गुरुवार, जून 28, 2012

अति, अतिरेक, और अतिरंजनाओं के बीच ब्लौगिंग

इन दिनों बहुत से ब्लौगरों ने फेसबुक और ट्विटर की बढ़ती लोकप्रियता और सुविधाओं पर चर्चा की. सारी बातों का निचोड़ यह निकला कि फेसबुक और ट्विटर त्वरित और क्षणिक गतिविधि के रूप में अधिक उपयोगी हैं पर इनमें ब्लौगिंग जितनी व्यापकता और विमर्श की कमी है. यह सही है.  विधिवत ब्लौगिंग करने के लिए आपको कम्प्युटर की ज़रुरत होगी जबकि फेसबुक और ट्विटर का सञ्चालन मोबाईल पर भी भली-भांति किया जा सकता है. मेरे पास बाबा आदम के ज़माने का मोबाईल है जिसमें इंटरनेट नहीं आता इसीलिए मैं अभी तक फेसबुक और ट्विटर का उपयोग एक सीमा से अधिक नहीं कर पाया हूँ.  

मैं अक्सर ही बहुत विविध विषयों को इंटरनेट पर सर्च करता हूँ और सर्च के परिणाम स्वरूप मुझे अनेक  नए ब्लौगों के बारे में पता चलता है. यह भी देखने में आता है कि बहुतेरे ब्लौगर आइसोलेटेड होकर ब्लौगिंग कर रहे हैं और उनका कोई पाठक वर्ग नहीं है. यही कारण है कि ऐसे ब्लौगरों में से ज्यादातर ब्लौगर कुछ पोस्ट लिखने के बाद ब्लौगिंग करना छोड़ देते हैं. हिंदी में ऐसे अनेक बेजोड़ ब्लॉग हैं जिनमें पिछले चार-पांच सालों में एक भी पोस्ट नहीं लिखी गयी है. कल को ऐसा भी हो सकता है कि गूगल या अन्य ब्लॉग सेवा प्रदाता कम्पनियाँ ऐसे ब्लौगों को निष्क्रिय मानकर डिलीट कर दे. इसका एक ही समाधान है कि हम ऐसे ब्लौगरों से संपर्क साधकर उन्हें कभी-कभार एक पोस्ट लिखने के लिए प्रेरित करें. निष्क्रिय पड़े ब्लौगों के डिलीट हो जाने पर उनमें प्रस्तुत सामग्री हमेशा के लिए लुप्त हो जायेगी क्योंकि इन ब्लौगरों ने उसे संजो कर नहीं रखा होगा.

दो दिन पहले मैं संस्कृत साहित्य के एक आख्यान को याद करने का भरसक प्रयास कर रहा था और इसके लिए मैंने फेसबुक पर मित्रों की सहायता भी मांगी. स्मृति के आधार पर मैंने हिंदी में कुछ कीवर्ड गूगल पर डालकर सर्च किया तो मुझे एक ब्लॉग में संस्कृत का वह श्लोक मिल गया जो मैं खोज रहा था. वह श्लोक यह है:



विप्राअस्मिन् नगरे महान् कथय कस्तालद्रुमाणं गणः
को दाता रजको ददाति वसनं प्रातर्गृहीत्वा निशि
को  दक्षः  परवित्तदारहरणे सर्वोपि  दक्षो  जनः
कस्माज्जीवसि हे सखे! विषकृमिन्यायेनजीवाम्यहम्.
(चाणक्य नीति, अध्याय 12, श्लोक 9)
एक ब्राहमण से किसी ने पूछा, "हे विप्र ! इस नगर में बड़ा कौन है?" 
ब्राहमण बोला, "ताड़ के वृक्षों का समूह".
प्रश्नकर्ता ने पूछा, "दानी कौन है?" 
ब्राहमण ने कहा, "धोबी. वह प्रातः काल कपड़े ले जाता है और शाम को ले आता है."
प्रश्नकर्ता ने फिर पूछा, "यहाँ चतुर कौन है?" 
उत्तर मिला, "दूसरों की बीवी को चुराने में सभी चतुर हैं"
प्रश्नकर्ता ने आश्चर्य से पूछा, "तो मित्र ! फिर तुम यहाँ जीवित कैसे रहते हो?"
तो उत्तर मिला, "मैं तो ज़हर के कीड़ों की तरह बस किसी तरह जी ही रहा हूँ!"

कृपया हर कथा या आख्यान की भांति उपरोक्त श्लोक को ब्लॉग जगत की दशा/दिशा से जोड़कर नहीं देखें, अन्यथा इसकी गति भी लोमड़ी और शेर वाली निर्दोष कथाओं की भांति होगी. मैं यहाँ सिर्फ यह बताना चाह रहा हूँ कि जिस चीज़ को मैं यहाँ-वहां खोज रहा था वह सर्च करने पर मात्र पांच सैकंड में एक ब्लॉग पर मिल गयी. श्री अमित त्यागी के जिस पोस्ट में यह श्लोक उद्घृत है उसमें भारत की वर्तमान परिस्थितियों का खाका खींचा गया है. त्यागी जी लिखते हैं:


"एक सज्जन व्यक्ति बड़े से शोरूम के बाहर से गुज़रा। वह शोरूम को अंदर से देखना चाहता था। उसने गेट पर बैठे एक चौकीदार से पूछा क्या मैं अंदर जा सकता हू ? चौकीदार ने मना कर दिया। सज्जन व्यक्ति चुपचाप एक तरफ बैठ गया। तभी एक ‘कूल डूड’ आया और सीधा अंदर चला गया। सज्जन व्यक्ति ने चौकीदार से पूछा ? आपने उसको क्यों जाने दिया तो चौकीदार बोला उसने मुझसे पूछा ही कब था..?...  नियमों को मानने वालों की यही नियति होती है। संपूर्ण व्यवस्था में उनकी स्थिति एक एलियन से कम नही होती ? भ्रष्ट एवं कमज़ोर तंत्र की यह विचित्र विडंबना है कि ईमानदार एवं पाबंद व्यक्ति की गुजर यहॉ एक दिन भी संभव नही है। ...सब चलता है.... के कांसेप्ट ने ही आज हमें उस मुकाम पर ला खड़ा किया है जहॉ 121 करोड़ लोगों में अन्ना हजा़रे एंड पार्टी दूसरे ग्रह के प्राणी जैसे लगने लगे हैं।"


यहाँ यह स्पष्ट करना ज़रूरी होगा कि उपरोक्त श्लोक मुझे हिंदी व संस्कृत के अनेक ब्लौगों पर ही नहीं बल्कि मराठी और अंग्रेजी के ब्लौगों पर भी उद्घृत मिला. हिंदी और अंग्रेजी से इतर भी एक दुनिया है ब्लौगिंग की जो यकीनन समृद्ध होगी और शायद कई मामलों में बेहतर भी. इधर हम अपनी कूपमंडूकता में ही मस्त फन्ने खाँ बने जा रहे हैं.


बहरहाल, त्यागी जी की उपरोक्त पोस्ट का विषय है भ्रष्टाचार. इसपर अब इतनी बात हो चुकी है कि बहुतेरे लोग  उकता गए हैं. हम यह अपेक्षा करते हैं कि सभी का आचरण आदर्श हो जाए तो समस्या का समाधान हो जायेगा लेकिन यह होना मुश्किल है, जैसा फिल्म 'दीवार' के एक संवाद में कहा गया कि "आदर्श और उसूल... इनको गूंथकर दो वक़्त की रोटी नहीं बनती". फिर किया क्या जाए?


"हम भारतीय लोग कार्यो को अधूरा छोड़ देते हैं। कुछ समय काले धन एवं स्विस बैंक पर ध्यान लगाते हैं फिर खापों के तुगलकी फरमानों और अनावश्यक दिये जाने वाले फतवों का प्रतिकार करते हैं। कुछ समय महॅगाई पर भी चर्चा करते हैं। विश्व कप विजय का जश्न तो ऐसे मनाते हैं जैसे यह विजय हमारी समस्याओं के उपर समाधान की जीत हो। शायद हम कोई भी कार्य हाथ में लेकर एक सिरे से निपटाते नही हैं। समस्याए काफी उलझी हुयी हैं एवं रास्ता जटिल है। धरना प्रदर्शन करने वाले विपक्ष का कार्य भी सिर्फ सत्ता पक्ष का विरोध करना मात्र होता है मुद्दों को सुलझाना नही। मुद्दो के सुलझते ही सबकी राजनैतिक जमीन ही खिसक जायेगी।" (त्यागी जी की पोस्ट से)

डॉ. अरविन्द मिश्र जी ने भी अपनी ताज़ा पोस्ट भ्रष्टाचार के बिंदु पर लिखी है. इस समस्या का समाधान यद्यपि वह भी नहीं सुझा पाए. एक समाधान दिखता है सो उनकी ही पोस्ट में:


"गीता में कहा गया है - यद्यदाचरति श्रेष्ठः तद्देवो इतरो जनः स यतप्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते मतलब जैसा आचरण 'श्रेष्ठ ' लोग करते हैं वैसा लोग अनुसरण करते हैं। अगर ऊपर के लोगों का आचरण पारदर्शी निष्कलंक हो जाए तो नीचे तो अपने आप चीजें सुधर जाएं। ज्यादातर मुलाजिम ऊंचे ओहदों पर कार्यरत बॉस का ही तो अनुसरण करते हैं।"


भ्रष्टाचार रोग है, कोढ़ है, नासूर है, यह है, वह है... पिछले कुछ अरसे में यह सब पढ़-पढ़कर मन उकता गया है. फिर भी, मिश्र जी ने सरकारी सेवक होने के नाते अपनी दुविधा को भली प्रकार व्यक्त किया है. उनकी पोस्ट पर संजय अनेजा जी का बेहतरीन कमेन्ट पढ़िए. कमेन्ट की आखिरी लाइन अतिरोचक है:)


"मैं एक साधारण सा मुलाजिम हूँ और मैंने यह पहले दिन से तय कर रखा है कि मुझे घूस नहीं लेनी है, किसी से undue benefit नहीं लेना है और जब और जहां मौक़ा मिलता है अपने डीस्क्रीशन का अपनी समझ में जेनुईन जगह पर प्रयोग करता हूँ, उसके लिए नियमों को गीता-कुरआन नहीं मान लेता. ये वो बातें हैं जिन्हें मैं खुद पर लागू कर सकता हूँ और इस सबके लिए किसी अन्ना, केजरीवाल या किसी और मसीहा का इंतज़ार नहीं करता. सौ प्रतिशत ईमानदारी की गारंटी नहीं देता, सौ प्रतिशत प्रयास की गारंटी देता हूँ. घूस लेता नहीं हूँ लेकिन कई बार देनी जरूर पड जाती है :( 'सम्वेदना के स्वर' पर डा.पी.सी.चरक वाली कड़ियाँ आपने पढ़ी हैं? न पढ़ी हों तो पढ़ देखियेगा, जिस व्यवस्था के हम पुर्जे हैं उसका एक अलग ही नजरिये से अवलोकन है|
आपकी 'नारी देह नारी मन' विषय विशेषज्ञता से इतर यह पोस्ट पसंद आई|"


मुझे संजय भाई की कुछ दिन पुरानी वह पोस्ट याद आ गयी जिसमें उन्होंने ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने की प्रणाली का वर्णन किया था.

अनुराग शर्मा जी के ब्लॉग में फेसबुक और ब्लौगिंग में आयेदिन सामने आनेवाली परेशानियों का विमर्श किया गया है. ब्लौगिंग विषयक पोस्टों की यह विशेषता है कि उन्हें खूब पाठक और टिप्पणियां मिलतीं हैं, हांलांकि अनुराग शर्मा जी को पढ़ने और टिपियाने वाले कम नहीं हैं. उक्त पोस्ट पर बहुतेरे कमेन्ट भी पढ़ने लायक हैं. यदि सारे कमेंटों को निकालकर केवल डॉ. मिश्र के पहले कमेन्ट को ही रख दिया जाये तो भी बात वहीं रहेगी. बकौल मिश्र जी, "ग़म ही ग़म है मुई इस ब्लागिंग में".


कल की पोस्ट में अनूप जी ने फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' पर आई अनेक पोस्टों की खोजखबर ली थी. हर चर्चित फिल्म को देखने की ख्वाहिश करता हूँ पर उसके बारे में इतना पढ़ लेता हूँ कि उसके लगभग हर पक्ष से परिचित हो जाता हूँ. ऐसे में अगर फिल्म देखने जाऊं भी तो लगेगा कि यह फिल्म ना जाने कितनी बार देखी जा चुकी है. 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के साथ भी यही हुआ है. भिन्न-भिन्न अभिरुचियों और झुकाव वाले ब्लौगरों ने इसपर बहुत कुछ लिख दिया. इसी कड़ी में कबाड़खाना पर अनिल यादव का रिव्यू जैसा फेसबुक स्टेटस पोस्ट किया गया जो इस फिल्म की अतिरंजनाओं और अरुचिकर स्थापनाओं को बहुत अच्छे से बयान करता है. आश्चर्य है कि यह पोस्ट अधिकांश पाठकों की नज़र से चूक गयी. पोस्ट में अंत में जो कुछ कहा गया है उसे हम अच्छे/बुरे सिनेमा की स्तरीय परिभाषा भी मान सकते हैं: 


"हर बेहतर फिल्म निजी जिंदगियों की कहानी कहती है और इस तरह से विस्तार लेती है कि वह कहानी निजी न होकर सार्वभौमिक हो जाती है- कोई बड़ा सत्य उद्घाटित करती है (उदाहरण- रोमान पोलांस्की की पियानिस्ट, स्पाइडरमैन, बैटमैन सिरीज़ या फिर सलीम-जावेद की लिखी अमिताभ की फिल्में) यहां उल्टा है, इतिहास से चलती हुई कहानी अंत तक पहुंचते-पहुंचते एक व्यक्ति की निजी जिंदगी के फंदे में झूल जाती है.”

नारी ब्लॉग पर वंदना जी की एक कविता को लेकर विमर्श हुआ. वंदना जी की कविता में स्तन कैंसर से ग्रस्त स्त्री की शल्य चिकित्सा के बाद उसमें जनित अपूर्णता के विचार का अन्वेषण है  क्योंकि स्त्री के वक्ष उसके स्त्री होने और स्त्रीयोचित सौंदर्य का प्रतिमान हैं. वंदना जी की पोस्ट पर और नारी ब्लॉग पर इस तथाकथित अपूर्णता और सौन्दर्यबोध को लेकर खासा विमर्श हुआ जिसमें कई कमेंट्स पढ़ने लायक हैं. पोस्टों पर महत्वपूर्ण कमेन्ट करनेवाली ब्लौगर आर. अनुराधा कैंसर के इस प्रकार से पर विजय प्राप्त कर चुकी हैं. उन्होंने अपने अनुभवों पर एक किताब भी लिखी है जिसके बारे में डॉ. सुषमा नैथानी जी ने लिखा था. पूरी पोस्ट में मुझे अनुराधा और अदा जी के कमेंट्स बेजोड़ लगे:



अनुराधा - "दरअसल मुझे लगता है कि यह सारी समस्या महिमामंडन की, अतिरेक की है। मां का महिमामंडन, फिर इस बीमारी का और उससे होने वाले 'नुकसान' का। क्यों नहीं इसे भी एक बीमारी की तरह देखा जा सकता? इसका भी इलाज है, समस्याएं हैं और इसके साथ भी जीवन है। क्या दूसरी सैकड़ों बीमारियां इसी तरह अनिश्चित भविष्य वाली नहीं होती? क्या सिर्फ इसलिए कि पुरुषों को अपने खेल के 'खिलौने' में कुछ कमी हो गई लगती है, यह बीमारी इतनी बड़ी समस्या बन जाती है? 



अदा - "कोई उनसे जाकर पूछे जो इस दौर से गुजरतीं हैं, उन्हें अपना वक्ष प्रिय था या प्राण..

एक से एक सुन्दर इन्सान उम्र के साथ बन्दर हो जाता है, वो वक्ष जो प्राण लेने पर उतारू हो उसका नहीं होना ही ठीक है, और अगर इस कमी की वजह से कोई किसी को असुंदर दिखती है, तो देखने वाले के दिमाग ईलाज होना चाहिए, ख़ूबसूरती ३४-३२-३४ के इतर भी होती है...देखने वाली नज़र चाहिए..."

अंत में बेजोड़ चित्रकार और शानदार कवि रवि कुमार की कविता इस ब्लॉग से:

कोई यदि पूछेगा
सबसे बेहतर रंग कौनसा है
मैं कहूंगा मिट्टी का
यदि कोई पूछेगा
सबसे दिलकश गंध किसकी है
मैं कहूंगा पसीने की


कोई यदि पूछेगा
स्वाद किसका सबसे लज्जत है
मैं कहूंगा रोटी का


यदि कोई पूछेगा
स्पर्श किसका सबसे उत्तेजक है
मैं कहूंगा आग का
कोई यदि पूछेगा
किसकी आवाज़ में सबसे ज़्यादा खनक है
मैं कह उठूंगा मेरी ! तुम्हारी !

ज्ञानदत्त जी इस बीच अपने पुत्र का विवाह अत्यंत सादगी से संपन्न करा आये. उन्हें बहुत-बहुत बधाई. उनकी ताज़ा पोस्ट में सुशील और उसकी चाय की गुमठी का ज़िक्र है. पिछले कुछ समय से उनकी पोस्टों का क्रम कुछ टूटा था. उनके ब्लॉग पर इस बीच घटित हुई बातों का लेखाजोखा चित्रों के साथ पढ़ने को मिलेगा, इसी आशा के साथ. धन्यवाद.


पुनश्च: ज्ञानदत्त जी के फेसबुक स्टेटस से:



राजा ने दरवेश से पूछा, "मरने के बाद लोग कहां जाते हैं?" दरवेश बोला, "मुझे नहीं मालुम। मैं अभी मरा नहीं!"

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बुधवार, जून 27, 2012

चलो एक कप चाय हो जाये

कुछ दिन हुये अपन ने बजरिये पापुलर मेरठी बताया था:
मवालियों को न देखा करो हिकारत से
न जाने कौन सा गुंडा वजीर हो जाए
आज देखते हैं कि अपने शब्द-सरदार साहब अजित वडनेरकर जी ने इसकी तसदीक भी कर दी कि गुंडा मतलब उभरा हुआ मतलब लोगों से अलग मतलब नायक मतलब नेता। तसल्ली से बताते हुये अजित जी बताते हैं:
"कन्नड़ में गण्डा का अर्थ होता है मोटा आदमी । इसका एक अन्य अर्थ है शक्तिशाली पुरुष । ध्यान रहे उभार की अर्थवत्ता के चलते ही गण्ड में नायकत्व का भाव आया है अर्थात जो दूसरों से ऊपर दिखे ।"

अब नेता जो होता है अपने अनुयायियों से घिरा रहता है, सबसे अलग दिखता है। यही तत्व गुंडे में भी होते हैं। तो अगर नेताजी को कोई गुंडा कहता है तो उनको बुरा नहीं मानना चाहिये। लेकिन ऐसा होगा नहीं न! वे हरकतें गुंडों सरीखीं करते हैं लेकिन मानते नहीं अपने को गुंडा। काश वे शब्दों का सफ़र पढ़ते होते। वैसे जब भी कभी गुंडागीरी की बात होती है, मुझे जयशंकर प्रसाद की कहानी’गुंडा’याद आती है। देखिये उस समय के गुंडे कैसे होते थे:
समस्त न्याय और बुद्धिवाद को शस्त्र-बल के सामने झुकते देखकर, काशी के विच्छिन्न और निराश नागरिक जीवन ने, एक नवीन सम्प्रदाय की सृष्टि की। वीरता जिसका धर्म था। अपनी बात पर मिटना, सिंह-वृत्ति से जीविका ग्रहण करना, प्राण-भिक्षा माँगनेवाले कायरों तथा चोट खाकर गिरे हुए प्रतिद्वन्द्वी पर शस्त्र न उठाना, सताये निर्बलों को सहायता देना और प्रत्येक क्षण प्राणों को हथेली पर लिये घूमना, उसका बाना था। उन्हें लोग काशी में गुंडा कहते थे।
बहरहाल बात गुंडागीरी से शुरु हुई तो आपको तो पता ही होगा कि आजकल एक ठो पिक्चर बनी है कोयला माफ़िया के किस्से और राजनीति दिखाने के लिये। नाम धरा गया है -गैंग्स आफ़ वासेपुर। तमाम लोग इस फ़िलिम पर अपनी राय बता चुके हैं। रवीश कुमार की बतावन सबसे ज्यादा चर्चा में रही। वे कहते हैं- गैंग्स आफ वासेपुर-गुंडई का नया महाकाव्य है। अपनी बात का लब्बो-लुआब रवीश शुरुऐ में बता देते हैं:
जो लोग बिहार की राजनीति के कांग्रेसी दौर में पनपे माफिया राज और कोइलरी के किस्से को ज़रा सा भी जानते हैं वो समझ जायेंगे कि गैंग्स आफ वासेपुर पूरी तरह एक राजनीतिक फिल्म है और लाइसेंसी राज से लेकर उदारीकरण के मछलीपालन तक आते आते कार्पोरेट,पोलिटिक्स और गैंग के आदिम रिश्तों की असली कहानी है।
गौरव सोलंकी अपनी बात कहते हुये शीर्षक में ही सब कुछ कह देते हैं-वासेपुर की हिंसा हम सबकी हिंसा है जिसने कमउम्र फ़ैज़लों से रेलगाड़ियां साफ़ करवाई हैं! इसी सिनेमा के अभिनेता मनोज बाजपेयी फ़िलिम के अपने विचार लिखवाते हैं:
गैंग्स ऑफ वासेपुर की चर्चा उत्साहित करने वाली है। लेकिन, पता नहीं फिल्म को लेकर अति उत्सुकतावश क्या क्या लिखा जा रहा है। एक मायने में यह अच्छा है, लेकिन दूसरी तरफ कई गलतफहमियां भी फैलती हैं। आज सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट मिल गया है। ए सर्टिफिकेट मिला है। यह बात हमें मालूम थी। हम सब संतुष्ट भी हैं। फिल्म के सेंसर बोर्ड में अटकने को लेकर जो अफवाहें थी, वो सही मायने में अफवाहें ही थीं।
मजे की बात है जिस वासेपुर के नाम पर फ़िलिम बनी वहां के लोग नाराज हैं इस बात पर कि उनके कस्बे को गलत तरीके से दिखाया गया है देखिये पंजाब केसरी की खबर :
जहां इस फिल्म को देश भर में सराहना मिल रही है तो दूसरी और धनबाद के वासेपुर में इस फिल्म का विरोध हो रहा है। वासेपुर के लोगों की शिकायत है कि फिल्म में उनके कस्बे को गलत तरीके से दिखाया गया है।
वासेपुर निवासियों के गुस्से के बारे में पढ़कर अपने गंगौली (गाजीपुर) वाले राही मासूम रजा साहब के गुस्से की याद आ गयी। फ़िलिम ’न्यू देहली टाइम्स’ में हिन्दू-मुस्लिम दंगे की कहानी दिखाने के लिये कस्बे का नाम रखा गया था गाजीपुर। राही मासूम रजा साहब ने इस पर सख्त एतराज जताया था यह कहते हुये कि गाजीपुर में कभी हिन्दू-मुस्लिम दंगा नहीं हुआ। देश में तमाम शहरों में दंगे होते हैं उनकी जगह गाजीपुर का नाम क्यों लिया गया। उनका एतराज फ़िलिम की इस लाइन के आगे अनसुना रहा गया- इस फ़िल्म में दिखाये गये सभी स्थान और पात्र काल्पपिक हैं। तहलका में छपी अनुपमा की रिपोर्ट में वासेपुर के लोगों की प्रतिक्रियायें बतायी गयी हैं। नईम मियां बताते हैं कि वासेपुर बसा कैसे:
वासे साहब के बारे में नईम मियां भी बताते हैं कि उन्होंने ही सबसे पहले डेढ़-दो सौ परिवारों को लाकर बसाया था. फिर तेजी से इस मोहल्ले का फैलाव होता गया और आज यह धनबाद का सबसे बड़ा मोहल्ला है. वासेपुर में हर कोई एक से बढ़कर एक बात बताता है. पता चलता है कि यहां छिनैती, रेप, चोरी, छेड़खानी जैसी घटनाएं कभी नहीं होतीं. लेकिन जब धनबाद में कोई घटना होती है तो कह दिया जाता है- अपराधियों को वासेपुर की राह भागते हुए देखा गया है.
इस मसले पर जब फ़िल्म के स्क्रिप राइटर से पूछा गया कि तो देखिये वे क्या कहते हैं:
फिल्म का नाम गैंग्स ऑफ वासेपुर होने की वजह से आपके मोहल्लेवाले ही नाराज हैं.
फिल्म में वासेपुर का सिर्फ नाम भर लिया गया है. कहानी धनबाद के कोयला माफियाओं की है. वैसे वासेपुर के आम लोग नाराज नहीं हैं. कुछ लोग अपना नाम चमकाने के लिए लोगों को उलटा-सीधा समझा रहे हैं. मैं वासेपुर का ही रहनेवाला हूं. मेरे मां-पिताजी वहीं रहते हैं. मुझे अपने मोहल्ले से बहुत प्यार है. भला मैं क्यों मोहल्ले को बदनाम करना चाहूंगा?
विनीत कुमार की नायिका का दर्द भी देखिये कुछ ऐसा सा है:
जिस धनबाद को लोग पढ़ने-लिखने और कल्चरली रिच टाउन मानते थे न, अब इसे गुंड़ों का शहर समझेंगे. एक बड़े सच को दिखाने के लिए ही सही पर इसने कल्चरली इसको बहुत डैमेज किया है. मेरे बचपन के शहर की धज्जी उड़ा दी रघु. मेरी सारी खूबसूरत स्म़तियों की चिद्दी-चिद्दी कर दी इस इंटल डायरेक्टर ने. वो जब लाल स्कूल ड्रेस में बच्चों को स्कूल जाते दिखा रहा था न तो लगा- अरे ये तो मैं हूं..लेकिन वो बच्चे गायब हो गए. क्या बासेपुर,धनबाद की एक भी लड़की कॉलेज नहीं जाती रघु ?
इस फ़िलिम के बारे में अनिल कुमार यादव का कहना कुछ अलग सा है देखिये:
अनुराग कश्यप चलती का नाम गाड़ी हो चुके हैं। सितारेदार प्री-पेड रिव्यूज का पहाड़ लग चुका है। वे अब आराम से किसी भी दिशा में हाथ उठाकर कह सकते हैं- इतने सारे लोग बेवकूफ हैं क्या? फिर भी इतना कहूंगा कि दर्शकों को चौंकाने के चक्कर में कहानी का तियापांचा हो गया है। कहानी की खामोश ताकत से अनजान निर्देशक गालियों और गोलियों पर ही गदगद है।

लेकिन जे एन यू के अमरेन्द्र का दर्द कुछ अलग तरह का है। पहला दिन पहला शो लपककर देखने वाले अमरेन्द्र ने जब फ़िल्म के निर्देशक का बयान सुना तो वे चौंके। अमरेन्द्र लिखते हैं:
अनुराग जी हिन्दी समाज में फिल्मों का स्तर गिरा होने का कारण दर्शकों को मानते हैं. वे दो टूक कहते हैं कि फिल्म कैसी आयेगी, यह दर्शक डिसाइड करता है. यानी खराब फ़िल्में आ रही हैं तो उसकी वजह निर्देशन-परिवेश कतई नहीं बल्कि दर्शक-परिवेश है.
अनुराग कश्यप के इस बयान पर अपनी राय जाहिर करते हुये अमरेन्द्र लिखते हैं:
फिलहाल बातचीत से यह समझने में आया कि सारी जद्दोजहद फन्ने-खाँ बन पाने तक ही है. ये (कला माध्यमों की) क्रांतिकारिता/परिवर्तनकामना ख़ास पायदान तक के पहले का मंगलाचरण हुआ करती है. उसके बाद तो बदलाव आता ही है. निर्देशक का व्याकरण/खेल-नियम बदल जाता है.
तो ये रही गुंडई का महाकाव्य नाम से चल रही पिक्चर गैंग्स आफ़ वासेपुर की चर्चा। अब देखिये तकनीक के किस्से। रविरतलामी बताते हैं एक एप्पलीकेशन के बारे में जो खरीददारी प्रेमी महिलाओं को बताता है कि वे कहां अपना पइसा खर्च कर सकती हैं। लेकिन रवि रतलामी के भीतर एक मध्यवर्गीय पति भी बसता है उसने अपनी बात धर दी सामने:
परंतु जब मैंने इस एप्प को ठोंक बजाकर देखा तो मुझे ये खास जमा नहीं. मेरे विचार में इस एप्प में एक फ़ीचर की कमी है. यदि ये फ़ीचर जुड़ जाए तो फिर यह एप्प एकदम परफ़ेक्ट हो जाए. वह फ़ीचर है – इसका स्वचालित खरीदारी अलार्म. जब भी स्त्रियाँ कोई नया ड्रेस खरीदने का विचार करें तो यह अलार्म बजा कर उन्हें आगाह करे कि आलमारी में जगह नहीं है, कोई बारह सौ ड्रेसेस का पहनने का नंबर पिछले साल भर से नहीं आया है और उनमें भी तीन दर्जन तो पूरे नए-नकोरे हैं – इत्यादि.

बधाई/मंगलकामनायें

अंतर्जाल में हिंदी के प्रचार-प्रसार में सबसे अग्रणी लोगों में से प्रमुख पूर्णिमा वर्मन जी को पिछले दिनों राष्ट्रपति द्वारा हिंदी सेवी सम्मान समारोह में पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पूर्णिमा जी को हार्दिक बधाई।
“मुट्ठी भर संकल्पवान लोग जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं।” का दृढ़ विश्वास धारण किये दुनिया के हर कोने से हिंदी की आवाज को बुलंद करने के लिए तत्पर पूर्णिमा जी हिंदी का लोकप्रिय साहित्य नेट पर लाने के लिये सदैव प्रयासरत रहती हैं। संयोग से आज 27 जून को पूर्णिमा जी का जन्मदिन है। पूर्णिमाजी को अनेकानेक मंगलकामनायें।
इस मौके पर उनके बारे में लिखे लेख के साथ पढिये उनसे हुई बातचीत जिसमें वे अपनी पत्रिकाओं अभिव्यक्ति और अनुभूति के बारे में बताती हैं:
हिन्दी में शायद यह पहली पत्रिका होगी जहां संपादक एक देश में निदेशक दूसरे देश में और टाइपिस्ट तीसरे देश में हों। फिर भी सब एक दूसरे को देख सकते हों सुन सकते हों दिन में चार घंटे दो घंटे सुबह और दो घंटे शाम। वो भी तब जब एक की दुनिया में दिन हो और दूसरे की दुनिया में रात। हम आपस में अक्सर कहते हैं, “हम दिन रात काम करते हैं। इसी लिये तो हम दूसरों से बेहतर काम करते हैं”।

पूर्णिमा जी के जन्मदिन के मौके पर आज उनकी ही एक कविताचलो एक कप चाय हो जाये

मेरी पसन्द


पूर्णिमा वर्मन>
जन्मदिवस के इस अवसर से
थोड़ा सा तो न्याय हो जाए
गुमसुम से बैठे हैं हम तुम
चलो एक कप चाय हो जाए


धूम धड़ाका किया उम्र भर
जीवन जी भर जिया उम्र भर
आज सुखद यह शीतल मौसम
कल की यादों में डूबा मन
खिड़की में यह सुबह सुहानी
यों ही ना बेकार हो जाए
चलो एक कप चाय हो जाए

खुशबू जो हमने महकाई
देखो दुनिया ने अपनाई
जगह जगह लगते हैं मेले
हम क्यों बैठे यहाँ अकेले
नई तुम्हारी इस किताब का
जरा एक अध्याय हो जाए
चलो एक कप चाय हो जाए

फूल भरा सुंदर गुलदस्ता
देखो कहता हँसता हँसता
दुख का जीवन में ना भय हो
जन्मदिवस शुभ मंगलमय हो
नानखताई का डिब्बा खोलो
मुँह मीठा इक बार हो जाए
चलो एक कप चाय हो जाए
पूर्णिमा वर्मन

और अंत में

आज के लिये फ़िलहाल इत्ता ही। चलते-चलते देखिये शब्दों के सारथी अजित वडनेरकर का एक और रूप जिसके बारे में रवि रतलामी ने लिखा था :
क्या आप जानते हैं कि अजित वडनेरकर कभी अहमद हुसैन – मोहम्मद हुसैन के शिष्य हुआ करते थे और वे एक उम्दा गायक भी हैं? देखिए उनके लाइव परफ़ॉर्मेंस का वीडियो – जब से हम तबाह हो गए, तुम जहाँपनाह हो गए.
इसमें गायक हैं अजित वडनेरकर। तबले पर संगत भी अजित की है। बस तबले की जगह माचिस का प्रयोग किया गया।

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