प्राइमरी का मास्टर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
प्राइमरी का मास्टर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, मई 05, 2010

निरुपमा : कुलीनता बनाम स्त्रीविमर्श और समाज

बिजनेस स्टैण्डर्ड में कार्यरत पत्रकार निरुपमा पाठक की  ह्त्या/आत्म-ह्त्या के मामले में पिछले अनुभवों की ही तरह जल्दी ही मीडिया ट्रायल किया  जा चुका है ....और वह भी इस हद तक कि उसमे बहुत विचार - पुनर्विचार की गुंजाइश नहीं दिखती | पहले आत्म-ह्त्या   और फिर  ह्त्या की ख़बरों के बाच चर्चा लिखे जाने तक  छह सदस्यीय फोरेंसिक दल ने अपनी जांच पूरी कर ली है। अब रिपोर्ट के आने का इंतजार है, जो कि आज  सार्वजनिक की जाएगी।

अधिकतर  ऐसे मुद्दों पर ब्लॉग जगत में सक्रिय  पत्रकार समूहों द्वारा रूटीन प्रतिक्रियाएं आयीं ...कहीं जन-समर्थन जुटाने की कवायद तो कहीं तटस्थ होकर अफ़सोस जताने तक  , कहीं वर्णव्यवस्था पर प्रश्नचिन लगाती तो कहीं स्त्री विमर्श के सहारे दैहिक व शारीरिक संबंधों को लेकर नए सवाल खड़े करती  | ऐसे मुद्दे पर अचानक चर्चा हेतु तत्पर होने  की मुख्य वजहें  बनी डा0  कविता वाचक्नवी और   गिरिजेश राव की पोस्ट्स  के अलावा निरुपमा के पिता का पत्र !


ऐसे समय जब बड़ी आसानी से ऐसी हत्याओं को  आनर किलिंग  कह के मुद्दे की चीर-फाड़ की जा रही हो उस समय ऐसे पक्षों पर भी नजर डाला जाना चाहिए | कि ....

एक वयस्क सुशिक्षित लड़की एक वैसे ही लड़के से बिना किसी सावधानी के शारीरिक सम्बन्ध बनाती है, गर्भवती होती है और तीन महीने (मतलब कि शिशु को जन्म देने को मानसिक रूप से तैयार) तक मृत्युपर्यंत गर्भ धारण रखती है। क्या उसका अपने माँ बाप के प्रति, जो कि पुराने विचारों के थे और वैसे ही समाज में रहते थे, कोई दायित्त्व नहीं था ? 


इन परिस्थितिओं में यदि यह मान लिया जाए कि निरुपमा के गर्भ में कोई संतान ना होती तो क्या उसकी यही नियति होती ? आखिर वही ....

लड़का खुलेआम टेसुए बहाता, हीरो बना घूम रहा है। लड़की के पोस्टमार्टम के समय क्या यह आवश्यक नहीं था कि गर्भ का डी एन ए परीक्षण कराया जाता ताकि लड़के का पिता होना सिद्ध हो सकता और उसको क़ानून के शिकंजे में लिया जा सकता ?

कितनी निरुपमायें अब तक  ऐसी ही परिस्थितिओं में ख़बरों में नहीं आयीं ...तो ....

कहीं ऐसा तो नहीं कि सारा बवाल बस इस लिए है कि मरने वाली पत्रकार थी और उसे मारने का पहला कदम लेने वाला ( उसे गर्भवती कर) उसका कथित प्रेमी भी पत्रकार है? कहीं प्रेमी अपने को बचाने के लिए जमात इकठ्ठी कर यह नौटंकी तो नहीं फैला रहा? कहीं ऐसा तो नहीं होगा न कि कल सुबूत मिले कि लड़के ने उसके साथ छिप कर शादी कर ली थी ?

 

इसी उधेड़बुन  में आलस्य-गुरु अपने अन्दर भी झांकते हुए चुनौती देते हैं कि .....

आप में से कितने गिरिजेश अपने नाम से 'राव' हटाने को और अपने बच्चे को भी जाति सूचक उपनामों से मुक्त करने को तैयार हैं? ..मैं गिन रहा हूँ। संख्या बहुत कम है। .. तो भैया बहिनी! आप लोग उपनाम तक हटाने को तैयार नहीं; जाति व्यवस्था पर इतनी हाय तौबा क्यों?

 

विवाह -पूर्व  शारीरिक संबंधों पर प्रहार करते हुए गिरिजेश बड़ा सवाल खडा करते हैं कि ....

कल अगर आप का बच्चा आप से पूछ बैठे तो क्या कहेंगे उसे ? वो जो कुत्ते करते हैं न वही कर रहे हैं - ऐसा कह पाएँगे आप ? ..सेक्स एजूकेसन। ... बच्चे सम्भोग करने के पहले उसकी ज़िम्मेदारी तो समझें...

 

दुसरे पक्ष को देखें तो एक भावनात्मक प्रश्न यह भी है कि .....

ऐसा कैसे हो सकता है एक उम्र के बाद मां बेटी का रिश्ता दो सहेलियों का सा हो जाता है, जो अपने सुख-दुख एक दूसरे के साथ शेयर करती है। माँ सिर्फ मां न रहकर बेटी की पथ-प्रदर्शक बन जाती है। बेटी की पेशानी में पड़ा एक हल्का सा बल भी मां को विचलित कर देता है और वह जानने को व्याकुल हो उठती है कि बेटी क्यों परेशान है? बेटी की हत्या का विचार मां के मन में कैसे आ सकता है?

 
निरुपमा के मामले में स्त्री विमर्श से जुड़े हुए कुछ दूसरे मुद्दों पर भी बहस जारी है  | चोखेरबाली पर आर0 अनुराधा आम प्रतिक्रियाओं के विपरीत इसे हिम्मत नहीं कायरता बताते हुए कहती हैं कि .....
मैं क्रांतिकारी नहीं हूं। मैं उससे सबसे पहले पूछती कि ये क्या हाल बना लिया? क्या अपना इतना भी ख्याल नहीं? क्या तुम सचमुच, जानबूझ कर बिन ब्याही मां बनना चाहती हो, ऐसे सामाजिक माहौल में? और मुझे लगता है कि वह इससे इनकार करती कि उसने चाह कर यह हालात अपने लिए बनाए हैं। यह उसकी हिम्मत नहीं, कायरता थी। 

.... ....जाहिर है समाज में रहकर उसके साथ अपने दैहिक संबंधों को लेकर सामान्य जागरूकता एक पढी लिखी लडकी में होनी ही चाहिए |
malefemale एक तो, वह पढ़-लिख कर भी खुद अपने शरीर के बारे में कुछ नहीं जानती। वह चाहती है, पर नहीं जानती कि इसका क्या करे? इस शरीर का सम्मान किस तरह करे। दुनिया भर की खबरें, लेख उसने पढ़े, एडिट किए, पर उसे इतना भी नहीं पता था कि अपने को इस हालत तक पहुंचाने से रोकने के कई तरीके हैं, और सब सहज और जायज है। वह दिल्ली शहर में आर्थिक रूप से आत्म निर्भर, अपने रोज के फैसले खुद करने वाली आज़ाद लड़की थी। और वह उसका प्रेमी भी, जो कि कोई अनपढ़ गंवार नहीं था और उसे इतनी अंतरंगता से जानता था, जो कभी उसकी हालत जान नहीं पाया तो क्या इस आशंका के बारे में सोच कर उसे आगाह भी नहीं कर पाया?
जाहिर है लडकी सामजिक रूप से उच्च वर्गीय हो तो वर्ण-व्यवस्था पर प्रश्न-चिन्ह तो लगने ही थे | पर इसके विपरीत स्त्री विमर्श के अगले चिंतन   को आगे बढाते हुए इस  चर्चा के होने की दूसरी महत्वपूर्ण वजह बनी डा0  कविता वाचक्नवी  का विचार है कि ....
निरुपमा की दुर्घटना को साझे "समाज की मानसिकता का प्रतिफल" के रूप में लिया जाना चाहिए अर्थात् सम्प्रदाय विशेष / जाति विशेष वर्सेज़ स्त्री नहीं अपितु समस्त समाज / सभी सम्प्रदाय वर्सेज स्त्री के रूप में देखा जाना चाहिए।  निरुपमा किसी भी सम्प्रदाय (धर्म?) में होती उसके कुँआरे मातृत्व को स्वीकारने की हिम्मत किसी में न होती।
जो लड़की महानगर में अकेली रहती है व प्रतिष्ठित पत्रकारिता से जुड़ी है, अपने पैरों पर खड़ी है, और सबसे बढ़कर जो एक पुरुष के साथ सहवास करने का साहस रखती है ( विशेषकर, उस भारतीय समाज में जहाँ विवाहपूर्व यौन सम्बन्ध मानो भयंकरतम जघन्य अपराध मानता है समाज, तिस पर उसमें इतना साहस भी है कि वह लगभग तीन माह का गर्भ वहन कर रही है ( ध्यान रहे यह वह काल होता है जब गर्भावस्था के बाह्य लक्षण सार्वजनिक रूप में दिखाई देने प्रारम्भ् होने लगते हैं); ऐसी साहसी व निश्शंक लड़की का मात्र माता-पिता के अन्तर्ज़ातीय विवाह के विरोधी होने के डर-मात्र से विवाह न करना कुछ हजम नहीं होता। यदि कोई माता-पिता के डर / दबाव-मात्र से इतना संचालित होता है तो उसका भरे (भारतीय) समाज में विवाहपूर्व गर्भवती होने का साहस करना - ये दो एकदम लग ध्रुव हैं। एक ही लड़की, वह भी बालिग, विवाह करने का साहस न रखे किन्तु सहवास व कुंआरे मातृत्व का साहस रखे, यह क्या कुछ सोचने को विवश नहीं करता ?
कविता जी इस विषय के दुसरे पक्षों पर बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखती है कि आखिर ......
एक ऐसे अमानवीय समय में जबकि दो व्यक्तियों की हत्या की भर्त्सना  करते हुए पूरे समाज को कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए व स्त्री की सुरक्षा और उसके जीवन के मौलिक अधिकार, मातृत्व के मौलिक अधिकार की बात होनी चाहिए, सामजिक न्यायव्यवस्था की बात होनी चाहिए; वैसे समय में ब्राहमणवाद आदि  का नाम लेकर हिन्दुत्व को धिकारने के प्रसंग निकालना मुझे उसी शैतानी पुरुषवाद की चाल दिखाई देता है जो स्त्री को अप्ने प्यार की फाँस में फँसा कर उसे भोग्या और वंचिता दोनों बनाता है। विवाह की जिम्मेदारी से बचता है और छलना करता है, दूसरी ओर भाई और अपना परिवार अपना पौरुष दिखाते हैं।
स्त्री क्या करे? कहाँ जाए?
भले ही आप विचारों की इस भीड़ के विपरीत ध्रुवों  से अपनी सहमति या असहमति का निर्धारण कर पायेंया नहीं? पर ऐसी घटनाओं से हमें   क्या पता चलता है?  कि.......
  • हम आर्थिक और विकास के लाख दावों के बावजूद अभी भी बर्बर मानसिकता में जी रहे हैं.
  • हमें अभी भी दूसरों की आजादी के अधिकार का सम्मान नहीं आता.
  • लोकतान्त्रिक पद्धति से बहुत दूर हैं. यह नहीं जान पाए हैं कि लोकतंत्र जीवन की एक सुविचारित प्रणाली है न कि केवल शासन व्यवस्था.

विचारों की दौड़ कहाँ तक जसकती है कि लोग अब परेशान हैं कि .....

निरुपमा ने क्या नाम सोचा होगा अपनी बेटी के लिए?

 

उपरोक्त चर्चा में एक दूसरा पक्ष यह भी है कि निरुपमा के गर्भ में पाया जाने वाला अंश केवल निरुपमा का ही था या .....उसकी जवाबदेही किसी और की भी है?

नीरू के शरीर में पल रहा भ्रूण जिस किसी का भी अंश था..मैं उसे नहीं जानता....पर क्या पुरुषों के लिए भी ऐसी ही सज़ा होगी....क्या उस बच्चे में उस पुरुष का अंश नहीं है....या सारी गलती नीरू की ही थी...
ज़ाहिर है अब मैं भावुक हो रहा हूं...और हमारे सभ्य समाज में भावुक केवल सामाजिक प्रतिष्ठा और दकियानूसी नियमों को लेकर हुआ जाता है...मानवीय नीतियों और मूल्यों को लेकर नहीं....ये भी एक नियम ही है....
माफ करना नीरू ! हम तुम्हें बचा नहीं पाए...पर क्या अफसोस करें तुम्हारे जैसी हज़ारों नीरू हम खो चुके हैं...शायद खोते भी रहेंगे....?

कोई मुद्दा आये और उसके बाद विचार और चिंतन  और मनन में फंसा मन जब अपने को निःशक्त  पाता है तो वह अपने आप से गंभीर सवाल करता है ...ऐसे सवाल जिनका जवाब किसी के पास नहीं ...ना हमारे पास ना आपके पास ना शासन के पास | इसी उधेड़बुन  में .....
हर राह से गुजरते हुए मैं अपने दामन को बचा न सका। किसी भी तौर निकला यही लगा कि इस गुरुतर अपराध में उस लड़की के हत्यारों के साथ ही परोक्ष रूप से बहुत से लोग शामिल हैं। किसी भी एंगल से लिखना चाहा तो बार-बार सवाल उठता रहा कि संविधान के पोथे के सिवा इस देश में ऐसी कौन-कौन सी जगहें हैं जहाँ जातिवाद,सामंतवाद या पितृसत्ता पर्याप्त रूप से कमजोर हुई है....?
जहाँ एक लडकी की मौत हुई तो यह सवाल कैसे रह जाता कि यदि वह स्त्री ना होकर एक पुरुष होती तो क्या उसकी भी यही नियति होती ?

यदि निरुपमा कि हत्या उसके माता-पिता ने कि है तो क्या यही कोशिश वह अपने बेटे के लिए करते। जब निरुपमा का भाई अपनी पसंद से कोई लड़की चुनता। उससे शादी करने का फैसला करता तो क्या उसका हश्र भी निरुपमा कि तरह होता?

 
चलते चलते निरुपमा के पिता का तथाकथित पत्र का अंश
आदमी को जिंदा रहने के लिए समाज एवं परिवार की आवश्यकता होती है अत: ऐसा काम करने से हमेशा बचना चाहिए जिससे बदनामी मिलती हो. मन बहुत चंचल होता है उसे मजबूती एवं दृढ़ निश्चय से काबू में रखना पड़ता है. आजकल का फिल्मी एवं टीवी का वातावरण जो कि वास्तविक नहीं होता है उससे प्रभावित नहीं होना चाहिए. मां-बाप की गलती का फल आनेवाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ता है, उसे वर्तमान एवं भविष्य में होनेवाले परिवार सभी गालियां देते हैं. भावना में बहकर कोई काम नहीं करना चाहिए. इस पत्र को दोनों आदमी पढ़कर संकल्प ले लो कि गलती सुधार लेंगे और मां-बाप की इच्छा के प्रतिकूल कोई काम नहीं करेंगे. मां-बाप अपने बच्चों की भूल को क्षमा कर देंगे. मां-बाप बेटे बेटियों को अपने से दूर भेजते हैं कि वे हमारे नाम और यश को उज्जवल करेंगे न कि मलीन.
 
उपरोक्त पत्र से  आप जैसे चाहें निष्कर्ष निकाले ....लेकिन कुछ गंभीर प्रश्न  भी छोड़ता मुझे  दीख पड़ता है | आखिर ऐसे अनुत्तरित प्रश्नों का हल हम सब   अब तक  ...शायद इसीलिये नहीं खोज पायें हैं? एक निष्कर्ष यह भी देखें ....कि....
"धर्म" से टकराना स्त्री के लिए कभी आसान नही रहा और यह वह सबसे बड़ी दीवार है जो उसके रास्ते मे खड़ी है।धर्म के ठेकेदार और पितृसत्ता के चौकीदार हाथ मे हाथ मिलाए सत्ता की सीढियाँ चढते हैं और मिल बाँट कर 'धर्म विमुख औरतों' को सबक सिखाते हैं।
निश्चित रूप से यह
पत्र एक पिता ने पुत्री को समझाते हुए नही लिखा है , यह एक आहत दर्प वाले पितृसत्ता के मुखिया ने बागी के प्रति दाँत कसमसाते हुए लिखा है, मुट्ठियाँ भींचते हुए ,शब्द चबा-चबा कर लिखा है, गुस्साई रक्तिम आँखों से लिखा है। 
 
चलते चलते .....
निरुपमा ने ये शायद सोचा नहीं था,
आधुनिकता परिधान जैसी हो गई है।
 
और
आखिर में !
 
उसे मिटाओगे
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे
उसके ही घर की हवा से
उसे वहां से भी मिटाओगे
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर
वहां से भी
मैं जानता हूं
कुलीनता की हिंसा !
(आलोक धन्वा की कविता का अंश)

ऐसी चर्चाएँ कुछ विचारोत्तेजक निष्कर्ष निकाल सकेंगी इस आशा के साथ चर्चा को विराम |
आपका
 प्राइमरी का मास्टर 

Post Comment

Post Comment

गुरुवार, अप्रैल 01, 2010

मूर्ख दिवसीय चर्चा ...... और शिक्षा का अधिकार : कोई सम्बन्ध तो नहीं?

क्या फर्स्ट अप्रैल (फूल डे) बनाने की आज भी अहिमयत अभी भी बची हुई है ....जबकि हम तो रोज ही ठगे जा रहे ....उल्लू बनाए जा रहे हैं ? इस छलिया डे की कित्ती उपयोगिता बची है ....कभी ना कभी इस सन्दर्भ में हम सब सोचेंगे ही ....आखिर हम सब हर दिन कहीं  ना कहीं किसी ना किसी समय  छले  ही तो जा रहें है |

ऊपर की तथाकथित साहित्यिक टाइप थिंकिंग को नजरंदाज कर दें ..तो हर फर्स्ट अप्रैल को हम कुछ ज्यादा ही सतर्क हो जाते हैं ...और फिर जरूर फंस  जाते हैं , जैसे पिछली बार यहाँ धर लिए गए | कहे दे  रहें हैं यहाँ मत जाइयेगा ......लेकिन आप मानेंगे थोड़े ही ? खैर थोड़ी चर्चा हो जाए ! फूल डे मनाने के पीछे कई कहानियाँ अब तक पढ़े होंगे ...दो- चार और पढनी हो तो यहाँ जाइए |

इस दिवस को मनाने वाले कुछ लोगों का कहना है कि इस को हम इसलिए मनाते हैं ताकि मूर्खता जो मनुष्य का जन्मजात स्वभाव है.....वर्ष में एक बार सब आजाद हो कर हर तरह से इस दिवस को मनाये और इस दिवस पर जम कर हंसे। जिससे मन मस्तक में ऊर्जा का संचार पैदा हो।

जब भाई लोग इस डे के इत्ते दीवाने हों तो कहीं ना कहीं से यह आवाज तो उठेगी ही |

फूल डे को राष्ट्रीय पर्व का दर्जा न देने से बड़ी कोई बेफकूफी नहीं। यही एक पर्व ऐसा है, जिसे राष्ट्रीय त्योहार का स्थान प्राप्त होना ही चाहिए। यह बात बेकार नहीं है। इसकी वजहें हैं। ‘फूलनेस’ जो इस दिन की विशेषता है, बिना किसी नस्ल, वर्ग, वर्ण, धर्म आदि के सभी में विद्यमान है। इसमें एकता का अटूट भाव छिपा हुआ है। यही नहीं, दोनों राष्ट्रीय त्योहारों की विशेषताएं भी इसमें समाई हुई हैं। इस दिन लोगों को एक-दूसरे को फूल बनाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्रता प्राप्त होती है। वैसे तो साल के 365 दिन इस पावन आजादी का उपभोग होता है, पर इसकी खुशी ‘फूल डे’ को मनाई जाती है।

हम सब जानते हैं कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं  ........ अब आप ही देखिये ना ? 
अगर हम फस्र्ट अप्रैल को मूर्ख दिवस की जगह समझदारी दिवस के रूप में देखें तो क्या हर्ज है। इसलिए आज सुबह पहली ही चाय से सतर्कता बरतते हुए, अपने लिए मूर्ख दिवस नहीं समझदारी दिवस सेलिब्रेट कीजिए।
कुछ लोग मूर्ख दिवस पर भी  कवितायें लिखें हैं ......कलेजा है भैये !

करते रहिए फील गुड़ गया चुटकला फैल।
देखो मूर्ख बने कौन, आने दो अप्रैल।

धोखा, झूठ, फरेब से किया हमें हैरान।
बोले मूर्ख दिवस है, करता क्या कल्यान।

बुद्धू मुझे बना दिया, बोले हैं अप्रैल।
मैं बोलूँ तो अर्थ है,
मार मुझे आ बैल।
हाँ बताता चलूँ कि आज किसी के झांसे में मत अइयो .....चाहे गूगल और वर्डप्रेस ही क्यों ना हो ? इनके चक्कर में तो अपने देबू दा जैसे ज्ञानी भी फस चुके हैं या फंसा चुके ? वैसे, मूर्ख बनाने को लेकर सबसे दिलचस्प संबंध उपभोक्ता व बाजार के बीच होते हैं। देखा जाए, तो बाजार का पूरा तंत्र ही सफेद झूठ पर टिका हुआ है।

आज के मार्केट के सबसे बड़े सच 'सेल' का 'सच' हर किसी को पता है, तो बारगेनिंग का पूरा प्रोसेस ही सफेद झूठ पर आधारित है। शर्ट में लगे कीमत वाले टैग और उस पर मिले डिस्काउंट को देखकर ग्राहक अपनी पीठ थपथपाता है कि देखो, कितनी सस्ती खरीदारी कर ली, तो इस डिस्काउंट के सच को जानने वाला दुकानदार भी मन ही मन खुश हो रहा होता है कि उसने कैसे ग्राहक को मूर्ख बना डाला। जरा सोचिए, ग्राहक और दुकानदार दोनों के लिए विन-विन सिचुएशन वाले बारगेनिंग सिस्टम पर आधारित अपनी बाजार व्यवस्था में अगर ईमानदारी घुस जाए, तो उसमें बचा क्या रह जाएगा!

वैसे कई लोग आज के दिन कोई गंभीर बात कहें तो कित्ता सीरियस उनको लिया जाता है ..अथवा लिया जाना चाहिए ?


इसी सन्दर्भ में अपने पुराने ब्लोगिया इ-पंडित श्रीश भाई का सारा पांडित्य धरा का धरा रह गया था ...इसी अप्रैल फूल  के चक्कर में !

अरे हद हो गई यार एक अप्रैल को कोई नॉर्मल पोस्ट नहीं लिख सकते क्या? मेरी सुबह वाली पोस्ट भी जोक थी क्या? और इस पोस्ट में फूल बनाने वाली क्या बात है? खुद देख लो।मुझे अप्रैल फूल बनाना होता तो सीरियस सी पोस्ट लिखता, सीरियस सा टाइटल रखता। अप्रैल फूल बनाने के लिए इससे बेहतर कई तरीके थे। गलती हो गई जो ये पोस्ट कल पब्लिश की। अब समझ आया कोई कमेंट क्यों नहीं आई अब तक लोग अप्रैल फूल का जोक समझ कर आए ही नहीं। अच्छी खासी पोस्ट का सत्यानाश हो गया, ये पोस्ट आज करनी चाहिए थी लेकिन क्या करुँ खबर ऐसी थी कि रुका न गया।

शायद  मूर्ख दिवस को भी स्वस्थ मनोरंजन के नाम पर ही स्वीकार किया था। चलन यह बन गया  है कि इस दिन का नाम लेकर किसी भी स्तर का  आपत्तिजनक मजाक लोग करने से नहीं हिचकते !
चलिए मस्ती, मजाक को दिवस हम सब मस्ती के साथ मनायें, बिना किसी को कष्ट और परेशानी दिए। बिना किसी की भावनाओं को आहत किये, बिना किसी को दुःख पहुँचाये। देखा जाये तो किसी भी पर्व का महत्व उसके द्वारा हर्ष, उल्लास मनाने से है न कि किसी को कष्ट पहुँचान से। क्या आज का मूर्ख दिवस हम इस विचार के साथ मना सकेंगे कि कोई हमारे किसी भी कदम से हताहत न हो, परेशान न हो, दुःखी न हो? 

इधर अपने ब्लॉग जगत में भी फर्स्ट अप्रैल के चक्कर में लोग बौराए जा रहें हैं ...देखिये अपने खटीमा वाले शास्त्री जी ने सीमा जी को उलाहना क्या दिया कि सीमा जी ने पलट कर शास्त्री जी को सिरफिरा कह दिया |
फिर भी शास्त्री जी खुश हैं

सिरफ़िरे होने पर
तो नाज़ है
एक कलम में
                         समाया पूरा समाज़ है
कभी कभी लोग मूर्ख बनाने ताना बाना तो बहुत  बुनते हैं ...पर ब्लॉगवाणी जैसी सेवायें उनकी वाट लगा देती है ...बकौल झा जी !
सत्यानाश सारी पोल तो ब्लोगवाणी पर पूरी पोस्ट दिख कर ही हो गई ...धत तेरे कि ..ये क्या हुआ ये तो अपना भी अप्रैल फ़ूल मन गया यार
आज के दिन हजारों और लाखों के लुभावने ऑफर उपलब्ध हैं .....एक ऑफर इधर भी! भैये पूरे 101 रुपइया  का इनाम जो है !
 
उस फूल का नाम बतलायें
जो अप्रैल में खिलता है
दिमाग का पोर पोर
उससे हिलता है

वैसे आज इत्ती चर्चा के बाद पता नहीं कित्ता सीरियसली आप लें ....फिर भी बताता चलूँ कि आज ही दिल एक पुराना सा म्यूजियम वाले रौशन का जन्मदिन है। उनको हमारी बधाई के असली फूल !
  आज एक अप्रैल यानि मूर्ख दिवस के अवसर पर सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून  (पूरा पाठ : इस लिंक पर उपलब्ध) लागू करने का निर्णय लिया है।  नये कानून के तहत 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों को अनिवार्य और समग्र शिक्षा उपलब्ध कराया जायेगा। निजी विद्यालयों  मे 25 प्रतिशत गरीब छात्रों के पढाई का खर्चा सरकार उठायेगी।

देश  में गरीब और अमीर के बीच जो  अनुपात है, ऐसे में 25 प्रतिशत की सुविधा किस स्तर के गरीबों को मिलेगी यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन इसमें भी हम जैसे मास्टर  लोग पूँछ ना रहें हों  कि कहीं सरकार की योजना गरीबों को अप्रैल  फूल  बनाने की  तो नहीं?

हमारा भी कुछ विचार है ...हिम्मत करके लिंक दे रहें ....अगर आपमें हिम्मत हो तबहिये जाइयेगा!
यानी आप जितना उच्च-क्वालिटी का  झूठ बोलेंगे, तो  जाहिर  है सामने वाला उतना ही बड़ा मूर्ख साबित होगा। सच्ची बात  तो यह है कि अपने संबंधों को कायम रखने में भी झूठ की बड़ी महत्वपूर्ण  भूमिका है। दूसरे शब्दों में अगर कहना चाहें तो कह सकते  हैं कि लोगों से अपने संबंधों को कायम रखने के लिए भी हमें उन्हें मूर्ख बनाना पड़ता है।
आप का क्या विचार है ?

Post Comment

Post Comment

शुक्रवार, जनवरी 01, 2010

भूल कर पुराने राग –विराग ; करें आज नया आगाज >>>>

कोई भूमिका नहीं …….. सीधे सीधे एक आह्वान एक नयी शुरुवात के लिए ……..!!!

शुभकामनाओं का अपने जीवन में महत्व कितना है …कोई इसे नकार नहीं सकता | सो आइये इस साझा मंच में आज चर्चा केवल नव-वर्ष की शुभकामनाओं की |

 

प्रारम्भ  कविवर हरिवंशराय बच्चन की शुभकामनाओ  से …….रूबरू करा रही हैं आकांक्षा यादव |

वर्ष नव,
हर्ष नव,
जीवन उत्कर्ष नव।
नव उमंग,
नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग।
नवल चाह,
नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह।

खुशी एक गुलाब है और दुख एक कांटा है। इन दोनों का बसेरा एक जगह ही है। इन्‍हें एक साथ ही रहना चाहिये। पर हम कांटे से गुलाब को छीनकर अलग-अलग कर देते हैं। कांटे को पड़ोसी के लिए और गुलाब को अपने लिए सहेज लेते हैं। पर हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। अगर हम कांटा नहीं चाहते हैं तो हमें गुलाब को भी छीनने का हक नहीं है। पर यहां देर भी है और अंधेर भी है।……..यह बता रहे हैं अपने की-बोर्ड के खटरागी |

जाने पर उसके उठा रहे सवाल
गलतियों भरा रहा सारा ही साल
सदा यही कहानी है।

 

आने पर प्रफुल्लित हैं सब जन
मन में सबके खुशियां भर आंगन
सदा यही कहानी है।

 

प्रत्‍येक गुलाब को
कांटे से दूर
होना ही है।

छोटी बिटिया नित्या के जन्मदिन पर आज कह रही हैं ….पूनम जी |

बीती रात अमावस की
हर रात अब पूरनमासी हो
हर पल खुशी के दीप जलें
हर दिन फ़ागुन महीना हो।

समय के बदलाव और शुभकामनाओं के बदले तरीकों पर स्याही कुछ इस तरह खर्च की सिद्दार्थ जी ने |

कलम उठाकर लिखते थे हम

शुभकामनाएं नये साल की

लिफाफे को सजाकर कुछ फूलों की डिजायन से

भरते थे उसमें अपना सुलेख

ग्रीटिंग कार्ड तैयार कर लेते थे-सस्ता, सुन्दर और टिकाऊ

अपने गुरुजनों को, सखा और सखियों को,

बस थमा देते थे अपनी शुभकामनाएं।

स्कूल में पहुँचने पर शुरू होता था नया साल

सबकी जुबान पर चढ़ा होता था

हैप्पी न्यू इयर, हैप्पी न्यू इयर, हैप्पी न्यू इयर

बदला जमाना

आ गया मोबाइल और इण्टरनेट

अब यहीं हो रही है मुलाकात और भेंट

अब नया साल रात में ही आ जाता है।

तीनो सूइयाँ एक दूसरे से मिलते ही शोर मच जाता है

नया साल टीवी के पर्दे से होकर निकलता है

लाइनें जाम हो जाती हैं

संदेश देने को फोन नहीं मिलता है।

क्या-क्या चाहते हैं, क्या-क्या सोचते हैं, क्या फरियाद है  हमारी हमारे राम से - हिमाशु जी के प्रिय कवि ’कैलाश गौतम’ की रचना पढ़ें - "नये साल  में रामजी..." ।

नये साल में रामजी, इतनी-सी फरियाद,
बना रहे ये आदमी, बना रहे संवाद।
नये साल में रामजी, बना रहे ये भाव,
डूबे ना हरदम, रहे पानी ऊपर नाव ।
नये साल में रामजी, इतना रखना ख्याल,
पांव ना काटे रास्ता, गिरे न सिर पर डाल।
नये साल में रामजी, करना बेड़ा पार,

नए साल का आगमन और आधा भरा है गिलास या खाली है की तर्ज चिंतन करती रंजना जी|

नया साल
एक नई आशा
नई उम्मीद जगाता हुआ
कलेंडर के पन्नों पर
उतर आता है
और कुछ दिन तो
अपने नयेपन के एहसास से
कुछ तो अलग रंग दिखाता है....
फिर ढलने लगते हैं लम्हे
वक़्त यूँ ही गुजरता जाता है ....
कुछ नया होने की आस में
यह जीवन यूँ ही बीतता जाता है

इस दुनिया में आने के बाद हमारी इच्‍छा हो या न हो , हम अपने काल , स्‍थान और परिस्थिति के अनुसार स्‍वयमेव काम करने को बाध्‍य होते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं , अपने काल , स्‍थान और परिस्थिति  के अनुरूप ही हमें फल प्राप्‍त करने की लालसा भी होती है। यह मै नहीं कह रहा ….. संगीता  जी कह रही हैं |

……अपने अनुभव में मैंने पाया है कि चिंता में घिरे अधिकांश लोग सिर्फ शक या संदेह में अपना समय बर्वाद करते हैं। इस दुनिया में सारे लोगों का काम एक साथ होना संभव नहीं , यह जानते हुए भी लोग बेवजह चिंता करते हैं। हमारे धर्मग्रंथ 'गीता' का सार यही है कि हमारा सिर्फ कर्म पर अधिकार है , फल पर नहीं। इसका अर्थ यही है कि फल की प्राप्ति में देर सवेर संभव है।  इस बात को समझते हुए हम कर्तब्‍य के पथ पर अविराम यात्रा करते रहें , तो 2010 ही क्‍या , उसके बाद भी आनेवाला हर वर्ष हमारे लिए मंगलमय होगा।

जिस प्रकार जीवन के चार आयाम होते हैं उसी प्रकार हिंदी चिट्ठाकारी की भी चार सीढियां है जिससे गुजरकर हिंदी चिट्ठाकारी संपूर्ण होता है ।कह रहें हैं रवीन्द्र प्रभात……

प्रथम सीढ़ी – भावना
जिससे दिखती है लक्ष्य की संभावना ,
संभावना से प्रष्फुटित होता है विश्वास ,
विश्वास से दृढ़ता , दृढ़ता से प्रयास ....!


यानी दूसरी सीढ़ी – प्रयास
प्रयास परिणाम कम शोध है
यह तभी सार्थक है जब कर्त्तव्य बोध है


यानी तीसरी सीढ़ी – कर्त्तव्य
कर्त्तव्य से होता है समन्वय आसान
और यही है उत्तरदायित्व का प्रत्यक्ष प्रमाण


यानी चौथी सीढ़ी है – उत्तरदायित्व
जिसमें न भय , न भ्रम , न भ्रान्ति होती है
केवल स्वावलंबन के साथ जीवन में शांति होती है

अभी दीजिए मुझे इजाजत….हम तो चले अपने स्कूल ! सभी को नए साल की ताजगी मुबारक …बाकी एक मौन हैं जिसे एक क्षण के लिए सब अपना लें तो कोई दिक्कत नहीं | सो दिल खोल कर दीजिए

बधाइयां!!! सब मिल बोलें ……

 

” हैप्पी न्यू इयर – २०१० ”

 

Post Comment

Post Comment

शनिवार, दिसंबर 12, 2009

बकरे की अम्मा कब तक खैर मनायेगी ......? की तर्ज पर पेश है आज की चिट्ठा-चर्चा !

चिट्ठा चर्चा का भार हमने कुछ इसी तरह हथियाया जैसे आदमी अंगुली पकड़ने के बाद सीधे हाँथ पकड़ लेता है  , और फिर लगातार चर्चा करने से बचते रहे ; पर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनायेगी की तर्ज पर पेश है आज की चर्चा !

चिट्ठों की चर्चा का मंच हमेशा ही ना कही जा सकने वाली अपेक्षाओं से घिरा होता है , ऐसा मेरा मानना है | सो पहली चिट्ठा-चर्चा में मैंने चित्र और नामों से परहेज कर कुछ लिंक्स सीधे सीधे देने का नया प्रयोग किया है , जो प्रथम दृष्टया अनाकर्षक लग सकता है | फिर भी ......
जिस पर मिली यह सीधी और सपाट टिप्पणी
चलिए हमारी भी शुभकामनाएं !
जीवन तनावों  से भरा है तो हाजिर  है इसका उपाय  "कायोत्यर्ग प्रेक्षाध्यान"
कायोत्यर्ग प्रेक्षाध्यान का एक चरण है जो शिथिलकरण की विधिवत्‌ एवं उन्नतिकारक प्रक्रिया है। कायोत्सर्ग परानुकंपी नाडी तंत्र को सक्रिय बनाता है और तनाव के मूल कारण बदल देता है। कायोत्सर्ग शरीर के अतिरिक्त दबाव को दूर करने में सक्षम है और इससे शरीर व मन को गहन शिथिल स्थित में ले जाया जा सकता है। कार्यात्सर्ग तनाव के दुष्प्रभावों से व्यक्ति को बचाता है।
जाड़े का मौसम भले ही अभी अपनी पूरी रंगत में ना हो ...पर जरूरी है कि यह समझ लें .....
.......... किसी जमाने में डाक्टर की सलाह के बाद स्वेटर पहना जाता था। जैसा कि नाम से पता चलता है स्वेटर अंग्रेजी के स्वेट शब्द से बना है। जाहिर है स्वेटर के मायने हुए पसीना लाने वाला। पहले लोगों को जाड़े का बुखार आने पर पसीना लाने के लिए डाक्टर एक खास किस्म के ऊनी वस्त्र को पहनने की सलाह देते थे। तब इसे कमीज के अंदर पहना जाता था। बाद में जब सर्दियों से बचाव के लिए कमीज से ऊपर पहने जाने वाले पहनावे भी चलन में आए तो भी उनके लिए स्वेटर शब्द ही चलता रहा।
अपने बीच सक्रिय रहा कोई चेहरा यदि चला जाए तो यह दर्द भी कितना चुभने  वाला हो सकता है इसीलिए ...
.....पिछला सप्ताह ब्लॉग के लिए इसलिए बुरा था कि ब्लॉग पर लिटरेचर वाले लोग आमने सामने थे और वे छोड़ कर जा रहे थे, लेकिन कचरा पट्टी वाले शीर्ष ब्लोगर आनंद में. खैर उनका आनद स्वतः स्फूर्त है. वे चाहते भी यही है कि ये कहानियों और कविता वाले संजीदा लोग जम गए तो हमारा कचरा कौन जुगाली करेगा. मेरे सपने के बाद की इस ख़बर ने मुझे और अवसाद की स्थिति में पहुंचा दिया.
किसी के जाने के बाद हमारे  साथ अगर कुछ है तो उनका विपुल सृजन और बेशुमार यादें.....
......वे संडास में दाखिल होते हैं ताकि विचार कर सकें कि मनुष्य की बनाई दुनिया में क्यों बढ़ रहा है मनुष्य का विलगाव बाहर आकर वे काँपते दीखते हैं सिंक के पास उनके भूरे हाथों से बह रहा है ठंडा पानी कलाई के बुढ़ाते बालों से चिपकी हैं कुछ जल-बूँदें। उनके रूठे - से बच्चे अक्सर टाल जाते हैं साथ बाँटना मजाक और गुप्त बातें।
बलात किया गया कार्य बलात्कार होता है हम तो अब तक यही समझते थे पर कई तरह के बलात्कार की कड़ी में भाषात्कार भी हो सकता है ....
मनुष्‍य अपने जीवन में जितनी तरह के बलात्‍कार करता है, उनमें से एक बलात्‍कार भाषा के साथ भी होता है, जिसे अपनेराम ने 'भाषात्‍कार' की संज्ञा दे डाली है। जिस तरह बलात्‍कार के लिए कमसे कम दो की ज़रूरत होती है उसी तरह भाषात्‍कार में भी कमसे कम दो भाषाओं की ज़रू‍रत होती है। अगर दो भाषाओं का परस्‍पर मिलन सस्‍नेह, प्‍यार मौहब्‍बत के साथ होता है तो वह मधुर वैवाहिक संबंधों की तरह पवित्र होता है। पर अगर इन्‍हें जबरदस्‍ती मिलाने की कोशिश हो तो फिर यह भाषात्‍कार ही कहा जाएगा।
ताकत के दम पर कार्य हो तो सलाह ऐसी  मिलनी थी ही.....
हम तो आज तक ना समझ पाए कि.....
पर लोग मानते कहाँ हैं ...?
कई प्रश्न अपने आप में सीख भी बन जाते हैं ........
ब्लॉगरी के बारे में हम जान कर भी और जानना चाहते है तो जान लीजिये ....
ढोंगी बाबाओं की बढ़ती जमात और उन पर ऐसी चार्जशीट के बाद भी प्रार्थना उनसे ....?
आप समझ रहे हैं ना .....
.....मैं इसे मराठी में नहीं, बल्कि हिन्दी में लिख रहा हूं, तो वो तो मुझे वडा पाव में दबा कर खा जाएं! हालांकि हिन्दी में लिखने का अलग मजा है क्योंकि बहुत से पार्टी सदस्य हिन्दी से घोर नफरत करते हैं, और उनके सामने इस डायरी को लहराने पर भी वे इसकी ओर देखेंगे भी नहीं. वे तो सिर्फ और सिर्फ मराठी देखने-पढ़ने के लिए प्रोग्राम्ड हैं!
हम कहते तो बवाल हो जाता ब्लागरी की आधी दुनिया हमारे पीछे पड़ जाती कि...
क्या जीवन में पैसा ही सब कुछ होना चाहिए? अच्छा करने का जज्बा किसी भी उम्र में पैदा हो सकता है। जिनकी नजर अपनों से आगे देख ही नहीं पाती उन लोगों के लिए ही पैसा सब कुछ हो सकता है। पर.....
कल मैंने सुना घर को, सामने के पार्क से बतियाते, देखो! कौन आया है ?...

ऐसे डान के लिए भी इतनी मीठी सीख ?
ठीक है कि पुरूषार्थ की भूमिका भाग्य से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है लेकिन सिर्फ इतना कह देने भर से भाग्य का महत्व किसी भी तरह से कम नहीं हो जाता |
अपने देश की ही तरह  लगने लगे तो क्या कहा जाए ....?
लोग दुखी हो जाते हैं तो मनाना पड़ता है भाई ....! जाइए यहाँ पर और जानिये यह दर्द.....
वैसे तो ब्राह्मण-वाद  को गाली हम यदा -कदा देते ही रहते हैं पर .....यदि ?
पहले आदमी बदलता है या उसकी मान्यताएं पर .....
जिन्दगी में हैरानियाँ कम नहीं है पर हैरानी इस पर कि ....
एक शिकायत और पर उसका निदान कहाँ क्योंकि ....
यहां पुरुष शादी के बाद महिलाओं का सर नेम तो नहीं रखते पर अधिकतर पति, पत्नियों के साथ उनके घर में रहते हैं और यह गलत नहीं समझा जाता है।
चलते -चलते हमारी तकनीकी दिक्कतों का एक और निदान (छद्म -टिप्पणी कर्ताओं के लिए राम बाण)



चर्चा और उसके प्रारूप को लेकर  प्रारंभिक  झिझक है अपने मन में ( समझ आ रहा है कि चर्चा पढने और करने में कितना अंतर है ?) ...... महीने में एक ही बार चर्चा का मन है सो आगे से कोशिश करूंगा कि महीने  भर के पसंदीदा और महत्वपूर्ण विषयों  को ही पेश  किया जाए | प्राइमरी के मास्टर को दीजिये अब इजाजत !!! और ....



चलते चलते एक जिज्ञासा - बचपन में  हमारे बड़े ताऊ कहा करते थे कि पिता को अपने सबसे बढ़िया यश -प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके संतान  से लगाव होता है  ; जबकि माँ को अपनी सबसे कमजोर संतान से ! शायद इसे सरलीकृत कर के कहा जा सकता है कि ..... "पिता को सबसे बड़ी और माँ को सबसे छोटी संतान अधिक प्यारी होती  है "
क्या कहना चाहेंगे आप?

Post Comment

Post Comment

Google Analytics Alternative