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मंगलवार, मई 04, 2010

हिंदी ब्लाग जगत का भविष्य बहुत शानदार है......

कल अदालत ने तमाम सुबूतों और गवाहों को मद्द-ए-नज़र रखते हुए कसाब को दोषी करार दे दिया. मतलब ये कि मुंबई पर जो हमला हुआ उसमें कसाब का भी हाथ था. दोषी करार देने के बाद जज साहब अब सज़ा सुनायेंगे. ये तो कसाब के मुकदमे की बात है. उसपर फैसला आ गया है.

उधर ब्लागिंग पर भी कल फैसला आ गया. पिछले ४-५ सालों से लोगों के मन में यह सवाल आवन-जावन कर रहा था कि; "हिंदी ब्लॉग जगत का भविष्य कैसा है?"

इस सवाल के जवाब के रूप में सतीश सक्सेना जी ने फैसला सुना दिया है. उन्होंने अपने फैसले में लिखा;

"...........................सारी विसंगतियों के बावजूद, हिंदी ब्लाग जगत का भविष्य बहुत शानदार है , जो बिना नाम कमाने की इच्छा लिए, समाज के लिए लिखेंगे, लोग उन्हें याद रखेंगे और वे अपने निशान छोड़ने में निश्चित रूप से कामयाब रहेंगे !"

आशा है कि कुछ दिनों के लिए ही सही इस शंका को अल्प-विराम मिलेगा कि हिंदी ब्लॉग जगत का भविष्य कैसा है.

लेकिन सक्सेना जी का यह फैसला तो राइडर के साथ आया. बिना नाम कमाने की इच्छा लिए लिखें तब जाकर लोग याद रखेंगे? जब नाम ही नहीं कमा सकेंगे तो याद कमाकर क्या मिलेगा? मैं तो कहता हूँ कि नाम नहीं कमाने का विचार न आये लेकिन टिप्पणी कमाई का विचार तो आना चाहिए.

ओह! टिप्पणी से याद आया कि टिप्पणियों ने कई वर्षों से एक विषय के रूप में हिंदी ब्लॉगर भाइयों और बहनों को बहुत प्रेरित किया है. इसी प्रेरणा को आगे बढाते हुए अदा जी टिप्पणी आरती लिख डाली. पढ़िए;

दर्शन तेरे होते ही, हर कष्ट निपट जाता
मईया हर कष्ट निपट जाता
सुख ही सुख मेरे ब्लॉग में....२
दूसरा कष्ट पाता
जय टिप्पणी माता ....

ब्लॉग माता तुम मेरी, तुम ही ब्लॉग परी
मईया तुम ही ब्लॉग परी
बड़े-बड़े ब्लाग्गर ...२
राह तकें तुम्हरी
जय टिप्पणी माता ....

मैं कन्या निर्बुद्धि, सूरत ठीक हमरी
मईया सूरत ठीक हमरी
लिखना-विखना न जानूँ....२
बस पाठक कृपा करी
जय टिप्पणी माता ...

बड़ी दूर तक नज़र डाली है अदा जी ने. पूरी आरती आप उनके ब्लॉग पर ही पढ़िए. एक प्रस्ताव पारित करके इस आरती को हिंदी ब्लॉग जगत की टिप्पणी आरती के रूप में रजिस्टर किया जा सकता है.


इसी टिप्पणी चिंतन को आगे बढ़ाते हुए अनूप शुक्ल जी ने किसी ब्लॉगर के टिप्पणी बक्से की झांकी टाइप पेश की. शीर्षक है, माडरेशन के इंतज़ार में टिप्पणियां. इस झांकी की एक झांकी देखिये;

"समय बिताने के लिये टिप्पणियों ने अंत्याक्षरी का विकल्प चुनने की बजाय बतकही का वरण किया और आपस में वह करने लगीं जिसे उर्दू शायर लोग गुफ़्तगू और दिलजले अफ़साना निगार चेमगोइयां कहते हैं। टिप्पणी बक्से में किसी भी सार्वजनिक स्थल की गरिमा के अनुरूप अंधेरा ही अंधेरा है! हाथ को हाथ तो छोड़िये टिप्पणी को टिप्पणी नहीं सुझा रही है।"

या फिर ये;

मामला गर फ़िरदौस बर रुये जमीनस्त जैसा न समझ लिया जाये इसलिये टिप्पणियां सांसारिक लोकाचार का पालन करते हुये बुराई-भलाई भी करती चल रही हैं। ज्यादा हम क्या कहें आप खुदै उनकी बातचीत सुन लीजिये:

कब खुलेगा ये बक्सा! जल्दी से माडरेट करे ये मुआ तो जरा खुली हवा में सांस लेने को मिले। यहां तो दम घुट गया खड़े-खड़े!

अरे आता होगा यार! हड़बड़ी क्या है। कहीं गया होगा बॉस के पास पांव फ़िराने। आयेगा! करेगा! उसके सरदर्द में तुम काहे अपने विक्स वेपोरब मल रही हो!

नई यार वो बात नहीं! लेकिन बोर हो गये यहां अंधेरे में वेट करते-करते।

हमको न बताओ! यहां बोर हो गयी या वहां पोस्ट से सटने का मन कर रहा है! इंतजार सहन नहीं हो रहा। हमसे तो न छुपाओ।

अरी हट! सबको अपने जैसा समझती है। हम कोई ऐसे-वैसे बलॉगर की टिप्पणी नहीं हैं। हमारा मालिक जरा सा कहीं देख लेता है इधर-उधर की हरकत तो फ़ौरन टिप्पणी मिटा देता है। फ़िर भले ही वही टिप्पणी बोल्ड में दुबारा करे।

बड़ा मूडी है तेरा मालिक। सेन्सेक्स से याराना लगता है क्या उसका?
बहुत सारे पाठकों ने इस लेखन को क्रिएटिव करार दे डाला. काहे किया ऐसा, यह तो आप पोस्ट पढ़कर समझिये. ई रहा लिंकवा.


एक और टिप्पणी चिंतन पंडित डी के शर्मा 'वत्स' जी ने किया. बात ललित शर्मा और मिश्रा जी के टिप्पणियों के लेन-देन की है. पढ़िए;

"मिश्रा जी अपने हाथ में पकडी नोटबुक ललित शर्मा के आगे कर देते हैं। ये देखिए पिछले एक साल में हमने आपकी जिस जिस पोस्ट पर जब जब टिप्पणी की है, उन सबका हिसाब इसमें लिखा हुआ है। ये देखिए कुल 420 टिप्पणियाँ हमारे द्वारा की गई हैं, ओर ये इधर देखिए साल भर में हमारी पोस्टों पर आपने कुल कितनी टिप्पणियाँ की हैं, महज 136. अभी ले देकर आपकी तरफ हमारी 284 टिप्पणियाँ बकाया रहती हैं। लेकिन आप हैं कि लौटाने का नाम ही नहीं ले रहे। अभी कुछ दिनों से हमारी किसी भी पोस्ट पर आपकी कोई टिप्पणी नहीं आ रही...जब कि हमारी टिप्पणी रोजाना आपको पहुँच रही है। भाई ऎसा कैसे चलेगा?"


टेलीविजन पर कविता लिखकर मानस खत्री ने प्रथम पुरस्कार जीत लिया. उनकी इस कविता ने उन्हें फैजबाद जिले में बाल हास्य-कवि के नाम से मशहूर कर दिया है. आप कविता के अंश पढ़िए;

ये टी.वी. वाले भी क्या गज़ब ढाते हैं,

एक तरफ सभ्यता का पाठ पढ़ाते हैं,

तो दूसरी तरफ सास-बहु को खुद ही लड़वाते हैं.

‘एकता कपूर’ जी के सेरि़लों ने खोले हैं महिलाओं के नयन,

अब हर सास ‘तुलसी’ और ‘पार्वती’ जैसी बहुओं का ही करती है चयन.

टी.वी. पर अधिकतम कार्यक्रम महिलाओं के ही आते हैं,

एक अकेले ‘संजीव कपूर’ हैं,

पर लानत है वो भी, खाना बनाना सिखाते हैं.

टी.वी पर भी चढ़ा है, आधुनिकता का रंग,

नामुमकिन है टी.वी. देखना, घर-परिवार के संग.

सबके अपने-अपने हैं Views,

कोई देखता है कार्यक्रम, तो कोई News.

पूरी कविता आप यहाँ क्लिकिया कर पढ़ सकते हैं. क्लिकियाइये.

रचनाकार पर मुनव्वर राना की दो गजलें छपी हैं. देखिये;

जहां तक हो सका हमने तुम्हें परदा कराया है
मगर ऐ आंसुओं! तुमने बहुत रुसवा कराया है

चमक यूं ही नहीं आती है खुद्दारी के चेहरे पर
अना को हमने दो दो वक्त का फाका कराया है

*************************************

इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिये
आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिये

आप दरिया हैं तो फिर इस वक्त हम खतरे में हैं
आप कश्ती हैं तो हमको पार होना चाहिये

दोनों गजलें पढने के लिए यहाँ पर क्लिक कर दीजिये.


कुलवंत हैपी जी पिछले मंगलवार को लोगों की मुलाकात किसी ब्लॉगर हस्ती नहीं करवा सके. इस बात के लिए उनहोंने क्षमा मांगते हुए आज मुलाकात करवाई है यशवंत महेता 'फकीरा' जी से. रोचक मुलाकात है. आप पढ़िए.

आदित्य ने दो दिन पहले ही अपना दूसरा जन्मदिन मनाया. बैंकाक में. आज उसने अपने जन्मदिन की पार्टी के फोटोग्राफ्स लगाये हैं. आप देखिये. आदित्य को शुभकानाएं.

हिंदी फिल्मों में मानसिक रोग. इस शीर्षक से सुनील दीपक जी का लेख पढ़िए. बहुत बढ़िया पोस्ट है.

तो ये थी 'जामे कुटुम समाय' घराने की एक चर्चा.

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शनिवार, अप्रैल 24, 2010

मिले बस चैन दिन का और गहरी नीद रातों की

बहुत दिनों बाद आज चर्चा करने की सोची. एक बार के लिए मन में विचार आया कि बहुत दिन बीत गए हैं, चर्चा कैसे की जाती है पता नहीं वो याद है या नहीं? फिर कहीं से सूचना मिली कि आदमी अगर एकबार साइकिल चला ले या फिर एक बार चर्चा कर ले तो फिर उसे भूल नहीं सकता. इस सूचना पर विश्वास करके हम चर्चा करने बैठ गए.

सेंसिटिव और जिम्मेदार ब्लॉगर आजकल ब्लॉग जगत में होने वाली धार्मिक हलचलों से बहुत दुखी हैं. धार्मिक हलचलों का मतलब यह मत समझिएगा कि लोग क्रिकेट पर बात कर रहे हैं क्योंकि क्रिकेट को हमारे देश में धर्म की तरह लिया जाता है. इसका सीधा-सीधा मतलब है कि लोग धर्म-धर्म खेल रहे हैं. ठीक वैसे ही जैसे बड़े लोग आईपीएल-आईपीएल खेल रहे हैं. अब चूंकि ऐसे लेखों पर ढेर सारी टिप्पणियां आती हैं तो सब ऐसे लेखों के बारे में जानते ही हैं. अब ऐसे में इन लेखों की क्या चर्चा करें? लोग कहेंगे अरे वही सब तो बता रहे हो जो हम पहले से जानते हैं.

ऐसे में चलिए आज केवल ग़ज़ल और ग़ज़ल के एक ब्लॉग की चर्चा करते हैं. जी हाँ, चन्द्रभान भारद्वाज जी के ब्लॉग की बात.

भरद्वाज जी अपने प्रोफाइल में लिखते हैं;

"अभी तक मेरे चार ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। (१) पगडंडियाँ (२)शीशे की किरचें (३)चिनगारियाँ (४)हवा आवाज़ देती है. पाँच ग़ज़ल संग्रहों में गज़लें सम्मिलित हैं। "


उनकी आज की ग़ज़ल, जो उनके ब्लॉग पर प्रकाशित की गई है, उसके कुछ अशआर पढ़िए;

रहा खुद पर भरोसा या रहा है सिर्फ ईश्वर पर
सिवा इसके हमारे पास ताकत भी नहीं कोई

मिले बस चैन दिन का और गहरी नीद रातों की
हमें अतिरिक्त इसके और चाहत भी नहीं कोई


कहते हैं हिंदी में ग़ज़ल लिखना आसान नहीं लेकिन भारद्वाज जी के लिए यह बिलकुल आसान सा लगता है. ये शेर पढ़िए;

करे जो दूध का तो दूध पानी का करे पानी
बिके सब हंस अब उनमें दयानत भी नहीं कोई

उनकी एक और ग़ज़ल के अशार पढ़िए. वे लिखते हैं;

तमन्ना थी कि हम उनकी नज़र में खास बन जाते
कभी उनके लिए धरती कभी आकाश बन जाते

अगर वे प्यास होते तो ह्रदय की तृप्ति बनते हम
अगर वे तृप्ति होते तो अधर की प्यास बन जाते


भारद्वाज जी साल २००७ से ब्लागिंग कर रहे हैं. शुरू-शुरू में वे देवनागरी में नहीं लिखते थे. उनकी लिखी हुई ये पोस्ट पढ़िए;

Jindagi men bas vijaya ki lalsayen khojiye,
Har men bhi jeet ki sambhavnayen khojiye;
Bhavanaon ke diye men tel shuchita ka bharo,
Chetna ki lo lagan ki vartikayen khojiye

देवनागरी में लिखी हुई उनकी पहली पोस्ट ३ अक्टूबर २००८ की है. वे लिखते हैं;
सजा किसको है किया किसका है;
लकीरों में जो लिखा किसका है

जड़ें थीं मेरी तना था उसका ,
फलों पर फिर हक़ बता किसका है

जरा ये पढ़िए;

चेतनाएं दांव पर हैं;
भावनाएं दांव पर हैं

पंगु है साहित्य जग का,
सर्जनाएं दांव पर हैं

मौन मन्दिर और मस्जिद,
प्रार्थनाएं दांव पर हैं

और ये;

समय का सितारा जिधर बोलता है;
उसी ओर सारा शहर बोलता है

समझाने लगा जो समय की नजाकत,
शहर की हवा देख कर बोलता है

गवाही वहां कत्ल की कौन देगा,
जहाँ चाकुओं का असर बोलता है


और उनकी ये ग़ज़ल पढ़िए. ज़िन्दगी जीने का तरीका;

है ज़हर पर मानकर अमृत उसे पीना यहाँ;
ज़िन्दगी को ज़िन्दगी की ही तरह जीना यहाँ।

उन हवाओं को वसीयत सौंप दी है वक्त ने,
जिनने खुलकर साँस लेने का भी हक छीना यहाँ।

आँख में रखना नमी कुछ और होठों पर हँसी,
क्या पता पत्थर बने कब फूल सा सीना यहाँ।

एक बार उनके ब्लॉग पर जाकर पढ़िए तो सही. एक से बढ़कर एक बढ़िया ग़ज़ल पढने को मिलेगी. कहाँ धर्म-धर्म खेल रहे हैं? और सेंसिटिव लोग इनलोगों को झेल रहे हैं. बहुत कुछ अच्छा पड़ा है ब्लॉग पर पढने के लिए. हाँ, टिप्पणी मिलेगी अगर इस आशा में पढने जायेंगे तो न जाना ही ठीक होगा. अगर बढ़िया कुछ पढने का मन है तो ज़रूर जाइए. हिंदी ब्लॉग जगत के चंद अच्छे ब्लॉग में भारद्वाज जी का ब्लॉग है.

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गुरुवार, फ़रवरी 25, 2010

ज़िन्दगी फुलवारियों का नाम हो जैसे

भारत और पकिस्तान के विदेश सचिव दिल्ली में मिल रहे हैं. मिलने-मिलाने के लिए मौसम भी अनुकूल है. न तो ज्यादा सर्दी और न ही गर्मी. ऐसे में मिलने का मज़ा आ गया होगा. कितना आया वह तो शायद कल तक ही पता चले लेकिन इतना ज़रूर कह सकते हैं कि कल बहुत मज़ा आया. कारण यह कि सचिन तेंदुलकर ने कल ही अंतर्राष्ट्रीय एक दिवसीय मैच में पहली बार डबल सेंचुरी ठोंक दी.

जब तमाम लोग यही दोहराए जा रहे थे कि यह एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैचों में बने गई पहली डबल सेंचुरी है, तभी सचिन ने लोगों को आगाह किया कि; "पहला नहीं, वनडे का दूसरा अर्धशतक है." सचिन का कहना है;
"सचिन के २०० रन को वनडे इतिहास का पहला दोहरा शतक घोषित करने वाली मर्द मानसिकता को सलाम."


यह कहने के बाद उन्होंने बताया कि आस्ट्रेलिया की महिला क्रिकेट खिलाड़ी बेलिंडा क्लार्क ने पहले ही दोहरा शतक लगा दिया है. पूरी घटना आप सचिन के ब्लॉग पर ही पढ़िए.

जहाँ सचिन ने मर मानशिकता को सलाम किया वहीँ तमाम ऐसे भी ब्लॉगर हैं जिन्होंने सीधे-सीधे सचिन को ही सलाम कर लिया. सलाम करने वालों की लिस्ट लम्बी है. देखिये;

अवधेश अकोदिया जी का सलाम यहाँ है.

राम कुमार सिंह जी का सलाम यहाँ है.

समरेन्द्र जी ने बताया कि रेल बजट और सचिन में चुनना पड़े तो वे सचिन के साथ हैं. क्यों हैं, आप यहाँ क्लिक करके जानिये.

जहाँ कुछ लोग सचिन को सलाम भेज रहे हैं वहीँ शंकर फुलारा जी पूछते हैं कि काहे का सलाम? ये (क्रिकेटर) देश और समाज के लिए क्या करते हैं? फुलारा जी लिखते हैं;

सचिन का एक और "रिकार्ड"...!
इसी की कमी थी, चलो...! बन गया!
अब...कुछ भूखों को रोटी मिल जायेगी, कुछ नंगों को कपडा
कुछ बीमारों को दवाएं.



फुलारा जी के सवाल तो हैं. सवालों में दर्द है. गरीबी का, भूख का...

कल एक बजट गया और कल एक और आ जाएगा. सुनकर लगता है जैसे भारत एक बजट-प्रधान देश है. कल वित्तमंत्री बजट पेश करेंगे. इसीलिए बजट से पहले अंशुमाली रस्तोगी जी ने उन्हें एक पत्र लिखा है. वे लिखते हैं;

"कागज और कलम को खपाने में हम लेखकों का बहुत बड़ा हाथ है। हम सालभर में कितने टन कागजों को काला और कितने दर्जन कलमों को कलम कर देते होंगे, इसका अंदाजा तो हमें भी नहीं है। अपना दिमाग और समय खर्च कर हम जो रचनात्मक सहयोग समाज को देते हैं, वो इतना आसान भी नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि हम लेखक बेहद उपेक्षित हैं। हमारे पास न ढंग के पुरस्कार हैं न आर्थिक सुख-सुविधाएं। जबकि सरकार और आपको हमारी तरफ भी बराबर का ध्यान देना चाहिए।"

पूरा पत्र आप अंशुमाली जी के ब्लॉग पर जाकर पढ़िए. वे हम 'लेखकों' के लिए कितने चिंतित हैं.

अनिल पुसदकर जी का मानना है कि शांति से नहीं पूरी तसल्ली से निपटाए जा रहे हैं हिन्दुओं के त्यौहार. अनिल जी लिखते हैं;

"होली आई नही कि प्रशासन को उसे शांतिपूर्ण ढंग से निपटाने की चिंता शुरु हो जाती है।इसके लिये शहर की शांति समिति की बैठक बुलाई जाती है और उसमे शामिल यस मैन पुलिस को कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये अच्छे-अच्छे?सुझाव देते हैं।इस बार यंहा की शांति समिति ने गुब्बारों पर प्रतिबंध लगवा दिया है।इससे अच्छा तो ये होता कि रंग पर ही प्रतिबंध लगा देते।सात दिनों की होली अब सात घण्टे भी नही चलने दी जाती और धीरे-धीरे लगता है इसके लिये भी त्योहार बचाओ आंदोलन छेड़ना पड़ेगा।"


वे और भी बहुत कुछ लिखते हैं. आप देखिये.

मनीषा पाण्डेय जी की पोस्ट पढ़िए. वे पूछती हैं;

"मैं सोचती हूं कभी और पूछती हूं कभी-कभी अपने आपसे कि मैं क्‍या होना चाहती हूं? किसी अखबार की एडीटर या कि कोई बड़ी तोप तुर्रम जंग रिपोर्टर? जिस राह निकल जाऊं तो लोग ‘फलां स्‍टोरी में तो आपने क्‍या कमाल किया था या ढंका रिपोर्ट में क्‍या अद्भुत समझ और गहराई थी’ का भोंपू उठाए मेरे पीछे-पीछे आएं। क्‍या मैं एक बेहद सजीले, रंगीले, सुरीले और मोहब्‍बत के झूले पर ऊंची-ऊंची पेंगे बढ़ाने वाला नौजवान के इश्‍क में गिरफ्तार होना चाहती हूं? मैं चाहती हूं क्‍या कि दो सुंदर-सुंदर गोल-मटोल मीठे झबरीले बच्‍चे मां-मां करते मेरी साड़ी खींचे और कहीं से दौड़ते हुए आकर मेरे पैरों से लिपट जाएं, जब मैं रसोई में उनके मनपसंद रसगुल्‍ले बना रही होऊं? बड़े लाड़ से मेरी गोदी में चढ़कर कढ़ाही में झांकें कि ‘मां, क्‍या पका रही हो?’ मैं गोदी से नीचे उतार दूं तो भी साड़ी में मेरे खुले पेट से मुंह चिपकाकर हवा निकालें और अजीब सी आवाजें करें?"

पूरी पोस्ट पढ़िए. वासी जानकारी के लिए बता दूँ कि पोस्ट को सुमन जी सर्टिफाई करते हुए लिख दिया है;

nice


संजीव के ब्लॉग पर मुक्तिबोध जी का लेख पढ़िए; " मेरी माँ ने मुझे प्रेमचंद का भक्त बनाया". संजीव का ब्लॉग कॉपी प्रोटेक्टेड है इसलिए मैं अंश नहीं दे पा रहा लेकिन आप पोस्ट ज़रूर पढ़ें.

फागुन में डॉक्टर मनोज मिश्र जी ने एक फाग गीत पोस्ट किया है. उन्होंने उसे अपनी आवाज़ में गाया भी है. आप सुनिए.


मेरी भी पसंद:

होंठ पर किलकारियों का नाम हो जैसे
ज़िन्दगी फुलवारियों का नाम हो जैसे

मन भिगोया तन भिगोया आत्मा भीगी
प्यार ही पिचकारियों का नाम हो जैसे

आस के अंकुर उगे कुछ कोपलें फूटीं
स्वप्न कोई क्यारियों का नाम हो जैसे

बाँटती फिरती हँसी को और खुशियों को
उम्र जीती पारियों का नाम हो जैसे

टांक कर रक्खीं ह्रदय में सब मधुर यादें
मन सजी गुलकारियों का नाम हो जैसे

आह आँसू करवटें तड़पन प्रतीक्षाएँ
प्यार भी सिसकारियों का नाम हो जैसे

ज्ञान 'भारद्वाज' बैठा भूलकर उद्धव
ध्यान में वृज-नारियों का नाम हो जैसे

---श्री चन्द्रभान भारद्वाज जी के ब्लॉग से साभार.



और क्या कहें? यह मालूम है कि चर्चा छोटी है. फिलहाल इसी से काम चलाया जाय.

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गुरुवार, जनवरी 28, 2010

जामे कुटुम समाय घराने की एक चर्चा

बसंत आ गया. कोहरा बसंत के साम्राज्य को आगे बढ़ने से रोकने के लिए अपना दम लगाये है. लोग बसंत पर कम और कोहरे पर ज्यादा कविता लिख रहे हैं. संत सिंह चटवाल पद्मभूषण हो गए हैं. प्रधानमंत्री के डॉक्टर साहब भी पद्मभूषण हो लिए. कुछ लोग पद्मभूषण होते-होते बच गए. अमर सिंह जी राज्यसभा से इस्तीफ़ा देने से मना कर दिया.

इन सब के बीच एरिक सीगल नहीं रहे. लव स्टोरी नामक किताब के लेखक. तमाम प्रेमियों को अपनी भाषा से प्रभावित करने वाले एरिक. आज गौतम राजरिशी जी एरिक सीगल पर एक पोस्ट लिखी है. पढ़िए वे क्या लिखते हैं;

"love means not ever having to say you are sorry"...हम जैसे कितने ही आशिकों के लिये परम-सत्य बन चुकी इस पंक्ति के लेखक एरिक सिगल की मृत्य हो गयी इस 17 जनवरी को और मुझे इस बात का पता चला बस कल ही।"


एरिक को श्रद्धांजलि देने वालों में हमारे नीरज भैया भी हैं. उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा;

"लव स्टोरी एक जादू जगा देने वाली किताब है, मैंने अपने कालेज के दिनों के बाद पढ़ा था, इतनी छोटी सी किताब इतना बड़ा असर डालती है की क्या कहूँ...बिना इसे पढ़े नहीं जाना जा सकता...हमारी भी श्रधांजलि."

आज श्री जाकिर अली रजनीश ने ब्लॉगर भाइयों का आह्वान किया और बताया कि; "ब्लागिंग को हल्के में न लें, अगले महीने एक और धमाके के लिए रहे तैयार.."

धमाका क्या है? इसके बारे में बताते हुए जाकिर साहेब लिखते हैं;

"साथियो, आप सबको बताते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है हिन्दी में प्रकाशित होने वाली विज्ञान केन्द्रित चर्चित पत्रिका "विज्ञान प्रगति" के फरवरी अंक में विज्ञान ब्लॉगिंग पर डा0 अरविंद मिश्र एक विस्त़ृत आलेख प्रकाशित हो रहा है। यह आलेख ब्लॉग की उपयोगिता और महत्ता को रेखांकित करने का एक और प्रयास है। आप सब इस लेख को अवश्य पढिएगा और अपनी प्रतिक्रिया से हमें जरूर अवगत कराइएगा। "


आशा है, जाकिर साहेब के आह्वान के बाद अब हम ब्लागिंग को हल्के में न लेंगे.

श्री रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक' की कविता पढ़िए. सुन्दर कविता उन्होंने कुहरे पर लिखी है. वे लिखते हैं;

भूरा-भूरा नील गगन है,
गीला धरती का आँगन है,
कम्बल बना बसेरा!
देखो हुआ सवेरा!


मनीष कुमार जी अपनी केरल यात्रा की दास्तान पढ़वा रहे हैं. मुन्नार में बिठाये उनके दिन और रात सबसे खूबसूरत थे. इसके बारे में मनीष बताते हैं;

"वापस रास्ते में सूर्य अपनी रक्तिम लालिमा लिए पहाड़ों की ओत में जाता दिखाई दिया.हमारे दुमंजिला कॉटेज की ऊपरी बालकनी पश्चिम दिशा की और खुलती थी. इसलिए हम सभी जल्द से जल्द वहां पहुंचकर इस मनोरह दृश्य को कैमरे में कैद कर लेना चाहते थे."


और क्या खूब फोटो निकाली हैं मनीष जी ने अपने कैमरे से. आप खुद देखिये. मेरे कहने से नहीं मानेंगे. यहाँ क्लिकियाइए.

जसवीर की बहुत ही प्यारी कविता पढ़िए जो उन्होंने मास्टर गोकुलचंद के नाम लिखी है. जसवीर लिखते हैं;

"मंदिर वाले स्‍कूल में
जिसे उस वक्‍त विद्या-मंदिर नहीं
कहा जाता था
और न ही उसमें पढ़ाने वाले
बूढ़े मास्‍टर गोकुलचन्‍द
को सर या टीचर।
उनकी आंखें पत्‍थर की थीं
हाथ में छड़ी रहती थी
धोती पहनते थे गंदी-सी
आवाज कड़क थी
गणित उनके लिए खेल था
बच्‍चे उनका जीवन थे।"


अब कविता पढ़ रहे हैं तो रजनी भार्गव जी की यह कविता पढ़िए. वे लिखती हैं;

"लम्हे, गुल्लक में
रेज़गारी से खनकते हैं
हर दिन रुई से भरी दोहड़
के लिए ललकते हैं।
एक लम्हा,
जब आँखें उस पर टिक जाती हैं,
लाल, पीले फूलों वाली,
किस, किस पगडंडी से गुज़रती है"


पूरी कविता पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कर दीजिये और देखिये हम आपको कितनी बढ़िया कविता पर ले जाते हैं.

कविताओं की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए पहुँचते हैं डॉ. मनोज मिश्र द्वारा प्रस्तुत स्व. पंडित रूप नारायण त्रिपाठी जी की रचना. एक नमूना देखिये;

"तुम्हारे पास बल है बुद्धि है विद्वान भी हो तुम
इसे हम मान लेतें हैं बहुत धनवान भी हो तुम
विधाता वैभवों के तुम इसे भी मान लेते हम
मगर यह बात कैसे मान लें इंसान भी हो तुम।"


आज समीर भाई की माताजी की पुण्यतिथि है. इस मौके पर समीर भाई ने बहुत ही भावुक कर देने वाली पोस्ट लिखी है. माताजी को याद करते हुए वे लिखते हैं;

"मैं उसके नाम के साथ स्वर्गीय लगाने को हर्गिज तैयार नहीं आज ५ साल बाद भी. वो है मेरे लिए आज भी वैसी ही जैसी तब थी जब मैं उसे देख पाता था. तुम न देख पाओ तो तुम जानो.

माँ कभी मरती है क्या...वो एक अहसास है, वो एक आशीष है, वो मेरी सांस है...उससे ही तो मैं हूँ..वो मेरी हर धड़कन में है..वो कोई एक तन नहीं जो मर जाये और हम उसे भूल जायें पिण्ड दान कर पुरखों में मिला कर."


बहुत ही प्यारी पोस्ट है. पोस्ट का महत्व उसके अंत में कविता की वजह से और बढ़ गया है.

हम सब की तरफ से माताजी को श्रद्धांजलि.

जहाँ एक और जाकिर साहेब कह रहे हैं कि ब्लागिंग को हल्के में न लें...वहीँ राजकुमार ग्वालानी जी के एक मित्र ने उनसे पूछ लिया; "तुम्हारे ब्लॉग की औकात ही क्या है?"

अपने मित्र के सवाल का जवाब देते हुए राजकुमार जी लिखते हैं;

"हमें इतना मालूम है कि आने वाले समय में ब्लाग का स्थान बहुत ऊंचा होने वाला है। इसको आज पांचवें स्तंभ के रूप में देखने की शुरुआत हो चुका है। अगर भविष्य में ब्लाग अखबारों के लिए खतरा बन जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। ऐसे में ब्लाग लिखना फायदेमंद है, इसकी औकात की बात करना गलत है।"


गणतंत्र साठ का हो गया. कवितायें लिखी गईं. परेड हो गई. हथियार निकाल कर दिखा दिए गए. और गणतंत्र दिवस मना लिया गया. इसी मौके पर पढ़िए प्रोफ़ेसर आनंद प्रधान का लेख. प्रोफ़ेसर प्रधान लिखते हैं;

"क्या यह सिर्फ एक संयोग है कि जिस समय गणतंत्र साठ का हो रहा है, देश में 'पेड न्यूज' यानि पैसा लेकर खबरों की शक्ल में विज्ञापन छापने पर तीखी बहस चल रही है? क्या यह भी सिर्फ संयोग है कि जिस संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके जरिये मीडिया की आज़ादी की गारंटी की गई है, उसके साठ साल के होने के मौके पर देश में मीडिया को 'रेगुलेट'(नियंत्रित) करने की मांग को लेकर बहस तेज हो रही है? निश्चय ही, यह सिर्फ संयोग नहीं है. ये दोनों ही मुद्दे एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं और उनका सीधा सम्बन्ध मुख्यधारा के मीडिया उद्योग की मौजूदा दशा-दिशा से है."



नीरज रोहिल्ला
नीरज रोहिल्ला ने ह्यूस्टन मैराथन में हिस्सा लिया. उसकी रिपोर्टिंग भी की. रिपोर्टिंग के शुरू में ही उन्होंने डिस्क्लेमर दे दिया. लिखा; "लम्बी और भावनात्मक पोस्ट". अब इस डिस्क्लेमर की वजह से अगर आपने पोस्ट न पढ़ी हो तो मैं कहूँगा कि पढ़ आइये. कमाल की पोस्ट है.

नीरज लिखते हैं;

"दौड़ के शुरू होने पर भी हमारा दिमाग ठिकाने पर नहीं था लेकिन हमने सोचा कि अब जो भी होगा दौड़ के बाद ही देखा जाएगा, घुटने का जायजा लिया तो यदा कदा किसी कदम के साथ थोडा सा दर्द था लेकिन कुछ ख़ास नहीं| बार बार अलग अलग ख्याल आ रहे थे और दौड़ पर ध्यान नहीं था| लेकिन शुरुआती ६ मील पलक झपकते ही कट गये | हर साल की तरह इस साल भी ह्यूस्टन निवासी धावकों का हौसला बढ़ने के लिए सड़क के दोनों ओर खड़े थे|"


आज एक और ब्लॉग पर चिट्ठाचर्चा हुई. यहाँ क्लिक कीजिये.

तो यह थी "जामे कुटुम समाय" घराने की चिट्ठाचर्चा. आपसब का दिन-रात सब मौज में बीते एही कामना है.

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बुधवार, जनवरी 20, 2010

बसंत पंचमी पर कविताओं की चर्चा

आज बसंत पंचमी है. कह सकते हैं आज बसंत आ गया. सर्दी है फिर भी आ गया. सर्दी से जरा भी नहीं डरा. बसंत आता है तो कविताओं की भी बाढ़ आ जाती है. आखिर वह बसंत ही क्या जो लोगों को कवि-कर्म में लीन न कर दे. (स्माइली) साथ में कवितायें ना लाये.

कई बार तो ऐसा देखा गया है कि जो कवि बनना चाहते हैं वे बसंत पंचमी का इंतज़ार करते हैं. उन्हें अगर लोग दिसम्बर या जनवरी में कविता लिखने के लिए उकसायें भी तो भी वे कविता नहीं लिखते. टालते हुए कहते हैं; "अब इतना दिन कविता नहीं लिखे तो चार दिन और सही. बसंत पंचमी आ रही है. उस दिन लिखेंगे. उस दिन कवि बन जायेंगे". (स्माइली).

तो पेश है बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर कविताओं वाली एक चर्चा.

तो सबसे पहले पढ़िए नीशू तिवारी जी की कविता. शीर्षक है; "बसंत की फुहार में....फागुन की बयार में." तिवारी जी लिखते हैं;

बसंत की फुहार में,
फागुन की बयान में,
आम के बौरों की सुगंध,
दूर -दूर तक फैली है,


बाकी कविता आप उनके ब्लॉग पर जाकर पढ़िए. ये रहा लिंक. बसंती टिप्पणी भी कीजियेगा.

नारदमुनि जी की कविता पढ़िए. बसंत से किस बात की तुलना की है उन्होंने, यह देखिये. वे लिखते हैं;

तेरा जाना पतझड़
तेरा आना बसंत,
मन एक
कामनाएं अनंत।

पूरी कविता पढने के लिए यहाँ क्लिकियाइये.

डॉक्टर श्याम गुप्ता की कविता पढ़िए. वे लिखते हैं;

सखी री ! नव बसंत आये ॥
जन जन में ,
जन जन जन मन में ,
यौवन यौवन छाये ।
सखीरी ! नव बसंत आये ॥

यह रहा लिंक. यहाँ क्लिक्क कीजिये और पूरी कविता पढ़ डालिए.

इसी बसन्ती कड़ी में पढ़िए निपुण पाण्डेय 'अपूर्ण' की कविता. मुझे कवि का उपनाम बहुत भाया. 'अपूर्ण.' आप पढ़िए वे क्या लिखते हैं;

शुभ बसंत ये आया खिल उठी प्रकृति रे !
मुस्काते स्वागत गीत मधुर हर तरु से फूटे
शुभ्र पुष्प दल खिले खिले यूँ लगे महकने,
पल पल हर चंचल कोपल नयी छठा बिखेरे


पूरी कविता आप ब्लॉग पर पढ़ें. बसंती टिप्पणी से कवि का स्वागत करें.

सतीश एलिया जी की कविता पढ़िए. वे लिखते हैं; "बसंत कलेंडर पर लिखी तारीख नहीं है." फिर क्या है बसंत? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए वे बताते हैं;
................................
बच्ची की किलकारी है, चिडियों की चहचहाट है,
पति की प्रतीक्षा है, पत्नी के विरह का स्वर है
................................


इस कड़ी में पढ़िए राजीव रंजन प्रसाद जी की रचना. रचना १८ साल पुरानी है. वे लिखते हैं;

सुख की थाती का क्या करना
करने दो दुख को क्रीड़ा माँ
वीणा के तार से गीत बजे
मैं गा लूं जग की पीडा माँ

सुन्दर रचना है. आप पूरी रचना पढने के लिए यहाँ क्लिक कर दीजिये.

बसंत पंचमी को 'निराला' जी का जन्मदिन भी माना जाता है. आज अनूप शुक्ल जी ने अपना एक पुराना लेख फिर से प्रस्तुत किया है. 'निराला' जी के बारे में प्रसिद्द आलोचक स्व. रामविलास शर्मा लिखते हैं;

यह कवि अपराजेय निराला,
जिसको मिला गरल का प्याला;
ढहा और तन टूट चुका है,
पर जिसका माथा न झुका है;
शिथिल त्वचा ढलढल है छाती,
लेकिन अभी संभाले थाती,
और उठाये विजय पताका-
यह कवि है अपनी जनता का!

बहुत ही बढ़िया पोस्ट है. अनूप जी के ब्लॉग का लिंक यह रहा. वहां जाकर पढ़िए.

श्री उदय प्रकाश के ब्लॉग पर 'निराला' जी के एक कविता प्रस्तुत की गई है. इस लिंक के सहारे जाइए.

जहाँ कवि इस बात से आश्वस्त है कि बसंत आ गया है वहीँ डॉक्टर महेश परिमल को बसंत के आगमन पर संदेह है. संदेह क्या है, वे मानकर चल रहे हैं कि बसंत नहीं आया. लिहाजा वे बसंत को खोजने के लिए तमाम जगह जाते हैं. कहाँ-कहाँ जाते हैं, यह जानने के लिए उनके लेख को पढ़िए. वे लिखते हैं;

"पर वसंत है कहाँ? वह तो खो गया है, सीमेंट और कांक्रीट के जंगल में। अब प्रकृति के रंग भी बदलने लगे हैं। लोग तो और भी तेज़ी से बदलने लगे हैं। अब तो उन्हें वसंत के आगमन का नहीं, बल्कि ‘वेलेंटाइन डे’ का इंतजार रहता है। उन्हें तो पता ही नहीं चलता कि वसंत कब आया और कब गया। उनके लिए तो वसंत आज भी खोया हुआ है। कहाँ खो गया है वसंत? क्या सचमुच खो गया है, तो हम क्यों उसके खोने पर आँसू बहा रहे हैं, क्या उसे ढूँढ़ने नहीं जा सकते।"

पूरा लेख आप डॉक्टर परिमल के ब्लॉग पर पढ़िए. ये रहा लिंक.

बसंत के आगमन पर पॉडकास्ट भी सुनिए. कबाड़खाना पर अशोक पाण्डेय जी ने ताहिरा सैयद द्वारा गाया
गीत लगाया है
. ये रहा लिंक. सुन आइये. बहुत सुख मिलेगा.

आज की चर्चा में बस इतना ही. आप सब को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं.

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गुरुवार, दिसंबर 31, 2009

तुलसी और दुर्वासा इतने भौंडे तो नहीं थे

ब्लॉग पर कविता लिखना कितना आसान है उसका एक उदाहरण देखिये. स्वनामधन्य महाकवि श्री अलबेला खत्री ने एक कविता लिखी है. कविता का शीर्षक है; "लोग माथा पीट रहे हैं और तुम लिंग पकड़ कर बैठी हो."

शीर्षक पढ़ लिया? अब कविता का कंटेंट पढ़िए;

कहीं स्वाइन फ्लू जैसा रोग है
कहीं आँगन में पसरा सोग है

कहीं ठण्ड के मारे हड्डियाँ चटक रही हैं
कहीं भूखी बुढ़िया भिक्षा को भटक रही है

लेकिन तुम्हें दिखाई नहीं देता
रुदन किसी का सुनाई नहीं देता

इसीलिए
शायद इसीलिए इतना ऐंठी हो
लोग माथा पीट रहे हैं
और तुम लिंग पकड़ कर बैठी हो

तुम्हारे दिल में ज़रा भी दर्द नहीं है
लगता है
तुम्हारी ज़िंदगी में कोई मर्द नहीं है

वरना ऐसे फालतू काम नहीं करती
भले लोगों को बदनाम नहीं करती

क्योंकि देह जिसकी असंतुष्ट होती है
सारी दुनियाँ उसके लिए दुष्ट होती है

न तो कोई ढंग का काम कर पाती है
न वह आराम से आराम कर पाती है

देखो ज़रा....
जग हर्ष मन रहा है
नव वर्ष मना रहा है
और तुम?
हाँ हाँ तुम!
अपने आपको
भाषा की जंजीरों में जकड कर बैठी हो
दुनियाँ चाँद पर पहुँच गयी
और तुम यहाँ लिंग पकड़ कर बैठी हो

लिंग ही पकड़ना था तो
किसी ज्योतिर्लिंग को पकड़ती
काशी में शिवलिंग को पकड़ती
मेवाड़ में एकलिंग को पकड़ती
तुम भी तर जाती
तुम्हारा कुनबा भी तर जाता
जहर जीतता भरा है
तुम्हारे भीतर' वह मर जाता

लेकिन तुम्हारे ऐसे सौभाग्य कहाँ?
सूर्पनखा के भाग्य में वैराग्य कहाँ?
उसे तो नाक कटनी है
और लुटिया डुबानी है
हे आधुनिक सूर्पनखा!
पुल्लिंग और स्त्रीलिंग में क्या सार है?
मेरी आँख से देख इसके अलावा भी संसार है
मगर तुम जिद्दी प्राणी हो' सच पहचानोगी नहीं
अपने घमंड के आगे किसी को मानोगी नहीं

इसलिए
ऐंठी रहो!
ऐंठी रहो
ऐंठी रहो
हम तो अपने काम में लग रहे हैं
तुम लिंग पकड़कर
बैठी रहो!
बैठी रहो!
बैठी रहो!

महाकवि की इस कालजयी कविता पर रामचरित मानस तथा भगवद गीता के जानकार और देवभाषा के पक्षधर श्री अरविन्द मिश्र की टिप्पणी पढ़िए;

जबर्दस्त- कवि अपने पर उतरता है तो दुर्वासा भी बनता है और तुलसी भी.
नववर्ष की मंगल शुभकामनाएं

आदरणीय राज भाटिया जी की टिप्पणी पढ़कर लगा जैसे वे भी ऐसा कुछ कहना चाहते थे लेकिन कह नहीं पाए. पता नहीं क्या मजबूरी थी? उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा;

अलबेला भाई जीयो खूब जीयो, बहुत सुन्दर और सटीक कविता कही, जो बात हम सब नहीं कह पाए वो आपने कह दी, हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा......
इस कालजयी कविता का सन्दर्भ अरविन्द मिश्र जी की पोस्ट है. जहाँ आयी टिप्पणियां भी महाकवि अलबेला खत्री जी की कविता से जरा भी कमतर नहीं हैं.

आप में से कुछ कह सकते हैं कि केवल एक पोस्ट को इतना महत्व देने की क्या ज़रुरत है? या फिर यह कि मुझे चिट्ठाचर्चा जैसे मंच इस्तेमाल कर किसी के खिलाफ लिखना शोभा नहीं देता.

मेरा कहना है;

ब्लॉग जगत को ख़राब किया जा रहा है.
ब्लॉग जगत में गुटबाजी हो रही है.
ब्लॉग जगत से गंध आ रही है.
कुछ लोगों ने ब्लॉग जगत को बर्बाद करने का बीड़ा उठा लिया है.

या इसी तरह की और बातें कहने वाले लोग खुद क्या कर रहे हैं? ब्लॉगर का स्त्रीलिंग क्या होना चाहिए? क्या महिला ब्लॉगर को ब्लागरा कहा जा सकता है? ऐसी बातों को आधार बनाकर दस लाइन की पोस्ट लिखकर तथाकथित बहस चलाकर ब्लॉग जगत का क्या भला किया जा रहा है? कितना भला किया जा रहा है? कहने की ज़रुरत नहीं कि रचना जी की टिप्पणियों और उनकी पोस्ट को आधार बनाकर कुछ लिखना और उसपर तथाकथित बहस करवाना किस तरह की ब्लागिंग है?

मैं और मेरे जैसे तमाम लोग यह मानते हैं कि ब्लॉग अभिव्यक्ति का माध्यम है. जो चाहे लिख सकते हैं. लेकिन क्या ऐसा कुछ लिखा जाना चाहिए जैसा परम आदरणीय अलबेला खत्री जी ने लिखा है? भौंडेपन की कोई लिमिट है कि नहीं? पाकिस्तानी हास्यास्पद रस के कलाकारों के साथ टेलीविजन पर तथाकथित लाफ्टर के फटके मारते-मारते इतना गिर जायेंगे कि ब्लॉग पर इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करेंगे? और टिप्पणी करने वाले बुद्धिजीवी उन्हें तुलसी और दुर्वासा बता रहे हैं.

कौन सी बहस महत्वपूर्ण है? यह कि "महिला ब्लॉगर को ब्लागरा कहा जाय?" या फिर यह कि "किसी के खिलाफ इस तरह की कविता लिखी जा सकती या नहीं?"

एक बार सोचियेगा.

मैं आदरणीय अरविन्द जी से और परम आदरणीय अलबेला खत्री जी से कहना चाहता हूँ कि उनके खिलाफ लिखने का या उन्हें केंद्र में रखकर चर्चा करने का मेरा कोई ध्येय नहीं है. बात केवल इसलिए उठाई गई है ताकि चिट्ठाकार यह तय कर सकें कि तथाकथित बहस के लिए कौन सा मुद्दा ज्यादा महत्वपूर्ण है?

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गुरुवार, दिसंबर 24, 2009

बड़ी घिनौनी लगती है अब आदम की बू-बास मियां

बहुत दिनों बाद आज चिट्ठाचर्चा करने बैठा हूँ. लगता है जैसे भूल गया हूँ कि कहाँ से शुरू करें और कहाँ ख़तम करें? लेकिन चर्चा करनी है तो कहीं से भी शुरू कर दूँ न. करीब बारह बजे रात के आस-पास से शुरू करूं तो पहले भोजपुरिया बाबू क्या कहीं, उसपर नज़र टिक जायेगी. भोजपुरिया बाबू का कहना है कि झारखण्ड में जनादेश खंडित है.

अब आप सोचिये कि नेताओं को पग-पग पर दोष देने वाले जनों का आदेश ही खंडित है. नतीजा यह कि नेता महिमा-मंडित है. अरे, ई तो कविता टाइप बन गया. जी हाँ, भोजपुरिया भाई के अनुसार वहां के मास्टर जी, सौरी-सौरी गुरु जी, एक बार फिर से उभरे हैं. अब वे उभरे हैं तो आदेश देने वाला जन तो डूबेगा ही. जाइए और जाकर पढ़िए कि भोजपुरिया भाई क्या विचार रखते हैं इस जनादेश पर.
जो जन अपना ही आदेश खंडित करेगा उसके साथ क्या-क्या हो सकता है, यह बता रहे हैं डॉक्टर मान्धाता सिंह. उनका कहना है कि सरकार तो लोकतांत्रिक है मूल उसका चरित्र जनविरोधी और राजशाही वाला है. अब बताइए, सरकारों का भी चरित्र ऐसा न रहे तो किसका होगा? झिंगुरी लोहार का? डॉक्टर सिंह के अनुसार;

छोडिये जाने दीजिये. वहीँ जाकर पढ़ लीजिये. ये रहा लिंक. उनका ब्लॉग सुरक्षित है.

बताइए, असुरक्षित जन और कुछ नहीं तो ब्लॉग ही सुरक्षित कर ले रहा है और उसी को अपना अचीवमेंट मान रहा है. वैसे अचीवमेंट का क्या है? हम सांसदों के खाने पर होने वाले खर्चे को उस रेट से कम्पेयर लें जिस रेट पर उन्हें खाना मिलता है. उसके बाद यह मानें कि ये हमारा अचीवमेंट है. खुशदीप सहगल जी ने यह अचीव किया है. आप खुद ही पढ़िए. ये रहा लिंक.

सुनते हैं डॉक्टर लोहिया भी नेहरु जी के ऊपर होने वाले खर्च का हिसाब रखते थे और कहते थे कि जिस दिन हिसाब पूरा हो जाएगा, समाजवादियों की सरकार बन जायेगी. हिसाब रखते-रखते डॉक्टर साहेब चल बसे. समाजवादी गणित टें बोल गया. उनके शिष्य बाद में नेहरु जी की पार्टी को समर्थन देने के लिए दिल्ली में डिनर अटेंड करते रहे.

कल रात हिंदी ब्लागरी (या ब्लागरा?) ने अपने शैशवकाल से एक बार फिर निकलने की कोशिश की. नतीजा यह हुआ कि एक बढ़िया परिपक्व बहस छेड़ी गई जिसमें अरविन्द जी ने पूछा कि; जैसे अदाकारा, शायरा वैसे ब्लागरा/चिट्ठाकार क्यों नहीं?
इस सवाल पर तमाम बेहतरीन टिप्पणियां आई हैं क्योंकि अरविन्द जी ने यह विषय खुली चर्चा के लिए रख दिया है. उन्हें संस्कृत के विद्वान् की ज़रुरत है जो इस पर प्रकाश डाल सके. देखिये, अगर आप भी कुछ कर सकते हैं तो बाकी लोगों की तरह कुछ कीजिये.

कुछ और करिए या न करिए, हो सके तो संजय पटेल जी की पोस्ट पढ़िए. रफ़ी साहब के ड्राईवर श्री अल्ताफ हुसैन खान का रफ़ी साहब की यादों के बारे में एक साक्षात्कार दिया है. बेहतरीन पोस्ट है. एक जगह अल्ताफ साहब कहते हैं;

"साहब के चाहने वाले और क़रीबी दोस्त उन्हें आलम पनाह कहा करते थे, क्योंकि हमारे साहब को अंदाज़ ही कुछ ऐसा था। बड़े क़रीने के आदमी थे। कहीं भी कार रुकवा कर चाहने वालों से मिल लेते थे। हर ख़त का जवाब ख़ुद लिखते थे। जब हमने आलम-पनाह कहरने की कोशिश की तो मना कर दिया। कहा - मैं रफ़ी ही ठीक हूँ और वह भी मोहम्मद रफ़ी।"


विष्णु बैरागी जी ने तीन मैकेनिक्स के बारे में लिखा है. उनका कहना है कि;

"कुछ दिनों से मैं तीन मिस्त्रियों (मेकेनिकों) से दुःखी हूँ। मेरी व्यथा-कथा प्रस्तुत कर रहा हूँ और उम्मीद कर रहा हूँ ऐसा केवल मेरे साथ नहीं हो रहा होगा।"


बेहतरीन पोस्ट है. एक मैकेनिक ईश्वर के बारे में विष्णु जी लिखते हैं;

"उसकी हँसी मेरे गुस्से को अधिक टिकने नहीं देती। उसकी विनम्रता मुझ जैसे कुटिल आदमी को भी साध लेती है और मैं उसके सामने परास्त हो जाता हूँ। कहता हूँ - ‘अब तुझे नहीं बुलाऊँगा।’ वह मुँह फेरकर, हँसते हुए कहता है - ‘तो बताओ जरा, किसे बुलाओगे।’"


समीर भाई का लैपटॉप नहीं रहा. मैंने तो शुरू-शुरू में ही सबकुछ बता दिया लेकिन समीर भाई ने लैपटॉप के बारे में बाद में बताया. शेर ठोकने के बाद. जिन्हें यह शिकायत है कि हिंदी ब्लागरी में सस्पेंस नहीं लिखा जाता वे आज से शिकायत करना बंद कर दें....:-)

पाठकों से टिपण्णी के माध्यम से श्रद्धांजलि व्यक्त करने के लिए निवेदन करते हुए उन्होंने लिखा;

"निवेदन: कृप्या टिप्पणी के माध्यम से अपनी श्रृद्धांजलि अर्पित करें तो मुझे आपका पता वापस मिले वरना तो वो सब साथ ले ही गया है."


लोगों ने उनकी बात मानते हुए टिप्पणियों में श्रद्धांजलि दे दी है. आप ने अगर अभी तक नहीं दी है तो दे आइये.

निशांत जी ने आज ईसा मसीह के जीवन से एक कहानी छापी है. क्रिसमस का मौसम है सो ईसा मसीह के जीवन में घटी घटना से बढ़िया और क्या हो सकता है? आप कहानी पढ़ें. सुन्दर कहानी है.

अलबेला खत्री जी ने सूचना दी है कि उन्होंने अभीजीत सावंत के साथ मिलकर लाफ्टर के फटके में धमाल मचा दिया है. बता रहे हैं कि फिल्मसिटी में इस धमाल की शूटिंग पूरी हो गई है.

अभिषेक ने एक पोस्ट लिखी है. समाज में तमाम तरह के लूप के बारे में. पढ़िए. वे लिखते हैं;

"माइकल डग्लस का वालस्ट्रीट फिल्म का एक डायलोग याद आता है: 'एक समय मैं जिसे दुनिया की सारी दौलत समझता था वो आज एक दिन की कमाई है '. मेरे एक दोस्त ऐसे हैं जिनकी महीने की कमाई और मेरे एक समय के संसार की सारी दौलत में आराम से मैच हो जायेगा."


वाल स्ट्रीट के बारे में बात करते हुए अभिषेक लिखते हैं;

"वैसे 'ज़ीरो सम गेम' से वालस्ट्रीट का एक और डायलोग याद आया:
Bud Fox: How much is enough?
Gordon Gekko: It's not a question of enough, pal. It's a zero sum game, somebody wins, somebody loses. Money itself isn't lost or made, it's simply transferred from one perception to another."


आज विनोद कुमार पाण्डेय जी का जन्मदिन है. उन्हें जन्मदिन की बधाई.

"क्या हिन्दु धर्म अब उन अपराधियों, हत्यारों, भू-माफियाओं, हवाला कारोबारीयों के बल पर जिन्दा रहेगा,जो भगवा धारण कर लोगों को छल रहे है?"


योगेन्द्र मौदगिल जी की गजल पढ़िए. उनका ब्लॉग सुरक्षित है इसलिए ये अशआर मैं खुद टाइप कर रहा हूँ. मेरी मेहनत के लिए भी मुझे दाद दीजियेगा प्लीज. योगेन्द्र जी लिखते हैं;

उन सब ने खंडित कर डाला जिनपर था विश्वास मियां
क्या अपनों को धर के चाटे क्या अपनों की आस मियां

इस बस्ती से आते-जाते नाक पे कपड़ा रख लेना
बड़ी घिनौनी लगती है अब आदम की बू-बास मियां


पूरी गजल आप उनके ब्लॉग पर पढ़िए.

आज की चर्चा में बस इतना ही.आप सब को क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाएं.

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