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गुरुवार, अक्टूबर 16, 2008

पूरा विश्वास उठ चुका है!!!

फुरसतिया जी का हम पर से पूरा विश्वास उठ चुका है. उठ भी जाना चाहिये. ऐसी हरकत बार बार कि अभी चर्चा कर रहे हैं, करते हैं, करेंगे और फिर नहीं कर पायेंगे कब तक कोई झेले. मगर हमारी भी मजबूरी..करें क्या?

पिछले तीन सप्ताह से तो कायदे से टिपिया भी नहीं रहे हैं, जो सामने पड़ गया. टिपिया दिया..और बस!!!
होता है ऐसा फेज भी. हम तो यही मानते हैं कि चलता है.

विवेक के अति आभारी हैं कि फुरसतिया महाराज को रोज चर्चवाने को मना लिए हैं.
अच्छा ही है, हमारे लिए कुछ बचा ही नहीं.

बस, हमारी लवली जी ने अपनी ब्लॉगिंग का एक साल पूरा किया और सबको धन्यवाद दिया, वो बताने के सिवा थोड़ा ही बचा है. न जाने किस भयवश उन्होंने अपनी प्रोफाईल ही अलग कर ली अपने ब्लॉग से और फोटो भी. एक वो कि अच्छी सी फोटो हटा ली और एक हम, कि अपनी नई नई टांके जा रहे हैं.

फिर उनके सिवाय, वकील साहब द्विवेदी साहेब ने अजब ही खुलासा किया. हमारे लिए तो वाकई जानकारी ही के समान थी:

मैं जानता था कि इस वास्तविकता को जान कर कुछ लोगों को दुख होगा। लेकिन यह वास्तविकता है। मैं ने यह कदापि नहीं कहा था कि 65% रिश्ते ऐसे हैं। मैं कह रहा था कि इतने लोग इन रिश्तों को मान्यता देते हैं।

वैसे दिनेशराय द्विवेदी जी हमेशा ही कुछ नया सा संदेश लाते हैं जो विस्मित कर देता है. वो गुणों की खान हैं, अतः बलवान हैं हमारी नजरों में. आपकी आप जानों.

आज जो सबसे सालिड पोस्ट लगी वो थी शिव कुमार मिश्रा जी की. आज उन्होंने साबित कर दिया कि वो हमारे ही अनुज हैं. स्नेहवश आशीष कहने को जी चाहता है. सोचता हूँ कि पास होता तो सर पर हाथ फेर देता और कहता कि वाह!! क्या बात है. क्या दोहे लिखे हैं!!!

आज तो अरूणा राय जी कुछ अलग रंग में ही आईं...और समझिये कि छा गईं. कहती हैं:

जब वे सबसे ज्‍यादा
निश्चिंत और बेपरवाह होते हैं
उसी समय जाने कहां से
आ टपकता है
एक चूजा
भविष्‍यपात की सारी तरकीबें
रखी रह जाती हैं
और कृष्‍णबाहर आ जाता है...
बहुत जबरदस्त प्रस्तुति!!!


मीडिया नारद ने सूचित किया कि आज याने १५ अक्टूबर को माननीत भू.राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम जी की जन्म दिन है मगर कहीं कोई चर्चा नहीं. आज असल संतो की यही हालत है..मगर नकल वाले संत अपने बेटों को कानून से बचा ऐश कर रहे हैं. आप भूलना भी चाह उनका जन्म दिन तो वो भूलने न देंगे.

शब्दों का सफर आज तिल का ताड़ बनाये दे रहा है..वो तो खैर हमेशा ऐसा ही करते हैं. जिस शब्द को हम तिल समझते हैं, उसकी ऐसी व्याख्या करते हैं कि ताड़ ही बन जाता है. अजित भाई को साधुवाद.

आज आलोक जी जैसे व्यंग्यकार और हर बात आराम से हजम कर जाने वाले हमारे मित्र भी भावुक हो लिए:

सर आपको कैसा फील हो रहा है-वह टीवी रिपोर्टर फिर एक बदहवास बाप से पूछ रही है।

यह सुनकर मुझे जो फील हो रहा है, वह बताने योग्य नहीं है क्योंकि वह छपनीय नहीं है।


आज उनका हृदय बोला जो मुझमें धड़का एक अपनापा सा लगता है इस शख्स से..शायद सबको लगता हो.

अभी तो बस इतना ही...बाकी देखी जायेगी. फुरसतिया जी तो आने ही वाले हैं फिर से.

एक निवेदन, भाई विवेक, आप मेरा वाला दिन ले लो...बड़ी मुश्किलें चल रही हैं..और फिर अब चार हफ्ते में भारत भी निकलना है. ये ज्यादा भारी लफड़ा है.

अंत में:

forcc

बायें से दायें:

घनश्याम गुप्ता जी, रजनी भार्गव जी, अनूप भार्गव जी, राकेश जी, समीर लाल...राकेश जी किताब ’अंधेरी रात का सूरज’ के विमोचन के अवसर पर.

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गुरुवार, सितंबर 18, 2008

मैडम आपको क्या परेशानी है??

शीर्षक देखकर भागे चले आये मानो कि बम फूटा हो. अरे महाराज, संदर्भ तो समझ लो कि दौड़ते ही रहोगे? यह ब्रह्म वाक्य नीलिमा जी की उस पोस्ट का हिस्सा है जिसमें वो बुजुर्गों के और नई पीढ़ी के बीच बढ़ती संवादहीनता की वजह से बुजुर्गों की हालत पर दुखी हैं एवं कहती हैं कि :

पीढियों के बीच बढती संवादहीनता हमारे अतीत और जडों को सुखा रही है !! अपनी वृद्ध पीढी के प्रति हमारा यह रवैया बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब विद्यालयों में बच्चे "वृद्धों की उपयोगिता" पर निबंध लिख रहे होंगे !


-वाकई, बहुत अहम मुद्दा उठाया है. पठनीय पोस्ट. हमारी खास रेकमेन्डेशन इसलिए भी कि हम खुद उसी बुजुर्गियत की दिशा में अग्रसर हैं.

वैसे बम फूटा की बात पर एक बात याद आई. जब न्यूयार्क में ९/११ अटैक हुआ या लन्दन में बम फटा और उसकी तस्वीर टीवी पर देखी, लोगों को घटना स्थल से उल्टी दिशा में भागते देखा मगर जब दिल्ली की तस्वीरें देखी तो लोग उसी दिशा में भाग रहे थे जहाँ बम फूटा..देखने कि क्या फूटा?? जैसे, सब टिप्पणी पर चली चर्चा जब खत्म हो गई. शांति छा गई तब राज भाटिया जी निकले आजादी की लड़ाई का बिगुल सधाते:

आप सब से निवेदन हे की इस जगह ऎसी बाते करके किसी का अपमान ना करे, क्योकि यहां हम ने किसी को नही देखा ना ही किसी के बारे जानते हे फ़िर क्यो दुशमनी करे, अगर दोस्ती नही कर सकते तो चुप रहॊ, उन से दुर रहो, आप भी मस्त रहो , दुसरो को भी मस्त रहने दो, मैं भी ९०% टिपण्णीयो मे बहुत कम शव्द लिखता हु, और कभी कभी सिर्फ़ :) से ही काम चलता है,
आप सब आजाद हैं ओर दुसरो को भी आजाद रहने दो यही मेरी शिकायत है और आप सब से प्राथना भी कि अब और नही, सब अपनी अपनी मस्ती मे रहॊ.


वैसे बात तो १०० टके सही है..आभार भाटिया जी.


आज शायदा जी ने कहा:

चुप के बियाबान में आवाज़ का बूटा रोप भी दें, तो सुबहोशाम उसे पानी कौन देगा? अनमनी उदारता के किसी क्षण में ईश्‍वर ने अगर अधर में लटकी दुआ को ज़मीन पर जाने का हुक्‍म भी दे दिया, तो तारे की तरह टूटकर गिरती उस दुआ को हथेलियां फैलाकर लोकेगा कौन?


शुरुवात में कहती हैं:.

"टूटी पलक को यूं ही ज़मीन पर गिरने नहीं दिया जाता... रोक लिया जाता है गाल पर ही। उल्टी हथेली पर रख, आंख बंद करके एक दुआ मांगी जाती है और कभी किसी को बताया नहीं जाता कि मांगा क्या गया। "


यही मंतर कालेज के समय हमारे एक मित्र भी हमें दे गये थे. विश्वास मानिये, पूरी पलक के बाल गिरा गिरा कर हथेली पर उल्टी धर के उड़ा दिये मगर बात नहीं बनी. उसकी तो शादी भी हो गई और हम बिना बाल की पलक लिये बहुत दिनों तक डोलते रहे बिना किसी को बताये, इसमें मंतर में बताना मना है. :) मगर यहाँ मसला दूसरा है. एक बेहतरीन लेखन का नमूना है, पढ़िये और आनन्द उठाईये.


वैसे, न जाने क्यूँ, क्या लफड़ा हुआ है कि भाई शिव कुमार मिश्र अपनी ईमेज बनाने के गुर सीखने में लग लिए हैं. लिखते तो हमेशा से क्लासिक व्यंग्य हैं, आज जरा अल्ट्रा क्लासिक टाईप लिख गये- और अपने मित्र कम गुरु से जिनकी ईमेज कबीर की है (गुमान ही होगा- वरना डॉ अनुराग ने उनके पोस्ट पर टीपते हुए कही दिया: सिर्फ़ गरियाने से अगर कोई कबीर बन जाता तो देखना यहाँ....इत्ते कबीर होते की उनके सरनेम से पहचानना पड़ता....) जितना गुरु से मूँह बाये सीखे, सब बता मारे.

ये गुरु को सुनने के चक्कर में लगे हैं और उधर सचिन मिश्रा बता रहे हैं कि गुरु कैसे कैसे!! ..

वैसे अनिल पुसडकर जी ने जैसे ही सचिन मिश्रा जी से शब्द पुष्टिकरण (वर्ड वेरीफिकेशन) हटाने की मांग की उन्होंने तुरंत उसे हटा कर टिप्पणी की कि :

"आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है. आगे से आपको यह दिक्कत नहीं होगी, आभार. " (लगा कहीं टेलीफोन लग गया है)

काश, सभी वर्ड वेरीफिकेशन धारी इस भावना को समझ हम टिप्पणीकारों पर रहम करते. :) कई ईमेल आते हैं कि वर्ड वेरीफिकेशन गुगल के साथ आया है, कैसे हटाये. बात तो सही है. डिफॉल्ट सेटिंग यही है और गुगल है भी दमदार आईटम. अब कोई उसके साथ आये तो हटायें कैसे-मगर उसने इसकी सुविधा दी है:

डेश बोर्ड से सेटिंग में जायें फिर सेटिंग से कमेंट में और सबसे नीचे- शो वर्ड वेरीफिकेशन में ’नहीं’ चुन लें, बस!!!


गुगल बुरा नहीं मानेगा, हमने कह दिया है. :)

आज एक विशेष चिट्ठे ’ओशो चिन्तन’ के बारे में जानकारी देना चाहूँगा जिसकी की कम ही चर्चा होती है. यह चिट्ठा नियमित रुप से राजेन्द्र त्यागी जी द्वारा संचालित है एवं इस पर रोज आचार्य रजनीश जो कि बाद में ओशो के नाम से जाने गये, का एक प्रवचन रहता है. जीवन के विभिन्न आयामों पर उनके चिन्तन और दर्शन पर उनके प्रवचन अति प्रभावी हैं.

आज एस बी सिंह जी ने रंग-ए-सुखन पर ब्रज का लोक गीत पंडित जसराज की आवाज में सुनवाया : मृगनयनी के यार. आनन्द आ गया.

मग्गा बाबा के प्रवचन सुन हमेशा की तरह मन प्रसन्न हुआ. आज उन्होंने गौतमबुद्ध और यशोधरा के मिलन की कथा सुनाई. हम मग्गा बाबा की जयकारा लगा आये. आप भी सुन आईये, अच्छा लगेगा.


आज कविताओं में:

आज कविताओं में स्वाति जी की प्रस्तुति उस त्वेष का योवन गजब की रही. वहाँ कट पेस्ट की सुविधा नहीं है वरना कुछ हिस्सा तो आपको यहीं पढ़वा देते.

कभी भाई वीनस केसरी स्कूल के दिनों में खीज उतारते एक कविता डायरी में लिख लिए थे. कुछ नया विचार दिमाग में नहीं आया तो वहीं खिजियाई कविता चिपका दिये, कुकडू कू $$$$$$$ -के नाम से. मस्त है!!!

आजकल पर ओमकार चौधरी जी को पढ़ें ’तेरे मेरे बीच की ये दीवार’ :

कई दिन की बारिश में
दरकी हैं कई दीवारें
भरे पड़े हैं पानी से रास्ते
भरी पड़ी हैं गलियां सारी
.... आगे पढ़िये ..


आज आये नये चिट्ठे:

आप सभी का हार्दिक स्वागत है. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाऐं:


1. आवाज़


2. कालापानी


3. मेरी कलम


4. श्री प्रह्लाद नारायण मित्तल (स्वर्गीय)


5. The S60 Blog


6. आपका दोस्त


7. Homoeopathy....Beyond Horizons


8. समीर

चिट्ठाकार: FIGHT AGAINST TERRORISM ...एक सालह- महाराज-ब्लॉग का नाम फाईट अगेन्सट टेरोरिज़म कर लो और चिट्ठाकार समीर.. सलाह बस है-हमारी नाम राशि हो, इसलिए स्नेह फूट पड़ा, मानना, न मानना, तुम्हारी इच्छा. :)

9. जाहिर है...


10. रंगीला मित्र मंडल


11. News36


12. गुरुवाणी


13. महाकौशल


14. MEDIA STUDENTS OF INDIA


15. चेतन पंचाल



------

और भी ढ़ेर सारा लिखे थे, पता नहीं कैसे उड़ गया...यही लफड़ा है उड़न तश्तरी का. कब न उड़ जाये..चलते चलते बवाल के दो शेर:

कौन कहता के, मौत आई तो मर जाऊंगा ?
मैं तो दरिया हूँ, समंदर में उतर जाऊंगा !!

ख़ुद पुकारेगी जो मंज़िल, तो ठहर जाऊंगा !
वरना खु़द्दार मुसाफ़िर हूँ, गुज़र जाऊँगा !!


-बहुत खूब (छोटी टिप्पणी-जबकि पढ़े भी हैं दोनों शेर और कंठस्थ भी कर लिए हैं, फिर भी)

आज की तस्वीर: (चित्र एवं पंक्तियाँ दोनों समीर लाल द्वारा) :)

(निम्न पंक्तियाँ वीनस केसरी की कविता में कुकडू कू और ओमकार चौधरी जी कविता में टर्र-टर्र टुर्र-टुर्र के प्रयोग से उत्साहित होकर)

जिन्दगी की कांव कांव,
कहीं धूप तो कहीं छांव!!


p1

अब चलते हैं-जय हो!!!

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बुधवार, जून 06, 2007

मैं भी इक दिन गीत लिखूँगा

आज विचार आया कि उल्टा चला जाये. जो सबसे बाद में पोस्ट किया है उसे पहले कवर करें. वजह साफ है. हम तो चिट्ठों की संख्या देखकर ही डर गये और सोचा कि चुप मार कर बैठ जाते हैं. उससे अच्छा है जितना हो जाये बाकि समझें कि हमने लिखा हि नहीं.फुरसतिया जी को भी नाराज होने का समय नहीं है, बच जायेंगे. वो तो फुटा जोड़ने की जुगत लगाने में व्यस्त हैं. (फुटा=फुरसतिया टाईम्स). बहाने बहाने से निकाले चले जा रहे हैं. कभी दूसरा अंक तो कभी स्पेशल एडीसन -भेंटवार्ता न हुई मानो विधान सभा भंग हो गई हो कि पूरा अखबार ही निकाल मारे. लोग बाग भी भरपूर ताकत से चढ़ाये हुये हैं निकालो निकालो ताकि बंदा उसी में व्यस्त रहे और लंबे लंबे लेख न झिलवाये. यही राजनीति हमारे साथ भी लोग किये हैं वो छोटी कविताओं की पोस्ट पर. एक बंधु तो कह गये अब यही लिखा करो, बहुत बढ़िया लिख रहे हो. अरे, टिप्पणी में छिपा मर्म हमसे ज्यादा कौन समझेगा. सारे बाल धूप में नहीं सफेद कर रहा हूँ, टिप्पणी कर कर के सफेद हुए जा रहे हैं और हमको ही ज्ञान, वो भी टिप्पणी के माध्यम से.

हमारे टिप्पणी पीर होने की चर्चा तो NCR ब्लॉगर मीट तक में हो गई. और तो और, घुघूती बासूती जी ने तो हमारे लिये अलग से नारद पर आरक्षण की माँग तक कर दी है. परेशान है तो इस तरह की माँग कर बैठीं. मगर की शांति से, न कोई तोड़ फोड़, न दंगा जैसा कि बाकि परेशान जनता करने लगती है. यही तो अंतर करता है आम परेशान जनता में और एक कविता वाले ब्लॉगर में. नमन करता हूँ उनकी शांति प्रियता को. पक्षी का नाम पक्षी का काम.

पक्षी की जगह हाथी होता, तो देता डंडे ही डंडे. मजाक नहीं कर रहा, सच में खबरची ने बताया है. बताने को तो अमित भी ब्लॉगर यात्रा और जुलाई ब्लॉगर भेंटवार्ता के बारे में बता गये और दीपक जोशी जी ने देखा कि सब हिमाचल की तरफ ही आ रहे हैं तो बता गये कि कहाँ ठहरे हिमाचल में. अब जब बतिया ही जा रहा है तो क्यारी भी बतियाये कॄषक आमिर के बारे में और रामा जी बतियाये कि अपराध और मौसम में गहरा रिश्ता है और हमारे राजेश रोशन तो अमर सिंग का शीर्षक देख कर ही प्रसन्न हुये जा रहे हैं. हम भी जाकर प्रसन्नता जता आये. आज कवितायें भी खूब आई. मगर हमारे गीत सम्राट राकेश खंडेलवाल जी परेशान हो उठे और लगे हैं कि एक दिन गीत लिखूँगा. अरे भाई, एक दिन क्या, रोज रोज लिखो. आपके गीतों के हम दीवाने हैं, मगर वो इतना व्यस्त हैं कि बस कहते ही चले गये कि एक दिन गीत लिखूँगा. खैर, हम भी आज ही नारा बुलंद किये दे रहे हैं कि एक दिन गीत पढ़ूँगा-तब तक बस ऐसे ही पढ़ता रहूँगा. :)

आज जीतू ने घोषणा की कि उनके परिवार में नया सदस्य जुड़ गया है. हम भी सोचे, यह बंदे को क्या हुआ. इस उम्र में जाकर यह उदंडता और उस पर खुशी खुशी घोषणा भी कर रहा है. शरमाते हुये चटकाये तो नजारा कुछ और ही निकला, नई कार खरीद लाये हैं और उसी का फोटो लगा कर सबको चमका रहे हैं. ऐसा चमकाये कि हमारे प्रमोद भाई तो काम्पलेक्स में ही आ गये.

अतुल श्रीवास्तव जी कहे कि आओ, बेहतरीन कहानी सुनायें. बड़ी सस्पेंस थ्रीलर टाईप कहानी सुनाये भाई- वो कौन थी. अब क्या जबाब दें, मिले तुम, खेले तुम, हम कैसे जानें कि कौन थी.

ब्लॉगर भेंटवार्ता तो ऐसी चल रही हैं कि जितने ब्लॉगर नहीं उससे ज्यादा भेंटवार्ता. हमारे परम शिष्य (नये वाले) संजीत त्रिपाठी ने भी बम्बई में भेंटवार्ता की रिपोर्ट पेश की बड़े चकाचक अंदाज में. मजा आ गया, आखिर हमारा शिष्य जो है, कोई यूँ ही थोड़े. अब जब शिष्य की सुनी गई तो गुरु कम थोड़े हैं तो हमारे गुरुवर आलोक पुराणिक को भी सुनो: हे प्रेम के गब्बरसिंह, हे च्यवनप्राश के मिसयूज-कर्ता.

अरुण की कथा दुम वाली कल ही कवर हो गई थी इसलिये आज नहीं कवर कर रहे. वरना पंगा हो जायेगा.
मगर ज्ञानदत्त जी की पोस्ट क्या केवल जुनून काफी है जीने के लिये को कवर करना जरुरी है, ऐसा उपर से आदेश आया है, भले ही पंकज बैगाणी की नई शुरु साईट शटर स्पीड छोड़ दें. क्या डिजाईन है भाई, मान गये. मगर छोड़ ही देते है उसको और विकास को भी जिसे सिंगल होने का घाटा हो रहा है. दोनों अपने बंदे हैं कि बुरा नहीं मानेंगे. रंजना भाटिया रंजू जी को भी छोड़ देते है जो स्मरण शक्ति के बारे में गरिमा जी के विचार बता रहीं हैं.

कविता के पसंदगारों के लिये गुरनाम सिंग जी खूब सारी कवितायें एक के बाद एक ले आये हैं और मोहिन्दर भाई भी कवि कुलवंत जी की और तुषार भाई की तरह लाये हैं. जब सब देखे हो तो हिन्द युग्म भी देख आओ.

अब थक गये, जितने कवर हुये कर लिये ऐसे ही बेतरतीब तरीके से..अब चलते है और आप पढ़िये अतुल अरोरा का अब तक छप्पन और सुषमा कौल जी की छोटी छोटी बतिया में बड़ी बड़ी बतिया.

अब हम चलते है. भूल चूक लेनी देनी.

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बुधवार, मार्च 28, 2007

कहाँ रहें राम?

सभी पाठकों को रामनवमीं की शुभकामनायें. इस अवसर पर संबंधित लेखन लेकर आये हमारे संजय भाई, कहते हैं हैप्पी बर्थ डे, रामजी, अभय तिवारी जी कहते हैं कहाँ रहें राम? और इसी अवसर पर यह भी खुब रही पर प्रयास अनुठे रामभक्त हनुमान के विषय में.

खैर, यह उत्सव तो पूरा हुआ, मगर दूसरा उत्सव, गीतकार का मुक्तक महोत्सव के रुकने से उड़न तश्तरी दुखी हो गई और पूछ रही है कि क्या भाई!! अकेला देख हड़काते हो? समर्थन में साथी टिप्पणियों के माध्यम से गीतकार जी को उत्सव नये फारमेट में फिर से शुरु करने की गुहार कर रहे हैं. इस पर गीतकार जी ने कहा- मुक्तक नहीं, एक प्रश्न और फिर गीत कलश पर हम किसको परिचित कह पाते :


हम अधरों पर छंद गीत के गज़लों के अशआर लिये हैं
स्वर न तुम्हारा मिला, इन्हें हम गाते भी तो कैसे गाते

अक्षर की कलियां चुन चुन कर पिरो रखी शब्दों की माला
भावों की कोमल अँगड़ाई से उसको सुरभित कर डाला
वनफूलों की मोहक छवियों वाली मलयज के टाँके से
पिघल रही पुरबा की मस्ती को पाँखुर पाँखुर में ढाला....................


खैर, मुझे लगता है (वैसे तो मालूम है) कि कल से गीतकार जी रुका महोत्सव नये फार्मेट में फिर से शुरू होगा मगर उनका नैतिकता के आधार पर लिया गया निर्णय चिठ्ठा जगत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज किया जायेगा, यह मेरा विश्वास है.

माना सब इसी तरह के बनाये गये मानकों से सीखेंगे मगर यह भी तय है, बकौल अभिनव, कि ज़िन्दगी भी बहुत से दाँव सिखा देती है :


हर सबक कैद नहीं होता है किताबों में,
ज़िन्दगी भी बहुत से दाँव सिखा देती है।


वैसे भी अभिनव इतनी सुंदर कविता रचता है कि अगर वो लिखे और हम जिक्र न करें, यह संभव नहीं. लिखते तो और भी लोग बहुत प्यारा है और हम उन्हें पुनः न प्रस्तुत कर सुन सुना चुके हैं मगर भईया, मान जाओ, बिना कट पेस्ट के हम कोशिश कर भी उनके अंश नहीं पेश कर पाते, जैसे कि आज हिन्द युग्म पर :

आमचो बस्तर, किमचो सुन्दर था...राजीव रंजन

देश निकाला- मोहिन्दर कुमार

यह कवि महोदय, चर्चा के लिये अपनी साईट पर इन्हें कट एण्ड पेस्ट के लिये खुला छोड़ दें तो हम वहाँ से ले लेंगे. अच्छा बुरा जो लगे लगा करे, मगर यार, हम फिर से टाईप न कर पायेंगे...और जो हमसे इस उम्मीद को लगाये बैठे हैं वो खुद चर्चा लिखने के आग्रह से शरमाये बैठे हैं और आगे आते ही नहीं और गुनाहों पे लज्जत कि सलाह हजारों हैं.

आज बहुत अंतराल के बाद अनामदास को इत्मिनान से पढ़ा...बिना इसके मजा भी तो नहीं. वाकई आनन्द आ गया. नियती और कर्मठता को आंकता उनका आलेख काबिले तारिफ है, इसी को तौलते.. वो बताते है कि कैसे निबू खरीदकर वो पत्रकार बन गये, वाह भाई, ऐसी साफगोई तो शायद ही आगे भी देखने को मिले, पहले भी नहीं देखी.. बहुत खूब. उनको सुन, बेजी भी अपनी एक पुरानी रचना सुना रहीं हैं, जो कि एक पोस्ट होने की काबिलियत रखती है. बेजी से उम्मीद है कि वो इसे एक अलग पोस्ट के माध्यम से भी प्रेषित करें:


गुब्बारे में भरी हवा का भार क्या है ?
माँ की साँसो की गुनगुन का सुरताल क्या है ?
वो आँसू जो आँखों मे सूखा उसका माप क्या है ?
मिट्टी की सौंधी खुशबू का नाम क्या है ?
बुलबुले के जीवन का अर्थ क्या है ?
उसमें तैरते इन्द्रधनुष की जरूरत क्या है


चलो, अब बेजी की जो इच्छा हो मगर आजकल लावण्या जी बड़ी सक्रियता से लिख रही हैं: आज उन्होंने मानवता के बारे में लिखा और हमारे निठल्ला चिंतक ले कर बैठे है अपने द्वारा निर्मित शो..प्रेटी वूमेन ...सृजनता और कल्पनाशीलता बहुत खूब है.

मगर उससे क्या होता है, यूँ तो सीमा जी भी निफ्ट की तस्वीरें दिन भर बदल बदल कर दिखाती रहीं और हमारे मनीष भाई, फैज की कल्पनाजगत की सैर कराते रहे मनीष भाई को बहुत बधाई, उनकी प्रस्तुति क्षमता अपने आप में अनोखी है और हम उसके कायल.

उपमा जैसे व्यंजन को मां के प्यार और मम्त्व से बांध देने का सफल प्रयास किया भाई रितेश ने और हमारी घघुती बसुती जी एक अलग अंदाज में अपनी दुख भरी दास्तां सुना रहीं हैं.

इन सब से बेखबर, हमारे प्रतीक भाई लाये हैं, लॉफ्टर चैलेंज वाली पारिजाद की तस्वीरें :)

अभी कोई जरुरी समाचार आ गया और मुझे जाना होगा....आना होगा में वादा करके संजय नहीं आये तो जाने में हम काहे शरमाये मगर जाते जाते एक जरुरी बात बता जायें:

तरकश हाटलाईन पर इस बार पेश हैं कटघरे में रवि रतलामी और साथ ही सुनिये उनकी पत्नी रेखा रतलामी से अंतरंग बातचीत.

मै संजय भाई से आग्रह करुंगा कि वो बचा और छुटा हुआ हिस्सा सुबह कवर कर लें..ताकि अगला चर्चाकर निश्चिंत हो उसका हिस्सा कवर करे.

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