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शुक्रवार, जून 19, 2009

मरने की दुवायें क्यूं मांगू, जीने की तमन्ना कौन करे: संगीत चिट्ठाचर्चा

आज सबसे पहले तो सरोद के महान साधक उस्ताद अली अकबर खाँ साहब के निधन पर हार्दिक श्रद्धान्जली। ऐसे महान कलाकार के जाने के बाद सरोद वादन के क्षेत्र में एक शून्यता व्याप सी गई है। कबाड़खाना पर संजय पटेल, खां साहब को श्रद्धान्जली अर्पित करते हुए खां साहब का बजाया हुआ राग पीलू सुनवा रहे हैं।
आपने किशोरदा का गाया हुआ पहला गीत सुना है जिसे उन्होने १९४८ में खेमचन्द्र प्रकाश जी के संगीत निर्देशन वाली फिल्म जिद्दी में गाया था? गीत के बोल थे मरने की दुवायें क्यूं मांगू, जीने की तमन्ना कौन करे।
चलिये अगर इस गीत को आपको एक बहुत ही सुन्दर और रूहानी आवाज में सुनाया जाये तो? आप इस गीत को सुनेंगे तो अपने आप वली मोहम्मद साहब की सुन्दर आवाज में डूबे बिना नहीं रह पायेंगे। तो आप सुनना चाहते हैं तो सुखनसाज पर आईये यहां संजय भाई पटेल इस इस सुन्दर गीत को सुनवा रहे हैं।
वली मोहम्मद जी के बारे में संजय भाई कहते हैं
उन्हें सुनें तो लगता है जैसे सहरा में एक बाबा बाजा लेकर बैठ गए हैं औरकन्दील
की मध्दिम रोशनी में आपको मनचाही बंदिशें सुना रहे हैं।
आइये अब आपको और इन्तजार करवाने के बजाय सीधे सुखनसाज पर बज रहे इस कलाममरने की दुवायें क्यूं मांगू, जीने की तमन्ना कौन करेपर ही ले चलते हैं।

सुन्दर गीत को सुनने के बाद संजय भाई के खुद के चिट्ठे सुरपेटी पर जाना हुआ तो वहां पीनाज मसानी की आवाज में एक सुन्दर भजन सुनने को मिला.. मैं तेरी दासी, तू मेरा दाता
यूनुस भाई के चिट्ठे पर कम ही पोस्ट आती है पर जो आती है वे बहुत ही बढ़िया होती है। बहुत बढ़िया गीतों की पसंदगी के साथ गीत, गायक, संगीतकार और फिल्म की जानकारी भी बहुत बढ़िया होती है। अपने चिट्ठे पर इस बार सुरैया को याद करते हुए यूनुस भाई सुनवा रहे हैं एक गीत कोई दिल में समाया चुपके चुपके
मनीष भाई लगातार दो पोस्ट में सुप्रसिद्ध गज़ल गायक चंदन दास के बारे में बताते हुए उनकी गाई हुई कुछ गज़लें सुनवा रहे हैं। पहली गज़ल है आती जाती हर मोहब्बत है चलो यूं ही सही... और दूसरी गज़ल है जब मेरी हकीकत जा जा कर उनको सुनाई लोगों ने....
गीतों की महफिल पर इस महीने में अब तक दो पोस्ट आई हैं, और दोनों ही पोस्ट में लता जी के वे गीत हैं जो अमूमन रेडियो पर सुनाई नहीं देते। पहला गीत है ओ जिन्दगी के मालिक तेरा ही आसरा है और दूसरा गीत है जमालसेन का संगीतबद्ध वह गीत जो रचा गया था फिल्म पहले कदम के लिये पर बाद में फिल्म में इसे शामिल नहीं किया जा सका। यह गीत है बीता हुआ एक सावन एक याद तुम्हारी

चिट्ठाचर्चा में पता नहीं क्यों हिन्दी में टाईप करने का ऑप्शन रखा हुआ है, कुछ टाइप करने के बाद एडिट करना हो तो यह अपने आप ही सुझाव दे कर कभी हिन्दी तो कभी अंग्रेजी में शब्दों को बदल देता है, और एडिट करते समय इतनी खीझ होती है कि पूरी चर्चा को डिलीट कर दिया जाये। अभी मुझसे टाइप के दौरान एक गलती हुई मैने थे, मरने की बजाय थमरने टाइप कर दिया। जब उसे सुधारने की कोशिश की तो अपने आप कभी ठेमराने तो कभी marraney टाइप हो जाता। ऐसा पहली बार नहीं हुआ, पिछली बार मुझे शीर्षक में चिट्ठाचर्चा टाइप करना था और ये जबरन चित्त्ता और ना जाने क्या क्या टाईप करवाने तुला हुआ था।
एक बार तो मन हुआ कि डिलीट ही करदें पर अनूपजी से वायदा किया था कि आज पोस्ट की जायेगी इसलिए फिर हटमल में जाकर आवश्यक सुधार किया। पोस्ट में तो किये जा सकते हैं लेकिन शीर्षक में..?
चित्र देखिये


आजकल गीत संगीत के चिट्ठों पर पोस्ट्स बहुत कम रही है, ना ही उत्साहजनक हिट्स/टिप्पणियां। इतनी पोस्ट भी नहीं कि जिनकी चर्चा की जा सके। अत: अब गीत संगीत के चिट्ठों की चर्चा कर पाना मेरे लिये मुश्किल हो रहा है सो अंतिम चिट्ठाचर्चा के साथ अलविदा।

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शनिवार, मई 02, 2009

नहीं रही इकबाल बा्नो: साप्ताहिक संगीत चिट्ठाचर्चा

नमस्कार, एक बार फिर हाजिर हूं, गीत संगीत के चिट्ठों पर पोस्ट हुए गीतों या उनकी चर्चा की जानकारी लेकर। पिछले हफ्ते हिन्दी चिट्ठों (संगीत के चिट्ठे) पर गज़लों का बोलबाला रहा। 

सबसे पहले हम बात करेंगे मशहूर गायिका इकबाल बानो  की जिनका पिछले दिनों (21 अप्रेल को) इंतकाल हो गया था। कबाड़खाना पर  अशोक पाण्डे जी उनको श्रद्धान्जली देते हुए अपने लेख में मिर्जा गालिब की मशहूर गज़ल

मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए
जोश-ए-कदः से बज़्म चराग़ां किये हुए

जिसे  स्व. इकबाल बानो ने स्वर दिया है; को पोस्ट की है । इसके बाद अशोक भाई  दूसरी पोस्ट सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराए जाएंगे

में एक और एक्स्क्लुसिव रचना हम देखेंगे... सुनवा रहे हैं।

महेन भाई भी अपने ब्लॉग प्रत्येक वाणी में महाकाव्य में बानो को श्रद्धान्जली देते हुए  मिर्जा गालिब की एक और दूसरी गज़ल दिया है दिल अगर उसको बसर है क्या कहिए सुनवा रहे हैं। इन लाईनों को देखिये

दिया है दिल अगर उस को, बशर है क्या कहिये
हुआ रक़ीब तो हो, नामाबर है क्या कहिये
ये ज़िद, कि आज न आवे और आये बिन न रहे
क़ज़ा से शिकवा हमें किस क़दर है क्या कहिये

इतनी उम्दा रचना और इकबाल बानो की आवाज हो तो... सुनने में एक अलग सा सूकुन मिलता है, वर्णन कर पाना मुमकिन नहीं है, ये तो गूंगे के गुड़ के समान है, बस चख ( सुन) कर ही आनन्द का अनुभव किया जा सकता है।

कबाड़खाने पर ही अशोक भाई अपनी एक और पोस्ट में एक गुमनाम अभिनेत्री गुलाब बाई जो एक जमाने में मशहूर नौटंकी कलाकार एवं गायिका थी के बारे में बता रहे हैं, सचमुच अशोक भाई हमने भी आज तक ना तो गुलाब बाई का नाम सुना था ना उनकी आवाज सुनी थी, आपने हमें अनमोल हस्ती के बारे में बताया सुनवाया बहुत बहुत आभार।अशोक भाई अपनी इस पोस्ट में कह रहे हैं कि

... ख़ैर छोड़िये, इन तफ़सीलात के बारे में जानना हो तो किताब खोज कर पढ़ें. मैं कोशिश में हूं कि किसी तरह इस किताब के अनुवाद के अधिकार हासिल कर लूं और जल्द से जल्द हिन्दी के पाठकों के सम्मुख इसे रख सकूं. यह मास्टर फ़िदा हुसैन नरसी के लिए मेरी व्यक्तिगत श्रद्धांजलि भी होगी और गुलाब बाई के जीवन वृत्त के माध्यम से लोग क्रूरतापूर्वक बिसरा दी गई एक विधा का इतिहास हिन्दी में पढ़ सकेंगे.

आमीन!

हम दुआ करते हैं अशोक भाई की आपको इस पुस्तक को अनुवाद करने के अधिकार मिलें और हम सब गुलाब बाई के बारे में और ज्यादा जान सकें।

अब  आगे  बढ़ते हुए सबसे पहले  चर्चा करते हैं मशहूर संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन के शंकर यानि स्व. शंकर राम सिंह रघुवंशी को उनकी बाईसवीं पुण्य तिथी पर श्रद्धान्जली देते हुए  पर एक लेख  अभागे शंकर लिखा है दिलीप कवठेकर जी ने ।  इस लेख में दिलीप जी ने लिखा है कि स्व. शंकर जी केवल अच्छे संगीतकार ही नहीं वरन अच्छे गायक भी थे, आईये उनके ही शब्दों में पढ़ते हैं।

बस एक मोड पर यूं हुआ कि शंकर जी ने शोभाजी को एक जगह मुरकी लेने को कहा, मगर किसे भी तरह उनसे वह मुरकी गले से नही उतरी.अंत में फ़ेस सेविंग के लिये शोभा जी नें कहा-शंकरजी, ये मुरकी तो गले में से निकलना संभव ही नही है, वरना मैं तो गा ही देती.
शंकर जी हंसे, हारमोनियम पकडा ,आंखें बंद की और त्वरित ही खुद गाकर वह मुरकी पेश की !!
मान गये शंकर जी... शोभा जी के हाथ खुद ब खुद जुड गये उस महान संगीतकार के वंदन में जो स्वयम एक महान गायक भी था!!

पिछले हफ्ते एक बड़ी ही मजेदार बात हुई मीत ने और मैने ( महफिल पर) एक साथ एक दिन एक ही गीत अपने अपने ब्लॉग पर पोस्ट किया, वह गीत है  रफी साहब का गाई हुई गैर फिल्मी गज़ल उठा सुराही.... रफी साहब की यह गज़ल सुनने के अलावा बढ़िया अशआर  पढ़ने  की इच्छा हो तो मीत के चिट्ठे पर इस पोस्ट मय नहीं है तो निगाहों से काम ले साकी  को जरूर पढ़िये।

पारुल आज अपने चिट्ठे पर  जगजीत सिंह की एक शानदार गज़ल सुनवा रही हैं  खुद को मैं ना बाँट ना लूं दामन दामन  कर दिया अगर मुझको मेरे हवाले।

हिन्द युग्म पर इस सप्ताह गीता दत्त छाई रहीं, पराग सांकला ने अपने एक लम्बे लेख में स्व. गीता दत्त को श्रद्धान्जली देते हुए  कई दुर्लभ गीत इस पोस्ट असली गीता दत्त की खोज में;  में सुनवाये, जो हम सबके लिये आज तक लगभग  अनसुने-अन्जाने ही थे।

 यहाँ बताना चाहूंगा कि राजस्थान के पराग सांकला गीता दत्त के बहुत बड़े प्रशंसक- भक्त हैं और गीता दत्त पर एक साईट  गीतादत्त.कॉम  पराग ने बनाई है। जिस पर स्व. गीता जी के बारे में बहुत सी जानकारी पाई जा सकती है।

इस पोस्ट के अलावा ओल्ड इज गोल्ड श्रंखला में भी गीतादत्त का ही गाया हुआ गीत  मेरा सुन्दर सपना बीत गया सुनवाया गया।
 
आगाज पर अफलातून जी सुनवा रहे हैं आंधी फिल्म का मशहूर गीत ये पाँच सालों का देने हिसाब आये हैं

मनीष भाई बता रहे हैं राँची की एक शाम पीनाज मसानी के नाम.. के बारे में और उनकी गाई गज़ल कहाँ थे रात को हमसे ज़रा निगाह मिले सुनवाई।

महफिल पर पिछले दिनों तीन प्रविष्टियां आई.. वे निम्न हैं
अब इजाजत दीजिये अगले महीने के पहले शनिवार को फिर मुलाकात होगी तब तक के लिये राम.. राम।

इकबाल बानो और गुलाब बाई के फोटो "कबाड़खाने" से साभार

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शनिवार, अप्रैल 11, 2009

निर्भय निर्गुण गुण गाऊंगा रे मैं तो: संगीत चिट्ठा चर्चा

कभी कभी आलसी व्यक्‍ति एकदम से जब सक्रिय होता है तो बढ़िया कमाल चीजें खोज लेते आता है। हमारे यूनुस भाई को ही लीजिये या तो वे महीनों पोस्ट नहीं लिखेंगे या फिर जब लिखेंगे तो कमाल करेंगे। महीनों से पिछले कई महीनों से दो पोस्ट के औसत से पोस्ट लिखने वाले भाई साब इस हफ्ते दो पोस्ट लेकर आये। और पोस्ट क्या लाये कमाल कर गये। पहली पोस्ट में कुमार गन्धर्व और वसुताई ( श्रीमती वसुन्धरा कोमकली जी) की आवाज में कबीर के निर्गुण भजन निर्भय निर्गुण गुण रे गाउंगा पोस्ट किया है| इस सुन्दर पोस्ट के लिये रेडियोवाणी के प्रशंसक रविकान्तजी को भी धन्यवाद देना चाहिये जिन्होने इन निर्गुण-गीतों की फरमाइश की और हमें इतनी बढ़िया गीत सुनने को मिले।
दूसरी पोस्ट में रेडियोनामा को दो साल पुरा होने के उपलक्ष्य में युनुस भाई उस्ताद बरकत अली खाँ की गाई एक गज़ल लेकर आये हैं गज़ल के बोल हैं दोनों जहां तेरी मोहब्बत में हार के
मेरे पसंदीदा रागों में से एक है देस राग और इसी देसराग को अफलातूनजी जी आगाज़ पर उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में सुनवा रहे हैं, आप इसे ध्यान से सुनिये देखिये आपका मन किसी दूसरी दुनिया में चला जाता है। हो सकता है आपको देसराग पर आधारित फिल्म्स डिविजन की वे डॉक्यूमेंट्री भी याद आ जायें जो आप बचपन में दूरदर्शन पर सुना-देखा करते थे।
हिन्द युग्म का संगीत ब्लॉग बड़ा जल्दी जल्दी अपडेट होता है। इस पर आज एक ही दिन में दो तीन पोस्ट्स आई हैं पर सबसे बढ़िया पोस्ट है महफिल-ए-गज़ल श्रेणी में विदुषी बेगम अख्तर की गज़ल खुशी ने मुझको ठुकराया है, दर्दो ग़म ने मुझे पाला है

आपने येसुदास के स्वर में गीत का करूं सजनी आये ना बालम ... सुना ही होगा पर क्या आप जानते हैं इसे उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ साहब ने भी गाया है? नहीं सुना ना तो महेनजी के ब्लॉग की मुलाकात लीजिये, वहां उस्तादजी का यह मधुर और दुर्लभ ठुमरी आपका इन्तजार कर रही है। यह ठुमरी आप पुरा सुने क्यों की पूरी होते होते राग मालकौंस में एक बंदिश है जो बिना सुने रुकने से आप एक बहुत ही सुन्दर बंदिश को सुनने का आनन्द नहीं ले पायेंगे।

मनीषभाई अपने ब्लॉग पर सुनवा रहे हैं आशा ताई और सुरेशवाडेकर का गाया हुआ गीत
प्यार के मोड़ पे छोड़ोगे जो बाहें मेरी
तुमको ढूँढेगी ज़माने में निगाहें मेरी

जिन चिट्ठों पर गीत- संगीत पोस्ट होता है उन चिट्ठों की चर्चा "एकलाइना" में करना उनके साथ न्यायसंगत नहीं होगा और समयाभाव के कारण पूरे चिट्ठे देख नहीं पाया, आज बहुत से लिंक छूट गये हैं, क्षमा चाहता हूँ।

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रविवार, मार्च 29, 2009

इक लौ क्यूं इस तरह बुझी मेरे मौला? साप्ताहिक संगीत चिट्ठाचर्चा

एक बार फिर मैं हाजिर हूं गीत संगीत के चिट्ठों की जानकारी लेकर!
मनीष भाई और उसके बाद तरुणजी के द्वारा पिछले दो शनिवारों को संगीत चिट्ठों की चर्चा किये जाने से थोड़ा बोझ हल्का हो गया, अब कोई एकाद मित्र और तैयार हो जायें तो मजा ही आ जाये।
आज सबसे पहले बात करते हैं निठल्ला उर्फ तरुण भाई के ब्लॉग गीत गाता चल पर पोस्ट किये गीत बड़े अच्छे लगते हैं की। स्व.किशोर दा के सुपुत्र अमितकुमार भले ही फिल्मों में अपने पिता की तरह ज्यादा सफल ना हों पाये हों पर "टैलेंट" की उन में भी कोई कमी नहीं, ये इस गीत को सुनने से साफ स्पष्‍ट हो जाता है। खासकर पहले और दूसरे पैरा की पहली लाईन जब वे गाते हैं हम तुम कितने पास हैं कितने... और तुम बिन सबको छोड़के चले कैसे जाओगी? इन लाईनों को बार बार सुनने का मन करता है। इस गीत में गीत के अलावा एक और चीज जो बहुत ही बहुत कमाल करती है वो है दो पैरा के बीच का पार्श्व संगीत, काश ऐसा कोई तरीका होता जिससे मैं आपको अपने मन का हाल बता सकता।

अफलातूनजी अपने ब्लॉग आगाज़ पर काजोल की मां का मजेदार गीत बजा रहे हैं, भाई साहब काजोल की माँ तनुजा बतौर गायिका बले ही इतनी प्रसिद्ध ना हो पर कम से कम इतनी अन्जानी भी नहीं कि उनका काजोल की मम्मी के नाम से परिचय देना पड़े। अपने जमाने में तनुजा खासी प्रसिद्ध अभिनेत्री रही हैं। ये बात अलग है कि गीत ना तो सलिल दा के स्तर का है ना ही कोई खास मधुर, हां काजोल की मां का गीत के नाम से एक बार सुना जरूर जा सकता है।
इस गीत को सुनवाने के तुरंत बाद की पोस्ट में अफलातूनजी एक बार फिर मधुर गीत ओ रसिया मोरे पिया छिन ले गयो रे जिया लेकर आये हैं। इस गीत की खास बात यह है कि इसके संगीतकार हृदयनाथ मंगेशकर हैं और आशा दीदी गायिका! जब भाई बहनों की जोड़ी मिलती है तब यकीनन मधुर गीत बनता है, भले ही लता- हृदयनाथ हो या लता- आशा हो या फिर इस गीत की तरह आशा- हृदयनाथ।

हिन्द युग्म के साज़-ओ-आवाज़ पर शिशिर पारखी, जगजीत सिंह की खूबसूरत गज़ल आपको देख कर देखते रह गया को अपनी आवाज में सुना रहे हैं, सुनने के बाद लगता है वाकई शिशिर की गायकी में दम है।
इसी चिट्ठे पर सुजॉय चटर्जी ने ओल्ड इज गोल्ड श्रंखला में मेरे बहुत पसंदीदा गीतों में से एक गीत तेरे सुर और मेरेगीत पोस्ट किया। ये गीत यकीनन सदाबहार है। इस गीत को शायद १०० साल बाद भी सुना जायेगा तो लताजी की आवाज, पं. वसंत देसाई का संगीत और भारत रत्‍न बिस्मिल्ला खां साहब की शहनाई को सुन कर सुनने वाला झूम उठेगा।
अब मैं जिस की पोस्ट के बारे में लिख रहा हूँ उसके बारे में पिछले हफ्ते तरुणजी लिख चुके हैं पर मैं भी लिखने से अपने आप को रोक नहीं पाया क्यों कि रचना ही ऐसी कमाल की है।
महेन मेहता जी अपने इस चिट्ठे पर सबसे बढ़िया रचनायें लेकर आते हैं, चिट्ठे का नाम हैप्रत्येक वाणी में महाकाव्य...!हालांकि मैने इस चिट्ठे पर शायद कभी टिप्प्पणी ना की हो पर मैं इस चिट्ठे को बहुत पसन्द करता हूँ। इसे सबसे बढ़िया संगीत चिट्ठा कहा जा सकता है।
महेन इस हफ्ते अपने ब्लॉग पर भारत रत्न स्व. एम एस सुब्बुलक्ष्मी जी का गाया हुआ भजगोविन्दम मूढमते ले कर आये हैं। लक्ष्मीजी की आवाज को सुनना हर समय एक दिव्य अनूभूति देता है। मेरे संग्रह में सुबुलक्ष्मीजी की तमिल फिल्म मीरा के गीत हैं, उसमें एक गीत यह भी है, संभव है कि भजगोविन्दम.... को मीरा फिल्म में शामिल किया हो।
एक शाम इनके नाम!
मनीष भाई बहुत मेहनत करते हैं साल भर के गीतों को सुनना और उन्हें वार्षिक गीतमाला के रुप में प्रस्तुत करना मामूली बात नहीं। इस हफ्ते आप वार्षिक संगीतमाला का सरताज गीत ले कर आये हैं। गीत फिल्म आमिर का है। भले ही खास कमाल ना दिखा पाई हो पर फिल्म के गीत बड़े ही लाजवाब हैं। मनीष ने इस गीत
इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला
गर्दिशों में रहती बहती गुजरती.
. को पहले स्थान पर रखा है।

अशोक जी के चिट्ठे सुखनसाज़ पर परवेज मेहदी की सुंदर आवाज में आपने यह गज़ल सुनी कि नहीं.. जिस शहर में भी रहना उकताये हुए रहना? आवाज की गुणवत्ता भले ही थोड़ी कमजोर हो पर गज़ल सुनने में आपको आनन्द जरूर आयेगा।

संगीत की कोई भाषा नहीं होती! गुप्‍ताजी के अंग्रेजी ब्लॉग Indian Raaga पर गुप्ताजी एक से एक लाजवाब चीजें लेकर आते हैं। ये भी उन चिट्ठों में से एक है जिसे "बुकमार्क" कर रखा जा सकता है।
इस हफ्ते की पोस्ट में Four Random Songs 2 आपके ब्लॉग पर उस्ताद राशिद खां के गाये राग जोगकौंस पर आधारित गीत पीर पराई जाने ना बालमवा, मलिकार्जुन मंसूर के गाये राग बिहारी पर आधारित रचना नींद ना आये...भारत रत्‍न पं. भीमसेन जोशी की आवाज में राग खमाज पर आधारित गीत पिया ना आये.. बजे! आहा! सुनकर ही आनन्द आ गया। इनकी इस पोस्ट में राग मालती बिहाग वाला गीत बज नहीं रहा।
गीतों की महफिल वाले जिसे सबसे आलसी ब्लॉगर का एवार्ड दिया जा सकता है, महीनों जिनके ब्लॉग पर वीरानी छाई रहती है इस हफ्ते अचानक तीन-तीन पोस्ट लेकर आये। अब जैसे आलसी वे खुद हैं शायद वैसे ही आलसी इस के पाठक निकले, तीन में से दो पोस्ट तो फ्लॉप रही! एक की तो बोहनी भी तब हुई जब अपने जीमेल के स्टेट्स पर आप लिख कर बैठे थे, धत्त बोहनी भी नहीं हुई!, तब कुछ मित्रों को दया आ गई और दो तीन टीप गये। :)
पहली पोस्ट में महफिल में राग हमीर के दो वीडियो दिखाये गये थे और पाठकों से पहेली के रूप में पूछा गया कि इस गीत पर आधारित कौनसा प्रसिद्ध गीत है, पोस्ट करने के पांचवे मिनिट में यह पहेली फुस्स हो गई क्यों कि सही जवाब नीरज रोहिल्ला ने दे दिया था।
दूसरी पोस्ट में सूरदास का एक भजन दीनन दुख: हरन देव संतन हितकारी था जो जगजीत सिंह और पी उन्नीकृष्णन की आवाजों में था, पता नहीं क्यों यह दिव्यस्वर में गाया हुआ दिव्य भजन पाठकों को पसन्द ही नहीं आया।
तीसरी और शायद आखिरी पोस्ट में एक जमाने की मशहूर फिल्म जोगन का एक दुर्लभ गीत था। जोगन फिल्म के गीत अक्सर रेडियो या टीवी पर सुनाई दे जाते हैं पर महफिल पर पोस्ट किया हुआ गीत बहुत कम सुनाई देता है। यह गीत था तलत महमुद की आवाज में सुन्दरता के सभी शिकारी... इस पोस्ट का भी हाल बुरा ही रहा।
तो आज की चर्चा खत्म हुई अगले शनिवार मनीष जी की बारी है और उससे अगले हफ्ते टीजे उर्फ निठल्ला उर्फ तरूण जोशीजी की।

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रविवार, मार्च 08, 2009

गीत-संगीत के चिट्ठों की चर्चा

कुछ दिनों पहले चैट के दौरान फुरसतिया भाई साहब का आदेश हुआ- क्यों ना गीत-संगीत के चिट्ठों की चर्चा तुम किया करो! अनूपजी का आदेश का पालन नहीं करने की धृष्टता करने की हिम्मत मुझमें नहीं सो मैने कहा जी करूंगा, पर रोजाना नहीं कर सकूंगा। अनूपजी ने कहा जब तुम चाहो।
बात आई गई हो गई, मैं आलस्यवश उस आदेश पालन कर नहीं पाया पर मन में वह बात कचोटती रही। बाद में सोचा कि इसकी शुरुआत कैसे हो! जितने संगीत चिट्ठों को जानता था उनकी फीड लिंक को एक ब्लॉग पर लगाया और उसका नाम रखा गीत गाता चल ताकि सभी चिट्ठों की ताजा पोस्ट की जानकारी मिल सके।
इस ब्लॉग की सूचना के आधार पर पिछले दिनों संगीतमय चिट्ठों पर जो पोस्ट्स आई उनके बारे में लिखना चाहूंगा।
सबसे पहले बात करते हैं हिन्द युग्म के संगीत ब्लॉग आवाज की। यहां सुजॉय चटर्जी आज ओल्ड इज गोल्ड श्रंखला में लता जी का गाया हुआ एक बहुत ही मधुर गीत सुना रहे हैं- तुम क्या जानो तुम्हारी याद में हम कितना रोये

और अमितजी (मीत)के ब्लॉग पर इसे भी एक बार जरूर सुने। होरी के रंगों में तरबतर होने से पहले इकबाल बानो की शिकायत भी सुन लेने में कोई हर्ज नहीं है- इकबाल बानो की शिकायत है
हम तो रुसवा हुए वफ़ा करके
आपको क्या मिला जफ़ा करके।

होली आने में अब ज्यादा दिन नहीं बचे पर छोटे बच्चों की तरह हमारे चिट्ठाकारों ने अपने ब्लॉग पर होली/होरी से संबधित गीत चढ़ा कर होली का आगाज़ कर दिया है... आगाज़! अरे हाँ इस शब्द से याद आया हमारे प्रिय श्री अफलातून जी के इसी ब्लॉग पर भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी गाते हुए दिख रहे हैं राम रंगी रंग ले
कबाड़खाना में कबाड़ की बजाय अबीर- गुलाल के बादल छाये हुए हैं, यहाँ सिद्धेश्वर जी हमें शोभा गूर्टू की आवाज में एक फगुनाया रसिया सुनवा रहे हैं - आज बिरज में होली रे रसिया। इसे सुनकर आप एकदम मदमस्त हो जायेंगे।

ठुमरी वाले विमल जी पर भी होली का रंग कई दिनों से चढ़ा है, जरा देखिये तो मार्च के पहले हफ्ते में ही फागुन ने इन पर अपना असर डारा है। विमल जी आपको होली के रंगों में सराबोर करने का बहुत सा सामान अपने ब्लॉग पर सजाये बैठे हैं। २ तारीख को आप अपने ब्लॉग पर छाया गांगुली जी की आवाज में सुनवाया था जब फागुन रंग झमकते हों देख फुहारे होली की उसके बाद एक बार फिर आप हमें रंगो में भिगोये बिना उसका असर डारने के लिये ले आये हैं एक ही दादरा दो अलग अलग आवाजों में। ये दो आवाजे हैं शोभा गूर्टू और उस्ताद शुजात खां साहब की। गीत है रंगी सारी गुलाबी चुनरिया रे मोहे मारे नजरिया संवरिया रे........ ध्यान से पूरा सुनने पर मुझे लगा कि शायद विमलजी शोभा गूर्टू की आवाज में यह गीत पोस्ट करना भूल गये हैं, क्यों कि यहां सिर्फ उस्ताद शुजात खां साहब का गीत ही बज रहा है।

मयंक जी के नये नवेले चिट्ठे का तो नाम ही रंग बिरंगा है- क्या रंग है ज़माने का? इस चिट्ठे पर तीसरी ही पोस्ट में मयंक जी कमाल करते हैं और आबिदा परवीन की आवाज में गाये गीत से हमें बता रहे हैं कि आज रंग है।

इधर पारुल पर भी होरी की या भंग की मस्ती चढ़ी है, वे तनि बौराई हुई कहती हैं तनि धीरे बोलो कोई सुन लईगा..तोरी तिरछी नजरिया पर मर लेगा... भई पारुल जी इस सुंदर गीत को सुनने के बाद गीत और गायकी पर कौन ना मर मिट जायेगा!

अब इतने रंगों के बाद भी मुझे लगता है कि कुछ और रंग होने चाहिये थे... इधर उधर खोज करने पर पता चलता है कि Indian Raga पर भी होली के कई शेड्स (Holi:Five Shades) बिखरे पड़े हैं यहां आपको एक से एक लाजवाब कलाकार रंगों में भिगोने तैयार बैठे हैं, देखिये शोभा गूर्टू, अबिदा परवीन तो हैं ही ओ हो हो.. पण्डित छन्नू लाल मिश्र और गिरिजा देवी भी हैं।
पंण्डित छन्नू लाल मिश्र जहां राधाजी के स्वर में नंद के लाल को कहते हैं-
रंग डारूगी.. रंग डारूंगी,
सांवरे रंग लाल कर दूंगी,
मली गुलाल दोऊ गुलाल पे रंग डारूंगी
गिरिजा देवी कहती हैं उड़त अबीर गुलाल लाली छाई हैं.... और दूसरे गीत में शिकायत करती हैं आँखन भरत गुलाल... रसिया ना माने रे..
आ हा हा.... अब मैं एकदम मस्त हो चुका हूं, कैसा अदभुद नशा छाया है बिना भंग चखे ही।
अब और कुछ सुनने सुनाने की जरूरत नहीं रही।

संगीतमय चिट्ठाचर्चा आपको कैसी लगी, अपनी राय जरूर बतायें।
सागर चन्द नाहर
॥दस्तक॥,गीतों की महफिल,तकनीकी दस्तक

होली चित्र Indian Raga की इस पोस्ट से साभार

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शनिवार, जुलाई 12, 2008

आज एक बहुत बढ़िया पोस्ट पढ़ी

आजकल व्यवसायिक कारणों से चिट्ठे पढ़ने का समय नहीं मिल पाता, परन्तु मैने जीमेल/क्लिप्स में भी अपनी पसंसीदा चिट्ठों और एग्रीग्रेटर का लिंक जोड़ रखा है सो सूचनायें कभी कभार मिल जाती है। आज सुबह मेल चैक करते ही जीमेल हैडर पर एक पोस्ट का लिखा दिखाई दिया मिलिए ९६ साल के जवान से… शीर्षक पढ़ कर मुझे भी 96 साल के जवान से मिलने की उत्सुकता हुई .. मिला तो बहुत ही बढ़िया लगा।
यह चिट्ठा है सिद्दार्थजी का और इनके चिट्ठे का नाम है सत्यार्थ मित्र..
इस पोस्ट में सिद्दार्थ एक "वयो"वृद्ध ( मनोवृद्ध नहीं) श्री आदित्य प्रकाश जी के बारे में बताते हुए लिखते हैं...

मेरे ऑफिस में स्वयं चल कर आने वाले पेन्शनभोगियों में सबसे अधिक उम्र का होते हुए भी इनके हाथ में न तो छड़ी थी, न नाक पर चश्मा था, और न ही सहारा देने के लिए कोई परिजन। …बुज़ुर्गियत पर सहानुभूति पाने के लिए कोई आग्रह भी नहीं था। इसीलिए मेरी जिज्ञासा बढ़ गयी और दो-चार बातें आपसे बाँटने के लिए नोट कर लाया….

सिद्दार्थजी की यह पोस्ट बढ़िया लगी तो झट से older post पर क्लिक कर दिया.. और यह क्या यहाँ तो एक और लाजवाब पोस्ट मेरा इन्तजार कर रही थी.. इस पोस्ट में लेखक अपने डेढ़ साला सुपुत्र सत्यार्थ की और अपनी परेशानी का जिक्र करते हुए लिखते हैं

..सत्यार्थ मेरी ऊपर की जेब से एक-एक कर कलम, चश्मा, मोबाइल और कागज वगैरह निकालने की कोशिश करता है…मैं उसे रोकने की असफल कोशिश करता हूँ। कैसे रुला दूँ उसे? उसे दुनिया के किसी भी खिलौने से बेहतर मेरी ये चीजें लगती हैं। …चश्मा दो बार टूट चुका है, मोबाइल रोज ही पटका जाता है…इसपर चोट के स्थाई निशान पड़ गये हैं। …फिर भी कोई विकल्प नहीं है…उसका गोद में बैठकर मस्ती में मेरा चश्मा लगाना, मोबाइल पर बूआ, दादी, बाबाजी, चाचा, दीदी, डैडी आदि से बात करने का अभिनय देखकर सारी थकान मिटती सी लगती है।

इस पोस्ट का अन्तिम पैरा सोचने पर मजबूर कर देता है; विचलित कर देता है
…वह चुपचाप सुनती हैं। बीच में कोई प्रतिक्रिया नहीं देती। मेरी उलझन कुछ बढ़ सी जाती है…। मैं कुरेदता हूँ। उन्होंने चेहरा छिपा लिया है…। मैं चेहरे को दोनो हाथोंसे पकड़कर अपनी ओर करता हूँ… दो बड़ी-बड़ी बूँदें टप्प से मेरे आगे गिरती हैं… क्या आपकी इस उलझन भरी दिनचर्या में मेरे हिस्से का कुछ भी नहीं है? …मैं सन्न रह जाता हूँ
…मेरे पास कोई जवाब नहीं है। …है तो बस एक अपराध-बोध… …

और इस पोस्ट का लिंक है
समय कम पड़ने लगा है ..

सागर चन्द नाहर
॥दस्तक॥ , गीतों की महफिल , तकनीकी दस्तक

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शुक्रवार, अप्रैल 13, 2007

चिट्ठा चर्चा- एक और महिला चिट्ठाकार

पिछले कुछ दिनों से गिरिराज जोशी के यहाँ नेट का कनेक्शन सही नहीं चल रहा और उसकी वजह से वे नियमित चर्चा नहीं कर पा रहे हैं। कई दिनों से तो उनकी कोई खोज खबर भी नहीं है। वैसे वे किसी काम में व्यस्त होते हैं तो चर्चा का जिम्मा मुझे सौंप देते हैं। कल मुझे भी याद नहीं रहा कि आज चर्चा का जिम्मा उनका है और उनकी अनुपस्थिती में मेरा। कल रात १० बजे ध्यान आया कि चर्चा लिखनी तो रह ही गई, अब क्या होगा?? ऐसे में मदद के लिये आई कोटा राजस्थान की डॉ गरिमा तिवारी! उन्होने कहा आप निश्चिंत हो घर जाईये आपका काम सुबह मिल जायेगा, और वाकई ऐसा हुआ भी जब सुबह आकर मेल चैक की तो गरिमाजी ने चर्चा कर मुझे मेल में भेज दी थी।
डॉ गरिमा ने अभी जमा तीन चार पोस्ट ही लिखी है पर नारद पर पंजीकरण ना होने से किसी के नजर में नहीं आई। गरिमा परिचर्चा में सबसे सक्रिय सदस्यों में से एक हैं और बहुत सुन्दर कवितायें लिखती है।
यहाँ से शुरु होती है डॉ गरिमा की लिखी चर्चा।

आज कल महिला अधिकार के चर्चा हर मोड पर मिल जाते हैं उसी कडी मे कुछ नया जोडते हूए उन्मुक्त जी संजीदगी के साथ बता रहे है
व्यक्ति' शब्द पर उठे विवाद पर सबसे पहला प्रकाशित निर्णय Chorlton Vs. Lings (१८६९) का है। इस केस में कानून में पुरूष शब्द का प्रयोग किया गया था। उस समय और इस समय भी, इंगलैंड में यह नियम था कि पुलिंग में, स्त्री लिंग भी शामिल है। इसके बावजूद यह प्रतिपादित किया कि स्त्रियां को वोट देने का अधिकार नहीं है। "
तो यही आशीष जी पत्रकारिता पर निराश हो रहे हैं, पर और लोगो की हताशा को नही बल्कि अपने नाम कि तरह हिम्मत से नयी दिशा मे बढने के लिये अग्रसर भी हैं|
लेकिन एक बात तो तय है कि अब पहले जैसी पत्रकारिता संभव नहीं है। अब तो जो है, इन्‍हीं के बीच में से रास्‍ता निकालना होगा। लेकिन हाथ पर हाथ रखकर बैठना भी सही नहीं है।

इस सबके बीच महाशक्ति जी कहा चुप बैठने वाले हैं, ये समाजवाद पर शक्ति प्रहार कर रहे हैं.. देखिये कैसे! और रवि रतलामी जी तकनीक क्षेत्र मे नयी रोशनी दिखा रहे हैं.. आप खुद ही देखिये और जानिये मै किस तरफ इशारा कर रही हूँ!

यहाँ तक गम्भीरता से पढते आये तो अब "मस्ती की बस्ती" मे भी गोता लगा लिया जाये... हाँ तो मस्ती के बस्ती मे गोता लगाते वक्त एक कथानक याद आ गया..." एक पंडित जी कहते थे, भईया हमरे ऑमलेट बनाना तो उमे प्याज मत डालना हम ब्राम्हण है ना" नही समझ मे आया ... तो देखिये... कैसे बनते है हम मह्त्वपूर्ण

मान लीजिये किसी आनुवांशिक या अन्य कारण से - जिसमें आपका कोई दोष नहीं है, आप साढ़े छह फ़ुट के हो गये तो आप हो गये महत्वपूर्ण।
कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि वे खाने में नमक नहीं लेते और पीने में शराब के अलावा कुछ नहीं लेते। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि दारू पी लेते हैं मगर चाय किसी हालत में नहीं पीते या वे अल्लमगल्लम सब कुछ खा लेते हैं मगर पालक नहीं खाते।

और भी महत्वपूर्ण होने के कायदे कानून है.. पढिये और महत्वपूर्ण बनिये ...

जनाब अब तक मस्ती के बस्ती मे ही घूम रहे हैं तो यथार्थ के दुनिया मे भी कदम रखिये... घबराईये नही जिन्दादिल अपूर्व कुलश्रेष्ठ आपका जिन्दादिली से स्वागत कर रहे हैं... आपको यथार्थ मे आसमान छूने के उपाय या यूँ कहिये कि रास्ता दिखा दिया चलना तो आपको है.. तो सैर कर ले आसमान का.. फिलहाल ब्लाग.. जब ये मंत्र जिन्दगी मे अपनायेंगे तो अपनी जिन्दगी मे भी|
इसी जमीनी हकिकत को एक नया दर्जा भी मिल रहा है... कल्पना ही कहिये.. खुदा नहीं आता यहाँ.. आ जाये तो पहले यहा के पंडितो और मौलवियो पर शामत आ जाये... तब हम ईंसान बन के रहने लगे.. तब को धर्म के नाम पर दंगा ना हो... शूऐबजी कह रहे हैं
शुक्र है आज हम भारतीयों के नौजवान बच्चे हर किसम की ज़ंजीरों से आज़ाद हैं - एक आज़ाद देश मे मज़े से सांस ले रहे हैं। और धर्मों की परवाह किए बगैर अपने देश की तरक्की मे सब एकसाथ जुटे हैं। माईक्रोसॉफ्ट, याहू, गूगल पंटागॉन और नासा दुनिया की हर तरक्की मे हमारे भारती बच्चे बराबर शामिल हैं। और आज हमारी नई पीढी के बच्चे शान से सीना तान कर कहते हैं: हम भारती हैं - कोई धर्म हमारे देश से बडा नहीं - और हम ना हिन्दू हैं ना मुस्लमान बल्कि अपने देश के ख़ुद ख़ुदा हैं।

अब इतने भी संजीदा ना हो जाईये.. मनीषा जी एक मजेदार तथ्य ले कर आयी हैं .. गाँधीजी जहाँ कागज के टुकडे़ भी सँभाल के रखते थे.. अब हम भारतीय आपातकालीन स्थिती के लिये भी बचत नही कर रहे हैं... है ना मजेदार तथ्य.. वक्त के साथ सब कैसे बदलता है,तो मसिजीवी अपने एकालाप मे ही व्यस्त लग रहे हैं, और बिहारी बाबू नेताओं की समीक्षा मे लगे हूये है... पर क्या नेता जी समझ पायेंगे...??

कमल शर्मा जी कर रहे हैं व्‍हर्लपूल इंडिया लिमिटेड कि समीक्षा... जानिये क्या होगा व्‍हर्लपूल का भविष्य। और चंद्र प्रकाश जी जो बताते है बात पते की आज खोल रहे हैं ढोल की पोल... देखिये..
ढोल की पोल अपनी जगह.. पर मुहब्बत का दिया इन सब बाधाओ से दूर जलता रहता है.. उसे बुझाना का दम किसमे...
वो कहते है ना.... प्यार मे ऐसी ताकत होती है कि पर्वत भी सर झुकाता है,कुछ ऐसा ही बताने कि कोशिश मे है रन्जू जी
तुझे सोचा है इतना महसूस किया है रूह से
कि बस अब तेरी जुदाई का भी हम पर कोई असर नही

और योगेश जी अपने बदलते हूए गाँव की पीडा या यूं कहिये अपने प्यार को सम्भाल रहे हैं
बीमारी तब से बढी जब पडे शहर के पांव.
कितना बूढा हो गया वो मेरे वाला गांव.


बदल गया है गाँव पर नही.. आज भी उसी पुराने ढकोसले पर चला रहे हैं हम, जो कहने को आधुनिकता का चोंगा भर बदला है, पर मन दिल दिमाग वही 40 साल पुराना... अगर ऐसा ना होता तो पंकज जी को उमर-प्रियंका के शादी पर हूये बवाल को लेकर यह लेख नही लिखना पडता
उमर-प्रयंका अपने घर लौटना तो चाहते हैं उनके साथ पूरे देश और न्यायालय का समर्थन भी है, लेकिन उनके घर और समाज के सम्मान की चिंता करने वाले लोगों के बयान और तेवरों को देखकर उमर-प्रयंका के चेहरे पर उभरे भावों से तो ये नहीं लगता कि वे जल्द से जल्द अपने घर जाने को तैयार हो जाएँगे। अब उनके लिए ये तय करना वाकई मुश्किल है कि कौन उनका है कौन पराया।


यहाँ तक की चर्चा की है गरिमा ने और आगे मैं कर रहा हूँ प्रतीक को हम चिट्ठा जगत कामदेव कहते हैं क्यों कि वे सबसे अच्छी अच्छी तस्वीरें लेकर आते हैं पर कल उनके साथ पंकज भाई को कामदेव बनने का भूत लग गया और दोनो ही मंदिरा बेदी के पीछे पड़ गए। और जहाँ प्रतीक अपने टाइमपास वाले चिट्ठे पर मंदिरा की Maxim में छपी तस्वीरों को बता रहे हैं तो पंकज बैंगाणी अपने स्तम्भ पर और सागर अपनी पसंदीदा अभिनेत्री की तस्वीरों को देखकर दोनों जगहों पर प्रलाप करते पाये गये.. हे मंदिरा तूने यह क्या किया..... लाहौल विला....

आज की सबसे दुखद: खबर यह है कि चिट्ठाजगत में हो रहे विवादों से दुखी हो कर रचना बजाज जी ने चिट्ठा लिखना बंद करने का फैसला किया है जो हम सबके लिये वाकई आघात जनक है। रचना कहती है
…..…..ज्यादातर इस तरह का लिखा जा रहा है कि एक चिट्ठा समझने के लिये कम से कम चार अन्य चिट्ठे पढने जरूरी हैं..हम आपके पास आते हैं तो परिचित नामों को ढूँढते ही रह जाते हैं….आप बिल्कुल हिन्दुस्तानी मीडिया की तरह हुए जा रहे हैं जिससे ऊब कर ही हम यहाँ आए थे…३० पेज के अखबार और चौबीसों घन्टे की खबर से परेशान होकर…मानो खबरों के बाहर जिन्दगी है ही नही….
सब नये लेखकों (या शायद पुराने लेखक लेकिन नये चिट्ठाकार!)से भी कुछ न कुछ सीखने को मिलेगा ही..लेकिन फिलहाल जितना सीखा उतना ही काफी है..माना कि कम ज्ञान खतरनाक होता है लेकिन अत्यधिक ज्ञान शायद उससे भी ज्यादा खतरनाक!!
हम आपका बोझ कम करना चाह्ते हैं, और अब से अपने ‘फेवरिट‘ की लिस्ट से ही नये पोस्ट देख लिया करेंगे.
अपनी सेहत का खयाल रखियेगा, आजकल ओवर टाइम काम जो कर रहे हैं

चिट्ठा चर्चा मंडल की तरफ से और अपनी तरफ से मैं रचनाजी से अनुरोध करना चाहता हूँ कि कृपया आप ऐसा ना करें। आप जो चिट्ठे ना पढ़ना चाहें ना पढ़ें पर कम से कम लिखना तो बंद ना करें। प्लीज रचना जी अपने निर्णय पर एक बार फिर से विचार करें।
पंगेबाज, पंगे लेते लेते और गलियॊं और होहल्ले के मुकदमें को जनता की अदालत में सौंपने के बाद एक बहादुर बच्चे अंकित की बहादुरी को सलाम कर रहे हैं, वाकई उस छोटे से बच्चे अंकित की बहादुरी को मैं नमन करता हूँ।

मोहिन्दर कुमार आज एक अच्छी गज़ल ले कर आये हैं और पूछ रहे हैं
आज तक किसने किसी गुमशुदा
अजनबी की शिनाखत की है
कुछ के हिस्से में है जमीदोजी
कुछ चिताओं पर चढ खाक में मिल जायेंगे
हश्र हर एक को मालूम तो है लेकिन
कब किसने ईमान पर चलने की जुर्रत की है


एक दिन पहले तक हम तुम गंगू हैं.. हिन्दू नाहीं.. कहने वाले अभयजी आज माफी मांग रहे हैं कि
हमारा एक ठो प्रस्ताव है.. जैसे बॉम्बे का नाम बदल कर मुम्बई किया गया है.. कलकत्ता का नाम बदल कर कोलकाता किया गया है..उसी तरज पर हम लोगो को चहिये कि हिन्दू का नाम बदल कर गंगू किया जाय.. टिप्पणी कर के सिगनेचर कैम्पेन में सहयोग कीजिये..


हिन्द युग्म पर कवि मित्रों की महफिल बढ़ती जा रही है और अब रंजना भाटियाजी भी उस महफिल से हमें उनकी अपनी कवितायें और गज़लें पढ़ायेंगी। और इस कड़ी में उन्होने अपनी पहली गज़ल लिखी है..... जिसे मैं यहाँ लिख नहीं पा रहा हूँ आप खुद ही वहाँ जा कर पढ़िये

साहब सलाम ... रमाशंकर जी आज महिला प्रशाषनिक अधिकारियों से पूछे जा रहे प्रश्नों से बड़े रोष में है। आज का दिन गज़लों के नाम रहा, एक और सुन्दर गज़ल प्रकाशित हुई है अन्तर्मन
पर हम खड़े तकते रहे इन आशियानों पर क़हर
ख्वाब सारे जल गए पर ना पड़ी उसकी नज़र
दूसरों के दर्द को भी देख आंखें न हों नम
ऐ ख़ुदा नाचीज़ को इस तू न दे ऐसा हुनर


अनाम रह कर बेहूदा टिप्प्णीयाँ करने पर प्रमोद जी के रोष और कमल जी के उनका समर्थन करने पर काकेशजी अपनी बैचेनी कुछ यूं व्यक्त कर रहे हैं
आज मैं बैचेन हूँ.. इसलिये नहीं की मेरी पिछली पोस्ट “निश:ब्द” की तरह पिट गयी.. इसलिये भी नहीं कि मुझे फिर से “नराई” लगने लगी … इसलिये भी नहीं कि मुझे किसी ‘कस्बे’ या ‘मौहल्ले’ में किसी ने हड़का दिया हो .. इसलिये भी नहीं कि मेरा किसी ‘पंगेबाज’ से पंगा हो गया हो .बल्कि इसलिये कि मुझे ‘नाम’ की चाह ना रखने वाले अनामों ,बेनामों का गालियां सुनना अच्छा नहीं लग रहा
.
काकेश अनाम रहने वालों को अच्छे अच्छे सुझाव भी दे रहे हैं मसलन
आप अनाम-बेनाम-गुमनाम नहीं हो सकते लेकिन आप चाहें तो अनामचंद , बेनामदास या गुमनाम कुमार रख सकते हो . आजकल बाजों का भी बहुत महत्व है ( बहुत दूर दूर की देख लेते हैं ) तो आप चालबाज , तिकड़मबाज , दंगेबाज रख सकते हैं . यदि कोई नया सा नाम रखना हो तो फिर फंटूस , कवि कानपुरी , निंदक , चिंतक जैसे नाम रख लें . वैसे एक राज की बात बताऊं आप अपना नाम कोई स्त्रीलिंग में रख सकें तो बहुत अच्छा

इसी विषय पर अनामदास भी कह रहे हैं कि
अनाम लोगों के संदेश को नाम वालों के मुक़ाबले ज़रा ज़्यादा ग़ौर से सुनना चाहिए क्योंकि उसमें संदेश प्रमुख होता है न कि उसे भेजने वाला. गुप्त मतदान के महत्व को लोकतंत्र में रहने के कारण आप अच्छी तरह समझते हैं. अनाम लोग अक्सर जनभावनाओं के प्रतिनिधि होते हैं, टीवी पर जो आदमी कहता है कि 'महँगाई बहुत बढ़ गई है' वह अनाम ही होता है. गुप्त टिप्पणी करने वाले को एक आम मतदाता समझने में क्या कष्ट है?

पोलियो की दवाई पर एक मुस्लिम समाज के कुछ लोगों द्वारा विरोध किये जाने पर पोलियो से अपाहिज हुए एक मुस्लिम की पर शैलेष भारतवासी एक मुसलमान की आत्मकथा को यूं व्यक्त कर रहे हैं
अब्बा!
काश!
मैं दो घूँट पीकर
नामर्द बन गया होता।

अल्लाह उन सबको बुद्धि दे जो पोलियो की दवाई से अपने बच्चों को दूर रख कर अपने बच्चों के साथ देश का भविष्य भी बर्बाद करने पर तुले हैं।
आज की तस्वीर हमेशा की भाँति डॉ सुनील दीपक जी के चिट्ठे छायाचित्रकार से।

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शुक्रवार, अप्रैल 06, 2007

चिट्ठा चर्चा- अथ: श्री जूता कथा

आज की चर्चा का जिम्मा गिरीराज जोशी का है पर आज एक बार फिर ऐन मौके पर उनके नेट के कनेक्शन ने धोखा दे दिया। सो एक बार फिर आपको मुझे झेलने के लिये बाध्य होना पड़ेगा। मेरी तबियत आज ठीक ना होने की वजह से कई चिट्ठों को नहीं देख पाया अत: मित्रो से अनुरोध करता हूँ कि इसे बात को अन्यथा ना लें।
गुरुवार दिनांक ५ अप्रेल को प्रकाशित सारे चिट्ठों की सूची यहाँ है।

अगर आपको कुछ याद नहीं रहता तो उसके लिये डॉ गरिमा आपको सिखा रही है कुछ ध्यान की विधियाँ जिससे आपकी याददाश्त बढ़ सकती है। अब चूँकि गरिमा पेशेवर हीलींग एक्सपर्ट है और ध्यान की विधियॊं को सुसंगत करना जरूरी होता है और सुसंगत करना ही उनका पेशा है सो लेख के अंत वह यह कहने से नहीं भूली कि
जाते-जाते एक विनम्र निवेदन है कि- यह मेरा व्यव्साय का अंग है इसलिये कृपया घोडे को घास से दोस्ती करने के लिये ना कहें।ही... ही... ही...:D


जीतू भाई अतीत के झरोखे में की तीसरी कड़ी में आज बता रहे हैं हिन्दी चिट्ठाकार, बुनो कहानी, सर्वज्ञ, ब्लॉगनाद, निरंतर, निपुण और अनूगूँज के जन्म के बारे में।
गीतकार जी का मुक्तक महोत्सव चल रहा है और उन्होने मुक्तक क्रमांक २३ से २७ प्रकाशित किये हैं जो हमेशा की भाँति सुन्दर और पठनीय है।

उन्मुक्त जी आज मैसेन्जर या अपने चिट्ठे पर लगाने के लिये अवतार यानि हैकरगॉचिस् बनाने की विधी यहाँ बता रहे हैं। उनमुक्त जी का कहना कितना सही है कि
यदि मुक्त सोर्स का प्रोग्राम उतना ही अच्छा काम करे जितना कि मालिकाना प्रोग्राम, तो फिर मुक्त सॉफ्टवेर में ही क्यों न काम किया जाय?


हिन्दी के पुराने चिट्ठाकारों ने इन्टरनेट पर हिन्दी को फैलाने की जो अलख जगाई थी उसमें पंकज भाई उर्फ मिर्ची सेठ एक कदम और आगे बढ़ते हुए लेकर आये हैं चिट्ठाकारी का नया तरीका "स्क्रीनकास्ट"। स्क्रीन कास्ट में मिर्ची सेठ एक वीडीयो के माध्यम से नये लोगों को हिन्दी लिखना सिखा रहे हैं।

जीतू भाई, जुगाड़ी लिंक में कॉमिक्स बनाना सिखा रहे हैं और साथ ही उन लोगों को काम का लिंक बता रहे हैं जिन्हें टेलीफोनिक इन्टरव्यू देना है।

रवीश आजकल इन दिनों झाँसी में है और बड़े ही मायूस लग रहे हैं क्यों कि लोग रानी लक्ष्मी बाई के बलिदान को किस तरह भुना रहे हैं।
अंदर ही अंदर झांसी की रानी की लड़ाई को मिल कर बेच रहे हैं । लक्ष्मी बाई मुझे बहुत कमज़ोर नज़र आई । मूर्तियों में बंद बेबस । हमें इसका सामाजिक विश्लेषण करना चाहिए कि चोर बदमाश भी कहते हैं कि हम झांसी की संतान हैं । क्या इसी लिए किसी ने अपनी जान दी । हिंदुस्तान की जनता बहुत भ्रष्ट है । वो दूसरे के बलिदानों का भुगतान अपने नाम करा लेती है । झांसी में लक्ष्मीबाई के नाम पर जितनी लूट मची है ये अगर रानी को मालूम होता तो वह अंग्रेजों को झांसी देकर किसी जंगल में चली गईं होती । नहीं गईं । किसी को फर्क नहीं पड़ता । झांसी में कहीं भी जाइये बेकार लोग गुनगान करते मिल जाएंगे ये फलां दबंग का मकान है । इसने यहां कब्जा किया है । वहां डाका डाला है ।
रवीश बिल्कुल सही कह रहे हैं क्यों कि देश में हर जगह महान व्यक्तियों के नाम को भुनाया जा रहा है, फिर चाहे वह राजनीती हो या सामान्य जनजीवन।

प्रियदर्शन भी ग्रेग चैपल की विदाई से आहत, पूछ रहे हैं कि ग्रेग चैपल के सवाल: कौन देगा जवाब पर चर्चा लिखे जाने तक किसी ने जवाब नहीं दिया।

नोटपैड जी ने पीठ खुजाने का जो अभियान छेड़ा है उसमें अब अनुराग मुस्कान जी भी जुड़ गये हैं पर अफसोस उनकी पीठ खुजाने नोटपैड जी के अलावा कोई नहीं आया। और नोटपैड जी के साथ तो बड़ा ही मजेदार वाकया हो गया, वे लोगों से पूछ रही थी क्या आपने आज वोट डाला?? और उनका ही वोट वे खुद नहीं दे पाई।
हमारे साथ लेकिन कुछ दुखद घट गया।
वोट डालने गए। अपनी ४ १/२ साल की औलाद को भी सथ ले गए ।
उसे समझाने और दिखाने कि वोट डालना क्या होता है।
बारी आई, तो हमारी औलाद दौडी ।ज़ोर से बीप की आवाज़ आई।
पता चला नालायक ने बटन दबा दिया। हमारा वोट डल चुका था। पोलिंग आफ़िसर और प्रेसाइडिंग आफ़िसर चिल्लाए।
पर अब का होत जब बेटा डाल चुका वोट।
तो, यह था भारत के सबसे युवा नागरिक का वोट, जो ना जाने किस उम्मीदवार के खाते मे चला गया। और हमारी उम्मीदो पर पानी फ़िर गया।


आजकल चिट्ठा जगत में एक और पुराण चल रहा है उसमें समीरलाल जी और फुरसतिया जी ने अपनी अपनी आहूती दे दी तो काकेश जी भला पीछे क्यों रहते, उन्हें भी इस यज्ञ में आहूति देने का शौक चर्राया है आप फरमा रहे हैं :)
.जूता बिरादरी के अन्य सदस्य मसलन जूते की प्रेमिका सैंडल रानी , छोटी बहिन चप्पल और भी अन्य सदस्य जैसे जूती , बूट इत्यादि नाराज हैं कि ये भेदभाव क्यों ..अब कल ही सैंडल रानियों से पाला पड़ गया
और देखिये पाला पडा तो भी कैसा ... और उसी पोस्ट को फिर से पढ़ा तो पता चला कि आजकल कि नयी पृथा के अनुसार सुन्दरियां “टिप्पणीयों” (कमेंटस) से बहुत खुश होती हैं ..शाम को घर लौटते समय फिर एक बस स्टेंड पर एक सुन्दरी को देखा और उस को खुश करने की ठानी ..और कमेंट्स पर कमेंट्स देने शुरु किये ..वो पहले तो सुनती रही ..हम सोचे कि खुश हो रही है अचानक वो घूमी और उसने भी हमारा सर बजा दिया


यह लिखने के बाद काकेश जी का मन एक बार फिर ऐसे ही मचला जैसे बस स्टैण्ड पर सुन्दरी को देककर मचला था और अपनी आपबीती को पॉडकास्ट के रूप में फिर से सुनाया। एक बात माननी पड़ेगी काकेश जी की आवाज बहुत शानदार है मानो वे रेडियो जाकी हों आप काकेश जी की आवाज को यहाँ सुन सकते हैं


आजका सबसे बेहतरीन लेख अगर पढ़ना चाहें तो वह लिखा है नीरज रोहिल्ला ने, मैकाले के लिये लिखा है कि
मैकाले: सत्य कहीं कुछ और तो नहीं । मैकाले के बहाने हमें वामपंथियों को गाली देने का सुनहरा अवसर प्राप्त हो जाता है और आधुनिक शिक्षा पद्यति के प्रति अपनी भडास निकालने का बहाना भी । इस लिहाज से देखा जाये तो मैकाले ने इस देश को उसकी नकारात्मक ऊर्जा को निकालने का एक माध्यम प्रदान किया है और इसके लिये मैं मैकाले का ॠणी हूँ ।

इस लेख के बारे में ज्यादा लिखने की बजाय आप खुद इसे पढ़ें तो बेहतर होगा।

रचनाकार पर रवि जी लेकर आये है नये कहानीकार कमल की कहानी प्रोजेक्ट ऑक्सीजन।
उत्तर प्रदेश के चुनावों पर तरकश के छोटॆ तीर यानि पंकज बैंगाणी पूछ्र रहे हैं क्या कायम रहेंगे मुलायम? कहीं कठोर तो ना हो जायेंगे?

मीडिया युग पर सूचक रेडियो के पुनर्जन्म के बारे में बतिया रहे हैं एफ एम चैनल्स के आने के बाद किस तरह एक बार फिर से बाजार में रेडियो छा गया है।

एक और नये चिट्ठाकार मिहिर जी ने कल अपने लेख रफी बनाम किशोर पर दोनों महान गायकों के बारे में चर्चा की और आश्चर्य की बात यह थी कि शायद ही कभी टिप्प्णी देने वाले बिहारी बाबू यानि प्रियंरजन झा यहाँ टिप्प्णी देते पाये गये।
किशोर कुमार के गाये हुए ज्यादातर गानों को सुनकर ऐसा लगता है कि हमारे बीच का ही कोई व्यक्ति उसे गा रहा है। यही किशोर दा की लोकप्रियता का राज है। किशोर कुमार की सबसे बड़ी खासियत यही थी कि उन्होंने कठिन से कठिन गीतों को भी इस तरह से गाया कि सुनने वालों को ऐसा लगे कि वह भी यह गीत गा सकता है। दूसरी तरफ रफी साहब के सामान्य गीतों को गाना भी काफी मुश्किल होता है।


प्रमेन्द्र प्रताप जी आज इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले से बड़े खुश हैं जिसमें न्यायालय ने आदेश दिया है कि उत्तर प्रदेश के कई जिल्लों में मुसलिम आबादी चालीस प्रतिशत से ज्यादा है और उन्हें इस वजह से अल्पसंख्यक माना जाना गलत है।


और रामचन्द्र मिश्र जी १२०० रुपये में बीच पर अश्लील हरकतें करने का लाईसेंस दे रहे हैं।

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शुक्रवार, मार्च 23, 2007

आह-हा! गाओ खुशी के गीत... चिठ्ठा चर्चा

गिरीराज जोशी पिछले कुछ समय से चर्चा नहीं कर पाये और उसकी कसर उन्होने अपन कल लिखे चिट्ठों की चर्चा में निकाल दी और आदरणीय फुरसतिया जी के लेखों से दो ढ़ाई इंच कम चर्चा लिख बैठे ।
उम्मीद करते हैं भविष्य में आप अनुपस्थित नहीं रहेंगे। :) इतनी लम्बी चर्चा लिखने के बाद भी चिट्ठे आते ही रहे और कविराज थक गये और उसी समय मेरा जीमेल पर आना हुआ झट से मुझे बाकी चिट्ठों की चर्चा करने का आदेश दे कर कट लिये (मुझे बोलने का मौका दिये बगैर साइन आउट कर लिये)।
वो कहते हैं ना अनाड़ी से दोस्ती जी का जंजाल..........ठीक है भाई दोस्ती की है तो निभानी भी पड़ेगी चलिये आदेश का पालन करने की कोशिश करते हैं।
अब जब चिट्ठा चर्चा लिखने बैठा हूँ तो चिट्ठे देखकर लग रहा है कि वाकई आज बहुत ही शानदार और पठनीय चिट्ठों की चर्चा का सौभाग्य मुझे मिला है। भारत के महान सपूत सरदार भगत सिंह का आज शहादत दिवस है और मैं उनको श्रद्धान्जली देता हूँ।
कल प्रकाशित हुए सारे चिट्ठों की पूरी सूचि आप यहाँ देख सकते हैं।
घुघुती बासुति ने मेरी पिछली चर्चा में मुझ पर दया कर कोई पोस्ट नहीं लिखी पर आज कह रही हैं ऐसा बार बार नहीं होगा। बासुती जी अपनी कविता में अपने बीती यादों के लिए कहती है
ये ही तो वे हैं जो ला डाल देती
गोद प्यारी नन्ही बिटिया को
ये ही तो लौटा लाती हैं फिर से
मेरे और उसके बीते बचपन को ।

सच है बासुति जी हम सब जब अपने बीते पलों को याद करते हैं तो कभी अधरों पर मुस्कान आ जाती है तो कभी पलकों पर आँखों में आँसू आ जाते हैं।

उनमुक्त जी आज बात कह रहे हैं लैंगिक न्याय की! साथ ही अलग अलग श्रेणी के लोगों के बारे में बता रहे हैं। उन्मुक्त जी अपने इस लेख को अपनी आवाज में सुना रहे हैं और इसे आप यहाँ सुन सकते हैं यह लगभग 7.09 Mb की ऑडियो फाईल है। अमित गुप्ता जी और रामचन्द्र जी के बाद उन्मुक्त जी; लगता है आने वाले दिनों में बहुत सारे चिट्ठाकार अपनी पोस्ट को पॉडकास्ट के रूप में सुनायेंगे। मुझे चिट्ठा पढ़ने की बजाय सुनना ज्यादा अच्छा लगा क्यों कि इस को सुनते हुए हम अपना दूसरा कार्य कर सकते हैं जब कि चिट्ठा पढ़ते समय हम अन्य काम नहीं कर सकते।

इन दिनों बहुत सारे नये चिट्ठाकार आये हैं और बहुत से विषयों पर लिख भी रहे हैं। ऐसे ही एक नये चिट्ठाकार है अनिल रघुराज! अनिल अपने बहुत सुन्दर लेख नोटों की नीति : जेब कटी हमारी, मौज हुई उनकी
में बता रहे हैं कि रिजर्व बैंक ने निर्यात को सस्ता बनाने के लिये अप्रैल 2006 से जनवरी 2007 के बीच सिस्टम में 56,543 करोड़ रुपये बाजार में डाले और किस तरह उनसे लाभ होने की बजाय नुकसान हुआ। इस लेख को पढ़ कर बहुत कम टिप्प्णीयाँ लिखते अतुल अरोड़ा जी बहुत प्रसन्न हो गये। और कह बैठे इसे कहते हैं चिट्ठाकारी!
इस तरह रिजर्व बैंक ने नोटों की जो नीति अपनाई है, उसका हश्र ये है कि न खुदा ही मिला, न बिसाले सनम। अमेरिका और यूरोप के ग्राहकों के लिए भारतीय माल को सस्ता रखने की कोशिश भारतीय ग्राहकों के लिए महंगाई का सबब बन गई है। हकीकत ये है कि आज भारतीय ग्राहक विदेशी ग्राहकों को सब्सिडाइज कर रहा है। अगर आज हमारी जेब कट रही है तो इस जेब से निकले नोटों का फायदा विदेशी ग्राहक को मिल रहा है। ये है हमारी सरकार और रिजर्व बैंक का भारत और भारतीयता प्रेम।

मैने कुछ बहुत पहले पढ़ा था कि किस तरह प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की सरकार ने अनाप शनाप नोट छापे और मुद्रा का इतना अवमूल्यन हुआ कि जनता को मिट्टी का तेल या लकड़ी से खाना बनाने की बजाय नोट जला कर खाना बनाना ज्यादा सस्ता लगता था। एक अंडा और एक ब्रेड तक खरीदने के लिये करोड़ों रुपये अदा करने होते थे। खैर इसकी चर्चा फिर कभी करेंगे।

अनिल अपने दूसरे लेख में प्रसन्न होते हुए कह रहे हैं कि आह-हा! गाओ खुशी के गीत... अनिल इतने खुश क्यों है? आप जानना चाहेंगे? वे इसलिये खुश है कि देश में गरीब घट गए हैं। आबादी में उनका अनुपात घट गया है।
अगर मुंबई का कोई भिखारी दिन में 18 रुपए कमा लेता है तो वह गरीब नहीं है, उसकी गिनती गरीबी रेखा से नीचे की आबादी में नहीं हो सकती। इस तरह मुंबई से लेकर दिल्ली और चेन्नई के सारे भिखारी तक अब गरीबी रेखा से ऊपर आ गए हैं क्योंकि ये लोग दिन में कम से कम 20 रुपए तो कमा ही लेते हैं। गांवों में तो अब रोज 12 रुपए कमानेवाले भी गरीबों की राष्ट्रीय गिनती से गायब हो गए हैं।

मैं अनिल रघुराज को इतने सुन्दर लेखने के लिये बधाई देता हूँ।

नन्दीग्राम हत्याकांड पर ताऊ को लिखे पत्र पर मिली एक टिप्प्णी को धुरविरोधी अपने चिट्ठे पर बता रहे हैं , कि
यह वही सालिम ग्रुप है, जो इंडोनेशिया में 1965 कम्युनिस्टों के कत्लेआम के बाद अमेरिकी संरक्षण में फला-फूला. इसे भ्रष्ट सुहार्तो शासन ने विकसित होने में मदद की. अब सुदूर भारत में इसे एक ज़बरदस्त मददगार मिल गया है-बुद्धदेव भट्टाचार्य.

धुरविरोधी जी के इस पत्र पर और भी अच्छी टिप्पणीय़ाँ आई है।

बेजी जी आज कुछ अध्यातमिक मूड में है और अपनी कविता प्रयत्न में कह रही है कि
महसूस कर सको तो करो उस खुदा को...
साँस लेती हुई हर सदा को...
खामोश सी हर उस अदा को...
अहसास से जुड़ी भावना को...
रंगों को....रागों को....
कर सको तो करो समर्पण....
तन को...मन को....और रूह को...
अंदाज़ को...आवाज़ को....और अरमान को....
खुद को...खुदाई को....और अपने खुदा को....


तिर्यक विचारक आज भगत सिंह की शहादत दिवस पर देश की युवा पीढ़ी से बहुत चिंतित है और कह रहे हैं कि
...सोचिएगा कि आखिर 23 साल की अवस्‍था में भरपूर जवानी का बलिदान कोई कैसे कर सकता है...और हम क्‍या कर रहे हैं...एक सामूहिक आत्‍महत्‍या की तैयारी...बगैर किसी आततायी का सिर तक फोड़े हुए...कम से कम...

रचना जी भी आज कुछ चिंतित है कि अच्छा है मेरी समझ कमजोर है!! रचना अपनी इस कविता में पूछ रही है कि हम भारतीय क्या सार्थक बहस कर पाते हैं? और खुद के अलावा क्या किसी और की सुन पाते हैं? रचना जी माना कि हम भारतीय़ सार्थक बहस नहीं कर पाते पर मैं आपकी इन पंक्तियों से ज्यादा सहमत हूँ।

हर शख्स समझे, बस खुद ही होशियार है!
ज्ञानीयों के ज्ञान का हाय कैसा शोर है!!

तब क्या सार्थक बहस की कोई गुंजाईश शेष रह जाती है?

पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कोच बॉब वूल्मर की हत्या पर बिहारी बाबू अपनी चिरपरिचित शैली में स्व. बॉब से कह रहे हैं
ठीक है कि टीम को बढि़या परदरशन करना चाहिए, लेकिन हारने के बाद आपको एतना सेंटियाने किसने कहा था? ई भारतीय उपमहाद्वीप है, यहां सरवाइव करना है, तो काम से मतलब कम रखिए औरो पोलिटिक्स बेसी कीजिए। आपके जैसन लोग, जो यहां बेसी प्रोफेशनलिज्म दिखाते हैं, सबको ऊपर का ही रास्ता चुनना पड़ता है, फिर चाहे ऊ हमरा दफ्तर हो या परधानमंतरी कार्यालय। यहां काम खराब कर शरमाने औरो सिर छुपाने की जरूरत नहीं पड़ती, बस गोटी बढि़या से फिट कीजिए, फिर देखिए आपको कोसने वाला शरमाकर खुदे छुप जाएगा।

काश बॉब, बिहारी बाबू की यह सलाह पहले ही मान लेते तो अपनी जान से हाथ ना धोते।

वार्षिक संगीतमाला लिखने से निवृत हुए मनीष अब लेकर आ रहे हैं फैज़ अहमद फैज़ की गज़लों और नज़्मों का सफर। मनीष इस सफर के पहले लेख में फ़ैज़ की जीवनी तथा उनकी कुछ गज़लों को पढ़वा रहे हैं। और लक्षमी नारायण जी बड़े दिनों के बाद आये हैं और आज एक मच्छर की व्यथा को अपने शब्द दे रहे हैं।


रैयाज़ उल हक अपने दो अलग अलग चिट्ठों पर एक साथ कई लेख प्रकाशित किये हैं। नन्दीग्राम लाल सलाम पर रैयाज ने नन्दीग्राम हत्या कांड के बाद के दृश्यों के अलग अलग वीडियो बताए हैं और अपने दूसरे चिट्ठे हाशिया पर सरदार भगत सिंह पर तीन लेख प्रकाशित किये हैं और एक लेख मे एक वीडियो दिखा कर दावा कर रहे हैं कि चांद पर मानव के जाने का अमरीका का दावा झूठा है। एल्लो इतना सफेद झूठ बोलकर अमरीका दुनियाँ को बेवकूफ बनाती रही और हमें पता ई नहीं चला!!!!

फ़िल्म दिखाती है कि क्यों चांद पर जा पाना तब संभव नहीं था और वह पूरा घटनाक्रम गढ़ा हुआ था. जो फ़िल्म हमें चांद की कह कर दिखायी गयी, वह दरअसल धरती पर ही की गयी रिकार्डिंग थी. फ़िल्म तीन वैग्यानिकों के शोध पर आधारित है.

चांद पर पहुँच मानव के पहुँच जाने के इतने वर्षों के बाद भी थोड़े थोड़े दिनों में स्वर उठता है कि यह सब झूठ है, यह बात ऐसी लगती है जैसे कई धार्मिक पुस्तकों में पृथ्वी का आकार गोल नहीं वरन चपटा दिखाया गया है और पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है आदि!! अगर प्रबुद्ध और पढ़े लिखे लोग भी इस बात को मानने में असमर्थ है तो आज तक की विज्ञान की तरक्की व्यर्थ गई।

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