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सोमवार, अगस्त 30, 2010

सोमवार (३०.०८.२०१०) की चर्चा

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर सोमवार की चर्चा के साथ हाज़िर हूं।

आज एक ब्लॉग को थोड़ा गौर से देखा। वह भी इस लिए कि कन्ट्रीब्यूटर्स या योगदान कर्ता के लिए जिस शब्द का प्रयोग किया वह मुझ बंगालवासी को खींच ले गया साइड बार में और फिर बड़े गौर से सारे शीर्षक (साइड बार के) पढ़ डाले। ये क्रिएटिविटी भाती है। देखिए

१. कुछ दूर साथ चलें...  = ई-मेल से सब्सक्राइब करने के लिए।

२. एइ पाथेर बंधू = योगदान कर्ता (पोथेर)

३. अंजुमन की रौनक = समर्थक (फॉलोअर)

४. अपनी बानी प्रेम की बानी.. = ट्रांशलेशन

५. ये तो खिड़की है... = ताज़ी टिप्पणियाँ

६. सैर के वास्ते... = कुछ पसंदीदा साइट्स के लिंक

७. बाज़ार से गुजरें तो... = बाज़ार हालचाल के लिंक

८. मंडप = इनके पसंद के ब्लॉग्स इसमें भी क्रिएटिविटी है देखिए = ज्ञान भाई की छुकछुकिया = मानसिक हलचल

९. तक्षदक्षम =

१०. अंदाज़-ए-बयां = लेबल

११. मालखाना = आर्काइव

१२. लेखा-जोखा = ब्लॉग के हिट्स

१३. चलो दिलदार चलें...

१४. ये दुनिया गोल है... = विजिटर्स

१५. फिलहाल साथ

इस ब्लॉग (इयत्ता) पर आज की पोस्ट  बेरुखी को छोडि़ए (इयत्ता) में रतन जी कहते हैं

प्यार है गर दिल में तो फिर
बेरुखी को छोडि़ए
आदमी हैं हम सभी इस
दुश्मनी को छोडि़ए

सही कहा भाई रतन आपने। कहीं पढा था “नफ़रत की तो गिन लेते हैं, रुपया आना पाई लोग। ढ़ाई आखर कहने वाले, मिले न हमको ढ़ाई लोग।” ऐसे में आपका यह निवेदन लोगों पर असर करे यही दुआ है,

जानते हैं हम कि दुनिया
चार दिन की है यहां
नफरतों और दहशतों की
उस लड़ी को छोडि़ए

My Photoइसके लिए सकारत्मक सोच को विकसित करने की ज़रूरत है। हमारा एप्टीटय़ूड हमें औरों से अलग करता है। हमारे शिक्षामित्र  भाषा,शिक्षा और रोज़गार पर कहते हैं एप्टीटय़ूड से किसी व्यक्ति की रचनात्मक क्षमता का आकलन किया जाता है। उसमें कलात्मक रुझान व रुचि का पता लगाया जाता है। उनका मानना है कि

एप्टीटय़ूड जन्मजात होता है। किसी का संगीत के प्रति तो किसी का पेंटिंग, नृत्य या लेखन के प्रति। किसी में इंजीनियर बनने का एप्टीटय़ूड है तो किसी में मैकेनिक।

साथ ही यह भी बताते हैं कि टैस्ट के बाद उन्हें उस क्षेत्र में ट्रेनिंग देकर उन लोगों से बेहतर बनाया जाता है, जो उस या क्षेत्र के प्रति जन्मजात एप्टीटय़ूड से लैस नहीं होते।

एक बहुत ही सारगर्भित और उपयोगी आलेख है। अवश्य पढें।

[y_50_front[3].jpg]एक और बड़ा ही उपयोगी लिंक दे रहा हूं। यह है जगदीश भाटिया जी का आइना http://aaina.jagdishbhatia.com/। इस पर हिन्दी टाइपिंग संबंधी बहुत सी जानकारियां हैं। खास  कर बरह में कैसे टाइप करें। इससे जुड़ीं कुछ प्रविष्ठियां नीचे दिए हैं, ज़रूर पढ़ें।

बरह में हिंदी टाइपिंग कैसे करें How to type in Hindi with Baraha

माइक्रोसॉफ्ट का हिंदी टाइपिंग टूल Hindi Typing Tool by Microsoft

गूगल क्रोम में हिंदी टाईप करने का आसान तरीका

गूगल ट्रांस्लिट्रेशन अब बना हिंदी का वर्ड प्रोसेसर

Google Script Converter-भारतीय लिपियों के लिये उपहार

एक क्लिक से हिंदी टाईपिंग How to type in Hindi

एक क्लिक से हिन्दी टाईपिंग - कैसे काम करता है

  • अब हिंदी में क्वर्टी कीपैड मोबाईल Mobile with Hindi qwerty key pad
  • भारतीय भाषाओं के लिये एपिक ब्राउज़र Epic Browser for Indian Languages
  • मनीकंट्रोल डॉट कॉम अब हिंदी में
  • कुछ और हिंदी वेब पते और उनके लिंक Hindi Sites and Links
  • हिंदी वेब पते और उनके लिंक Hindi Sites and Links
  • बरह में हिंदी टाइपिंग कैसे करें How to type in Hindi with Baraha
  • माइक्रोसॉफ्ट का हिंदी टाइपिंग टूल Hindi Typing Tool by Microsoft

    इसके अलावे भी कई खूबियां हैं, जैसे, हिन्दी पंजाबी साहित्य से कुछ चुने संकलन का होना।

    साहित्य

    पंजाबी साहित्य

     

    सपने जब टूटते हैं तो इंसान जड़वत्‌ हो जाता है। उसकी भावनाएं समय के क्रूर थपेड़ों की चोट से पत्थर की तरह हो जाती हैं। कुछ इन्ही भावनाओं को समेटे संगीता स्वरूप जी कह रही हैं पत्थर हो गयी हूँ ......!

    डूब गयी नाव मेरी

    ऐसी नदी में  जो थी जलहीन ...

    बिना  पानी के आज  मैं खो गयी हूँ

    पत्थर तो नहीं थी पर आज हो गयी हूँ ...

    कई बार ऐसा होता है कि हमारा अस्तित्‍व अपने अतीत, वर्तमान और भविष्‍य से जूझता हुआ खुद को ढूंढता रहता है। स्मृतियों और वर्तमान के अनुभव एक-दूसरे के सामने आ खड़े होते हैं। ऐसे में यह समझना कठिन हो जाता है कि हम जीवन जी रहे हैं या जीवन हमें जिए जा रहा है। या हमारी तरल संवेदना पत्थर-सी हो गई है।

    My Photoअनामिका जी एक कवियित्री के तौर पर भीतर-बाहर से बहुत साधारण इंसान हैं। इतने साधारण कि इनका साधारण जीवन अपने लगभग सारे रूपों के साथ इनकी कविता/नज़्मों/ग़ज़लों की दुनिया मे अपने आप आ जाता है। यही कारण है कि बोलचाल के ढेरों अंदाज इनकी रचना तो कुछ और कहूँ...  में है। कभी सवाल के अंदाज में पूछती हैं ......

    अपने दिल की उदासी को छुपा लूँ तो कुछ और कहूँ

    अपने लफ़्ज़ों से जज्बातों को बहला लूँ तो कुछ और कहूँ.

    कभी व्‍यंग्‍य कसती बात....

    अपनी साँसों से कुछ बेचैनियों को हटा लूँ तो कुछ और कहूँ

    धूप तीखी है, जिंदगी को छाँव की याद दिला दूँ तो कुछ और कहूँ

    एकाकी, जीवन की दुरूह परिस्थितियों का सच्‍चा लेखा-जोखा सामने रखती इस रचना को पढते हुए रोमांच, प्रेम, उदासी और प्रसन्‍नता से होकर गुजरना पड़ता है ! बहुत अच्छी भावाभिव्यक्ति।

    मेरा फोटोपिछले दिनों दिल्ली में किसानो ने अपनी जमीनों के अधिग्रहण को लेकर प्रदर्शन किया। यह खबर पूरे मीडिया में छाई हुई थी। किसान अपनी जमीन पर आपने अधिकार खोने से नाराज है। यह सूचना दे रघी हैं प्रज्ञा पाण्डेय एक गली जहाँ मुडती है से। आलेख विकास और असंतोष में कहती हैं देश में विकास के नाम पर बन रही सड़के ,बहुमंजिली इमारतो और सेज इत्यादि जैसे बड़ी परियोजनाओ के दौरान किसानो की जमीने बड़े पैमाने पर अधिग्रहित की जाती है .इस अधिग्रहण से विकास की राह तो आसान हो जाती है या यूँ कहे कि हमारे चमचमाते इंडिया कि तस्वीर बनी रहती है लेकिन उन गरीब किसानो का क्या जिनकी जमीने कम दामो पर खरीद ली जाती है।

    साथ यह विचार भी व्यक्त करती हैं कि न समस्याओं से निपटने के लिए सरकार को पुराने भूमि अधिग्रहण कानून १८९४ में परिवर्तन कर नया भूमि अधिग्रहण कानून लाना चाहिए .यह कानून किसान की हालिया परेशानीयों को ध्यान में रख कर बनाया जाना चाहिए।

    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी का गद्यात्मक काव्य की दुनियां मे सरस कविताओं का अनवरत पेशकश ज़ारी है और आज वो कह रहे हैं, "करते-करते यजन, हाथ जलने लगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक") ।

    उम्र भर जख्म पर जख्म खाते रहे,
    फूल गुलशन में हरदम खिलाते रहे,
    गुल ने ओढ़ी चुभन, घाव पलने लगे।
    करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।। 

    कहते हैं जब संसार प्रचण्‍ड तूफान का रूप धारण कर ले, तब सर्वोत्‍तम आश्रय स्‍थल ईश्‍वर की गोद ही है। पर जब यज्ञ करते ही हाथ जले तो उसे कौन बचाए!

    एक बहुत ही अच्छी पोस्ट डाली है अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने छंद-प्रकरण [ १ ] : 'छंद' शब्द का अर्थ और आशय ।

    'छंद' का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ : बताते हुए कहते हैं इस शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। छंद शब्द संस्कृत के छंदस् शब्द का अर्द्ध-तत्सम रूप है। छंद शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के छद् धातु से मानी जाती है जिसका अर्थ परिवेष्टित करना , आवृत करना या रक्षित करने के साथ-साथ प्रसन्न करना भी है। प्रसन्नताप्रद अर्थ में छद् धातु निघंटु में भी मिलती है। स्पष्ट है कि अपने व्युत्पत्तिमूलक अर्थ में छंद 'बंधन' की रुढ़ि से मुक्त है।

    चर्चा को निष्कर्ष देते हुए बताते हैं छंद वाणी के प्रस्तुतीकरण का वह सुव्यवस्थित रूप है जिसमें वाणी की अन्तर्निहित ऊर्जा सशक्त और दिक्-काल से परे अपनी पहुँच को स्थापित करने का भूरिशः यत्न करती है। इसमें मात्राओं और वर्णों की संख्या किसी रूढ़ि को पालित/पोषित नहीं करती बल्कि उस गेय-धर्म के निर्वाह की तरह है जिसमें कोई भाव ( 'भू' धातु के अर्थ में , 'जो है' वह ) रुचिर हो जाता है, शक्तिवान हो जाता है, कालातीत हो जाता है, स्वतंत्र हो जाता है, 'बंधन'-रहित हो जाता है!

    और चलते चलते ये पढिए आओ न कुछ बात करें भड़ास blog पर  baddimag की प्रस्तुति

  • किसका घूंसा - किसकी लात, आओ न कुछ बात करें...
    होती रहती है बरसात, आओ न कुछ बात करें।

    अगर मामला और भी है तो वो भी बन ही जाएगा,
    छोड़ो भी भी ये जज्बात, आओ न कुछ बात करें।

    नदी किनारे शहर बसाना यूं भी मुश्किल होता है,
    गांव के देखे हैं हालात, आओ न कुछ बात करें।

    बूंद-बूंद ये खून बहा कर क्यों प्यासे रह जाते हो,
    बांटे जीवन की सौगात, आओ न कुछ बात करें।

    नींदों को पलकों पर रख कर छत पर लेटे रहते थे,
    फिर आई वैसी ही रात, आओ न कुछ बात करें।

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    सोमवार, जुलाई 26, 2010

    सोमवार (26.07.2010) की चर्चा

    नमस्कार मित्रों!

    मैं मनोज कुमार सोमवार की चर्चा लेकर हाज़िर हूं। शनिवार को तरुण जी आ रहे हैं। तो अब से मैं सोमवार को ही आया करूंगा।

     

    तो आइए चर्चा शुरु करते हैं।
    अबूझमाड़ के आदिवासिओ के बीच बिताये पल

    भड़ास blog पर Akhilesh जी की एक चित्रात्मक पोस्ट है, जो नक्सलवाद के चलते भोले-भाले अबुझ्मद के आदिवासी विषम परिस्थितियो में कैसे जीवन बिता रहे है, उसको बहुत ही सजीवता से प्रस्तुत करती है।. अखिलेश जी ने विगत दिनों इन आदिवासिओ के बीच एक दिन बिताया। और आज वो प्रस्तुत कर रहे हैं उनके जीवन की कुछ तस्वीरें। एक तस्वीर मैं यहां दे रहा हूं, बाक़ी आप उनके पोस्ट पर देखिए।

    स्वयं उतारी ताड़े और सल्फी पीकर आनंद में मस्त रहते है।

    यह पोस्ट उस आदिवासी इलाक़े का टोटल प्रभाव उत्पन्न करता है।

    .

    डोली पर बैसल कनिया ( Bride going to her husband's house )

    आपको मैथिली आती हो या नहीं इस पोस्ट को ज़रूर देखें। यह Kohbar पर Jyoti Chaudhary की प्रस्तुति है। इसमें एक छवि है जिसमें डोली पर बैठी दिल्हन को  चित्र के द्वारा दिखाया गया है। मधुबनी या मिथिला चित्रकला शैली  में बनाया गया है यह चित्र। पहले दुल्हन की विदाई महफा(डोलॊ)  पर होती थी। साथ में रास्ते के लिए पानी आदि दिया जाता था। चित्र को देखिए और सराहे बिना न रह पाएंगे आप।

    है ना अद्भुत! इन सब लोक कलाओं को जीवित रखना हमारा फ़र्ज़ है।

    इंसानियत कि पाठशाला व संस्थान कि आज इस देश को सख्त जरूरत है ....क्या आप खोलना चाहेंगे ऐसी पाठशाला....?

    My Photoयह प्रश्‍न पूछ रहे हैं honestyprojectrealdemocracy पर honesty project democracy जी। कहते हैं “हमारे देश और समाज कि अवस्था बेहद दर्दनाक व भयानक होती जा रही है | सामाजिक परिवेश इस तरह दूषित हो चुका है कि ह़र कोई विश्वास का गला घोंटकर अपना स्वार्थ साधने को अपनी काबिलियत व योग्यता समझने लगा है|”

    आगे कहते हैं,

    इन सारी बातों को देखते हुए आज जरूरत है हर शहर में इंसानियत के पाठशाला और संस्थानों कि जो सच्ची इंसानियत कि पाठ पढ़ाने का दुष्कर कार्य को अंजाम दे सके ,क्या आप खोलना चाहते हैं ऐसी  पाठशाला व संस्थान ..? मैंने तो सोच लिया है ऐसा एक पाठशाला या संस्थान चलाने कि इसमें हमें सरकारी सहायता कि आशा तो नहीं है लेकिन सच्चे और इमानदार इन्सान के हार्दिक सहयोग कि मुझे पूरी आशा है |

    इरादा नेक है। आपको सफलता मिले।

    My Photoबदल जाएगा तकनीकी शिक्षा का चेहरा!

    बता रहे हैं भाषा,शिक्षा और रोज़गार पर शिक्षामित्र। कहते हैं कि तकनीकी पेशेवरों की फौज तैयार करने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय कई नए कदम उठाने की तैयारी में है। इसके लिए परंपरागत रूप से दी जा रही तकनीकी शिक्षा का चेहरा बदलने की कोशिश की जा रही है। अभिभावकों और छात्रों को स्कूली शिक्षा से तकनीकी शिक्षा की तरफ शिफ्ट करने की कोशिश की जा रही है।

    आगे बता हैं

    एक पहल तकनीकी शिक्षा के लिए साइंस की पढ़ाई की अनिवार्यता खत्म किए जाने की तैयारी हो रही है। यानी किसी भी पेशेवर कोर्स में प्रवेश के लिए भविष्य में न्यूनतम शैक्षिक योग्यता में पढ़ाई के कुल वर्ष देखे जाएंगे न कि 11-12वीं में पढ़े गए विषय।

    बहुत ही रोचक जानकारी प्रस्तुत किया है आपने।

    आवारा हूँ ...

    जी ये एक आलसी का चिठ्ठा है गिरिजेश राव द्वारा प्रस्तुत किया गया है। जब कोई यह ऐलान करेगा कि आवारा हूं तो यह तो कहेगा ही कि आवारगी हमेशा बुरी नहीं होती। तब जब ब्लॉग जगत में यूँ ही निरुद्देश्य घूमा जाय तो यह बहुत अच्छी हो जाती है। हिन्दी सिनेमा को गिरिजेश जी निरर्थक मनोरंजन की एक विधा मानते थे।

    पूर्वग्रह जब मस्तिष्क पर काई सा बैठ जाय और पसरता हुआ जड़ जमा जाय तो घातक रोग में तब्दील हो जाता है।

    My Photoभीड़ और फ़ितरत

    संवादघर पर संजय ग्रोवर प्रस्तुत कर रहे हैं एक लघुकथा।

    मुझे देखकर उन डूबती निगाहों में उम्मीद और विश्वास की जो चमक कौंधी, उसने मुझे बदल डाला।

    मैं कूद पड़ा दरिया में। भंवर मुझे तैरना सिखाने लगा। लहरें बोलीं मामूली काम है, डरते क्या हो ! तूफ़ान ने पैग़ाम भेजा कि तुम अपना काम कर लोगे तभी मैं उस तरफ़ आऊंगा। मैंने उसे बचा लिया।

    भीड़ के चरित्र पर अच्छा कटाक्ष है इस लघुकथा में!

    My Photoसंडे के दिन पत्नी के बजाय जब मैंने डोसा बनाया... कुछ रोचक राजनीतिक अनुभव हुए .....जाना कि डोसा बनाना भी एक कला है....आखिर देश एक तवा जो ठहरा.........सतीश पंचम

    सफ़ेद घर में सतीश पंचम जी बताते हैं कि आज sunday वाली छुट्टी के दिन जब घर में डोसा बनाया जा रहा था तब उसी वक्त पीने का पानी भी आ गया। अब या तो डोसा बनाया जाय या पानी भरा जाय यह दुविधा थी। ऐसे में पत्नी को उन्होंने कहा कि आज तुम पानी भरो और मैं डोसा बनाता हूँ।

    यह देश एक डोसा मेकिंग एक्टिविटी  की तरह है....नीचे से आँच तो नेता लोग लगाते ही रहते हैं.....लेकिन हर मसला समय बीतने के साथ या तो खुद ब खुद सुलझ जाता है या सख्त होकर कभी न सुलझने के लिए काला पड़ जाता है ।

    अब जब डोसे बनाने में आपको देश दिखने लगने लगा, देश देख लीजिये, हालात साँभर जैसी है।

    My Photoमॉडर्न भौतिकी और सुंघनी

    मानसिक हलचल: विफलता का भय पर ज्ञानदत्त पाण्डेय जी कहते हैं वे जवान और गम्भीर प्रकृति के छात्र हैं। विज्ञान के छात्र। मॉडर्न भौतिकी पढ़ते हैं और उसी की टमिनॉलॉजी में बात करते दीखते हैं। अधिकांशत: ऐसे मुद्दों पर बात करते हैं, जो मुझे और मेरी पत्नीजी को; हमारी सैर के दौरान समझ में नहीं आते। हम ज्यादातर समझने का यत्न भी नहीं करते – हमें तो उनकी गम्भीर मुख मुद्रायें ही पसन्द आती हैं।

    अगर भारत समृद्ध होता और उन्हें सिविल सेवाओं की चाहत के लिये विवश न करता तो भारत को कई प्रीमियर वैज्ञानिक मिलते – कोई शक नहीं। पर उसे मिलेंगे सेकेण्ड-ग्रेड दारोगा, तहसीलदार, अध्यापक और कुछ प्रशासनिक सेवाओं के लोग।

     

    My Photoगुरू पूर्णिमा पर ओशो नमन !!

    कर रहे हैं Samvedana Ke Swar पर सम्वेदना के स्वर।

    मैं चाहता हूं तुम्हें निर्भार करना -
    ऐसे निर्भार कि तुम पंख खोल कर
    आकाश मे उड़ सको.
    मैं तुम्हें हिन्दू,मुसलमान, ईसाई, जैन, बौद्ध
    नहीं बनाना चाहता
    मैं तुम्हे सारा आकाश देता हूं.

    मैं गुरु इस मायने में ही हूं
                      कि मेरी साक्षी में तुमने
                      स्वयम् को जानने की
                      यात्रा आरम्भ की है,
                      इससे आगे मुझसे उम्मीद मत रखना.

     

    ओशो की बात ही निराली है! उनकी व्याख्या गुरु पूजा के कुछ नये आयाम खोलती है ! गुरु को समर्पित आपकी पोस्ट सच में कमाल है ! गुरु पर्व की बहुत बहुत बधाई!!

    My Photoआ कर छू लो कोरा है मन ( गठरी ब्लाग)

    गठरी पर अजय कुमार की प्रस्तुति।

    तन्हां तन्हां मैं रहता हूं ,आलम है तन्हाई का ।
    आती है आवाज ,तुम्हारी यादों में शहनाई का ॥
    रिमझिम रिमझिम , बरसे सावन ।
    तुमको पुकारे , अब मेरा मन ।
    तुम बिन , सूना सूना सावन ।
    दिल में आग लगा ही देगा , मौसम ये पुरवाई का ॥
    इस बारिश में , भीग रहा तन ।
    आकर छू लो , कोरा है मन ।
    बिन सजनी के , कैसा साजन ।
    आ भी जाओ फेंक के अपना , चोला ये रुसवाई का ॥

    भाषा की सादगी, सफाई, प्रसंगानुकूल शब्दों का खूबसूरत चयन, भाषिक अभिव्य्क्ति में गुणात्मक वृद्धि करते हैं।

    (title unknown)  पंजाबी कहानी - पठान की बेटी - सुजान सिंह

    संस्कृति सेतु पर समवेत स्वर द्वारा कहानी श्रृंखला – 8 के अंतर्गत इस पंजाबी कहानी की अनुवादक हैं नीलम शर्मा ‘अंशु’।
    ग़फूर पठान जब भी शाम को अपनी झोपड़ी में आता तो उन झोंपड़ियों में रहने वाले बच्चे ‘काबुलीवाला’ - ‘काबुलीवाला’ कहते हुए अपनी झोंपड़ियों में जा छुपते। एक छोटा सा सिक्ख लड़का बेखौफ वहाँ खड़ा रहता और उसके थैले, ढीली-ढाली पोशाक, उसके सर के पटे और पगड़ी की तरफ देखता रहता। गफ़ूर को वह बच्चा बहुत प्यारा लगता था। एक दिन उसने लड़के से पठानी लहज़े वाली हिंदुस्तानी ज़बान में पूछा - ‘तुमको हमसे डर नहीं लगती बाबा ?’

    पठान कह रहा था - ‘ज़ालिम को बच्ची नहीं देने का। बचाओ! बचाओ! ये लोग मार डालेगा। मेरा बेटी को, ये जालिम.....कसाई।’

    थानेदार कड़क कर बोला, ‘तो तू इसको बचाने के लिए उठा कर ले गया था?’ चारों तरफ हंसी का ठहाका गूंज उठा। कोई कह रहा था, ‘शैदाई है।’ कोई कह रहा था, ‘बनता है।’ परंतु ग़फूर रोए जा रहा था।

    एक बहुत ही अच्छी प्रस्तुति। सरस अनुवाद।

    My Photoसरकारी अनुदान

    बेचैन आत्मा पर बेचैन आत्मा की कविता।

    झिंगुरों से पूछते, खेत के मेंढक
    बिजली कड़की
    बादल गरजे
    बरसात हुयी
    हमने देखा
    तुमने देखा
    सबने देखा
    मगर जो दिखना चाहिए
    वही नहीं दिखता !
    यार !
    हमें कहीं,
    वर्षा का जल ही नहीं दिखता !
    एक झिंगुर
    अपनी समझदारी दिखाते हुए बोला-
    इसमें अचरज की क्या बात है !

    आपकी बैचेनगी काफी तीखे व्यंग करती है। बरगदी वृक्ष और साँप के बिल के माध्यम से जो आपने व्यंजक अर्थ दिए हैं गजब हैं। 'सरकारी अनुदान' नाम की यह रचना भविष्य में हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा गया तो उसमें इस रचना का उल्लेख किया जाना अवश्य चाहिए।

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    शनिवार, जुलाई 24, 2010

    शनिवार (24.07.2010) की चर्चा

    नमस्कार मित्रों!

    मैं मनोज कुमार एक बार फिर से शनिवार (24.07.2010) की चर्चा के साथ हाज़िर हूं।

    समयाभाव के कारण इस बार संक्षिप्त चर्चा।

     

    ब्लॉग‘

    पोस्ट / लिंक एक लाइना
    अज़दक

    न खत्‍म होने वाली बारिश की उस रात..

    बनते-बनते बिगड़ गई बात…!
    चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    अ-कबिता

    दू गो बच्ची और एक ठो पिता

    हजारों महाकव्य से बढकर है

    ऐसन एक ठो  अ-कबिता ।

    मेरी भावनायें...  रश्मि प्रभा...

    जल्दी आओ ...

    एक चाय भी बिना तू तू मैं मैं के कहाँ स्वादिष्ट होती है!

    धान के देश में! : जी.के. अवधिया

    बुढ़ापे में जवानी के रोमांस की याद भी जीवन में रस घोलती है

    अवधिया जी सच बताना आजकल आपका किसके साथ चक्कर चल रहा है?"

    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति 
    अनिल कान्त :

    ओ रे मनवा तू तो बावरा है

    तो एक काम कीजिए एक बिना नाम-पते वाली चिट्ठी उस लाल बक्से में डाल ही आइए।

    ज्योतिष की सार्थकता

    पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

    इन वैदिक उपायों से मन भी मान जाता है........(ज्योतिष उपाय Jyotish Remedies)

    जब इस प्रकार की बातें सुनने को मिलती हैं तो लगता है कि मन ही सब कुछ है!

    शिक्षामित्र

    इंटरव्यू टिप्स

    अगर आप सही मायने में बिना किसी दबाव के इंटरव्यू देना चाहते हैं तब तयशुदा समय से थोड़ा पहले चले जाएँ।

    बना रहे बनारस

    शैलेन्द्र नेगी

    प्रतिभा कटियार

    ‘वेरा’ निकोलाई की कैद से निकल भागी है।

    निकोलोई चेर्नीवेश्की के उपन्यास ‘व्हाट इज टु बी डन’ की पात्र ‘वेरा’, समय, काल, इतिहास की कैद से मुक्त हो चुकी है।

    गर पकड़ी गयी तो !!

    घुघूतीबासूती

    Mired Mirage

    चाहें तो कई युग लग सकते हैं चाहें तो कुछ पल भर ही!

    अगर सादगी से विवाह किया जाए,तो इस तरह की परेशानियां सर ही ना उठायें!

    Rhythm of words...

    Parul

    क्यों दिखती नहीं वो..

    'जिंदगी पहले तो रोज मिल जाती थी' ॥

    Abhivyakti -- अभिव्यक्ति

    शोभना चौरे

    जान लेवा .....सच क्या है ??

    अब तो बस कुछ ही सांसे बची है बाकि तो सब जानलेवा ही है!

    लहरें

    Puja

    हमेशा के लिए अधूरा हो जाना

    .इसका अधूरापन कुछ जियादा ही साल रहा है!

    हिन्दी साहित्य मंच

    डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

    सामाजिक सरोकारों का संरक्षण आवश्यक है

    हम स्वयं आकलन करें कि समाज के सरोकारों को तोड़कर हम किस प्रकार के समाज का निर्माण करना चाहते हैं?

    भड़ास

    lokendra singh rajput

    सचिन की आत्मकथा से करोड़ो प्रशंसकों को निराशा

    35 लाख रुपए एक किताब के लिए खर्च करना आपके बस की है भी तो भी आप नहीं खरीद सकते क्योंकि ये सभी दस किताबों अभी से बुक हो चुकी हैं।

    शब्द-शिखर

    आकांक्षा

    एस. एम. एस.

    शब्द छोटे होते गए
    भावनाएं सिमटती गई!

    शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग

    Shiv

    एक मुलाकात कृषि मंत्री के साथ

    इस साक्षात्कार के ट्रांसक्रिप्ट आपको कहाँ मिले?

    sarokaar

    arun c roy

    समय की कसौटी

    जब लेती है परीक्षा कहाँ खड़ा हो पाया कोई!

    कडुवा सच

    श्याम कोरी 'उदय'

    गुरुमंत्र ..... कुत्ता बना आदर्श !

    एक ऎसा गुरुमंत्र जिससे सफ़लता की सौ प्रतिशत गारंटी!

    ज़ख्म

    वन्दना

    मानव! व्यर्थ भूभार ही बना

    खाली हाथ आया
    और खाली ही
    चल दिया!

    उड़न तश्तरी

    Udan Tashtari

    हर शाख पर उल्लू बैठा है

    अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा!
    मनोज
    परशुराम राय

    स्वरोदय विज्ञान (अंक-1) आचार्य परशुराम राय

    हम एक वैज्ञानिक प्रणाली की खोज करते हैं तो उसके अन्दर अनेक वैज्ञानिक प्रणालियाँ कार्यरत दिखती हैं।

    do patan ke bich 
    रंजीत

    सुनो तो क्या कहती हैं ये पागल नदियां

    जंगलों की कटायी तत्काल बंद करनी होगी और वृक्षारोपण अभियान चलाना होगा। कार्बनडाइआक्साइड गैस के उत्सर्जन में कमी लाकर हिमालय के ग्लैशियर को बचाय जा सकता है।

    साजिद की कलम 
    sajid

    नाग विदेशी डसता...............................................साजिद

    आस्तीन के साँपों! तुमको
    हमने जी-भर दूध पिलाया
    ज़हरीलो! तुमने डस-डस कर
    भारत का क्या हाल बनाया

    स्पंदन SPANDAN 

    shikha varshney

    इसरार बादल का

    आ ले उडूं तुझे मैं, बस पाँव निकाल देहरी से बाहर जरा सा.

    चला बिहारी ब्लॉगर बनने 
    चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    नींद क्यूँ रात भर नहीं आती

    सिरहाने सलिल के आहिस्ता बोलो

    ई बकबक करके, अबके सो गया है.

    बुरा भला 
    शिवम् मिश्रा

    भगवान् का लाख लाख शुक्र है !

    भगवान् का लाख लाख धन्यवाद की उसने कार्तिक की रक्षा की ! भगवान् के आशीर्वाद से उसको ज्यादा चोट नहीं आई हैं और वह अब सदमे से भी बाहर है !

    Samvedana Ke Swar 
    सम्वेदना के स्वर

    गुमशुदा ब्लॉगर्स की तलाश

    हमें टिप्पणियों की गिनती तो याद रहती है, टिप्पणियाँ देने वालों की गिनती हम भूल जाते हैं, टिप्पणियों की परवाह तो हम करते हैं, टिप्पणियाँ लिखने वालों की परवाह नहीं होती.

    AKHILESH POEMS 
    akhilesh

    कोई हमे इश्क करना सिखला दे

    बोल ख़ामोशी के,

    भाषा बिन बोलो की,

    भाव दिलों के,

    धुन प्रेम भावों की,

    अश्क ख़ुशी के,

    गाथा खामोश आसूंओ की,

    बिन जुबां के हमको भी दिल का हाल

    सुनाना सिखला दे,

    मेरे भाव 
    मेरे भाव

    ओस

    पल भर को सजना
    शरमाई शबनम की तरह
    एक ही क्षण में बिखरना
    ठुकराई दुल्हन की तरह

    ' हया ' 
    लता 'हया'

    बन्दर क्या जानें अदरक़ का स्वाद

    ये मुहब्बत तो मौला की सौग़ात है

    वर्ना मै क्या हूँ क्या मेरी औक़ात है

    गर है जन्नत ज़मीं पे तो बस है यहीं

    आप हम है,ग़ज़ल है,हसीं रात है

    उच्चारण 
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

    "गुलों की चाह में-.." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

    अपना चमन बरबाद कर डाला।

    चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।
    स्व प्न रं जि ता  Mrs. Asha Joglekar

    क्रूझ शुरू – मॉन्टेकार्लो (फ्रान्स)

    मॉन्टे कार्लो ये इतालवी नाम है इसका मतलब है चार्ल्स पर्वत (Mount Charles) । ये मोनेको के राजा चार्ल्स III के नाम पर पडा है । मोनेको अपने आप में एक देश है भले ही ये जयपुर से भी छोटा हो ।

    ज्ञानवाणी 
    वाणी गीत

    आखिर यह भी तो हमारे देवी -देवताओं का अपमान ही है ...!

    प्यार और सम्मान तो हम अपने अभिभावकों का भी करते हैं पर क्या उनकी तस्वीरों का इस तरह सार्वजनीकरण कर अपमानित होतेदेख सकते हैं ?

    अनामिका की सदाये... 
    अनामिका की सदायें ......

    दो नयन..

    मौन....
    किन्तु चंचल, गहरे, सुन्दर
    और विषैले,
    चन्दन से शीतल भी,
    और अंगारों से ऊष्ण भी..

    सफ़ेद घर 
    सतीश पंचम

    एनडीटीवी के कमाल खान को मिले पुरस्कार के मायने.........सतीश पंचम

    वह कोई विरला ही होता है जो बरसाती नालों को देख  कहता है  - यह दरिया है लोकतंत्र का....संभलकर जईयो। 

    काव्य मंजूषा 
    'अदा'

    आत्ममुग्धता हमारी हार का कारण है....

    भारत का भला तभी हो सकता है जब...एक क्रांति की लहर आएगी...

    विदेशियों के कुछ अच्छे गुणों को अपनाया जाए...जैसे ईमानदारी, समय का सदुपयोग,  नेतागन  स्वयं को जनता के  सही मायने में सेवक समझें और अपना काम नौकरी की तरह, तनखा पर करें!

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    शनिवार, जुलाई 17, 2010

    शनिवार (17.07.2010) की चर्चा

    नमस्कार मित्रों!

    मैं मनोज कुमार एक बा फिर हाज़िर हूं शनिवार की चर्चा के साथ।

    मंगलवार को चर्चा मंच पर एक पोस्ट आई। प्रस्तुत किया था संगीता स्वरूप जी ने। वो सप्ताह भर की कविताओं से सजी पोस्ट थी। इसने मुझे भी प्रेरित किया एक कविताओं से सजी पोस्ट तैयार करने के लिए। तो आज पेश है कुछ पोस्ट कविताओं के।

    कवि अपनी बाते शब्दों में कहता है। शब्द और अर्थ जब मिलते हैं तो काव्य का सृजन होता है। यों कहें कि हमारी सृजनात्मक अभिव्यक्ति का आरंभ काव्य के रूप में ही हुआ तो ग़लत नहीं होगा। आदि काल से ही हमारे सुख-दुख के मनोभावों की अभिव्यक्ति का माध्यम कविता ही बनी रही। कवि-कर्म एक शाब्दिक निर्मिति है। कवि शब्द  ’कु’ धातु में अच प्रत्यय (इ) जोड़कर बना है। ’कु’ का अर्थ है व्याप्ति, सर्वज्ञता। यानी कवि द्रष्टा है, स्रष्टा है, संपूर्ण है, सर्वज्ञ है। जहां न पहँचे रवि, वहां पहुँचे कवि। ऐसा व्यक्ति अपनी अनुभूति में सब कुछ समेटने की क्षमता रखता है। कवि द्वारा जो सृजन होता है उसके मूल में मनवीय संवेदना सक्रिय तो रहेगी ही। ये विचार राजभाषा ब्लॉग पर व्यक्त किए गये हैं कविता क्या है शीर्षक आलेख में।

    कवि वही बड़ा होता है जो सामान्य भाषा की शक्ति-सामर्थ्य को कई गुना बढ़ा सकता है, जहां उसकी भाषा ही काव्य हो जाती है। उसका गद्यात्मक संगठन भी कवितापन से सिक्त हो जाता है। कविता में मार्मिक स्पर्श उसकी बुनावट में चार-चांद लगा देते हैं।

    न दैन्यं न पलायनम्   पर प्रवीण पाण्डेय जी की पोस्ट 28 घंटे पढ़कर ज्ञानदत्त पांडेय जी कहते हैं

    यह पोस्ट पढ़ कर मुझे लगा जैसे नव विवाहित कवि हृदय गद्य में कविता लिख रहा हो!!

    और ज्ञान जी सही भी हैं, देखिए ना इन पंक्तियों को पढकर लगता नहीं कि यह एक कविता की पंक्तियां हैं

    आज तुमने अपनी यात्रा छोटी कर ली है । तुम्हे मंजिल पाने की शीघ्रता है । तुम्हारा निर्णय था हवाई यात्रा का । तुम हवाई जहाज की तरह उड़ान भरना चाहती हो, मैं ट्रेन की दो पटरियों के बीच दौड़ता, लगातार, स्टेशन दर स्टेशन । मेरे टिकट पर एक और सीट तुम्हारी राह देखती रही पूरे 28 घंटे ।

    आज तुमने अपनी यात्रा छोटी कर ली है

    तुम्हे मंजिल पाने की शीघ्रता है

    तुम्हारा निर्णय था

    हवाई यात्रा का

    तुम हवाई जहाज की तरह

    उड़ान भरना चाहती हो,

    मैं ट्रेन की दो पटरियों के बीच दौड़ता,

    लगातार,

    स्टेशन दर स्टेशन

    मेरे टिकट पर एक और सीट

    तुम्हारी राह देखती रही

    पूरे 28 घंटे।

     

    आइए अब चर्चा शुरु करें

     

    My PhotoJ0148798अविनाश चंद्र की, चाहे कविता लंबी हो या छोटी, एक अलग शैली है। विषय कहने में वे अनूठे हैं। और सबसे बड़ी बात कि वो दूसरों से भिन्न फॉर्मेट अपनाते हैं, । कविता का सलीका, तरीक़ा, रखरखाव, उनका अपना है। नई विधि-प्रविधि, व्याकरण की शैली जिसमें उनका चरित्र झांकता है। यह कविताकार मौलिक सर्जक है। अपूर्ण अनुच्छेद... जो .....मेरी कलम से..... पर प्रस्तुत उनकी कविता इसका प्रमाण है।

    शलभ समान अक्षर,
    जो थे सने-नहाए,
    धूसरित धूल में.
    पुलकित हुए देख,
    तुम्हे ज्योतिशिखा
    .
    ***

    फिर कहीं से आई,
    भौतिकता की वल्लरी.
    लपेटती रही-नापती रही,
    समास-संधि-क्रिया.

    जिस मनुज ने नेह का व्याकरण कंठस्थ कर रखा हो, उसे यह संज्ञा से अव्यय तक के व्याकरण कहाँ लुभा सकते हैं... सब विस्मृत हो जाता है जब प्रेम का प्रत्यय या उपसर्ग लग जाता है जीवन के साथ, एक अविभाज्य अंग बनकर, जिसे “ सिर दे सो लो ले जाई” के मंत्र को सिद्ध करने वाला ही अनुभव कर सकता है...!!!

     

     

    PH01046J  धरती शीर्षक कविता स्वप्न मेरे ................ पर दिगम्बर नासवा जी प्रस्तुत करते हुए कहते हैं

    ना चाहते हुवे
    कायर आवारा बीज को
    पनाह की मजबूरी
    अनवरत सींचने की कुंठा
    निर्माण का बोझ
    पालने का त्रास

    इसमें वर्णन और विवरण का आकाश नहीं वरन् विश्लेषण, संकेत और व्यंजना से काम चलाया गया है। प्रयुक्त प्रतीक व उपमाएं नए हैं और सटीक भी। आपकी इस कविता में निराधार स्वप्नशीलता और हवाई उत्साह न होकर सामाजिक बेचैनियां और सामाजिक वर्चस्वों के प्रति गुस्सा, क्षोभ और असहमति का इज़हार बड़ी सशक्तता के साथ प्रकट होता है। तभी तो कवि कहता है

    अथाह पीड़ा में
    जन्म देने की लाचारी
    अनचाही श्रीष्टि का निर्माण
    आजन्म यंत्रणा का अभिशाप
    ये कैसा न्याय कैसा स्रजन
    प्राकृति का कैसा खेल
    धरती का कैसा धर्म ....

    नासवा जी, अपकी कविता ने फ़ादर माल्थस की याद दिला दी... कहीं कोई हल नहीं!! धरा की यह व्यथा यह कराह कौन सुनता है. धरती का एक नाम क्षमा भी है ! यह इसकी क्षमाशीलता है ! अब तक की सबसे बड़ी साक्षी यही है न !

     

    J0384888 मंजरियाँ शीर्षक कविता मेरे भाव पर मेरे भाव की प्रस्तुति है। इनकी कविता पढ़ने पर लू में शीतल छाया की सुखद अनुभूति मिलती है।

    आम्र पर बौर आये हैं
    लगता वसंत की अगुवाई है
    कोकिल ने छेड़ी मधुर तान
    बजी ऋतुओं की शहनाई है ।

     

    लेटे हुए जमीन परJ0386485 रवानी में अज़दक पर प्रमोद सिंह कहते हैं

    रवानी में बसे-धंसे बाबू बहे चलो
    मगर यह लरबोर बुझायेगा साथी, सुझायेगा?
    नीले आसमान के नीचे तिरी दुनिया

    ढीठ समय के सात सुर, हाथ आयेंगे?

    उनकी इस कविता में अज्ञात की जिज्ञासा, चित्रण की सूक्ष्मता और रूढ़ियों से मुक्ति की अकांक्षा परिलक्षित होती है।

    गोड़ की डोरी और ख़यालों की लोरी
    गुड़ुप, पानी में सर डुबाये
    कलेजे में तीली जलाये
    भाषा की धधकती चिमनियों के पार
    कहीं पहुंचाएंगे?
    जाएंगे जाएंगे बाबू, आंख खुली रखो
    लरबोरी के पार सुर-सुधा बनायेंगे.

    ऐसा सामर्थ्य कम कवियों के पास होता है और जिन के पास होता है वे ही दिदावर कहलाते हैं। कहना होगा कि प्रमोद सिंह ऐसे ही कवि हैं।

    J0148757  सांवर दइया की हिंदी कविताएं आखर कलश पर नरेन्द्र व्यास जी प्रस्तुत कर रहे हैं। साँवर दइया आधुनिक राजस्थानी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। हां वही सुख, यह देह ही, नए साल की सुबह : एक चित्र, सपना संजो रहे, अपने ही रचे को , रचता हुआ मिटता, सुनो मां !, सच बता…. कविताएं इस बात का सबूत हैं कि कवि की निगहबान आंखों न तो जीवन के उत्सव और उल्लास ओझल हैं और न ही जीवन के खुरदुरे यथार्थ। बदली हुई आवाज़ों के बरक्स अपनी आवज़ के जादू के साथ सन्नाटों के कई रंग इन कविताओं में मौज़ूद हैं।

    कितना अच्छा था वह दिन

    भले ही अनजाने में लिखे थे

    और अक्षर भी ढाई थे

    लेकिन उनमें समाई दिखते थी

    पूरी दुनिया

    और आज

    कितना स-तर्क होकर

    रच रहा हूं पोथे पर पोथे

    झलकता तक नहीं जिसमें

    मन का कोई कोना

    सच बता यार !

    ऐसे में क्या जरूरी है मेरा कवि होना ?

    इनकी कविता की भाषा सीधे-सीधे जीवन से उठाए गए शब्दों और व्यंजक मुहावरे से निर्मित हैं। ये कवितएं एक विलुप्त होती कला की केवल पहचान दर्ज़ करने की कोशिश नहीं बल्कि क्षरणशील एवं छीजती संवेदनशीलता की शिनाख़्त हैं।

     

    My PhotoJ0382959 यह अकारण नहीं है कि मुहब्बत में फ़िदा होने वाली ज़िन्दगियों की दास्तान के साथ कवयित्री को याद आता है कि किसी का साथ पाने की उद्विग्नता याद दिलती है उनके अधूरेपन का। निर्वाण अनामिका की सदाये... पर अनामिका की सदाये...... कुछ इसी तरह ख़्यालात लेकर आई हैं।

    तुम्हारा साथ पाने की

    उद्विग्नता ...

    हड्डियों के ढांचे से

    चिपके मांस में

    छिपी रक्त धमनियों को

    उकसा देती है .

    चाहतें परछाइयाँ बन कर

    पीछा नहीं छोडती...

    मानो तिल की तरह

    शरीर पर पड कर

    याद दिलाती रहती हैं...

    अपने अधूरेपन का.

    आख़िरी कुछ पंक्तियां बरक्स ध्यान खींचती हैं।

    आज मैं ..

    पागल व्यक्ति की तरह

    विस्मृतियों में जाकर

    खुद को

    भुला देना चाहती हूँ.

    मैं भी योगियों की तरह

    समाधि की तरफ

    अग्रसर हो....

    सांसारिक कर्मों और

    योनियों के

    आवरणों से विरत हो ..

    निर्वाण पा लेना चाहती हूँ.

    इस असार संसार का बोध, निर्वाण और समाधि की अवस्था...प्रश्न सुख की कामना न होने से दुःख का अनुभव न होना नहीं, एक ऐसी अवस्था प्राप्त करना है जहाँ सुःख क्या और दुःख क्या का भेद ही समाप्त हो जाता है... सच कहा है आपने ऐसी स्थिति सिर्फ पागल ही होकर पाई जा सकती है... उस प्रियतम को पा लेने का पागलपन...बहुर सुंदर रचना, बहुत सुंदर भाव!

     

    मेरा फोटोJ0382963 औघट घाट पर नवीन रांगियाल की कविता चाय के दो कप को पढकर यह जाना जा सकता है कि लोक संवेदना की प्रस्तुति ही इसकी प्रमुख विशेषता है।

     

    केबिन मै चाय के दो कप
    आज सुबह केबिन में
    एक जिन्‍दगी
    अचानक घुस आई.
    कुछ पल ठहरीं
    और एक युग रिस गया.

    यह कविता जीवन की हमारी बहुत सी जानी पहचानी, अति साधारण चीजों का संसार भी है। यह कविता उदात्ता को ही नहीं साधारण को भी ग्रहण करती दिखती है।

    मेरा फोटोVista18 "जीवन की अभिव्यक्ति!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’) उच्चारण पर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक की एक ऐसी कविता है जिसके बारे में यह कह देना सर्वथा ज़रूरी है कि आज कविता में आए शुष्क एवं रुक्ष गद्य की बाढ़ के विरुद्ध ये कविता बेहद सुकून देती है।

    क्या शायर की भक्ति यही है?
    जीवन की अभिव्यक्ति यही है!

    शब्द कोई व्यापार नही है,
    तलवारों की धार नही है,

    राजनीति परिवार नही है,
    भाई-भाई में प्यार नही है,
    क्या दुनिया की शक्ति यही है?
    जीवन की अभिव्यक्ति यही है!

    मौजूदा हालात को बयां करती है आपकी रचना बेहद शानदार है। ये केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि पारस्परिकता की बुनियाद पर टिकी उस संस्कृति एवं सभ्यता का आईना है जहां राग और कर्म एक ही संधि स्थल पर खड़े दिखाई देते हैं।

    मेरा फोटोVista09 यात्रा शीर्षक कविता के द्वारा sarokaar पर arun c roy कहते हैं

    यात्रा
    सब करते हैं
    शब्द भी
    तुम तक
    जो शब्द पहुँचते हैं
    उनकी यात्रा
    रूमानी होती है
    उन शब्दों के एहसास
    मधुर होते हैं

    आप इस कविता की भाषा की लहरों में जीवन की हलचल साफ देख सकते हैं।

    शब्द और तुम
    कर आओ ए़क यात्रा
    मेरे ह्रदय की झील में

    सच में, जब शब्द इन सुन्दर भावों को पिरोते हैं तो बड़े भाग्यशाली होते हैं। शब्दों का सफ़र लाजवाब है ... बिन कहे यहाँ से वहाँ शब्द ही पहुँचते हैं !

    Vista11 संगीता सेठी की बैठक बन्द रहती है मिट्टी के डर से कविता हिन्द युग्म प्रकाशित हुई है। अपनी इस कविता के लिए वो किसी भारी-भरकम कथ्य को नहीं उठाती, फिर भी अपने काव्यलोक की यात्रा करते हुए कुछ ऐसा अवश्य कह गयी हैं, जिसे नया न कहते हुए भी हल्का नहीं कहा जा सकता।

    नहीं आता है अब
    कोई मेहमान
    समय की कमी के कारण
    कोई आता भी है जल्दी में
    तो बैठा दिया जाता है
    दालान में...आहाते में
    या खड़े-खड़े ही
    विदा कर दिया जाता है
    महल जैसी बैठक में
    बैठने के
    नियम तय किए हैं
    हर कोई तो
    नही बैठाया जाता
    उन गद्देदार सोफों पर
    इसलिए
    ना सजते हैं काजू प्लेटों में
    ना बादाम-शेक परोस पाती हूँ
    महँगी क्रॉकरी
    शो-केस में सजी रहती है
    और बैठक बन्द रहती है
    मिट्टी के डर से

    समय कोई भी हो, कविता उसमें मौज़ूद जीवन स्थितियों से संभव होती है। वही जीवन- स्थितियां, जिनसे हम रोज़ गुज़रते हैं। संगीता जी  की यह रचना इसी के चलते हमें अपनी जैसी लगती है। इसमें निहित यथार्थ जैसे हमारे आसपास के जीवन को दोबारा रचता है।

    मेरा फोटोVista08 आजकल की कविता की एक और पहचान है – संवादधर्मिता, कथ्य और रूप दोनों स्तरों पर। कवयित्री कहीं स्वयं से  संवाद करती है, कहीं दूसरों से। यों ये दोनों स्थितियां परस्पर पूरक ही कही जाएंगी। कुछ तो है मेरी भावनायें... पर रश्मि प्रभा... जी की रचना इसी का मिसाल है।

     

    नहीं जानती - सत्य और असत्य

    सही और गलत

    स्वप्न और यथार्थ

    पर कुछ तो है

    जो मेरी धडकनें सुनाई देने लगी हैं

    कुछ तो है

    तभी तो

    आत्मा परमात्मा को छू लेने को व्याकुल है

    दार्शनिक सोच के साथ इस मनोरम प्रस्तुती में अज्ञात की जिज्ञासा, चित्रण की सूक्ष्मता और रूढ़ियों से मुक्ति की अकांक्षा परिलक्षित होती है। तीव्र संवेदनशीलता उन्हें प्रकृति के हर रंग-रूप में स्त्रीत्व का पता बताती है।

    My Photoअब और नहीं शिनाख़्त करो खुद की जज़्बात पर M VERMA की कविता काफी अर्थपूर्ण है, और ज़्यादा समकालीन। इस कविता के द्वारा वर्तमान स्थिति में जहां भी सार्थक एवं दिशावान जनांदोलन हैं वहां अपनी आशा और आस्था का बीजारोपण करें, समर्थन दें, कवि ये चाहता है।

     

    आसमाँ की बुलन्दियों पर
    तुम्हारी पहचान उभरेगी
    तुम अपनी मुट्ठियाँ
    हवा में लहराकर तो देखो

    आज इसकी सख्त जरूरत है। हर किसी की पहचान खोती जा रही है इस भाग-दौर भरी दुनिया में! क्योकि भ्रष्ट लोगों ने सामाजिक असंतुलन की भयावहता खरी कर दी है सरकारी खजाने को बुरी तरह लूटकर जिसके खिलाफ सबको मुट्ठियाँ एकजुट होकर हवा में लहराने की जरूरत है!

    My Photoबच गया मैं गीत............... पर संगीता स्वरुप ( गीत ) जी की ज़िंदगी का गणित कविता को पढने के उपरांत लगा कि उनकी कला साधना और भी गंभीर तथा परिपक्व हुई है। यह कविता एक ऐसा प्रश्‍न खड़ा करती है कि उत्तर देने में सदियां बीत जाएं और शायद तब भी प्रश्‍न का उत्तर अधूरा रह जाए।

    कोणों में बंटी

    ज़िंदगी

    कब कितने

    डिग्री का एंगल

    बन जाती है

    पाईथागोरस  प्रमेय

    की तरह .

    लोग

    यूँ ही तो

    नहीं कहते

    कि  गणित

    कठिन होता है  |

    जीवन के गणित को समर्पित इस कविता को पढकर यह समझ आया कि विकट समस्‍याओं का आसान हल ढूँढ निकालना सबसे मुश्किल काम है। ज़िंदगी के गणित को बहुत सुलझे हुए भावों के साथ समझाती यह कविता, बहुत सरल बना देती है एक ऐसे विषय को जिसे हमेशा कठिन माना जाता है। बस आवश्यकता है बुने हुए स्वेटर के एक खुले सिरे के पकड में आने की, हाथ आया तो कठिन से कठिन गणित उधड़ता चला जाता है।

    मेरा फोटोआफ़त-1 बारिश? शीर्षक कविता अमिताभ पर अमिताभ श्रीवास्तव द्वारा प्रस्तुत की गई है। इस कविता की भाषा सीधे-सीधे जीवन से उठाए गए शब्दों और व्यंजक मुहावरे से निर्मित हैं। आज का दौर विचलनों का दौर है। विचलनों के इस दौर में कविताओं में धरती दिखाई नहीं देती। लेकिन यह दिलचस्प है कि इनकी रचना में धरती और आकाश का दुर्लभ संयोग दिखता है।

    पहाड टूटना बस एक मुहावरा भर है
    कोई सचमुच थोडी टूट जाता है माथे पर।
    और अगर टूट भी जाये तो
    यकीन रखो तुम्हारे माथे पर तो नहीं ही गिरेगा।
    तब लगता है हां
    निश्चित ही बारिश का मौसम होगा।

    यह कविता बरसात के पहले लोगों द्वारा अपना घर सहेजने की प्रक्रिया मत्र नहीं है बल्कि कंक्रीट युग के बरक्स पूरी एक संस्कृति इस कविता में दृश्यमान हो उठी है।

    जब भंवर लयबद्ध नहीं होती
    जीवन की दिशायें एक सीध खो देती हैं
    मुहफेरी की खिडकियों से
    झांकने लगते हैं दोस्त,
    पीठ के पीछे छूरा घोपने की घटनायें आम हो जाती हैं,
    मुंह के सामने मीठी छुरियों का बाज़ार लगने लग जाता है
    और वे कन्धे ऊंचे व बडे हो जाते हैं एक दम से
    जिनके सहारे गले में हाथ डाला जाता था
    तब लगता है बारिश सावन की चमक खो चुकी है

    कविता में मुहावरों लोकोक्तियों के प्रासंगिक उपयोग, लोकजीवन के ख़ूबसूरत बिंब कवि के काव्य-शिल्प को अधिक भाव-व्यंजक तो बना ही रहे हैं, दूसरे कवियों से उन्हें विशिष्ट भी बनाते हैं। मनुष्य होने और बने रहने की बिडंबनाएं अमिताभ जी की इस कविता में जगह-जगह मौज़ूद हैं। कवि जब बरसात को कल्पित करता है तो जैसे मौसम को ही नहीं, ख़ुद को भी उदास पाता है। इस संदर्भ में ही इस कविता को देखा जा सकता है।

    My Photoदर्द विछोह पर्याय हैं मेरे.... कविता काव्य मंजूषा पर 'अदा' जी की प्रस्तुति है। यह कविता नारी पराधीनता अथवा उससे संबंधित कड़वे सच को बयान करती है।

    दूर जाना यूँ माँ से है

    जाँ का जाना जानो

    झुकते हैं कभी बिछते हैं

    मानो या न मानो

    याद की कलसी

    फिर छलकी है 

    आँख का आँचल भीगा है

    ये दुनिया क्या समझेगी

    तुम धैर्य की चादर तानो

    मैं बेटी

    किस्मत मेरी है

    दूरी की ही जाई

    दर्द विछोह पर्याय हैं मेरे

    मान सको तो मानो....!!

    एक नारी द्वारा रचित नारी विषयक इस कविता में उनकी स्वानुभूति और सहानुभूति का मसला यहां प्रधान है। कविता सीधे-सादे सच्चे शब्दों में स्वानुभूति को बेहद ईमानदारी से अभिव्यक्ति करती है। इसमें सदियों से मौज़ूद स्त्री-विषयक प्रश्‍न ईमानदारी से उठाया गया हैं।

    My Photo04092008145-001 पुरानी खांसी कविता बिगुल पर राजकुमार सोनी ने प्रस्तुत की है। जब से सोनी जी कविताएं प्रस्तुत करने लगे हैं उनका असल व्यक्तित्व उभर कर सामने आया है। यह ग्रामगंधी कविता नहीं बल्कि गांव या लोक जन जीवन से पगी कविता है।

    कहते हैं कि यह देश किसानों का देश है, लेकिन दुनिया के पेट को रोटी देने वाला किसान जिस तरह से भूखा रहता है। दाने-दाने को तरसता है, उसे देखकर नहीं लगता है कि वास्तव में यह देश किसानों का सम्मान करना भी जानता है।

    अब क्या बताऊं आपको
    अचानक दोनों छोटी लड़कियों के
    कपड़े छोटे पड़ गए
    मजबूरी थी
    पीले करने पड़ गए उनके हाथ

    गिरवी रखना पड़ा
    हीरा-मोती को
    अरे.. हीरा.. मोती .. नहीं.. नहीं बाबू

    हीरा-मोती तो बैल का नाम है.

    किसान की स्थिति के मार्मिक शब्दचित्र इस कविता में मौज़ूद हैं।

    इतना सब कुछ बताते-बताते
    किसान ने बंडी से बीड़ी निकाली

    और सुलगाते हुए कहा-
    अरे.. बाबू.. बड़े लोगों को
    होती है
    बड़ी बीमारी

    अपनी खांसी तो पुरानी है
    बस जाते-जाते जाएंगी

    इस कविता को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि सोनी जी किसानों के जीवन को उसकी विस्तृति में बूझने का यत्न करने वाले कवि हैं। जो मिल जाए, उसे ही पर्याप्त मान लेने वाले न तो दुनिया के व्याख्याता होते हैं और न ही दुनिया बदलने वाले। दुनिया वे बदलते हैं जो सच को उसके सम्पूर्ण तीखेपन के साथ महसूस करते हैं और उसे बदलने का साहस भी रखते हैं। यह कवितामहज़ एक समय कवि द्वारा किसन से मिलने का बयान भर नहीं है। इसमें ऐसा कुछ है जो इसे संश्लिष्ट और अर्थ सघन बनाता है। ऐसा इसलिए है कि सोनी जी तथ्यो, चीज़ों और घटनाओं को सतह पर ही मूल्यांकित कर परम संतोष पा जानेवाले अघए हुए कवि नहीं हैं।

    20100517100240-1-1 title unknown)

    भड़ास blog पर अजित त्रिपाठी की इस छोटी कविता में मनुष्य होने और बने रहने की बिडंबनाएं मौज़ूद हैं।

    उसे शौक है
    गीली मिट्टी के घरौंदे बनाने का
    सजा सजा कर रखता जा रहा है
    जहां का तहां
    निश्चिंत है न जाने क्यूं,
    अरे!
    कोई बताओ उस पागल को
    कि
    सरकार बदलने वाली है।

    कविता काफी अर्थपूर्ण है, और ज़्यादा समकाली। ये हमारी श्रमजीवी समाज के चरित्र हैं – अपने बहुस्तरीय दुखों और साहसिक संघर्ष के बावज़ूद जीवंत।

    image4564059567_509b46413f खुली आँखों के सपने कविता मनोज करण समस्तीपुरी की पेशकश है। यह कविता इस बात का सबूत है कि कवि की निगहबान आंखों न तो जीवन के उत्सव और उल्लास ओझल हैं और न ही जीवन के खुरदुरे यथार्थ। बदली हुई आवाज़ों के बरक्स अपनी आवज़ के जादू के साथ सन्नाटों के कई रंग इस कविता में मौज़ूद हैं।

    आज मेरी आँखें खुली हैं,

    बिलकुल खुली !

    और मैं देख रहा हूँ,

    खुली आँखों से सपने !!

    जिनमें हैं कई चेहरे,

    कुछ धुंधले,

    कुछ साफ़,

    कुछ गैर,

    और बहुत से अपने !!

    कविता सीधे-सादे सच्चे शब्दों में स्वानुभूति को बेहद ईमानदारी से अभिव्यक्ति करती है।

    एक और सपना देख रहा हूँ,

    मैं सपनों में !!

    परन्तु ये आँखें फिर भी खुली हैं,

    और

    प्रतीक्षा कर रही हैं,

    कि

    कब आयेगी वह भोर ?

    जब हर चेहरे में होगी,

    सच्चाई की चमक !

    विश्वास की झलक !!

    आपकी जागी आँखों का ख़्वाब बहुत ही हसीन था... दर्द भी हसीन होते हैं, क्योंकि मांजते हैं इंसान को ताकि उनकी चमक और बढे.!!

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