मंगलवार, जून 05, 2012

संस्मरणों की दुनिया के रोजनामचे

कल चर्चा करने के बाद अच्छा लगा। सोचा कि चर्चा नियमित करनी चाहिये। सो आज भी सुबह से खुटखुटाने लगे। इस बीच ब्लॉगर के हुलिया और जलवा दोनों बदल गया है। यह भी देखा कि भले ही चर्चा का काम पिछ्ले बहुत दिनों से ठप्प सा था लेकिन नियमित पचास-साठ लोग चिट्ठा चर्चा देखते थे। कल लगभग दो सौ लोगों ने देखी।

कल रविरतलामी का इंटरव्यू चर्चा पर पोस्ट किया । संयोग से कल ही हिंदी के पहले चिट्ठाकर आलोक कुमार से भी आनलाइन मुलाकात हो गयी। बहुत देर तक चैटियाते रहे। उनके साथ हुयी चर्चा के अंश ठीक-ठाक करके जल्दी ही पेश किये जायेंगे। वैसे यह संयोग ही है कि हिंदी के पहले चिट्ठाकार के शुरुआती अनुभवों के बारे में अभी तक हम लोगों ने कोई बातचीत पोस्ट नहीं की।

कल कार्टून पोस्ट करना छूट गया था। इसलिये आज की शुरुआत ही कार्टून से की। कार्टूनिस्ट तो वैसे और भी हैं लेकिन काजल कुमार इस मामले में खास अपने लगते हैं काहे से कि वे नियमित रूप से ब्लाग जगत से जुड़े रहते हैं। एक पुरानी चर्चा याद आ रही है जिसमें सिर्फ़ कार्टूनिस्टों की चर्चा की गयी थी।

यह भी संयोग ही है कि बहुत दिनों के बाद डा.अनुराग आर्य की पोस्ट आयी। अनुराग आर्य का लिखने का अंदाज ऐसा है कि एक ही पोस्ट में न जाने कहां-कहां एयरलिफ़्ट करा देते हैं। यूरोप का कोई एयरपोर्ट है, सहारनपुर का कोई रेलवे प्लेटफ़ार्म है, एक टुकड़ा गुड़गांव है और आखिरी में डायरी। कमेंट बक्से पर ताला है। किसी को अंदर घुसने की इजाजत नहीं पोस्ट के। बस बाहर से ही निहार लो चकमक टुकड़े सजे हुये शो केस में। बातें भी इत्ते इशारे में की जाती हैं कि जरा सा चूके नहीं कि स्पार्किंग शुरु। कनेक्शन गुल्ल। फ़िर लौटकर आओ। तार जोड़ो और नये सिरे से रोशनी में सफ़र शुरु करो।

कई टुकड़े हैं इस पोस्ट के। एकाध झलक दिखला देते हैं:

 रहने दो ,तुम साले मर्द जिस्म से ऊपर उठते नहीं हो ....ख़ूबसूरती !!,
नहीं यार जिस्म भी ज्यादा देर अटरेक्ट नहीं कर पाता रोक नहीं पाता ,आप उबने लगते हो . प्यार में आप उबते नहीं  प्यार में उबने लगो  तो समझ लो या तो स्पेस चाहिए या इस प्यार को वापस टटोलने की जरुरत  है
" इतने बड़े एक्सपर्ट थे तो समझे क्यों नहीं ?"
"पर  तुमने कब कहा  था तुम मुझे उस नजर से देखती हो"
"लडकिया कभी नहीं कहती"
"जता तो देती है "
"कन्फ्यूज़  थी ओर न इतनी हिम्मत थी तब  " .!
"ओर मै कहाँ कहाँ भटकता रहा "
"हमारे  पास वो नहीं थी न ......ख़ूबसूरती !"
वो उसे देखता है एकटक   "तुम दुनिया में सबसे अलग  थी मेरे लिए ,बहुत अच्छी   "
वो कुछ कहना चाहती है फिर जाने क्यों रुक गयी है "डेस्टिनी " !
"फिर आज क्यों कहा ?"
ओह अब मै बोल्ड हूँ ,ओर तुम साले बूढ़े हो गए हो
यह पढ़कर लगता है कि पोस्ट के इस टुकड़े में नायिका नायक के साथ पुराने दिनों के कारीडोर में टहलती है। पहले जो कह नहीं पाये दोनों आपस में उसका कारण साझा करते हैं। नायिका अब बोल्ड हो गयी है। दो-तीन मिनट में नायक को दो बार साले बोलती है। हमारा  जैसा कोई खुराफ़ाती चर्चाकार होगा तो यही कहेगा- लड़की का लड़के को साले कहना लड़की की बोल्डनेस की निशानी है। लड़की-लड़का न जमे तो नायक-नायिका कह सकते हैं।

पोस्ट का सहारनपुरवाला हिस्सा बचाकर निकल जाने का मन करता है। सच जरा ज्यादा बोल्ड होता है न! तीसरा हिस्सा आपके और हमारे कई लोगों के जीवन के हिस्से होंगे। लेकिन चौथा हिस्सा खास अनुराग की डायरी का हिस्सा हो सकता है:
"दरअसल
हम सब इक ढोंग है
 बरसो से न कोई बुद्ध है न कबीर
राम निर्वासित है
तबसे ही
कोई लक्ष्मण उन्हें लेने नहीं जाता
रावण हो गये है अमर
पृथ्वी हांफती है काटते पूरा एक चक्कर
ईश्वर ने दे दिया है त्यागपत्र
कलयुग को मिल गयी है अगले चार सौ सालो की लीज़ ! "

ऊपर शायद किसी को एतराज हो कि ये तो हमारी भी डायरी का हिस्सा है। तो ऊपर अनुराग की डायरी की जगह अनुराग जैसे लोगों की डायरी का हिस्सा पढ़ें।

 डा.अनुराग के न जाने कित्ते प्रशंसक हैं। सब बड़े चाव से टिपियाते हैं उनके यहां। उनको अपनी अभिव्यक्ति का मौका दिये बिना अपने कमेंट बक्से में ताला लगा लिहिन डाक्साब। आप इस पोस्ट को निहार सकते हैं, सराह सकते हैं लेकिन टिपियाने के लिये अधिकृत नहीं है आप। ठीक है भाई!  :)

कमेंट बक्सा बंद करने वाली एक ठो और ब्लागर हैं -अदा! हां नहीं तो वाली अदा! जिन लोगों ने उनके सक्रिय और हां नहीं तो! फ़िनिशिंग वाली पोस्टें/ टिप्पणियों   के दौर देखे हैं वे उनके लेखन से बाकिफ़ होंगे। कुछ दिन उन्होंने अपनी आवाज में ब्लॉग चर्चा भी की। लेखन बिन्दास लेखन वाली अदाजी की आवाज बहुत शानदार है। इसका प्रमाण उनकी हर पोस्ट के नीचे उनकी आवाज में गाया हुआ गाना सुनकर मिलता है। कभी-कभी उनके श्रीमानजी भी संगत देते हैं। युगलगीत सुनकर लगता है जुगलजोड़ी को गला भी जोड़े में मिला है। :)

अदाजी ने पिछले दिनों कुछ बेहतरीन संस्मरण लिखे। उनमें से एक में अपने रेडियो प्रोग्राम के दिनों की यादें साझा की हैं। माउस और की बोर्ड को दरकिनार कर मन से लिखे इस संस्मरण में वे लिखती हैं:
मेरे श्रोता हर उम्र और हर तबके के लोग थे, मुझे याद है, एकाकी जीवन जीते हुए बुजुर्ग दंपत्ति, हॉस्पिटल में ३ साल से आपाहिज पड़ी महिला, फैक्टरी में रात की ड्यूटी करती हुई हिन्दुस्तानी महिलाएं, और अकेला टोरोंटो से रोज़ ओट्टावा आता हुआ ट्रक ड्राईवर, रात को बर्फ में टैक्सी चलाते टैक्सी ड्राईवर, और घर में नितांत अकेले रहने वाले हमारे बुजुर्ग...जब भी उनके फ़ोन आते थे, और उनको जब भी रेडियो पर मैं लेकर आती थी, उन्हें मैं उनकी अपनी नज़र में ऊँचा उठते देखती थी...उनकी आवाज़ में जो ख़ुशी मैं महसूस करती थी, उसको बयाँ करने की ताब मेरी लेखनी में नहीं है...
और भी कई तरह के श्रोताओं के किस्से सुनाते हुये वे बताती हैं:
क्या-क्या और कितनी बातें बताऊँ...सैकड़ों बातें हैं...वो ट्रक ड्राईवर जो टोरोंटो से ओट्टावा हर दिन आता था...कहता था मेरा सफ़र ४ घंटे का होता है सपना जी, आपके प्रोग्राम को सुनने के लिए मैं ठीक ८ बजे चलता हूँ टोरोंटो से, आपकी आवाज़ के साथ मेरे २ घंटे, कैसे बीत जाते हैं पाता ही नहीं चलता....या फिर उस दंपत्ति का जिनका तलाक़ होने वाला था और मेरे रेडियो प्रोग्राम ने वो होने नहीं दिया...या फिर उनलोगों का ज़िक्र करूँ, जो अपने बुड्ढ़े माँ-बाप को गराज में रखते थे, और हर सुबह गुरुद्वारे छोड़ आते थे, ताकि उनके खाने का खर्चा बच जाए..(इसके बारे में तफसील से लिखूंगी ), जिनको मैंने इतना लताड़ा, कि वो सुधर ही गए और, उनके माता-पिता की दुआओं ने मेरी झोली भर दी...

पोस्ट के आखिरी में वे अपने गुरु जी की आवाज सुनने पर हुये अपने हाल बयान करती हैं । हाल जो हुये वो तो उनकी पोस्ट में ही बांचियेगा आप। हम तो खाली आफ़्टर इफ़ेक्ट बता रहे हैं:
.....कुछ देर बात करने के बाद,  फ़ोन काटना पड़ा मुझे...इस बीच मैं एक भी फ़ोन नहीं ले पाई, डर के मारे मेरी आवाज़ काँप रही थी...कुछ संयत होकर जब मैंने फ़ोन काल्स लेना शुरू किया...मेरे सुनने वालों ने साफ़-साफ़ बता दिया...सपना जी, आपने जितनी देर अपने गुरु से बात की आप खड़ी थीं , हमें पता चल गया था...आपकी आवाज़ में वो घबराहट, वो आस्था, वो सम्मान था, जिसे हम न सिर्फ़ सुन रहे थे, महसूस भी कर रहे थे...और मैं हैराँ थी, आवाज़ की दुनिया भी कितनी पारदर्शी होती है...है ना !!!

ऊपर अनुराग और फ़िर अदाजी की पोस्टें पढ़ते हुये लगा कि ब्लागजगत के सबसे बेहतरीन पोस्टें संस्मरणों की दुनिया में सैर के रोजनामचे हैं।  बाकी तो सब ठीक है उनका अपना फ़ैसला है लेकिन कभी-कभी लगता है कि ये बिहार के पानी के किस्से सुनाने वाली अदाजी की ये अदा ठीक नहीं कि अपने कमेंट बक्से पर ताला सटा के चाभी कहीं छुपा दी- हां नहीं तो। :)

इस बीच अनीताकुमार जी ने भी नये सिरे से लिखना शुरु किया। सिंगापुर पलट पोस्टें लिखने के बाद ब्लाग सर्वे किया। आप भी अपने विचार बताइये उनको। उनके यहां कमेंट बक्से में ताला नहीं लगा है। सवाल भी बड़े आसान टाइप हैं जैसे कि:

1) क्या आप के भी ब्लॉग के ऐसे सक्रिय पाठक है जो खुद ब्लॉगर नहीं है पर आप के लिखे का इंतजार रहता है उन्हें?
2) क्या ये पाठक जन सिर्फ़ पढ़ते ही हैं या टिपियाते भी हैं? अगर नहीं टिपियाते तो आप को कैसे पता चलता है कि वो आप के पाठक हैं?

3) क्या ये पाठक  आप के लिये पहले अजनबी थे या आप के अपने परिवेश में से ही हैं, जैसे आप के दोस्त, रिश्तेदार, सहकर्मी, बॉस, इत्यादी?

4) ऐसे पाठकों के प्रति आप उतने ही सहज रह पाते हैं जितने ब्लॉगर बिरादरी के पाठकों के प्रति?

5) क्या पोस्ट लिखते समय आप इस बात का ख्याल रखते हैं कि ये पाठक आप का लिखा पढ़ने वाले हैं और हो सकता है कल दफ़तर में  ही मौखिक या टेलिफ़ोन पर ही टिपिया रहे हों?

6) कहीं इस एहसास से आप के लेखन में कमी या कृतिमता तो नहीं आयी?

जबाब आप उनकी पोस्ट पर ही दीजिये। 


आज के लिये फ़िलहाल इतना ही। बकिया फ़िर । जल्दी ही।


Post Comment

Post Comment

सोमवार, जून 04, 2012

सोलह साल की लड़की, सूरज का खत और अमेरिकी जीवन के किस्से

बहुत दिन हुये चर्चा किये! कभी रोज करने का मन होता था। दिन में एक से अधिक बार चर्चिया देते थे। अब हाल ये है कि महीनों हो गये चर्चा किये हुये। शायराना अन्दाज में कहा जाये तो :
आज उतनी भी मयस्सर नहीं मयखाने में,
जितनी कभी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में।
:) बहरहाल लगा के इस्माइली शुरु होते हैं। ढेर दिनों के बाद। :)

रविरतलामी चिट्ठाजगत के बड़े खलीफ़ा हैं। शुरुआतै से (जून ,2004) लगे हैं लिखने-पढ़ने में। चिट्ठाजगत और अंतर्जालजगत में हुये बहुत सारे काम-धाम में इनका नाम आया है। इसके बारे में विस्तार से रवि बाबू ने अपने एक साक्षात्कार में बताया है। इनके मुताबिक -हिंदी के नए सूर और तुलसी हिंदी ब्लॉगिंग के जरिए ही पैदा होंगे।


लेकिन ई बात पक्की है कि अभी सूर और तुलसी पैदा हुये नहीं हैं। अगर हुये भी हैं तो वो प्रोफ़ेशनल नहीं होंगे काहे से कि रवि बाबू ई भी कहे हैं कि हिन्दी ब्लॉगिंग में प्रोफ़ेशनलिज्म का अभाव है। एक बात और जान लें ब्लॉगिंग से जुड़े लोग कि ब्लॉगर वही जो 500 पोस्ट ठेल ले जाये। ज्यादा हम क्या कहें! आप खुदै बांचिये उनका इंटरव्यू!

वैसे हम आपको बतायें कि हम भी कभी रवि रतलामी जी को इंटरव्युविया चुके हैं। हमारे ब्लॉग पर इसे बांचिये। सूचनार्थ ये भी बता दें कि हमारे ब्लॉग पर सबसे ज्यादा स्पैम टिप्पणियां जिन पोस्टों पर आती हैं उनमें से एक पोस्ट यह भी है- सीखना है तो खुद से सीखो-रवि रतलामी

अब आगे क्या लिखा जाये ये सोचने में थोड़ा समय लग रहा है। जब तक सोचते हैं तब तक आप कुछ ब्लॉग पोस्टों के अंश बांच लीजिये। क्या पता पूरी पोस्ट बांचने का मन बन जाये!

  1. तुम्हारी सबसे बड़ी ख़ासियत पता है क्या है ? कि तुम बेहद आम हो... तुम में हर वो कमी है जो तुम्हें एक ख़ास इन्सान बनाती है... तुम कोई कैसानोवा नहीं हो... इतने ख़ूबसूरत कि जिसे देखते ही लड़कियां पागल हो जाएँ... तुम मेरी ही तरह एकदम साधारण हो... बेहद सौम्य... और इसीलिए मुझे सबसे ज़्यादा पसंद हो... क्यूँकि तुम्हारी ख़ूबसूरती तुम्हारे दिल में बस्ती है... मेरी आँखों से देखना कभी ख़ुद को... ख़ुद अपने आप पे दिल ना आ जाये तो मेरा नाम बदल देना... वैसे वो तो तुमने पहले ही बदल दिया है... तुम्हारे मुँह से कभी अपना नाम सुनती हूँ तो कितना पराया सा लगता है ये दुनियावी नाम... सुनो, तुम मुझे मेरे नाम से मत पुकारा करो ! तुम्हारी यादों का केलाइडोस्कोप ! -रिचा
  2. मैं अब भी वो कूटभाषा सीख रहा हूं जब कीबोर्ड की दो बूंदों वाला एक बटन किसी ब्रैकेट वाले दूसरे बटन के साथ जुगलबंदी कर ले तो हम मुस्कुराने (स्माइली) लगते हैं या फिर उदास दिखने लगते हैं। क्या ज़िंदगी में ऐसा नहीं हो सकता। हम जिन्हें चाहते हैं, वो दिखें, न दिखें। मिलें, न मिलें। बात करें, न करें। बस इतना कि ज़िंदगी में उनकी मौजूदगी का एहसास बना रहे। किसी भी आकार में। सॉलिड में न सही, लिक्विड या गैस में ही सही। मैं एक कूटभाषा में लड़ना चाहता हूं...-निखिल आनन्द गिरि
  3. पिछली पीढ़ी का सच ये भी है कि जहां अति होती है, अति भी वहीं होती है। सो, ज़मींदारी बिखरती गई और ज़मीन-जायदाद नशे और ऐय्याशियों की भेंट चढ़ने लगे। बंटवारे के बाद भी एक धुर ज़मीन के लिए भाई-भाई एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे रहे। पूरा परिवार बेईमानियों, डर, अवसाद और कर्ज़ के बोझ तले दबता चला गया। ज़मींदारी नहीं बची, और किसी तरह बची-खुची ज़मीन पर खेती करके परिवार गुज़ारा करते रहे। लेकिन ऐंठ ना जानी थी, नहीं गई। -गर्मी छुट्टी डायरीज़ ५: ज़मीन, जायदाद, ज़मींदारी की अनचाही विरासत -अनु सिंह चौधरी
  4. कुल मिलाकर जीजाजी के साथ वो फिल्में देखी जाती जिसमें थोड़ा-बहुत मसाला हो. ऐसे में मां-चाची जीजाजी के दो-चार घंटे की एक्टिविटी पर गौर करती. सबकुछ सही रहा तो हरी झंड़ी मिल जाती. जाने देते हैं, घर के मेहमान हैं, उन्नीस-बीस होगा तो साथ में हैं न और फिर जूली ( जो ब्याहकर आयी है) बउआ थोड़े हैं,समझती नहीं है कि मेहमान-पाहुन के साथ एतना-एतना जुआन-जवान बहिन के साथ जा रही है तो ध्यान रखे. बाकी तो हम जैसे चपरासी छोटे भाई होते ही जो थोड़ा भी इधर-उधर आने पर चट से मां को रिपोर्ट करते- मां, इन्टरवल हुआ न तो जीजाजी सबको फंटा दे रहे थे औ लास्ट में सुषमा दीदी को दिए न त हाथ पकड़े ही रह गए. -सौ साल का सिनेमाः जीजा वही जो सिनेमा दिखाए- विनीत कुमार
  5. किरनों से उसकी सुलह हो गयी थी! एक दिन एक खत आया... सूरज जा चूका था! हमेशा के लिए! वह रोई..बिलखी! इतने आंसू झरे कि किरने भी भीग कर अपने रंग खो बैठीं! सूरज पूरब से पश्चिम तक जाते जाते उसके उदास मुख पर चमक लाने की कोशिश करता! पर वो चमक वापस नहीं आई! उसने सूरज का खत जला दिया और साथ में उंगलियां भी जला बैठी ! उँगलियों पर मलहम लगाये वह सोच रही थी.... क्या सचमुच सूरज नज़दीक आने पर झुलसा देता है?" एक लड़की और सूरज की दोस्ती की कहानी -पल्लवी त्रिवेदी
इसके अलावा भी और भी कित्ता-कित्ता है पढ़ने को। न हो तो प्रमोदजी की ये पोस्ट ही बांच डालिये। न जाने कहां से घुमाते हुये वे आपको कविता सुनाते हैं-
दूर से अपना घर देखना चाहिए
मजबूरी में न लौट सकने वाली दूरी से अपना घर
कभी लौट सकेंगे की पूरी आशा में
सात समुंदर पार चले जाना चाहिए
जाते-जाते पलटकर देखना चाहिए
दूसरे देश से अपना देश
अंतरिक्ष से अपनी पृथ्‍वी
कविता की बात चली तो देखिये पूजा उपाध्याय ने भी कविता लिखी है। वैसे तो वो जो भी लिखती हैं वो भी कविता ही लगता है। लेकिन ऊ सब छोड़िये। अभी तो उनके लिखे मेरा मतलब रचे हुये को देखिये:
किचन हर रोज़ चढ़ता है उनपर परत दर परत
रंग, गंध, चाकू के निशान, जले के दाग जैसा

नहाने के पहले रगड़ती हैं उँगलियों पर नीम्बू
चेहरे पर लगाती हैं मलाई और शहद

जब बदन को घिस रहा होता है लैवेंडर लूफॉ
याद करती हैं किसी भूले आफ्टरशेव की खुशबू

आधी रात को नहाने वाली औरतें में बची रहती है
१६ की उम्र में बारिश में भीगने वाली लड़की
कविता की बात चली तो कविता तो अपने नीरज त्रिपाठी भी करते हैं -बल भर करते हैं। नमूना देखियेगा-
करते करते काम कभी गर तुम थक जाओ
कार्यालय में कुर्सी पर चौड़े हो जाओ

ऐसे सोओ सहकर्मी भी जान न पाएँ
रहे ध्यान ऑफिस में न खर्राटे आयें

ऐसे लो जम्हाई कि दूजे भी अलसाएं
मैनेजर की फटकारें लोरी बन जाएँ

चिंतन की मुद्रा में नींद का झोंका मारो
मीटिंग में मौका पाते ही चौका मारो

कुछ पुरानी पोस्टों से

पिछ्ले दिनों हिंदी ब्लॉगजगत के कई साथियों की किताबें आयीं। मुझे याद आया कि शुरुआती दौर के चिट्ठाकारों में से एक अतुल अरोरा की किताब कब से नेट पर पड़ी है। पूरी किताब बस छपने की देरी है। एक कनपुरिया लड़के के अमेरिकी किस्से। जैसा कि वे खुद लिखते हैं:
कानपुर की गलियों मे एलएमएल-वेस्पा चलाते चलाते एक दिन खुद को अटलांटा में एचओवी लेन में पाया| अभी तक तेजरफ्ता रही इस जिंदगी में, जो अभी तक गुजरा है, उसमें से जो कुछ खट्टा - मीठा या गुदगुदाता सा है उन्हें समेट कर रोचक संस्मरणों का संकलन तैयार किया है "लाईफ ईन ए एचओवी लेन"|
शीर्षक है लाईफ इन ए एचओवी लेन! अब आप पूछियेगा कि ई एच.ओ.वी.लेन क्या बला है। तो आइये आपको बता ही देते हैं (वैसे अगर आप पढ़ेंगे तो पता चल ही जायेगा) क्या होती है एच.ओ.वी.लेन! किताब की प्रस्तावना में अतुल बताते हैं-
अमेरिका के कुछ महानगरों के हाईवे में सबसे बाईं तरफ की लेन एचओवी यानि कि हाई आकूपेनसी वेह्किल लेन कहलाती है| अगर आप को कुछ दूर तक हाईवे से बाहर नही निकलना , तो एचओवी लेन में आप एकसमान तेज गति से सफर कर सकते है| ईसमें निश्चित अंतराल पर प्रवेश व निकास के चिन्ह निर्धारित होते हैं| बस एक बार एचओवी लेन में प्रवेश कीजिए और फर्राटे से बिना लाल बत्ती या लेन बदलने की चिंता किए भागते जाइऐ | अमेरिका में जिंदगी भी बस एचओवी लेन की तरह लगती है|
अब आपका मन करे तो आराम से बांचिये एच.ओ.वी.लेन के किस्से। दस अध्याय हैं। हर अध्याय के उप-अध्याय हैं। पहली पोस्ट नहीं भाई पहले अध्याय में अमेरिका जाने की सूचना मिलने पर जिसे कनपुरिया भाषा में कहते हैं -बवाल कटा। इसके बाद सलाह का दौर शुरु हुआ। देखिये सीन:
भला हो अमेरिका में पहले से रह रहे मित्रों का जिन्होने वक्त पर सही मार्गदर्शन कर दिया| यहाँ सब कुछ मिलता है| घर एयरकंडीशंड होते हैं अतः रजाई कोई नही ओढ़ता| मेरे एक मित्र को ऐसे ही विशेषज्ञों ने रजाई, कढ़ाई और न जाने क्या माल असबाब लाद कर ले जाने पर मजबूर कर दिया था| बेचारा एयरपोर्ट पर फौजी स्टाईल के बिस्तरबंद के साथ कार्टून नजर आ रहा था|
आगे के किस्से आप खुदै बांचिये। मजे की पूरी गारंटी। ये किस्से हैं सन दो हजार चार-पांच के आसपास के लिखे। पूरी किताब मस्त पड़ी है ब्लागर पर तबसे। जिसे मन आये पढ़ डाले। छाप दे। :)

मेरी पसंद

दूर से अपना घर देखना चाहिए
मजबूरी में न लौट सकने वाली दूरी से अपना घर
कभी लौट सकेंगे की पूरी आशा में
सात समुंदर पार चले जाना चाहिए
जाते-जाते पलटकर देखना चाहिए
दूसरे देश से अपना देश
अंतरिक्ष से अपनी पृथ्‍वी
तब घर में बच्‍चे क्‍या करते होंगे की याद
पृथ्‍वी में बच्‍चे क्‍या करते होंगे की होगी
घर में अन्‍न-जल होगा कि नहीं की चिंता
पृथ्‍वी में अन्‍न-जल की चिंता होगी
पृथ्‍वी में कोई भूखा
घर में भूखा जैसा होगा
और पृथ्‍वी की तरफ लौटना
घर की तरफ लौटने जैसा.
घर का हिसाब-किताब इतना गड़बड़ है
कि थोड़ी दूर पैदल जाकर घर की तरफ लौटता हूं
जैसे पृथ्‍वी की तरफ.


विनोद कुमार शुक्ल

और अंत में

आज के लिये फ़िलहाल इत्ता ही। बाकी फ़िर। शायद जल्दी ही। तब तक आप मस्त रहिये। व्यस्त भी।

Post Comment

Post Comment

Google Analytics Alternative