कल जब चिट्ठाचर्चा की तो पहली टिप्पणी डा. अरविंद मिश्र की आई! उन्होंने लिखा- अब तो उधिरा ही गए :)
हमें उधिराने का मतलब समझ नहीं आया। नेट पर सर्च किया तो देखा मिसिरजी ने अगस्त 2009 में भी टिपियाया था विवेक सिंह की एक पोस्ट पर- हा हा हा हम बूझते भये मगर बताएगें नहीं ..बहुत उधिरा गएँ हैं idhar !
भाव कुछ समझे बहुत कुछ नहीं समझे। फ़िर शब्दकोष देखा तो वहां मतलब गोल। तब तक सतीश पंचम मिल गये आनलाइन तो उन्होंने कुछ उदाहरण देकर मतलब समझाया। उधिराना मतलब अचानक उमड़ पड़ना, भभ्भड़ टाइप, टूट पड़ना, झुंड में आ जाना टाइप।
खोजबीन के इस सिलसिले में अनिल रघुराज की एक पुरानी पोस्ट पर पहुंचे। उन्होंने समय के अस्तित्व के बारे में विचार करे हुये बारिश के मौसम में पांखियों के उधिराने(उमड़ पड़ने ) का जिक्र करते हुये जानकारी दी कि शायद उनका बायलाजिकल क्लाक बदल गया होगा:
चंदू बाबू ने एक पोस्ट में शुद्ध गणित के रोमांस का जिक्र किया है। एक बाप की गणित से बचने की सीख से इस लेख की शुरुआत होती है:
अपने बचपन और नक्सली जीवन के बारे में उन्होंने विस्तार से अजित वडनेरकर के शब्दों के सफ़र में लिखा है| 1 जून सन चौसठ को आजमगढ़ से करीब बीस किलोमीटर दूर मनियारपुर गांव में जन्में चंद्रभूषण के प्रेम के रास्ते की अड़चन उनके ही शब्दों में सुनिये:
कुल 26 किस्तों में लिखे इन संस्मरणों में चंद्रभूषण ने अपने बचपन, परिवेश से होते हुये नक्सली बनने के किस्से यथासंभव निस्संगता से बयान किये हैं। अपनी कमियों का भी जिक्र किया है। आखिरी पोस्ट में वे लिखते हैं:
मेरी पसंद

पांच तो क्या एक भी गांव मुझे नहीं चाहिए।
सुई के नोक बराबर भी जमीन
तुम मुझे नहीं देना चाहते
मत दो, मुझे उसका क्या करना है।
मुझे तुमसे कोई युद्ध नहीं लड़ना
न जर, न जमीन, न जोरू के लिए
न बतौर कवि
एक जरा सी हैसियत के लिए।
मेरी महाभारत तो खुद मुझसे है
जिसे मैं जितना भी बस चलता है,
लड़ता रहता हूं।
किसी कुत्ते-कबूतर गोजर-गिरगिट की तरह
मेरे भी हाथ एक जिंदगी आई है
इसको तुमसे, इससे या उससे नापकर
मुझे क्या मिल जाएगा।
इस दुनिया में हर कोई अपने ही जैसा
क्यों नहीं रह सकता
इस पर इतना टंटा क्यों है
बस, इतनी सी बात के लिए
लड़ता रहता हूं।
मेरी कविता की उड़ान भी
इससे ज्यादा नहीं है
मेरी फिक्र में क्यों घुलते हो
मुझे तुमसे कोई युद्ध नहीं लड़ना।
चंद्रभूषण
और अंत में
एक टिप्पणी के बहाने टहलते हुये न जाने कित्ती पोस्टें बांच डाली। जितनी बांची उसके केवल कुछ अंश यहां दे पाया। बाकी के आपको शौक होगा तो आप खुदै खोज लेंगे। अब जब मामला खतम करने पर आया तो एक नया संयोग दिख रहा है कि जिनका भी जिक्र यहां हुआ वे सब के सब इलाहाबाद विश्वविध्यालय से डिग्री हासिल किये हैं अरविंद मिश्र, अनिल रघुराज, चंद्भभूषण। अब चलते-चलते एक ठो और इलाहाबादी की आवाज सुन लीजिये इस पोस्ट पर जाकर ऐ रंजन, अबे से रंजन
अब चला जाये। ज्यादा रुकेंगे तो कहीं अपने इलाहाबाद के किस्से ठेलने का मन करने लगेगा।
मजा करिये। मस्त रहिये। जो होगा देखा जायेगा।
हमें उधिराने का मतलब समझ नहीं आया। नेट पर सर्च किया तो देखा मिसिरजी ने अगस्त 2009 में भी टिपियाया था विवेक सिंह की एक पोस्ट पर- हा हा हा हम बूझते भये मगर बताएगें नहीं ..बहुत उधिरा गएँ हैं idhar !
भाव कुछ समझे बहुत कुछ नहीं समझे। फ़िर शब्दकोष देखा तो वहां मतलब गोल। तब तक सतीश पंचम मिल गये आनलाइन तो उन्होंने कुछ उदाहरण देकर मतलब समझाया। उधिराना मतलब अचानक उमड़ पड़ना, भभ्भड़ टाइप, टूट पड़ना, झुंड में आ जाना टाइप।
खोजबीन के इस सिलसिले में अनिल रघुराज की एक पुरानी पोस्ट पर पहुंचे। उन्होंने समय के अस्तित्व के बारे में विचार करे हुये बारिश के मौसम में पांखियों के उधिराने(उमड़ पड़ने ) का जिक्र करते हुये जानकारी दी कि शायद उनका बायलाजिकल क्लाक बदल गया होगा:
अनिल रघुराज की इस पोस्ट में ही चंद्रभूषण जी के मार्मिक संस्मरण का जिक्र था। अपने बचपन के दिनों को याद करते हुये चंद्रभूषण जी ने लिखा था:तीस-चालीस साल पुरानी इस बात को मैं भूल ही चुका था कि तीन साल पहले गांव गया। बारिश का मौसम था। अचानक एक दिन उधिरा गईं पांखियां। किसी रिफ्लेक्स एक्शन की तरह मेरी आंख अपनी घड़ी पर चली गई और मैं चौंक गया कि उस समय आठ नहीं, आठ बजकर दस मिनट हो रहे थे। मेरी घड़ी एकदम सही थी, आकाशवाणी के समय से मिली हुई थी। मैं फेर में पड़ गया कि या तो पांखियों की बायोलॉजिकल क्लॉक दस मिनट स्लो हो गई है या हमारे समय की घड़ियां दस मिनट फास्ट हो गई हैं।
एक बार तो बारिश की एक रात में मैंने अपने घर में सूर बड़े या तुलसी का झगड़ा हिंसक हद तक पहुंचते देखा है। बड़े भाई सूर वाले थे, शास्त्र उनके पक्ष में था- सूर सूर तुलसी ससी। मंझले भाई को कुतर्क का सहारा था। उन्होंने कहा, नहीं, सही यह है- सूर ससी तुलसी रवी। बरसात की उस रात में पांखी उधराई हुई थीं और मां सबसे जल्दी सो जाने को कह रही थी। आठ बजे के आसपास मुझे नींद आनी शुरू ही हुई थी कि मैंने देखा, बड़े भाई ने मंझले पर जलती हुई लालटेन फेंक मारी..
चंदू अपने मन की बातें अपनी कविताओं में कहते हैं। आज के बीहड़ समय में एक संवेदनशील मन की बात है उनका यह बयान:
मैं रात का राही हूं...पहले की तरह आज भी
हालांकि राहें अब पहले की तरह
कहीं आती-जाती नहीं दिखतीं।
उजालों से मुझे कोई नफरत नहीं है
सिर्फ इनके झूठ मुझे जीने नहीं देते।
सबकी तरह मैं भी इनकी चाकरी बजाता हूं
जरूरी हुआ तो प्रशस्ति भी गाता हूं
लेकिन जीने के लिए कहीं और चला जाता हूं।
चंदू बाबू ने एक पोस्ट में शुद्ध गणित के रोमांस का जिक्र किया है। एक बाप की गणित से बचने की सीख से इस लेख की शुरुआत होती है:
मेरे बेटे, समानांतर रेखाओं के फेरे में तो तुम हरगिज न पड़ना। यह रास्ता मेरे लिए अच्छी तरह जाना-बूझा है। न जाने कितनी अंतहीन रातें जाग कर मैंने इसकी थाह लेने की कोशिश की है लेकिन मेरे जीवन की सारी रोशनी, मेरी सारी खुशी इस प्रयास में स्वाहा हो गई। इसे उतनी ही हिकारत से त्याग दो, जैसे कोई सच्चरित्र व्यक्ति अवैध यौन संबंध के प्रस्ताव से नजरें फेर लेता है। यह तुम्हें जीवन के हर आनंद से वंचित कर देगा। तुम्हारा स्वास्थ्य चौपट हो जाएगा, आराम छिन जाएगा और तुम्हारे जीवन से प्रसन्नता सदा के लिए लुप्त हो जाएगी।'ये तो शुरुआत थी। आगे वे लिखते हैं:
एक विज्ञान के रूप में गणित की छवि किसी तपस्वी की साधना जैसी ही है। इसकी क्रांतिकारी खोजें भी प्राय: अचर्चित रह जाती हैं। या चर्चित होने में उन्हें इतना वक्त लगता है कि खोजी के लिए अपनी खोज ही बेमानी हो जाती है। इसके दो उज्ज्वल अपवाद यूनान के आर्किमिडीज और ब्रिटेन के आइजक न्यूटन हैं, जो जितने बड़े गणितज्ञ थे, उतने ही बड़े मिलिट्री साइंटिस्ट भी थे। उनका असर जितना आने वाले समय पर पड़ा, उतना ही अपने समय पर भी दर्ज किया गया। बतौर गणितज्ञ उनकी हैसियत को उनके शाही रुतबे के चलते कम करके नहीं आंका गया। लेकिन पिछली सदी में इस खेल के नियम बदल गए।इस खूबसूरत पोस्ट की सबसे अहम बात शायद यह है:
इंसान का लालच और उसकी खुदगर्जी संसार की हर चीज का इस्तेमाल कर सकती है। प्योर मैथमेटिक्स के पुजारी किसी भी गिरि-कंदरा में छिप जाएं, धंधेबाज लोग वहां से भी उनके काम को खोज लाएंगे और अपने धंधे में लगा लेंगे।चंदू जी ने अपने परिचय में बताया है:
नक्सली कार्यकर्ता रहा . इलाहाबाद , पटना और आरा में काम किया , जनमत पत्रिका में हाथ बँटाया . कविताएँ लिखीं , बहसें की और अभी हिंदी के पत्रकार के रूप में नोयडा / दिल्ली से इन्ही सारी चीज़ो के मायने समझने की कोशिश कर रहा हूँ .
अपने बचपन और नक्सली जीवन के बारे में उन्होंने विस्तार से अजित वडनेरकर के शब्दों के सफ़र में लिखा है| 1 जून सन चौसठ को आजमगढ़ से करीब बीस किलोमीटर दूर मनियारपुर गांव में जन्में चंद्रभूषण के प्रेम के रास्ते की अड़चन उनके ही शब्दों में सुनिये:
'जबतक किसी लड़की से मेरा परिचय नहीं होता, मैं उसके पीछे पलकें बिछाए घूमता हूं, लेकिन जैसे ही परिचय होता है, बातचीत होती है, वह मुझे बहन जैसी लगने लगती है।'बचपन के दिन कैसे बीते देखिये:
बड़ी लड़कियों के बीच चोटी-फीता किए छोटी लड़की बनकर पड़े रहने के दिन। सुबह-सुबह ताऊजी से दस पैसे मांगकर बहन के साथ टुघुर-टुघुर जलेबी लेने चौक तक चले जाने के दिन। चौक से घर लौटते हुए किसी गली में भटक जाने और फिर जैसे-तैसे खोज लिए जाने के दिन। आजतक मेरी याददाश्त के सबसे खुशनुमा दिन यही हैं।
कुल 26 किस्तों में लिखे इन संस्मरणों में चंद्रभूषण ने अपने बचपन, परिवेश से होते हुये नक्सली बनने के किस्से यथासंभव निस्संगता से बयान किये हैं। अपनी कमियों का भी जिक्र किया है। आखिरी पोस्ट में वे लिखते हैं:
भारत जैसे सामंती दबदबे वाले देश में न सिर्फ कम्युनिस्ट आंदोलन बल्कि बुनियादी मुद्दों को लेकर चलने वाले किसी भी लंबे आंदोलन के लिए पूरी तरह हथियार छोड़ कर चलना भी एक असंभव कल्पना ही लगता है। देश में शायद ही कोई पार्टी ऐसी हो, जिसके पास समय-समय पर सक्रिय होने वाले हथियारबंद लोगों की जमात न हो, हालांकि इनमें से ज्यादातर अपने को गांधीवादी और अहिंसक ही कहती हैं। …
चंद्रभूषण जी को पढ़ना अपने को पढ़ना जैसा लगता है।अगर ब्लॉग की सुविधा न होती तो शायद हम उनको बांच ही न पाते। चंदू की पोस्टों की खासियत है कि वे सब की सब पठनीय हैं। फ़ालतू के किस्से नहीं हैं उनके यहां। जिन लोगों को लगता है कि चिट्ठाजगत में केवल बवालिया अभिव्यक्ति होती है उनको चंदू के पहलू में आना चाहिये।
मेरी पसंद
पांच तो क्या एक भी गांव मुझे नहीं चाहिए।
सुई के नोक बराबर भी जमीन
तुम मुझे नहीं देना चाहते
मत दो, मुझे उसका क्या करना है।
मुझे तुमसे कोई युद्ध नहीं लड़ना
न जर, न जमीन, न जोरू के लिए
न बतौर कवि
एक जरा सी हैसियत के लिए।
मेरी महाभारत तो खुद मुझसे है
जिसे मैं जितना भी बस चलता है,
लड़ता रहता हूं।
किसी कुत्ते-कबूतर गोजर-गिरगिट की तरह
मेरे भी हाथ एक जिंदगी आई है
इसको तुमसे, इससे या उससे नापकर
मुझे क्या मिल जाएगा।
इस दुनिया में हर कोई अपने ही जैसा
क्यों नहीं रह सकता
इस पर इतना टंटा क्यों है
बस, इतनी सी बात के लिए
लड़ता रहता हूं।
मेरी कविता की उड़ान भी
इससे ज्यादा नहीं है
मेरी फिक्र में क्यों घुलते हो
मुझे तुमसे कोई युद्ध नहीं लड़ना।
चंद्रभूषण
और अंत में
एक टिप्पणी के बहाने टहलते हुये न जाने कित्ती पोस्टें बांच डाली। जितनी बांची उसके केवल कुछ अंश यहां दे पाया। बाकी के आपको शौक होगा तो आप खुदै खोज लेंगे। अब जब मामला खतम करने पर आया तो एक नया संयोग दिख रहा है कि जिनका भी जिक्र यहां हुआ वे सब के सब इलाहाबाद विश्वविध्यालय से डिग्री हासिल किये हैं अरविंद मिश्र, अनिल रघुराज, चंद्भभूषण। अब चलते-चलते एक ठो और इलाहाबादी की आवाज सुन लीजिये इस पोस्ट पर जाकर ऐ रंजन, अबे से रंजन
अब चला जाये। ज्यादा रुकेंगे तो कहीं अपने इलाहाबाद के किस्से ठेलने का मन करने लगेगा।
मजा करिये। मस्त रहिये। जो होगा देखा जायेगा।
तीस-चालीस साल पुरानी इस बात को मैं भूल ही चुका था कि तीन साल पहले गांव
गया। बारिश का मौसम था। अचानक एक दिन उधिरा गईं पांखियां। किसी रिफ्लेक्स
एक्शन की तरह मेरी आंख अपनी घड़ी पर चली गई और मैं चौंक गया कि उस समय आठ
नहीं, आठ बजकर दस मिनट हो रहे थे। मेरी घड़ी एकदम सही थी, आकाशवाणी के समय
से मिली हुई थी। मैं फेर में पड़ गया कि या तो पांखियों की बायोलॉजिकल
क्लॉक दस मिनट स्लो हो गई है या हमारे समय की घड़ियां दस मिनट फास्ट हो गई
हैं।


