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शुक्रवार, अक्टूबर 09, 2009

बवाले जान हुआ खुदा

ईश्‍वर मध्‍ययुगीनता के प्रतीकात्‍मक अवशेष का नाम है। जब जब इंसान को यह भ्रम होने लगता है कि वह मध्‍ययुगीनता से बाहर तो नहीं आ गया वो झट से भगवान को याद कर लेता है तुरंत ही पूरी हिंस्र मध्‍ययुगीनता अपने धुर नग्‍न रूप में उभर कर सतह पर आ जाती है। तलवार गंडासे ले कर ये 'धार्मिक' सड़क पर निकल पड़ता है और दो चार गैलन खून बहाने के बाद अपनी मध्‍ययुगीनता को प्रमाणित कर वापस आ बैठता है। कभी कभी वह केवल आनुषंगिक पद्धति से ही ऐसा करता है अनुष्‍ठान, व्रत-उपवास, ज्‍योतिष, वास्‍तु, फेंगशुई से- पर अक्‍सर उसकी मध्‍यकालीन पहचान की प्यास बाकायदा धर्म के दंगों से ही बुझती है। चिट्ठासंसार भी कुछ अलग नहीं है जब मनुष्‍य ने खुदा बनाया था तो सोचा होगा कि अव्‍याख्‍येय कि जिम्‍म्‍ेदारी इस पर डालकर चैन की बंसी बजाएंगे...पर अपने हिस्‍से का काम दूसरे पर डालने से उसके हम पर हावी हो जाने की जो गुंजाइश होती है वो सच साबित हुई है। ये आदिम कल्‍पना अब सल्‍ल. बल्‍ल कर खुद को सर्वोपरि घोषित करने पर उतारू है। लिंक विवेक ने अपनी पोस्‍ट में इकट्ठे दे दिए हैं...जिनका मन न माने वे झांक सकते हैं- 

सलीम खान मै मुस्लिम धर्म अपनाना चाहती हूँ बशर्ते -

हम तुम्हें गाली दें, तुम हमारे मुँह पे थूको -

मेरा ब्लॉग न हुआ कूड़ा घर हो गया हो उन्होंने चेलेंज के साथ १३ बार मेरे ब्लॉग पर गंदगी फैलाई

ये क्या हो रहा है?
इस्लाम में महात्मा गाँधी जैसा कोई व्यक्तित्व क्यों नहीं होता

जिनका मन विचलित है वो होने दें पर इस हालिया हल्‍लम हल्‍ले (धर्म को लेकर मचा ये बबाल न तो हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में पहला है न आखिरी...इस एंगल को लेकर हम लोग इतने आत्‍मनिर्भर हैं कि यदा यदा ही धर्मस्‍य....पर किसी अवतार की जरूरत नहीं होती) को लेकर अपनी चिंता ये है कि इसने 'हमारे कट्टरपंथी' और 'उनके कट्टरपंथी' जैसी जमात खड़ी कर दी है। अचानक 'उनके' जहर फैलाने वालों की गंदगी देखकर 'अपने' जहर फैलाने वाले सभ्‍य लगने लगे हैं। शर्मिंदगी के साथ एक स्‍वीकारोक्ति ये भी है कि भीतर कहीं एक एग्‍नोस्टिक-सैडिस्टिक मन एक बार को कहने भी लगा कि 'अरे लड़ने मरने दे आपस में...काहे दुखी होता है...दोनों ही तो इंसानियत के बराबर दुश्‍मन हैं'- पर फिर संभल गए क्‍योंकि ये भी सच है कि जब कट्टरपंथी आपस में भिड़ते हैं तो एक दूसरे को खत्‍म नहीं करते उलटा एक दूसरे को बढ़ावा देते हैं।

इस माहौल में आपको कौन सी पोस्‍टें पढ़वाई जाएं ? तो चलिए टाईम मशीन में, शुएब की कुछ शानदार पोस्‍टों की ओर -ताकि इन खुदागिरी करने वालों को दर्पण दिखाया जा सके-

मसलन हम खुदा है-56 में शुएब फरमाते हैं-

सभी भारतीयों ने एक साथ बुलंद आवाज़ मे ख़ुदा से कहाः ख़ुदा को उसके ख़ुदा होने का वासता, ख़बरदार जो हमारी पाक धर्ती पे अपने क़दम रखा। जाओ जाओ हमें आपकी कोई ज़रूरत नहीं…… ईराक़ जाओ, अफ़गानिस्तान जाओ…. इन देशों को जाने अगर हिम्मत नहीं तो अपने स्वर्ग वापस जाओ मगर इस पाक धर्ती पे अपने क़दम ना रखो। हम भारती अपने देश के ख़ुद भगवान हैं, यहां पहले से इतने भगवान हैं कि हमें किसी नये भगवान पर ईमान नहीं।

दो हाथ वाले, चार हाथ वाले, बगैर हाथ वाले और बगैर दिखाई देने वाले, क़बरों मे सोए हुए सूली पर लटके हुए हर किसम के ख़ुदा हमारे देश मे मौजूद हैं अब हम भारतीयों को किसी और ख़ुदा की ज़रूरत नहीं। हम भारतीय ख़ुद ख़ुदा हैं ख़ुद क़यामत मचाते हैं, ख़ुद लुटेरे हैं, ख़ुद फितनेबाज़ भी हैं, ख़ुद दंगा फसाद मचाते हैं, अपने फैसले हम ख़ुद करते हैं। हम भारती हैं अपनी मर्ज़ी के राजा हैं - आप जाओ यहां से, हमारा किसी भी नये ख़ुदा पर ईमान नहीं

खुदा को दॉंत नहीं किस्‍त में-

गुजरात सरकार के बारे ख़ुदा ने कहाः मीडिया वालों ने हल्ला मचा रखा है जैसे मोदी कोई और नहीं बल्कि सोनिया का भाई है। हम ने मोदी को ऐसे ही कुर्सी पे नहीं बिठाया! बल्कि ख़ुदा जिसको चाहे कुर्सी सोंपदे और जिसको चाहे ज़लील और रुसवा करे। ख़ुदा ख़ुद चाहता है कि लोगों को धर्म मे लडवाए क्योंकि ख़ुदा का कोई धर्म नहीं और ख़ुदा की मर्ज़ी के बगैर किसी को धर्म बनाने का अधिकार नहीं

34वीं किस्‍त यानि 9/11 जूनियर में-

खुदा की नींद हराम, अपना बिस्तर छोड फोरन महल से बाहर चीखते हुए भागा। आसमान पर कान फाडते अमेरिकी सेना के लडाकू जहाज़, खुदा ने झिल्लाते हुए कहाः लानत है, हमारी नींद खराब करदी। वो तो शुक्र है अमेरिका ने खुदा को तसल्ली दीः  ये सब आप ही की सिक्यूरिटी के लिए आए हैं। थंडा पानी पीने के बाद खुदा ने फरमायाः समझ मे नही आता आखिर ये लडाकू जहाज़ कान क्यों फाडते हैं? हम भी जगह जगह भूकम्प और भूचाल लाते हैं मगर मजाल है जिस से कोई आवाज़ निकले। अगर किसी को डराना है तो उसके हाथ पैर तोड देते या फिर उसे जान से ही मार डालते जैसे हम भूकम्प भेज कर सेकडों को एक साथ मारते हैं मगर किसी के कान नही फाडते

32वीं किस्‍त में अफजल की फांसी पर खुदा के उद्गार

अफज़ल की बेगम खुदा से इलतिजा कर बैठीः बडी मेहरबानी अगर अप मेरे अफज़ल की जगह ले लें वैसे भी खुदा को मौत नही आती – अगर उसे लटका दिया तो मैं दुनिया मे अकेली अपने बच्चे के साथ और अफज़ल जन्नत मे हूरों के साथ जो मुझे बरदाश्त नही। खुदा ने अपनी बात जारी रखीः हर इनसान की ज़िन्दगी और मौत खुदा के हाथ मे है मगर आतंकवादीयों से खुदा खुद खौफ खाता है, क्योंकि वो यकीनन हमारे स्वर्ग तक मिज़ाइल से निशाना बना सकता है। हम ने मुजाहिदीन से जन्नत का वादा किया, मगर वो बेचारे हमेशा से दुनिया ही मे बुरी मौत मारे जाते हैं

वैसे खुदा सीरीज में अपनी पहली पोस्‍ट में शुएब ने कहा था-

मुझे बहुत कुछ लिखना है और ऐसे वैसे बातें लिखना है जो आज से पहले कभी न पढी हों न सुनी हों । जी हां, ये ब्लॉग अमेरिका और खुदा के बीच चल रही रिश्तेदारी पर है? ठीक ही पढा, क्योंकि इस वक़्त खुदा अमेरिका मे मेहमान है

शुएब की बात इसलिए की जा रही है कि कहीं ऐसा न हो कि कुछ लोगों को एक पूरी कौम को सलीमीफाई या कैरानवीकृत करने का मौका हाथ लग जाए। उल्‍लेखनीय है कि इसी खुदा से मिलो श्रृंखला के लिए जिसमें अब तक 79 कडि़यॉं शुएब दे चुके हैं, शुएब को न जाने कितनी गालियॉं, धमकी व फतवे भुगतने पड़े हैं इनमें पाकिस्‍तानी उर्दू ब्‍लॉगरों की एक पूरी की पूरी रेवड़ शामिल है। दूसरा उद्देश्‍य या याद दिलाना भी है कि पंगे पचड़े नए नही है सनातन चल रह हैं...और ये तो नूंहए चाल्‍लेंगे...ज्‍यादा टेंशन नहीं लेने का। खुद ओसामा भी हिन्‍दी ब्‍लागिंग में आ जाए तो हजम हो जाएगा...फिकर नॉट।

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शुक्रवार, अगस्त 28, 2009

'जजमेंटल' होने के ट्रैप से बचा रहना

कल अनूपजी ने चर्चा तारीख बदलने से बस कुछ ही पहले की, एक जानकार चर्चापाठक ने राय रखी-

ई अपरिहार्य कार्य चर्चा के दिन ही क्यों टपक पड़ते हैं??? और यह मुत्तादी [कंटेजियस] क्यों होते हैं?? शायद किसी ब्लाग वायरस का असर हो! रवि रतलामीजी इस पर प्रकाश डाल सकते हैं या फिर पाबलाजी भी अपनी जानकारी बांट सकते है:)

भई गजब खोजे हैं, ये बाकायदा चर्चालेखन का मरफी नियम है कि यदि आप चाहे धुर निठल्‍ले हैं तथा सप्‍ताह में एकही दिन कुछ काम पड़ता है तो तय है कि वह काम ऐन चर्चा के ही दिन पड़ेगा, इंटरनेट की खराबी, हाजमे की खराबी, बिजली की गड़बडी, मूड का आफीकरण, सास का आना, ससुर का जाना....सब ससुर चर्चा के ही शेड्यूल का दुश्‍मन है। हम आज भी बस जैसे तैसे चार बजे मॉनीटर का मुँह देख पाए हैं सो भी जमाने भर की बेशर्मी लादकर। कपड़ों पर इस्‍तरी अभी हुई नहीं, बालकों के एसाइनमेंट जॉंचने का काम मुल्तवी कर दिया है, फोन आफ हैं तिसपर भी आठ बजते तक चर्चा कर पांवें तो बहुत समझिएगा (ये तो तब है कि ठेठ ठुल्‍ले किस्‍म की नौकरी है मास्‍टरी जिसमें सप्‍ताह में बस तेरह घंटे लेक्‍चर देना होता है,  बाकी तो बस एरियर का इंतजार भर ही करते हैं, ऐसे में अनूप जैसे अफसर जो चर्चा में इतना समय दे पाते हैं बस धन्‍य हैं वे तो बेचारे इतने बिजी हैं कि उनके बकाया एरियर के हिसाब तक का आनंद खुद नहीं ले पाते दूसरों से हिसाब करवाना पड़ता है :))   

आज की चर्चा का मूल स्‍वर एक पोस्‍ट पर आई एक टिप्‍पणी के एक हिस्‍से भर से लिया गया है। पोस्‍ट है कबाड़खाने पर अनिल यादव की पोस्‍ट तामुल और जलपरी।

मैं मुंह बाए उसकी लाल-लाल आंखों को देखते हुए वहीं जड़ हो गया। उस घर की एक बुढ़िया जो वहीं बैठी हुक्का पी रही थी, ने इसे भांप लिया। उसने आँखे तरेरते हुए वह गमछा मांगा और उठाने के लिए हाथ भी बढ़ा दिया। इससे हड़बड़ाकर उस आदमी ने मुझे छोड़ दिया। बाएं हाथ की मुट्ठी बांधे मैं दो दिन बुखार में पड़ा रहा।

संस्कृति की महानता का पुराण बांचने वाले समलैंगिकता की ही तरह बाल यौन शोषण के भी अपने देश में होने से झट इंकार करेंगे... खैर अनिल यादव ने इस सीरीज में यानि उत्‍तरपूर्व यात्रा पर संस्‍मरणों की सीरीज में चार लेख लिखे हैं एक, दो , तीन, चार। अब तक के इन लेखों में जो गुण सबसे उभरकर दिखाई देता है वह है-

मुनीश ( munish )

आलेख की खासियत है लेखक का 'जजमेंटल' होने के ट्रैप से बचा रहना .देखें कब तक ?

 

हमारी नजर में ब्‍लॉगलेखन कुछ बेहद मूल्‍यवान गुणों में से है जजमेंटल होने से बचना। ये वाकई एक ट्रैप है। मसलन पाकिस्तान की फिल्‍मों में अपने बच्‍चों में 'देशभक्ति' भरने की कोशिश पर (जो सिर्फ उतनी हर भोंडी या मनमोहक है जितनी हमारी फिल्‍मों में होती है) प्रतिकिया देखें-

इसमें बच्चों को उनका मास्टर पाकिस्तान को संभालने के लिए कह रहा है. वह उन्हें बताता है कि उनके मुल्क को शहीदों ने अपने खून से सींचा है. बच्चों से कुरआन के सहारे चलने की अपेक्षा की गई है. गाने के अंत में वह कश्मीर को कब्जे में लेने का चिरकालीन राग अलापने लगता है. आश्चर्य है कि वे अपने छोटे-छोटे बच्चों को भी बचपन से ही यह घुट्टी पिलाते आ रहे हैं कि उन्हें कश्मीर पे कब्जा करके वहां अपना झंडा फहराना है.

 

या फिर अपने गुरूवर प्रभाषजी के लेखन से असहमत (असहमति में भी अति जजमेंटलिज्‍म का दोष है सही) लोगों पर पिले पड़े आलोक तोमर की भाषा देखें-

ये ब्लॉगिए और नेट पर बैठा अनपढ़ों का लालची गिरोह प्रभाष जी को कैसे समझेगा?
ये वे लोग हैं जो लगभग बेरोजगार हैं और ब्लॉग और नेट पर अपनी कुंठा की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करते रहते हैं। नाम लेने का फायदा नहीं हैं क्योंकि अपने नेट के समाज में निरक्षरों और अर्ध साक्षरों की संख्या बहुत है।

लगभग ऐसा ही विनीत भी जुगत-भुगत रहे हैं।

talk

कुछ ऐसा ही गुण अवगुण चोखेरबाली पर नीलिमा की पोस्‍ट के रीठेल में भी दिखता है।

अरविंद-एशिया ही नहीं ऐसा कमीनापन कमोबेश पूरी दुनिया में है -पर पूरी दुनिया में हर किसी को कोसते रहना ठीक नहीं है ! खुद सोचिये की क्या यह एक एकांगी दृष्टिकोण नहीं है ? यहाँ कुछ खराब है तो वह ही क्यों बार बार उद्धरनीय बनता है -क्या जो अच्छा है वह दिखता नहीं -यह दृष्य्भेद महज दृष्टि भेद के ही चलते है ! लगता है ब्लागजगत की आधी दुनिया के नुमायिंदे प्रशंसाबोध खो चुके हैं -इन्हें बस हर वक्त रोना कलपना ही आता है ! इससे क्या मिलेगा समाज को ? यह कैसी रचनात्मकता है ? इसी को शूकर वृत्ति कहा गया -कबीर को हर जगह बस मैला दिखता था -तुलसी इस शूकर वृत्ति से ऊपर उठे -आज वे कबीर से कहीं अधिक सम्माननीय हैं ! (कम से कम मेरी दृष्टि में ) -यह उदाहरण महज इसलिए की समाज में चोखेरबालियाँ वह भी तो देखें और बताये जो कुछ अच्छा और अनुकरणीय हो रहा है -बार बार एक ही रोना विकर्षित करता है

इसके कंट्रास्‍ट में लविज़ा का आइडिया देखें (ये दावा नहीं कि पापा का सोना गलत है या उन्‍हें उठाना ठीक :)) इसी परह परमोद बाबू का अंगरेजी में भिन्‍न भिन्‍न मुद्राएं बनाकर सूखे में हरियाना-

master

 

सो बिना जज़मेंटल हुए हमने तो जो भी सामने आया परोस दिया, अब आप इसपर जितना चाहें हो जाएं ज़जमेंटल।

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शुक्रवार, जून 05, 2009

एक रंग-बिरंग-बेरंग गुठली चर्चा

 

दिल्‍ली पेरिस नहीं हो गई है गोकि यहॉं भी बिजली-पानी की समस्‍याएं हैं पर इतनी नहीं कि मध्‍यप्रदेश की तरह पानी के लिए दंगे हों या कलकत्‍ता की तरह बिजली की इतनी किल्‍लत हो कि शिवकुमारजी की तरह चर्चा 5-6 घंटे टाली जा सके। इस तरह के बहानों के लिए हमें आत्‍मनिर्भर रहना पड़ता है , तो हम भी चर्चा में 5-6 घंटे देर से हैं पर बिजली सुबह से है, पानी सुबह का दो घंटे आ चुका है..टंकी भर गई थीं शाम का आने वाला है टंकी ,खाली नहीं हुई है- नहा चुके हैं नाश्‍ता मिल चुका है, लंच मिलने वाला है, कॉलेज न कल जाना था न कल जाना है पिछले पूरे महीने छुट्टी थी, इस पूरे महीने छुट्टी है मतलब ये कि अगर  ग्रीन हाउस गैसें, आतंकवाद,भ्रूण हत्‍या, भ्रष्‍टाचार जैसी सार्वकालिक समस्‍याओं से दु:खी  न हों तो जीवन में ऐसा कोई कष्‍ट जिसके आधार पर चर्चा टाली जा सके। पर इसका मतलब ये भी नहीं कि कोशिश करने पर कष्‍ट खोज नहीं सकते। जब हमारी मुख्‍यमंत्री बैठे बिठाए इस बात पर दु3खी हो सकती हैं कि खंबों का रंग क्‍या है तो जाहिर है हम भी तय कर सकते हैं अगर भगवा पसंद हे तो कह सकते हैं कि हरे बोर्ड क्‍यों ? हरा पसंद है तो कह सकते हैं कि भगवा क्‍यों ? नीला पRag pickersसंद है तो दिल्‍ली के खंबों की ओर मुँह करके दुखी होसकते हैं और पसंद नहीं तो नोएडा के खंबो की ओर मुँह कर। गनीमत है कुत्‍ते खंबों का इस्‍तेमाल करते समय उसके रंगों की शीला दीक्षीती चिंता में नहीं पड़ते वरना कुत्‍तों के रंगे बिरंगे डायपर अपने कचरेदानों में भरे होते और कूड़ा समेटते बच्‍चे इतने रंगीन न होने के कारण इसमें छिप न पाते जैसे आजकल छिप पाते हैं

 घुघुती आम से दु:खी हैं उसके रंग से नहीं उसके नाम से। आम का नाम केसर जाहिर है शीला आंटी को तो पसंद आने से रहा यही घुघुतीजी की परेशानी भी है। हमारी परेशानी बस इतनी है कि दो पेड़ों पर घुघुतीजी को मात्र  दो केसर आम मिले, अब जब आममालिक ही आम खाने की जगह गिन रहे हैं तो जाहिर है हमें तो गुठली भी नसीब न होंगी। 

मुझे भगवान पर कुछ विशेष विश्वास न होते हुए भी कभी कभार 'हे भगवान' कहने की आदत थी। आजकल कहते कहते रुक जाती हूँ क्योंकि कोई यह न कहे कि भगवा..न के बहाने गलत रंग को याद कर रही है ।

खैर इस रंग बिरंगी नोंक झोंक‍ में एक अच्‍छी बात ये भी हुई कि बहस फिर से करने की हिम्‍मत दिखने लगी। ब्‍लॉगिंग की नदी में निरंतर नया पानी जुटता रहता है इससे होता ये है कि वे पुराने बहसिए जो एकाध बार बहस करने का जोखिम उठा हाथ जला चुके होते हैं वे चुपचाप हो चुप्‍प्‍प मार लेते हैं अब रवीश- अविनाश...संजय- सुरेश- अरुण से मुखातिब होना छोड़ चुके थे गनीमत है  काशिफ आरिफ इन बहसों के कड़वे-मीठे इतिहास से अंजान थे इसलिए उन्‍होंने नए सिरे से बहस छेड़ी केवल बहस छेड़ी थी को किसी पर कोई तोहमत नहीं लगाई थी। 

परेशानी मुझे इस बात से है कि इनका हर लेख काग्रेंस, इस्लाम और मुस्लिम समुदाय की बुराई से शुरू होता है और सघं, भाजपा, और हिन्दुत्व की तारिफ पे खत्म होता है। इन सब के ब्लोग्स पर Comment Moderation लगा हुआ है, जो टिप्पणी इनको प्रकाशित करनी होती है उसे प्रकाशित करते है वर्ना जो टिप्पणी कुछ ज़्यादा ही इनके खिलाफ होती उसे ये पी जाते है,

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इन ब्लोग्गर्स मे से प्रमुख है :- सुरेश चिपलूनकर जी, त्यागी जी, अरुन उर्फ पन्गेबाज़ जी। और इनके ब्लोग पर आपको जो इनकी हौसला अफ़ज़ाई करते मिलेगें उनमे प्रमुख है :- संजय बेंगाणी, ताऊ रामपुरिया, दिनेशराय द्विवेदी, अजित वडनेरकर, संजीव कुमार सिन्‍हा, शिव कुमार मिश्रा, महाशक्ति, ऋषभ कृष्ण, राज भाटिया,आदि। 

भगवा-लाल की दलबंदी तो खैर पुरानी है पर मनोरंजक बात ये है कि इस सूची में द्विवेदीजी और वडनेरकरजी का भी नाम है। दिनेशजी तो हमारी समझ में अर्ध रिटायर किस्‍म के कामरेड हैं। खैर बहस तो अभी शुरू हुई है खत्‍म होने से पहले इसे बहस- लड़ाई-जूतमपैजार-टंकीबाजी- बैनकरो आंदोलन- थकान- ऊब के महत्वपूर्ण चरणों से गुजरना है।  

 

खैर रंग-बिरंग-बेरंग चिट्ठों की चर्चा बस इतनी ही बाकी देखें आमने-सामने-

 

आमने

सामने

वो इश्कबाजी और फिल्मों का दौर पहले चिकित्सा, फिर एफआईआर कराएँ -सुप्रीम कोर्ट
हिन्दुओं का अंतिम संस्कार पाकिस्तान में कितना दर्दनाक भगवान ऐसे पड़ोसी सबको दे...
चूरन के साथ बछड़े वाली गाय का दूध पीयें, बेटा होगा! बच्चे या कूड़ा!
ऑस्ट्रेलिया में नही है रंगभेद लहू का रंग कैसा होता है
‘‘जानवर भी मित्र बन जाते हैं’’ मैने किसी पर कोई तोहमत नही लगायी...!!
जीवन के रंग हज़ार .. रंग हो जाने चाहिए बेरंग
हिन्‍द महासागर का नाम कैसे पडा? पहेलीमय दौर में पहेलियाँ बूझिये ?
हर ताले की चाबी है मेरे पास... उसके खिलौने
कहिए, क्या खबर है? ईश्वर मोहल्ले का दादा है !?
शादी के पहले के प्यार भरे खत (Love Letters) फ़्री और लंबी मोबाईल काल्स में खो गये कल की बात-
मनमोहन सरकार का मीडिया मैनेजमेंट "तू तू - में में " मंत्रालय

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शुक्रवार, मई 08, 2009

वोट से बनो कि बिन वोट पप्‍पू तो तुम्‍हें ही बनना है

हमारा मानना रहा है कि भारतीय राजनीति और कला का बहुत गहरा नाता है ! जब जब राजनीति में सरगर्मियां और हलचल बढती है कला की सभी विधाओं में रचनात्मक उर्जा बढी हुई दिखाई देने लगती है ! खासकर ब्लॉग लेखन जो कि आजकल का सबसे आधुनिक कला- रूप है में मात्रात्मक और गुणात्मक विकास होता है ! राजनीति , राजनीतिक व्यक्तियों , संस्थाओं की निंदा , आलोचना , उपहास , व्यंग्य न हो करने को तो ब्लॉग में क्या खाक लिखा जाएगा ? चुनाव  वो भी लोकसभा के आ गए तो ब्लॉग लेखन में भी रचनाओं की बहार - सी आ गई है ! कविता , किस्सा , कहानी , कार्टून हर स्टाइल में मौसम के अनुरूप पोस्टें आईं ! चुनाव के प्रंग से लदे फदे ऎसे माल से तंग आकर शेफाली पांडे जी को लिखना पडा कि बस आज से कोई चुनावी व्यंग्य नहीं आज से खालिस गंभीर कविता लिखूंगी ~! बामुलाहिज़ा के ब्लॉग पर कसाबी आतंकवाद पर कार्टून देखने लायक है ,साथ ही मायावती की मासूमियत भी ! भई जो तंज़ कार्टून में है वो किसी विधा में नहीं है ! खैर ! मेरी आप सबसे गुज़ारिश है कि पूरा देश मिलकर जो चुनाव आयोग को कंफ्यूज़िया रहा है वो न करें ! कोई कहता है कि चुनाव आयोग ध्यान दे ,   तो कोई कहता है चुनाव - आयोग ध्यान न दे ! अब अंशू जी के ब्लॉग को पढकर चुनाव आयोग के कान ( अगर वो हैं तो ) पर जूं रेंगेगी क्या ?

मेरी गली और देश के सारे के सारे पप्पूओं के साथ जो अन्याय हो रहा है मेरे हिसाब से उसपर मानवाधिकार आयोग को जल्द ध्यान देने की ज़रूरत है ! उनके नाम को खामख्वाह बदनाम किया जा रहा है ! जो जन्म से पप्पू नाम के साथ बड़ी हुए हैं वो जी कैसे रहे होंगे इसपर संवेदनशीलता से विचार करना चाहिए ब्लॉगरों को ! एक ब्लॉगर ही हैं जिनसे ऎसी बातों से मुद्दा निकालने की उम्मीद की जा सकती है ! अब जो पप्पू भी नहीं बने वोट भी नहीं डाला उनका ऎक्स्पीरियेंस भी पढ डालिए हो सकता है आगे काम आए ! टेंशन –प्वाइंट पर जाकर मुंह छिपाए घूम रहे पप्पू थोडा रिलीव्ड महसूस कर सकते हैं ! पर आपको बताए दूं यहां पोस्ट नहीं पोस्ट की बच्चा ही मिलेगा ! :) भई लिख ही रहे हैं तो थोडी टेंशन आप भी ले ही लो हाथ खोलो की बोर्ड पर ताकि पढने वाला भी समझ पाए कि आप लिखना ही चाहते थे ब्लॉग वाणी की लिस्ट में आ जाना भर इरादा नहीं था आपका !  चुनावी काउंट डाउन शो जल्द ही शुरू होने वाला है अब गिनना बाकी है जो कि सबसे आसान काम है भारतीयों के लिए ! आखिर इतनी बढी आबादी की जनगणना से गिनने की प्रेक्टिस करते आए हैं हम ! मंसूर मतदान के बाद के समय सोलह मई की गिनती के लिए तैयार कर रहे हैं-

बोल घड़े में डाल चुके अब गिनती करना है ,
पोल खुलेगी जल्दी ही, अब गिनती करना है.
सब ही सर वाले तो सरदार बनेगा कौन?
दार पे चढ़ने वालो की अब गिनती करना है.

गूंगे बहरे शेर के पकडे जाने की कहानी का रहस्य जानने के लिए पल्लवी त्रिवेदी जी के ब्लॉग पर जाइए ! पढकर मुस्कुराए बिना नहीं रहेंगे ! इलेक्शन के दिन एक तत्पर और ज़िम्मेदार वोटर को पप्पू बनाया जाने के लिए विवश करते सरकारी तंत्र पर व्यंग्य अवश्य पढिए चाय - चिंतन में !  वैसे शर्मिंदगी केवल पप्‍पूपन की ही नहीं है, मसलन पीएम साहब क्‍वात्रोची की वजह से शर्मिंदा हैं।  शर्मिंदगी की वजहें और भी हैं मसलन औरत औरत होना जो रोजाना मरती है या फिर अल्‍पवयस्‍क पत्नी की होना जिसे कानून भी पटकता फटकता है।

क्या हम दुनिया के किसी भी भाग से ऐसे समाचार नहीं सुनते हैं कि दो या पाँच या सात वर्ष की बालिका के साथ बलात्कार किया गया।  किसी भी अवस्था में इस तरह के अपराध के होने की संभावना तो बनी ही रहती है।  इसी तरह से बाल विवाह पूरी तरह से प्रतिबंधित हो जाने पर भी यह स्थिति तो बनी ही रहेगी कि कानून से निगाह बचा कर कोई बाल विवाह हो ही जाए और उस अवस्था में कोई पति अपनी 15 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ बलात्कार कर दे।  ऐसी अवस्था में उस कृत्य को अपराध घोषित किया जाना क्या आवश्यक नहीं है?

 

और अंत में आमने-सामने :

आमने

सामने

कानून में 15 वर्ष से कम की पत्नी क्यों?

औरत रोज़ाना मरती है...

मैने यह दृश्य पहली बार देखा... आप भी देखिए कुमार गंधर्व के सुपुत्र मुकुल शिवपुत्र भोपाल की सड़कों पर भीख मांग रहे हैं ।
प्रीत की रीत ये मनाने का हुनर हो शायद ...
हाय दिस इज रामप्यारी स्पीकिंग

पादुका प्रक्षेपण करने वालों के लिए नई रेंज आई है......

गूगल को बताइए अपनी कहानी, वह सुनना चाहता है आपकी जुबानी। टैक्नोलाजी, बच के रहना
राहुल का बयान, सन्नाटे में लालू हंगामा क्यों बरपा है?
खिसियाये लालू, मीडिया पर भड़के मैं पप्‍पू बन गया
आज भी गाये जाते हैं प्रभाती रामू के रण में जन गण मन

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रविवार, अप्रैल 12, 2009

एक और अनेकः सच्चा शरणम् अखिलं मधुरम्

कभी पहले जब मैं नियमित चर्चा करता था तब मैं ज्यादा से ज्यादा उन चिट्ठों को टटोलता था जो भीड़ में गुम से रहते थे। अपनी इस कोशिश में कई अच्छे लिखने वालों का पता चला था जिनमें से ज्यादातर पसंद और पाठक के मामले में हम से कहीं आगे निकल गये हैं। ऐसे ही एक ब्लोगर के ब्लोग का पता मुझे तब चला था और उसकी लिखी कवितायें अन्य ब्लोगरस से थोड़ा जुदा सी लगी थीं। चर्चा में हमने उसकी कविताओं की चर्चा भी की और आज वो ही एक और अनेक के तीसरे एपिसोड का मेहमान है। अगर अभी तक अंदाज नही लगा पाये तो बता दूँ ब्लोगर का नाम है हिमाँशु जो पेशे से अध्यापक हैं।

जगजीत सिंह की गायी हुई एक गजल की लाईनें हैं, "अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफर के हम हैं, रूख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं"। इसी तर्ज में हिमाँशु का अपने बारे में कुछ यूँ कहना है -
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफिर का नसीब सोचते रहतें हैं किस ओर किधर के हम हैं।
पढ़ने सुनने के मामले में हिमाँशु जिस तरह का शौक रखते हैं वैसा ही उनके लिखे में दिखता भी है। इनके चिट्ठों में से एक है, सच्चा शरणम्। जिसमें उनकी ताजातरीन पोस्ट है - गाने आया जो अनगाया है अब तक वो गीत रे। ये दरअसल भावानुवाद है रविन्द्रनाथ की गीतांजलि से और इसे हिमाँशु ने नही बल्कि उनके पिताश्री प्रेम नारायण 'पंकिल' जी ने किया है -
गाने आया जो अनगाया है अब तक वो गीत रे
वीण खोलते कसते वासर गये अमोलक बीत रे ।
देखा बदन न उसका उसके स्वर न सुन सके कान
उसकी पगध्वनि का ही बस कर पायी श्रुति संधान
गृह समीप पथ से निकला जब मंथर गति मनमीत रे
वीण खोलते कसते वासर गये अमोलक बीत रे ।
लेकिन इस भावानुवाद से पहले जो उन्होंने पोस्ट किया था वो उनका खुद का ही लिखा था। क्या आपने कभी कुछ महसूस किया है कुछ और वो क्या लगा आपको। महसूस करने के मामले में हिमाँशु का कहना है, महसूस करता हूँ, सब तो कविता है -
मैं रोज सबेरे जगता हूँ
दिन के उजाले की आहट
और तुम्हारी मुस्कराहट
साफ़ महसूस करता हूँ ।
चाय की प्याली से उठती
स्नेह की भाप चेहरे पर छा जाती है ।

फ़िर नहाकर देंह ही नहीं
मन भी साफ़ करता हूँ,
फ़िर बुदबुदाते होठों से सत्वर
प्रभु-प्रार्थना के मंद-स्वर
कानों से ही नहीं, हृदय से सुनता हूँ ।
अगरबत्ती की नोंक से उठता
अखिल शान्ति का धुआँ मन पर छा जाता है ।
उनके चिट्ठे को और बाँचता हूँ तब यही लगता है कि लेखन कला उन्हें विरासत में ही मिली है। हमारे साथ कई बार होता है कंप्यूटर खोलते तो ब्लोग लिखने के लिये हैं लेकिन फिर गेम खेलने लग जाते हैं। वैसा ही कुछ जरूर उनके बाबूजी के साथ हुआ होगा तभी तो पंकिल जी लिख बैठे, दिया राहु लिख चन्द्रमा लिखते-लिखते -
पथिक पूर्व का था चला किन्तु पश्चिम
दिया राहु लिख चन्द्रमा लिखते-लिखते ।

यह बुढ़िया स्वयं खा रही है ढमनियाँ
सिखाती है औरों को सदगुण ही सुख है
लबालब भरेगा सलिल कैसे ’पंकिल’
जो औंधा किया अपनी गागर का मुख है,
चिकित्सक बना भी तो कैसा अनाड़ी
दिया टाँक मिर्गी दमा लिखते-लिखते ।
उनके क्षेत्र के नेता भी बड़े निराले हैं, ऐसे ही एक नेता गधे में बैठ, जूते की माला धारण किये नामांकन भरने गये और जनता इनसे देश के उद्धार की आश लिये इनके पीछे पीछे। कोई आश्चर्य नही ये चुनाव जीत भी जायें। इसी घटना पर लिखी इनकी पोस्ट में विश्लेषण की भरमार देखिये -
स्वनामधन्य ये महानुभाव गधे पर क्यों बैठे ? गधा तो शीतला मइया का वाहन है, अतः भागवत जी तो महामारी लेकर आ गये । भोली जनता को गधा बनाने वाला ऐसा गधा (माफ करें) कहाँ मिलेगा ? यदि निरीह प्राणी की ही बात है तो गधा तो ’रजक’ (धोबी) वर्ग का सम्मानित जीव है । खुर भी चलाता है, दाँत भी चलाता है, भार भी ढोता है । सेवक है, सुशील है, सत्कर्मी है । अच्छा होता ’भागवत जी’ मेमने पर बैठ गए होते ! अंग्रेजी कवि ’विलियम ब्लेक’ ने मेमने (लैम्ब ) को सबसे निरीह माना है - न पूँछ, न सींग । कोई भेंड़ भी चुन सकते थे, समयानुसार भोजन कर लेते, जैसे नेता जनता का कर लिया करते हैं । जूते की माला की जगह कुर्सी लटका लेते - कुर्सी भी तो चलती है संसद में; चला भी लेते, उस पर बैठ भी जाते । ऐसी अभद्रता किस लोकतंत्र की धरोहर है ? जनता तुम्हारा जूता देख रही है जिसे गले से निकालकर किसी के गाल पर चला सकते हो । ऐसी सुबुद्धि को शत-शत बार प्रणाम ।
हिमाँशु अक्सर ही कविता लिखते रहते हैं लेकिन फिर भी कई बार उन्हें कहना पड़ता है, मैंने कविता लिखी -
मैंने कविता लिखी
जिसमें तुम न थे
तुम्हारी आहट थी
और इस आहट में
एक मूक छटपटाहट

मैंने कविता लिखी
जिसमें इन्द्रधनुष नहीं था
हाँ, प्यासे कुछ लोग थे
क्योंकि उसमें बादल था
दुनिया में तो देखते आये थे अक्सर हिंदी ब्लोग जगत में भी सुनने में आ ही जाता है, आप सोच रहे हैं क्या? यही पात-पात में हाथापायी बात-बात में झगड़ा, इसी शीर्षक में वो लिखते हैं -
गांव गिरे औंधे मुंह
गलियां रोक न सकीं रुलाई
’माई-बाबू’ स्वर सुनने को
तरस रही अंगनाई,
अब अंधे के कंधे पर
बैठता नहीं है लंगड़ा

पूजा के दिन गंगाजल की
घर-घर हुई खोजाई
दीमक चाट रहे कूड़े पर
मानस की चौपाई,
कट्टा रोज निकाल रहे हैं
बन कर पिछड़ा-अगड़ा ।
हिमाँशु को SMS भी आते हैं, एक दिन ऐसा ही एक आया -
एक आदमी मंदिर गया
रोने लगा-
"हे राम’ मेरी बीवी खो गयी है" .
राम जी बोले,
"बाजू वाले हनुमान मंदिर में जा के बोल,
क्योंकि मेरी भी उसी ने ढूंढी थी"....
अपने बाबूजी की लिखी रचनाओं के लिये हिमाँशु ने एक ब्लोग बनाया है, नाम है अखिलं मधुरम्। इस पर लिखी रचनाओं को समझने के लिये हमारी जैसी साधारण समझ से नही चलेगा। उसके लिये हिंदी का अच्छा खासा ज्ञान चाहिये। कुछ बानगियाँ देखिये -
गहन तिमिर में दिशादर्शिका हो ज्यों दीपशिखा मधुकर
मरु अवनी की प्राण पिपासा हर लें ज्यों नीरद निर्झर
तथा मृतक काया में पंकिल भर नव श्वाँसों का स्पंदन
टेर रहा है नित्य नूतना मुरली तेरा मुरलीधर।।16।।
कुछ और देखिये -
“पिंडलि पर आँकू”, कहा श्याम “लतिका दल में खद्योत लिये।
नव कदलि-खम्भ मृदु पीन-जघन पर पुष्पराग दूँ पोत प्रिये!
विरॅंचू नितम्ब पर नवल नागरी व्रजवनिता बेचती दही।
पदपृष्ठप्रान्त में अलि-शुक-मैना मीन-कंज-ध्वज-शंख कही्।
फिर बार-बार बाँधू केहरि-कटि पर परिधान नवल धानी।
अन्तर्पट पर रच दूँ लिपटी केशव-कर में राधा रानी।”
हो चतुर चितेरे! कहाँ, विकल बावरिया बरसाने वाली ।
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन-वन के वनमाली ॥54॥
हिमाँशु ने एक नया प्रयत्न भी किया है और वो है अपनी लिखी कविताओं का गान और इनके कविता गान को आप सुन सकते हैं - नया प्रयत्न में, आवाज भी कविता जितनी ही मधुर है। नया प्रयत्न में उनकी लिखी काफी सारी खुबसूरत कवितायें हैं। अगर आप काव्य प्रेमी है तो जाईये वहाँ और खुद ही रसपान कीजिये।

हिमाँशु, अंग्रेजी में भी कवितायें लिखते हैं और ये आप इनके चिट्ठे Literary Look में पढ़ सकते हैं।

अब हिमाँशु से की गयी सवालों की त्रिवेणी -
तरूण: आप के प्रोफाइल से पता चलता है कि आप अध्यापन से जुड़ें हैं, तो क्या बतायेंगे कि किस विषय से? क्या आपके छात्र आपके ब्लोगस के बारे में जानते हैं। कभी स्कूल के समारोह में अपनी कोई कविता पढ़ी क्या आपने?
हिमाँशु: अपने ही कस्बे के डिग्री कॉलेज में एक साल से हिन्दी साहित्य पढ़ाता हूँ । बहुत से छात्र मेरे इण्टरनेट प्रेम को जानते हैं । कुछ एक पढ़ते भी हैं, जिनके पास सुविधा हो । अपने कस्बे का अकेला ऐसा उपयोक्ता हूँ जिसने इण्टरनेट केवल ब्लॉगिंग जैसी किसी वस्तु के लिये लिया हो, अन्यथा यहाँ इण्टरनेट परीक्षा परिणाम जानने के साधन के सिवा कुछ समझा नहीं जाता । बहुतों ने तो शुरु-शुरु में पूछा भी, "कितना रिजल्ट देखना है आपको कि घर पर इण्टरनेट ले आये ?" मैं निरुत्तर हूँ अभी तक।

कुछ मित्रों के साथ बैठकी में कविता पढ़ लिया करता था, लोग इसके प्रति सीरियस नहीं थे । छात्रों को खूब कविता सुनायी है, पर समारोह में नहीं, व्यक्तिगत - आफिस में या घर पर जब वह कुछ पूछने आते हैं, और कविता का जिक्र चल जाया करता है । आजकल हिन्द-युग्म से जुड़े ’मनीष वन्देमातरम’ मेरे कस्बे के पास ही रह रहे हैं, उन्हें सुनाता हूँ।

तरूण: अखिलं मधुरम् में एक स्क्रोल बार दौड़ता रहता है जो उस ब्लोग को शुरू करने की वजह बताता है। श्री प्रेम नारायण पंकिल जी के बारे में थोड़ा कुछ बताईये।
हिमाँशु: श्री प्रेम नारायण ’पंकिल’ मेरे पिता जी हैं । स्थानीय इण्टर कॉलेज में अंग्रेजी के प्रवक्ता थे, पिछली साल अवकाश प्राप्त कर लिया । पिता जी ने अपने शिक्षा व अध्यवसाय से स्वयं को एक विद्वान और श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में निर्मित किया, परन्तु प्रदर्शन से दूर रहे । लगातार लिखते रहे, आस-पास की पत्रिकाओं में अपने आप किसी ने छाप दिया तो ठीक, नही तो अपना समस्त काव्य-कर्म उसी चिरन्तन के सम्मुख परसते रहे और संतुष्ट हो लिये । एक निर्विकार स्वरूप । मेरी अपनी जिद से मैंने ’अखिलं मधुरम’ पर उनकी रचनायें देनी शुरु कीं । बहुत लिखा है उन्होंने, आज भी लिख रहे हैं ।

तरूण: आपकी कविताओं में दर्शन शास्त्र का असर साफ दिखता है लेकिन अगर मल्लिका शेरावत (या आपकी कोई फेवरिट) आपको प्यार का दर्शन समझाने की जिद करे तो आप इसे कहाँ (किस जगह) सीखना चाहेंगे?
हिमाँशु: मेरा एक बैठका है । उसी में अतिथियों के आने जाने से लेकर अपने सभी सम्बन्धियों/ प्रियजनों के बीच मैं क्षुद्र-मति अपने कम्प्यूटर के साथ विहार करता हूँ । यहीं रोज की दिनचर्या के बीच, जीवन की आपाधापी में समय का एकांत ढूंढ़ता हूँ ( ठीक उसी तरह जैसे दो शब्दों के बीच छुपा अर्थ ) और अपना एक फलसफा बनता जाता है ( अगर कोई फलसफा है ) । कविता भी मेरे जीवन के इसी संस्कार से जन्म लेती है । कोशिश करुंगा, कि मल्लिका शेरावत यहीं पधारें - यहाँ भीड़ में बहुत कुछ समझने की जिद रहती है मेरी ।


अंत में, इतना ही कहूँगा कि हमेशा हंसते रहिये क्यूँकि एक तो ये फ्री है और दूसरा कई बिमारियाँ दूर रखता है। और अगर ये बातें काफी नही है हंसने के लिये तो इतना ही कहूँगा कि जीव जंतु और जानवर ही हैं जो नही हँसते, सिर्फ इंसान ही हैं जिन्हें हँसना आता है। और आपमें से जो हसँते रहते हैं उनके लिये हिमाँशु की लिखी ये कविता पेश किये जाता हूँ - आपका हँसना
आपके हँसने में
छ्न्द है
सुर है
राग है,
आपका हँसना एक गीत है।

आपके हँसने में
प्रवाह है
विस्तार है
शीतलता है,
आपका हँसना एक सरिता है।

आपके हँसने में
शन्ति है
श्रद्धा है
समर्पण है,
आपका हँसना एक भक्ति है।

आपके हँसने में
स्नेह है
प्रेम है
करुणा है,
आपका हँसना एक भाव-तीर्थ है।

आपके हँसने में
आपका विचार है
अस्तित्व है
रहस्य है,
आपका हँसना स्वयं आप हैं।

मेरे जीवन में
आपकी तरलता है
स्निग्धता है
सम्मोहन है,
मेरा जीना आपका हँसना है।
कुछ देर के लिये इसे हमारे ही भाव समझिये, अगली बार फिर मुलाकात होगी एक दूसरे ब्लोगर और उसकी अनेक पोस्टस के साथ।

- तरूण

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रविवार, अप्रैल 05, 2009

एक और अनेकः अशोक का कृषि दर्शन

अपने पर्सनल चिट्ठे पर जब मैं दूरदर्शन के पुराने दिनों की याद कर रहा था तो उसमें डा अनुराग ने एक टिप्पणी में कहा था, जो एक प्रोग्राम कुछ खासा अच्छा नही लगता था वो था कृषि दर्शन, कमोबेश यही हमारी भी कहानी थी। कृषि दर्शन बहुत बोरिंग लगता था क्योंकि उसकी बातें एक बच्चे की समझ से ऊपर की बातें होती थीं। लेकिन उस टिप्पणी से हमें याद आया एक ऐसा ब्लोगर जिसने इसी को अपने ब्लोगर का सबजेक्ट चुना। जी हाँ आज के हमारे एक ब्लोगर हैं, अशोक पांडेय जो खेती बाड़ी के नाम से ब्लोग लिखते हैं।

मैं अभी उनका ब्लोग देख रहा था तो जो सबसे पहली पोस्ट दिखी वो थी एक ऐसे व्यक्ति के बारे में जो शिक्षा से तो वैज्ञानिक था लेकिन कर्म से एक सिक्यूरिटी गार्ड वो भी कनाडा में। अशोक ने शीर्षक रखा था, "वैज्ञानिक करें सिक्‍यूरिटी गार्ड का काम, तो कैसे हो कृषि अनुसंधान !"। इस पोस्ट में कुछ टिप्पणियाँ सहानुभूति की आयी तो कुछ उस वैज्ञानिक को कोसती। सहानुभूति जताकर भी कुछ नही होने वाला ना ही उस व्यक्ति को कोसकर, इंडिया में ऐसे ना जाने कितने पढ़े लिखे हैं जिनके पास काम नही है। काम कोई भी खराब नही होता है लेकिन पढ़े लिखे लोग शायद चाहकर भी इंडिया में वो काम नही कर सकते जो दूसरे देशों में जाकर। क्योंकि अगर इंडिया में करते हैं तो आस पास का समाज ताने मार मार उसको वैसे ही मार देगा। यहाँ अमेरिका में अभी एक बड़ी कंपनी के एक CEO को पिज्जा डिलीवर करते देखा था।

अशोक लिखते हैं -
घोषित तौर पर कृषि क्षेत्र सरकार के एजेंडा में भले ही सबसे ऊपर हो लेकिन जमीनी सच्‍चाई हमेशा इसके विपरीत ही नजर आती है।
आगे उनका कहना है,
इधर अपने देश में कृषि अनुसंधान का हाल यह है कि इस क्षेत्र में वैज्ञानिकों की घोर कमी है, जिसके चलते कई परियोजनाओं के ठप पड़े होने की बात कही जाती है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के विभिन्‍न संस्‍थानों के कृषि वैज्ञानिकों के करीब 38 फीसदी अर्थात 2500 पद खाली हैं।
ये तो जमीनी सच्चाई है लेकिन इन सबसे आंखे मूँदे हम गर्व करते हुए गाते हैं, मेरे देश की धरती सोना उगले। ऐसे हालात रहे और किसान आत्म हत्या करते रहे तो ये धरती क्या उगलेगी क्या निगलेगी ये तो वक्त ही बतायेगा।

ऐसा भी नही है कि एक किसान को खेती के सिवा कुछ नही सूझता, उसकी कोई संवेदना नही होती, होती है जी और ये अशोक के साथ भी है। इसलिये अपनी एक पोस्ट में आम आदमी की संवेदना पर लिखते हुए रघुवीर सहाय की कविता पेश करते हैं - आज फिर शुरू हुआ

आज फिर शुरू हुआ जीवन
आज मैंने एक छोटी-सी सरल-सी कविता पढ़ी
आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा

जी भर आज मैंने शीतल जल से स्‍नान किया

आज एक छोटी-सी बच्‍ची आयी, किलक मेरे कन्‍धे चढ़ी
आज मैंने आदि से अन्‍त तक एक पूरा गान किया

आज फिर जीवन शुरू हुआ।
लेखों में विभिन्नता बरकरार रहती है, तभी तो खेतों से खलिहान से यदा कदा जब इधर उधर पहाड़ियों पर नजर डालते हैं तो बात करने लगते हैं एक पहाड़ी पर बसे मुंडेश्‍वरी मंदिर की जो कि पुरातत्‍व के आईने में भारत का प्राचीनतम मंदिरों में आता है।
विख्‍यात इतिहासकार एनजी मजुमदार ने शिलालेख का गहन अध्‍ययन करने के उपरांत संवत्‍सर का आशय गुप्‍तकाल से लगाते हुए शिलालेख की तिथि 349 ईस्‍वी निर्धारित की। उनका विश्‍लेषण Indian Antiquity, February, 1920 Edition में प्रकाशित हुआ। श्री मजुमदार का स्‍पष्‍ट मत है कि मुंडेश्‍वरी शिलालेख समकोणीय ब्राह्मी लिपि में है, जो 500 ईस्‍वी के बाद देश में कहीं भी देखने को नहीं मिलती। उनके मुताबिक हर्षवर्धन के काल में जिस ब्राह्मी लिपि का प्रयोग देखने को मिलता है वह न्‍यूनको‍णीय है।
यही नही प्राप्त शिलालेखों पर बताते हैं -
मुंडेश्‍वरी मंदिर के काल निर्धारण का मुख्‍य आधार वहां से प्राप्‍त शिलालेख ही है। अठारह पंक्तियों का यह शिलालेख किन्‍हीं महाराज उदयसेन का है, जो दो टुकड़ों में खंडित है। इसका एक टुकड़ा 1892 और दूसरा 1902 में मिला। दोनों टुकड़ों को जोड़कर उन्‍हें उसी साल कलकत्‍ता स्थित इंडियन म्‍यूजियम में भेज दिया गया। 2’8”x 1’1” का यह शिलालेख संस्‍कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में है। लेख की भाषा में कुछ व्‍याकरणिक अशुद्धियां हैं और शिला टूट जाने के कारण जोड़ के बीच के कुछ शब्‍द गुम हो गए हैं। हालांकि विद्वानों ने अपने शोध के आधार पर उनकी पुनर्रचना की है। ब्राह्मी लिपि के उक्‍त शिलालेख का चित्र और बिहार राज्‍य धार्मिक न्‍यास परिषद द्वारा किया गया उसका देवनागरी लिप्‍यंतरण और हिन्‍दी अनुवाद इस आलेख के साथ यहां प्रस्‍तुत किया गया है।
जय जवान, जय किसान का नारा देने वाले लाल बहादुर के देश में किसानों और कृषि को शायद इग्नोर किया जा रहा है तभी तो कृषि क्षेत्र में पड़ोसियों से भी पिछड़ गया भारत, और ये बात भी एक पोस्ट के जरिये बता रहे हैं अशोक।
कृषि उत्पाद के मामले में भारत, दक्षिण एशिया का दिग्गज देश नजर आता है, लेकिन अगर पिछले आंकड़ों को देखें तो खाद्य फसलों की उत्पादनशीलता छोटे पड़ोसी देशों से भी कम है। यहां तक कि अफगानिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों में भी पिछले दो दशकों में फसलों की उत्पादकता के मामले में भारत की तुलना में विकास दर ज्यादा रही है।
अशोक ने अपनी पहली पोस्ट १८ मई, २००८ के दिन लिखी थी और पोस्ट थी - लोहे की बढ़ी कीमतें हैं महंगाई का रक्तबीज। इसकी शुरूआत ही उन्होंने किसानों के बढ़ती आत्म हत्या पर बात उठाते हुए करी -
खच्चर बोझ भी ढोता है और गाली भी सुनता है। हमारे देश में किसानों की स्थिति उस निरीह जानवर से बेहतर नहीं है। पहले से ही आत्महत्या कर रहे किसानों के लिए हाल की महंगाई प्राणलेवा है, इसके बावजूद उन्हें इसका बोझ उठाने को विवश किया जा रहा है। महंगाई रोक पाने में सरकार की नाकामी का मुख्य कारण उसकी नीतिऔर नियत में यह खोट ही है।


इनकी पहली पोस्ट पर ज्ञान दत्त पांडेजी की टिप्पणी थी -
यह अत्यंत हर्ष और संतोष का विषय है कि आप जैसे खेतीबाड़ी से जुड़े लोग भी ब्लॉगोन्मुख हो रहे हैं। और आपकी पोस्ट से स्पष्ट है कि आप सम्बन्धित विषयों पर सुस्पष्ट विचार रखते हैं।

नियमित लिखते रहें और ब्लॉगों पर सब्स्टेंस वाली टिप्पणियां करते रहें। आपको निश्चय ही सशक्त ब्लॉगर बनना है।


और एक दूसरी टिप्पणी थी, डा.चंद्रकुमार जैन की -
माटी की सेवा करते हैं,
कलम से नाता गहरा है.
धरती माता के आँगन में,
ये माटी-पुत्र का पहरा है.


कुल मिलाकर बात इतनी भर है कि अगर जाने पहचाने विषयों से परे कुछ अलग सा जानना है या पढ़ना चाहते हैं तो खेती बाड़ी पर जाईये क्योंकि किसान और उसका खेत हमेशा से ही इस देश की पहचान रही है और ये पहचान बनी रहनी चाहिये।

एक और अनेक की इस दूसरी (पहली चर्चा थी, महेन की बतियाँ) चर्चा से कुछ नया इसमें जोड़ा है और वो ये कि जिस किसी भी ब्लोगर की यहाँ बात करेंगे उससे ३ सवाल भी पूछेंगे। इसी क्रम में बगैर पूर्व चेतावनी के अंतिम क्षण में हमने अशोक से ३ सवाल पूछे।

तरूणः आम आदमी के लिये जहाँ कृषि एक बोरिंग सा विषय होता है वहीं आपने इस विषय को अपने ब्लोग के लिये क्यों चुना?
अशोक पांडेयः मैं खुद एक किसान हूं और मुझे अपने गांव व खेतों से काफी लगाव है, इसलिए मैंने अपने ब्‍लॉग के लिए यही विषय चुना। मुझे लगा कि किसान का पक्ष सही तरीके से एक किसान ही रख सकता है।

तरूणः कुछ समय पहले और आजकल भी यदा कदा सुनने में आता है किसानों की आत्म हत्या के बारे में, भारत जैसे कृषि प्रधान देश में ये होता देख और सुन आपको कैसा लगता है? इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिये क्या कुछ किया जा सकता है?
अशोक पांडेयः इस देश में भगवान और किसान को सबसे अधिक बेवकूफ समझा जाता है और उन्‍हें सबसे अधिक छला जाता है। कृषिप्रधान देश होने के बावजूद यहां सबसे अधिक उपेक्षित कृषि और किसान ही हैं। किसान की आत्‍महत्‍या की बात सुन मेरा खून खौलने लगता है। वैसा ही दर्द होता है जैसा एक भाई के मरने पर दूसरे भाई को होता है। इस देश के बहुसंख्‍यक किसान हिन्‍दीभाषी हैं, जबकि यहां की राजकाज की भाषा (राजभाषा) व्‍यावहारिक रूप से आज भी अंगरेजी है। इसका परिणाम है कि किसान के हाथ पैर तो मुक्‍त हैं लेकिन उसकी जुबान पर ताला लगा है। किसान की जुबान का ताला खोल दो, उसके हाथों में इतनी ताकत है कि वह अपनी किस्‍मत खुद संवार लेगा। आज यदि किसानों के बेटे नक्‍सली या अपराधी बन रहे हैं तो उसका कारण उनकी यह उपेक्षा ही है। सरकार उनके लिए कुछ नहीं करती तो मजबूरी में वे अपराध या नक्‍सलवाद की डगर पकड़ते हैं।

तरूणः अगर आप से पूछा जाय कि बालीवुड, हालीवुड या आपकी भोजपुरी (बिहारवुड) में से किसी एक हिरोईन को एक शाम की डेट (एक यादगार शाम बिताने के लिये) के लिये चुनें तो आप किसे चुनेंगे? और कहाँ लेकर जायेंगे?
अशोक पांडेयः एक से काम नहीं चलेगा जी, हम तो भीड़ में रहना पसंद करते हैं। मेरा वश चले तो मैं हॉलीवुड, बॉलीवुड, पॉलीवुड सभी को बुला लूं और कहूं कि खेत की मेड़ पर घूमते हुए मटर की हरी-हरी छेमियां खाते हैं और चांदनी रात में खलिहान में बैठकर चैता, कजरी का आनंद लेते हैं।

ये था अशोकजी से पूछे गये सवाल-जवाब का सिलसिला, अगली बार फिर लेकर आयेंगे किसी एक ब्लोगर और उसकी अनेक पोस्टों को "एक और अनेक" में।

[आप में से जिन्होंने कभी भी मेरे पर्सनल चिट्ठों पर अपनी टिप्पणी नही छोड़ी, उनसे अनुरोध है कि कम से कम एक टिप्पणी वो वहाँ किसी भी एक चिट्ठे में अपने असली ईमेल एड्रैस और ब्लोग पते के साथ छोड़ दें। जिससे अगर उनको या उनके चिट्ठों का नंबर आता है तो उससे सवाल पूछने के लिये हमारे पास उसका ईमेल पता हो। ये सिर्फ आप्शनल है अगर नही भी छोड़ेंगे तो भी चर्चा तो की जायेगी, बस सवाल-जवाब वाला सेक्शन नही दे पायेंगे। इस नोट को सेल्फ प्रमोशन ना समझा जाये। ;)]

[कल की संगीत चर्चा जो कभी नही से देर भली की तर्ज पर की गयी]

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शनिवार, अप्रैल 04, 2009

झूले में पवन के आई गीतों की बहार

मैं यूँ ही इस तरफ चला आया तो खामोशी देखी, जहाँ गीत बजने चाहिये थे वहाँ सन्नाटा बिखरा हुआ था। जब सारे विश्व में शांति का बैंड बजा हुआ हो तो ये शांति हमें यहाँ कैसे सुहाती लिहाजा पेशे खिदमत है गीतों की मदमदाती, कुछ गुदगुदाती, कुछ खिलखिलाती बयार।

जब बयार की बात चली हो तो सबसे अच्छी जो पवन सुहाती है वो गंगा (नदी) किनारे। गंगा की बात करी तो याद आता है छोरा गंगा किनारे वाला। लेकिन युनूस भाई को याद आ रहा है "गंगा रेती पे बंगला छबाय दियो रे"। अब चूँकि बात बंगले की है तो वहाँ काफी रेती (रेत) भी बिखरी हुई है।
गंगा-रेती में बंगला छबा मोरी राजा आवै लहर जमुने की ।
कोई अच्‍छा-सा खिड़की कटा मोरे राजा, आवै लहर जुमने की ।।
खिड़की कटाया, मोरे मन भाया
कोई छोटी-सी बगिया लगा मोरे राजा आवै महक फूलों की ।।
गंगा किनारे बंगला होने का एक और फायदा है, अगर बंगले के बाहर बैठे बैठे कभी सूरज की गर्मी से बदन झुलसने लगे तो बजाय अंदर जाने के आप गंगा में डुबकी लगा सकते हैं। लेकिन शर्मा बंधु का जलते तन को ठंडक पहुँचाने का तरीका थोड़ा अलग है, तभी तो गा रहे हैं -
जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को मिल जाये तरूवर की छाया,
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है, जब से शरण तेरी आया
आवाज में फिलहाल तो खेल चल रहा है और खिलाड़ियों की चिंता यही है कि खेल अधूरा ना छूटे -
जीत ही लेंगे बाजी हम तुम, खेल अधूरा छूटे ना

बहार डोल रही है और मतवाली कोयल बोल रही है, बोल रही है? नही, नही कोयल तो गाती है लेकिन ये कोयल की तो आवाज नही। अरे ये तो उस्ताद राशिद खान साहेब हैं जो राग बहार अलाप रहे हैं आगाज पर।

आजकल मेंहदी हसन साहेब बीमार चल रहे हैं, उनके स्वास्थ्य लाभ की कामना करते हुए संजय सुर-पेटी में सुना रहे हैं, मेंहदी हसन को - दिल में तेरी उल्फत का निंशा बाकी है

गुलजार साहब की कलम के तो हम पहले से ही मुरीद थे, और आवाज के भी अब विमल जी भी गुलजार की आवाज से काफी प्रभावित हैं। अब गुलजार की बात चली है तो क्या आप बता सकते हैं कि उनका लिखे गीतों में शुरूआती दिनों का यानि पहले पहला का गीत कौन सा है? हम नही बतायेंगे खुद जाकर सुनिये और चड्डी पहनके खिले हुए फूल को भी देख कर आइये।

अच्छा अब जरा ये बांचिये -
'ख़ातिर' ये है बाज़ी-ए-दिल
इसमें जीत से मात भली
किसका लिखा है बता सकते हैं? सुनने में कैसा लगेगा बूझ सकते हैं? हमें तो भला भला सा लगा पहली बार सुनकर, आप जरा देख कर आइये तो।

रून झुन बाजे ललन पग पैजनियाँ ये कह रही हैं पारूल रामनवमी के अवसर पर लेकिन मुझे लगता है कि राम और श्याम में कोई फर्क है क्या कम से कम मेरे लिये तो नही इसलिये बजाय राम के कह रहे हैं - शाम ढले जमुना किनारे, किनारे आजा राधे आजा तूझे श्याम पुकारे

प्रत्येक वाणी में महाकाव्य, नही महाकाव्य नही ठुमरी। इस बार की संगीत चर्चा ना देख कर आप में से कुछ लोग शायद ऐसा ही कुछ सोच रहे हों - का करूँ सजनी आए न बालम। बड़े गुलाम अली को सुनिये यही गाते हुए।

मैने चर्चा शुरू की थी गंगा यानि नदी की बात से, नदी यानि पानी। इसलिये सोच रहा हूँ आगाज जिस बात से किया इस चर्चा का अंजाम भी उसी बात के बारे में बात करके करें। मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा...जहाँ कोई गड्ढा होगा वहीं ठहरा हुआ होगा। क्या आप भी ऐसा ही सोच रहे हैं, तो गलत। दुष्यंत कुमार का कहना कुछ और है, सुनिये -

यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बसते हैं
ख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा
हमें दीजिये ईजाजत, आपका दिन हंसते गाते बीते और रात एकता कपूर का सीरियल देखते हुए, क्योंकि आपकी पसंद ने ही तो ये नौबत आने दी ना।

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शनिवार, मार्च 28, 2009

एक और अनेकः महेन की बतियां

उन्मुक्त होने में जो आनंद है वो नियमित होने में नही, इसमें बंधन खुल से जाते हैं। फुरसतिया ने चर्चा से जाने पर अनियमित चर्चा करने की बात करी, लेकिन मेरा चर्चा छोड़ना किसी बंधन की वजह से नही था। उसकी वजह थी वक्त की कमी जिसके चलते चर्चा करने पर चिट्ठों के साथ न्याय नही हो पाता। अपनी पसंद के चार चिट्ठे पढ़ चर्चा करना कम से कम हमें गवारा नही था। इसलिये देर से ही सही हम अनियमित चर्चा करने आ पहुँचे लेकिन इस चर्चा का फार्मेट अन्य दिनों की चर्चा से बिल्कुल जुदा होगा। इसमें हम सिर्फ एक ही चिट्ठाकार की अलग अलग पोस्टों की चर्चा करेंगे उसके एक या अनेक चिट्ठों को पढ़कर। इसी क्रम में शुरूआत कर रहे हैं महेन की लिखी पोस्टों की बतिया से।

महेन कम लिखते हैं लेकिन जब भी लिखते हैं तो दिल से और ये बात उनके प्रोफाईल में अपने बारे में कही बात से पता चल जाती है। जब वो बताते हैं वो यहाँ काइकू -

ग़लत हैं वे जो कहते हैं कि परमानन्द मुक्ति से ही मिलता है। कील लगने के कुछ दिनों बाद जो खुजास होती है, उसमें भी परमानन्द होता है। शिशु के कुनमुनाते होठों में भी परमानन्द होता है और भोर में बाल सुखाती पड़ोस के शर्मा जी की आयुष्मती को आँखभर देख लेने में भी परमानन्द ढूँढा जा सकता है। परमानन्द तो परनिन्दा में भी होता है और परसाई की बात मानें तो परमानन्द उसे कहते हैं जब भक्त ईश्वर को ठग लेता है। ईश्वरीय सत्ता ने इस धरा पर हमें जो उपकरण दिये हैं उनमें से किसी में भी परमानन्द मिल सकता है। मुझे यह परमानन्द पीले पन्नों के काले-काले अक्षरों को बाँचने में बाकी चीज़ों की अपेक्षा ज़्यादा मिलता है।
वो मुख्य रूप से दो चिट्ठों पर अपनी कलम ज्यादा घिसते हैं, एक है हलंत और दूसरा प्रत्येक वाणी में महाकाव्य। हलंत में उनकी लेटेस्ट पोस्ट में वो नोस्टाल्जिया का नशा कुछ यूँ बयाँ करते हैं -

कभी किसी नये रास्ते से गुज़रते हुए पुरानी सी महक नासापुटों में पैठती है तो आदमी वहां पहुँच जाता है जहाँ से वह बहुत पहले गुज़र चुका है। एक छोटी सी तान से अकसर सालों का फासला तय करके वही क्षण वापस आ खडा होता है जिसे भुला दिया गया था या जिसे हम डायरी के पुराने पन्ने पर धूल फांकने के लिए छोड़ आये थे। बीते ज़माने में दोस्तों की टांगों का तकिया बनाकर नीमनशे में बुझती आखों के लैंपपोस्ट से पढ़ी कोई कविता दोबारा नज़रों के सामने गुज़र जाए तो यकायक वो भूले नाम दिमाग में धींगामुश्ती करने लगते हैं, जिनका इन बीच के सालों में कोई ज़िक्र ही नहीं उठा। कभी यूँ भी होता है कि इत्र या डेओ की महक से बरबस कोई याद आ जाता है जिसे भुलाना अपने आप में ताजमहल खड़ा कर लेने से कम नहीं रहा होगा। और तो और एक पुराना इश्तेहार अगर बजने लगता है तो अपने साथ जाने कितने वाकये ज़िन्दा कर देता है या रसोई में दाल में लगा तड़का भी लंबा सफर तय करा लाता है कई बार।


नोस्टाल्जिया कई तरह का होता है। याद के कई दरवाज़े होते हैं और याद कई सूत्रों से जुड़ी होती होगी, तभी तो कभी कभी बेतार की तार से कुछ अप्रत्याशित याद आ जाता है।
अब उनको और क्या क्या और किस तरह का नशा याद आया उसके लिये तो मयखाने ही जाना पड़ेगा, जाकर पढ़िये निराशा नही होगी।

लिखने में बहुत गैप रखने के कई नुकसान होते हैं, कई लोग ऊतार्ध पहले लिख देते हैं फिर उस लेख को शुरू करने की नौबत नही आती। और महेन जैसे लोग भी हैं जो पूर्वाध यूँ ही लिख देते हैं और फिर कई दिन बीत जाने पर बताते हैं कि

कुछ महीनों पहले यूँही कुछ लिखने का सोचा था जिसका यह पूर्वार्ध है। अब चूंकि बात पुरानी हो चुकी है और विचार बदल चुका है इसलिए इसे आगे बढ़ाने का कोई विचार नहीं।
अब आप लोग भी सोच रहे होंगे कि आखिर ये पूर्वाध कैसा था और किस बारे में था, तो जनाब ट्रैलर हम दिखा देते हैं, फिल्म वहीं थियेटर में जाकर देखिये। महेन का कहना था मुझपे तेरे ये भरम जाने कितने झूठे होंगे -

एक बार फिर देखा; वही पुरानी तस्वीरें, वही उलझी सी लिखावट वाले सलीके से तह किये हुए पत्र। वही लापरवाही से लिखे गहरे-हलके अक्षर। सब समेटकर बड़े से लिफ़ाफ़े में डाल दिये। बगल की फ़व्वारे की दुकान से लकड़ी के महंगे विंड-चाईम्स के खनकने की आवाज़ रह-रहकर गूँज उठती थी। छोटे-छोटे फव्वारों से पानी की अल्हड़ थिरकन उठकर माहौल को वैसे ही रोमांटिक बना रही थी जैसी पहले बनाया करती थी। उधर छोटे से रेस्तराँ में कोई बैरा को ऑमलेट के लिये आवाज़ लगा रहा था। सामने छोटे से मंच पर, जो आजतक अपनी पहली प्रस्तुति के लिये तरस रहा था, बड़ा सा मटमैला सफ़ेद पड़ा परदा लटक रहा था। उसके पीछे एक कोने से बेतरतीब पड़े लकड़ी के बेंच झाँक रहे थे, जिन्हें किसी ने यूँही निरुद्देश्य वहाँ छोड़ दिया था। उनपर धूल की इतनी मोटी परत जमी हुई थी कि लगता था जैसे वे बने ही मिट्टी से हों। मंच के बगल की दीवार पर गहरे हरे रंग की बेल पूरी चढ़कर अब छज्जी तक पहुँच चुकी थी।
महेन अकविता भी करते हैं, अब चूँकि अकविता हमारे विषय क्षेत्र से दूर की चीज है इसलिये कह तो नही सकते कि उन्होंने जो ये लिखी है वो किस काल के अंतर्गत आयेगी लेकिन हमें अच्छी लगी -

इससे तो बेहतर है
अनजान लोगों से बतियाया जाए कुछ भी
किताबों में घुसा लिया जाए सिर
एक के बाद एक चार-पांच फ़िल्में देख डाली जाएं
पूरी रात का सन्नाटा मिटाने के लिये
टके में जो साथ हो ले
ऐसी औरत के साथ काटी जाए दिल्ली की गुलाबी ठंडी शामें
गुलमोहर के ठूँठ के नीचे
या दोस्तों को बुला लिया जाए मौके-बेमौके दावत पर

तुम्हे प्यार करते रहना खुद से डरने जैसा है
और डर को भुलाने के लिये जो भी किया जाए सही है।

अब चलते हैं और कुछ नजर दौड़ाते हैं उनके दूसरे चिट्ठे वाणी में महाकाव्य पर, जहाँ लेटेस्ट पोस्ट पर वो आठवाँ सुर सुना रहे हैं। महेन उत्तराखंड से बिलोंग करते हैं इसलिये यदा कदा इस अंचल के गीत भी सुनाते रहते हैं। इसी क्रम में नरेन्द्र सिंह नेगी का शुरूआती दिनों में गाया गढ़वाली बोली का गीत सुना रहे हैं सौंणा का मेयना (सावन का महीना)। उनके इस चिट्ठे पर होने वाली पोस्टों से (या गीतों) से उनके चिट्ठे के नाम की सार्थकता बनी रहती है तभी तो गढ़वाली के अलावा वहाँ बांग्ला में भी गीत सुनने को मिलता है, मन्ना दे के स्वर में "आबार हाबेतो देखा"।

महेन ग्रुप चिट्ठाकारी भी करते हैं, कबाड़खाने के कबाड़ी तो हैं ही साथ ही साथ चित्रपट में सिक्के उछाल के चित और पट भी करते रहते हैं। चूँकि वो चित्रपट में ज्यादा सक्रिय हैं इसलिये अंत में यहाँ भी नजर डालते चलते हैं।

ताजा ताजा पोस्ट के रूप में वो फिराक देखने की सिफारिश करते हैं लेकिन आवेश में थोड़ा सा गड़बड़ा जाते हैं - फिराक जरूर देखी जाना चाहिए। फिर संभल के सबसे पहले पेश करते हैं मंगलेश डबराल की कविता गुजरात के मृतक का बयान का एक अंश -

मेरी औरत मुझसे पहले ही जला दी गई
वह मुझे बचाने के लिए खड़ी थी मेरे आगे
और मेरे बच्चों का मारा जाना तो पता ही नहीं चला
वे इतने छोटे थे उनकी कोई चीख भी सुनाई नहीं दी
मेरे हाथों में जो हुनर था पता नहीं उसका क्या हुआ
वे अब सिर्फ जले हुए ढांचे हैं एक जली हुई देह पर चिपके हुए
........
मेरे जीवित होने का कोई बड़ा मकसद नहीं था
और मुझे मारा गया इस तरह जैसे मुझे मारना कोई बड़ा मकसद हो...
हर आदमी (और औरत) का अपना अपना नजरिया होता है और वो हर बात को अपनी नजर से ही देखता है परखता है लेकिन जरूरी नही कि सच उतना ही हो। जैसे कि मेरा मानना है कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, फिराक में तस्वीर का सिर्फ एक पहलू ही पेश किया गया, और ये मेरी नजर है, मैं ऐसा सोचता हूँ। भगत सिंह पर हम फिल्म बनायेंगे तो वो उसमें क्रांतिकारी होंगे लेकिन अगर ब्रिटिशर फिल्म बनाने की सोचें तो वो अलग तरीके से पेश करेंगे। बहराल महेन फिराक के बारे में बताते हुए लिखते हैं -

एक ऐसे समय में जब एक साझा विरासत में सांप्रदायिक दंगों और तनावों के बीच मानवीय रिश्ते लगातार दरक रहे हों और उनमें दूरियां बढ़ रही हों, लोगों को मारा जाना एक मकसद में बदल गया हो, दंगों की खौफनाक यादें पीछा करती हई वर्तमान जीवन को तनावग्रस्त बनाए रखती हों, आशंकाएं और भय हर किसी की दहलीज और खिड़कियों पर घात लगाएं बैठे हों तब हिंसा के खिलाफ एक फिल्म इस मकसद से बनाई जाती है कि वह यह बता सके कि हिंसा का असर कहां-कहां और किन स्तरों पर लोगों का जीवन तबाह कर देता है। इस तरह यह हिंसा के खिलाफ कलात्मक ढंस से आवाज उठाती है। फिल्म फिराक यही संदेश देती है।
सांप्रदायिकता पर बनी जिस फिल्म ने मुझे काफी प्रभावित किया था वो थी पंकज कपूर अभिनीत धर्म, अगर आपने अभी तक नही देखी है तो जरुर देखियेगा। मुझे कोई ताज्जुब नही उसको किसी पुरस्कार के लायक नही समझा गया।

इससे लगभग एक महीने पहले लिखी पोस्ट में महेन उस शख्स को ढूँढने की कोशिश करते हैं जो खो चुका है, बात करते हैं दादासाहेब फाल्के की। लिखते हैं -

एकमात्र व्यक्ति जिसे शायद दादासाहेब की महत्ता मालूम थी, प्रभात फिल्म्स के शांतारामबाबु, उन्हें मंच तक भी ले गए और सिनेमा जगत से आग्रह किया कि नासिक में उनके रहने की व्यवस्था के लिए धन दें। अंततः शांतारामबाबु ने ही इस राशि का बड़ा हिस्सा दिया। वहीं नासिक में छ: साल बाद दादासाहेब की मृत्यु अकेलेपन और उपेक्षा में हुई। १९३८ में ही जब सिनेमा-जगत भारतीय-सिनेमा के पितामह को भुला चुका था तो एक फिल्म-पत्रिका को उनका पता मिला और पत्रिका ने उन्हें एक इंटरव्यू करने का आग्रह किया, जिसके जवाब में उन्होंने लिखा, "जिस सिनेमा-जगत को भारत में मैंने जन्म दिया, जब उसी ने मुझे भुला दिया तो आप भी भुला दें।"
भारतीय फिल्म उधोग और फैन हमेशा से स्टार को ज्यादा महत्व देते आये हैं कलाकार को नही वरना अगर कला से ही आंका जाता तो मेरा मानना है शाहरूख आज उस मुकाम में नही होते जहाँ वो आज हैं। महेन दादा साहेब के बारे में आगे लिखते हैं -

आज जो सिनेमा-जगत का हाल है, उसकी नींव संभवतः उसी दौर में पड़ चुकी थी। दादासाहेब की ही तरह भारत भूषण, ललिता पवार और ओमप्रकाश आदि भी भुला दिए गए और इन सभी ने बड़ी कठिनाइयों में अपने आखरी दिन गुज़ारे। "आउट ऑफ़ साइट, आउट ऑफ़ माइंड" फिल्म-जगत में शुरू से चलता आया है। किसी फिल्म-लेखक के संस्मरण में कहीं पढ़ा था कि दादासाहेब को एक सेठनुमा फिल्म-निर्माता के स्टूडियो के बाहर बदहाल देखा गया था और वे उस फिल्म-निर्माता से बात करने की कोशिश कर रहे थे।
संभवतः यही हाल इस हिंदी ब्लोग जगत का भी है, ये और ऐसे ही कई पोस्ट पर मिली टिप्पणियाँ मेरी इस बात की हमेशा गवाही देती रहेगी। ये एक ऐसा लेख है जिसे हर किसी को पढ़ना चाहिये क्योंकि बहुत मुश्किल है इतनी डिटेल में फिर कहीं दादा साहेब के बारे में पढ़ने को मिले।

लेकिन दादा साहेब और उनके जैसे कई अन्य कलाकार मसलन भगवान दादा, भारत भूषण की कहानी ये सीख भी देती है कि अपने काम में माहिर होने के अलावा थोड़ी बहुत दुनियादारी की समझ भी होनी चाहिये।

उनकी बतियों को विराम देते हलंत पर लिखी उनकी पहली पोस्ट से, जो बकौल महेन अकविता है, पेड़ और मैं -

मैंने नहीं देखा
अपने घर के आगे खड़ा वह पेड़
उसमें किस रंग के फूल खिलते हैं
क्या मालूम
कौन जाने वह
कब रहा होगा ठूंठ

एक सुंदर सा घोंसला बनाया है
उसमें गौरैया ने
कहता है मेरा बेटा
कितनी मेहनत लगी गौरैया की
मैंने नहीं लगाया हिसाब
फल गिरते हैं उसके हर साल
मेरे आँगन में
मेरे पास नहीं है वक्त
उन्हें समेटने का

इसे कटवा देंगे
कहती है मेरी बीवी
इससे भर जाता है आँगन में कूड़ा
दिनरात शोर मचाती हैं
इसपर डेरा डाले चिडियां
और इसकी जड़ें खतरा भी तो हैं
घर की नींव के लिए
मैं हिला देता हूँ हामी में सिर
जैसे पेड़ हिलता है हवा में
और डूब जाता हूँ अपने काम में

आने वाले संकट से बेख़बर
पेड़ और मैं
खुश हैं
और हरे भरे हैं अभी तक।

तो ये थी एक और अनेक में हमारी पहली अनियमितता के तहत महेन की बतियाँ, कोशिश यही रहेगी कि हर सप्ताहांत में ऐसे ही किसी एक ब्लोगर और सिर्फ उसकी बतियों की चर्चा की जाय और ये शुक्रवार से सोमवार के बीच कभी भी हो सकता है।

अब हमें दीजिये ईजाजत अगली बार फिर मुलाकात होगी, नियमित चर्चा के तहत गीत-संगीत की पोस्टों की चर्चा लेकर सागर भाईसा पीछे पीछे आ ही रहे हैं। आप लोगों के दिन मजे में बीते और रातें आराम से, मुस्कुराते रहें खिलखिलाते रहें।

-- तरूण, (उनके लिये जो इस दौरान हमें शायद भूल चुके हों)

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शनिवार, मार्च 21, 2009

गीत सुनोगे हुजूर या गजल सुनाऊँ

चर्चा में इस ख्याल से फिर आ गया हूँ मैं, शायद मेरे जाने से मुर्झा गये हों आप। लेकिन ऐसा मेरा मानना है, आप लोग तो सोच रहे होंगे - जाने से उसके चर्चा से खुश हो गये थे सब, फिर से पकाने आ गया किसने इसे बुला दिया। तो जनाब ऐसा है कि गुनाहगार की गर्दन दबोचने के लिये कानपुर जाना होगा। क्योंकि एक रोज -
नॉक नॉक
हू इज देयर
फुरसतिया
फुरसतिया हू
तीसरे शनिचर को चर्चा करो यू

जिन्हें ऊपर का लिखा समझ नही आया उनके लिये बता दूँ, नॉक नॉक यहाँ अमेरिका में स्कूल के बच्चों में चुटकुला सुनाने का एक फार्मेट है, जिसके बहाने इसी तरह के कई सवाल-जवाब दिये जाते हैं।

संगीत के मामले में अपनी समझ अन्य दो चर्चाकारों से काफी कम है, बढ़ती ईकोनॉमी के देश में रहने वाले उन दोनों को जहाँ ब्रांड की अच्छी समझ है वहीं उसके उलट ढलती ईकोनॉमी के देश में रहकर हम पैकेज डील से पसंद नापसंद तय करते हैं।

एक बार की बात है दांत-काटे की ही तरह टिप्पणी-खिंचाई वाले दो दोस्त फुरसतिया और उड़नतश्तरी ने संगीत समारोह में जाने की सोची, दो प्रोग्राम चल रहे थे सहमति नही बनी। अंत में तय हुआ अपने अपने पसंद के प्रोग्राम में जाया जाय। उड़नतश्तरी चले मगन चतुर्वेदी का गायन सुनने और फुरसतिया निकल लिये घुलमिल मलिक के गायन का अंदाज-ए-तमाशा देखने। मगन चतुर्वेदी का आलाप खत्म होने के बाद कुछ ही देर का गायन हुआ था कि उड़नतश्तरी को सामने से फुरसतिया आते दिखायी दिये। उन्हें देख उड़नतश्तरी के चेहरे में "देखा मैने कहा था" वाले भाव उभर आये। वो फुरसतिया को बोले मैं पहले ही यहाँ आने की कह रहा था तुम माने ही नही, वो प्रोग्राम पसंद नही आया ना। फुरसतिया ने कहा, १ घंटे का प्रोग्राम था पूरा देखकर आ रहा हूँ क्यों यहाँ अभी शुरू नही हुआ क्या?

तो घुलमिल मलिक के चाहने वालों के लिये आज हमारे पास सुनाने को कुछ नही लेकिन कुछ अन्य शानदार गायकी के लिंक जरूर हैं।

हमने ये सुना था कि पतझड़, सावन, बसंत, बहार के बाद पाचँवा मौसम प्यार का होता है लेकिन जो महेन बता रहे हैं वो पहली बार पता चला। वो बात कर रहे हैं सुब्बुलक्ष्मी के आठवेँ सुर की -
दक्षिण में रहते हुए कर्णाटक संगीत मुझे बार-बार आकर्षित करता है, खासकर मंदिरों में बजता हुआ संगीत। अगर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत श्रृंगार प्रधान है तो कर्नाटक संगीत भक्ति प्रधान। सुब्बुलक्ष्मी का गायन मेरे लिए कई चीज़ों का पर्याय हो चुका है।
हम चाहे ये संगीत कम सुन पाते हों लेकिन इनकी कही बात से इत्तेफाक रखते हैं और आज तो जी भरकर सुना भी। अब बात करते हैं राग की और वो है अहिर भैरव जो बज रहा है आगाज में सौजन्य अफलातून। घबरायें नहीं और जाकर सुनें क्योंकि ये गीत है जो उस राग पर बेस्ड है, गाया है आशा भोंसले और सत्यशील देशपांडे ने -
मन आनन्द आनन्द छायो
मिट्यो गगन घन अन्धकार
अँखियों में जब सूरज आयो

उठी किरन की लहर सुनहरी
जैसे पावन गंगाजल
अर्पण के पल हरसिंगार मधु गीत निन्दूरी गायो
मन आनन्द...

अभी कुछ दिनों पहले आमीर खान ने कहा था स्लमडॉग में स्लम के बच्चों का अंग्रेजी में गिटर-बिटर करना उनको हजम नही हुआ। अब कोई अंग्रेजी गानों का रसिया अगर मो रफी के इस गीत को सुनने ले तो शायद वो भी कुछ ऐसा ही बोले। ये गढ़ा खजाना निकाल के लाये हैं सागर नाहर, गीतों की महफिल में -
the she i love is the beautyfull- beautyfull dream come true
i love her love love love her...
हम निठल्ले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं, ये सुन कानों का स्वाद तो बदल चुका होगा। अच्छा ये तो बताईये आजकल देश में माहौल कैसा है, हमें तो आजकल प्रजातंत्र, वोट जैसी बातें सुनने में आ रही है। देखिये ना कान में कुछ ऐसी बातें पड़ीं -
सत्ता की ये भूख विकट आदि है ना अंत है, अब तो प्रजातंत्र है...
अरे जिसकी लाठी उसकी भैंस आपने बना दिया
हे नोट की खन खन सुना के वोट को गूँगा किया
पार्टी फंड, यज्ञ कुंड घोटाला मंत्र है
अब तो प्रजातंत्र है, अब तो प्रजातंत्र है

आदमी आज़ाद है, देश भी स्वतंत्र है
राजा गए रानी गई अब तो प्रजातंत्र है
जी हाँ वेलकम टू इंडियापुरम, पायदान ३ में खड़े होकर हमारी पसंद का कैलाश खेर का गाया और अशोक मिश्रा का लिखा ये गीत सुना रहे हैं मनीष।

आपको हिंदी में सुना दिया, कर्नाटकी सुना दिया, अंग्रेजी भी नही छोड़ी अब ये बताईये आपका उर्दू का ज्ञान कितना है, अपना तो अलिफ तक ही सीमित है। अगर आप हम से ज्यादा समझदार हैं तो मीत को बूझिये -
ज़ीस्त अब कुछ मो'तबर सी हो चली है, ख़ैर हो
कुफ्र ये मालिक कहीं तर्क-ए-मुहब्बत तो नहीं
अब एक पहेली बूझिये, जावेद-जावेद-अल्लाह रक्खा, इस त्रिमूर्ति से आपको कौन सा गीत समझ आता है। कहने को जश्न-ऐ-बहारा है वरना हम बता देते कौन से गीत की बात कर रहे हैं। इस बार मनीष दूसरी पायदान में खड़े हैं और सुना रहे हैं जोधा-अकबर का जश्न-ऐ-बहारा गीत। जावेद अली का गाया, जावेद अख्तर का लिखा और अल्लाह रक्खा रहमान का संगीतबद्ध ये गीत संगीत, बोलों और गायकी तीनों ही दृष्टि से ग़ज़ब ढाता है।

ये तो थी आज की संगीत चर्चा बकौल फुरसतिया अब तक अगर आप हमें भूल चुके हैं तो बता दें हम वही हैं निठल्ला चिंतन वाले तरूण, रह रह कर याद आयेंगे और जी भर तुम्हें पकायेंगे। अब अगले तीन शनिवारों तक इत्मेनान की सांस लीजिये, खुद भी हंसिये, दूसरों को भी हंसाईये -

दो जवाँ दिलों का गम दूरियाँ समझती हैं

चर्चा पे करी मेहनत को टिप्पणियाँ समझती हैं

[काम और पर्सनल व्यवस्तता के चलते, हमारी इस सप्ताह भी चिट्ठों से दूरी बरकरार रही अगर आप में से किसी ने कोई गीत-संगीत पर पोस्ट लिखी हो और उसका यहाँ जिक्र नही हो पाया तो आप अपना लिंक टिप्पणी में छोड़ सकते हैं। वक्त मिलते ही चर्चा में अपडेट कर दूँगा वैसे अभी यहाँ रात के बारह बजे हैं। हिन्दी युग्म के आवाज नामके चिट्ठे पर भी कुछ गीत बजे थे लेकिन वो ठीक बज नही रहे थे इसलिये चर्चा में सम्मिलित नही कर पाया।]

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शनिवार, फ़रवरी 14, 2009

ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय

आज वी डे है यानि वैलेंटाईन डे, आज ये हमारी आखिरी चर्चा भी है, आज के बाद किसी और शनिच्चर को आना होगा। आज अपनी आखिरी चर्चा वैलेंटाईन दिवस की शुभकामनाओं के साथ समर्पित करके जा रहा हूँ उन बुजुर्गों को जिन्हें उनके बच्चों ने घर से निकाला हुआ है, जो किसी वृद्धा आश्रम में पड़े प्रेम को तरस रहे हैं। ये चर्चा समर्पित है उन मासूमों को भी जिनके सिर से माँ-बाप के प्यार का साया उठ गया है और वो अनाथाश्रमों में प्यार की बजाय दया पर जीने को विवश हैं। ये समर्पित है उन फौजियों को भी जिनके ज्यादातर त्यौहार बोर्डर में अपने परिवार के स्नेह और प्रेम से दूर अकेले मनते हैं।

अब थोड़ी चर्चा कर लेते हैं चिट्ठों की, एक लड़की किसी की बहिन होती है, किसी की बेटी होती है, किसी की बीबी होती है और होती है जननी। महिलाओं को सामाजिक मुश्किलों के अलावा भी कुछ अन्य मुश्किलों का सामना करना पड़ता है जिनमें एक है - ऐनीमिया, इसके बारे में कुछ बता रही हैं शुभदा।
प्रकृति ने महिलाओं को कुछ इस तरह बनाया है कि वे प्रायः खून की कमी से जूझती हैं, खासकर वे महिलाएँ, जो माँ बनने के दौर में हैं। इससे महिलाओं की काम करने की क्षमता घट जाती है और वे जल्दी थक जाती हैं। रक्तक्षीणता रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी प्रभावित करती है। इस कारण वे रोगों से भी शीघ्र संक्रमित हो जाती हैं। एक जननी का स्वस्थ होना जरूरी है, क्योंकि उस पर एक नए जीवन को धरती पर लाने का जिम्मा है। रक्त प्रवाह हमारे शरीर की वह जीवनधारा है, जो सभी जरूरी पोषक पदार्थ लिए पूरे शरीर में चलती रहती है। यदि कोई स्त्री पहले ही आयरन की कमी झेल रही है तो उसका एनिमिया और अधिक हो जाएगा।
पूजा खुश और शायद सब को होना भी चाहिये क्योंकि खबर है कि सेने को लेने के देने पड़ गये, वैलेंटाईन का दिन है और सब तरफ प्यार ही प्यार की खबरें, पाकिस्तान मान गया, निठारी की पिटारी खुल गयी और बैंगलोर, मुझे बड़े अफसोस से कहना पड़ रहा है कि पूजा के पुराने आलेख के कहने पर जितनों ने भी बैंगलोर की टिकिट किसी विशेष कारण से करवायी होगी उनको मायूसी ही हाथ आयेगी। वैसे उनकी खुशी का आलम कुछ यूँ है -
तो आज बहुत बहुत दिनों बाद मैं सुबह सुबह अखबार देख कर अपने देश में रहने के लिए गौरवान्वित महसूस करती हूँ। इस दिन को इतना खूबसूरत बनाने के लिए बहुतों ने कार्य किया है...उन सबका हार्दिक धन्यवाद।
अगर अब आप भी अपने देश पर गौरवान्वित महसूस करने लगे हैं तो मेरी बात मानें और पप्पू ना बने, काफी समय से ये कहना चाहता था मुझे तो वक्त मिला नही लेकिन रंजन ने हमारे दिल की बात कह दी - पप्पू ना बने वोट दें

वाकई में ये आपका अधिकार है और उसका उपयोग जरूर करें, अगर आपने अभी तक अपने को वोटर लिस्ट में रजिस्टर नही करवाया है तो जागो रे की साईट पर जाकर भी आप ये कर सकते हैं।

प्रेम का त्यौहार हो और बच्चों का जिक्र ना हो, ऐसा भला हो सकता है वो भी सीमा सचदेव के रहते, वो बच्चों को सुना और दिखा रही है - हमको मन की शक्ति देना
जी हां कल प्रेम दिवस है और जिससे प्रेम करते है ,उसे उपहार देते हैं और उसकी हर खुशी की शुभ-कामना करते है , तो हम भी जिससे सबसे ज्यादा प्रेम करते हैं ,उनको हम भी उपहार देन्गे आपको पता है वो कौन हैं.....? जिन्हें हम खुद से भी ज्यादा प्यार करते हैं , जिन्हें देखकर हम बिल्कुल बच्चे बन जाते हैं और जिन्हें देखकर खूब भागने , दौडने , मस्ती करने और खूब सारा खेलने को मन करता है ......बिल्कुल ठीक समझे आप , वो हैं - आप लोग नन्हे-मुन्ने छोटे-छोटे ,प्यारे-प्यारे अपने परिवार से बाहर निकल हमें दुनिया मे कोई सबसे सुन्दर , सबसे प्यारा , सबसे कोमल , निर्मल , पावन अगर कुछ दिखता है तो वो हैं नन्हे-मुन्ने बच्चे , और इस प्रेम के दिवस पर हम आपको बस शुभ-कामनाएं ही दे सकते हैं , और ईश्वर से आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए क्यों न हम ईश्वर से प्रार्थना करें , सुनिए आपभी और प्रार्थना कीजिए हमारे साथ कि सभी बच्चों का जीवन सुखमय हो


अंत में चलते-चलते
आज दिल की बात वाले डा. अनुराग की शादी की सालगिरह है श्रीमान और श्रीमती दोनों को हमारी तरफ से बहुत बहुत शुभकामनायें।

वैसे हमने पहले भी ये सुझाव दिया था जाने से पहले एक बार फिर सोचने के लिये विचार उछाले जा रहे हैं कि दिनों दिन बड़ते चिट्ठों के मद्देनजर चिट्ठाचर्चा के स्वरूप में बदलाव बहुत जरूरी है, चाहे तो हिंदी चिट्ठों के लिये कोई नया या फिर चिट्ठा चर्चा को देसी पंडित जैसे फार्मेट में ढाला जाय तो बेहतर होगा।

चिट्ठाचर्चा से हमारा आखिरी सलाम, हमारे ब्लोगस में जो आते रहते हैं उनसे सप्ताहांत में मेल मुलाकात होती रहेगी। बाकि सभी अन्य लोगों को ढेरों शुभकामनायें, हंसते रहे, मुस्कुराते रहें आपस में प्यार बांटते रहें।

एक बार फिर हैप्पी वैलेंटाईन डे, प्यार के दिवस में प्यारी सी कामना आप लोगों का प्यार फले फुले और दिन दुगुनी रात चौगुनी तरक्की करे।

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मंगलवार, फ़रवरी 10, 2009

पहला प्यार और बसंत की मार कल काहे पड़ी थी

कल अनुपजी ने चर्चा करी थी हमारा जिक्र किया साथ में एक "दा विंसी कोड" भी छोड़ गये, जिसे कोई भलामानुष तोड़ नही पाया। माथा हमारा भी ठनका था लेकिन फिर जब टिप्पणियों में अपना नाम बारबार पढ़ने को मिला तो "सार सार को गही रहे थोथा दे उड़ाये" की तर्ज पर बिसरा दिये।

लेकिन हमारे भाग्य में उस कोड को तोड़ना लिखा था सो तोड़ दिया और समझ आया कल यानि ९ फरवरी के दिन चर्चा में "बड़ा कठिन है भूलना पहला-पहला प्यार" क्यों कहा जा रहा था और फुरसतिया के यहाँ "वनन में बागन में बगर्‌यो बसंत" क्यों आ रहा था।

कल का कोड ये था -

"आज का दिन खास है तरुण के लिये और हमारे लिये भी। "

तो फुरसतिया यानि अनुपजी ऋतुराज का स्वागत इसलिये कर रहे थे क्योंकि उनकी शादी की सालगिरह थी और जाहिर है ये दिन उनके लिये खास ही होगा। हमें अच्छा नही लगा कि दिन तो उनका भी खास था लेकिन सब सिर्फ हमें बधाई दिये जा रहे थे।

इसलिये ये पोस्ट ठेल दी, दो लिंक भी लगा दिये जिससे ये चर्चा बनी रहे। अनुपजी आपको और भाभीजी को शादी की सालगिरह की एक दिन देर से बहुत बहुत बधाई और ढेरों शुभकामनायें। चूँकि अनुपजी बसंत, प्यार और वैलेंटाईन की बातें कर रहे हैं इसलिये कौन से नंबर की सालगिरह है ये हम छुपा के रख लेते हैं।

हमें शुभकामनायें देने के लिये आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद। अगली (पिछली) यानि मंगलवारी चर्चा में देखिये गायब आया और फिर से छाया, उनकी चर्चा का अंदाज हमें हमेशा भाया ;)

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शनिवार, फ़रवरी 07, 2009

छुपा लो यूँ बैंगलोर में प्यार मेरा कि जैसे पब में बोतल बियर की

आज के दौर में दो अतिवादी संस्कृतियाँ अपने पैर पसार रही हैं, पहली वो जिसका प्रतिनिध्त्व राम सेने कर रही है और दूसरी वो जो आजादी का मतलब ड्रग्स सेवन से लगाते हैं। लेकिन फिलहाल देश हर साल की तरह दिवाना हुआ जा रहा है वैलेंटाईन दिवस के पीछे। Valentine day is a big fuss in India, कह नही सकता कितने लोग समझते होंगे ये दिन प्यार करने के लिये नही बल्कि प्यार की भावना को जिंदा रखने का दिन है। लेकिन इस दिन की मार्केटिंग इंडिया में इलु-इलु टाईप प्यार की की गई है। दरअसल ये वैसा ही है जैसा हमारा बंसतोत्सव जो उतने उत्साह से नही मनाया जाता। खैर आने वाली १४ तारीख को दुनिया को कामसूत्र का ज्ञान देने वाले, खजुराहो की मूर्तियों में प्यार परिभाषित करने वाले देश के युवा वैलेंटाईन दिवस मनाने की तैयारी कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ स्वयंभू संस्कृति के रक्षक बने कुछ लोग सारे नियम कानून तोड़ने की कवायद में जूटे होंगे। लेकिन अगर कोई रिसर्च करे तो ये जानना इंटरेस्टिंग रहेगा इनमें से कितने मँजनू बने अंत तक लैला के साथ डटे रहते हैं और कितने चाँद मोहम्मद की राह में चल पड़ते हैं।

जैसे योग हमने ईजाद किया लेकिन सीखा किसी और से वैसे ही भोग भी हमने ही ईजाद किया लेकिन सिखना पढ़ रहा है किसी और से, इस से पहले कोई गलत अर्थ में ले ले, मैं क्लियर कर दूँ मेरा मतलब चाकलेट के भोग ;) से है - अभी से चढ़ने लगा वेलेण्टाइन-डे का खुमार

वो आपने गीत सुना है ना पीठ ऊँची ऊँट की ऊँचाई से नही होती, होती ही है होती ही है पीठ ऊँची ऊँट की। बस इस बार इसी पीठ के पीछे पड़े हैं अरविन्द मिश्रा जी। अब चूँकि वो राजस्थान में नही है इसलिये पुरूष पीठ ढूँढ लाये हैं। वो पूछते हैं, रोयेंदार पुरूष पीठ -आकर्षक या अनाकर्षक? जो देख कर आये हैं उसे देख के तो यही कहेंगे ना आकर्षक ना अनाकर्षक बल्कि खौफनाक।

लगता है शुक्रवार का दिन मानव अंगों के बारे में बतियाने का ही दिन था, वहाँ पीठ तो निठल्ले के यहाँ नाक के ऊपर सवाल उठाये जा रहे थे - “सुर्पनखा बन नाक कटाये”, क्या इसे कहावत बना सकते हैं?

पुलिस वालों का फ्रस्टेसन दिनों दिन बढ़ता जा रहा है क्योंकि नेताओं पर हाथ डाल नही सकते, कॉलेज के छोरों के आगे इनकी चलती नही, पीकर गाड़ी चला सरेआम फुटपाथियों को कुचलने वाले रईसजादों पर भी इनका बस नही चलता, धर्म की ठेकेदारी के लिये बनी टुकड‌ियों पर भी जब इनका जोर नही चला तो इनका डंडा चल पढ़ा १० साल की एक छोटी बच्ची पर

हाथ मिला और गाल पर दे एक प्यारा सा चुम्मा तभी ये कहलायेगी नमस्ते, इस तरह से अभिवादन करने के लिये जाना पड़ेगा गोवा। और अगर ट्रेनिंग की जरूरत हो तो मेटेरियल यहाँ पड़ा है

हमारा बस चले तो हम पोस्टर बनाने वालो से ये गुजारिश भर कर दें कि पोस्टर के सबसे ऊपर छोटे-छोटे अक्षरों में इतना और लिख दें - रास्ते, और जगहों के पते इस पोस्टर के पीछे छुपे हैं, इधर-उधर देख अपना समय बरबाद ना कर किसी से पूछ मंजिल तक शीघ्र पहुँचे। और अगर आप सोच रहे हैं कि हमें अचानक इंडिया से उतने दूर बैठे बैठे ये क्या सूझी तो बता दें, ये ख्याल हमें कांग्रेस की आय देख कर आया है -

कुछ गीत:


कविता-गजल
परमजीत बाली अपनी अपनी उड़ान कुछ यूँ समझा रहे हैं -
जिस दिन से
हम सभी आऐ हैं
उसी दिन से
धीरे धीरे मर रहे हैं
हर पल।
एक दिन
पूरे मर जाऐगें।
फिर भी सपने सजाऐगें।
राजीव थपेड़ा को शिकायत है कि कोई उनकी तस्वीर सीने से लगाता क्यूँ है -
वक्त मरहम है,दिल को तसल्ली देता है,गर
तो फ़िर वो हमें खंजर चुभाता क्यूँ है ?
दिल को मेरे भी जरा तपिश तो ले लेने दे
साए से मेरे धुप चुरा कर ले जाता क्यूँ है ?
रतन सिंह शेखावटी आरकुट में मिला स्क्रैप पढ़वा रहे थे -
आज एक बार मन्दिर हो आओ
पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो
इसे पढ़कर मुझे जाने क्यों सीधे राम सेने की याद आ गयी और... -

आज एक बार पब हो आओ
बियर के साथ व्हिस्की भी चढ़ाओ
क्या पता १४ तारीख की तोड़फोड़ में
बैंगलोर में पब हो ना हो


मुक्ति औरत होने के सुख बड़ी खुबसूरती से कुछ यूँ बयाँ करती हैं -
भीगी आँखों के /धुंधले परदे के पीछे से /मैंने देखा था /उसकी भी आँखें /गीली थीं /पर वो ठहरा मर्द /रोता कैसे ?/ तो पी गया वो /अपने सारे आँसू/पर मैं रोई /रो -रोकर /अपने ख़त्म होते रिश्ते के /दर्द को मैंने /आँसुओं में बहा दिया /और ...पहली बार /अपने औरत होने का सुख /महसूस किया /रोना ,फूट-फूटकर रोना /यही तो औरतें / आज़ादी से कर पाती हैं /और शायद / इसी कारण /बड़ा से बड़ा दर्द / सह जाती हैं।
सस्ते शेर में इस बार थोड़ा सा महँगा शेर पढ़ने को मिला, बानगी यहाँ देखिये पूरा वहाँ जाकर पढ़िये -
हमने ये माना पैदा हो गया, खायेगा क्या,
घर में दाने ही नहीं पायेगा तो भुनवायेगा क्या,
इस निखट्टू बाप से माँगेगा तो पायेगा क्या,
देख कहा मान ले, जाँ-ए-जबर पैदा न हो,
ऐ मेरे बच्चे मेरे लख्ते-जिगर पैदा न हो
शफक के फुरसत के रात दिन में एक बहुत ही खुबसूरत गजल पढ़ने को मिली, जितने हिट इसे मिले हैं, ये उससे ज्यादा की हकदार थी।

मुझे रास्ते ही अज़ीज़ हैं मुझे मंज़िलों की खबर नहीं
मेरा कारवां मेरा दोस्त है मुझे बस्तियों की फिकर नहीं
कभी मैने तुझसे गिला किया कभी तूने मुझको भुला दिया
हम यार हैं के रक़ीब हैं या तेरी दुआ में असर नहीं
लो ये मौज और ये कश्तीयाँ मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो
यूँही डूबना मेरा शौक़ है मेरी साहिलों पे नज़र नहीं
उस एक पल की तलाश में जिसे लोग कहते हैं ज़िंदगी
मैं कहाँ कहाँ से गुज़र गया मुझे ज़िंदगी की कदर नहीं
जो ख्वाब देखे थे साथ में उन्हे पूरा करने का वक़्त दे
तेरी ता कयामत चाह है मुझे इक उमर से सबर नहीं||
डा रूपचंद्र शहीदों को नमन करते हुए लिखते हैं -
धन्य माता हुई, धन्य है यह धरा,
हो गया वो अमर, जो वतन पर मरा,
हैं समर्पित तुम्हें, वाटिका के सुमन।
ऐ शहीदो तुम्हें कोटि-कोटि नमन।।


हिंदी ब्लोगस का भी वही हाल है जो आजकल मंदी का, कुछ ब्लोग पर हिट्स इंडिया और चीन की ईकोनॉमी की तरह छाये हुए थे तो ज्यादातर में पश्चिमी देशों की ईकोनॉमी का असर साफ दिख रहा था जो किसी तगड़े बेलआउट पैकेज की राह तकते दिख रहे थे।

अब हमें दीजिये ईजाजत, आप सब हंसते रहें, मुस्कुराते रहें, हम हैं राही प्यार के, फिर मिलेंगे आपसे यूँ ही लिखते लिखते।

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शनिवार, जनवरी 31, 2009

आओ विचारें मिलकर सभी

सोच रहा हूँ कहाँ से शुरूआत करूँ, कहीं ये विचारों का मर जाना तो नही। कह नही सकता शायद इसकी वजह ३-४ दिन से कुछ ना पढ़ पाना हो। सपनों का मर जाना, हो सकता है खतरनाक हो लेकिन आजकल उससे कहीं अधिक खतरनाक है नौकरी का चले जाना, कम से कम अमेरिका में तो ऐसा ही लगता है।

फिर सोचता हूँ कि मैंगलौर के उस पब में जिसका पता हमें अभी अभी चला है अगर घंटी होती तो क्या कोई बजाने जाता? घंटी का तो पता नही लेकिन सालों पहले गोडसे ने जो एक ट्रिगर दबाया था उसकी गूँज आज तक सुनायी देती है जिसमें अहिंसा के पुजारी की हिंसात्मक मौत हुई थी।

हिंसा की बात चली तो मुझे तालिबानी याद आ गये, बेचारे हो सकता है कहीं बैठे बदनामी का घूँट पी रो रहे होंगे। जो अमेरिकी सेना नही कर पायी वो भारतीय मीडिया और ब्लोगरस ने कर दिखाया। क्योंकि जिस हिंसा को तालिबानी नाम दिया वो वैसा ही है जैसे ऊँट के मुँह में सामने जीरा।

खैर ये बेतरतीब विचार तो यूँ ही फैले रहेंगे, इस बार चर्चा की फोरमेलिटी करके जा रहे हैं, फुरसतिया को फुरसत में ना होने की भी नही बता पाये। चलते चलते स्कूल के वक्त पढ़ी मैथिलीशरण गुप्त की ये कविता आर्य आपके लिये पोस्ट कर जाते हैं -

हम कौन थे, क्या हो गये, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें मिल कर, यह समस्याएं सभी।

भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां
फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां
संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है।

यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है, इसके निवासी आर्य हैं
विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं
संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े
पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े।

वे आर्य ही थे जो कभी, अपने लिये जीते न थे
वे स्वार्थ रत हो मोह की, मदिरा कभी पीते न थे
वे मंदिनी तल में, सुकृति के बीज बोते थे सदा
परदुःख देख दयालुता से, द्रवित होते थे सदा।

संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी
निश्चेष्ट हो कर किस तरह से, बैठ सकते थे कभी
फैला यहीं से ज्ञान का, आलोक सब संसार में
जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार में।

वे मोह बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे स्वाधीन थे
सम्पूर्ण सुख संयुक्त थे, वे शांति शिखरासीन थे
मन से, वचन से, कर्म से, वे प्रभु भजन में लीन थे
विख्यात ब्रह्मानंद नद के, वे मनोहर मीन थे।

अगले शनिवार फिर मिलेंगे लिखते लिखते, तब तक हंसते रहें मुस्कुराते रहें, फासलें कम करें और पास आते रहें।

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शनिवार, जनवरी 24, 2009

हम हैं इस पल यहाँ, जाने वो हैं कहाँ

आप जरूर सोच रहे होंगे कि ये 'वो' है कौन? बताते हैं लेकिन उससे पहले स्कूल के वक्त छत्रपति शिवाजी से जुड़ी इतिहास में पढ़ी एक बात याद आ रही है - गढ़ आया सिंह गया। शायद अब आप समझ ही गये होंगे हम किस तरफ जा रहे हैं। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं उन शहीदों की जो देश की रक्षा की खातिर शहीद हो गये। ये वो 'वो' हैं जो देश के भीतर भी देशवासियों की रक्षा करने के लिये अपनी जान की बाजी लगा गये। २ दिन बाद २६ जनवरी है यानि गणतंत्र दिवस, आइये उन शहीदों को पहले अपनी एक विनम्र श्रद्धांजलि देते हैं और देते हैं एक जोरदार सैल्यूट - जय जवान, जय हिंद

चर्चा की शुरूआत में पकड़ते हैं चुंगकिंग एक्सप्रेस, इसमें प्रत्यक्षा टिकट की जगह कहती है -
मैं बेतहाशा हँसती हूँ। इसलिये कि मुझे रोना नहीं आता।
ये तो अच्छी बात है, कई लोग तो सिर्फ इसलिये ही नही रो पाते क्योंकि रो रो कर उनके आँसू सूख गये। लेकिन अच्छा है अगर सब लोग यूँ ही हँसने लग जाये तो - हंसते हंसते कट जायें रस्ते।

हंसने से किसी का कल्याण हो ना हो लेकिन कमलकांतजी के कल्याण के सिद्धांत पढ़कर किसी का कल्याण तो जरूर होना चाहिये। अब ये भी बताने की बात है क्या कि "उनके भाग्‍य में पीएम इन वेटिंग होना ही लिखा है, पीएम होना नहीं।" किसके लिये कहा गया होगा। कमलकांत बुधकरजी राजनीति के ऊपर लिखते हैं -
बार बार साबित होता है कि राजनीति वेश्‍या है और वह किसी भी कोठे पर बैठ सकती है या किसी को भी अपने कोठे पर बुला सकती है। अब देखिये न, कभी के कटखने आज एकदूसरे की पप्‍पी लेने पर उतारू हैं और वह भी सरेआम। कह रहे हैं कि दोस्‍ती हो गई है। मस्जिद गिराने का श्रेय लेनेवाले उतावले अब मुल्ला मुलायम की गोद में हैं
।ऐसा नही है कि बात राजनीति में आकर ही चिपक गयी हो, बल्कि दोस्ती के लिये भी तारीफ के दो शब्द उनकी लेखनी से कुछ यूँ निकले -
लोग समझ लें कि यह दो विपरीत मगर सिद्धांतवादियों की दोस्‍ती है। दोस्‍ती का आधार तीन और छह के ही अंक हैं। अब तक के छत्‍तीस अब त्रेसठ होकर दोस्‍त बन गए हैं। यह एक ही प्रदेश के दो पूर्व मुख्‍यमंत्रियों की दोस्‍ती है यानी सेम स्‍टेटस। यह दो पूर्व अध्‍यापको की दोस्‍ती है और यह दोस्‍ती है दो धोतीवालों की। यानी अगेन सेम स्‍टेटस। और सबसे बड़ी बात यह है कि यह दो होनहार पुत्रों के स्‍नेहबद्ध पिताओं की दोस्‍ती हैा इस दोस्‍ती की जयजयकार होनी ही चाहिये। धिक्‍कार है इस दोस्‍ती को धिक्‍कारने वालों पर।
पीएम की वेटिंग का तो हमें समझ नही आया लेकिन विवेक गुप्ता जो पेंटिंग पेंटिंग कह रहे थे वो थोड़ी समझ जरूर आ गयी। वो पेंटरानी (स्त्री लिंग के लिये यही कहेंगे क्या?) पुष्पा द्रविड़ की बात कर रहे हैं जो क्रिकेटर राहुल द्रविड़ की माँ भी हैं। वो बताते हैं -
देश के प्रसिद्ध चित्रकारों में शामिल, कर्नाटक की लोकप्रिय चित्रकार डॉ. पुष्पा द्रविड़ के लैंडस्केप, पोट्रेट और वॉश के फिगरेटिव पेंटिंग्स भी देशभर में सराही जाती हैं।
यही नही इनके बारे में पढ़कर एक बात और क्लियर हो जाती है कि पढ़ने के लियेकोई उम्र नही होती, देखिये तो 58 वर्ष में पीएचडी -
कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही मेरा मन पीएचडी करने का था, लेकिन उस समय संभव नहीं हुआ। बाद में भी किसी न किसी कारण से यह टलता रहा। रिटायरमेंट के अंतिम वर्षो में मुझे लगा कि अब परिवार की जिम्मेदारियां पूरी हो गई हैं, तो सोचा कि यही समय है और बस पीएचडी कर ली।

पंकज अवधिया अपनी प्रतिक्रिया इस बार कुछ इस तरह से दे रहे हैं -
"अरे, यह तो भ्रमरमार है। एक नही दो-दो है।" मै लगभग चीख पडा। मेरी खुशी का ठिकाना नही रहा। ऐसा लगा जैसे मुझे अनमोल रत्न मिल गये हो।
क्या है ये भ्रमरमार, जाकर आप खुद देखिये

पौराणिक कथायें भी बड़ी अगड़म बगड़म होती हैं अगर हमारी बात पर यकीन नही आ रहा तो ओडेपस की ये कथा को ही ले लीजिये जिसमें ओडेपस ने अपनी माँ से शादी की थी बताया जा रहा है -
ग्रीस जिसे हम यूनान कहते हैं, के पौराणिक कथाओं में ओडेपस (Oedipus) नामक एक राजकुमार की कथा मिलती है. लगभग ईसा पूर्व ७वी शताब्दी में लाईअस (Laius) नाम का एक राजा थेबेस नगर राज्य का शासक था. उसकी पत्नी का नाम था जोकस्ता (Jocasta). इन्हें एक पुत्र होता है ओडेपस (Oedipus). राजा लाईअस ने , डेल्फी के पुरोहित, तिरेसियस, जो भविष्य वक्ता था (ओरेकल) से बच्चे के भविष्य की जानकारी चाही. ओडेपस स्फिंक्स के प्रश्न का उत्तर देते हुए उसने यह बता दिया कि बच्चा बड़ा होकर अपने पिता की हत्या करेगा और अपनी माँ से शादी कर लेगा.
और कमाल ऐसा कि ये हो भी गया। इस पर लावण्या जी ने एक सही टिप्पणी की - फ्रोइड महाशय ने इसीलिये तो "ओडीपस कोम्प्लेक्स " की थियरी प्रतिपादीत की थी - Truth is stranger then fiction !!धरोहर में अभिषेक नेताजी सुभाष चंद्र बोस को याद करते हुए लिखते हैं -
अपने विद्रोही स्वाभाव से ब्रिटिश साम्राज्य को झकझोर देने वाले सुभाष चन्द्र बोस का मानना था कि किसी भी युग में युवाओं कि बुनियादी सोच समान होती है। उन्हें अंजान राहें ज्यादा लुभाती हैं, जबकि समाज उन्हें अपनी आजमाई हुई लकीर की ओर ही खींचना चाहता है।
हमने भी बचपन में ये गीत प्रभात फेरियों में खूब गाया था, आप भी गुनगुना लीजिये -
कदम-कदम बढाये जा, खुशी के गीत गए जा;
ये जिंदगी है कौम की, तूँ कौम पर लुटाये जा।
शहीद तो शहीद ही होता है, उसका कोई सर नेम नही होता और ना धर्म ना जाति और ना ही ओहदा, हमें ऐसा ही लगता है और इसी से इत्तेफाक रखते हुए राम त्यागी पूछते हैं, मुंबई के कुछ ही शहीदों को सलाम क्यूं ?? -
क्यूं हर रोज केवल चुनिन्दा पुलिस वालो को ही बार बार शहीद बताया जा रहा है, सिर्फ़ इसलिए की वो उच्च पदों पर आसीन पदाधिकारी थे या फिर इसलिए की वो तथाकथिस शहरी वर्ग से आते थे, क्यों महानगरीय ठप्पे वाले लोग जैसे हेमंत जी, सालसकर जी को ही हम अशोक चक्र या वीरता चक्र देने की बात कर रहे है? क्या वो पुलिस वाले जो तीसरे विस्वयुद्ध की बंदूको से लड़ रहे थे या फिर अपने डंडे से ही कुछ कमाल दिखा रहे थे, शहीदी का तमगा नही लगा सकते ? मेने आज तक किसी भी टीवी चैनल पर साधारण पुलिस वालो का नाम या लिस्ट नही देखी , मेने अपने ज्ञान के अनुसार वेब पर भी इधर उधर नजर दौडाई पर कही भी मुंबई के ३ अफसरों के अलावा किसी और का नाम नही दिखा, ये क्या मजाक है?
ये तो पहले भी हुआ है आजादी से पहले और बाद सिर्फ किरदार बदल गये हैं, हम तो देश के हर शहीद के लिये नमन करते हैं। बात फर्क की चली ही तो आजादी से पहले की ये बात भी देख लीजिये -
सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी की इच्छा के विरुद्ध जब कांग्रेस अध्यक्ष चुन लिए गए, तो कांग्रेस में बवाल हो गया था। रामगढ़ कांग्रेस में सुभाष चंद्र बोस ने अध्यक्ष पद के चुनाव में पट्टाभि सीता रमैया को हराया था। इस पर महात्मा गांधी ने कहा था कि पट्टाभि की हार मेरी हार है। फिर क्या था, पूरी कांग्रेस कार्यसमिति ने इस्तीफा दे दिया। हार कर सुभाषचंद्र बोस ने भी अध्यक्ष पद छोड़ दिया।इसमें सुभाष की नैतिक जीत और गांधी की नैतिक हार हुई।
नेताजी को साहित्य शिल्पी में भी याद किया जा रहा है -
“दिल्ली चलो” और “तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूँगा.. खून भी एक दो बुंद नहीं इतना कि खून का एक महासागर तैयार हो जाये और उसमे मै ब्रिटिश सम्राज्य को डूबो दूँ” का नारा देकर स्वाधीनता संग्राम मे नई जान फूँकने वाले सुभाष चन्द्र बोस
बाल-उधान में शोभा बच्चों को बता रही हैं - सुभाष चंद्र बोस से सीखो


अब कुछ कविताओं में नजर डालते हैं
दिल इक पुराना सा म्यूजियम है में रोशन नेता सुभाष चंद्र बोस को उनके जन्मदिवस पर याद करते हुए उनपर गोपाल दास व्यास की लिखी ये कविता 'ख़ूनी हस्ताक्षर' समर्पित करते हैं -
उस दिन लोगों ने सही-सही, खूं की कीमत पहचानी थी।
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में, मॉंगी उनसे कुरबानी थी।
बोले, स्‍वतंत्रता की खातिर, बलिदान तुम्‍हें करना होगा।
तुम बहुत जी चुके जग में, लेकिन आगे मरना होगा।

आज़ादी के चरणें में जो, जयमाल चढ़ाई जाएगी।
वह सुनो, तुम्‍हारे शीशों के, फूलों से गूँथी जाएगी।
आजादी का इतिहास कहीं काली स्याही लिख पाती है
इसको लिखने के लिए खूनकी नदी बहाई जाती है।
.........
सारी जनता हुंकार उठी- हम आते हैं, हम आते हैं!
माता के चरणों में यह लो, हम अपना रक्‍त चढ़ाते हैं!
सीमा सचदेव भी नेताजी पर नन्हें मनों के लिये एक बड़ी प्यारी सी कविता पढ़वा रही हैं -
सुभाष चन्द्र जी बोस महान
थे बच्चो वो गुणों की खान
तीक्ष्ण बुद्धि उन्होंने पाई
देते थे अंग्रेज दुहाई
बचपन से ही थे महान
सभ्य,सुसंस्कृत और विद्वान
अपने देश से करते प्यार
प्रभु मे आस्था भी अपार
महा-विचारों को अपनाया
अपना जीवन लक्ष्य बनाया
लडेंगे देश के हित मे लडाई
नव-युवकों की सेना बनाई
दिया एक जन-जन को नारा
है यह हिन्दुस्तान हमारा
खून दो मुझको मै फरियादी
बदले मे दूंगा आजादी
वहीं मुक्ति बड़ी होती हुई लड़की के बारे में अपने ख्यालों को अल्फाजों में कुछ इस तरह से सिमेटती है -
अपने ही घर में वह डरती है /और अंधेरे में नहीं जाती /हर पल उसकी आँखों में /रहता है खौफ का साया /जाने किस खतरे को सोचकर /अपने में सिमटी रहती है /रास्ते में चलते -चलते /पीछे मुड़कर देखती है /बार -बार /और किसी को आता देख /थोड़ा किनारे होकर /दुपट्टे को सीने पर /ठीक से फैला लेती है /गौर से देखो /पहचानते हो इसे /ये मेरे ,तुम्हारे /हर किसी के /घर या पड़ोस में रहती है /ये हर घर -परिवार में /बड़ी होती हुयी लड़की है /... ... आओ हम इसमें /आत्मविश्वास जगा दें /अपने हक के लिए /लड़ना सिखा दें /हम चाहे चलें हों /झुक -झुककर सिमटकर /पर अपनी बेटियों को /तनकर चलना सिखा दें .
अल्पना ने पहले हाइकू की कल्पना की उड़ान भरी थी आज त्रिवेणी में हाथ दे मारा, हाईकू तो समझाये थे लेकिन त्रिवेणी कैसे लिखते हैं नही बताया लेकिन जो भी है पहली कोशिश शानदार रही -
हर दिन तलाशती हूँ जीवन -परिभाषा के शब्द ,
मेरा शब्द कोष अधूरा है या तलाशना नही आता ?
वह परिभाषा जो तुमने ही तो बतलायी थी मुझे.

टूट कर जुड़ती रही नीर भरी गगरी,
रिसता रहता है खारा पानी ,
फिर भी छलका जाते हो 'तुम ' आते -जाते!
हम सोच रहे हैं क्यों ना थोड़ा हाथ हम भी आजमा लें, अरे रे रे ब्राउजर क्लोज करने कहाँ चले, छोड़िये इस बार बख्श देते हैं।


अब हमको दीजिये इजाजत, हम हैं राही प्यार के फिर मिलेंगे चलते-चलते लिखते-लिखते लेकिन उससे पहले आप सभी लोगों को गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत बधाई, और अंत में माखन लाल चतुर्वेदी की ये प्रसिद्ध कविता देश के तमाम शहीदों के नाम -

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ
चाह नहीं, प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर हे हरि, डाला जाऊँ
चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ
मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पर जावें वीर अनेक ।।

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