आप पूछेंगे मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं? क्या परिवर्तन मुझे स्वीकार नहीं? इन दोनों सवालों का जवाब मेरे पास यही है कि हिन्दी एग्रीगेटरों का वर्तमान स्वरूप जैसा बन गया था वह सहज मांग को पूरा करनेवाला था. अपने-आप में अनूठा तो था ही. अब इतने वर्गीकरणों के बीच चिट्ठे तक पहुंचना और उस तरह गुत्थम-गुत्था में शामिल हो जाना जैसा परंपरागत स्वरूप के कारण होता था, अब संभव नहीं होगा.
चिट्ठाजगत का नया स्वरूप हिन्दी ब्लागिंग के नैसर्गिक स्वरूप को तोड़कर नये तरह की अवधारणा प्रस्तुत करता है जिसके लिए अपनी हिन्दी जमात मानसिक रूप से शायद ही तैयार हो. वैसे तो आरएसएस फीड और न जाने कैसे-कैसे हथियार हैं जिसके जरिए आप अपने पसंद के चिट्ठे तक पहुंच सकते हैं लेकिन फिर भी एग्रीगेटरों की भूमिका खत्म तो नहीं हो जाती? इसी तरह अगर वर्गीकरणों का ऐसा जाल हमारे सामने बिछा दिया जाए तो शायद हम उधर जाना भी नहीं चाहेंगे. कम से कम मेरा मन तो खटक ही गया है. आपकी आप जानें.
एग्रीगेटर चलानेवाले बंधु कहते हैं क्या करें ब्लाग्स बढ़ रहे हैं तो कुछ नया तो सोचना ही पड़ेगा. परंपरागत स्वरूप से काम नहीं चलेगा. आपकी क्या राय है?