न
समीर ने करी शिकायत, न ही
शानू ने कुछ बोला
और रहे
काकेश मौन हो व्यस्त स्वयं की मधुशाला में
कोई शिकवा नहीं किसी का चर्चा से क्यों दूर हुए हम
उलझे रहे च्यस्तताओं की पल पल पर ढलती हाला में
घुघुत्र्र बासूतीजी अपना खोया बचपन ढूँढ़ रही हैं
जो न कह सके वो थी शायद सिले हुए होठों की ही स्मित
यह निश्चित ही व्यंग्य नहीं है कहते हैं
आलोक पुराणिकएक
सोच का दॄष्टिकोण है, हम भी हुए सोच कर ही चित
ई पंडित जी ने खोले हैं नये ज्ञान के नूतन पोथे
गर्दिश में भी रहा दीप्तिमय, वो बस एक
चरागे दिल है
दिल का दर्पण सिखलाता है नये पाठ कुछ नई विधा में
गीतकलश में जो भी कुछ है,
एक तुझी पर आधारित हैनारद पर कुछ पूरा दिखता नहीं न जाने क्या कारण है
न समीर का चिट्ठा दिखता नहीं दिखे हैं रवि रतलामी
ये है निश्चित सभी लिख रहे, सोषी संभव मेरी नजर है
चलो हो चुकी चर्चा अब स्वीकारो मेरी एक सलामी
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