बिजनेस स्टैण्डर्ड में कार्यरत पत्रकार निरुपमा पाठक की ह्त्या/आत्म-ह्त्या के मामले में पिछले अनुभवों की ही तरह जल्दी ही मीडिया ट्रायल किया जा चुका है ....और वह भी इस हद तक कि उसमे बहुत विचार - पुनर्विचार की गुंजाइश नहीं दिखती | पहले आत्म-ह्त्या और फिर ह्त्या की ख़बरों के बाच चर्चा लिखे जाने तक छह सदस्यीय फोरेंसिक दल ने अपनी जांच पूरी कर ली है। अब रिपोर्ट के आने का इंतजार है, जो कि आज सार्वजनिक की जाएगी।
अधिकतर ऐसे मुद्दों पर ब्लॉग जगत में सक्रिय पत्रकार समूहों द्वारा रूटीन प्रतिक्रियाएं आयीं ...कहीं जन-समर्थन जुटाने की कवायद तो कहीं तटस्थ होकर अफ़सोस जताने तक , कहीं वर्णव्यवस्था पर प्रश्नचिन लगाती तो कहीं स्त्री विमर्श के सहारे दैहिक व शारीरिक संबंधों को लेकर नए सवाल खड़े करती | ऐसे मुद्दे पर अचानक चर्चा हेतु तत्पर होने की मुख्य वजहें बनी डा0 कविता वाचक्नवी और गिरिजेश राव की पोस्ट्स के अलावा निरुपमा के पिता का पत्र !
ऐसे समय जब बड़ी आसानी से ऐसी हत्याओं को आनर किलिंग कह के मुद्दे की चीर-फाड़ की जा रही हो उस समय ऐसे पक्षों पर भी नजर डाला जाना चाहिए | कि ....
एक वयस्क सुशिक्षित लड़की एक वैसे ही लड़के से बिना किसी सावधानी के शारीरिक सम्बन्ध बनाती है, गर्भवती होती है और तीन महीने (मतलब कि शिशु को जन्म देने को मानसिक रूप से तैयार) तक मृत्युपर्यंत गर्भ धारण रखती है। क्या उसका अपने माँ बाप के प्रति, जो कि पुराने विचारों के थे और वैसे ही समाज में रहते थे, कोई दायित्त्व नहीं था ?
इन परिस्थितिओं में यदि यह मान लिया जाए कि निरुपमा के गर्भ में कोई संतान ना होती तो क्या उसकी यही नियति होती ? आखिर वही ....
लड़का खुलेआम टेसुए बहाता, हीरो बना घूम रहा है। लड़की के पोस्टमार्टम के समय क्या यह आवश्यक नहीं था कि गर्भ का डी एन ए परीक्षण कराया जाता ताकि लड़के का पिता होना सिद्ध हो सकता और उसको क़ानून के शिकंजे में लिया जा सकता ?
कितनी निरुपमायें अब तक ऐसी ही परिस्थितिओं में ख़बरों में नहीं आयीं ...तो ....
कहीं ऐसा तो नहीं कि सारा बवाल बस इस लिए है कि मरने वाली पत्रकार थी और उसे मारने का पहला कदम लेने वाला ( उसे गर्भवती कर) उसका कथित प्रेमी भी पत्रकार है? कहीं प्रेमी अपने को बचाने के लिए जमात इकठ्ठी कर यह नौटंकी तो नहीं फैला रहा? कहीं ऐसा तो नहीं होगा न कि कल सुबूत मिले कि लड़के ने उसके साथ छिप कर शादी कर ली थी ?
इसी उधेड़बुन में आलस्य-गुरु अपने अन्दर भी झांकते हुए चुनौती देते हैं कि .....
आप में से कितने गिरिजेश अपने नाम से 'राव' हटाने को और अपने बच्चे को भी जाति सूचक उपनामों से मुक्त करने को तैयार हैं? ..मैं गिन रहा हूँ। संख्या बहुत कम है। .. तो भैया बहिनी! आप लोग उपनाम तक हटाने को तैयार नहीं; जाति व्यवस्था पर इतनी हाय तौबा क्यों?
विवाह -पूर्व शारीरिक संबंधों पर प्रहार करते हुए गिरिजेश बड़ा सवाल खडा करते हैं कि ....
कल अगर आप का बच्चा आप से पूछ बैठे तो क्या कहेंगे उसे ? वो जो कुत्ते करते हैं न वही कर रहे हैं - ऐसा कह पाएँगे आप ? ..सेक्स एजूकेसन। ... बच्चे सम्भोग करने के पहले उसकी ज़िम्मेदारी तो समझें...
दुसरे पक्ष को देखें तो एक भावनात्मक प्रश्न यह भी है कि .....
ऐसा कैसे हो सकता है एक उम्र के बाद मां बेटी का रिश्ता दो सहेलियों का सा हो जाता है, जो अपने सुख-दुख एक दूसरे के साथ शेयर करती है। माँ सिर्फ मां न रहकर बेटी की पथ-प्रदर्शक बन जाती है। बेटी की पेशानी में पड़ा एक हल्का सा बल भी मां को विचलित कर देता है और वह जानने को व्याकुल हो उठती है कि बेटी क्यों परेशान है? बेटी की हत्या का विचार मां के मन में कैसे आ सकता है?
मैं क्रांतिकारी नहीं हूं। मैं उससे सबसे पहले पूछती कि ये क्या हाल बना लिया? क्या अपना इतना भी ख्याल नहीं? क्या तुम सचमुच, जानबूझ कर बिन ब्याही मां बनना चाहती हो, ऐसे सामाजिक माहौल में? और मुझे लगता है कि वह इससे इनकार करती कि उसने चाह कर यह हालात अपने लिए बनाए हैं। यह उसकी हिम्मत नहीं, कायरता थी।
एक तो, वह पढ़-लिख कर भी खुद अपने शरीर के बारे में कुछ नहीं जानती। वह चाहती है, पर नहीं जानती कि इसका क्या करे? इस शरीर का सम्मान किस तरह करे। दुनिया भर की खबरें, लेख उसने पढ़े, एडिट किए, पर उसे इतना भी नहीं पता था कि अपने को इस हालत तक पहुंचाने से रोकने के कई तरीके हैं, और सब सहज और जायज है। वह दिल्ली शहर में आर्थिक रूप से आत्म निर्भर, अपने रोज के फैसले खुद करने वाली आज़ाद लड़की थी। और वह उसका प्रेमी भी, जो कि कोई अनपढ़ गंवार नहीं था और उसे इतनी अंतरंगता से जानता था, जो कभी उसकी हालत जान नहीं पाया तो क्या इस आशंका के बारे में सोच कर उसे आगाह भी नहीं कर पाया?
निरुपमा की दुर्घटना को साझे "समाज की मानसिकता का प्रतिफल" के रूप में लिया जाना चाहिए अर्थात् सम्प्रदाय विशेष / जाति विशेष वर्सेज़ स्त्री नहीं अपितु समस्त समाज / सभी सम्प्रदाय वर्सेज स्त्री के रूप में देखा जाना चाहिए। निरुपमा किसी भी सम्प्रदाय (धर्म?) में होती उसके कुँआरे मातृत्व को स्वीकारने की हिम्मत किसी में न होती।
जो लड़की महानगर में अकेली रहती है व प्रतिष्ठित पत्रकारिता से जुड़ी है, अपने पैरों पर खड़ी है, और सबसे बढ़कर जो एक पुरुष के साथ सहवास करने का साहस रखती है ( विशेषकर, उस भारतीय समाज में जहाँ विवाहपूर्व यौन सम्बन्ध मानो भयंकरतम जघन्य अपराध मानता है समाज, तिस पर उसमें इतना साहस भी है कि वह लगभग तीन माह का गर्भ वहन कर रही है ( ध्यान रहे यह वह काल होता है जब गर्भावस्था के बाह्य लक्षण सार्वजनिक रूप में दिखाई देने प्रारम्भ् होने लगते हैं); ऐसी साहसी व निश्शंक लड़की का मात्र माता-पिता के अन्तर्ज़ातीय विवाह के विरोधी होने के डर-मात्र से विवाह न करना कुछ हजम नहीं होता। यदि कोई माता-पिता के डर / दबाव-मात्र से इतना संचालित होता है तो उसका भरे (भारतीय) समाज में विवाहपूर्व गर्भवती होने का साहस करना - ये दो एकदम लग ध्रुव हैं। एक ही लड़की, वह भी बालिग, विवाह करने का साहस न रखे किन्तु सहवास व कुंआरे मातृत्व का साहस रखे, यह क्या कुछ सोचने को विवश नहीं करता ?
एक ऐसे अमानवीय समय में जबकि दो व्यक्तियों की हत्या की भर्त्सना करते हुए पूरे समाज को कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए व स्त्री की सुरक्षा और उसके जीवन के मौलिक अधिकार, मातृत्व के मौलिक अधिकार की बात होनी चाहिए, सामजिक न्यायव्यवस्था की बात होनी चाहिए; वैसे समय में ब्राहमणवाद आदि का नाम लेकर हिन्दुत्व को धिकारने के प्रसंग निकालना मुझे उसी शैतानी पुरुषवाद की चाल दिखाई देता है जो स्त्री को अप्ने प्यार की फाँस में फँसा कर उसे भोग्या और वंचिता दोनों बनाता है। विवाह की जिम्मेदारी से बचता है और छलना करता है, दूसरी ओर भाई और अपना परिवार अपना पौरुष दिखाते हैं।
- हम आर्थिक और विकास के लाख दावों के बावजूद अभी भी बर्बर मानसिकता में जी रहे हैं.
- हमें अभी भी दूसरों की आजादी के अधिकार का सम्मान नहीं आता.
- लोकतान्त्रिक पद्धति से बहुत दूर हैं. यह नहीं जान पाए हैं कि लोकतंत्र जीवन की एक सुविचारित प्रणाली है न कि केवल शासन व्यवस्था.
विचारों की दौड़ कहाँ तक जसकती है कि लोग अब परेशान हैं कि .....
निरुपमा ने क्या नाम सोचा होगा अपनी बेटी के लिए?
उपरोक्त चर्चा में एक दूसरा पक्ष यह भी है कि निरुपमा के गर्भ में पाया जाने वाला अंश केवल निरुपमा का ही था या .....उसकी जवाबदेही किसी और की भी है?
नीरू के शरीर में पल रहा भ्रूण जिस किसी का भी अंश था..मैं उसे नहीं जानता....पर क्या पुरुषों के लिए भी ऐसी ही सज़ा होगी....क्या उस बच्चे में उस पुरुष का अंश नहीं है....या सारी गलती नीरू की ही थी...
ज़ाहिर है अब मैं भावुक हो रहा हूं...और हमारे सभ्य समाज में भावुक केवल सामाजिक प्रतिष्ठा और दकियानूसी नियमों को लेकर हुआ जाता है...मानवीय नीतियों और मूल्यों को लेकर नहीं....ये भी एक नियम ही है.... माफ करना नीरू ! हम तुम्हें बचा नहीं पाए...पर क्या अफसोस करें तुम्हारे जैसी हज़ारों नीरू हम खो चुके हैं...शायद खोते भी रहेंगे....?
हर राह से गुजरते हुए मैं अपने दामन को बचा न सका। किसी भी तौर निकला यही लगा कि इस गुरुतर अपराध में उस लड़की के हत्यारों के साथ ही परोक्ष रूप से बहुत से लोग शामिल हैं। किसी भी एंगल से लिखना चाहा तो बार-बार सवाल उठता रहा कि संविधान के पोथे के सिवा इस देश में ऐसी कौन-कौन सी जगहें हैं जहाँ जातिवाद,सामंतवाद या पितृसत्ता पर्याप्त रूप से कमजोर हुई है....?
यदि निरुपमा कि हत्या उसके माता-पिता ने कि है तो क्या यही कोशिश वह अपने बेटे के लिए करते। जब निरुपमा का भाई अपनी पसंद से कोई लड़की चुनता। उससे शादी करने का फैसला करता तो क्या उसका हश्र भी निरुपमा कि तरह होता?
आदमी को जिंदा रहने के लिए समाज एवं परिवार की आवश्यकता होती है अत: ऐसा काम करने से हमेशा बचना चाहिए जिससे बदनामी मिलती हो. मन बहुत चंचल होता है उसे मजबूती एवं दृढ़ निश्चय से काबू में रखना पड़ता है. आजकल का फिल्मी एवं टीवी का वातावरण जो कि वास्तविक नहीं होता है उससे प्रभावित नहीं होना चाहिए. मां-बाप की गलती का फल आनेवाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ता है, उसे वर्तमान एवं भविष्य में होनेवाले परिवार सभी गालियां देते हैं. भावना में बहकर कोई काम नहीं करना चाहिए. इस पत्र को दोनों आदमी पढ़कर संकल्प ले लो कि गलती सुधार लेंगे और मां-बाप की इच्छा के प्रतिकूल कोई काम नहीं करेंगे. मां-बाप अपने बच्चों की भूल को क्षमा कर देंगे. मां-बाप बेटे बेटियों को अपने से दूर भेजते हैं कि वे हमारे नाम और यश को उज्जवल करेंगे न कि मलीन.
"धर्म" से टकराना स्त्री के लिए कभी आसान नही रहा और यह वह सबसे बड़ी दीवार है जो उसके रास्ते मे खड़ी है।धर्म के ठेकेदार और पितृसत्ता के चौकीदार हाथ मे हाथ मिलाए सत्ता की सीढियाँ चढते हैं और मिल बाँट कर 'धर्म विमुख औरतों' को सबक सिखाते हैं।
निश्चित रूप से यह पत्र एक पिता ने पुत्री को समझाते हुए नही लिखा है , यह एक आहत दर्प वाले पितृसत्ता के मुखिया ने बागी के प्रति दाँत कसमसाते हुए लिखा है, मुट्ठियाँ भींचते हुए ,शब्द चबा-चबा कर लिखा है, गुस्साई रक्तिम आँखों से लिखा है।
उसे मिटाओगे
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे
उसके ही घर की हवा से
उसे वहां से भी मिटाओगे
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर
वहां से भी
मैं जानता हूं
कुलीनता की हिंसा !
(आलोक धन्वा की कविता का अंश)

उसे मिटाओगे
सिरफ़िरे होने पर
बीती रात अमावस की
नये साल में रामजी, इतनी-सी फरियाद, 