गुरुवार, अक्टूबर 18, 2007

वाशिंगटन में कवि सम्मेलन

चिट्ठों की चर्चा तो अक्सर करता हूँ पर आज नहीं है
आज सूचना भर देनी है सब मित्रों औ’ सुधी जनों को
इस महिने की सत्ताईस को कवि सम्मेलन का आयोजन
शिल्पित करने को कवियों की आंखों में बुनते सपनों को

आयेंगे अनूप, रजनीउड़नतश्तरी वाले लाला
आप अगर हैं वाशिंगटन के आस पास तो आप आइये
और अगर यदि लिखते भी हैं तो मुझको दें आप सूचना
मंच यहां पर हम देते हैं, अपनी रचना आन गाइये

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मंगलवार, अक्टूबर 16, 2007

कोई शिकायत ???

समीर ने करी शिकायत, न ही शानू ने कुछ बोला
और रहे काकेश मौन हो व्यस्त स्वयं की मधुशाला में
कोई शिकवा नहीं किसी का चर्चा से क्यों दूर हुए हम
उलझे रहे च्यस्तताओं की पल पल पर ढलती हाला में

घुघुत्र्र बासूतीजी अपना खोया बचपन ढूँढ़ रही हैं
जो न कह सके वो थी शायद सिले हुए होठों की ही स्मित
यह निश्चित ही व्यंग्य नहीं है कहते हैं आलोक पुराणिक
एक सोच का दॄष्टिकोण है, हम भी हुए सोच कर ही चित

ई पंडित जी ने खोले हैं नये ज्ञान के नूतन पोथे
गर्दिश में भी रहा दीप्तिमय, वो बस एक चरागे दिल है
दिल का दर्पण सिखलाता है नये पाठ कुछ नई विधा में
गीतकलश में जो भी कुछ है, एक तुझी पर आधारित है

नारद पर कुछ पूरा दिखता नहीं न जाने क्या कारण है
न समीर का चिट्ठा दिखता नहीं दिखे हैं रवि रतलामी
ये है निश्चित सभी लिख रहे, सोषी संभव मेरी नजर है
चलो हो चुकी चर्चा अब स्वीकारो मेरी एक सलामी

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