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शुक्रवार, फ़रवरी 20, 2009

एक चोखेरचैट चर्चा: समरथ हमदरदी बांचें, बेचारे चरित्‍तरनाशी

शुक्रवार सुबह की शुरूआत ही ऐसे होती है कि नीलिमा से कहते हैं कि छोड़ो आज चाय मैं बनाता हूँ तुम  निश्चिंत होकर चर्चा करो पर न जी वे किसी झांसे में नहीं आतीं फिर फोन करके दूसरी चोखेरबाली सुजाता पर अपने बड़े होने का रौब गांठते हैं पर जो आराम से चर्चाशोषण सह जाए वो काहे की चोखेरबाली, प्रमाण स्‍वरूप पेश है आज सुबह की चैटचर्चा, दूसरी ओर सुजाता हैं तथा चर्चा चैटमई है अत: अनौपचारिक है इसलिए कई नामों के आगे संघी किस्म का 'जी' नही लगा है अत: सर्वश्री की तर्ज पर सर्वजी पहले ही स्‍वीकार करें।

chokher bali is online.
मसिजीवी: अरे वाह तुम कितनी अच्‍छी हो सुबह सुबह चिट्ठा चर्चा करने बैठ गईं
चोखेरबाली: नहीईईईईईईईईईईईईई
                   मै जा रही हूँ
                    ..बाय
                  मै आपको जानती तक नही
                   कौन मसिजीवी?
मसिजीवी: मसिजीवी इज ब्‍लॉक्‍ड
चोखेरबाली: आपके तो बड़े चर्चे हो रहे हैं बाबाओं के बीच
 मसिजीवी जी,अभी अभी आपके प्रोफाईल के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.जिसमे आपने अपने बारे में लिख रखा है कि ठेठ हिंदीवाला पढ़ने पढ़ाने लिखने और सोचने के अलावा कुछ सोचता तक नहीं बन्धुवर नवचिन्तक महोदय्! लगता है कि सोचने का काम आपके लिए नया-नया है, इसलिए आप बहुत जोर लगा कर सोच रहे है और लगातार सोचते ही चले जा रहे है. आप खुद भी नहीं जानते है कि इतना सोच कर आप करेंगे क्या और अपने इन ओजस्वी विचारों को रखेंगे कहां?.
 पंडित जी आपको यह पता नही है क्या कि मसीजीवी चोखेरबाली ब्लाग चलाने वाली सुजाता जी के पति है। सुजाता जी से पूरा ब्लाग जगत थर्र-थर्र काँपता है। अब आप ही सोचे मसिजीवी की क्या हालत होती होगी। इसलिये खुन्नस निकालने वे ब्लाग ब्लाग मे बक-बक करते है।
चोखेरबाली: हाँ
मसिजीवी: जिससे सब थर्राते है
चोखेरबाली: हा हा
मसिजीवी: मैं बेचारा
चोखेरबाली: मै बहुत देर तक हँसती रही
आपने अपनी क्या इमेज बना ली है
कुंठित मन है कितने सारे आजू बाजू
वैसे वह कमेंट बाबाजी का भी मज़ाक ही उड़ा रहा था
मसिजीवी: कुंठित मन अच्‍छा ब्‍लॉग नाम है
चोखेरबाली: बिल्कुल कठपिंगल जैसा
खैर तो  आप आज चर्चा मे क्या लिखोगे ?
मसिजीवी: जो चाहो लिख दो् फुल फ्रीडम है तुम्‍हें...चिंता नहीं
चोखेरबाली: ब बाय :) 
 
मसिजीवी: हॉं साइन आउट करके लिखो नहीं तो लोग डिस्‍टर्ब करते रहते हैं
चोखेरबाली: क्या है ???
मसिजीवी: गुड, सो नाइस आफ यू
ओह एम आई डिस्‍टर्बिंग यू
व्‍हाइल यू आर राइटिंग चर्चा
चोखेरबाली: बाय कह दिया न
मै आपको नहीं जानती
मसिजीवी:गुड हम इस तरह तो चर्चा कर रहे हैं
चोखेरबाली: ये तो बेईमानी है , मै अनूप से बोलूंगी ,हाँ
मसिजीवी:नहीं सही कह रहा हूँ
चोखेरबाली: ह्म्म
मसिजीवी: शुरू तो हो गई चर्चा

आदरणीय कालिया जी
जनवरी संपादकीय में आपने एक ही पत्थर से तीन निशाने साध लिये हैं। मीडियाकर, जीनियस और दाढ़ी वाले। आपने तीनों वर्गों में आपसी रिश्ते को भी उजागर करने की कोशिश की है और ये भी फतवा दे डाला है कि दाढ़ी चाहे जीनियस दिखने की चाह में मीडियाकर रखे या खास दिखने की चाह‍ में जीनियस, मूलत: आलसी होता है।

चोखेरबाली: यह तो कल की बात है
 
मसिजीवी: चर्चा भी तो कल की ही है
तुम चाहो तो ,खोज सकती हो कि कि प्रकृति का षडयंत्र है :))   कि स्‍त्री जीनियस नहीं हो सकती
दाड़ी = जीनियस
स्‍त्री = नो दाढ़ी
स्‍त्री कान्‍ट बी जीनियस
 
चोखेरबाली: हाँ बिलकुल
 
मसिजीवी: हेंस प्रूव्‍ड
अब समझ आया क्‍यों रवींद्र जीनियस हैं पर ममता मीडियोकर
 
चोखेरबाली: जैसे सिरे से सब कह रहे हैं कमेंट्स मे, मोहल्ला पर कि "लड़की तो बहाना है ", न वह जीनियस हो सकती , न ही षडयंत्र करने वाली , न दिमागदार
केवल बदचलन या बेवकूफ या मिडिय़ॉकर
लड़की मानो कोई चीज़ है या कोई है ही नही
 
मसिजीवी: जबकि सभी जीनियस अखबार वाले और चैनल वाले एमएमएस दिखाकर अपने जीनियस होने का प्रमाण दे ही रहे हैं
सवाल उठता है कि क्या ये खबर दिखाना उस लड़की के हित में है ....क्या इस खबर को दिखाना - छापना जरूरी है .....। खबर दिखा भी रहे हैं तो क्या चेहरा छिपाकर भी उस लड़की की तस्वीर दिखाना जरूरी है ....।
है न.. वो मसाला है, पटाखा है और एमएमएस है
वो कंटेंट है, एंकर है जिसे कापीराइटिंग की तमीज नहीं
चोखेरबाली: इस्तेमाल अविनाश करे या मैनेजमेंट , लड़की की बिसात ही कुछ नही यह साबित हो रहा है
मानो कोई प्रोडक्ट हो
मसिजीवी: हॉ तभी तो अविनाश के लिए सहानुभूति बटोरी जा रही है, बटोरी जा पा रही है
चोखेरबाली: अनाम भाई जाने कहाँ कहाँ से आकर
टिप्पणी देने में भी आप पलटी मार मारकर टिप्पणी देते हैं। ये नहीं समझ में आता है कि आप पक्ष में हैं या विपक्ष में। सबसे बड़ी बात तो ये है कि आप जो भी हैं, आपमें पोस्टों को पढ़ने की अद्भुत क्षमता है।
मसिजीवी: विनीत सहानुभूति की दुकान सजा रहे हैं
हद बात करते हैं जी। अविनाश हो चाहे कोई और। किसी के विरोध में बात करना जितना लोकतांत्रिक है उसके प्रति सहानुभूति रखना और जुटाना भी उतना ही है। इसे ऐब के तौर पर क्यों लिया जा रहा है। जिसको मन में आए सहानुभूति जताए औऱ जिसको मन में आए विरोध करे, जब किसी के दर्द से अपनी दुकान सजाने का मन बना ही लिया गया है तो इसमें इतना आगे-पीछे सोचने की जरुरत क्या है। ये अलग बात है कि ये देश हमेशा एकतरफा बातें सुनने का अभ्यस्त रहा है।
चोखेरबाली: ह्म्म
देखा
ह्म्म और सहानुभूति भी समर्थ से ही जताई जाती है
बेचारों से नही
इसका भी हमारा देश अभ्यस्त है
मसिजीवी: बेचारे, उन्‍हें सहानुभूति की क्‍या जरूरत,
बेचारे तो चरित्रहीन होते हैं
चोखेरबाली: जिसके पास शोहरत ,नाम , सम्पादकत्व, दोस्त, लॉबी, पैसा, ब्लॉग है
वह अभिव्यक्त नही कर पा रहा
उसके पास तो मौका ही नही है
इसलिए उसे सहानुभूति की सख्त ज़रूरत है
जैसे गरीब चोर होते है
वैसे बेचारे चरित्रहीन होते है
मसिजीवी: रांची में ब्‍लॉगर सम्‍मेलन हो रहा है, जिसमें ब्‍लॉगिंग का कारण बताएंगे सब
ऐसे ब्लॉगर जो ब्लॉगिंग में नियमित हैं, कम से कम वे सभी अधिकतम ५ मिनट में ब्लॉगिंग से जुड़ने का कारण और अब तक का अनुभव उपस्थित दर्शकों/श्रोताओं से बाँटें।
चोखेरबाली: माने ?
मसिजीवी: सवाल ये है कि असल कारण बताएंगे कि नहीं..मतलब जूतमपैजार।
चोखेरबाली: हा हा
मसिजीवी: पर फिर भी ये सवाल तो बनता ही है कि तुम्‍हारी पालिटिक्‍स क्‍या है कामरेड
चोखेरबाली: ह्म्म दूसरों के लिखे मे टांग अड़ाने का मौका नही छोडते लोग
मसिजीवी: शुएब ने पाकिस्तान के दृश्‍य दिखाए हैं
 
 
टांग अड़ाने की बात तो सही है
हॉं वो तो कल मिश्रजी ने कहा ही कि कहॉं कहॉं टांग अड़ाते हैं लोग मत पूछो
लेकिन देखा जाय तो इलाहाबाद के चतुर्वेदी जी को बेनेफिट ऑफ़ डाउट दे देना चाहिए. आए दिन कितना कुछ तो फटता रहता है. कोई कहाँ-कहाँ टांग घुसाता फिरेगा? चतुर्वेदी जी बेचारे अपनी दो टांगों को कहाँ-कहाँ घुसाते फिरेंगे?
चोखेरबाली: जो भी हो लेकिन क्रांति की बात मत करो
क्रांति आने वाली चीज़ नही
सोचने वाली चीज़ है
मसिजीवी: उन्‍हें पता रखना चाहिए कि स्‍वात कहॉं पड़ता है
क्‍योंकि बहुत दूर नहीं ये पिछवाड़े ही है
चोखेरबाली: न काहू से बैर की नीति ऐसे मे कारगर नही हो सकती
जो फिटेस्ट होगा वह सर्वाइव करेगा
तगड़ी जंग है
चोखेरबाली: उनके साथ होना चाहिए जो अपनी रीड़ सीधी रखते है
जिनके पास रीड़ नही?
मसिजीवी: चलो हो गई चर्चा... नहीं होती तो छ़ट्टी हो जाती... और छुट्टी लेना पाप है
चोखेरबाली: कोर्ट की रीढ है कि नही ?
शायद नही है
मसिजीवी: कोर्ट ... का पता नहीं पर भूतों के पास है वे बुढहा होते हैं पानी में खींच लेते हैं कीचड़ में धांस देते हैं।
चोखेरबाली: प्रशासन की भी नही वर्ना सेबी राजू को पकड़ सकती थी
अब जाऊँ ?
मसिजीवी: ओके बाय
चोखेरबाली: ब बाय
 

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रविवार, अगस्त 05, 2007

रविवारी मूड और चर्चा

रविवार छुट्टी का दिन है ,इसलिए सब मौज-मज़े के मूड में हों तो समझ आता है । पर चर्चा के लिए आज नारद देखा तो हैरानी हुई कि शनिवार को भी लोग संडे वाले मूड में थे [लिखने वाले नही,पढने वाले] लगभग 10-11 चिट्ठे शून्य हिट पर व इतने ही मात्र एक हिट पर थे । रोचक यह था कि ब्लॉगवाणी पर वे ही अनहिट चिट्ठे 14,21,25,31 बार पढे गये ।खैर ,यह क्रम किसी किसी चिट्ठे में उलट भी हो सकता है । स्वाभाविक है । कोई निष्कर्ष निकालना मकसद नही है । सिर्फ इतना भर कि पहले सोचा था कि शून्य और एक हिट वाले चिट्ठों की चरचा करने का विचार था , यह सोच कर कि चर्चा में ही उन्हे स्थान मिल जाए । पर् वे पढे गये हैं ,यह विश्वास होने के बाद पसन्द के चिट्ठे ही है ।
कल के सारे चिट्ठे यहाँ देख सकते हैं ।

भ्रूण हत्या पर एक सम्वेदनशील प्रस्तुति तस्वीर की आवाज़ में विपुल जैन द्वारा
।एक दिल दहलाने वाला चित्र ।




भारत में यौन शिक्षा पर एक स्वस्थ चर्चा ज़रूरी है । इस विषय पर विचार करते हुए शास्त्री जे सी फिलिप् निम्न निष्कर्ष पर पहुँचे हैं

यौन-शिक्षा पूरी तरह से असफल एक पश्चिमी अवधारणा है जिसने पश्चिम को बर्बाद कर दिया है अत: इसकी जरूरत हिन्दुस्तान को नहीं है ।
अंग्रेज़ी हिन्दी के बीच उत्पन्न वैमनस्य की दीवारें काल्पनिक है या वास्तविक यह सोव्हा जाए पर साथ ही ध्यान रखा जाए कि कमसे कम ब्लॉग जगत पर यह सह-अस्तित्व में दिखाई दें ।रचना जी की टिप्पणी-हिंदी को आगे लाए जाने के लिये इंग्लिश का बहिष्कार ना करके उसका उपयोग करें तो ज़्यादा बेहतर होगा-को उद्धृत करते हुए मसिजीवी विचार करते हैं-----

चिट्ठाकारी में इसकी शायद कोई जरूरत ही नहीं, क्‍योंकि यहॉं अंग्रेजी विरोध
कोई स्‍वाभाविक बीमारी की तरह लोगों के मन में जमा नहीं बैठा है, कम से कम उस तरह
तो नहीं ही जैसा कि अंग्रेजी के चिट्ठाकारों में इस 'फिल्‍थी' हिंदी जमात के लिए
रहा है। *** दरअसल प्रिंट या विश्‍वविद्यालयी दुनिया में जो भी हो पर अंतर्जाल की
दुनिया में हिंदी के लोग अंग्रेजी भाषा के प्रति दुराग्रह से पीडि़त नहीं है या कम
पीडित हैं इसलिए आपकी नेकनीयती सरमाथे पर कुछ सलाहें अंग्रेजी वालों को भी
दें।


लेकिन शासक और शासित की भाषा वाला फंडा भी है जो कई मनों में पैठा है ।भाषा और सत्ता के गहरे सम्बन्धों को हम भाषा की संरचना में ही देख सकते हैं । हाँ एक बडा पहलू यह भी है।भाषा भाव से नही शक्ति से चलती है । अनामदास अंग्रेज़ी के कुचक्र में फँसी हिन्दी के विषय् पर सवाल उठा रहे है और जवाब भी तलब कर रहे हैं-

कुचक्र है कि क्रयशक्ति बिना अँगरेज़ी के सिर्फ़ गुंडागर्दी से आती है. यह कुचक्र
कब और कैसे टूट सकता है इसके बारे कुछ सोचिए, बोलिए और बताइए

आप विचार करते हुए संडे के खाली वक़्त को सार्थक कीजिए और चूरमा के स्वादिष्ट लड्डू भी खाइए ,बशर्ते कि आपको उन्हे बनाने से भी परहेज़ न हो

और हाँ आज मै चिट्ठाचर्चा क्योँ ? तो यह जुर्माना है नीलिमा जी और मसिजीवी के यहाँ सप्ताहांत मनाने के लिए आने का :)

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