्दी चिट्ठाजगत् में सृजित हो रहे हिन्दी शब्दों के बारे में अपने चिरपरिचित अंदाज में पर, नए कोण से लिखा है.

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इस चीख की आवाज को दोस्तो, हम सभी को सुनना होगा...

July 20, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami



पूरी कहानी यहाँ पढ़ें

चित्र - विजेन्द्र विज की कलाकृति

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एक फुलकी खुश्बु है, कीसी दीलकी जुबानी है

June 21, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami


कोई मलयाली, हिन्दी में चिट्ठा लिखेगा तो?

कोई केरली, कोई जापानी और कोई अमरीकी हिन्दी में चिट्ठा लिखेगा तो?

और कोई ख़ालिस गुजराती , हिन्दी में चिट्ठा लिखेगा तो?

वह कैसा लिखेगा?

जाहिर है, उसकी हिन्दी में उसकी अपनी मातृभाषा के अंश घुस आएंगे - जैसे कि हमारी अपनी हिन्दी में अंग्रेजी घुसपैठ कर चुकी है.

शुद्धतावादियों से आग्रह है कि वे भी अपनी उत्साहवर्धक टिप्पणियां ही दें, व शुद्ध हिन्दी लिखने के लिए तमाम ऐसे चिट्ठाकारों को थोड़ा सा समय अवश्य दें. समय सबको सिखा देता है.

तो, आइए, इस ग़ैर हिन्दी भाषी के इस हिन्दी चिट्ठा प्रविष्टि का स्वागत् करें व इनके प्रयासों की सराहना करें.

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आइए, आज मालवी जाजम बिछाएं...

June 17, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami


(मालवी जाजम के चिट्ठाकार - श्री नरहरि पटेल)

भाई ई-स्वामी ने कोई दो साल पहले ख्वाहिश जाहिर की थी कि कोई मालवी चिट्ठा शुरू करवाई जाए...

इधर कुछ समय से इक्का दुक्का मालवी चिट्ठे शुरु हुए हैं. देर से ही सही, उनकी ख्वाहिश अब पूरी हो गई.

आज चर्चा करते हैं मालवी जाजम की.

मालवी जाजम का पहला चिट्ठा 10 जून को प्रकाशित हुआ और आज 17 जून के आते तक उसमें 7 चिट्ठे मालवी में प्रकाशित हो चुके हैं. यदि रफ़्तार यही रही, जिसके लिए हमारी शुभकामनाएँ हैं , तो यह चिट्ठा मालवी भाषा-बोली की उपस्थिति इंटरनेट पर दर्ज कराने में मील का पत्थर साबित होगा.

प्रस्तुत हैं मालवी जाजम के कुछ चुनिंदा पोस्ट -

मालवी ग़ज़ल


कसी लुगायां हे...

सीधी सादी,कसी लुगायां हे
भोली भाली,कसी लुगायां हे

जनम की मां,करम की अन्नपूर्णा
भूखी तरसी, कसी लुगायां हे

पन्ना,तारा,जसोदा मां, कुन्ती
माय माड़ी, सकी लुगायां हे

कुंआरी बिलखे हे,परणी कलपे
घर से भागी,कसी लुगायां हे

गूंगी-गेली,वखत की मारी हे
खूंटे बांधी, कसी लुगायां हे

फ़ांसी-फ़न्दो,तेल ने तंदूर
लाय लागी,कसी लुगायां हे

टीप:

लुगायां:औरतें
माड़ी:मां
परणी:ब्याहता
लाय: आग

****

भाटो फ़ेकीं ने माथो मांड्यो..

मालवी का यशस्वी हास्य कवि श्री टीकमचंदजी भावसार बा अपणीं रंगत का बेजोड़ कवि था.घर -आंगण का केवाड़ा वणाकी कविता में दूध में सकर जेसा घुली जाता था.मालवी जाजम में या बा की पेली चिट्ठी हे....खूब दांत काड़ो आप सब.आगे बा की नरी(अनेक) रचना याद करांगा.

कविता को सीर्सक हे..
भाटो फ़ेकी ने माथो मांड्यो...

लकड़ी का पिंजरा में चिड़ियां बिठई
चोराय पे जोतिसी ने दुकान लगई
भीड़ भाड़ देखी ने एक डोकरी रूकी
लिफ़ाफ़ो उठायो तो चिट्ठी दिखी

साठ बरस की डोकरी ने बिगर भणीं
बंचावे भी कीसे भीड़ भी घणीं
अतरा में एक छोरो बोल्यो ला मां... हूं वांची दूंगा
जेसो लिख्यो वेगा वेसो कूंगा


लिख्यो थो...
प्रश्न पूछ्ने वाले तुम्हारी अल्हड़ता और सुंदरता पे
आदमी मगन हो जाएगा
और आते महीने तुम्हारा लगन हो जाएगा.

***-***

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तीन साल की इगा का चिट्ठा

June 13, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami


मासुमियत की दुनिया में, किलकारियों की गूँज के साथ आपका स्वागत है।....

तीन साल की इगा भी चिट्ठाकारी - हिन्दी चिट्ठाकारी में उतर चुकी हैं. ऊपर की पंक्ति उसके ब्लॉग का टैगलाइन है.

उनके चिट्ठे का नाम है - मेरा बचपन

इगा अपनी पहली भारत यात्रा पर उत्साहित है, और वह कुछ यूँ लिखती है -

मेरी पहली भारत यात्रा ( की तयारी )

सोमवार की सुबह तक (११ -जून) मुझे पता ही नहीं था कि इन्डिया जाना क्या होता है| पापा-मम्मी पिछले कुछ दिनों से लगातार व्यस्त चल रहे थे | ख़ूब प्लानिंग भी चल रही थी | पूरे घर मे सामान बिखरा हुआ , अटैचीयां खुली हुई| मेरे लिए तो अच्छा था , खेलने के लिए नए और अजीबो-गरीब खिलौने थे | मम्मी के कपड़े, सारियाँ , गहने , नया मोबाईल फ़ोन -हर चीज़ मुझे जैसे बुला रही हो, " आओ , मुझसे खेलो" |
लेकिन जैसा कि हमेशा होता है, मेरी माँ मुझे कभी भी मेरे पसंद वाले खिलोने से खेलने नहीं देती | कभी भी कुछ उठाया तो - Sami ! डोंट टच ( Sami Dont Touch!! ) की गुहार लगाने लगती हैं | अब उन्हें कैसे समझाया जाये कि बिना छुए हुये मैं कैसे खेल सकती हूँ खिलौनों से |

अब यदि अपने मोबाइल -कैमरे से आपने मेरी तस्वीर खींची है तो मेरा पुरा हक बनता है कि मैं देखूं कि फोटो कैसी आयी है | अलबत्ता , मुझे कैमरा(फोन) हाथ मे लेकर ही अपनी फोटो देखना पसंद है | अब यदि आपको फोन के गिर कर टूटने का डर है तो वो आपकी समस्या है | उसके लिए मैं क्या कर सकती हूँ |
सबसे ज्यादा गुस्सा मुझे तब आया जब ममा ने अपना पुराना फोन मुझे बहलाने के लिए दे दिया| मैं छोटी हूँ पर नए और पुराने फोन का भेद समझती हूँ | वो तो ढंग से चल भी नहीं रहा था | ना कोई कैमरा , ना रंगीन स्क्रीन | मैंने साफ जता दिया कि मुझे फालतू फोन दे कर टरकाने की उनकी सारी कोशिशें नाकाम होंगीं |
( पापा अभी काम कर रहा है, फुर्सत मे उससे और लिखावाउंगी )


आखिरी लाइन आपने सही पढ़ी. इगा अभी अपने पापा से लिखवाती है.

इगा, तुम जल्दी बड़ी होओ और फिर खुद लिखो. इन्हीं कामनाओं के साथ,

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पेश है देसी गूगलवा...

June 01, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami

दोस्तों अब से नियमित सोमवारी चर्चा के बजाए अब अनियमित, जिस वक्त कुछ उल्लेखनीय दिख गया या सूझ गया की तर्ज पर चर्चा जारी रहेगी. कोशिश रहेगी कि सप्ताह में कम से कम एकाध चर्चा गाहे बेगाहे तो मार ही दें...

इसे नियमित चिट्ठाचर्चाकार कतई व्यवधान स्वरूप न समझें. नियमित चर्चा जारी रहेगी. यदि किसी नियमित चर्चा में व्यवधान सा महसूस होता है तो अपनी राय अवश्य रखें.

तो चलिए आज से इस अनियमित चर्चा की शुरूआत देसी गूगल से करते हैं -

पियवा गइले परदेश फगुनवा रास ना आवे,
ना भेजले कउनो संदेश फगुनवा रास ना आवे।।

ननदी सतावे देवरा सतावे,
रही रही के जुल्मी के याद सतावे।
सासुजी देहली आशीष फगुनवा रास ना आवे।।

सखिया ना भावे नैहर ना भावे,
गोतीया के बोली जइसे आरी चलावे।
नींदियो ना आवे विशेष फगुनवा रास ना आवे।।

बैरी जियरवा कइसो ना माने,
रहि रहि नैना से लोरऽवा चुआवे
काहे नेहिया लगवनी प्राणेश फगुनवा रास ना आवे।।


आगे इस चिट्ठे पर पढ़ें, जहाँ और भी मजेदार चीजें पढ़ने और देखने के लिए हैं!

और, यहाँ भी एक नजर मार सकते हैं - यदि बॉलीवुड गॉसिप में आपको कोई तत्व नजर आता है.

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मैं जलकुकड़ी

May 28, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami


दोस्तों, इन संकलित चिट्ठों की ख़ासियत ये है कि इनमें से अधिकतर नारद से जुड़े नहीं हैं, हिन्दी में नए नवेले हैं और प्रायः दूसरी भाषाओं - मसलन अंग्रेज़ी से हिन्दी लेखन की ओर नए-नए आकर्षित हुए हैं. आपसे गुज़ारिश है कि इनकी हौसला आफ़जाई अपनी धुआंधार टिप्पणियों के माध्यम से करें. हां, हो सकता है इनमें से कुछ की हिन्दी शोचनीय या शौचनीय जैसा कुछ हो (लिखते पढ़ते वे शीघ्र सीख जाएंगे - यकीन मानिए, कोई भी व्यक्ति शौकिया रूप से गलत भाषा में नहीं लिखता) परंतु आइए, उनके प्रयासों की सराहना करें.


ये नए नवेले हिन्दी चिट्ठे मुझे कहाँ से मिले? मेरे टंबलर से! ये टंबलर क्या है ? जल्दी ही आपको बताता हूँ!, तब तक आप मेरा टंबलर देखें.

शब्द सागरना किनारे...

भाषाई दीवार ढहती हुई -

उन के देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक़
वह समझ्‌ते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

તે મારી સામે જુવે છે અને મારા ચહેરા પર ચમક આવી જાય છે, અને તેઓ સમજે છે કે આ બિમારની હાલત હવે સારી છે.

आगे पढ़ें -


द इनरमोस्ट फ़ीलिंग...

एक गांव में एक स्त्री थी । उसके पती आई टी आई मे कार्यरत थे । वह आपने पती को पत्र लिखना चाहती थी पर अल्पशिक्षित होने के कारण उसे यह पता नहीं था कि पूर्णविराम कहां लगेगा । इसीलिये उसका जहां मन करता था वहीं पुर्णविराम लगा देती थी ।उसने चिट्टी इस प्रकार लिखी--------

प्यारे जीवनसाथी मेरा प्रणाम आपके चरणो मे । आप ने अभी तक चिट्टी नहीं लिखी मेरी सहेली कॊ । नोकरी मिल गयी है हमारी गाय को । बछडा दिया है दादाजी ने । शराब की लत लगा ली है मैने । तुमको बहुत खत लिखे पर तुम नहीं आये कुत्ते के बच्चे ।.... आगे यहाँ पढ़ें


लस्ट फ़ॉर लाइफ़

होती है मुझे ईर्ष्या !!

उन हवाओं से,

जो तुम्हारे बाल सहलाती हैं,

उन खुशबुओं से,

जो तुम्हारे करीब आती हैं ।

.... आगे पढ़ें

सृजन

आज फ़िर...

आज फ़िर हमने एक सपना देखा,

हो जायेगा पूरा, वो अरमान है सोचा ।

खुश हो जाये दिल का हर एक कोना,

फ़िर आरजू की कलियो को खिलता देखा ॥

आगे पढ़ें-


मैं जलकुकड़ी (जेलसमी)

हेल्लो!! क्या चल रहा है?? सब मस्त?

मेरा नाम आरुशी है!!

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चदुवरि

अब हिंदी मे भी लिख सकते है। लेकिन ए सुविधा तेलुगु भाषा केलिये कब आयेगी?

जल्दी ही आएगी, तब तक आप भोमियो का इस्तेमाल कर सकते हैं!

आगे पढ़ें -


अग्नि की खोज

आप पूछोगे कि यह आदमीयों कि ज़मात मे गधा कहा से आ गया?

इसका जवाब अपने रामलाल जी शरमाते-लजाते-मुस्कराते हुए देते हैं। कहते है " अजी गधा भी तो आख़िर आदमी होता है।" तो हाज़रीन रामलाल जी का गधा कोई मामूली गधा नही-वो तो शेर है अपने दरवाज़े का, अब चुंकि राम्लाल्जी के लिए बकौल शायर आस्मान छत और धरती ठिकाना है, गधे को दरवाज़े कम ही मिलते हैं और बेचारा अपनी मनमोहन जी जैसे शेर होके भी गधे वालो काम चलाऊ सर्कार कि जिन्दगी जीं रहा है।

लेकिन इन सारी बातों का शायरी से क्या वास्ता? तो जनाब शायरी से मेरा ही कौन सा बहुत वास्ता है, मैं तो बस सुहाने मौसम और भीगी भीगी शाम के लपेटे मे आ कर भावुक हो उठा था, जैसे जंगल का मोर हो उठता है।....

आगे पढ़ें -


ऑक्शन

अपको एबय से कैसे पैसा कमाना है ये सीकना है?

तो आगे पढ़ें -


स्प्लैटक्रैश

फिर आज मुझे तुमको

...बस इतना बताना है,

हंसना ही जीवन है, हंसते ही जाना है।

यह शब्द सुनके मेरको पहले सुख मिलता था, मैं सोचती थी की सब कुछ ठिक हो जायगा, पर अब लगता है, की जिंदगी में केवल दुख है, और खुशियाँ सब एक सपना।

हसीं का कुछ मतलब था, और हसीं मजाक में समय निकल जाता था, बिना सोचे ना समझे, पर अब यह तो चलता ही नहीं, ना तो मन माने ना तो जी समझे। सब दोस्तों के साथ ऐसा क्यों होता है। समझ में ही नहीं आता की हम क्या कर सकते है, सच समझे तो कुछ नहीं हो सकता है, बस इंतजार। पर कब तक इंतजार करे, जबतक, सब दोस्त अपने अपने घम में गुम ही जाये? क्या यह ही जीवन है, बस इतनी ही कोशिश?...

आगे पढ़ें-


हाल-ए-दिल

धड़कन है साँसे हैं ,

पर वो जिन्दगी नहीं

मेरा चांद आज मेरे साथ है,

पर वो चांदनी नहीं

मुद्दत से चाहा है उनको,

कभी छीना भी नहीं

नशे में गम को भुला दे,

ऐसा वफाई सीना भी नहीं...

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इनफ़ोविनिटी

एक बार हमें शादी करने का ख्याल आया।

हमने तुरन्त जाकर पिता जी को बताया।

पिता जी ने अगले दिन ही;,

बिना दहेज के शादी के लिए

अखबार में इश्तिहार छपवाया।

महीने भर तक घर पर कोई नहीं आया।

तब पिता जी ने अपनी समस्या

एक प्रार्पटी डीलर को बताई।

उसने तुरन्त एक तरकीब सुझाई।

बोला

झुमरी तलैया में दूल्हों की सेल लगी है।

वहां लड़कियों की बहुत लम्बी लाईन लगी है।

आप तुरन्त वहां चले जाइए।

जैैसी चाहें वैसी वधू पाइए।

पिता जी बोले

पर मुझे दहेज नहीं लेना।

वो बोला लड़की तुम रख लेना।

दहेज मुझे दे देना।....


यहाँ पर यह पोस्ट भी अवश्य पढ़ें -


जीवन पुष्प

हे मेरे गुरुदेव करुणा-सिंधु .. - भजन

हे मेरे गुरुदेव करुणा-सिंधु करुणा किजीये,

हुं अधम आधीन अशरण, अब शरणमें लिजीये...

खा रहा गोते हुं मैं भव-सिंधु के मझधारमें,

दुसरा है आसरा कोई ना ईस संसारमें,

हे मेरे गुरुदेव करुणा-सिंधु करुणा किजीये...

मुझमें नहि जप-तप व साधन, और नहि कुछ ग्यान है,

निर्लज्जता है एक बाकी, और बस अभिमान है,

हे मेरे गुरुदेव करुणा-सिंधु करुणा किजीये...

आगे पढ़ें


काव्य संग्रह

आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।

आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।

आराम शब्द में 'राम' छिपा जो भव-बंधन को खोता है।

आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।

इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।

ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।

....... आगे पढ़ें


ऑरबिट मैक्स

आना है तो आ, राह में कुछ फेर नही है

भगवान के घर देर है, अन्धेर नही है।

जब तुझसे न सुलझे तेरे उलझे हुए धन्दे

भगवान के इन्साफ़ पे सब छोड़ दे बन्दे।

खु़द ही तेरी मुशकिल को वो आसान करेगा

जो तू नहीं कर पाया वो भगवान करेगा।

आगे पढ़ें...


तथा यह भी -

उत्सव का मतलब है:

पूस कि रात
चार दोस्त
एक बरसात
चार कप चाय

(या)

१०० रु का पेट्रोल
एक खटारा मोटरगाड़ि
एक खाली सड़क

(या)

म्यागि नूड़ल्स
हास्टल का कमरा
सुबह कि ४:२५

(या)

तीन पुराने साथि
तीन अलग शेहेर
तीन काफ़ी के प्याले
एक इन्टर्नेट मेसेन्जर

(या)

आगे पढ़ें-


हैप्पीनेस

....इसीलिये मेरी मां ने मुझे

अशिक्षा की, भाग्यशीलता की

धर्मान्धता की और जांत- पांत की

अफीम चटा दी है...

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बस यूँ ही

हीय में उपजी,

पलकों में पली,

नक्षत्र सी आँखों केअम्बर में सजी,

पल‍ ‍दो पलपलक दोलों में झूल,

कपोलों में गई जो ढुलक,

मूक, परिचयहीनवेदना नादान,

किससे माँगे अपनी पहचान।

नभ से बिछुड़ी,

धरा पर आ गिरी,

अनजान डगर परजो निकली,

पल दो पलपुष्प दल पर सजी,

अनिल के चल पंखों के साथरज में जा मिली,

निस्तेज, प्राणहीनओस की बूँद नादान,

आगे पढ़ें ....


आज फिर


आज फिर याद कर तुम्हें
रोने का मन करता है
पर इसपर भी मेरा अधिकार नहीं
तुमने क़सम जो दी है मुझको

आज फिर याद कर तुम्हें
वो पेड़ की छाँव याद आती है
तुम्हारी गोद में सिर रख कर
सोने का फिर मन करता है

आज फिर याद कर तुम्हें
चूड़ी की खनक सुनाई देती है
वो कंगन और बाली की आधी झलक
मन हर कोने में खोजता है...

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ओबेदुल्ला अलीम की ग़ज़लें

अजीज़ इतना ही रखो कि जी संभल जाये
अब इस क़दर भी ना चाहो कि दम निकल जाये

मोहब्बतों में अजब है दिलों का धड़का सा
कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाये

मिले हैं यूं तो बोहत, आओ अब मिलें यूं भी
कि रूह गरमी-ए-इन्फास* से पिघल जाये

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मिस्टर इंडिया के बीस साल

२० साल पहले शेखर कपूर कि groundbreaking फिल्म "मिस्टर इंडिया" release हुई थी। उस समय शायद मेरी toilet training चल रही थी। इस पिक्चर को मैंने early nineties में अपने VCR पर देखा था। फिल्म इतनी पसंद थी कि इसका cassette भी खरीद लिया था। उस समय कंप्यूटर तो था नही और video game तब खरीदा नही था।केबल काफी नया था। VCR पे picture ही देखी जा सकती थी। आज कल तो दिन भर net पे बैठा रहता हूँ । Torrents से दुनिया भर कि picture और TV shows download कर के देखता हूँ. by chance, आज एक video Youtube पर मिला :

आगे यहाँ पढ़ें...

यहीँ पर एक पोस्ट में लिखा है -

नारद वाले काफी दादागिरी करते हैं। मोगाम्बो जैसे आदमी को रजिस्टर करने के लिए तीन पोस्ट क्यों लिखना ज़रूरी है। बड़ा तोडु introduction लिखा था। सोचा था एक बार aggregate हो जाये, लिस्ट पे नाम आजाये तो पोस्ट करूंगा। अब तो उसे जल्दी ही लगना पड़ेगा।

तो, बंधु अगर आप ऐसी खिचड़ी लिपि में लिखेंगे तो नारद का प्रसाद आपको क्योंकर मिलेगा? अंग्रेज़ी के शब्द खूब लिखें, पर लिखें देवनागरी लिपि में. नारद हो या कोई भी संस्था - उसके अपने कुछ उसूल नियम कायदे कानून तो होंगे कि बस मोगेम्बो की अक्खा, उलटी, बेनियम-बेकायदा दुनिया ही चलेगी?

और, अंत में स्थानीयकृत (लोकलाइज्ड) गुजराती ग़ीक - कार्तिक मिस्त्री का ब्लॉग - यहाँ ब्लॉग पर कुछ पढ़ने ढूंढने के लिए आपको कमांड लाइन के जरिए बैश कमांड देने पड़ सकते हैं! लिनक्स कमांड सीखने का बेहतरीन आइडिया. कमांड लाइन पर help कमांड देकर देखें!

(चित्र - मैं जलकुकड़ी से!)

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25 सर्वाधिक प्रसिद्ध चिट्ठे

May 21, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami


इंटरनेट पर उपलब्ध तमाम चिट्ठों में से 25 सर्वाधिक प्रसिद्ध चिट्ठों को छांटा गया है. जाहिर है इसमें हिन्दी चिट्ठे तो आने वाले दो-चार सालों में भी नहीं आ पाएंगे - वजह है पाठकों की अत्यंत सीमित संख्या. उदाहरण के लिए, पंचम स्थान प्राप्त बोइंगबोइंग के चार लाख से ऊपर नियमित फ़ीडबर्नर सब्सक्राइबर हैं!

इस सूची में कुछ जाहिरा तौर पर प्रसिद्ध चिट्ठे तो हैं ही जैसे कि क्रमशः दूसरे व तीसरे स्थल पर गिज़्मोडो.कॉम तथा एंगेज़ेट्स है जिसमें कि नए-नए गॅज़ेट्स और उपकरणों के बारे में तमाम ब्लॉग पोस्ट लिखे जाते हैं. नए गॅज़ेट्स हर किसी को आकर्षित करते हैं! है ना?

बोइंग-बोइंग का नाम भी इसमें है तो लाइफ़-हैकर भी 6 वें क्रमांक पर है. टेकक्रंच को दसवें स्थान पर रहकर संतोष करना पडा है. ऑटो-ब्लॉग भी 13 वें स्थान पर घुसने में कामयाब रहा है जो यह बताता है कि लोगों का कारों और मोबाइक का आकर्षण कभी भी खत्म नहीं होगा. यू-ट्यूब के वीडियो से भरा पूरा क्रुक्स एंड लायर्स 17 वें स्थान पर है जो दिखाता है कि लोग लाफ़्टर चैलेंज जैसी चीजों को अच्छी खासी तरजीह देते हैं. आर्सटेक्निका तथा माशेबल क्रमशः 19 वें तथा 24 वें स्थान पर हैं जिन्हें मैं नियमित पढ़ता हूँ. पेरिज़ हिल्टन नाम का सेलिब्रिटी ब्लॉग 15 वें स्थान पर है जो यह दिखाता है कि अपने बॉलीवुड की तरह फ़िल्मों के हीरो हीरोइनों के बारे में भी जानने को जनता उत्सुक रहती है और इन ब्लॉगों को खूब पढ़ती है.

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मेरी दुनिया है मां तेरे आँचल में...

May 14, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami



आइए, आज मातृ दिवस पर केंद्रित चिट्ठों की चर्चा करें.

यदि आप मल्टी टास्किंग कर सकते हैं - यानी कि चिट्ठे पढ़ते पढ़ते संगीत या वार्ता सुन सकते हैं तो आपके लिए ये हैं दो कड़ियाँ.

रेडियोवाणी पर मां के लिए कुछ बेहतरीन गीत हैं तो वहीं पॉडभारती पर मन को द्रवित करने वाली प्रस्तुति. या तो इन्हें पहले से डाउनलोड कर लें, या विनएम्प में इनके एमपी3 यूआरएल को एनक्यू में लगा दें (रेडियोवाणी के कुछ गानों को ऑनलाइन प्लेयर से ही सुनना होगा) और हो जाएं तैयार चिट्ठा चर्चा पढ़ने.

पसंद पर मां कुछ यूं पालना में झूले दे रही हैं -

फूलों का पालना सा,

लगता था तेरा आँचल।

तेरा हाथ फिरता सर पर,

देता था मन को ताकत।

दिशाएँ में मां की ममता की पावन बयार कुछ यूं बह रही है -

आओ आँगन मे हम खेलें

माँ का प्यार मुदित हम लेलें

माँ तुम दॊडों मै पकडूँगी

अथवा तुम संग मै झगड़ूँगी

खेलो ना इक बाजी

ओ माँ,तुम भी हो मतवाली।

मेरी मां की ममता मैंने कैसे जाना? पढ़िए मन पखेरू फ़िर उड़ चला में -

माँ बनकर ये जाना मैनें,

माँ की ममता क्या होती है,

सारे जग में सबसे सुंदर,

माँ की मूरत क्यूँ होती है॥

जब नन्हे-नन्हे नाजु़क हाथों से,

तुम मुझे छूते थे...

कोमल-कोमल बाहों का झूला,

बना लटकते थे...

मां - कितना छोटा मगर कितना महान है ये लफ़्ज. कुछ पल जिन्दगी जैसे... में कविता ये और बहुत कुछ बयान कर रही है-

इस लफ्ज़ में छुपी हैं

वो दो ऑंखें,

जो देखती हैं हमे हर पल,

जिनके सपनो में बसें है

हमीं पल पल

मां को आत्मा से आप कितने दिन परे रख सकते हैं? शायद एक पल भी नहीं. शब्दलेख सारथी के शब्दों में-

पल-पल मेरे दिल में बसने वाली माँ के लिए बस एक दिन ! मुझे लगता है कि पशिच्मी देशों की संस्कृति में जिस क़दर भौतिकता वाद का बोलबाला है उसको देखते हुए ऐसे दिनों की जरूरत पड़ती होगी। मैं नही जानता कि गलत हूँ या सही, पर मैंने अपने माता-पिता को अपने आत्मा से परे कभी नहीं माना, और मैंने अपने माता-पिता की उनके मुहँ पर कभी प्रशंसा नहीं की क्योंकि उनके संस्कारों ने ही मुझमें यह संकोच भरा है।। मैंने उनसे क्या सीखा कभी यह उन्हें बताया नहीं। मेरे पिता अब इस दुनिया में नहीं है पर हर हालत से जूझना, अपने कार्य को निष्ठा और लगन से करना और सदैव दूसरों की सहायता करना मैंने अपने पिता से ही सीखा है । माँ से सीखा है अपने धर्म में अगाध आस्था रखना और भगवान की भक्ती और सदैव सहज रहने का भाव। हालतों ने हमें अलग अलग शहरों में पहुंचा दिया पर इसी दौरान मेरे को यह पता लगा कि मैं अपने माता-पिता से सीखा क्या था-क्योंकि अकेले में उनका ज्ञान ही मेरा सारथी बना ।संघर्ष के पलों में मैं आज भी अपने पिता का स्मरण करता हूँ तो लगता है कि दिल में एक स्फूर्ति आ रही है....

मां के लिए एक ई-मेल फ़ॉरवर्ड-

जब आप 1 वर्ष के थे, उसने आपको दूध पिलाया, नहलाया धुलाया. आपने उसका धन्यवाद रात भर रो-रोकर दिया.

जब आप 2 वर्ष के थे, उसने उँगली पकड़ कर आपको चलना सिखाया. जब उसने आपको पुकारा तो आपने दूर भाग कर उसका धन्यवाद दिया.

जब आप 3 वर्ष के थे, उसने स्नेह पूर्वक आपके लिए पकवान बनाया. खाने से भरे अपने प्लेट को फर्श पर बिखेर कर आपने उसका धन्यवाद दिया.....

हिन्द युग्म में - मां को समर्पित ग़ज़ल : वो सिर्फ मां है -

ममता की गहराई से हार गया समन्दर भी

देख तेरी मुस्कान, जी रही तुम्हारी "माँ" है

तेरे कदमों की आहट से बढ़ जायेगी धड़कनें,

जाने कब से इंताजर में बैठी तुम्हारी "माँ" है

मां - छुपा लो ना मुझे अपने ही आँचल में कहीं... बिटिया का मां को लिखा पत्र :

नये ख्वाबों की नयी मंज़िल सामने देख

तुमने हाथ पकड़ कर मुझे चलना सिखाया होगा

मुझे बार बार गिरते देख,

तुम्हारा दिल भी दर से कंपकापाया होगा

और अपने प्यार भरे आँचल में छुपा कर

कई ज़ख़्मो से मुझे बचाया होगा

मातृदिवस पर गीतकलश का गीत -

दर्द की तुम दवा

पूर्व की तुम हवा

चिलचिलाती हुई धूप में छाँह हो

कष्ट की आह में

कंटकी राह में

तुम सहारे की फैली हुई बाँह हो

और, मां के लिए एक मुक्तक:

कोष के शब्द सारे विफ़ल हो गये भावनाओं को अभिव्यक्तियाँ दे सकें

सांस तुम से मिली, शब्द हर कंठ का, बस तुम्हारी कॄपा से मिला है हमें

ज़िन्दगी की प्रणेता, दिशादायिनी, कल्पना, साधना, अर्चना सब तुम्हीं

कर सकेंगे तुम्हारी स्तुति हम कभी, इतनी क्षमता न अब तक मिली है हमें

ममता टीवी में मां का स्वरूप कुछ यूं दिख रहा है -

उसको नही देखा हमने कभी ,पर उसकी जरुरत क्या होगी

ए माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी.

एक मां की अपनी खुद की मां के लिए ये हैं कुछ पंक्तियाँ:

माँ की कुछ बातें आज तुमको बताऊँ,

पहले प्रभु के शीश माँ को झुकाऊँ!

वो सब याद रखती, जो मैं भूल जाऊँ,

वो मुझको सम्हाले, जो मैं डगमगाऊँ!

वो सब कुछ है सुनती, जो भी मैं सुनाऊँ,

वो चुप रह के सहती, अगर मैं सताऊँ!

भूखी वो रहती, जो मैं खा न पाऊँ,

रातों को जागती, जो मैं सो न पाऊँ!

वही गीत गाती, जो मैं गुनगुनाऊँ,

संग मेरे रहती, जहाँ भी मैं जाऊँ!

ईश्वर से एक ही मैं मन्नत मनाऊँ,

हर एक जनम में यही माँ मैं पाऊँ!!!

मां : तीन रूप -

1-

सूरज एक नटखट बालक सा

दिन भर शोर मचाए

इधर उधर चिड़ियों को बिखेरे

किरणों को छितराये.....

2-

बेसन की सोंधी रोटी पर

खट्टी चटनी जैसी माँ

याद आती है चौका-बासन

चिमटा फुकनी जैसी माँ....

3-

मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार

दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार

छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार

आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार...

मां क्या है? मां की परिभाषा:

अपने आगोशोँ मेँ लेकर मीठी नीँद सुलाती माँ

गर्मी हो तो ठंडक देती ,जाडोँ मेँ गर्माती माँ

जब बच्चे चीखेँ चिल्लायेँ एक खिलोना दे देती

बच्चोँ की किल्कारी सुनकर फूली नहीँ समाती माँ

हम जागेँ तो हमेँ देखकर अपनी नीँद भूल जाती

घंटोँ ,पहरोँ जाग जाग कर लोरी हमेँ सुनाती माँ

पहले चलना घुटनोँ घुट्नोँ और खदे हो जाना फिर

बच्चे जब ऊंचाई छूते बच्चोँ पर इठ्लाती माँ

वो लम्हा जब मेरे बच्चे ने मां कहा मुझको:

वो लम्हा जब मेरे बच्चे ने मां कहा मुझको

मैं एक शाख से कितना घना दरख्त हुई

अपने बच्चे के लिए चिंतित मां का एक रूप यह भी:

ताबीज घर में लाकर बहुत मुतमइन है मां

बेटा बहू की बात में हरगिज न आएगा

मां अपने दैवीय रूप में - मां बमलेश्वरी :

माँ बम्लेश्वरी सबकी इच्छाएं पूरी करती है। हर समस्या का निदान मां के चरणों में है। सभी धर्म और आध्यात्मिक गुरुओं ने ये स्वीकार किया है कि "आराधना और प्रार्थना अद्भत तरीके से फलदायी होती है। या तो यह मानसिक तौर पर प्रार्थना करने वाले को संबल प्रदान करती है या फिर चमत्कार करती है।"

दैवीय स्वरूपा मां का एक और रूप:

जय माँ बमलेश्वरी

तोला सुमरंव बारम्बार हो,

मोर देवी भवानी, जय होवय तोर,

मोर माता भवानी,जय होवय तोर।

तोर लीला अपरंपार हो,

जय मां बम्लेश्वरी जय होवय तोर,

टीप पहाड़ म तोर मंदिरवा,

दिखय चारों ओर।

मोर माता भवानी जय होवय तोर।

दैवीय स्वरूपा मां का एक और रूप:

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

और, अंत में-

मां तुझे सलाम...!

मां को आप कितना चाहते हों.....हो सकता है आप बता न पाएं या फिर अपने दोनों हाथों को पीठ पीछे ले जाएं और दिखाएं इतना....लेकिन इतना तय मानिए आपकी मां का प्यार आपके लिए इससे कई गुना होगा । वो भी तब जब आपका प्यार, प्रेम या श्रद्धा अकेले सिर्फ अपनी मां पर केंद्रित हो रहा होता है लेकिन आपकी मां का प्यार, यदि आप अकेली संतान नहीं हैं तो सभी संतानों के लिए समान बरसता है। इतना मुश्किल संतुलन एक मां के ही वश की बात है।

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चित्र - डेस्टिनेशन से

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चिट्ठा-चर्चा मार्गदर्शन 1

May 07, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami


सम्माननीय चिट्ठालेखकों व चिट्ठापाठकों!

एक बार फिर यह बहस सामने है कि हम चिट्ठाचर्चा क्यों करते हैं? किस कीड़े ने हमें काटा है जो हम अनवरत् बिना काम चिट्ठा चर्चा करते हैं - वह भी मोनोटोनस एक ही रंग में, एक ही अंदाज़ में, एक ही घिसी-पिटी स्टाईल में?

क्यों हम अपने चिट्ठाचर्चा में वेराइटी, रंगीनियाँ नहीं लाते हैं? क्यों वही बोरियत भरी चर्चा करते हैं? क्यों हम अपने-अपनों की ही चर्चा करते हैं और दूसरों की छोड़ देते हैं?

जाहिर है, आज मेरी बारी थी चिट्ठा चर्चा के लिए. परंतु जब मैं चिट्ठाचर्चा करने बैठा तो मुझे भी लगा कि मैं क्यों वही घिसे पिटे अंदाज में कभी व्यंग्य भरी तो कभी व्यंज़ल भरी चिट्ठा चर्चा करता हूँ? क्यों मैं लोगों को एक ही अंदाज में घिसापिटा, मोनोटोनस चिट्ठाचर्चा परोसता हूँ? सोचा कि चलो आज कुछ क्रांति की जाए. कुछ नया चिट्ठाचर्चा परोसा जाए.

पर, फिर ये याद आया कि कल को क्या होगा? दूसरे चिट्ठाचर्चाकारों का क्या होगा? कल की राकेशी कविताओं युक्त चर्चा की एकरसता कैसे खत्म होगी? उसके बाद कुण्डलिनी नुमा समीरी बयार युक्त चिट्ठाचर्चा में दूसरी सुगंध कहां से कैसे आएगी? उनका भी तो खयाल रखना पड़ेगा.

तो, चलिए, आज चिट्ठा चर्चा छोड़कर चिट्ठाचर्चाकारों के लिए एक नियमावली बनाते हैं. मार्गदर्शन तैयार करते हैं ताकि पाठकों की बोरियत दूर हो, पाठक चिट्ठा-चर्चा पढ़ें, चिट्ठों से पहले चर्चा पढ़ें, और हो सके तो सिर्फ चर्चा ही पढ़ें.

नियमावली हेतु निम्न आरंभिक सुझाव प्रस्तुत है. सुझावों की यह नियमावली निरंतर अद्यतन की जाती रहेगी. बल्कि पल प्रतिपल अद्यतन की जाती रहेगी ताकि इन नियमों को पढ़कर भी किसी को कहीं से भी कोई बोरियत नहीं महसूस हो, और चिट्ठाचर्चा में हर बार नया , नायाब , ताजा, अजूबा और इन्हीं किस्मों की चर्चा पाठकों को पढ़ने को मिलें. आप पाठकों से भी निवेदन है कि नियमावलियों के लिए अपने-अपने उत्कृष्ट सुझाव दर्ज करावें. आपके उत्कृष्ट सुझावों के उपलक्ष्य में अगली दफा चर्चा में आपके चिट्ठे की विशेष सम्मान सहित चर्चा की जाएगी.

नियम: 1 - चिट्ठाचर्चाकार मंडली तत्काल प्रभाव से भंग की जाकर नए चिट्ठाचर्चाकारों को एप्वाइंट किया जाए. भारतीय क्रिकेट टीम के सीनियरों की तरह कुछ तथाकथित स्वयंभू सीनियर चिट्ठाकार चिट्ठाचर्चाकार बने बैठे हैं वे सिर्फ ब्रांड मैनेजरी करते हैं उन्हें घर बैठाया जाए. नए यंग चिट्ठाचर्चाकारों को लाया जाए. जो घिसेपिटे चिट्ठाचर्चा करते हैं उन्हें पनिश किया जाए और जो बढ़िया मजेदार लिखते हैं उन्हें पुरस्कारों से नवाजा जाए. चिट्ठाचर्चा में भी पूरी एकाउन्टेबिलिटी लाई जाए.

नियम: 2 - चिट्ठाचर्चाकारों को बढ़िया, अच्छा, पठनीय, अ-घिसीपिटी और अ-बोरियत वाली चर्चा लिखने के लिए उतनी ही बढ़िया और अच्छी कोचिंग की व्यवस्था की जाए. ताकि चर्चा बढ़िया, पठनीय और मजेदार रहे. प्रत्येक चिट्ठाचर्चाकार को इस हेतु कम से कम दो कोच उपलब्ध कराए जाएँ.

नियम: 3 - चिट्ठा चर्चा से जुड़े प्रत्येक कार्य के लिए कमेटियां बनाई जाएं. जैसे कि चि