शनिवार, जून 09, 2012

योजना आयोग का शौचालय और उस्ताद चिरकीन

पुराने जमाने में राजा लोगों को जहां कोई सुन्दर कन्या  दिखी प्रेमपूर्वक या जबरिया अपना लेते थे। अपने रनिवास में स्थापित कर लेते थे । नबाब लोग अपने हरम में  डाल लेते थे। उनके लिये कोपभवन की भी व्यवस्था करते थे।  इस मामले  में कवि /लेखक की प्रवृत्ति भी नबाब टाइप ही होती है। जहां कोई सुन्दर/असुन्दर आइडिया दिखा नहीं कि उसे अपने कब्जे में लेकर लेख/कवितायें निकाल देते हैं। कहा जाये  तो कवि/लेखक और आइडिया के गठबंधन  से रचनाओं का जन्म होता है।

यही हाल कल योजना भवन वाले आइडिये का हुआ। योजना भवन में मंहगा शौचालय बनने का आइडिया लोगों को दिखा नहीं कि उसे लोगों ने फ़ौरन झपट लिया और इस्तेमाल कर डाला। लेख लिख डाले, कार्टून बना डाले। कुछ वैसे ही जैसे कि शौचालय  दिखा नहीं कि लोग सोचते हैं निपट ही लें। वैसे  ही लोगों सोचा आइडिया मिला तो यूज ही कर लें। ई-स्वामी ने सही ही कहा था- चीजें अपना उपयोग कराती हैं।  :)

आलोक पुराणिक ने आइडिया यूज करते हुये व्यंग्य  थ्रो किया- स्मार्ट टॉइलेट में 'बिजी' योजना आयोग।
अपने लेख का नाड़ा काटते हुये वे  फ़रमाते हैं:  
योजना आयोग को पूरे देश में स्मार्ट भले ही ना माना जाता हो, पर वह टॉइलेट्स के मामले में तो स्मार्ट हो ही गया। वहां 60 अफसरों को टॉइलेट यूज करने के लिए स्मार्ट कार्ड दिए गए हैं।
शु्रुआत भले स्मार्टकार्ड से हुयी लेकिन वे चले उन्हीं कन्दराओं में गये जिनमें आजका व्यंग्यकार का मन रमता है। हाल में हुये  घपले-घोटाले उनको उसई तरह परेशान करें हैं जैसे कभी शेन वार्न को सपने में भी तेंदुलकर छेड़ते थे। वे राजा जी, कामनवेल्थ, बोरी/बारदाना घोटाला, गरीबी/अमीरी रेखा  के झरोखों से समस्या को निहारते हुये मामला फ़्लश कर देते हैं
जिसका टॉइलेट स्मार्ट कार्ड से चले, वह स्मार्ट। बाकी सारे गरीब। देश के गरीबों की तरफ से शाप है, तुम्हें योजना आयोग के अफसरों, जिस दिन तुम्हें बहुत जोर से आ रही हो, तुम्हारे स्मार्ट कार्ड खो जाएं, बिलकुल ना मिलें। फिर सड़क पर आना और समझना कि पब्लिक का दर्द क्या है। पाठक माई-बाप, बताना, शाप कुछ ज्यादा तो ना हो गया।
अमित  श्रीवास्तव इस आइडिये का बमबम उपयोग करते हैं । पहले वे शौचालय को सोचने की जगह बताते हैं और फ़िर  बताते हैं
मेरा फोटोअब अगर यह 'सोचालय' योजना भवन का हो तो जाहिर सी बात है , जहां पूरे देश के १२५ करोड़ लोगों की दिशा दशा सुधारने हेतु नीति निर्धारण करने वाले सोचने का कार्य करते हों तब उनके 'सोचालय' का प्रकार भी उच्च कोटि का होना ही चाहिए | इन भावनाओं के आगे ३५ लाख कुछ भी नहीं | ऐसे लोगों की नीयत में कोई खोट नहीं | अरे जब चिंतन का स्थान उपयुक्त होगा तभी सही और अच्छे विचार उनके मन में उत्पन्न होंगे और बाई प्रोडक्ट के रूप में उत्पन्न उनके विकार " शौचालय'" में विलीन हो जायेंगे और उत्पन्न विचार उसी "सोचालय" में मूर्त रूप धारण करेंगे |

बताते चलें कि अमित को हम लोग कालेज के से जमाने से ही मारे मोहब्बत के बमबम कहते रहे हैं। मोहब्बत में जबतक अटपटापन न हो तब तक मजा भी तो नहीं आता न। वैसे इस कालेजियट मोहब्त का फ़ायदा बाद में अमित  की  श्रीमती जी को भी हुआ, जिन्होंने अभी तीन दिन पहले ही घूंघट डालना सीखा है । उनको अपने महीन भाव व्यक्त करने के लिये कोई नया नाम खोजने में सर नहीं खपाना पड़ा।

अब अगर  शौचालय को सोचालय कहा जायेगा तो सागर भाई दिल्ली वाले  कहेंगे कि इ्सपर तो उनका ब्लागराइट सालों पुराना है।

मेरा फोटोइस मसले पर आदम और हव्वा के बहाने अपनी बात कहते हुये रवि रतलामी  जो कहते हैं वो नीचे देखिये:  
35 लाख का टॉयलेट - भारतीय योजना आयोग - अमीरी की रेखादेश/दु्निया के पिछड़े पन का जब भी रोना रोया जाता है तो चंद टसुये इस बात पर भी बहते हैं करोड़ों लोग आज भी खुल्ले में निपटते हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में 1.1 अरब लोग खुले में करते हैं शौचलेकिन यह भी सोचने वाली बात है कि अगर  कभी सारा देश बंद में निपटने लगेगा तो क्या होगा।

सोपान जोशी ने सबको शौचालय उपलब्ध होने की  स्थिति की कल्पना करते हुये सवाल किया है- खुले में शौच जाये तो शर्म क्यों आये? :
लेकिन अगर हरेक के पास शौचालय हो जाए तो बहुत बुरा होगा। हमारे सारे जल स्रोत-नदियां और उनके मुहाने, छोटे-बड़े तालाब, जो पहले से ही बुरी तरह दूषित हैं- तब तो पूरी तरह तबाह हो जाएंगे। आज तो केवल एक तिहाई आबादी के पास ही शौचालय की सुविधा है। इनमें से जितना मैला पानी गटर में जाता है, उसे साफ करने की व्यवस्था हमारे पास नहीं है। परिणाम आप किसी भी नदी में देख सकते हैं। जितना बड़ा शहर, उतने ही ज्यादा शौचालय और उतनी ही ज्यादा दूषित नदियां। दिल्ली में यमुना हो चाहे बनारस में गंगा, जो नदियां हमारी मान्यता में पवित्र हैं वो वास्तव में अब गटर बन चुकी हैं। सरकारों ने दिल्ली और बनारस जैसे शहरों में अरबों रुपए खर्च कर मैला पानी साफ करने के संयंत्र बनाए हैं। इन्हें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट कहते हैं। ये संयंत्र चलते हैं और फिर भी नदियां दूषित ही बनी हुई हैं। ये सब संयंत्र दिल्ली जैसे सत्ता के अड्डे में भी गटर का पानी बिना साफ किए यमुना में उंडेल देते हैं।

समस्या औ भी होगी और मामला जलसंकट को और बढ़ायेगा:
  जितने शौचालय देश में चाहिए, उतने अगर बन गए तो हमारा जल संकट घनघोर हो जाएगा पर नदियों का दूषण केवल धनवान लोग करते हैं, जिनके पास शौचालय हैं। गरीब बताए गए लोग जो खुले में पाखाने जाते हैं, उनका मल गटर तक पहुंचता ही नहीं है क्योंकि उनके पास सीवर की सुविधा नहीं है फिर भी जब यमुना को साफ करने का जिम्मा सर्वोच्च न्यायालय ने उठाया तो झुग्गी में रहने वालों को ही उजाड़ा गया। न्यायाधीशों ने अपने आप से ये सवाल नहीं किया कि जब वो पाखाने का फ्लश चलाते हैं तो यमुना के साथ कितना न्याय करते हैं।

बात जब शौचालय की चली तो बताते चलें कि निपटने की छोटे पैमाने की प्रक्रिया में चिरकना आता है। इसी नाम के एक शायर उस्ताद चिरकीन का जिक्र बोधिसत्व ने अपने ब्लॉग में किया था। वे लिखते हैं:
लोग बताते हैं कि चिरकीन साहब अलीगढ़ में रहते थे और हर मुद्दे को चिरके से जोड़ने की महारत रखते थे। विद्वानों का मत है कि चिरकीन का मूल अर्थ है बिखरी हुई टट्टी। आप समझदार हैं टट्टी का अर्थ झोपड़े की टाटी नहीं करेंगे ऐसा मुझे भरोसा है। टट्टी मतलब हाजत या कहें कि गू या हगा। चिरकीन की काव्य कला अद्भुत थी। बड़े-बड़े शायर उनसे पनाह माँगते थे। अच्छे-अच्छे मुशायरों में चिरकीन ने चिरका बिखेर दिया था। इस आधार पर कहा जा सकता है कि चिरकीन प्रात काल में स्मरणीय हैं। वंदनीय है। 
शायद चिरकीन की काव्य कला के विभिन्न पहलुओं के शेर पेश किये बोधि ने:

राष्ट्रीय एकता

चिरकिन चने के खेत में चिरका जगा–जगा
रंगत सबकी एक सी , खुशबू जुदा-जुदा।

स्वागत

बाद मुद्दत के आप का मेरे घर पर आना हुआ
तेज की घुमड़न हुई और धड़ से पाखाना हुआ।

इश्क

वस्ल के वक्त महबूबा जो गू कर दे

सुखा के रख लीजे, मंजन किया कीजे।
 आगे  जनता की बेहद मांग पर चिरका समाज का ब्लॉग बना।  आगे फ़िर प्रसिद्ध कथाकार सूरजप्रकाश जी चिरकी प्रंसग को आगे बढाते हुये लिखा :
• रूस में चिरकिन कई लोगों का सरनेम हुआ करता है.. इस नाम वाले कवि विद्वान और कवि वहां हुए हैं.
• चिरकीं दुनिया में अकेले ऐसे कवि नहीं थे जो अपनी रचना का आधार वहां से तलाशते थे.. फ्रांस, इंगलैंड में भी ऐसे कवि हुए हैं जिन्‍होंने गू, पाद, हगने की आदतों, और गू की ईश्‍वरीय खासियतों को अपनी रचना का आधार बनाया है.
• फ्रांस के Euslrog de Beaulieo, Gilles Corrozal और Piron, इंगलैंड के स्वि‍फ्ट ऐसे ही कवि हैं.
कुछेक बानगियां देखिये
Gilles Corrozel की कविता हैः
"Recess of great comfort
Whether it is situated
in the fields or in the citys
Recess in which no one dare enter
Except for cleaning his stomach
Recess of great dignity"
 इसी क्रम में मनोहरश्याम जोशी की किताब हरिया हरक्यूलीज की हैरानी के किस्से याद  आ रहे हैं। लेकिन वो फ़िर कभी।

मेरी  पसन्द

हमने कई बार नोट किया है की लड़कियां अपनी प्रोफाइल या कवर फोटो अकेले वाली नहीं लगाती हैं, 2-4 और लोग होते ही हैं । इस बात पे जब और सोचा तो लगा की निम्नलिखित कारण हो सकते हैं इसके :
१.  एक कारण जो सीधा सीधा लगा वो ये की कोई उन्हें एक बार में पहचान न पाए ।
 
२. हो सकता है की घर वालों का "फैमिली प्रेशर" हो कि अपनी फोटो नहीं डालोगी । इस तरह की फोटो डालकर वो ये कह के बच जाती हैं कि  देखो मैंने कहाँ "केवल" अपनी फोटो डाली है । बबिता, साधना, हेमा, जया भी तो हैं ।
 
३.  हो ये भी सकता है की वो कोई ऐसी फोटो लगाती हों जिसमे वो बाकी सबसे ज्यादा खूबसूरत (कम से कम खुद को तो ) लग रही हों, जिससे कोई पूछे की इनमे से तुम कौन हो तो कह सकें "वही जो सबसे खूबसूरत दिख रही है"।
  दरसल ये प्यार और फेसबुक का रिश्ता काफी गहरा है । कितनी ही प्रेम कहानियां यहाँ बनी होंगी । लोगो का कहना है कि सोशल नेटवर्किंग के आने से प्यार-इश्क का माहौल परवान चढ़ रहा है । कुछ लोग तो इसी चक्कर में सोशल नेटवर्किंग के विरोध में आ गए हैं । क्या पता आमिर खान को आने वाले टाइम में सोशल नेटवर्किंग के सपोर्ट में सत्यमेव जयते का एक आध  एपिसोड भी करना पड़े 
ये कहानी बहुत लम्बी है फिर कभी बताएँगे अभी मन नहीं कर रहा ।पर  जाते-जाते आपको  एक कालजयी शेर ज़रूर  सुना देते हैं :
 
उन्होंने गरियाया हमें हमारी ही वाल पे, उनकी इनायत है ,
कभी हम उसपे आये कमेंट्स, तो कभी लाइक्स को देखते हैं ।
Smile   


और अंत में 
 कन्नौज के लोकसभा उपचुनाव में  लगभग सभी पार्टियों के उम्मीदवारों ने समाजवादी पार्टी की  उम्मीदवार के चलते अपना नाम वापस ले लिया या नामांकन ही नहीं कराया। इस तरह वहां निर्विरोध निर्वाचन होने की बात चल रही है। ब्लागिंग सम्मान में भी जिस गति से लोग अपने नाम वापस  ले रहे हैं उससे यहां भी निर्विरोध चुनाव के हाल बन रहे हैं। साहित्य समाज का दर्पण है की तर्ज पर अब हमें कहना शुरू कर देना चाहिये - ब्लॉग समाज का आईना है।
फ़िलहाल इतने ही संतोष करिये। मजे करिये। नीचे वाला फोटो विस्फ़ोट से ! Smile
खुले में शौच जाये तो शर्म क्यों आये?

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शुक्रवार, जून 08, 2012

एक अलसाई सी चिट्ठाचर्चा

आज जरा अलसा सा गये। हालांकि उठ तो गये टाइम से लेकिन फ़िर इधर-उधर आवारागर्दी करते रहे। कुछ न कुछ बांचते रहे। कल मोहल्ला में अशोक चक्रधर जी के बारे में कुछ खबरें देखीं और फ़िर उनके सबूत । बड़ी देर सोचता रहा कि ......! बवाल है। तरह-तरह की टिप्पणियां आयी हैं।  इसके बाद विजय कुमार जी की ब्लॉगिंग के बारे में चिंता  देखी। इस पर नीरज गोस्वामी जी का कहना  है:
विजय जी मैं आपसे सहमत नहीं...मुझे ब्लॉग्गिंग में पांच वर्ष हो गए है और मैं अपने ब्लॉग पर नियमित रूप से लिखता आ रहा हूँ...मुझे अभी इस बात का अहसास नहीं हुआ के ब्लॉग जगत में गन्दगी फ़ैल रही है...मेरी मित्र संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है...ये आपके देखने का नजरिया है यदि आप गन्दगी देखेंगे तो आप को गन्दगी ही नज़र आएगी और अच्छाई पर नज़र रखेंगे तो अच्छाई...गिलास आधा भरा है या खाली ये आपकी सोच पर है...बजाय दूसरों की बातों से या कमेंट्स से दुखी होने के अच्छा है के हम पहले अपने आप को सुधारें दुसरे क्या कर रहे हैं उसकी फ़िक्र में दुबले न हों...ब्लॉग भी इस समाज और जीवन का हिस्सा है जो कुछ अच्छा बुरा समाज में होता है वो ही ब्लॉग में नज़र आता है इस पर अधिक दुखी या आश्चर्यचकित होने की जरूरत नहीं है..
गुलाब के साथ कांटे प्रकृति का नियम है. खुश रहें.
आपका भी कुछ कहने-वहने का मन हो कह-वह लीजिये। मौका भी है दस्तूर तो खैर है ही।

जब टहलना शुरु ही किये तो चिट्ठाचर्चा की शुरुआती पोस्टें भी देखी। सबसे पहली चर्चा देखी। उन दिनों इंडीब्लागीस के तहत ब्लागिंग के इनाम दिये जा रहे थे। हमने अंग्रेजी ब्लागरों के रुख को देखते हुये लिखा था:

बहरहाल,एक और मजेदार नजारा दिखा .ज्यादातर महारथी अपने ब्लाग के लिये वोट देने का अनुरोध कर रहे हैं. अंग्रेजी में पता नहीं क्या कहते हैं इसे पर हिंदी में कहते हैं -वोट के लिये दांत चियार रहा है.इस मामले में भी हिंदी वाले बहुत पिछड़े है.तीन में से किसी को भी मिलेगा पहला स्थान सब सोचेंगे कि हमें ही मिला है.
यह बात आज से सात साल पहले की है। गये सालों में हिंदी वालों का  पिछड़ापन दूर हुआ है और जहां कहीं वोटिंग /सेटिंग से इनाम की बात चलती है हिंदी चिट्ठाकारों ने भी जम के दांत चियारना शुरु कर दिया है।

जब कभी बाल चिट्ठाकारों की बात चलती है तो पाखी , आदित्यलविजा , जादू (जी) आदि बच्चों के ब्लागों की चर्चा होती है। आदित्य से और उनके माता-पिता से तो पिछली जोधपुर यात्रा में मिलने का सौभाग्य भी मिला। ये सभी ब्लॉग 2008 या उसके बाद बने।  पिछली चर्चा देखते हुये याद आया कि रविरतलामी जी ने इगा के ब्लाग की चर्चा की थी। यह ब्लाग 2007 से चालू है। जुलाई 2007 की एक पोस्ट में इगा लिखती हैं:
अभी -कुछ दिन पहले ही भारत से लौटी हूँ | तीन सप्ताह मे जितनी हिंदी और अक्लमंदी भारत से सीख कर आयी हूँ उतना तो पापा-ममी ३ सालों में नही सीखा पाए| वो कहावत -' खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे' , पूरी तरह से लागू हो रही है इन दोनो पर |

इस बीच परिकल्पना पर दशक के पांच चिट्ठाकारों की सूची जारी हुई। उनमें पहला नाम पूर्णिमा वर्मन जी का है।
अंतर्जाल पर आज जितनी भी हिंदी दिखती है उसके लिये सबसे ज्यादा योगदान देने वालों की अगर कोई सूची बने तो उनमें से एक नाम पूर्णिमा जी का जरूर होगा। पूर्णिमा जी का जन्मदिन इसी माह की 27 तारीख को है। 2006 में उनके जन्मदिन के मौके पर उनका परिचय अपने ब्लाग पर लिखा था। इसी मौके पर उनसे हुयी बातचीत के वे अंश यहां पेश हैं जो उस समय के ब्लागिंग के परिदृश्य की जानकारी देते हैं।

हिंदी के कई चिठ्ठाकार आपके नियमित लेखक हैं- रवि रतलामी, अतुल अरोरा,प्रत्यक्षा आदि। चिठ्ठाकारी के प्रति आपके क्या विचार हैं?

रवि जीकी प्रतिभा बहुमुखी है इससे आप इनकार नहीं करेंगे। वे लगभग शुरू से ही हमारी पत्रिका से जुडे हुए हैं। उनके व्यंग्य और कविताएं लोगों ने पसंद की हैं। प्रौद्योगिकी के उनके नियमित स्तंभ ने उनके बहुत से शिष्य बनाए होंगे। मुझे यह बहुत बाद में पता चला कि वे हिंदी कंप्यूटिंग के क्षेत्र के जाने-माने विद्वान हैं। हमारे साथ स्तंभ लिखना उन्होंने बहुत बाद में शुरू किया। चिठ्ठाकारी लोग नियमित रूप से करते हैं और अक्सर व्याकरण और वर्तनी पर ध्यान नहीं देते। संपादन भी नहीं होता है पर इसका मतलब यह नहीं कि उन लेखकों में प्रतिभा नहीं या उनकी हिंदी अच्छी नहीं। कुछ तो सुविधाओं की कमी है जैसे हर एक के पास हिंदी आफ़िस नहीं जो गलत वर्तनी को रेखांकित कर सके, दूसरे समय की भी कमी है। अगर इन्हीं लोगों को समय और सुविधा मिले तो हिंदी साहित्य का कायाकल्प हो सकता है। जब मैंने अतुल के कुछ छोटे आलेख देख कर उनसे नियमित स्तंभ की बात की थी तब वे रचनात्मक आकार में नहीं थे। उन्होंने समय और श्रम लगा कर उसे जो आकार दिया उसे सबने पसंद किया। इसी तरह बहुत से चिठ्ठे ऐसे हैं जिन पर ध्यान दिया जाए तो वे स्तरीय साहित्य की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। हमें प्रसन्नता होगी अगर ऐसे लोग हमारे साथ आकर मिलें और अभिव्यक्ति का हिस्सा बनें। चिठ्ठा लिखने में किसी अनुशासन या प्रतिबध्दता की जरूरत नहीं है। आपका मन है दो दिन लगातार भी लिख सकते हैं और फिर एक हफ्ता ना भी लिखें। पर जब पत्रिका से जुडना होता है तो अनुशासन और प्रतिबध्दता के साथ-साथ काफ़ी लचीलेपन की भी जरूरत होती है। ये गुण जिस भी चिठ्ठाकार में होंगे वह अच्छा साहित्यकार साबित होगा। प्रत्यक्षा हमारी लेखक पहले हैं चिठ्ठाकार बाद में। विजय ठाकुर और आशीष गर्गआदि कुछ और चिठ्ठाकारों के बारे में भी सच यही है ।


पूर्णिमा वर्मन>
आपने चिठ्ठा लिखना शुरू किया था। अश्विन गांधी के चित्रों के साथ कुछ खूबसूरत कविताएं लिखीं थीं, चिठ्ठा लिखना स्थगित क्यों कर दिया?

 हमेशा के लिए स्थगित नहीं हो गया है। थोडा रुक गया है. मुझे अपनी कविताओं के लिए जैसे ले आउट की जरूरत थी उसके लायक तकनीकी जानकारी मेरे पास फिलहाल नहीं है। जैसे पृष्ठ मुझे चाहिए उसके लिए काफ़ी प्रयोग की आवश्यकता है जिसका समय नहीं मिल रहा है। कुछ चिठ्ठाकर जरूर ऐसे होंगे जिन्हें ब्लॉग पर ले आउट और ग्राफ़िक्स के प्रदर्शन की बढिया जानकारी होगी। शायद मुझे कोई ऐसा सहयोगी मिल जाए जो इस काम में सहयोग कर सके। पर अभी तक ऐसा हुआ नहीं है। अगर हो भी तो इस व्यस्तता के दौर में दोनों ओर से काम करने का समय और सुविधा का संयोग होना भी जरूरी है।

कुछ हमारे जैसे चिठ्ठाकार हैं जो आपको जबरदस्ती अपना लिखा पढाते रहते हैं. क्या आप अन्य लोगों को भी नियमित पढ पाती हैं?

 चिठ्ठाकार की सदस्य हूं तो नियमित मेल आती है। लगभग सभी नए चिठ्ठाकारों के चिठ्ठे मिल जाते हैं। काफ़ी चिठ्ठे देखती हूं पर सभी लेख पढे हैं ऐसा नहीं कह सकती कभी-कभी छूट भी जाते हैं। साहित्य से समाज में बदलाव की आशा करना कितना तर्क संगत है? दो सौ प्रतिशत तर्क संगत है। आप ध्यान दें तो पाएंगे कि दुनिया के सभी क्रांतिकारी श्रेष्ठ लेखक हुए हैं। हां, लेखक में क्रांतिकारी के गुण होने चाहिए। मैं गांधी जी की इस कथन में विश्वास रखती हूं कि ''मुठ्ठी भर संकल्पवान लोग जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं।'' 

फ़िलहाल इतना ही बाकी फ़िर कभी।  

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