April 19, 2008 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami
इस चिट्ठा प्रविष्टि पर आज नजर पड़ी तो लगा कि इसे तमाम दुनिया को बताना चाहिए कि इसे अवश्य देखें. गीत सम्मोहक तो है ही, वीडियो संयोजन अत्यंत सम्मोहक. तमाम दुनिया को आप भी फारवर्ड करें, उन्हें बताएं, देखें-दिखाएं व सम्मोहित हों... चिट्ठे की कड़ी है - http://lifeteacheseverything.blogspot.com/2008/04/blog-post_18.htmlLabels: chitha charcha, रविरतलामी
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August 25, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami
 बया के नवीनतम अंक में हिन्दी ब्लॉगजगत् के बारे में अरविन्द कुमार का आलेख आपने संभवतः पढ़ा होगा. इसी अंक के संपादकीय में कहीं पर यह लिखा है "...ग़ौरतलब है कि प्रस्तुत व्यंग्य कथाओं में से तीन हिन्दी के ब्लौगों से प्रिंट माध्यम में पहली बार आ रही हैं." ये व्यंग्य कथाएँ कौन सी हैं, ये हैं - हिन्दी ब्लॉग जगत् के दिन अब सचमुच में बहुर गए हैं. क्या आपको ऐसा नहीं लगता :) Labels: chitha charcha, चिट्ठा चर्चा, रविरतलामी
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August 17, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami
दोस्तों, यदि आपने मोहल्ले पर प्रकाशित अरविंद कुमार के इस लेख को अब तक नहीं पढ़ा है तो अवश्य पढ़ें. अरविन्द कुमार ने हिन्दी चिट्ठाजगत् में सृजित हो रहे हिन्दी शब्दों के बारे में अपने चिरपरिचित अंदाज में पर, नए कोण से लिखा है. Labels: chitha charcha, चिट्ठा चर्चा, रविरतलामी
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August 16, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Jitendra Chaudhary
लो जी, हम भी आ पहुँचे, जैसा कि आदेश हुआ कि चिट्ठा चर्चा के सभी चर्चाकारों को एक लाइन की चर्चा करनी जरुरी है तो लो जी, झेलो। देखो भाई, पसन्द आए तो कमेन्ट करना और ना पसन्द आए तो टिप्पणी करना। पहला प्रयास है, अगर इसको बन्द करवाना है तो कमेन्ट करना जरुरी होगा। तो भाई झेलो, नारद पर शामिल १५ अगस्त २००७ के चिट्ठो की चर्चा। जुगाड़ी लिंक : तुम्हरा जुगाड़ तुम्हारे काम नही आया, देखो हिंदी की जगह का दिखा रहा है? मेरी चिंताएं :शुकु्ल की लम्बी पोस्ट पढना। लोहे का स्वाद :कैल्शियम सैंडोज मे। अब बड़े पैक मे। ठीक नही आपका इतना मुस्कराना : क्योंकि सफ़र अभी बाकी है स्वतन्त्रता दिवस की बधाई : लेट तो नही हुए.. बीत गया पंद्रह अगस्तकंडोम सांग इन तेलगू : अनुवाद करके सुनाओ ना। क्या तरक्की है हाउसवाइफ़ की : हाँ सचमुच मानना पड़ेगा, क्योकि मै अभी भी जिन्दा हूँ। साठ साल की आजादी आपके लिए क्या मायने रखती है? : सफ़ेद कुर्ता-पायजामा और टोपी पहनने का बहाना। टैक्नोराटी के मोर्चे पर चिट्ठाजगत ने नारद को पछाड़ा : गलती से मिस्टेक हो गया....भूल चूक लेनी देनी। आगरा : हथिया लिया ताज मोमेंटो : गनीमत समझो, ताजमहल वहाँ छोड़ दिया, बहनजी के आदेश का पालन करते तो..... बिलीव इट आर नाट : अंग्रेजी के टाइटिल मे दम होता है। स्वतंत्रता आज भी कुछ मांग रही है? : ले लो तिरंगा प्यारा । मुझे ये कापी लग रही है : हाँ, फोटो कापी तो ले ली, पैसे दिए बिना भाग गया। हम लोग : अब ब्लॉग लिखेंगे। मनमोहन जी कैसे करिएगा शिक्षा क्रांति? : मैडम से पूछ कर बताएंगे। एक करोड़ का इनाम टीम इंडिया को : ये वही टीम है, जिसको करोड़ो लोगो ने जूतों की माला पहनाई थी। पहले जूते, अब रुपए..वक्त बदलते देर नही लगती... हिंदी टूलबार के चिट्ठे पर आपका स्वागत है: ह्म्म! हैडर मे टूलबार का स्क्रीन शाट तो लगाओ भाई। राष्ट्रगान मे ये भारतभाग्य विधाता कौन है? : एल्लो, इत्ता भी नही पता? हमको भी नही पता। राम भरत मिलाप : ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार।ज़िन्दगी एक सफर है सुहाना.. : हाँ, यहाँ कल क्या हो किसने जाना? अब भाई, बाकी लोग जो छूट गए हो, वो यहाँ टिप्पणी करें (जानबूझ कर छोड़े है, इसी बहाने, कम से कम चार पाँच टिप्पणियां तो आएंगी), टिप्पणी मिलते ही चर्चा कर दी जाएगी। Labels: chitha charcha, chithacharcha, चिट्ठाचर्चा, जीतू
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August 05, 2007 को प्रकाशित। लेखकः note pad
रविवार छुट्टी का दिन है ,इसलिए सब मौज-मज़े के मूड में हों तो समझ आता है । पर चर्चा के लिए आज नारद देखा तो हैरानी हुई कि शनिवार को भी लोग संडे वाले मूड में थे [लिखने वाले नही,पढने वाले] लगभग 10-11 चिट्ठे शून्य हिट पर व इतने ही मात्र एक हिट पर थे । रोचक यह था कि ब्लॉगवाणी पर वे ही अनहिट चिट्ठे 14,21,25,31 बार पढे गये ।खैर ,यह क्रम किसी किसी चिट्ठे में उलट भी हो सकता है । स्वाभाविक है । कोई निष्कर्ष निकालना मकसद नही है । सिर्फ इतना भर कि पहले सोचा था कि शून्य और एक हिट वाले चिट्ठों की चरचा करने का विचार था , यह सोच कर कि चर्चा में ही उन्हे स्थान मिल जाए । पर् वे पढे गये हैं ,यह विश्वास होने के बाद पसन्द के चिट्ठे ही है । कल के सारे चिट्ठे यहाँ देख सकते हैं । भ्रूण हत्या पर एक सम्वेदनशील प्रस्तुति तस्वीर की आवाज़ में विपुल जैन द्वारा ।एक दिल दहलाने वाला चित्र ।  भारत में यौन शिक्षा पर एक स्वस्थ चर्चा ज़रूरी है । इस विषय पर विचार करते हुए शास्त्री जे सी फिलिप् निम्न निष्कर्ष पर पहुँचे हैं यौन-शिक्षा पूरी तरह से असफल एक पश्चिमी अवधारणा है जिसने पश्चिम को बर्बाद कर दिया है अत: इसकी जरूरत हिन्दुस्तान को नहीं है ।
अंग्रेज़ी हिन्दी के बीच उत्पन्न वैमनस्य की दीवारें काल्पनिक है या वास्तविक यह सोव्हा जाए पर साथ ही ध्यान रखा जाए कि कमसे कम ब्लॉग जगत पर यह सह-अस्तित्व में दिखाई दें ।रचना जी की टिप्पणी-हिंदी को आगे लाए जाने के लिये इंग्लिश का बहिष्कार ना करके उसका उपयोग करें तो ज़्यादा बेहतर होगा-को उद्धृत करते हुए मसिजीवी विचार करते हैं----- चिट्ठाकारी में इसकी शायद कोई जरूरत ही नहीं, क्योंकि यहॉं अंग्रेजी विरोध कोई स्वाभाविक बीमारी की तरह लोगों के मन में जमा नहीं बैठा है, कम से कम उस तरह तो नहीं ही जैसा कि अंग्रेजी के चिट्ठाकारों में इस 'फिल्थी' हिंदी जमात के लिए रहा है। *** दरअसल प्रिंट या विश्वविद्यालयी दुनिया में जो भी हो पर अंतर्जाल की दुनिया में हिंदी के लोग अंग्रेजी भाषा के प्रति दुराग्रह से पीडि़त नहीं है या कम पीडित हैं इसलिए आपकी नेकनीयती सरमाथे पर कुछ सलाहें अंग्रेजी वालों को भी दें।
लेकिन शासक और शासित की भाषा वाला फंडा भी है जो कई मनों में पैठा है ।भाषा और सत्ता के गहरे सम्बन्धों को हम भाषा की संरचना में ही देख सकते हैं । हाँ एक बडा पहलू यह भी है।भाषा भाव से नही शक्ति से चलती है । अनामदास अंग्रेज़ी के कुचक्र में फँसी हिन्दी के विषय् पर सवाल उठा रहे है और जवाब भी तलब कर रहे हैं- कुचक्र है कि क्रयशक्ति बिना अँगरेज़ी के सिर्फ़ गुंडागर्दी से आती है. यह कुचक्र कब और कैसे टूट सकता है इसके बारे कुछ सोचिए, बोलिए और बताइए आप विचार करते हुए संडे के खाली वक़्त को सार्थक कीजिए और चूरमा के स्वादिष्ट लड्डू भी खाइए ,बशर्ते कि आपको उन्हे बनाने से भी परहेज़ न हो और हाँ आज मै चिट्ठाचर्चा क्योँ ? तो यह जुर्माना है नीलिमा जी और मसिजीवी के यहाँ सप्ताहांत मनाने के लिए आने का :) Labels: chitha charcha, chithacharcha, notepad, sujata
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July 22, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Neelima
हिंदी चिट्ठों की बढ्ती संख्या से हिंदी के देसी पंडित का सवाल पिछले दिनों उठाया गया ! सच है कि चिट्ठाकारी बढेगी तो इसके पाठक के लिए अपनी पसंद के चिट्ठे तक पहुंच पाना मुश्किल होता जाएगा ! चिट्ठाचर्चा जैसे मंचों को अपनी निष्क्रिय भूमिका त्यागकर चिट्ठा- समीक्षा और वर्गीकरण के लिए कमर कसनी होगी ! चिट्ठों की वर्गीकृत करके ही उनकी समीक्षा और चर्चा संभव हो पाएगी ! एसे में चिट्ठाचर्चाकार या चिट्ठा-समीक्षाकार की चयन कुशलता मायने रखेगी और उसका दायित्व बोध भी बढ जाएगा ! हम नहीं जानते कि हिंदी चिट्ठाकारिता भविष्य क्या होगा किंतु अनुमान तो लगा ही सकते हैं न ! और हमारा अनुमान है वर्गीकृत चिट्ठों को विषयानुरूप विशेषज्ञता वाले चिट्ठाचर्चाकार की जरूरत होगी ! तो आइए आज की चिट्ठाचर्चा के बहाने कुछ भविष्य की चिट्ठाचर्चा शैली की प्रेक्टिस हो जाए आज हमने एक नहीं पॉच चर्चाएं की है और हर में केवल दो तीन ही पोस्टों को लिया है वर्गीकरण विषय व रुचि के अनुसार है इसलिए नीचे की पॉंच चर्चाओं में से अपनी पसंद की चर्चा पढें और अपनी पसंद की चर्चा पर ही टिप्पणी भी करें। पर इस मॉडल पर टिप्पणी यहॉं या कहीं भी कर डालें चाहें। चर्चाएं हैं- कविता की रसधार में कविताई जहॉं गद्य ललित है कोमल है ललित गद्य दाग अच्छे हैं- व्यंग्य पोस्टें धड़धड़ फ्राड पर तीरे नजर - तकनीक व चिट्ठाई पत्रकारिता का भटियारापन और वैज्ञानिक का भटकता मन - विमर्श व चिंतन पर पहले सारी पोस्टों के लिए नारद पर यहॉं देखें, चिट्ठाजगत पर यहॉं देखें, ब्लॉगवाणी पर यहॉं देखें। वैसे हम फोटोब्लॉग की कैटेगरी से भी कुछ देना चाहते थे पर फिर सामूहिक संसाधन के इस सामूहिक इस्तेमाल की भी बात थी। तो आनंद ले चिट्ठों का और चर्चा(ओं) का। Labels: chitha charcha, chithacharcha, neelima
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को प्रकाशित। लेखकः masijeevi
तकनीकी व चिट्ठाई लेखन में दो मुद्दे और तीन-चार पोस्टें। पहले सागरभाई ने एक पोस्ट लिखी थी जिसमें क्लिक की गैर ईमानदारी की चर्चा थी- हमारा क्या है हो गए प्रेरित और लिख दिया- दरअसल इन्हीं फ्राडों के चलते गूगल अर्थव्यवस्था पर ही एक संकट सा आ गया है, क्योंकि अब विज्ञापनदाता प्रति क्लिक भुगतान करने के स्थान पर अब साईनअप या सेल्स पर ही भुगतान करने वाले मॉडल को वरीयता देने लगे हैं।
पर ऐसे विषयों पर रविजी को पढ़ने का अपना आनंद है और हम तो कहते हैं कि फ्राड मानें तो मानें पर आपको इन्हें पढ़ना चाहिए और एकाध विज्ञापन भी क्लिक कर देखना चाहिए इससे हाथ से हाथ बढ़ा का जज्बा पैदा होता है। है कि नहीं- खैर इस विषय पर उन्होंने लिखा- एडसेंस मिसयूज़ का किस्सा तो एडसेंस के आरंभ से ही चला आ रहा है, हालाकि अब हालात काफी कुछ सुधर गए हैं. मुझे याद आ रहा है सात आठ साल पहले का वाकया जब यहाँ रतलाम में भी किसी नेटवर्क कंपनी ने लोगों को किश्तों में पीसी बांटे थे और उन लोगों को इंटरनेट पर कुछ खास साइटों के विज्ञापनों को क्लिक करते रहने होते थे और बदले में बहुत सा पैसा मिलने का झांसा दिया गया था. उनके पीसी को हर हफ़्ते फ़ॉर्मेट किया जाता था ताकि कुकीज वगैरह से पहचान स्थापित दुबारा नहीं की जा सके. शायद तब आईपी पते से पहचानने की सुविधा नहीं जोड़ी गई रही हो.
ओह रतलाम की कंप्यूटर क्रांति गूगलफ्राड से आई है :) दूसरा मुद्दा हुआ है चिट्ठाजगत की दुनिया का जहॉं की जा रही रेटिंग पर तरुण भाईसा ने चंद सवाल उठाए हैं दिक्कत दोनों ही रैंकिंग से है। विपुलजी ने भी वहीं पहुँच के जबाव दिए हैं हम प्रतिक्रिया दे आए हैं आप भी जाकर दे आएं। चाहते थे कि कॉपी पेस्ट कर यहॉं बता देते कि तर्क की दिशा क्या है पर क्या करें इन गीकों ने भी न... पता नहीं क्या जुगाड़ है कि नकल करता हूँ टेक्स्ट और होता है लिंक- हम उसी सिद्धांत पर कि भई खुद टाईप तो करेंगे नहीं कह रहे हैं कि जाकर ही देख लें। :) मूल चर्चा पर वापस जाने के लिए क्लिक करें Labels: chitha charcha, chithacharcha, masijeevi
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को प्रकाशित। लेखकः Neelima
प्रत्यक्षा जी की ने अपने चिरपरिचित काव्यमय गद्य शैली में रात पाली में काम करने वाले मेहनत कशों की जिंदगी को उकेरा है! यहां श्रम से संवेदना के बोझिल होते मन की कथा बखूबी कही गई है श्रम जो है पुरुष का रेले का रेला , हुजूम का हुजूम विशाल गेट के मुहाने से अजबजाये बाढ की तरह बह आता । साथ साथ आती पसीने ,थकन और ग्रीज़ की खट्टी बिसाई महक । कुछ भीड छिटक कर गुमटी की तरफ सरक आती । कुछ और आगे की टीन टप्पर की दो बेंच वाली चाय दुकान पर जमक जाती । रात पाली के बाद की रुकी ठहरी भीड बडी छेहर सी होती ।
और साथ ही श्रम जो है स्त्री का अनचीन्हा, अनगिना- औरत निंदायी निंदायी पानी का ग्लास थामे निढाल आती है बिस्तर पर । रसोई समेटना बाकी है अभी , दही जमाना बाकी है अभी , मुन्नु की आखिरी बोतल बनाना बाकी है अभी । गँधाते फलियों और कपडों के ढेर को सरका कर जगह बनाते औरत सोचती है उसकी रात पाली कब खत्म होगी
हमारी एक और प्रिय गद्यकार बेजी ने कहानी लिखने का पहला प्रयास किया है, अपनी कहानी स्मृति की छवि में, कहानी के विषय में कामगार श्रमिक महोदय ने सही ही कहा कि कहानी में ठहराव नहीं है। नारूिकी समख्ति की ही तरह कहानी फिसल फिसल बहती है रिदम के साथ- अपने आप में कोई ऐसे भी खोता है पर स्मृति को किसी चीज़ की परवाह नहीं थी। मस्त और खुश। ना तो उसे बाकी लड़कियों की तरह मेहंदी लगाते, सिलाई बुनाई करते देखा...ना खुद को घंटों शीशा निहारते। कहीं कोई अच्छा गाना सुनती तो थिरकने लगती...हर छोटी बड़ी बात पर खिलखिला कर हँसती....और कभी घंटों खिड़की पर बैठी रहती।
तो ये थी आज की गद्य पोस्टों से हमारा चुनी हुई दो पोस्टें। वापस मूल चर्चा पर जाने के लिए क्लिक करें। Labels: chitha charcha, chithacharcha, neelima
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को प्रकाशित। लेखकः masijeevi
विर्मशात्मक पोस्टों में से मैं दो पोस्टों की चर्चा करना चाहूँगा - पहली और वाकई दमदार पोस्ट है नीरज रोहिल्ला की विज्ञान और प्राद्योगिकी में एक गालीय घोड़े की परिकल्पना। क्या बात है- सौभाग्य से हम चिट्ठाकारों में नीरज, मिश्राजी, लाल्टू, शास्ती्रजी जैसे संवेदनशील वैज्ञानिक हैं और वे तो इस लेख से जुड़ाव स्वाभाविक रूप से महसूस करेंगे ही पर हम भी इस वाकई मौजूं लेखन मानते हैं। खासकर छटपटाहट की अभिव्यक्ति - जिस गति से शोधपत्र छप रहे हैं उसके लिहाज से आप कभी भी विषय पर पूरी जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते । आपको कहीं न कहीं रेखा खींचनी पडेगी और अपना मौलिक कार्य प्रारम्भ करना पडेगा ।
तथा मैने वास्तव में गोलीय घोडों जैसी अवधारणायें मानकर महत्वपूर्ण विषयों पर शोधकार्य होते देखा है । कई बार ऐसी हास्यास्पद परिकल्पनायें वास्तविक जीवन की समस्याओं (Real World Problems) को सुलझाने में सक्षम होती हैं । Pure Science के क्षेत्र में भले ही आपको ऐसी अवधारणाओं की आवश्यकता न पडे लेकिन व्यवहारिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी (Applied Science and Technology) के क्षेत्र में लगभग रोज ही ऐसी अवधारणाओं पर शोधकार्य किया जा रहा है ।
दूसरी पोस्ट सेलेब्रिटी पत्रकार रवीश की अपने लेखन के श्रेय को एनडीटीवी की झोली में पटकती हुई पोस्ट है। हिंदी पत्रकारिता अपने भटियारेपन से गुज़र रही है। देखा जाना चाहिए कि क्या यह सब पत्रकारों की नाकामी से हो रहा है। क्या टीआरपी सिर्फ भूत प्रेत से आएगी ? जिस तरह से आजतक ने नकली दवाओं का पर्दाफाश किया उससे टीआरपी, बाज़ार और पत्रकारिता का रास्ता नहीं दिखता? करोड़ों लोगों की ज़िंदगी से समझौता करने वाली नकली दवाईयां। उसे तो दस दिन तक लगातार दिखाना चाहिए। या फिर ऐसी खोजी पत्रकारिता की सीमा है? रोज़ नहीं मिल सकती? रोज़ हासिल करने के लिए भूत तांत्रिकों को लाना होगा?
विमर्श वाल भी पोस्टें तो बहुत हैं पर हम कोई तांत्रिक थोड़े ही हैं कि सब बता पाएंगे कुछ मेहनत आप भी करें :) मूल चर्चा पर वापसी के लिए क्लिक करें Labels: chitha charcha, chithacharcha, masijeevi
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को प्रकाशित। लेखकः Neelima
बांझ कौन है ? कविता मान्या जी के भीतरी आक्रोश को उजागर करती कविता है ! इसमें कविता का महीनपन न होकर सवालों की स्थूलता ज्यादा है! यहां कविता का संवेदना संप्रेषण कविता की शैली पर हावी होता दिखाई दे रहा है ! कवियित्री के लिए भावना अहम है उसका प्रदर्शन नहीं ! इस कविता में बांझ ,निपूती जैसे पांपरिक विभूषनणों से नवाजी जाती औरत का दर्द साकार हो उठा है ! यह कबविता समाज पर गहरा व्यंग्य करते हुए जिस सवाल को सामने रख देती है उससे बचल्कर निकल पाना कविता पढ लेने के बाद संभव नहीं ! यह पाठक ही जो तय करेगा कि बांझ का क्या मायना है भारतीय सामाजिक जीवन में- आज फ़िर दो और वर्ष बीत चुके हैं... आज 'वह' एक बेटी की गौरवान्वित 'मां' है... सुहागन, भागन जैसे अलंकार हैं.... और सुना है उसके पहले पति ने.... अपनी दूसरी बीवी को भी... 'बांझ' कहना शुरू कर दिया है....
बोतल जिन्न और शब्द में अभिव्यक्ति के लिए व्याकुल कवि मन के उद्गार हैं ! कवि अन्याय से सामाजिक शोषण से आहत होता है -सबसे अधिक आहत होता है वह संवेदना को अभिव्यक्त न कर पाने से। ओर इसी जिन्न को साधने की कोशिश है लेखन- सोचता हूँ अपने शब्द-लेखन से कहीं दूर हो जाऊं बिना पढे मैं कब तक लिखता जाऊं पर शब्द और बोतल में बंद जिन्न के बीच मैं खङा होकर सोचता हूँ मुझे किसी एक रास्ते पर तो जाना होगा और शब्द हैं कि झुंड के झुंड पीडाओं को साथ लिए चले आते हैं मुझे अपने साथ खींच ले जाते हैं
कवितामूलक पोस्टों के ही क्रम में युनुस के रोडियोवाणी में चॉंद प्रेरित गीतो का आनंद लें। मूलचर्चा पर वापसी के लिए क्लिक करें Labels: chitha charcha, chithacharcha, neelima
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को प्रकाशित। लेखकः masijeevi
हिंदी की चिट्ठाकारी में 'जारी' साधुवाद युग की ही तरह राष्ट्रपति भवन में ही ऐसा ही युग जारी था कलाम गए तो राहत की सांस ली गई। बिहारी बाबू और खुलासा कर बता रहे हैं- अब आप ही बताइए न शुचिता, ईमानदारी, पवित्रता, विद्वता ... औरो न जाने केतना कुछ ... एतना भारी भरकम शब्द सब कलाम से जुड़ल था कि राष्ट्रपति भवन में समाइए नहीं पाता था। परिणाम ई हो गया कि देश का बाकी नेता सब इंफीरियरिटी काम्प्लेक्स से ग्रस्त हो गया था औरो मानसिक तौर पर बीमार रहने लगा था।
हमारे यहॉं तो एक्के नेता हैं- समीर भाई और वे चकाचक हैं :)। इस देश के लिए दाग बहुत अच्छे हैं- हम सहमत हैं- दाग अच्छे हैं इसलिए, काहे कि यह पता नहीं चलने देता कि के राजा है, के रंक। काजल की कोठरिया में सब बस काला भूत होता है। अगर कलाम दागी होते, तो दो सूटकेश लेकर राष्ट्रपति भवन से विदा नहीं होते औरो यही तो अखरने वाली बात है! जिस देश में चपरासी का भाई मुखमंतरी बनता हो औरो करोड़पति होकर मुखमंतरी निवास से विदा होता हो... एमसीडी की टीचर मुखमंतरी बनती हो औरो अरबपति होकर मुखमंतरी निवास से विदा होती हो, वैसन देश में कलाम जैसन लोगों होना ठीक नहीं।
व्यंग्य के हमाम में आज दूसरी पोस्ट है एक विश्वदीपक की एक हास्य कविता अब हंसने की मेरी बारी है, बड़ी मुश्किल से ताड़ी है, थोड़ी रोनी सूरत डालो भी, हर रोम-रोम खंगालो भी। तेरे ट्रेंड, गर्लफ्रेंड की महिमा से तेरा यूँ काया-कल्प हुआ, लव-लाईफ तो धुमिल हुई हीं और शर्ट चेंज करोगे कहाँ कहो, मेरी नज़रों में मेरे यार अहो- सक्सेश-परसेंटेज अल्प हुआ।
मूलचर्चा पर वापसी के लिए क्लिक करें Labels: chitha charcha, chithacharcha, masijeevi, चिट्ठचर्चा
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July 08, 2007 को प्रकाशित। लेखकः masijeevi
आज है तो 8X7X7 पर ये 7X7X7 के ही चिट्ठों की चर्चा है, इसलिए इसे ही 7X7X7 चर्चा माना जाए। पिछली चर्चा से अब तक एक पूरी दुनिया बदल चुकी है, हमने पिछली चर्चा में बताया कि एक दिन में 57 पोस्ट चिट्ठाजगत ने रिपोर्ट की है तो रविजी ने कहा Raviratlami कहते हैं: 7/01/2007 4:39 PM एक दिन में 57 पोस्ट - हिन्दी चिट्ठों के लिखे जाने की गति में त्वरण बढ़ने लगा है. अब एक दिन में 100 के आंकड़े का इंतजार है. देखते हैं कितनी जल्दी पूरा होता है
और लीजिए हो भी गया, अब हालत ये है कि रोज ही सैकड़ा लग रहा है। चिट्ठाजगत के अनुसार कल की पोस्टें 119 हैं, नारद के अनुसार और ब्लॉगवाणी के अनुसार कितने हैं आप खुद देखें। रविजी का टंबलर या हिंदी ब्लॉग्स पसंद हो तो वहॉं देखें। हे हे हे कर ये मत कहना कहना कि मात्रा से क्या होता है गुणवत्ता बताओ क्या है। है और भरपूर है। पहले देखें विविधता- भाषा-साहित्य हास्य-व्यंग्य कविता सम-सामयिक तकनीक संगीत-मनोरंजन फिल्म-टेलिविजन धर्म आत्म-विकास चौपाल ब्लॉगरी विविध समीक्षा जीवनशैली खेलकूद संस्मरण इधर उधर की शैयर बाजार पूंजी-जायदाद फोटोग्राफी एवं पेन्टिंग खाना और बनाना पोडकास्ट व्हीडियोकास्ट शिक्षा सैर-सपाटा
ये भी अभी टेस्टिंग पर है इसलिए एरर400 आ जाए तो मैथिलीजी को गुरर्र मत करने लगना- सहयोग करें, आदमी काम पर हैं।
आप कहेंगे कि इंडेक्सिंग ही करते रहोगे कि चर्चा भी करोगे। तो भई हम तो हाथ खड़े करते हैं- सबकी चर्चा नहीं कर पाएंगे- बहुतो की भी नहीं कर पाएंगे- थोड़ों की करने की कोशिश कर लेते हैं।
पहले वे जिनकी चर्चा मैं नहीं कर रहा हूँ- पंगेबाज, काकेश, ईस्वामी, राहुल, भड़ास, मसिजीवी, अफलातून, ज्ञानदत्त, अभय तिवारी आदि ने फिर से नारद वारद के पचखे पर पोस्टें या व्यंग्य लिखें हैं और चूंकि इनके अलावा भी बहुत काम की पोस्टें आई हैं तो इन्हें छोड़ भी देंगे तो आपका कोई नुकसान नहीं होने वाला- फिर भी लगाई बुझाई पसंद है तो जांए पर ये न कहना कि आगाह नहीं किया था।
अब व पोस्टें जिनकी चर्चा मैं कर रहा हूँ- रविजी बता रहे हैं चिट्ठाजगत पर टैग के विषय में, शास्त्रीजी भोमियो पर फिर से कुछ बता रहे हैं। नसीर ने समाचार दिया है कला पर हमले का। कल 7x7x7 थी इसलिए ये चर्चा भी 7x7x7 हुई तो देखें आज की 7x7x7 विषयक पोस्टें- नितिन अपनी नजर से अजूबे खोज रहे हैं -7, संजय 070707 बनाम चिट्ठों पर विचार कर रहे हैं। इसी विषय पर ईष्टदेव भी कुछ कह रहे हैं देखें। एक विशेष उल्लेख चिट्ठों में हाल में बच्चों से संबंधित प्रविष्टियों व चिटृठों की स्वागतयोग्य उपस्थिति दिख रही है- मसलन केंद्रीय विद्यालय हजरतपुर का चिट्ठा या जाकिर अली का चिट्ठा बालमन....बाकी कहीं जाएं या नहीं यहॉं जरूर जाएं और भरपूर उत्साहवर्धन करें। लठ्ठम लठ्ठा तो इंतजार कर सकती है।
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July 04, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Udan Tashtari
आज अनजाने में ही एक चिट्ठाचर्चा , हमारी चर्चाकारी से बेहतर, वैसे ही हो चुकी है जो कि हमारे मित्र जगदीश भाटिया ने अपने अनोखे और निराले अंदाज में की है. हम तो उसे ही कट पेस्ट कर देते. परमिशन भी मांगे थे. मालूम भी है वो दे देंगे मगर भारत है, क्या करें. जब तक परमिशन आयेगी-दिन सरक जायेगा, बातें महत्ता खो देंगी. इस लिये बस लिंक दिये दे रहे हैं तो वहाँ तक की चर्चा इस लिंक पर देखें. मजा आने की गारंटी, जगदीश भाई की तरफ से हमारी. अब आगे बढ़ना ही जिन्दगी है तो हम भी बढ़ें. क्या आपको पता है कि ब्लॉगर पर आप अपने पोल और सर्वे करवा सकते हैं जैसा कि नारद करता है कि आप स्त्री हैं कि पुरुष. बिना इसका ध्यान रखे कि एक वर्ग और है. चुनाव तक लड़ने का अधिकार है मगर नारद पढ़ने का नहीं. खैर, उसे छोड़ें. हरि इच्छा के आगे क्या कहें. मगर ऐसे पोल आप कैसे कर सकते हैं बता रहे हैं अंकुर भाई . सीख गये और आसमान पर नजर दौडाई और रोज की तरह आज भी आज की शायरी और सामान्य ज्ञान प्राप्त किया. आज, आज के विचार की कमी खली, आदत जो पड़ गई है. वैसे, यह मात्र प्रस्ताव है कि अगर यह तीन दैनिक पोस्टों को एक कर दिया जाये और शीर्षक रहे- आज का विचार, शायरी और सामान्य ज्ञान. तो एक ही क्लिक में काम चल जाये और नारद के संसाधनों का भी उपयोग सभी के द्वारा बराबरी से हो सके. यह मात्र आज का हमारा विचार है, बाकि जैसा आप उचित समझें. अनिल जी की रचना विड्म्बना देखें-सव, एक सुन्दर रचना है. और भी दुर्लभ चीज देखना हो तो सागर भाई हेमंत दा का दुर्लभ गीत सुना रहे हैं और अमित दुर्लभ चित्र दिखा रहे हैं. चाहे कुछ देख दिखा लो, मगर कमलेश भाई का डिक्लेरेशन कि मैं भी इंसान हूँ देखना न भूलना. हमने न सिर्फ देखा बल्कि टिपियाया भी है. :) अब ध्यान रखते हैं. अनिल रघुराज जी की लेखनी के तो हम व्यक्तिगत तौर पर कायल हैं और आज उस पर और मुहर लग गई जब उन्होंने क्यूबा के कास्त्रो के विचार हिन्दी में लिखे यह कहते हुये कि आत्मा जैसे होते हैं विचार . आज पहली बार पढ़ा और दिनेश पारते जी ने तो मानो लुट ही लिया-क्या रचना है!! हम तो पूछने वाले थे कि क्या भाई, आपने ही लिखी है?? गजब भाई गजब- आकांक्षा मानकर चले कि उन्होंने ही लिखी है तो उसका कुछ भाग यहाँ न दें तो पाप कहलायेगा, सच में: हे कृष्ण मुझे उन्माद नहीं, उर में उपजा उत्थान चाहियेअब रास न आता रास मुझे, मुझको गीता का ज्ञान चाहियेनिर्विकार निर्वाक रहे तुम, मानवनिहित् संशयों परकिंचित प्रश्नचिन्ह हैं अब तक, अर्धसत्य आशयों परकब चाह रही है सुदर्शन की, कब माँगा है कुरुक्षेत्र विजयमैने तो तुमसे माँगा, वरदान विजय का विषयों परमन कलुषित न हो, विचलित न हो, ऐसा एक वरदान चाहियेमुझको गीता का ज्ञान चाहिये .....पूरी रचना यहाँ पढ़ें . वाह, बधाई, मित्र. उनकी पुरानी रचनायें भी पढ़ें. लिखे तो राजीव रंजन जी भी चाँद पर बेहतरीन क्षणिकायें हैं मगर कोशिश करके भी हम टिपिया नहीं पाये, पता नहीं क्या समस्या है. रचनाकार ने बेहद नाजुक कहानी विजय शर्मा जी की सुहागन सुनाई, हम तो ऐसा खोये कि टिपियाना ही भूल गये, जो अभी देख पाये. माफ कर देना भाई, चर्चा के बाद कोशिश करते हैं. राजेश पुरकैफ भाई से बारिश के मंजर की एक अलग तस्वीर देखें-हमने कह दिया है: किसी की मस्ती, किसी की उजड़ी बस्ती। चन्द्र भूषण जी ने कहा लट्ठलट्ठे का सूत कपास-शीर्षक देख कर पढ़ना शुरु किया और पहली लाईन देख कर बंद-आपका दिल करे तो पढ़ें . मेरी मंद बुद्धि है, गहराई समझ नहीं पाता. मगर अधिकतर चंद्र भूषण जी लिखा पसंद करता हूँ तो बता दिया. सब चुप रह जायें तो भी मेरे भाई मसिजीवी न चुप रहेंगे, तो उनकी सुनो चिट्ठाजगत की गोपनियता पर .... अभी यही रुकते हैं, वादा है कि कल सुबह आगे की कवरेज दूंगा बिना नागा.....जरा, हड़बड़ी में भागना पड़ रहा है....कोई भी कुछ न सोचे मैं वापस आ रह हूँ... क्षमा मित्रों.Labels: chitha charcha, chithacharcha, chithha charcha, चिट्ठा चर्चा, मध्यान्हचर्चा, समीर लाल
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July 01, 2007 को प्रकाशित। लेखकः masijeevi
रविवार का अलमस्त खाली दिन है इसलिए दिन की शुरुआत एक ऐसे नाश्ते से होनी चाहिए जिसमें आप चुनें कि क्या लेंगे। च्वाइस का दिन रविवार। तो जाहिर है पढ़ने के लिए भी च्वाइस दरकार है। यूँ तो हम चाहेंगे कि आप सब कुछ पढ़ें पर ऐसा न तो अब होता है न हो सकता है इसलिए हम आपके सामने पेश करना चाहते हैं च्वाइस। तो सबसे पहले तो ये लें- कल की सारी पोस्ट पढ़ने की च्वाइस- नारद से पढ़ना चाहें तो यहॉं पढ़ें (कुल 49 पोस्ट) और यदि पचखा मुक्त एग्रीगेटर से पढ़ना चाहें तो चिट्ठाजगत से यहॉं पढ़ें (कुल 57 पोस्ट) (ध्यान रखें कि ये अक्सर सर्वर डाउन पाया जाता है, हमें दोष न दें, टीथिंग प्राब्लम हैं, सहयोग करें) वैसे हिंदी ब्लॉग्स भी है और रविजी का टंबलर भी च्वाइस में पर ये दिनांक के अनुसार वर्गीकरण नहीं करते। अगर आप चिट्ठाकार मिलन पर कुछ पढ़ना चाहें तो च्वाइस है कि हमारे यहॉं जाकर दिल्ली मीट की बात करें या सत्य की घाटी में जाकर उमाशंकरजी के साथ इस बैठक का एंजेंडा तय करें या फिर चाहें तो फुरसतिया जी के चिट्ठे पर जाकर बाकायदा एक मीट का वर्णन पढ़ें । तस्वीरें टंडनजी पहले ही दिखा चुके हैं। यक्ष अनुत्तरित प्रश्न रहा डा.टंडन ने सवाल दागा- आप इतना लिखने की फ़ुर्सत कैसे निकाल लेते हैं? हमारे पास कोई जवाब न था। हमने मुस्करा के बात टालने की कोशिश की लेकिन उसी घराने के सवाल वे बराबर उछालते गये। अगर भाषाबाजी करनी हो, भाषाखोरी करनी हो सिर्फ भाषावाद करना हो तो आपके पास कुछ च्वाइस हैं मसलन आप प्रमोद के साथ सुकुमार हिंदी की सवारी कर सकते हैं, मोहल्ला में इस भाषा की बीमारू होने पर चल रही बहस में हिस्सा ले सकते हैं, लाल्टू के यहॉं इस भाषा में लिखने की उनकी परेशानियॉं सुन सकते हैं, हरिराम के यहॉं वाक्यांश कोश की जरूरत पर विचार देख सकते हैं और नहीं तो ज्ञानदत्तजी द्वारा भाषा का खतम इस्तेमाल देख सकते हैं। यानि इस मामले में आपके पास च्वाइस ही च्वाइस है। • हिन्दी वाले खतम हैं. • अरुण अरोड़ा खतम पन्गेबाज हैं. • फ़ुरसतिया एकदम खतम ब्लागर हैं. • समीर लाल की टिप्पणियां खतमतम होती हैं. • अभय तिवारी ने अछूतों पर एक खतम शोध किया है. • इन्फ़ोसिस के नारायणमूर्ति एक खतम व्यक्तित्व हैं. • आप बिल्कुल खतम आदमी हैं.
लगता है पंगाशास्त्र पढकर इन्होंने कई लागों से एकसाथ पंगे ले लिए हैं। पर असली च्वाइस तो है कविता पढ़ने में- दीपक की कविता रंग बदलता सौंदर्य महसूसें या फिर योगेशजी के यहॉं झुलसा कबीर पढ़ें अपनी किस्मत, अपना हिस्सा, सबका अपना अपना किस्सा, कोई बडी जमीं का मालिक कोई बोये बिस्सा बिस्सा,
बिरहन भक्तिन श्रेयार्चन की कविता कान्हां के भावों में खो जाएं, मान्या की कविता तुम्हारा आईना हूँ मैं पढ़ें जहॉं (भी) समीर ने 'सुंदर कविता' टाईप टिप्पणी की है। हिंद युग्म व गुरनाम सिंह जी की भी कविताएं हैं। पर ये सब आपके लिए राईट च्वाइस नहीं रहीं हैं क्योंकि आप गीकटाईप हैं या बनना चाहते हैं तो आप जाहिर है तकनीक पर नजर डालेंगे तो हुजुर मेरे झोले में आपके लिए भी काफी च्वाइस हैं- आप फिलिप महोदय के यहॉं चिट्ठाचोरों से बचने के उपाय देखें या देखें कुछ मुक्त साफ्टवेयर । आई फोन पर राजेश को सुनें, देवाशीष नए वर्डप्रेस की समीक्षा कर रहे हैं और वर्च्युल टीम्स पर ईस्वामी कर रहे हैं चर्चा। अब च्वाइस देखने और न देखने की। सबसे पहले फिर से पूछा गया कि चिट्ठाजगत देखा कि नहीं, फिर सुजाता ने कहा कि अनदेखा करें... फिर थोड़ी ही देर में कहा कि अनदेखा न करें- शास्त्रीजी ने सही ही कहा है कि ये अनदेखा करें...कहना ठीक नहीं है। वैसे ठीक तो ये भी नहीं है कि बिजली बेकार यूँ ही जलती रहे। पर ये आपको पंकजजी के यहॉं जाकर ही देखना पड़ेगा क्योंकि हमारे यहॉं तो उनका ये लिंक आज खुल नहीं रहा। कुछ देखने की भी च्वाइस हैं- प्रतिबिंब पर, मिश्राजी के यहॉं भी पर हम दिखा रहे हैं एक तस्वीर हनुमानजी के ऑंसू रविजी के यहॉं से। और अब आपके पास भी च्वाइस है चाहें तो नीचे टिप्पणी दें नहीं तो भी नीचे टिप्पणी देंLabels: chitha charcha, chithacharcha, masijeevi, मसिजीवी
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June 17, 2007 को प्रकाशित। लेखकः masijeevi
आज ऐसे एक चिट्ठे की चर्चा जो (अब) नहीं है-  लो प्रत्यक्षा तुम्हें छोटा सा बहाना चाहिए था खुश होने का, हम एक बड़ा सा कारण दे देते हैं, कारण यह है कि ये दुनिया आज सुबह सात बजे से एक बहुत अच्छी दुनिया बन गई है, सब बुरों और बुराइयों से मुक्त- हमारी यह अच्छी-बुरे लोगों से भरी दुनिया, अब सिर्फ अच्छी, और अच्छी बनने जा रही है. इसकी प्रक्रिया तो शुरु हो ही चुकी है, जहां असहमति का कोई जगह नहीं. अब आप इस दुनिया को एक आदर्श दुनिया बनाने वाले हैं, जहां सब अच्छा ही अच्छा हो. अच्छी बातें. अच्छे लोग. वाह! ऐसी आदर्श दुनिया में विरोध का क्या काम?धुरविरोधी का क्या काम? यहां तो सिर्फ सहमति की ही जगह है. इसलिये उचित यही है कि इस विरोध को विराम दिया जाय.
धुरविरोधी का परिचय देना एक कठिन काम है, वैसे अपनी एक पोस्ट में उन्होंने बता दिया था कि -मेरा नाम जे.एल.सोनारे है, मैं मुम्बई, गोकुलधाम के साईंबाबा काम्प्लेक्स में रहता हूं, उम्र उनतीस साल, एक फिल्म प्रोडक्शन कंम्पनी में थर्ड अस्सिस्टेंट हूं, मतलब, चपरासी जैसा काम। वे सुनीता फाल्के पर लट्टू थे जो उनसे कहीं ज्यादा कमाती थी, वहॉं इस ज्यादा कमाई ने धुरविरोधी को चुप | |