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शुक्रवार, मार्च 19, 2010

लजाइए नहीं ... चिट्ठाईए - कठिन ब्‍लॉगिंग के हाफ बाल्‍ड प्रेत के लिए

एक पोस्‍ट पर चर्चा कई बार हुई है पर आज हम एक चिट्ठाकार पर चर्चा करना चाहते हैं। गजब खब्‍ती चिट्ठाकार है ये। वन कैननॉट ड्रेग हीम टू... ब्‍लडी कीचड़ आव चिट्ठाकारी, अगला वही रहेगा जो है पर यू कान्‍ट ड्राइव हीम अवे आइदर ... अगला बना रहेगा। आप टिपियाए या नहीं, पढें या नहीं (समझ पाएं या नहीं)यानि चिट्ठाकार परमोद बाबू

         

       

 

आज की उनकी पोस्‍ट  कुल जमा दो लाइन की पोस्‍ट है... पूरी की पेरी दे  देते हैं-

जीवन के ट्रैफिक में मैं कहीं उलझा रह गया था, मौका अभय बाबू ने मार लिया था, मेरे देखने का छींका आज टूटा, उसी मीठी जलेबी का एक छोटा सा मजमून है.

अपने दूसरे ब्‍लॉग सिलेमा पर उन्‍होंने घोर गैर सेंसेश्‍नल फिल्‍म दाएं या बाएं की एक समीक्षा पेश  की है, अभय पहले ही इस फिल्‍म पर लिख चुके हैं पर प्रमोद की समीक्षा उसमें कुछ जोड़ती ही है।

फ़ि‍ल्‍म देखने के बाद इस अहसास की खुशी होती है कि बतौर माध्‍यम सिनेमा अब भी अपने देश में एक संभावना है, और वह फ़ि‍ल्‍मकार के हित में सिर्फ़ यही दिखाने का जरिया नहीं कि वह कितना स्‍मार्ट है, या जिन जड़ों से आया है उसकी कितनी स्‍मार्ट, एक्‍ज़ॉटिक पैकेजिंग करने का उसने हूनर हासिल कर लिया है. बेला ने अपनी पहाड़ी पृष्‍ठभूमि और स्‍थानीयता को जो सिनेमाई अरमान और ऊंचाइयां दी हैं, उसके लिए जितनी भी उनकी तारीफ़ की जाए, कम है. भयानक शर्म की बात है कि फ़ि‍ल्‍म के तैयार होने के एक साल बाद भी फ़ि‍ल्‍म के निर्माता सुनील दोषी उसे रिलीज़ करने की दिशा में कोई भी कदम उठाते नहीं दिख रहे. इस दो कौड़ि‍या आचरण पर कोई उनसे जवाब तलब करेगा? मीडिया, कुछ करे

हमने आज परमोद बाबू को चर्चा के लिए चुना उसकी वजह केवल यही पोस्‍ट नहीं है वरन शायद खुद परमोद बाबू हैं।  लोग जब अकेले या ऐसोसिएशनों के बूते जगह बनाने और न बना पाने या कम बना पाने पर हिटत्‍व के नुस्‍खे लिखने पर उतारू हों तो ऐसे में प्रमोद का ब्‍लॉग व्‍यक्तित्‍व हैरान करता है। प्रमोद विरक्‍त ब्‍लॉगर नहीं हैं उनका आर्काइव खंगालने से सहज ही पता चलता है कि वे निरंतर लिखते रहने वाले ब्‍लॉगर हैं तथा एकाध किसी दुर्लभ प्रसंग को छोड़ दें तो ऐसा कोई अवसर याद नहीं पड़ता जहॉं वे किसी वाद विवाद संवाद में पड़े हों। टिप्‍पणियों का समीरानंद कभी उनकी पिछवाड़े नहीं बहा (यहॉं तक कि शायद यही ब्‍लॉग है जिस पर टिप्‍पणी करना खुद समीर तक भूल जाते हैं :))    पर मजाल है इससे प्रमोद के लिखने की शैली पर बित्‍ता भर फर्क पड़ता हो।

प्रमोद के लेखन की खास बात उनका परी तरह प्रोफेशनल किस्म की शैली तथा उनका डरा देने की हद तक बहुपठ  होना तथा वाइडली ट्रैवल्‍ड होना है। हमें तो वे कठिन ब्‍लॉगिंग के प्रेत नजर आते हैं। खैर चर्चा के लिए सलाह देते हैं कि उनकी चंद सीरिज पर नजर डालें मसलन पतनशील साहित्‍य की उनकी खिड़की में एक न दो पूरी दो सौ तेरह पोस्‍टें हैं हर एक को पढ़ना एक तकलीफदेह यात्रा से गुजरना है। इसी सीरिज ने बाद में पतनशीन औरतों वाले लेखन को प्रेरित किया था जो हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की ऐसी विरासत है कि संस्‍कृति के गदाधारियों का आज तक उसके सपने आते होंगे।  भर भर घर से एक हिस्‍सा-

चार दिनों से बंद हूं तंग हूं अलग बात है, सच्‍चाई यह है ग़लत शादी की तरह यह घर हमेशा से मेरी जान खाती रही है. पूछो क्‍यों हमारे हिस्‍से आई तो हरामख़ोर का चेहरा उतर जाता है! अबे, किसी और के गले जाकर नहीं बंध सकती थी, समूचे चॉल में ‘कथा’ के नसीर की तरह एक हमीं शरीफ़ मिले कि अपने मोह में उलझाकर हमारे कृशकाय पर लतरकुमारी होकर लटक लीं? चलो, एक मर्तबे हर किसी से ग़लती होती है, हमसे भी हुई हमने भाव दे दिया मगर बेहयाकुमारी अबतक लटकी हो?

  ऐसा नहीं कि प्रमोद किसी कोकून में दबे- छिपे लेखन करते हैं, खुद ब्‍लॉगिंग पर उन्‍होंने 166 पोस्‍टें लिखी हैं जो काम के लिंक्‍स व चिंतन से भरी हैं।

इन सबके अलावा प्रमोद के स्‍केच ... ओह गॉड हाउ टैंलेंटेड दिस हाफ बाल्‍ड मैन इज...

 

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शुक्रवार, फ़रवरी 19, 2010

चर्चा-1411... हिन्दी ब्‍लॉगजगत क्‍या कर रहा है ?

 

 

कारपोरेट की दुनिया जब किसी सार्वजनिक महत्‍व के काम में हाथ लगाती है तो संशय उत्‍पन्‍न होना स्‍वाभाविक है। दुष्‍यंत की पंक्ति 'चाकू की पसलियों से गुजारिश तो देखिए' याद आती है। हिन्‍दी की दुनिया वैसे भी संशयजीवी है इसलिए पहले पहल एयरसेल के बाघ बचाओ अभियान  पर विश्‍वास करने को जी नहीं चाहता था पर बाघ बचाने में तो उनका हमारा सबका स्‍वार्थ है... वो बचेंगे तो हम भी। इसलिए चिट्ठाचर्चा 1411 बचें हैं अत: बाघ बचाएं अभियान का समर्थन करती है। इस अभियान में जागरूकता फैलाने का बीड़ा आम लोगों ने उठाया है..हम  शहरी जो दरअसल इस सारे पारिस्थितिकीय विनाश के लिए पूरी तरह जिम्‍मेदार हैं पर हमारे हाथ एकदम झक्कास साफ सुथरे दिखाई देते हैं, हम अधिक न भी कर पाऍं तो माहौल बनाने में अपना योगदान तो दे ही सकते हैं। जब सारे बाघ खत्‍म हो जाएंगे तो कम से कम आब्‍युचरी की पोस्‍टें लिखने से अच्‍छा है कि अभी बाघ बचाने की पोस्‍टें लिखी जाएं ताकि इस बेहद खूबसूरत जानवर को बचाने में हम अपना ‍योगदान दे सकें। पर क्‍या करें हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत को और इतने काम हैं.. खुद ही इतने शिकार करने-होने के काम हैं कि बाघ.. उनका क्‍या है अभी तो 1411 बचे हैं... देखेंगे..देख लेंगे।

खैर चर्चा के लिए सोच रखा था कि बाघ पर आई पोस्‍टें ही शामिल की जाएंगी। सबसे प्रशंसनीय जाहिर है चिट्ठाजगत की प्रतियोगिता पोस्‍ट है जो प्रोत्‍साहित करती है-

एक ज़माना था जब लोग बाघ से बचते थे, और आज का ज़माना है जब लोग बाघ को बचाते हैं।
क्या से क्या हो गया, और क्यों, आपका क्या सोचना है?
भाग लीजिए
चिट्ठाजगत.इन द्वारा प्रायोजित एक और लेखन प्रतियोगिता, इसमें आप अपने निबंध, कविताएँ, व्यंग्य, कार्टून, तस्वीरें और वीडियो अपने चिट्ठे पर चढ़ा कर, शीर्षक में १४११ (या 1411) लिख दें।

मजे की बात है कि एक डाक्‍टर साहब का अब भी सवाल है-

बाघ जैसे खूंखार जानवर को बचाने का क्या फ़ायदा ?? ये क्यों पुण्य कार्य है??---कोई बतायेगा!

वेसे तो जबाव देने वालों ने दे ही दिया है पर हम कहना चाहते हैं कि कितना भी खूंखार क्‍यों न हो कोई भी जानवर इंसान सा खूंखार तो नहीं ही होगा, उस तक को बचाने की कोशिश की जाती है।

 

पवन ने इस संदर्भ में एक बाजिव सवाल उठाया है कि अगर हम बाघ नहीं बचाएंगे तो अगली पीढ़ी के प्रति अपनी जिम्‍मेदारी से पलायन है उन्‍हें क्‍या बताएंगे-

अब मुझे भी दुःख होता हैं की पिछले कुछ दशको में जो इनकी संख्या में इतनी गिरावट आई हैं की हमारी आने वाली नयी पीड़ी को हमें इनके बारे में बताने के लिए उन्हें किसी संग्राहलय में ले जाना पड़ेगा जहाँ पर इनकी भी हड्डियों का एक ढाचा या इनका पुतला बना होगा ठीक वैसे ही जैसे हमें अभी डायनासोरो के बने होते हैं.

 

संदीप ने वेबदुनिया के अपने ब्‍लॉग में बाघों के पक्ष में एक तथ्‍यात्‍मक आलेख दिया है जो टाईगर ईयर में इनके बचाव पर बल देता है-

चीन में इस साल टाइगर वर्ष मनाया जा रहा है और दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इस कारण से इस वर्ष बाघ के अंगों की माँग में जबरदस्त इजाफा हुआ है। एक रिपोर्ट के अनुसार मध्य एशिया और चीन में बाघ के लिंग की कीमत 80 हजार डॉलर प्रति 10 ग्राम है, बाघ की खाल 10 हजार से लेकर 1 लाख डॉलर तक, बाघ की हड्डियाँ 9000 डॉलर प्रति किलो तक बिक जाती हैं। ह्रदय और अन्य आंतरिक अंगों की कीमत भी हजारों-लाखों में है। इसके बावजूद खरीदारों की कोई कमी नहीं है।

उमेशपंत ने अपनी बात कविता में कही है-

कुछ खाली सा कर देती है उसकी मौत भी
और उस खालीपन में भरने लगती है
एक खास किस्म की उदासी।
उस रोज किसी ने नहीं कहा था
कि घट रही है उनकी तादात
पर आज जबकि बाघ की जीवन यात्रा
छूं रही है अपना अन्तिम पड़ाव
तेा आ रहा है समझ

विनय जोशी की अलंकृत पोस्‍ट भी आपका आह्वान कर रही है-

 

 

खरी खरी में संदीप भी पुन: आगह करते हैं कि बच्‍चों की ही खातिर सही पर बाघ बचाना आवश्‍यक है-

 

 

 

हम अपनी आने वाली नस्ल के लिए क्या छोड़ेगे, पन्नो पर बाघों के चित्र, विकिपीडिया पर उसकी जानकारी , कहानियो में शेर की बहदुरी के किस्से , शेर मार जायेगा लेकिन घास नहीं खायेगा जैसी कहावते, ज्यादा से उदार हुआ और मांग बड़ी तो कमाई के लिए एक अध् फिल्म बनादेगे .या फिर रास्ट्रीय चिन्ह के रूप में चार मुह वाला शेर छोड़ेगे . लेकिन जब आने वाली नस्ल में से ही कोई सिरफिरा हमारा रास्ट्रीय पशु बाघ को देखने कि जिद कर बैठा तो सोच लो क्या दिखाओगे ..... क्या समझोगे....... क्या कहोगे.........

संजीव ने ब्‍लॉगजगत से आग्रह किया है कि प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने के लिए बाघ बचाओ का प्रतीक चिन्‍ह अपने ब्‍लॉग पर लगाऍं-


CG Blog

 

शान ने भी कविता की पंक्तियों में उस शर्मिंदगी को व्‍यक्‍त किया है जिसमें पूरी मानवता साझा है-

लेकिन न जाने किसकी इनको नज़र लग गई
एक दिन एक बड़े हैवान ने देख लिया
जिसे इंसान कहते हैं उस शैतान ने देख लिया
घर उजाडना शुरू कर दिया
कुनबे को खत्म करना शुरू कर दिया
एक एक को मारना शुरू कर दिया
इनको मार कर वाह वाही लूटी
आलीशान बंगलो में लटका कर शान समझी
आगे की नस्लो को क्या बताएगे ये बात न समझी
अभी भी वक्त है
संभल जाना चाहिए
1411 सिर्फ बचे है
इन्हे संभालना चाहिए

सागर की कविता भी इस संदर्भ में अहम है -

आने वाले दिनों में हम

अपनी महत्वाकांक्षा की

तरकश में

कुछ और विष बुझे तीरों से साथ

नयी नस्लों की शिकार पर निकलेंगे

 

संजय ने एक बेहद शानदार अंदाज में पोतों का मासूम सवाल सामने रखा है कि क्‍या एक बचाकर नही रख सकते थे-

कभी शेर को बहादुरी का प्रतीक बना दिया गया. यह बात और है कि शेर अपनी बहादुरी दिखाने के लिए किसी को नहीं मारता, मगर इनसान के लिए ऐसा नहीं है. शेरदिल इंसान शेर-बहादुर कहलाने और खुद को शेर से ज्यादा बहादुर साबित करने के लिए कातरों की भाँति छिप कर शेर को मारता रहा. मृत शेर पर पाँव रख मूँछों को ताव देता रहा. बेचारा बाघ, शिकायत भी न कर सका कि किसने कहा था मुझे बहादुर कहने को. मैं तो कायर-कमजोर ही भला था

आप भी इस अभियान में शामिल हो सकते हैं, अपने ब्‍लॉग पर लिखिए, आर्कुट, फेसबुक, ट्विटर हर 2.0 माध्‍यम का इस्‍तेमाल करें और इस सरोकार में शामिल हों। आप लिखने के लिए इन लिंक्‍स से सहायता ले सकते हैं-

http://saveourtigers.com/blog/
http://projecttiger.nic.in/
http://www.youtube.com/saveourtigers
http://www.facebook.com/pages/Stripey-the-Cub/316470889745?ref=ts
http://twitter.com/saveourtigers
http://www.wwfindia.org/

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शुक्रवार, जनवरी 15, 2010

बताइए साबजी कैसा लग रहा है ?

screenshotप्रौद्योगिकी की दुनिया बहुत तेजी से बदलती है..इतनी  तेजी से कि इंसान अपनी एक ही पीढ़ी में तकनीक की कई पीढि़यॉं देख कर विदा लेता है...  अभी कल तक की बात लगती है जब डोस वातावरण में फ्लॉपी डालकर बूट करते थे अपना 8088 सिस्‍टम फिर 286 -386-486 पेंटियम.... इसी तरह वर्ड्स स्‍टार... अक्षर... वेंचुरा।  इंटरनेट की बात करें तो नेटस्केप...हॉटमेल...ट्विटर। हिन्‍दी इंटरनेट की बात करें तो ये फांट वो फांट... चिट्ठा विश्‍व, नारद, ब्‍लॉगवाणी... कई बार तो इस पैंतीस की उम्र में ही कराह कर कहने को मन करता बहुत देख लिया ऊपर वाले.. :)। अब यही देखो कहॉं तो एग्रीगेटर चाहिए इसलिए थे कि गैर हिन्‍दी बहु ब्‍लॉग प्‍लेटफार्म हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग को भाव ही नहीं देते थे कहॉं होते होते हम उस मोड़ पर पहुँच गए हैं कि अब ब्‍लॉगवाणी वाकई 'भारतीय ब्‍लॉग एग्रीगेटर' बन रहा है। गिरिजेश ने सूचना दी है साथ ही आशंका भी व्‍यक्‍त की है-

मुफ्त सेवा प्रदान करते इस एग्रीगेटर साइट की विषयवस्तु क्या हो, कैसी हो, किस भाषा में हो - इन पर निर्णय लेने के लिए इसका प्रबन्धन स्वतंत्र है। यह उनका अधिकार है।

लेकिन अंग्रेजी चिट्ठों की बाढ़ में हिन्दी चिट्ठे दिखने बहुत कम हो जाएँगे जो कि अभी विकसित होती हिन्दी ब्लॉगरी के लिए शुभ नहीं होगा।

बहुभाषी होने की स्थिति में ब्लॉगवाणी को प्रयोक्ता के लिए भाषा चुनने का विकल्प अलग से देना चाहिए ताकि जिसे जिस भाषा का ब्लॉग देखना हो वही दिखे। इससे अपेक्षाकृत कम ब्लॉग संख्या वाली हिन्दी ब्लॉगरी को फलने फूलने में सहूलियत रहेगी

वैसे सूचना तो हमें थी पर ये तो दिमाग में आया ही नहीं कि इसे पोस्‍ट बनाया जा सकता है :)। खैर फिर नया होते रहना आज के नेट जगत की विवशता है..प्रासंगिक बने रहने की शर्त ही ये है कि पुनर्नवा रहें। खुद को बार बार रचें। इसी में एक मित्र की छटपटाहट दिखी -

आप कहते तो हैं कि यहां चिट्ठों की चर्चा हिंदी में देवनागरी लिपि में होगी. भारत की हर भाषा के उल्लेखनीय चिट्ठे की चर्चा का प्रयास किया जायेगा
तो क्या मुझ मूरख को यह ज्ञान प्राप्त होगा कि अब तक 1050 पोस्टों में कितनी पोस्टों पर हिंदी-अंगरेजी के अलावा अन्य भारतीय भाषायों वाले ब्लोगो की चर्चा का प्रयास किया गया है? लिन्क दे सकें उन पोस्टों का तो आभार
यह उल्लेखनीय होना भी क्या कोई खास क्राईटेरिया है?

एम ज्ञान साहब ने अपनी ये टिप्‍पणी-पोस्‍ट प्रचारार्थ हर जगह चेपी है... चिट्ठाचर्चा में टिप्‍पणी मॉडरेशन नहीं है इसलिए संभव है कोई तकनीकी वजह रही हो या जो भी हो...लीजिए शिकायत दूर हो गई। सही है अन्‍य भारतीय भाषाओं की पोस्‍टें आमतौर पर चिट्ठाचर्चा का हिससा नहीं बन पाई हैं इसके कोई आध्‍यात्‍िमक या पराभौतिक कारण नहीं हैं हम चर्चाकारों की सीमा भर है। अब ब्‍लॉगवाणी के भरोसे कुछ अंग्रेजी मराठी ब्‍लॉग दिखेंगे तो शायद चर्चा का हिससा भी बनें। जैसे आज निपुण पांडेय की मराठी कविता पर नजर पड़ी' 

शुभ पर्व आहे हा संक्रान्तिचा
स्नान करा , घ्या संकल्प नवा
तन आणि मन आपण शुद्ध करा
तीळ गुळ घ्या, गोड़ गोड़ बोला !

इसी प्रकार मृत्‍युंजयकुमार ने अंग्रेजी में ग्राफिती छाप एक पोस्‍ट ठेली है-

पिज्जा रीचेस फास्टर देन पुलिस एंड अमबुलंस!

कार लोन एट 8% बट एजुकेशन लोन एट 12 % !

फीस/डोनेशन ऑफ़ स्कूल्स आर मोरे देन सेलारिस ऑफ़ परेंट्स !

मेडिकल साईंस  इस अप फॉर आक्‍शन/बिज़नस … ओं थे देअथ बेड…!

ज्ञानजी ने ब्लागिंग की सीमा के बहाने बेव 2.0 से आगे की बात की है (हमारा धंधा बिगाड़ रहे हैं हमने तो अभी संभा संगोष्ठियों में 'हिन्‍दी 2.0' गिराना शुरू भर किया था)-

पर क्या ब्लॉगिंग की सीमा मात्र इससे तय होती है? शायद नहीं। जो अप्रिय हो, तिक्त हो, गोपन हो और जिसके सम्प्रेषण पर निरर्थक विवाद हो, वह पोस्टनीय नहीं है।पीरियड।

हमें तो ये पीरियड वाली भाषा मजेदार लगती है आखिरी बात... कह दिया तो कह दिया...बस- पीरियड :)

चलते चलते कुछ और पोस्‍टें जो हमें अहम लगीं -

कुंभ बाजार पर खुशदीप सूरज का सातवॉं घोड़ा के बहाने विचार कर रहे हैं-

..लेकिन कुंभ का आस्था के अलावा बाज़ार शास्त्र भी है...ज़्यादा विस्तार में न जाकर इस संदर्भ में आपको सिर्फ एक उदाहरण देता हूं...अगले तीन महीने में हरिद्वार में सिर्फ़ फूलों-फूलों का ही 400 करोड़ रुपये का कारोबार होगा...ज़ाहिर है ये फूल और दूसरी पूजा सामग्री गंगा में ही जाएगी...यानि गंगा का प्रदूषण कई गुणा और बढ़ जाएगा... उसी गंगा का जिसकी सफ़ाई के लिए हम करोड़ों रूपये के मिशन बना रहे हैं...

घर बैठे किताबें मँगाने के लिए फ्लिपकार्ट पर अभय जानकारी दे रहे हैं।

मैंने पिछले दिनों कुछ किताबों की ज़रूरत पड़ने पर उनको बुकशॉप्स में खोजा; कहीं न पाया तो फिर नेट पर खोजा। अमेज़न में थी लेकिन डॉलर्स में और किताब की क़ीमत से ज़्यादा उनके शिपिंग चारजेज़। उसी खोज में फ़्लिपकार्ट भी नज़र आया। जो किताब चाहिये थी वो थी, उसके अलावा दूसरी कई किताबें और भी दिखीं जो दिलचस्प थीं और मेरी जानकारी में नहीं थीं। किताब का मूल्य रुपये में, कोई शिपिंग शुल्क नहीं क्योंकि इसका संचालन बेंगालूरु से ही होता है, और उलटे डिसकाउंट!! चार-पाँच किताबे मँगवाई। तीन तो तीसरे दिन आ गई। और शेष भी जल्दी।

गिरिराजजी का लेख ब्‍लॉगिंग तो नहीं... छापे की चीज है पर है पठनीय। यही स्थिति स्मिता मिश्र के लेख की है। भावेश का आलेख एक शानदार शुरूआत है। कांउटडाउन पर कौशल को पढें।

काउंटडाउन एक चमत्कारिक शब्द है। आप दुनिया के किसी हिस्से में हों, किसी फील्ड में काम कर रहे हों, यदि इसके अर्थो को समझकर इस पर सही ढंग से अमल किया तो इसके जो चमत्कारिक परिणाम होंगे, उसे आप ही हासिल करेंगे। एक बार फिर बताऊं, दुनिया में हर चीज की एक निश्चित अवधि होती है, निश्चित फ्रेम होता है, निश्चित सर्कल भी। उसी अवधि, उसी फ्रेम, उसी सर्कल में चीजें घूमती हैं। आपको इस निश्चित अवधि से अनजान नहीं रहना होगा। इस निश्चित अवधि का संज्ञान में आना, उसका भान होना ही काउंटडाउन है।

चिट्ठियों पर कविता का स्‍पेस झांकें-

एक दिन सफाई करते हुए न जाने क्या हुआ,शायद मन कुछ ठीक नहीं था,या कुछ और,पता नहीं क्यों ये सोचा की इतनी पुरानी सहेलियां जिनसे बिछड़े करीब १५ साल हो गए है,उन्हें तो शायद मेरी याद भी नहीं होगी,मैं ही उनके पत्रों को संजोए बैठी हूँ मैंने सबसे पुराने पत्र जला डाले.हाँ-हाँ वही पत्र जिनकी खजाने की तरह रक्षा करती थी जला डाले ,पता नहीं इससे घर में कितनी जगह बनी हाँ दिल का एक कोना आज भी खाली महसूस हो रहा है।

एक बड़ी उपलब्धि अब हिन्‍दी ब्‍लागिंग के मुख्‍यधारा राजनीति से जुड़ जाने को माना जाना चाहिए। अमर सिंह अपनी बात कहने के लिए ब्‍लॉग मीडिया को उपयुक्‍त माध्‍यम मान रहे हैं। सपा खींचतान पर अमरसिह ने अपने ब्‍लॉग में अपना पक्ष रखा है-

ScreenHunter_01 Jan. 15 09.58 पता लगाने पर पुष्टि हुई कि कम से कम यह तो सच है कि रामगोपाल जी के दोनों बयानों (दिल्ली और सैफई वाले) के समय आदरणीय नेता जी दिल्ली और सैफई दोनों जगह मौजूद थे और पुराने समाजवादियों से दिल्ली में उनकी बैठक की भी पुष्टि हुई है. फिर भी संदेह के आधार पर क्या कहूँ? आज़म, नेता जी के दिल की पुरानी धड़कन है और हो सकता है शिवपाल शहीद हो जाए.

 

 

 

 

कुल मिलाकर कह सकते हैं कि नया साल कुछ कुछ बहुत कुछ नया दिखा रहा है हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में। चलते चलते चंद खूबसूरत तस्‍वीरें आदित्‍य की - बताइए साबजी कैसा लग रहा है??

 

 

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शुक्रवार, दिसंबर 18, 2009

'सर्वाइवल इज नॉट नेगोशिएबुल' - टपकते एडीएसएल से चर्चा की कुछ बूंदें

इंटरनेट सुबह से रूठा हुआ है, मॉडम की एडीएसएल की लाइट दिलासा देते देते अचानक टपक जाती है। यूँ तो छुट्टी है पर इतने भी खाली नहीं हैं कि एमटीएनएल मॉडम के टप टप देखने के अलावा कोई काम न हो। सोचा अनूपजी को बताकर खेद व्‍यक्‍त कर दें पर उनके यहॉं से भी किसी ने कहा कि 'साहब...अभी उपलब्‍ध नहीं है' तो जब जक साहब उपलब्‍ध न हों जाएं या इंटरनेट निर्बाध न मिलने लगे हम एक ऐसा काम करने जा रहे हैं जो चिट्ठाचर्चा में आज तक किसी ने नही किया यानि एक आफलाइन चर्चा। सो भी बस चर्चा कर रहे हैं लाइवराइटर पर अगर बाद में नेट मिला तो पोस्‍ट होगी नहीं तो खुद ही पढ़ लेंगे।  इस बीच एडीएसएल की टिमटिमाहट बंद हुई और हम कुठ पढ़ पाए तो चर्चा में आन लाइन तत्‍व भी जोड़ दिए जाएंगे।

2009 बस जाना ही चाहता है अपनी पिछली चर्चा में डा. अनुराग ने रिट्रोस्‍पेक्टिव की शुरूआत भी कर दी है। उन्होंने छांट छांटकर चिट्ठाकरों की रचनाएं खोजकर उनके लिंक प्रदान किए। एक चर्चाकार जानता है कि ये कितने श्रम का काम है। तो रिट्रोस्‍पेक्टिव इस बात की ओर इशारा करते हैं कि साल जाने को है जरा मुड़कर देखें..कैसा बीता। अगर चिट्ठाचर्चा के लिहाज से देखें तो ये सल खासा सक्रिय साल रहा है... जाने अनजाने चिट्ठाचर्चा को नारद समूह से जोड़कर देखा जाता था लेकिन इस साल चर्चा ने बेनारद ही सबसे ज्‍यादा पोस्‍टें ठेलीं हैं जिनमें से कई गुणात्मकता के लिहाज से श्रेष्‍इतम चचाएं कही जा सकती हैं। कोई सांख्यिकीय आंकड़े तो मेरे पास नहीं हैं लेकिन अनुभव का कोई मोल हो तो कह सकता हूँ कि जितने घंटे 2009 में चिट्ठाचर्चा को दिए गए हैं इससे पहले किसी साल नहीं दिए गए। कई नए चर्चाकार इस साल जुड़े हैं 2009 चचा्रसाल के लिहाज से खूब हैप्‍पनिंग ईयर रहा है। 

 

एडीएसएल टिमटिमा रहा है..लगता है थमेगा...

ये थमा... लीजिए झट से जितने हो सके ब्‍लॉग खोल लेता हूँ फिर इत्‍मीनान से चर्चा में शामिल कर सकूँगा-

ScreenHunter_01 Dec. 18 15.57

ScreenHunter_02 Dec. 18 15.57

काव्‍यमंजुषा की ल‍ेखिका  अदा का बेटा मृगांक आजकल घर आया हुआ है ममता उड़ेल उड़ेल दी जा रही है...मॉं अदा खूब रीझ रही हैं अपने बेटे पर... सो अपनी जगह पर हमें जो बात मजेदार लग रही है वह यह कि ब्‍लॉगजगत कैसे इसमें शामिल हो रहा है एक नितांत निजी अवसर पर हम सब शामिल.. जै बलॉगजगत की।

जब वो आया तो देख कर हैरान हो गई ..... कितना बदल गया है....बॉडी-शोदी बना ली है ...तभी तो जब भी फोन करो ...फोन नहीं उठाता....बाद में वापिस फोन करके कहता ...जिम में था ...फोन जिम बैग में था.... पता नहीं सच या झूठ ...लेकिन बॉडी देख कर तो यही लगता है.... 

दूसरे पक्ष में आराधना मॉं को याद करती हैं-

कई तरह की
सज़ाएँ पायीं
मार भी खायी
कई बार
पर
नहीं भूलती माँ
तुम्हारी वो अनोखी सज़ा
कुछ भी न कहना
सभी काम करते जाना
एक लम्बी
चुप्पी साध लेना

कोपेनहेगन में चल रही सरगर्मियों पर कुछ लोगों ने कलम चलाई है। मालदीव का कथन 'सर्वाइवल इज नॉट नेगोशिएबुल' अहम लगता है। दृस्टिकोण पर एक समग्र लेख देखें

मालदीव के प्रतिनिधि का उद्गार-‘SIRVIVAL IS NOT NIGOTIABLE’ ना केवल मालदीव के आम जनसाधारण के जीवन पर आसन्न संकट के प्रति गहरी चिंता को अभिव्यक्त करता हैं, बल्कि एक तरह से यह वाक्य सारी दुनिया के जलवायु परिवर्तन से पीड़ित आम जनसाधारण की आवाज को भी अभिव्यक्ति देता सा लगता है

प्रो. जगदीश्‍वर चतुर्वेदी स्‍थापित आलोचक व मीडियाविद हैं इससे उनके एक ब्‍लॉगर बनने के राह में भयानक बाधाऍं उठ खड़ी होती हें पर उम्‍मीद है कि वे उनसे पार पा लेंगे (उम्‍मीद में क्‍या जाता है) फिलहाल वे ब्‍लॉग का इस्‍तेमाल प्रिंट के लिए लिखे गए लेखों को सहेजने के लिए कर रहे हैं। इस क्रम में आज वे स्‍त्री भाषा के सवाल को उठा रहे हैं-

कुछ भाषाविद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हुए जान पड़ते हैं कि भाषा पुरूष की होती है। यह एक पुंसवादी संरचना है। वे सहज ही यह मानते हैं कि पुरूष ही भाषा का निर्माता और आविष्कर्ता है।मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय दृष्टि से भाषा का अध्ययन करनेवालों ने भी भाषा के निर्माण में स्त्री की किसी तरह की भूमिका को अस्वीकार किया। स्त्रियों के पास जो कुछ है वह पुरूषोंका अनुकरण है या उनसे चुराया गया है।

ब्‍लॉगजगत के शर्मीले बालक को देखें कि वो इस चित्र को छापने में गजब संकोच महसूस कर रहे हैं-

 

  यह तस्वीर पोस्ट करते हुए एक संकोच मन में लगातार बना रहा कि इसे इजहार का अश्लील नमूना ना समझ लिया जाये और मेरे इस प्रयास को एक उच्श्रृंखल व्यवहार। जबकि मेरा यह भरपूर मानना है कि और जो भी हो, यह कहीं किसी कोने से अश्लील इजहार नहीं है। साथ ही यह भी, बचपन से ऐसी लिखावटों को पढ़ना ठीक लगता है। इजहार के ये तरीके आकर्षण लिए रहे हैं। मालगाड़ियों के लाल डब्बों पर लिखी ये इबारतें अक्सर पढ़ने को मिलती हैं। कहीं कहीं तो गाँव कस्बे का नाम भी दर्ज मिलता है। लड़के और लड़की का नाम भी। मैं सोचता हूँ कि इतनी मेहनत करने की हिम्मत जुटाना भी एक बात है

अपना तो कहना है कि अगर इस लिहाज से ही अश्‍लीलता परिभाषित होती तो तमाम पापुलर कल्‍चर ही मटिया देनी पड़ती।

प्रेम में चौंकने का इरादा है तो चौंकाएबुल प्रेम की कमी थोड़े ही है मसलन संदीप के चौंकने के कारण को सराहें-

आज सुबह अख़बार में एक तस्वीर पर नजर गयी. अख़बार में एक फोटो छपी थी जिसके नीचे लिखा था- विवाह के बाद माता-पिता आशीर्वाद देते हुए. बीच में मां-बाप बड़ी शान से अपने दोनों तरफ खड़े नवविवाहित जोड़े के सर पर हाथ रख आशीष दे रहे थे. मै तस्वीर में दुल्हन ढूंढता रह गया. मां-बाप के दोनों तरफ दो लड़के शेरवानी पहने खड़े शान से नए जीवन में प्रवेश के वक्त मां-बाप का आशीर्वाद ग्रहण कर रहे थे.

जब मसला प्रेम पर टिका ही हुआ हे तो थोड़ा पीछे जाकर देखें कि कैसे शिव के वीर्य को चुराने के लिए देवताओं ने क्‍या कया नहीं किया, कामदेव तो अपनी पूरी सेना लेकर ही जुट गए -

उन्होंने अपना ऐसा प्रभाव दिखाया कि वेदों की सारी मर्यादा मिट गई। कामदेव की सेना से भयभीत होकर ब्रह्मचर्य, नियम, संयम, धीरज, धर्म, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य आदि, जो विवेक की सेना कहलाते हैं, भाग कर कन्दराओं में जा छिपे। सम्पूर्ण जगत् में स्त्री-पुरुष संज्ञा वाले जितने चर-अचर प्राणी थे वे सब अपनी-अपनी मर्यादा छोड़कर काम के वश में हो गये। वृक्षों की डालियाँ लताओं की और झुकने लगीं, नदियाँ उमड़-उमड़ कर समुद्र की ओर दौड़ने लगीं। आकाश, जल और पृथ्वी पर विचरण करने वाले समस्त पशु-पक्षी सब कुछ भुला कर केवल काम के वश हो गये। सिद्ध, विरक्त, महामुनि और महायोगी भी काम के वश होकर योगरहित और स्त्री विरही हो गये। मनुष्यों की तो बात ही क्या कहें, पुरुषों को संसार स्त्रीमय और स्त्रियों को पुरुषमय प्रतीत होने लगा।

समय के लिहाज से अब तक चर्चा पोस्‍ट कर दी जानी चाहिए पर बिना मन का पाखी का उल्‍लेख किए आज की चर्चा अधूरी रहेगी उन्‍होंने मुंबई की अपनी जिंदगी पर लोकल के बहाने से एक पोस्‍ट लिखी है। हमारी नजर में रश्मि की यह पोस्‍ट ब्‍लागिंग का शानदार उदाहरण है, उम्मीद है प्रो. जगदीश्‍वर चतुर्वेदी की नजर इस पर पड़ेगी और वे ब्लॉगर बनने की ओर प्ररित होंगे :)-

"थर्ड क्लास कहाँ है?"
"थर्ड क्लास नहीं होता"
कुछ देर सोचता रहा फिर चिल्ला कर बोला,"ओह्हो! थर्ड क्लास में तो हमलोग पटना जाते हैं",(उसका मतलब थ्री टीयर ए.सी.से था )पर मैंने कुछ नहीं कहा,सोचने दो लोगों को कि मैं थर्ड क्लास में ही जाती हूँ.अगर एक्सप्लेन करने बैठती तो ४ सवाल उसमे से और निकल आते.

इसी तरह शानदार ब्‍लॉगिंग का एक उदाहरण शेफाली पांडे की पोस्‍ट मजे का अर्थशास्‍त्र है। शेफाली की यह पोस्‍ट उन चंद लंबी पोस्‍टों में से हैं जो आकार में फुरसतिया हैं अनूप शुक्‍ला ने नहीं लिखी हैं पर बिना आदि से अंत तक पढ़े छोड़ी नहीं जा सकती।  शेफाली कामकाजी बनाम घरेलू महिलाओंके जीवन की एक तकलीफदेह झलक देती हैं-

वह नौकरी नहीं करती, मैं करती हूँ , इस लिहाज़ से वह मुझे कुछ भी कहने की अधिकारिणी हो जाती है , मोहल्ले से हँसती - खिलखिलाती गुज़रती है ,मुझे देखते ही उसे दुखों का नंगा तार छू जाता है . ''हाई ! तुम कितनी लक्की हो !तुम्हें देखकर जलन होती है''  का हथगोला मेरी ओर फेंककर,अपना कलेजा ठंडा करके वह आगे बढ़ लेती है.

घड़ी 5 से ज्‍यादा बजा रही है, एमटीएनएल की दुआ से साढ़े चार घंटे खप चुके हैं...आज बस इतना ही। चलते चलते चंद तस्‍वीरें आदि की हट में से-

 

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शुक्रवार, दिसंबर 11, 2009

चित्रचर्चा: एक शब्‍द-विरोधी समय में

ब्‍लॉगजगत में समय घनघोर शब्‍दविरोधी हो चला है। उधर ज्ञानदत्‍तजी ने उम्‍मीद जाहिर की थी कि जितना जल्‍द हो सके शब्‍द का बबल बर्स्‍ट होना चाहिए। तिस पर अगर आप ये जो भी हैं अवधिया चाचा की टिप्‍पणियॉं देख रहे हैं तो आप जान ही रहे होंगे कि शब्‍द के होने न होने से अब फर्क कम ही पड़ता है मसलन इस टिप्‍पणी को ही लीजिए

इस कमेंट से कापी कर लें कुत्‍ता कभी मुझे लिखना होगा तो यहाँ से कापी कर लूंगा(मैं जो कीबोर्ड प्रयोग करता हूँ उसमें टाइप नही कर पाता), हो सके तीसरे किरदार से कहें वह भी अपना ब्‍यान नोट करवादे, अवधिया की तरफ से कहना प्रवचन का समय नहीं है यह,अन्‍यथा वह फेल होजाएगा, यार लोग स्‍टोरी एवार्ड जीत लेंगे अब अवधिया की दो ही इच्‍छाऐं है एक अवध देखना दूसरा खान का ब्‍यान पढना

अगर इस अवधिया अभिव्‍यक्ति का कुछ अर्थ, भाव, कुभाव, अभाव, विभाव, अनुभाव, संचारी, व्‍यभिचारी भाव पता चले तो बताइएगा। पिछली चर्चा भी टैंपलेट केंद्रित थी। अत: कुल मिलाकर आजकल पढ़ने पढ़ाने पर कम और दिखने दिखाने पर ज्‍यादा जोर है.. ये वो पक्ष है जो हमारा काफी कमजोर है। दिखते हम एकदम अदर्शनीय हैं और दिखाने का ऐसा है कि डोमेन लिए तीन साल हो चुके अभी तक ब्‍लॉगर पर ही पड़े हैं क्‍योंकि वहॉं अपने स्‍पेस पर सजावट का काम करना पड़ेगा इससे डरे हुए हैं। लेकिन किसी भी डर से जूझने का तरीका ये हैं कि सीधा जाकर उससे जाकर टकरा जाओ इसलिए आज हमारी ये चर्चा पढ़ने नहीं देखने की चर्चा है। हमने हर उस ब्‍लॉग पर जिस पर कोई चित्र आज की पोस्‍ट में है चित्र उठाया है अगर चित्र में जी रूचे तो उस पर क्लिक करें वह आपको सीधा उसी पोस्‍ट पर ले जाएगा। उदाहरण के लिए

यह चित्र जितेंद्र भगत की कविता तक ले जाएगा जहॉं उन्‍होंने ये चित्र सटाया है। इसी प्रकार नीचे प्रत्‍येक चित्र भी संदर्भित पोस्‍ट का लिंक है तो आज चित्र देख देखकर तय करें कि क्‍या पठनीय दर्शनीय है :)

 

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ScreenHunter_01 Dec. 10 16.45
   
mandir

 

चित्रचर्चा है अत: स्‍वाभाविक है चित्र उन पोस्‍टों से ही लिए गए हैं जिनके लिंक चित्र पर हैं। जहॉं एक ही पोस्‍ट में एक से अधिक चित्र मिले हैं उनमें से कुछ जानबूझकर एक से ज्‍यादा बार लिंकित कर दिया है। तो बताएं कैसी लगी चित्रितचर्चा ?

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