जिस चिट्ठाकार के प्रोफ़ाइल में दर्शित फोटू पर ये लिखा हो – चेहरा फर्क करने का माध्यम है, पहचानने का नहीं, तो उस फोटू को भले न सही, उस ब्लॉग को और उस ब्लॉग की प्रविष्टियों को जरा ध्यान से देखने की इच्छा तो होगी ही.
तो, जरा ध्यान से इस ब्लॉग की प्रविष्टियों को देखिए. आपको निराशा नहीं होगी. सार्थक और नायाब लेखन की नई परिभाषा मिलेगी यहाँ. मनीष वैसे तो 2008 से हिन्दी चिट्ठे लिखते रहे हैं, मगर बीच में 2009 में वे अक्रिय से रहे. अभी पिछले दो एक महीने से वे फिर से सक्रिय हुए हैं. उनके लेखन के बारे में उनके एक पाठक का कहना है -
“अदभुत लिख रहे हो भाई ! विस्मित हूँ !कैसे नहीं पहुँचा इस ठौर अब तक, कोस रहा हूँ खुद को ! नियमित यात्री हुआ इधर का !”
एक और पाठक का कहना है -
“मित्र,मुझे आपके प्रत्येक लेख का बड़ी बेसब्री से इन्तज़ार रहता है। आपके लेख चाहे जैसे रहें उनमे हास्य का पुट अवश्य रहता है।परन्तु आपके कुछ लेखो की मार्मिकता को समझ के आँखे नम हो गयी। आप से एक गुजारिश है,आप अपने ब्लोग पर हमेशा लिखते रहिये,हमेशा!”
इनके एक लेख पर यह एक और टिप्पणी -
“सत्य वचन सुन स्वभाविक खीझ को इससे बेहतर शायद ही कोई व्यक्त कर पाये. आप महान हैं…शब्दों के चितेरे हैं.
साहित्यजगत आपको याद रखेगा भले ही आज के बाद आप एक भी शब्द न लिखें. ”
तारीफ की एक और पंक्ति -
“शुक्रिया एक सच को बेहद सवेंदनशील तरीके से रूबरू कराने के लिये …..आपकी लेखनी में दम है ..ओर किस्सागोई का अंदाज भी…अब आना जाना लगा रहेगा…..”
वैसे तो मनीष की तमाम पोस्टें पठनीय हैं और सभी एक से बढ़कर हैं. मस्ती की पाठशाला जरूर पढ़ें, जिसके लिए यह कहा गया है कि उस पोस्ट को समझने के लिए पाठक को 12 वीं तक गणित पढ़ा होना आवश्यक है. परंतु मेरा विचार है कि यदि पाठक गण 10 वीं तक भी गणित पढ़े हों, तब भी वे इसे समझ सकते हैं.
मनीष की एक कहानी “अछूत” विशेष रूप से, साभार, यहाँ चिपकाना चाहूंगा -
आसमान पर कुछ सफ़ेद बादल धीमी गति से तैर रहे थे । धीमी हवा कभी कभी मेरे बालों को उड़ा देती । सूरज एक बादल की आड़ मे छिपा बैठा था और उस उड़ते बादल की छाया धीरे धीरे मुझसे दूर टीले की तरफ़ भागी जा रही थी । मैं भी उस टीले की तरफ़ अपने बचपन के साथी संदीप के साथ जा रहा था । छुटपन मे हम लोग इसी टीले के उस पार मल विसर्जन किया करते थे । कई वर्ष बाद उससे मुलाक़ात हुई तो हमने पुराने दिनों की याद ताज़ा करने हेतु व्यर्थ भ्रमण करने का विचार बनाया था और पहला गंतव्य इस टीले को चुना गया ।
हम दोनों चुपचाप टीले की तरफ़ चले जा रहे थे ।
कुछ ही देर में हम टीले के करीब थे । टीला वैसे ही डरावना लग रहा था जैसा कि बचपन में लगता था । मैनें टीले पर चढ़ते ही नाग की बिल की तरफ़ देखा और चुप्पी तोड़ते हुए संदीप से पूछा –
“ कालिया है”
“ नहीं !! कुछ साल पहले गाँव वालों ने मार दिया”
संदीप ने हल्के स्वरों में ज़वाब दिया ।
“क्यों ???”
“ठाकुर साहब को दौड़ा लिया था , बस मार दिया”
“ये ठाकुर साहब कहाँ से पैदा हो गया ,ये कौन है???”
“ अरे वही लँगड़ा का पूत ……स्साला……”
एक भद्दी गाली उसके मुँह से निकली । और तुरंत ही चुप हो गया ।
हम लोग टीले पर चढ़ चुके थे । हवा कुछ तेजी से बहने लगी थी और मेरे बाल बिखर से गये । सरपतों के झुंड चारों तरफ़ फैले थे और हवा के वेग से झुक जा रहे थे । उन्हीं के बीच एक सियार दुबका बैठा था । साँप की दो तीन केचुल छोटी घास पर पड़ी हिल रही थी । छुटपन मे इन्ही को देखकर मैं जोर से भागने लगता था लेकिन आज धीमे कदमों से चलते हुए मुस्कुरा रहा था ।
टीले की पगडंडियों से होते हुए हम कटीली झाड़ियों तक आ गये थे जहाँ एक बड़ा सा बबूल का पेड़ था जिसके तने से एक चिपचिपा पदार्थ निकलता था जिसे हम लोग च्यूंइगम की तरह चबाते थे और सामने ही टीले के नीचे पौहारी बाबा के ट्यूबवेल का खंडहर था । मैने संदीप से वहां जाने की इच्छा जताई ।
संदीप सरपतों के झुंड से होता हुआ ,घनी झाड़ियों मे सरकता चला गया । टीले की ढाल इस तरफ़ कुछ ज्यादा थी। मैं भी सरपतों को पकड़ता हुआ धीरे धीरे नीचे चला आया। टीले के इस पार नीरवता छाई थी बिल्कुल शान्त !
कुछ ही दूरी पर पौहारी बाबा के ट्यूबवेल का खंडहर था और पास मे ही एक घनी छांह वाला नीम का पुराना पेड़ जिसे पौहारी बाबा के पिता ने लगाया था और उसके चारों तरफ़ सीमेंट का चबूतरा बाबा ने बनवाया था । समय के साथ यह भी बिल्कुल बिखर सा गया था । मैं चुपचाप वहाँ जाकर बैठ गया लेकिन संदीप कुछ बेचैनी से यहाँ वहाँ टहल रहा था । मैने उसे बुलाते हुए कहा –
“आ जाओ भाई ,कुछ सुस्ता लिया जाये । गाँव से काफ़ी दूर आ गये हैं”
वह चुपचाप आकर बगल में बैठ गया
सामने से आती मैदानी हवाएं कुछ अच्छी लग रही थी । दूर – दूर तक वीरानियाँ फ़ैली थी सब कुछ शांत, केवल दर्जन भर खड़े पेड़ों की पत्तियाँ हवा के साथ संगीत बिखेर रही थी ।
दूर कुछ धूमिल सी दिखती कुछ झाड़ियॉ दिखी , और मैने उत्सुकता वश बगल में बैठे संदीप से पूछ लिया –
“पोखरा मे पानी है”
“हाँ लेकिन अब कोई वहाँ जाता नहीं” ,
“तो पहले ही वहाँ कौन जाता था!!” मैने उबासी लेते हुए कहा ।
वह फ़िर चुप हो गया ।
बचपन मे हम लोग चोरी छिपे इस तरफ़ बहुत आया करते थे , लेकिन गांव वाले इधर झाँकने भी न आते थे क्योकि यह साँप प्रधान क्षेत्र था , और कालिया जैसा खतरनाक साँप इस क्षेत्र की रखवाली करता था । इसके बावजूद हम इधर आते और प्रकृति के सौन्दर्य को निहारते । घनी झाड़ियों से घिरे उस पोखरे का पानी पीते और सारा दिन इमली और आम तोड़ कर खाते । कुछ लोग कहते थे कि पोखरे के पास एक चुड़ैल है । लेकिन हमने तो आज तक नहीं देखी ।
कही से फ़ूलों की गंध आ रही थी । बगल में लाल बड़ी चींटियों की कतार पेड़ पर जा रही थी और मेरी नज़र दूर उस पोखरे की तरफ टिकी थी एक याद का साया अचानक तैर सा गया और एक लालिमा लिये गोरा सा चेहरा आँखो के सामने आ गया। वह पुष्पा ही तो थी …
हवा कुछ अधिक तेज बहने लगी थी । पेड़ों की पत्तियाँ कुछ ज्यादा आवाज करने लगी थीं । आसमान में अब भी सफेद बादल तैर रहे थे, लेकिन अब कुछ गिद्ध बादलों के पास मडरा रहे थे , और पुष्पा मेरे इर्द गिर्द ।
उस दिन भी सफ़ेद फ़ाहे जैसे बादल तैर रहे थे और गिद्ध ऊँची उड़ान भर रहे थे, जब पोखरे पर मेरी आँखें पुष्पा के नंगे बदन को देख अचानक बन्द हो गयी थी।
लेकिन बन्द होने से पहले आँखों ने बहुत कुछ देख लिया था, जिसमें शर्म के मारे लाल हुई पुष्पा का चेहरा भी था। शर्मा तो मैं भी गया था, आखिर वह अचानक ही तो वह पानी से बाहर निकली थी, और अचानक ही मैं झाड़ियों से अन्दर पोखरे पर गया था। सब कुछ अचानक ही तो हुआ था। वह जड़वत वही खड़ी रही और मैं आखें बन्द किये खड़ा रहा। आँखें तो बन्द ही थी लेकिन वह दृश्य अभी तक सामने था, साँस फूल रही थी और आँखें खुलने का प्रयास कर रहीं थीं।
कानों ने कुछ सुना शायद पहली बार उस आवाज ने मेरे कानों को चूमा था, उसकी आँखें तो कई बार मेरी आँखो को चूमी थीं, शायद आवाज का चूमना अभी शेष था। लेकिन कानों ने जो सुना उसे सुन आँखें खुल गयी और वह दृश्य एक बार फिर दोहरा उठा। उसके कपड़े मेरे पीछे एक कँटीली झाड़ी पर फैले थे। जिसे मागने के लिये उस आवाज ने कानों पर दस्तक दी थी।
मैं अपने आप को असहज महसूस कर रहा था लेकिन फिर भी मैने उसके कपड़े झाड़ियों से उतार कर उसके करीब पहुँचा। वह अपनी आँखें ज़मीन पर गड़ाये सिमटी जा रही थी। कपड़े देते ही मेरे कदम तेजी से वापस मुड़ गये, और झाड़ी से बाहर आकर ठिठक गये। मुझे लगा था कि माफी मागना जरूरी है।
कुछ देर बाद वह कपड़ों से लिपटी बाहर आ गयी और मुझे वही खड़ा देख तेज रफ्तार से टीले की तरफ जाने लगी। मैने उसे रोका था और अटकते हुए कहा था “गलती से…”
वह हल्की सी मुस्कुराई थी और बोली “गलती कैसी, ये किसी का घर थोड़े ही है……”
और उसके शब्द बढ़ते गये उन शब्दों मे असलियत थी एक लाचारी थी, एक संवेदना थी…
उस रोज पता चला कि निम्नवर्ग की औरतें, लड़कियाँ बाहर खुले में कैसे नहा लेती हैं शायद यही कारण था कि वह गांव से इतनी दूर इस एकान्त में आई थी।
उसके शब्द समाप्त हो गये थे और मेरे पास कुछ न शेष था लेकिन उसके शब्दों ने मेरे सम्मान को वापस लौटा दिया। जाते हुए उसने अपने आप को अछूत कह गयी। और मैं देर तक वहीँ खड़ा झाड़ियों मे उलझता रहा।
उस दिन को गुजरे एक अरसा बीत गया। लेकिन मेरी निगाहें उन्हीं झाड़ियों में अटकी थी शायद पुष्पा को ढूँढना चाहती थी, उसी रूप में……
लेकिन शायद वह फिर न दिख सकेगी क्योंकि वह अदृश्य रूप में वहाँ नहा रही होगी या हो सकता है कि वह पोखरे वाली चुड़ैल की सहेली बन गयी हो। क्योंकि अब पुष्पा नही रही। गाँव के कुछ सवर्णों के कपूतों ने एक दिन पोखरे पर उसकी अस्मत लूट ली थी और पोखरे के पानी में उसे डुबोकर मार डाला। कई दिन तक वह पानी में नहाती रही। सियार उसे पानी से बाहर खींच लाये थे और मरने के बाद भी उसे लूट रहे थे। कौवे स्तनों पर चोंच मार रहे थे। इन सबसे बेखबर पुष्पा हवाओं मे तैर रही थी।
शायद उसकी चींखें इस वीरानें ने अपनी यादों मे रख लिया होगा, तभी तो आज भी वहाँ मनहूस खामोशी छाई हुई है।
मैं अपनी जगह से उठा और उस पुराने पोखरे की तरफ चल पड़ा।
एकाएक एक तेज हवा का झोंका उस तरफ बह चला। शायद पुष्पा आज भी उन्हीं झाड़ियों के बीच नग्न होकर सिसक रही है।
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पिछले कुछ समय से नॉलेज प्रोसेस आउटसोर्सिग यानी केपीओ के प्रति शिक्षित युवा वर्ग की रुचि काफी बढ़ी है। एक रिपोर्ट में वर्ष 2010 तक ग्लोबल केपीओ सेक्टर में भारत की हिस्सेदारी 71 प्रतिशत तक होने का अनुमान लगाया गया है। भारत की पहचान ग्लोबल स्तर पर ‘नॉलेज हब’ के रूप में उभर कर सामने आई है। इन्हीं सब विषयों के प्रति एक रोचक आलेख लेकर आए हैं हमारे शिक्षा मित्र और समझा रहे हैं
वैज्ञानिक निरन्तर इस खोज में रहे हैं कि वो सोमरस की जडी बूटी कहाँ मिले, जिसकी वेदों नें बडी भारी प्रशंसा की है। यदि ऋचाओं की संख्या को ध्यान में रखें तो इन्द्र के बाद सोम पर ही सबसे अधिक ऋचाएं कहीं गई हैं।
गूगल ब्लॉगर साथियों को
स्मार्ट इंडियन (आपको 
ठंडे घरों में करता पसीने का वो हिसाब,
‘‘ऋ’’ से हैं वह ऋषि, जो सुधारे जगत। 

एक बेहतरीन 

इस स्थल की यात्रा में प्रकृति हर कदम पर बिल्कुल नए रंग दिखाती रहती है। कहीं पर पहाड़ बहुत हरे भरे तो कहीं पर बस पत्थर की बनावट सी प्रतीत होती ।
अदा जी प्रस्तुत कर रहीं हैं