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शनिवार, जुलाई 25, 2009

गंगूबाई हंगल : क्या शास्त्रीय गायिकाओं को पंडित या उस्ताद के समकक्ष पदवियों से पुकारे जाने का हक़ नहीं ?

शास्त्रीय संगीत जगत की जानी मानी गायिका गंगूबाई हंगल नहीं रहीं। अधिकांश शास्त्रीय संगीत समीक्षक इस बात पर एक मत हैं कि छोटे कद काठी और व्यवहार में सीधा सपाट व्यक्तित्व रखने वाली किराना घराने की इस गायिका की आवाज़ में एक अलग तरह की गहराई और दम था जिसे सुधी श्रोता कई वर्षों तक याद करेंगे।

हाल ही में उनके बारे में हिंदू अखबार में एक लेख पढ़ रहा था जिसे शास्त्रीय गायिका शन्नो खुराना ने लिखा है। शन्नो लिखती हैं कि गंगूबाई को इस बात का मलाल रहा कि स्वतंत्रता के पश्चात भी महिला शास्त्रीय गायकों के लिए अभी तक सम्मान सूचक उपाधियाँ जैसे पंडित , उस्ताद आदि के सामानांतर कोई पदवी नहीं बनी है जिसे उनके नाम के साथ लिया जा सके।

गंगूबाई का प्रश्न वाज़िब है और संगीत के मठाधीशों को इस बारे में गहन चिंतन की आवश्यकता है कि इस स्थिति में बदलाव क्यूँ नहीं आ रहा?


वैसे गंगूबाई का नाम गंगूबाई की क्यूँ पड़ा इसके पीछे भी एक कहानी है। उनका वास्तविक नाम गान्धारी था पर उनके संगीत को जनता के सामने पहुँचाने का जिम्मा जिस कंपनी ने पहले पहल लिया उसके अधिकारियों का मानना था कि उस ज़माने का श्रोता वर्ग सिर्फ नाचने गाने वाली बाइयों के ही रिकार्ड खरीदता है। इसीलिए उन्होंने गान्धारी हंगल जैसे प्यारे नाम को बदल कर चलताऊ गंगूबाई हंगल कर दिया।

चिट्ठाजगत में भी गंगूबाई हंगल पर कई लेख लिखे गए पर एक जिद्दी धुन पर असद ज़ैदी का ये आलेख मुझे उनके व्यक्तित्व के ज्यादा करीब ले जा पाया। असद ज़ैदी उनके बारे में कहते हैं।

सवाई गन्धर्व की इस किस्मतवाली शिष्या ने अब्दुल करीम खां, भास्करराव बाखले, अल्लादिया खां, फैयाज़ खां को चलते फिरते देखा और गाते हुए सुना था. उन्होंने बचपन और जवानी के आरंभिक दौर में घोर ग़रीबी, सामाजिक अपमान और भूख का सामना किया. किसी कार्यक्रम में उस्ताद अब्दुल करीम खां ने उनका गाना सुना, उनका हुलिया अच्छी तरह देखा, फिर पास बुलाकर उनके सर पर हाथ फेरकर बोले: "बेटी, खूब खाना और खूब गाना!" बालिका गंगूबाई सिमटी हुई सोच रही थी : गाना तो घर में खूब है, पर खाना कहाँ है!


वहीं राधिका बुधकर जी ने भी उनकी गाई कुछ रिकार्डिंग्स का यहाँ एक संकलन पेश किया। वैसे शास्त्रीयता के रंग में कई सांगीतिक चिट्ठे इस महिने डूबे रहे। भाई संजय पटेल ने तो हमारी मुलाकात ऍसे साधक से करवा दी जो कमाल का गायक भी है। इनके बारे में संजय जी लिखते हैं..

आसमान में बादल छाए हैं.आइये गोस्वामी गोकुलोत्सवजी के स्वर में सुनें राग मियाँ मल्हार. बंदिश उनकी स्वरचित है. यह गायकी उस रस का आस्वादन करवाती है जो किसी और लोक से आई लगती है और जब कानों में पड़ती है तो उसके बाद कुछ और सुनने को जी नहीं करता.

वैसे शास्त्रीय संगीत या फिर शास्त्रीय रंगत में रंगे कुछ फिल्मी गीत सुनना चाहें तो इन लिंकों का रुख करें ...

शास्त्रीय संगीत से चलें पुराने गीतों के आंगन में। इस महिने हिंदी चिट्ठा जगत ने संगीतकार मदन मोहन, रौशन और गायिका गीता दत्त को शिद्दत से याद किया। गुजरे ज़माने की मशहूर गायिका गीता दत्त की पुण्यतिथि पर दिलीप जी ने उनके गीतों द्वारा श्रृद्धांजलि देते हुए कहा..

गीता दत्त , या गीता रॊय… एक अधूरी सी कविता , या बीच में रुक गयी फ़िल्म , जो अपने मंज़िल तक नहीं पहुंच पायी. क्या क्या बेहतरीन गीत गाये थे .. दर्द भरे भाव, संवेदना भरे स्वर को अपनी मखमली मदहोश करने वाली आवाज़ के ज़रिये.

गीता दत्त रॉय, पहले प्रेमिका, बाद में पत्नी.सुख और दुःख की साथी और प्रणेता ..अशांत, अधूरे कलाकार गुरुदत्त की हमसफ़र..

आवाज़ पर सुजॉय चटर्जी ने फिर कुछ सदाबहार पुराने नग्मे सुनाए और उनसे जुड़ी जानकारियाँ बाँटी। पर उनके चुने गए गीतों में मुझे सबसे ज्यादा पसंद आया मुकेश का गाया जब गमे इश्क़ सताता है तो हँस लेता हूँ.....। इस गीत के कम चर्चित गीतकार न्याय शर्मा के बारे में सुजॉय लिखते हैं..
जयदेव की धुन और संगीत संयोजन उत्तम है, मुकेश के दर्द भरे अंदाज़ के तो क्या कहने, लेकिन उससे भी ज़्यादा असरदार हैं शायर न्याय शर्मा के लिखे बोल जो ज़हन में देर तक रह जाते हैं। ऐसे और न जाने कितने फ़िल्मी और ग़ैर फ़िल्मी गीतों और ग़ज़लों को अपने ख़यालों की वादियों से सुननेवालों के दिलों तक पहुँचाने का नेक काम किया है न्याय शर्मा ने।

पुराने गीतों का शौक है तो इन लिकों पर भी नज़र डालिए


ऍसा नहीं कि नई रचनाएँ असर नहीं डाल रहीं। इस बार नए गीतों में मेरी पसंद के इन दो गीतों को सुनना ना भूलिए

  • पहली आवाज़ पर गुलज़ार का अपने ही दिल को धिक्कारता ये कमीना गीत
  • और दूसरे एक शाम मेरे नाम पर राहत फतेह अली खाँ का गाया प्रेम की चाशनी में डूबा सूफ़ियाना नग्मा हाल-ए-दिल. और हाँ इन दोनों ही गीतों के संगीतकार हैं विशाल भारद्वाज

लोकवाद्य में अगर आपकी रुचि है तो झारखंड के वाद्य यंत्रों के बारे में प्रीतिमा वत्स का ये आलेख बेहद ज्ञानप्रद रहेगा।


तो ये थी इस महिने हिंदी चिट्ठा जगत पर प्रस्तुत गीत संगीत की यात्रा। तो अब चलते चलते कुछ शेर-ओ-शायरी भी हो जाए। मोहब्बतों के शायर क़तील शिफाई जिनकी पुण्य तिथि इसी ग्यारह जुलाई को थी, की एक ग़ज़ल के चंद शेर देश के आज के हालातों को बड़े करीब से छूते हैं। मिसाल के तौर पर रहर दाल की आसमान छूती कीमतों पर उनका ये शेर याद आता है..

हौसला किसमें है युसुफ़ की ख़रीदारी का
अब तो मँहगाई के चर्चे है ज़ुलैख़ाओं में

(जनाब यूसुफ़ हजरत याकूब के पुत्र थे जो परम सुंदर थे और जिन्हें उनके भाइयों ने ईर्ष्यावश बेच दिया था। आगे चल कर इन पर मिश्र की रानी जुलैख़ा आसक्त हो गईं थीं और वे मिश्र के राजा बन गए। )

तमाम भविष्यवक्ता इस साल भी ठीक ठाक मानसून की घोषणा कर रहे थे। अब पाते हैं कि कहीं अकाल है तो कहीं बाढ़ ऍसे में देश का आम किसान तो यही कहेगा ना

जिस बरहमन ने कहा है के ये साल अच्छा है
उस को दफ़्नाओ मेरे हाथ की रेखाओं में

क़तील की आवाज़ में ये पूरी ग़ज़ल आप यहाँ सुन सकते हैं।

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शनिवार, जून 27, 2009

क्यूँ हमारी संगीत प्रेमी जनता महरूम है एक उत्कृष्ट संगीत चैनल से ?

टीवी पर संगीत का कोई उत्कृष्ट चैनल क्यूँ नहीं आता जिस पर सारी संगीत विधाओं को समेटने और सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रसारित करने की काबिलियत हो ? रेडिओ वाले ऍसा क्यूँ ऐसा सोचते हैं कि हिट गानों की फेरहिस्त को दिन में दस बार बजा कर वो आम श्रोताओं के दिल में बस जाएँगे।

दरअसल फिल्म संगीत (वो भी नए) के आलावा संगीत की किसी भी अन्य विधा को रुचिकर ढंग से आम जनता तक पहुँचाने की कोशिश निजी स्तर का कोई रेडिओ और टीवी चैनल कर ही नहीं रहा है और ना ही भविष्य में ऍसी कोई योजना आ रही है। ये भारत की संगीतप्रेमी जनता के साथ बहुत बड़ा अन्याय है। रेडिओ तो फ्री है पर केबल टीवी के लिए तो हम सभी इन चैनलों के लिए मासिक रूप से किराया दे रहे हैं पर ये चैनल हमारी आज की पीढ़ी को हमारी विविधतापूर्ण सांगीतिक विरासत तक पहुँचने और उसका आनंद उठाने से ही वंचित कर दे रहे हैं।

ये सिर्फ एक व्यवसायिक मामला है ऐसा भी नहीं लगता। अगर समाचार चैनलों में NDTV व्यवसायिक मजबूरियों के बावजूद भी अपना एक अलग स्थान बना सकता है तो फिर इसी तरह की पहचान बनाने में हमारे संगीत के टीवी चैनल और निजी एफ एम चैनल इतने पीछे क्यूँ हैं? ये एक ऐसा प्रश्न है जो मुझे वर्षों से कचोट रहा है। हाल ही में चंदन दास पर श्रृंखला करते समय उनको भी इसी विचार को प्रतिध्वनित करते पाया तो लगा कि ये बात चिट्ठा चर्चा के पाठकों के सामने भी रखनी चाहिए। आप सब इस बारे में क्या सोचते हैं इससे अवगत जरूर कराइएगा।

तो इस बार के चिट्ठा चर्चा की शुरुआत करते हैं साहित्य शिल्पी पर अजय यादव द्वारा कैफ़ी आज़मी पर लिखे गए लेख से। इस लेख में अजय ने क़ैफी आज़मी से जुड़ी कुछ बातों के साथ उनकी एक बेहतरीन नज़्म और उनके लिखे कुछ गीत भी पेश किए हैं। अजय लिखते हैं

१० मई, २००२ में उनकी मृत्यु के बाद उनकी बेटी शबाना आज़मी (यहाँ मुझे शबाना जी से जुड़ी एक बात याद आ गई. शबाना का जब जन्म हुआ, उस समय क़ैफ़ी साहब ज़ेल में थे और कम्युनिस्ट पार्टी नहीं चाहती थी कि ऐसी हालत में शौकत किसी बच्चे को जन्म दें. पार्टी की ओर से बाकायदा शौक़त को इस वाबत आदेश भी मिला था मगर ये उनकी ज़िद ही थी कि शबाना का जन्म हुआ और दुनिया को अदाकारी का एक अनमोल नगीना मिला.) ने अपने पति ज़ावेद अख्तर के साथ मिलकर श्रीमती शौक़त क़ैफ़ी के संस्मरणों 'यादों की रहगुज़र' पर आधारित एक नाटक 'क़ैफ़ी और मैं' का मंचन सन २००६ में देश व विदेश के कई स्थानों पर किया.
और इस बेहतरीन नज़्म की ये पंक्तियाँ देखें

एक दो भी नहीं छब्बीस दिये
एक इक करके जलाये मैंने
इक दिया नाम का खुशहाली के
उस के जलते ही यह मालूम हुआ
कितनी बदहाली है
पेट खाली है मिरा, ज़ेब मेरी खाली है
........................................................
दूर से बीवी ने झल्ला के कहा
तेल महँगा भी है, मिलता भी नहीं
क्यों दिये इतने जला रक्खे हैं
अपने घर में झरोखा न मुन्डेर
ताक़ सपनों के सजा रक्खे हैं
आया गुस्से का इक ऐसा झोंका
बुझ गये सारे दिये-

हाँ मगर एक दिया, नाम है जिसका उम्मीद
झिलमिलाता ही चला जाता है


भई वाह दिल में उतर गई ये नज़्म । नज़्म पूरी पढ़ने के लिए और गीतों को सुने यहाँ पर

हरकोना वाले रवींद्र व्यास कबाड़खाना पर मिलवा रहे हैं एक नए गायक पुष्कर लेले से, जहाँ उनकी बातचीत का विषय आज का भारतीय संगीत है। स्लमडॉग मिलयनर के संगीत के बारे में ईमानदारी से अपनी राय देते हुए पुष्कर लेले कहते हैं

स्लमडॉग मिलिनियेर का संगीत रिदम बेस्ड है। उसमें रिदम ज्यादा है, मेलड़ी कम है। इस फिल्म के लिए उन्हें ऑस्कर मिला लेकिन इसका संगीत मुझे इतना पसंद नहीं। ऑस्कर के अपने अलग मापदंड होते हैं। मुझे उनका पहले का संगीत स्लमडॉग से कई गुना बेहतर लगता है। जब से रहमान को इंटरनेशनल एक्सपोजर मिला है, उनका संगीत मेलडी से रिदम की तरफ झुका है।
ए आर रहमान के संगीत के बारे में आम संगीतप्रेमी भी यही राय रखता है। रवींद्र जी अगर आप इस पोस्ट में लेले द्वारा गाया हुआ कोई भी टुकड़ा सुनवा देते तो इस कलाकार की प्रतिभा हम तक और अच्छी तरह पहुँच पाती।

और जब आज के संगीत की बात चली है तो फिर क्यूँ ना कुछ नए एलबमों की बात की जाए। सजीव सारथी आवाज़ पर कैलाश खेर के एक नए एलबम चंदन का भीगा भीगा सा गीत सुनवा रहे हैं। सजीव लिखते हैं

दो सालों में बहुत कुछ बदल गया. कैलाश आज एक ब्रांड है हिन्दुस्तानी सूफी संगीत में, और अब वो विवाहित भी हो चुके हैं तो जाहिर है जिंदगी के बदलते आयामों के साथ साथ संगीत का रंग भी बदलेगा. एल्बम में जितने भी नए गाने हैं उनमें सूफी अंदाज़ कुछ नर्म पड़ा है, लगता है जैसे अब कैलाश नुसरत साहब के प्रभाव से हटकर अपनी खुद की ज़मीन तलाश रहे हैं ।
अब मानसून तो समय पर आया नहीं क्यूँ न हम और आप अपनेआप को कैलाश खेर की स्वरलहरियों से भिंगा लें..

तीखी तीखी सी नुकीली सी बूँदें,
बहके बहके से बादल उनिन्दें.
गीत गाती हवा में,
गुनगुनाती घटा में,
भीग गया मेरा मन...
चमके चमके ये झरनों के धारे,
तन पे मलमल सी पड़ती फुहारें,
पेड़ हैं मनचले से,
पत्ते हैं चुलबुले से,
भीग गया मेरा मन....


आज की बातें तो खूब हुई अब कुछ अतीत की तह भी तो टटोलें जनाब ! खेती बाड़ी वाले अशोक पांडे जी वाद्य यंत्र के इतिहास को ३५००० वर्ष पीछे ले गए हैं। उनकी संकलित ख़बर के अनुसार

जर्मनी में खोजकर्ताओं ने लगभग 35 हज़ार साल पुरानी बांसुरी खोज निकाली है और कहा जा रहा है कि यह दुनिया का अब तक प्राप्‍त प्राचीनतम संगीत-यंत्र है। प्रस्‍तर उपकरणों से गिद्ध की हड्डी को तराश कर बनायी गयी इस बांसुरी को दक्षिणी जर्मनी में होल फेल्स की गुफ़ाओं से निकाला गया है।
चलिए वापस आते हैं ३५००० साल पहले से करीब ४५ साल पहले के बेमिसाल प्रेम और बेवफाई से ओतप्रोत, फिल्म भीगी रात के गीत पर जिसके संगीतकार थे प्रतिभावान रौशन। इस फिल्म में था एक प्यारा सा नग्मा दिल जो ना कह सका वही राज ए दिल कहने की रात आई.. जिसे आवाज़ दी थी रफ़ी और लता जी ने दो अलग अंदाजों में
इन गीतों को सुनकर मेरे मन में तो ये खयालात उठे...

गीतकार साहिर लुधियानवी ने प्रेमिका की बेवफाई टूटे नायक के दिल में उठते मनोभावों को गीत के अलग अंतरों में व्यक्त किया हैं। नायक की दिल की पीड़ा को कभी तंज़, कभी उपहास तो कभी गहरी निराशा के स्वरों में गूँजती है और इस गूँज को मोहम्मद रफ़ी अपनी आवाज़ में इस तरह उतारते हैं कि गीत खत्म होने तक नायक का दर्द आपका हो जाता है। रफ़ी साहब का गाया गीत एक ऊंचा टेम्पो लिए हुए था वहीं मीना कुमारी पर फिल्माया ये गीत उस शांत नदी की धारा की तरह है जिसके हर सिरे से सिर्फ और सिर्फ रूमानियत का प्रवाह होता है। लता इस गीत में अपनी मीठी आवाज़ से प्रेम में आसक्त नायिका के कथ्यों में मिसरी घोलती नज़र आती हैं।
शायद आपको भी ये गीत रूमानियत से भर दें। सुन कर देखिए और बताइए।

और चलते चलते इन्हें भी एक बार सुनना ना भूलें

और जैसा कि आप सब को विदित है मशहूर पॉप गायक और स्टेज शो पर अपने मशीनी नृत्य से अचंभित करने वाले माइकल जैक्सन का गुरुवार देर रात दिल का दौरा पड़ने के कारण मात्र ५१ वर्ष की आयु में निधन हो गया। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।

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शनिवार, मई 23, 2009

किन अर्थों में भिन्न है गीत संगीत से जुड़ी ब्लागिंग ?

संगीत पेश करने वाले चिट्ठे तरह तरह के हैं। कहीं गीत सिर्फ सुना दिये जाते हैं, कभी साथ में गीत के बोल भी दिये जाते हैं, तो कहीं दिलचस्प जानकारियाँ भी होती हैं। पर ये सारी बातें तो किसी संगीत से जुड़ी वेब साइट पर भी मिल जाती हैं। तो फिर क्या नए आयाम तलाशती है संगीत से जुड़ी चिट्ठाकारी?

मेरे ख्याल से गीत संगीत पर आधारित चिट्ठे की असली पहचान ये है कि संगीत को पेश करने वाला कैसे उनसे अपने जुड़ाव को स्थापित करता है। ये जुड़ाव उस गीत से जुड़े उसके निजी अनुभव हो सकते हैं या फिर इससे भी अच्छा तो तब होता है जब ब्लॉगर खुद अपनी आवाज़ में गुनगुना देता है। खैर ये तो मेरे अपने विचार हैं आप क्या सोचते हैं इस बारे में ये भी बताइएगा. तो इस बार की संगीत चर्चा की शुरुआत ऍसी ही कुछ पोस्ट्स से... ......

झारखंड का आकाश मेघों से आच्छादित है। दोपहर इससे पहले अपने शबाब पर आए उससे पहले ही मेघों की सेना सूरज की किरणों को परे ढकेल देती है और उनके गर्जन और कौंधती बिजली के बीच मौसम ठंडा हो जाता है। ऍसी हालत कवि मन पर क्या असर करती है ये पारुल की इन पंक्तियों में देखिए

इस बरसती साँझ में सावलि निशा का आगमन
रोक लो ये पल विकल मन, बावरे से हैं नयन

उन ढ़लानो से उतरना, बूँद में बूँदों का घुलना
लख रहे हम दूर बैठे,एक धारा का जनम

कविता की गेयता एक गीत की तुलना में काफी कठिन होती है पर पारुल ने अपने मधुर स्वर में अच्छी तरह निभाया है इसे इस पॉडकॉस्ट में।

दिलीप कवठेकर तलत महमूद के बहुत बड़े प्रशंसक हैं और अपनी हाल की पोस्ट में उनकी याद करते हुए कहते हैं


जब भी तलत मेहमूद ये नाम हमारे ज़ेहन में आता है, तो हमारे यादों की खिडकियों पर दस्तक देती हैं उनकी मखमली आवाज़ के मोरपंखी एहसासात । हमारा प्यासा मन खुद ब खुद, सुरों की इन हसीन वादियों से टकरा कर गूंजते हुए दर्द भरे नगमों के समंदर में डूब जाता है।
और इस बार दिलीप ऍसे डूबे हैं कि खुद उन्होंने अपनी आवाज़ में एक गीत सुनाया है तेरे आँख के आँसू पी जाऊँ.. जिसे सुनना मेरे लिए एक सुखद अनुभव रहा
यक़ीनन आपके लिए भी रहेगा...।

दरअसल हर संगीत प्रेमी के पीछे एक गायक छुपा होता है। ऍसी हालत में जब कोई गीत दिल से छूता है तो आप उसे घंटों गुनगुनाते हैं और मन एकदम से खुशनुमा हो जाता है।

पुरानी ग़ज़लों की रिकार्डिंग से गुजरते हुए मुझे कई पुराने ग़ज़ल गायकों की वो अनमोल कृतियाँ मिलीं जो एक समय इतनी मशहूर हुईं थीं कि हर जगह वही सुनाई देती थीं। इसलिए काफी खोज बीन के बाद मुझे जब नेट पर मुझे राजेंद्र मेहता और नीना मेहता का गाया गीत तुम मुझसे मिलने शमा जलाकर ताजमहल में आ जाना.. मिला था तो वो आपको सुनाया था। पिछले हफ्ते क़तील शिफ़ाई की एक बड़ी प्यारी ग़ज़ल हाथ लगी जिसे महदी हसन के शागिर्द रहे राज कुमार रिज़वी ने अपनी मखमली आवाज़ में इस तरह से इसे अपना स्वर दिया है कि एक बार सुनने के बाद कुछ दिनों तक जुबां से ये ग़ज़ल जाती नहीं
सुनने के पहले क़तील के इन अशआरों की बानगी लीजिए

तूने ये फूल जो जुल्फ़ों में सजा रखा है
इक दीया है जो अँधेरों में जला रखा है

इम्तिहान और मेरे ज़ब्त का तुम क्या लोगे
मैंने धड़कन को भी सीने में छुपा रखा है।


इस प्यारी ग़ज़ल को यहाँ सुन सकते हैं।

क़तील के बाद बात चचा ग़ालिब की। जिन्हें ग़ालिब बहुत भाते हैं उन्होंने जगजीत की आवाज़ और गुलज़ार की कमेंट्री वाली मिर्जा ग़ालिब की कैसेट जरूर याद होगी। इसी एलबम से एक मोती चुन कर लाए हैं यूनुस भाई। कोई दिनगर जिंदगानी और है... विनोद सहगल की दिलकश आवाज़ में। विनोद ऍसे कलाकारों में हैं जिन्हें अपनी क्षमता के अनुरूप काम नहीं मिला। यूनुस ने अपनी पोस्ट में इस ग़जल के साथ में गुलज़ार की आवाज़ में ग़ालिब के इस परिचय को भी पेश किया है।

बल्‍लीमारान के मुहल्‍ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियां
सामने टाल के नुक्‍कड़ पे बटेरों के वो क़शीदे
गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वाह
चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के परदे
एक बकरी के मिमियाने की आवाज़
और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अंधेरे,
ऐसे दीवारों से मुंह जोड़के चलते हैं यहां
चूड़ीवालान के कटरे की बड़ी बी जैसे,
अपनी बुझती हुई आंखों से दरवाज़े टटोलें
इसी बेनूर अंधेरी सी गली-क़ासिम से
एक तरतीब चराग़ों की शुरू होती है
एक क़ुराने सुख़न का सफा खुलता है
असद उल्‍ला ख़ां ग़ालिब का पता मिलता है


हिन्द युग्म पर इस हफ्ते पुराने गानों की श्रृंखला तो है ही और ग़ज़लों के साथ गोपाल दास नीरज का लिखा और अब्बास रज़ा अल्वी का स्वरब्द्ध गीत भी है जो बचपन की याद दिला रहा है।

फिर मिलेंगे चलते चलते : इन्हें भी एक बार देखना ना भूलिए
ग़ज़ल सुनीं, गीत सुने तो अब ये कव्वाली भी सुन लीजिए
किन हालातों में इकबाल बानो ने गाया था हम देखेंगे...?
अपने अधूरे सपनों का अर्थ ढूँढिए यहाँ !
नुसरत तो उनकी धुन में जी रहे हैं और आप ?
जब ली इंदीवर ने दार्शनिकता की अद्भुत उड़ान !
देशभक्ति का जज़्बा बना रहे !

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शनिवार, अप्रैल 25, 2009

सांगीतिक चुनावी चिट्ठा चर्चा : सब ताज उछाले जाएंगे सब तख्त गिराए जाएंगे

तकरीबन महिने भर बाद आप सबसे इस मंच पर मुलाकात हो रही है। पिछली बार माहौल था होली का और अब इन झुलसाती गर्मियों मे चुनावी हवाएँ जोर मार रही हैं तो फिर इस बार की इस सागीतिक चर्चा का रंग चुनावी क्यूँ ना हो। आम भारतीय की प्रवृति गाने गुनगुनाने और बात बात पर जुमले बनाने की रही है फिर चुनाव का मौसम भला इनसे अछूता कैसे रह जाए। अगर ये बात नहीं होती तो जन जनार्दन को लुभाने के लिए कांग्रेस पार्टी जय हो .. जैसे गीतों का सहारा नहीं ले रही होती और उस विज्ञापन के तुरंत बाद बाद आप भाजपा की पैरोडी भय हो.. नहीं सुन रहे होते। खैर, इन गीतों और जुमलों से वोटिंग ट्रेंड पर क्या प्रभाव पड़ता है ये तो पता नहीं पर चुनाव में चुनावी माहौल पैदा करने में ये जरूर सफ़ल होते हैं।

माँ बताती है कि जब वो कॉलेज में थीं तो नारायण दत्त तिवारी के पक्ष में कुछ इस तरह के नारे लगा करते थे

नर है ना नारी है , नारायण दत्त तिवारी है

अब आज के युग में कोई ऍसा नारा लगाए तो पता नहीं रासुका के आलावा क्या क्या लग जाए :)। तो इससे पहले कि मैं इस सांगीतिक चुनावी चिट्ठा चर्चा को आगे बढ़ाऊँ चुनावी जुमलों से जुड़े एक किस्से को आप के साथ जरूर बाँटना चाहूँगा जिसे हाल ही में मैंने एक पुस्तक में पढ़ा था। बात १९७७ के चुनावों की है जहाँ पर एक क्षेत्र के उम्मीदवार थे कोई रामदेव। कहते हैं कि वोटरों को उनसे शिकायत थी की नसबंदियों की ज्यादतियों के दौरान उन्होंने जनता की कोई मदद नहीं की। बस फिर क्या था लोगों ने बना दिया जुमला

जब कट रहे थे कामदेव, तब तुम कहाँ थे रामदेव !

तो आइए इस हफ्ते चिट्ठाजगत में पेश किए गए कुछ गीतों को इस चुनावी माहौल में एक वोटर की नज़र से देखें। सबसे पहले चलें पुराने गीतों की इस महफिल में जहाँ सागर नाहर आशा ताई की आवाज में मीराबाई का ये मधुर भजन सुना रहे हैं

फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥
बिन करताल पखावज बाजै अनहद की झंकार
बिन सुर राग छतीसूं गावै रोम रोम रणकार रे॥

पर भाई अगर मीराबाई आज हमारे बीच होतीं तो टीवी चैनलों में चल रहे विज्ञापनों की तरह वोटरों को यही संदेश देतीं।

चुनावन के दिन चार वोट दे दे मना रे
बिना काज के नेता बाँचें वादों की झंकार॥
चुनावन के दिन चार वोट दे दे मना रे


अफ़लू भाई तो ठहरे फुल टाइम चुनावी कार्यकर्ता तो आगाज़ पर चुनावी गीत तो बजना ही है। सो वो उम्मीदवारों के स्वागत में आँधी फिल्म का गीत लेकर आए हैं।
सलाम कीजिए .. जनाब आए हैं

हिंदी युग्म ने इस हफ्ते हमें पुराने गीत भी सुनाए, शक्ति सामंत की फिल्मों के गीतों की चर्चा भी की पर मुझे सबसे ज्यादा लुत्फ दिया विश्व दीपक तनहा के गुलज़ार पर लिखे लेख ने।

अब गुलज़ार की इन पंक्तियों को लोकतंत्र के परिपेक्ष्य में देखें तो हर पाँच सालों बाद हमारा ये आम वोटर आशाओं के भँवर में डूबते उतराते हुए भी अपने मताधिकार का प्रयोग करता है। कितनी बार उसकी आशाओं पर तुषारपात होता है पर तरह तरह की बाधाओं को पार कर वो फिर पहुँचता है अपना वोट देने। इन हालातों में गुलज़ार यूँ भी कहते तो गलत नहीं होता ना..

वोटर बुलबुला है पानी का
और पानी की बहती सतह पर टूटता भी है, डूबता भी है,
फिर उभरता है, फिर से बहता है,
न समंदर निगला सका इसको, न तवारीख़ तोड़ पाई है,
वक्त की मौज पर सदा बहता - वोटर बुलबुला है पानी का।


पिछले हफ्ते राँची में पीनाज़ मसानी का आगमन हुआ तो मैं भी जा पहुँचे उनका कार्यक्रम सुनने। पर ग़ज़लों की रंगत की जगह सिर्फ फिल्मी गीतों का तड़का मिला। हार कर श्रोताओं को ही बोलना पड़ गया कि अब कुछ ग़ज़लें भी सुना दीजिए। फिर आज जाने की जिद ना करो से लेकर यूँ उनकी बज़्म ए खामोशियाँ सुनने को मिलीं। पीनाज़ की गाई इस ग़ज़ल कहाँ थे रात को हमसे ज़रा निगाह मिले को अगर आज के नेताओं से पूछे जाने वाले प्रश्न में बदलें तो मतला कुछ ऍसा नहीं होगा क्या...

कहाँ थे आज तक हमसे जरा निगाह मिले
अब तक की कारगुजारियों का कोई तो हिसाब मिले


इस सांगीतिक चुनावी चर्चा को अंत करने से पहले विख्यात ग़ज़ल गायिका इकबाल बानों के देहांत पर विनम्र श्रृद्धांजलि। इस सिलसिले में हिंद युग्म, इरफान भाई और कबाड़खाना पर फ़ैज की लिखी और उनकी गाई मशहूर नज़्म हम देखेंगे,लाजिम है कि हम भी देखेंगे को पेश किया गया। कबाड़खाने पर अशोक पांडे ने उन पर लिखा

इक़बाल बानो का ताल्लुक रोहतक से था. बचपन से ही उनके भीतर संगीत की प्रतिभा थी जिसे उनके पिता के एक हिन्दू मित्र ने पहचाना और उनकी संगीत शिक्षा का रास्ता आसान बनाया. इन साहब ने इक़बाल बानो के पिता से कहा: "बेटियां तो मेरी भी अच्छा गा लेती हैं पर इक़बाल को गायन का आशीर्वाद मिला हुआ है. संगीत की तालीम दी जाए तो वह बहुत नाम कमाएगी."
ठुमरी, दादरा और ग़ज़ल के लिए उनकी आवाज़ बेहद उपयुक्त थी और
उन्होंने अपने जीवन काल में एक से एक बेहतरीन प्रस्तुतियां दीं.मरहूम इन्कलाबी शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ साहब की नज़्म "हम देखेंगे" की रेन्डरिंग को उनके गायन कैरियर का सबसे अहम मरहला माना जाता है. ज़िया उल हक़ के शासन के चरम के समय लाहौर के फ़ैज़ फ़ेस्टीवल में उन्होंने पचास हज़ार की भीड़ के आगे इसे गाया था.
प्रस्तुत है इस उत्प्रेरक नज़्म का एक हिस्सा
हम देखेंगे
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो नाज़िर भी है मन्ज़र भी
उट्ठेगा अनल - हक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो


लोकतंत्र में ऍसी नज़्म लिखने वालों की सख्त जरूरत है जो आवाम में अपने शब्दों के तेज़ से जन जागृति की मशाल को जलाए रखें।

तो अब दीजिए मुझे इस चुनावी सांगीतिक चर्चा को खत्म करने की इजाजत। फिर आपसे मुलाकात होगी अगले महिने। तब तक के लिए राम राम !

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शनिवार, मार्च 14, 2009

चिट्ठा चर्चा पर चलिए मेरे साथ इस साप्ताहिक संगीत यात्रा पर...

चिट्ठा चर्चा के पाठकों को मनीष कुमार का सलाम ! शुकुल जी की आज्ञा से आज आपके सामने साप्ताहिक गीत संगीत से जुड़ी प्रविष्टियों की चर्चा को लेकर उपस्थित हूँ।

आशा है होली का ये पर्व आप सब ने अपने नज़दीकियों के साथ सोल्लास मनाया होगा। अब बात होली की हो तो बिना लोकगीतों की मिठास के इस पर्व का मज़ा कहाँ ? पर हमारे संगीत के सो कॉल्ड डेडीकेटेड चैनलों या रेडिओ के इन एफ एम बैंड वालों से इतना भी नहीं हुआ कि होली से जुड़े लोकगीतों पर कम से कम दिन भर का भी कार्यक्रम कर पाते।

करें भी तो कैसे? लगता है कि ना तो वे ब्रज की गोरियों के बालपन से परिचित हैं और ना ही फगुआ की रस भरी बयार से उनका सामना हुआ है। और हद तो ये है कि होली पर आधारित गीत संगीत का प्रचार करते समय ऍसे एलबमों की भरमार होती है जो चोली के आलावा, होली से जीवन के किसी और रंग का जुड़ाव नहीं देख पाते। पर जो काम हमारे संचार माध्यम नहीं कर पा रहे वो संगीतप्रेमी ब्लागिए किए दे रहे हैं।

यूँ तो चिट्ठा जगत पर होली का रंग दो हफ्ते पहले ही चढ़ चुका था फिर भी पिछले हफ्ते इस रंग पर परवान चढ़ाया हमारे साथी चिट्ठाकारों ने। कहीं प्रख्यात गायिका गिरजा देवी आँखिन भरत गुलाल रसिया ना माना रे.... गुनगुना रही थीं तो कहीं सुनने को मिली नवोदित गायिका लीपिका भट्टाचार्य द्वारा होली गीत की गरिमामय प्रस्तुति। आखिर ऍसा क्यूँ है कि हम होली के आते ही गीत संगीत की शरण में चले जाते हैं। यूनुस इस मनोविज्ञान के बारे में कहते हैं ...

"...होली मुझे बेहद तरंगित और ललित पर्व लगता है । मुझे लगता है कि आधुनिक-जीवन के तनावों और दबावों से निपटने के लिए होली एक 'स्‍ट्रेस-बस्‍‍टर' की तरह है । जिसमें हम अपने भीतर जमा हो चुके 'संत्रास' को मौज-मस्‍ती के माध्‍यम से बाहर निकालकर बहुत हल्‍के हो जाते हैं ।..."

वहीं फगुआ गीतों से जुड़े मस्ती और उल्लास वाले माहौल की चर्चा करते हुए सिद्धेश्वर अपनी पुरानी यादों को बाँटते हुए कहते हैं .... "आज होलिका दहन या सम्मत (सम्मथ बाबा ) जलाने की बारी है. बचपन में हमलोग लौकार (मशाल ) बनाकर उसे भाँजते हुए इस जुलूस में शामिल होते थे- गोइंठा (उपले ) और उबटन की उतरन के साथ. हाँ , तब हम लोग होली पर पटाखे छोड़ते -फोड़ते थे दीवाली पर नहीं "......

होली के इन गीतों में, सबसे ज्यादा आनंदित किया पंडित छन्नू लाल मिश्रा के इस गीत ने जिसे यूनुस ने रेडियोवाणी पर चढ़ाया है। शब्दों के साथ इस रसभरे गीत का आनंद लीजिए

खेलैं मसाने में होरी दिगंबर खेले मसाने में होरी ।
भूत पिसाच बटोरी, दिगंबर खेले मसाने में होरी ।।
लखि सुंदर फागुनी छटा के, मन से रंग-गुलाल हटा के
चिता-भस्‍म भर झोरी, दिगंबर खेले मसाने में होरी ।।


ये तो हुई होली और उसकी सांस्कृतिक विरासत से मिले लोकसंगीत की बातें। लोकगीतों से चलें फिल्मी गीतों की तरफ। आवाज़ पर इन दिनों पुराने गीतों की श्रृंखला चल रही है। इसी संदर्भ में सुजॉय चटर्जी ने जिक्र किया संगीतकार मदनमोहन द्वारा कम्पोज की हुई ग़ज़लों के बारे में लता जी के विचारों का। लताजी कहती हैं

"पहले ग़ज़ल गाने का एक ख़ास रंग हुआ करता था. गिनी चुनी तर्जें हुआ करती थी. मदन भैया ने अलग अलग रंग के ग़ज़ल गानेवालों को सुना, और जब खुद ग़ज़लों की तर्जें बनाना शुरू किये, तो उनमें अपना एक नया रंग भर दिया, जो अनोखा था. सुर ऐसे चुने जिनमें सोज़ भी था, सुरूर भी. इसीलिए उनके ग़ज़लों के तेवर भी अलग थे. एक अजीब बांकपन था. फिल्मों के लिए ग़ज़लों की तर्जें कैसे बनाई जाती है, उन्हे कितने रूपों में पेश किया जा सकता है, यह मदन भैया हम सबको बता गये. मैं मदन भैया को ग़ज़लों का
बादशाह मानती हूँ"

और हाँ अगर ग़ज़लों के शौकीन हैं तो को पुणे के नवोदित गायक शिशिर पारखी को भी जरूर सुन लीजिएगा जिन्होंने बड़ी खूबसूरती से ज़िगर मुरादाबादी की ग़ज़ल को अपनी आवाज़ से सँवारा है।

गीत पुराने हों या नए, उनका असर तभी होता हे जब वे जिंदगी के विशाल कैनवास के अलग अलग रंगों को कुछ पंक्तियों में उकेर दें। अब आमिर फिल्म के इस परिस्थितिजन्य गीत को देखिए। एक भला आदमी डॉक्टरी पास कर के वापस घर आ रहा हो और एयरपोर्ट पर आते ही उसे ये पता चले कि उसका पूरा परिवार अपहृत है । और फिर अदृश्य अपराधियों से अपने परिवार को बचाने के लिए हो रही जद्दोज़हद को गीतकार अमिताभ गीत के मुखड़े में किस खूबसूरती से व्यक्त करते हैं

अरे चलते चलते हाए हाए
हल्लू हल्लू दाएँ बाएँ हो
अरे देखो आएँ बाएँ साएँ
जिंदगी की झाँए झाँए हो
अरे निकले थे कहाँ को
और किधर को आए
कि चक्कर घुमिओ..


यानि लाख अपनी मेहनत के बलबूते पर आप अपनी किस्मत रचना चाहें पर कभी तो ऊपरवाला भी आपको ऐसे चक्कर घुमाता हे कि आप बेबस हो जाते हैं। युवा प्रतिभावान संगीतकार अमित त्रिवेदी के संगीत निर्देशन में आमिर फिल्म का ये गीत बना है मेरी वार्षिक संगीतमाला 2008 के 25 चुने हुए गीतों में चौथे नंबर का गीत।

तो ये थी इस सप्ताह में गीत संगीत से जुड़ी प्रविष्टियों पर चर्चा ! दो हफ्ते बाद फिर इस चिट्ठे आपकी सेवा में हाज़िर हूँगा। तब तक गाते रहिए गुनगुनाते रहिए और हम सब को कुछ बेहतरीन सुनवाते रहिए।

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