असली ब्लॉगिंग के अपनी तरह के सैकड़ों, वाजिब उदाहरण हो सकते हैं. एक उदाहरण आपके सामने पेश है.
सिंह सदन नाम का एक घर है. उस घर के सदस्यों का एक ब्लॉग है – सिंह सदन – ए हट अंडर द स्काई. इस ब्लॉग की पहली पोस्ट इब्तिदा 10 अप्रैल 2010 को प्रकाशित की गई थी -
इब्तिदा.........!
सिंह सदन का होम ब्लॉग “सिंह सदन -ए हट अंडर द स्काई” शुरू हो गया है...........इस ब्लॉग के ज़रिये हम आपको ‘सिंह सदन से’ जुडी हरचीज को सामने लेन का प्रयास करेंगे ..........यह एक सहकारी प्रयास होगा जिसमें परिवार के अधिकाधिक सदस्य जुड़ेंगे..........तो ब्लॉग पर सिंह-सदन से जुडी हरगतिविधि और व्यक्ति का तार्रुफ़ करने का जिम्मा भी इसी घर के सदयों को ही लेना था......यह जिम्मेदारी घर के लोगों ने ली भी है। सभी ने अपने अपने रूचि के क्षेत्रों को चुना है, पूरे मन से उस कलम को लिखने का प्रयास भी किया है .......! सभी सदस्यों ने जिन विषयों पर जिन शीर्षकों के अंतर्गत लिखने का जिम्मा उठाया है.....उसे मैं ब्रीफ किये देता हूँ....
इसके बाद सबने अपना जिम्मा ले लिया और नियमित पोस्टों का सिलसिला शुरू हो गया. फिर तो घर-परिवार के व्यक्तियों पर केंद्रित बेहद मर्मस्पर्शी पोस्टें आने लगीं. कुछ पाठकों की नजर में ये बेहद व्यक्तिगत और निजी हो सकती हैं, मगर, फिर, यही तो है असली ब्लॉगिंग.
दादी माँ पर एक पोस्ट है – वेल डन अम्मा.
“सिंह सदन की खूबसूरती और क़ाबलियत हमारी अम्मा की दुआओं से ही महफूज़ है.अम्मा घर और कुनबे में सबसे बड़ी हैं .घर के पुरुष और महिलाओं पर अम्मा का रसूख साफ देखा जा सकता है .
घर के बच्चों के लिए अम्मा सबसे खूबसूरत चीज़ हैं.घर के बच्चे उनके दीवाने हैं .अम्मा भी बच्चों पर जान छिड़कती हैं.मजाल है कि अम्मा की मौजूदगी में भला कोई बच्चों को तिरछी नजर देख भी ले....बच्चे कितनी भी शैतानी करें अम्मा के रहते सब माफ़.अम्मा घर पर हों तो हर बच्चा उनके पास सोना चाहता है. इस पर बच्चों में जंग भी छिड़ जाती है...लेकिन अम्मा सब सम्भाल लेती हैं. घर में अम्मा का मैं सबसे चहेता हूँ. मैं भी उनको बहुत प्यार करता हूँ........उनसे जुड़े कई संस्मरण है जो आज भी जेहन में तारो-ताज़ा हैं.
अम्मा की बौद्धिक क्षमता का मैं बचपन से ही कयाल हूँ. अम्मा ने इन अस्सी सालों में हर रिश्ता जिया है....जीवन के बहुत से उतार-चढ़ाव देखे हैं. सबमें अम्मा सफल नज़र आती हैं. घर में उनकी स्थिति अंग्रेजी लेखक रस्किन बोंड की कहानियों में "बरगद के पेड़" की तरह है. बदलते दौर में भी अम्मा सब पर भारी नजर आती हैं. अम्मा हर उम्र के बीच चुटकी में सेट हो जाती हैं. एक बार मैं सूफी संत बुल्ले शाह का सूफियाना कलाम सुन रहा था. कलाम मुल्तानी पंजाबी में था. सुनते ही अम्मा ने उसके मायने मुझे समझाए. मैं उनकी इस क़ाबलियत पर दंग रह गया…..” >>> आगे पढ़ें
एक पोस्ट पिता जी पर समर्पित है – पापा तुस्सी ग्रेट हो.
“मैंने लोगों को कई तरेह के शौक रखते हुए देखा है...लेकिन काम करने का शौक मैंने पापा में ही देखा है......उत्तर प्रदेश पुलिस सेवा में उनको तीस साल से ज्यादा समय हो गया है.कहा जाए तो पूरी जिन्दगी उन्होंने नोकरी ही की....उनको देख कर लगता है जैसे पुलिस की नोकरी पापा जैसे लोगों के लिए ही बनायीं गयी है.वे चोबीस घंटे काम कर सकते है....और करते भी है.....नोकरी करते करते उनको मालूम ही नहीं पड़ा की हम चार भाई कब बड़े हो गए......पापा को नोकरी करते देख हम लोग बड़े हुए.....पापा बेहद कर्तव्य निष्ठ है....काम और नौकरी से उन्होंने कभी बेमानी नहीं की...ये गुण हम भाइयों को खून में मिला....पापा नौकरी में सफल है....''कसौली''जहां पापा पैदा हुए.कसौली आज भी मैनपुरी के पिछड़े गावं में शुमार है....पापा का बचपन इसी गावं में बीता.पापा को बचपन से है पढने का शौक था.सो पापा ने पढने के लिए मजदूरी भी की.गावं के ही पास बने एक भट्टे पर रोज़ पढाई से फुरसत पाने के बाद कड़ी मेहनत करते और उससे जो पैसा मिलता.पढाई पर खर्च करते.घर में पैसों के आभाव में पांच भाइयों में सिर्फ पापा ही पढाई पूरी कर सके.बचपन के पढाई पूरी करने के लिए पापा सिरसागंज आ गए.यहाँ रह कर पापा ने कृषि विज्ञान की पढाई पूरी की.पापा की शादी चुकीं 15 -16 की उम्र में ही हो गयी थी.सो घर का खर्चा चलने के लिए पापा ने बच्चों की टयूशन देना का काम शुरू किया.इसी दौरान मैनपुरी से पुलिस की नौकरी निकली तो पापा ने फ़ौरन इसके लिए एप्लाई कर दिया...18 साल की उम्र में पापा पुलिस में आ गये.इसके बाद पापा ने नौकरी में कभी पीछे मुड के नहीं देखा,,,,सिपाही से ''डी वाई एसपी ''तक का सफर उन्होंने कब पूरा कर लिया पता ही नहीं चला.सरकारी नौकरी...खास तौर पर पुलिस सेवा में यहाँ तक आना फर्श से अर्श तक पहुचने जैसा है.पापा नेहम चारों भाइयों की तालीम पर खास ध्यान दिया,जिसका नतीजा ये रहा की हम भाइयों को नौकरी के लिए खास स्ट्रगल नहीं करना पड़ा.मुझे खूब याद है जब पापा रात में गश्त करके वापिस घर आते थे तो बड़े भैया को उठा कर रात में ही पढ़ना शुरू कर देते थे...” >>> आगे पढ़ें
माँ पर भी कीबोर्ड खटकाई गई है – माँ तुझे सलाम!
“ईश्वर का वरदान है माँ
हम बच्चों की जान है माँ
मेरी नींदों का सपना माँ
तुम बिन कौन है अपना माँ
कभी भाई, कभी बहन, कभी पिता बन जाती माँ
ग़र ज़रूरत पडे तो दुर्गा भी बन जाती माँ
ऐ ईश्वर धन्यवाद है तेरा दी मुझे जो ऐसी माँ
है विनती एक यही तुमसे हर बार बने ये हमारी माँ
***प्रभाकर माचवे
प्रभाकर माचवे की यह कविता मुझे बरबस ही याद आ जाती है जब में माँ को याद करता हूँ...... सच कहूं तो ''माँ''.......... एक ऐसा मोहक बंधन है .... एक ऐसी प्यारी भावना है .... शब्दों में बाँध पाना जिसे संभव नहीं.. हम ईश्वर को धन्यवाद देते हैं की उसने न केवल हमे माँ दी.. वरन ऐसी माँ दी जिसने अपने वात्सल्य , स्नेह, प्रेम और संरक्षण से हर पल हमें तराशा... हमे जिंदगी से मुकाबला करना सिखाया...मूल्यों और नैतिकता का पाठ न केवल लगातार पढ़ाया , बल्कि उसे अच्छी तरह रटाया... आज हम सभी भाई ज़िन्दगी में जो भी कुछ जाने हैं... सीखे हैं...किसी लायक हो पाए हैं .....सब हमारी माँ की दुआओं .. उनकी रात दिन की प्रार्थनाओं का ही असर है !
हम भाईओं को पालने में उन्होंने अपनी हस्ती मिटा दी ...पूरी जिंदगी उन्होंने कोई शौक नहीं किये... कोई फरमाइश नहीं की ...जो भी थोडा बहुत पैसा पिताजी अपनी नौकरी में देते रहे ..... एक-एक पैसा बचाकर उन्होंने उसे घर की ...... बच्चों की बेहतरी में लगा दिया... उन्होंने घर, परिवार, समाज में बड़ी मुश्किलों का सामना किया और अर्जुन की तरह एक ही लक्ष्य बनाकर बच्चों की परवरिश में लगी रही........ उनकी तमाम कुर्बानिओं ने मेरी रूह पर कितना असर डाला है ...... मैं बता नहीं सकता..!
घर-परिवार की परवरिश में पिताजी उनको बहुत समय न दे सके...... सो बिना घबराये माँ ने अकेले ही मोर्चा संभाल लिया........हालात ने उन्हें कई बार बेज़ार कर के रख दिया पर हिम्मत नहीं हारी...”>> आगे पढ़ें
अब बारी माँ की है… माँ ने अपने बच्चे के लिए लिखा – माता श्री की कलम से.
“मंझले सुपुत्र....
बड़े बेटे पर लिखी गयी पोस्ट के उपरान्त यह मेरी दूसरी पोस्ट है । इस बार भी मैं अपने बच्चों के ऊपर पोस्ट लिख रही हूँ । चूँकि पिछली पोस्ट में मैंने बताया था कि मेरे चार पुत्र हैं । इसी क्रम में यह पोस्ट मेरे दूसरे बेटे पंकज के ऊपर है ।
पंकज... पवन से छोटे हैं... ओर इस समय वे ''सेल्स टेक्स कमिश्नर'' के पद पर कार्य रत हैं । उनकी कुछ विशेषताओं को मैं यहाँ बताना चाहूंगी ।
वे अपने नाम की तरह पुष्पित एवं पल्लवित हैं । वे ऊँची कद काठी के हैं । वे शांति प्रिय हैं । वे आध्यात्म से जुड़े हैं । उन्हें मीठे भोजन बहुत पसंद हैं । उनको सफाई और घर का सामान यथा स्थान लगाना पसंद है । समय का अभाव होने पर भी वे ज्यादा से ज्यादा वक़्त मुझे देते हैं और विहार व्यक्त करते हैं । उनके यहाँ मुझे बहुत शांति मिलती है । वो भीष्म पितामाह जैसे दृढ़ प्रतिज्ञ हैं, जो मन में ठान लें, कर दिखाते हैं । जब वो मुझे ''माते'' कहकर पुकारते हैं... तो मैं अपने आपको धन्य समझती हूँ । इश्वर में उनकी आस्था को देखकर मुझे एक चौपाई याद आती हैं । जो माँ सुमित्रा ने लक्ष्मण के लिए कही थी .......
पुत्रवती युवती जग सोई ।
रघुपति भगत जासु सुत होई ।।ऐसे बच्चों का होना वास्तव में गर्व की बात है पर मै इसको प्रभू की कृपा समझती हूँ उनकी कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं है निसंदेह पंकज बहुत भावुक किस्म के हैं वे बाहर से नारियल की तरह कठोर लगते हैं जबकि वे अन्दर से बेहद नरम हैं….” >> आगे पढ़ें
सिंह सदन में और भी बहुत कुछ है. स्टाइलिश फैमिली से लेकर सास-बहू तक. 30 जून 2010 को सिंह सदन का मासिक बुलेटिन भी प्रकाशित हुआ -
“माह : जून 2010
1. ''सिंह सदन'' के लिए जून का बेहद गर्म माह भी खासा गहमा - गहमी भरा रहा ! ''होम ब्लॉग'' की सक्रियता ने पुराने सभी रिकार्ड ध्वस्त कर डाले ! एक ही माह में ''गोल्डन जुबली'' .... यानि एक ही माह में ५० पोस्ट ....और इस तरह जून माह इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गया है !
....इस शानदार कामयाबी के लिए मैं सभी सुधी लेखकों .... माता श्री.... भैया.... अंजू भाभी ....हृदेश सिंह ''जोनी'' ... पुष्पेन्द्र सिंह ''पिंटू'' ... प्रिया ... अमित ''चिंटू'' ... संदीप ... नेहा सिंह ''बिटिया'' को बहुत बहुत मुबारक बाद देता हूँ !…”
इस ब्लॉगर परिवार की खुशियों में आप भी शामिल होना चाहते हैं? तो फिर देर किस बात की? सिंह सदन – ए हट अंडर द स्काई के मेहमान बन जाइए!
ओढ़कर छतरी चला था
हरकीरत ' हीर' कहती हैं कि वो हैरान थी ....रंगों ने पानी में कई सारी चूड़ियां सी बना रखी थीं ....उन्होंने छुआ तो हाथों को राह मिल गई ....ख्यालों ने रंगों की चूड़ियां पहनी और बदन खिल उठा ....उन्होंने ऊपर देखा ....सामने वही परिंदा था जिसे रात उन्होंने मुक्त किया था .....उन्हें देख मुस्कुराने लगा....उन्होंने उसे कलाइयों की चूड़ियां दिखलायीं ....वह चहकने लगा ....ख्वाबों ने कई साज़ तरन्नुम भरे छेड़ दिए .....रब्ब ने इक खामोशनदी में मोहब्बत का पत्थर फेंका .....इश्क़ ने धड़कना सीख लिया ...बस ये ख्याल थे जो एक-एक कर सामने आते रहे ...... और क्षणिकाओं में इन्हीं ख़्यालों को उन्होंने पिरो दिया।








