रविवार, जुलाई 04, 2010

यही तो है असली ब्लॉगिंग…

असली ब्लॉगिंग के अपनी तरह के सैकड़ों, वाजिब उदाहरण हो सकते हैं. एक उदाहरण आपके सामने पेश है.

सिंह सदन नाम का एक घर है. उस घर के सदस्यों का एक ब्लॉग है – सिंह सदन – ए हट अंडर द स्काई. इस ब्लॉग की पहली पोस्ट इब्तिदा  10 अप्रैल 2010 को प्रकाशित की गई थी -

इब्तिदा.........!

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सिंह सदन का होम ब्लॉग “सिंह सदन -ए हट अंडर द स्काई” शुरू हो गया है...........इस ब्लॉग के ज़रिये हम आपको ‘सिंह सदन से’ जुडी हरचीज को सामने लेन का प्रयास करेंगे ..........यह एक सहकारी प्रयास होगा जिसमें परिवार के अधिकाधिक सदस्य जुड़ेंगे..........तो ब्लॉग पर सिंह-सदन से जुडी हरगतिविधि और व्यक्ति का तार्रुफ़ करने का जिम्मा भी इसी घर के सदयों को ही लेना था......यह जिम्मेदारी घर के लोगों ने ली भी है। सभी ने अपने अपने रूचि के क्षेत्रों को चुना है, पूरे मन से उस कलम को लिखने का प्रयास भी किया है .......! सभी सदस्यों ने जिन विषयों पर जिन शीर्षकों के अंतर्गत लिखने का जिम्मा उठाया है.....उसे मैं ब्रीफ किये देता हूँ....

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इसके बाद सबने अपना जिम्मा ले लिया और नियमित पोस्टों का सिलसिला शुरू हो गया. फिर तो घर-परिवार के व्यक्तियों पर केंद्रित बेहद मर्मस्पर्शी पोस्टें आने लगीं. कुछ पाठकों की नजर में ये बेहद व्यक्तिगत और निजी हो सकती हैं, मगर, फिर, यही तो है असली ब्लॉगिंग.

दादी माँ पर एक पोस्ट है – वेल डन अम्मा.

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“सिंह सदन की खूबसूरती और क़ाबलियत हमारी अम्मा की दुआओं से ही महफूज़ है.अम्मा घर और कुनबे में सबसे बड़ी हैं .घर के पुरुष और महिलाओं पर अम्मा का रसूख साफ देखा जा सकता है .

घर के बच्चों के लिए अम्मा सबसे खूबसूरत चीज़ हैं.घर के बच्चे उनके दीवाने हैं .अम्मा भी बच्चों पर जान छिड़कती हैं.मजाल है कि अम्मा की मौजूदगी में भला कोई बच्चों को तिरछी नजर देख भी ले....बच्चे कितनी भी शैतानी करें अम्मा के रहते सब माफ़.अम्मा घर पर हों तो हर बच्चा उनके पास सोना चाहता है. इस पर बच्चों में जंग भी छिड़ जाती है...लेकिन अम्मा सब सम्भाल लेती हैं. घर में अम्मा का मैं सबसे चहेता हूँ. मैं भी उनको बहुत प्यार करता हूँ........उनसे जुड़े कई संस्मरण है जो आज भी जेहन में तारो-ताज़ा हैं.

अम्मा की बौद्धिक क्षमता का मैं बचपन से ही कयाल हूँ. अम्मा ने इन अस्सी सालों में हर रिश्ता जिया है....जीवन के बहुत से उतार-चढ़ाव देखे हैं. सबमें अम्मा सफल नज़र आती हैं. घर में उनकी स्थिति अंग्रेजी लेखक रस्किन बोंड की कहानियों में "बरगद के पेड़" की तरह है. बदलते दौर में भी अम्मा सब पर भारी नजर आती हैं. अम्मा हर उम्र के बीच चुटकी में सेट हो जाती हैं. एक बार मैं सूफी संत बुल्ले शाह का सूफियाना कलाम सुन रहा था. कलाम मुल्तानी पंजाबी में था. सुनते ही अम्मा ने उसके मायने मुझे समझाए. मैं उनकी इस क़ाबलियत पर दंग रह गया…..” >>> आगे पढ़ें

एक पोस्ट पिता जी पर समर्पित है – पापा तुस्सी ग्रेट हो.

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“मैंने लोगों को कई तरेह के शौक रखते हुए देखा है...लेकिन काम करने का शौक मैंने पापा में ही देखा है......उत्तर प्रदेश पुलिस सेवा में उनको तीस साल से ज्यादा समय हो गया है.कहा जाए तो पूरी जिन्दगी उन्होंने नोकरी ही की....उनको देख कर लगता है जैसे पुलिस की नोकरी पापा जैसे लोगों के लिए ही बनायीं गयी है.वे चोबीस घंटे काम कर सकते है....और करते भी है.....नोकरी करते करते उनको मालूम ही नहीं पड़ा की हम चार भाई कब बड़े हो गए......पापा को नोकरी करते देख हम लोग बड़े हुए.....पापा बेहद कर्तव्य निष्ठ है....काम और नौकरी से उन्होंने कभी बेमानी नहीं की...ये गुण हम भाइयों को खून में मिला....पापा नौकरी में सफल है....''कसौली''जहां पापा पैदा हुए.कसौली आज भी मैनपुरी के पिछड़े गावं में शुमार है....पापा का बचपन इसी गावं में बीता.पापा को बचपन से है पढने का शौक था.सो पापा ने पढने के लिए मजदूरी भी की.गावं के ही पास बने एक भट्टे पर रोज़ पढाई से फुरसत पाने के बाद कड़ी मेहनत करते और उससे जो पैसा मिलता.पढाई पर खर्च करते.घर में पैसों के आभाव में पांच भाइयों में सिर्फ पापा ही पढाई पूरी कर सके.बचपन के पढाई पूरी करने के लिए पापा सिरसागंज आ गए.यहाँ रह कर पापा ने कृषि विज्ञान की पढाई पूरी की.पापा की शादी चुकीं 15 -16 की उम्र में ही हो गयी थी.सो घर का खर्चा चलने के लिए पापा ने बच्चों की टयूशन देना का काम शुरू किया.इसी दौरान मैनपुरी से पुलिस की नौकरी निकली तो पापा ने फ़ौरन इसके लिए एप्लाई कर दिया...18 साल की उम्र में पापा पुलिस में आ गये.इसके बाद पापा ने नौकरी में कभी पीछे मुड के नहीं देखा,,,,सिपाही से ''डी वाई एसपी ''तक का सफर उन्होंने कब पूरा कर लिया पता ही नहीं चला.सरकारी नौकरी...खास तौर पर पुलिस सेवा में यहाँ तक आना फर्श से अर्श तक पहुचने जैसा है.पापा नेहम चारों भाइयों की तालीम पर खास ध्यान दिया,जिसका नतीजा ये रहा की हम भाइयों को नौकरी के लिए खास स्ट्रगल नहीं करना पड़ा.मुझे खूब याद है जब पापा रात में गश्त करके वापिस घर आते थे तो बड़े भैया को उठा कर रात में ही पढ़ना शुरू कर देते थे...” >>> आगे पढ़ें

माँ पर भी कीबोर्ड खटकाई गई है – माँ तुझे सलाम!

“ईश्वर का वरदान है माँ
हम बच्चों की जान है माँ
मेरी नींदों का सपना माँ
तुम बिन कौन है अपना माँ
कभी भाई, कभी बहन, कभी पिता बन जाती माँ
ग़र ज़रूरत पडे तो दुर्गा भी बन जाती माँ
ऐ ईश्वर धन्यवाद है तेरा दी मुझे जो ऐसी माँ
है विनती एक यही तुमसे हर बार बने ये हमारी माँ
***प्रभाकर माचवे

imageप्रभाकर माचवे की यह कविता मुझे बरबस ही याद आ जाती है जब में माँ को याद करता हूँ...... सच कहूं तो ''माँ''.......... एक ऐसा मोहक बंधन है .... एक ऐसी प्यारी भावना है .... शब्दों में बाँध पाना जिसे संभव नहीं.. हम ईश्वर को धन्यवाद देते हैं की उसने न केवल हमे माँ दी.. वरन ऐसी माँ दी जिसने अपने वात्सल्य , स्नेह, प्रेम और संरक्षण से हर पल हमें तराशा... हमे जिंदगी से मुकाबला करना सिखाया...मूल्यों और नैतिकता का पाठ न केवल लगातार पढ़ाया , बल्कि उसे अच्छी तरह रटाया... आज हम सभी भाई ज़िन्दगी में जो भी कुछ जाने हैं... सीखे हैं...किसी लायक हो पाए हैं .....सब हमारी माँ की दुआओं .. उनकी रात दिन की प्रार्थनाओं का ही असर है !

 

हम भाईओं को पालने में उन्होंने अपनी हस्ती मिटा दी ...पूरी जिंदगी उन्होंने कोई शौक नहीं किये... कोई फरमाइश नहीं की ...जो भी थोडा बहुत पैसा पिताजी अपनी नौकरी में देते रहे ..... एक-एक पैसा बचाकर उन्होंने उसे घर की ...... बच्चों की बेहतरी में लगा दिया... उन्होंने घर, परिवार, समाज में बड़ी मुश्किलों का सामना किया और अर्जुन की तरह एक ही लक्ष्य बनाकर बच्चों की परवरिश में लगी रही........ उनकी तमाम कुर्बानिओं ने मेरी रूह पर कितना असर डाला है ...... मैं बता नहीं सकता..!

घर-परिवार की परवरिश में पिताजी उनको बहुत समय न दे सके...... सो बिना घबराये माँ ने अकेले ही मोर्चा संभाल लिया........हालात ने उन्हें कई बार बेज़ार कर के रख दिया पर हिम्मत नहीं हारी...”>> आगे पढ़ें

अब बारी माँ की है… माँ ने अपने बच्चे के लिए लिखा – माता श्री की कलम से.

“मंझले सुपुत्र....

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बड़े बेटे पर लिखी गयी पोस्ट के उपरान्त यह मेरी दूसरी पोस्ट है । इस बार भी मैं अपने बच्चों के ऊपर पोस्ट लिख रही हूँ । चूँकि पिछली पोस्ट में मैंने बताया था कि मेरे चार पुत्र हैं । इसी क्रम में यह पोस्ट मेरे दूसरे बेटे पंकज के ऊपर है ।

पंकज... पवन से छोटे हैं... ओर इस समय वे ''सेल्स टेक्स कमिश्नर'' के पद पर कार्य रत हैं । उनकी कुछ विशेषताओं को मैं यहाँ बताना चाहूंगी ।

वे अपने नाम की तरह पुष्पित एवं पल्लवित हैं । वे ऊँची कद काठी के हैं । वे शांति प्रिय हैं । वे आध्यात्म से जुड़े हैं । उन्हें मीठे भोजन बहुत पसंद हैं । उनको सफाई और घर का सामान यथा स्थान लगाना पसंद है । समय का अभाव होने पर भी वे ज्यादा से ज्यादा वक़्त मुझे देते हैं और विहार व्यक्त करते हैं । उनके यहाँ मुझे बहुत शांति मिलती है । वो भीष्म पितामाह जैसे दृढ़ प्रतिज्ञ हैं, जो मन में ठान लें, कर दिखाते हैं । जब वो मुझे ''माते'' कहकर पुकारते हैं... तो मैं अपने आपको धन्य समझती हूँ । इश्वर में उनकी आस्था को देखकर मुझे एक चौपाई याद आती हैं । जो माँ सुमित्रा ने लक्ष्मण के लिए कही थी .......

पुत्रवती युवती जग सोई ।
रघुपति भगत जासु सुत होई ।।

ऐसे बच्चों का होना वास्तव में गर्व की बात है पर मै इसको प्रभू की कृपा समझती हूँ उनकी कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं है निसंदेह पंकज बहुत भावुक किस्म के हैं वे बाहर से नारियल की तरह कठोर लगते हैं जबकि वे अन्दर से बेहद नरम हैं….” >> आगे पढ़ें

सिंह सदन में और भी बहुत कुछ है. स्टाइलिश फैमिली से लेकर सास-बहू तक. 30 जून 2010 को सिंह सदन का मासिक बुलेटिन भी प्रकाशित हुआ -

“माह : जून 2010

1. ''सिंह सदन'' के लिए जून का बेहद गर्म माह भी खासा गहमा - गहमी भरा रहा ! ''होम ब्लॉग'' की सक्रियता ने पुराने सभी रिकार्ड ध्वस्त कर डाले ! एक ही माह में ''गोल्डन जुबली'' .... यानि एक ही माह में ५० पोस्ट ....और इस तरह जून माह इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गया है !

....इस शानदार कामयाबी के लिए मैं सभी सुधी लेखकों .... माता श्री.... भैया.... अंजू भाभी ....हृदेश सिंह ''जोनी'' ... पुष्पेन्द्र सिंह ''पिंटू'' ... प्रिया ... अमित ''चिंटू'' ... संदीप ... नेहा सिंह ''बिटिया'' को बहुत बहुत मुबारक बाद देता हूँ !…”

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इस ब्लॉगर परिवार की खुशियों में आप भी शामिल होना चाहते हैं? तो फिर देर किस बात की?  सिंह सदन – ए हट अंडर द स्काई के मेहमान बन जाइए!

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शनिवार, जुलाई 03, 2010

शनिवार (03.07.2010) की चर्चा

 

 

My Photoओढ़कर छतरी चला था
मोह में मैं पड़ा था
मुझसे मेरा मैं बड़ा था
मैं न भीगा .... मैं न भीगा .... मैं न भीगा।

ये बेचैन आत्मा की छटपटाहट है जो जीवन के भोगे हुए यथार्थ को शब्दों में पिरो कर जीवन दर्शन का एक सुन्दर चित्रण प्रस्तुत कर रहा हैं।

इक समुंदर बह रहा था
एक कतरा पी न पाया
उम्र लम्बी चाहता था
एक लम्हा जी न पाया

आदमी खामख्वाह तरह तरह के बंधनों में बंधा रहता है। बेबसी , मजबूरी और सीमाएं हाथ रोक देती हैं, पैरों को पकड़ लेती हैं, आगे बढने से। झूठे अहंकार में दबा रहता है इन्सान। भूल जाता है कि दुनिया कितनी खूबसूरत भी है।

तोड़ लाऊँ
एक बादल
औ. निचोड़ूँ सर पे अपने
भीग जाऊँ
डूब जाऊँ....
हाय लेकिन मैं न भीगा !
बहुत सुन्दर बिम्ब दिया है! एक सच्चे, ईमानदार कवि के मनोभावों का वर्णन।

सोचता ही रह गया
देखता ही रह गया
फेंकनी थी छतरिया
ओढ़ता ही रह गया

इस कविता के भाव इतने स्पष्ट हैं कि वे कल्पना के अनंत गर्भ में लीन हो गये हैं। आपकी इस रचना में मानव / प्रकृति के सूक्ष्म किंतु व्यक्त सौंदर्य में आध्यात्मिक छाप है। अपने मन की सच्ची बातें कवि सीधे-सीधे अपने ही मुख से उत्तम पुरुष में कह रहा है और पाठक को इस तरह उन भावों के साथ तादातम्य अनुभव करने में बड़ी सुगमता होती है।

तेरा ख्याल .......

My Photoहरकीरत ' हीर' कहती हैं कि वो हैरान थी ....रंगों ने पानी में कई सारी चूड़ियां सी बना रखी थीं ....उन्होंने छुआ तो हाथों को राह मिल गई ....ख्यालों ने रंगों की चूड़ियां पहनी और बदन खिल उठा ....उन्होंने ऊपर देखा ....सामने वही परिंदा था जिसे रात उन्होंने मुक्त किया था .....उन्हें देख मुस्कुराने लगा....उन्होंने उसे कलाइयों की चूड़ियां दिखलायीं ....वह चहकने लगा ....ख्वाबों ने कई साज़ तरन्नुम भरे छेड़ दिए .....रब्ब ने इक खामोशनदी में मोहब्बत का पत्थर फेंका .....इश्क़ ने धड़कना सीख लिया ...बस ये ख्याल थे जो एक-एक कर सामने आते रहे ...... और क्षणिकाओं में इन्हीं ख़्यालों को उन्होंने पिरो दिया।
तेरा ख्याल
कभी रुकता नहीं
मानसून के मिजाज़ सा
वक़्त बे वक़्त बेखौफ
भिगोने चला आता है
तेरा ख्याल .....!!

(२)

सड़क के किनारे लगे
बैनर , पोस्टरों से
इशारे करता है तेरा ख्याल
झिड़क देती हूँ तो
बड़ा मासूम सा .....
किसी लैम्प पोस्ट के नीचे
जा खड़ा होता है
तेरा ख्याल .......!!

(३)

बिखरे हुए शब्दों से
अभी-अभी नज़्म बन
उतर आया है तेरा ख्याल
जरा सा छूती हूँ तो ....
गीत बन गुनगुनाने लगता है
तेरा ख्याल .......!!

शब्दहीन कर दिया है आपकी इस बेहतरीन रचना ने...ख्याल आने के एक से बेहतर एक मंज़र खींचे हैं आपने!

अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक – सस्ती कार बनाम महंगी दाल

सम्वेदना के स्वर पर यह आलेख पढकर मुझे लगा आज इनका स्वर कुछ बदला-बदला सा है। पहला परिवर्तन तो फोटो में था। अब और पहले की तस्वीर नीचे है।

My Photo

फिर रचना के तेवर पर ध्यान गया। ये स्वर कहते हैं इतिहास गवाह है कि इस धर्म-निरपेक्ष भारत में कथित आज़ादी के बाद से ही धार्मिक अल्प-संख्यक और बहु-संख्यक का एक छद्म युध्द जारी है. छद्म इसलिये कि इसकी आड़ में देश के असली अल्प-संख्यक और बहु-संख्यक पार्श्व में चले जाते हैं और मंच पर धर्मान्धता का राजनैतिक खेल चलता रहता है. हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान भारत और इण्डिया दिखाई देते हैं। ये विभाजन अमीर से और अमीर तथा गरीब से और ग़रीब होने वाले समाज का विभाजन है। जहाँ इंडिया के लिए बनी कार सस्ती होकर लखटकिया भर रह गई है, वहीं दाल रु.100 प्रति किलो होकर भारत के मुँह से निवाला छीन रही है। विकास और महंगाई की इस दौड़ में, विकास का मजा अल्पसंख्यक इंडिया ले रहा है और महंगाई की मार बेचारा बहुसंख्यक भारत झेल रहा है।

इसको पढ़ने के बाद लगा क कुछ चिनगारियां निकलीं और उत्तेजित करके चली गईं। इस आलेख में वर्तमान व्यवस्था के प्रति लेखक की बेचैनियां और राजनीतिक वर्चस्वों के प्रति गुस्सा, क्षोभ और असहमति का इज़हार बड़ी सशक्तता के साथ प्रकट होता है।

जीवन............

My PhotoRhythm of words... पर Parul की प्रस्तुति मुझे यह कहने पर विवश कर गई कि संवेदना की भाषा और अभिव्यक्ति की भाषा के बीच एक अन्तराल है। संवेदना के स्तर पर जी लेने के बाद ही लिखने की बारी आती है, पहले नहीं। लिखने के लिए थोड़ा पीछे मुड़ना पड़ता है। और पीछे मुड़्ने पर पारुल को बचपन याद आता है, और वो दिन याद आते हैं

बस आज फिर यूँ ही वो बचपन याद आया
किसी मासूम सी जिद पे सिसकता मन याद आया!!
कैसे जिए वो पल अपने ही ढंग में
रंग लिया था जिन्दगी को जैसे अपने ही रंग में
आज देखा जो खुद को, वो सब याद करके
ऐसा लगा कोई भूला सा दर्पण याद आया!!
वो रंग-बिरंगी सी सपनों की किश्ती
वो भूली सी रिमझिम की भोली सी मस्ती
कहाँ छोड़ आया वो मिटटी के खिलोने
परियों की कहानियों से अपनापन याद आया!!
पलता हर पन्ना, जिंदगी थी कोरी
मन की कडवाहट में गुपचुप थी लोरी
मैं खोज रहा था जब अपने जीवन का आकार
तो मुझको बस वो हाथ का 'कंगन' याद आया!!

मानवीय संवेदना की आंध में सिंधी हुई ये कविता हमें मानवीय रिश्ते की गर्माहट प्रदान करती है।

नारद मुनि

मेरा फोटोधर्म संसार पर Nilabh Verma की गहरे विचारों से परिपूर्ण यह प्रस्तुति हमें बताती है कि नारद मुनि, हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रो मे से एक है। उन्होने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया है। वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों मे से एक माने जाते है।

किंतु साथ ही वे यह भी बताते हैं कि आजकल धार्मिक चलचित्रों और धारावाहिकों में नारदजी का जैसा चरित्र-चित्रण हो रहा है, वह देवर्षि की महानता के सामने एकदम बौना है। नारदजी के पात्र को जिस प्रकार से प्रस्तुत किया जा रहा है, उससे आम आदमी में उनकी छवि लडा़ई-झगडा़ करवाने वाले व्यक्ति अथवा विदूषक की बन गई है। यह उनके प्रकाण्ड पांडित्य एवं विराट व्यक्तित्व के प्रति सरासर अन्याय है।

नारद जी का उपहास उडाने वाले श्रीहरि के इन अंशावतार की अवमानना के दोषी है। भगवान की अधिकांश लीलाओं में नारदजी उनके अनन्य सहयोगी बने हैं। वे भगवान के पार्षद होने के साथ देवताओं के प्रवक्ता भी हैं। नारदजी वस्तुत: सही मायनों में देवर्षि हैं।

चरमराकर गिरते हुए पेड़ों को देख कर अचानक यूँ महसूस हुआ मानो किसी ने ज़मीन का ज़बरन गर्भपात करवा दिया हो-क्या इनमें भी कन्या भ्रूण-हत्या का चलन है या हिन्दू के हाथ से बोये पौधे ने किसी मुस्लिम के हाथ से बोये पेड़ को नफ़रत की बलि चढ़ा दिया है?
इन पंक्तियों ने मुझे रुककर इस आलेख को पढने पर, बार-बार पढने पर मज़बूर किया।

मेरे पड़ौसी - पेड़, परिंदे और पुलिस

My Photo' हया ' पर लता 'हया' बता रही हैं कि मेरे घर के ठीक सामने अनगिनत हरे-भरे पेड़ों का झुरमुट है. ख़ाली पड़ी ज़मीन पर क़ब्ज़ा जमाये ये पेड़ पिछले दस सालों में मेरी आँखों के सामने जवान हुए हैं. पर उसकी आज की हक़ीक़त बताते हुए कहती हैं कि धू-धू जलते हुए उन पेड़ों के शवों को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे किसी नव यौवना को दहेज की आग में जला दिया गया हो. सच है ये जो इंसानियत का पेड़ कटता जा रहा है ; मोहब्बत के परिंदे छटपटा रहे हैं-रिश्तों का पर्यावरण ही प्रदूषित होता जा रहा है-उसको रोकने का कोई उपाय है हमारे पास? बात को ग़ज़ल के ज़रिए वो और स्पष्ट करती हैं।

क्यूँ बुलडोज़र मंगाए जा रहे हैं

शजर क्यूँ फिर गिराए जा रहे हैं

इन्हें कटता हुआ यूँ देख कर के

परिंदे तिलमिलाए जा रहे हैं

एक सच्चा फ़नकार कितना संवेदनशील होता है, यह आपकी इस ग़ज़ल से साबित हो रहा है। प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जागरुकता के साथ आपकी संवेदनाएं सहज ही प्रभावित करने वाली हैं।

दिन हरजाई

My Photoकुछ कहानियाँ,कुछ नज्में पर Sonal Rastogi

कुछ तन्हाई
एक रजाई
बदन तोडती
एक अंगडाई
ठन्डे हाँथ
तपती साँसे
अंगीठी से
गायब गरमाई
मौन मुखर
मुखरित आँखे
मौन अधर
मुखरित जम्हाई
सहज नेह
असहज हो तुम
असहजता को
दे आज बिदाई
रात ढली
तुम आये
जल्दी ढलता
दिन हरजाई

शब्दों में बेहतरीन प्रवाह..इस कविता की अलग मुद्रा है, अलग तरह का संगीत, जिसमें कविता की लय तानपुरा की तरह लगातार बजती रहती है । अद्भुत मुग्ध करने वाली, विस्मयकारी।

'आवारागर्द' है....................... पंकज तिवारी

हिन्दी साहित्य मंच पर प्रस्तुत करते है एक बेहतरीन ग़ज़ल।

ये हँसी नहीं मेरे दिल का दर्द है।
हर एक साँस मेरी आज सर्द है।।
छुपाया है हर एक आँसू आँखों में,
न देख पाये ज़माना बड़ा बेदर्द है।
है साफ आइने सा आज भी दिल,
कतरा तलक जम न सकी गर्द है।

अपने मोहल्ले की लड़कियों के बारे में

My Photoबिगुल पर बता रहे हैं राजकुमार सोनी जी कहते हैं लगता है कि मैं एक बार फिर कविताओं की ओर लौटने लगा हूं।  जो लोग कविता लिखते हैं वे मेरे बारे में अपनी यह राय जरूर कायम कर सकते हैं कि एक बेवकूफ था जो इधर-उधर अपनी फजीहत करवाने के बाद घर लौटकर आ गया है।

अपने मोहल्ले की लड़कियों के बारे में

एक लड़की
सीखने जाती है
सिलाई मशीन से

घर चलाने का तरीका



एक लड़की
दिनभर सुनती है
लता मंगेशकर का गाना


एक लड़की
सुबह  भाई को
स्कूल छोड़ती है
और.. पिता को अस्पताल

बदले रूख

मेरा फोटोमेरी भावनायें... पर रश्मि प्रभा जी बदले रुख़ लेकर आई हैं। कहती हैं

मेरे नए पंख मुझसे कह रहे हैं

'एक लम्बी उड़ान

आज तुम्हारे हाथ है'

सम्पूर्ण आकाश, चाँद

आज फिर मेरे दोस्त हैं

आज फिर

मेरी आँखों के झील में

मासूम नन्हें नन्हें ख्याल हैं

किसी बच्चे के हाथों बनी

कागज़ की नाव जैसे

आज

इस नाव के डूबने का कोई खतरा नहीं

आस्था और आशावादिता से भरपूर स्वर इस कविता में मुखरित हुए हैं। जो स्‍वयं को हर परिस्थितियों के अनुसार ढालना जानता है, उसे जीवन जीने की कला आ जाती है।

एहसास (क्षणिकाएँ..)

My Photo.....मेरी कलम से..... पर Avinash Chandra जी की क्षणिकाएं हमें जीवन के कई अनुभवों का एहसास कराती हैं।

शिकायती लिबास...
कभी मैं सुखाता हूँ,
कभी तुम.
ना ख़त्म होते हैं,
हमारी शिकायतों के,
गीले लिबास.
न उतर पाती है,
अपने दरम्यान की,
कसैली अलगनी.

और भी कई क्षणिकाएं हैं। इन क्षणिकाओं पर कोई टीका नहीं लिखी जा सकती। सिर्फ महसूस की जा सकती है। आप भी पढिए और महसूस कीजिए।

हमारी जान लेने के नए-नए तरीके...

मेरा फोटोभड़ास blog , जुगाली और नुक्कड़ पर संजीव शर्मा जी कुव्यवस्था के प्रति अपनी भड़ास निकालते हुए कह रहे हैं कि आप भले ही सुबह पांच बजे से उठकर पार्क के कई चक्कर लगते हों या फिर बाबा रामदेव के कहने पर सुबह से शाम तक कपालभाती और अनुलोम-विलोम करते हुए बिताते हों या फिर किसी जिम में जाकर घंटों पसीना बहाते हों लेकिन इन तमाम कोशिशों का आपको उतना फायदा नहीं मिल पायेगा जितना कि आप मानकर चल रहे हैं. बताते हैं कि हाल ही में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि टमाटर सूप के नाम पर लोगों को ज़हर दिया जा रहा है।

बात सूप की नहीं, बल्कि विश्वास की है क्योंकि किसी भी कंपनी ने यह बताने कि जहमत नहीं उठाई कि वह टमाटर के नाम पर उसका रंग भर दे रही है और उसका सेहत से कई लेना-देना नहीं है?

स्व अस्तित्व

My Photoगीत............... पर संगीता स्वरुप ( गीत ) की एकदम सच्ची अभिव्यक्ति पढिए जो यह संदेश दे रही है कि खुद पर विश्वास कर हमें खुद ही हिम्मत जुटानी पड़ती है।
बोली के दंशों में

कितना विष रखते हो

ज़ेहन के हर कोने में

गरल  पैबस्त करते हो .

क्यों नहीं सीखते तुम

कुछ गुड़ की सी बातें करना

आसान हो जाता फिर

इस कड़वाहट  को पीना .

सर्वोत्तम मानव मस्तिष्क की पहचान है , किन्हीं दो पूर्णतः विपरीत विचार धाराऒं को साथ- साथ ध्यान में रखते हुए भी स्वतंत्र रूप से कार्य करने की क्षमता का होना।

बस मूँद  कर

मैं पलकों को

स्व - अस्तित्व   

एकत्र  करती हूँ

और फिर से मैं इस

मैदान ऐ जिंदगी  में

उतर पड़ती हूँ .

मानसिक शान्ति का आनन्‍द प्राप्‍त करने के लिए हमें मन को व्‍यर्थ की उलझनों में फँसने नहीं देना चाहिए।

भगवान ने चाहा - इंशा अल्लाह!!

मेरा फोटोचला बिहारी ब्लॉगर बनने पर चला बिहारी ब्लॉगर बनने बता रहे हैं कि ऊ त कभी सोचबो नहीं किए थे कि देस छोड़कर बिदेस में नौकरी करने का मौका मिलेगा. अऊर जब मौका मिला त उनके घर में मातम छा गया। कुछ चुना हुआ लोग को हर साल उनका ऑफिस बिदेस में पोस्टिंग करता था।. गलती से उनको भी चुन लिया गया अऊर शारजाह भेजने का खबर आ गया. पटना फोन करके खुसखबरी दिए त मातम छा गया घर में. एक त एतना दिन के लिए बाहर अऊर दोसरा इस्लामी देस में रहना, ऊ भी उनके जैसन ठेठ साकाहारी आदमी के लिए।

लेकिन जैसे तैसे पहुंच ही गए शारजाह और ऊहां उनका और हुनकर सिरीमती जी का दोस्ती एगो पाकिस्तानी परिवार से हो गया। आ जब लौट कर भारत आए, त अईसा लगा कि पूरा परिवार छोड़कर आ रहे हैं. जावेद भाई और शह्ज़ादी भाभी, आज भी फोन करते हैं. लेकिन पाँच मिनट के कॉल में आज भी दू मिनट त ऊ दुनो औरत लोग के रोने में निकल जाता है. आज भी ऊ लोग एक्के बात बोलता हैं, “भाई जान! अगर हालात सुधर जाएँ, तो एक बार हमारे यहाँ आप ज़रूर तशरीफ़ लाना." इनका जवाब होता है, " इंशा अल्लाह!” मगर जब तक ऐसा नहीं होता तब तक तो बस अमन का आसा लिए बैठे हैं,  अऊर मुनव्वर राना साहब का सेर पर बिचार कर रहे हैं:

              सियासत नफ़रतों का ज़ख़्म भरने ही नहीं देती
              जहाँ भरने पे आता है तो मक्खी बैठ जाती है.

सियासत के बात किए त एकठो सेर हमहूं मारिए देते हैं

मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है,

सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है।

संवेदना को छूने वाली पोस्ट! सारा खेल ह्रदय से जीने और दिमाग से जीने के बीच ही है!! दिल के सामने देश, जात, धर्म आदि का कोई गणित नहीं होता है! मुस्कुराहट आमंत्रण है और आँसू प्रार्थना!!

कल है ग्रहों का खास गत्‍यात्‍मक योग .. क्‍या पडेगा आपपर प्रभाव ??

मेरा फोटोगत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष पर संगीता पुरी जी कह रही हैं गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषीय दृष्टि से कल यानि 3 जुलाई का दिन खास है, क्‍यूंकि बृ‍हस्‍पति और चंद्र को केन्‍द्रगत करते हुए आसमान में बाकी ग्रहों की स्थिति के संयोग से एक खास प्रकार का योग तैयार हो रहा है। यह योग 3 जुलाई को 11 बजे से 12 बजे के लगभग मध्‍य रात्रि को उपस्थित होगा। इस योग का प्रभाव विश्‍व के अधिकांश हिस्‍सों में सुखद ही रहना चाहिए , इस कारण भीषण गर्मी वाले क्षेत्रों में दो दिनों तक घने बादल बने रहने और यत्र तत्र बारिश होते रहने की संभावना है। पृथ्‍वी के जिस क्षेत्र में यह योग अधिक प्रभावी होगा , वहां कुछ अनिष्‍ट की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता, खासकर बाढ , तूफान या भूकम्‍प की।

ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' की नई ब्लॉग-वसीयत

शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग पर Shiv प्रस्तुत कर रहे हैं। अप्रैल २००८ में अपने हलकान भाई, यानि ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' ने अपनी ब्लॉग-वसीयत लिखी थी. पिछले हफ्ते हलकान भाई ने अपनी ब्लॉग वसीयत में बदलाव किया। हलकान भाई की नई वसीयत पडिए जिसमें वे कहते हैं कि

मैं ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' , ब्रह्माण्ड का सबसे धाँसू हिन्दी ब्लॉगर, अपने पूरे होश-ओ-हवाश में ये ब्लॉग-वसीयत लिख रहा हूँ. कल तक मैं समझता था कि वसीयत केवल घर-बार, जमीन-जायदाद, बैंक लॉकर, सोना-चाँदी वगैरह के भविष्य में होने वाले बँटवारे के लिए लिखी जाती है. लेकिन जब से एक साईट ने मेरे ब्लॉग की कीमत दस लाख डॉलर से ज्यादा आंकी है, तबसे ये ब्लॉग ही मेरी सबसे अमूल्य निधि बन बैठा है. रूपये-पैसे, सोना-चाँदी वगैरह की कीमत मेरे लिए दो कौड़ी की भी नहीं रही. इसलिए ये ब्लॉग-वसीयत लिखना मेरे लिए मजबूरी हो चुकी है.

इसे शिव जी ने पोस्ट कर दिया अपने ब्लॉग पर। इस पर हलकान भाई का कहना है

आप मेरी वसीयत को और भी दस बारह ब्लाग पर छपाने का इन्तजाम कीजिये ना भाई!

शिव जी ने हाथ करते हुए ऐलान कर दिया

१२-१३ ब्लॉग पर आपकी वसीयत पब्लिश कैसे करें? मेरा तो एक ही ब्लॉग है!

इस मंच से मैं निवेदन करता हूं आपसे कि आप यदि हलकान भाई की इच्छा पुरी कर सकें तो कर दें।

चलने से पहले इस फोटॊ और इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख का मज़ा लीजिए।

अनूप जी को तो कुश की प्रस्तुति इतनी पसंद आई कि उन्होने एक बार पलक झपकाये बिना पूरा मंचन देखा

जी लिंक…..?

ओह! ये है

कुश और नाटक भारत की तक़दीर, पढ़िये नवोन्मेष महोत्सव-२०१० भाग-१

My Photoहृदय गवाक्ष पर कंचन सिंह चौहान की प्रस्तुति!

अब मैं भी चला। रात के १२ बज रहे हैं। विश्‍व कप फुट्बॉल का दूसरा क्वार्टर फाइनल मैच शुरु हो रहा है। मैं भी अनूप जी की तरह बिना पलक झपकाए मैच देखूंगा।

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