गुरुवार, जनवरी 21, 2010

कोहरा, बसंत के बहाने कुछ चर्चा

कल शिवकुमार मिश्र ने बसंत पंचमी पर कविताओं की चर्चा की। इससे लगता है कि कोहरा झल्ला गया और सब जगह छा गया। कोहरे की सबसे ज्यादा मार यातायात पर पढ़ी। तीन लाख से अधिक की कार की गति तीन हजार से कम की साइकिल गति से मुकाबला करने लगी। उड़ान और रेल पर कोहरा गाज के रूप में गिरा। रेलवे में तो कोहरे के कारण रेलों की पिछाड़ी भिड़ंत के चले वरिष्ठ अधिकारी तक निलंबित हुये। इससे अधिकारियों का मनोबल लड़खड़ाया हुआ है।

इस कोहरे के मौसम में बसंती हवा की खनक भी साथियों के लेखन में दिखने लगी है। अपूर्व बसंत का गीत सुनाते हैं:

बसंत
सिर्फ़ बसंत मे जीना
बसंत को जीना
ही तो नही है जिंदगी
वरन्‌
क्रूर मौसमों के शीत-ताप
सह कर भी
बचाये रखना
थोड़ी सी सुगंध, थोड़ी हरीतिमा
थोड़ी सी आस्था
और
उतनी ही शिद्दत से
बसंत का इंतजार करना
भी तो जिंदगी है

हाँ यही तो गाती है
ठिगनी बंजारन चिड़िया
शायद!


नजीब अकबराबादी बसंत के बारे में लिखते हैं:

बसंत
आलम में जब बहार की लगन्त हो
दिल को नहीं लगन ही मजे की लगन्त हो
महबूब दिलबरों से निगह की लड़न्त हो
इशरत हो सुख हो ऐश हो और जी निश्चिंत हो

जब देखिए बसंत कि कैसी बसंत हो

अव्वल तो जाफरां से मकां जर्द जर्द हो
सहरा ओ बागो अहले जहां जर्द जर्द हो
जोड़े बसंतियों से निहां जर्द जर्द हो
इकदम तो सब जमीनो जमां जर्द जर्द हो

जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो



बसंत
रवीश कुमार हरिद्वार के संत समागम का बेईमान गुणा भागम निहारते हैं:
सारे बाबाओं के होर्डिंग हैं लेकिन वहीं गंगा प्रदूषित हो रही है। जिन धार्मिक मंचों से गंगा के लिए आवाज उठती है वो इतने राजनीतिक हो गए हैं कि सबकी माता होने के बाद भी गंगा को लेकर सामूहिकता नहीं बन पाती। गंगा को लेकर कोई चिंतन नहीं है। गंगासागर की तरफ जाने वाले मार्ग में गंगा की हालत देखी नहीं जाती। हरिद्वार के ठीक ऊपर पहाड़ों को देखिये। वृक्ष कट गए हैं। वृक्ष की जगह होर्डिंग उग आए हैं। मुख्यमंत्री के चेहरे से लेकर मोहन पूरी वाले का बोर्ड दूर से दिख जाएगा। कहीं से नहीं लगता है कि हरिद्वार आध्यात्मिक जगह है।


किसी भी काम में सफ़लता अधीननस्थ और बॉस के आपसे संबंधी पर काफ़ी हद तक निर्भर करती है। आपसी समझ और तालमेल के महत्वपूर्ण मानते हुये कीर्ति राणा लिखते हैं:
काम बड़ा हो या छोटा सिर्फ बोलते रहने से ही हो जाए तो सारे लोग घरों में रट्टू तोते ही न पाल लें! कोई भी काम को लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए सामूहिक सहयोग जरूरी होता है और यह टीम वर्क से ही सम्भव होता है।


मेरी पसंद



बसंत
बच्चों को फूल बहुत पसंद हैं
वे उन्हें छू लेना चाहते हैं
वे उनकी ख़ुशबू के आसपास तैरना चाहते हैं
उन्हें तितलियां भी बहुत पसंद हैं

बच्चों को उनके नाम-वाम में
कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं होती
वे तो चुपके से कुछ फूल तोड़ लेना चाहते हैं
और उन्हें अपने जादुई पिटारे में
समेटे गए और भी कई ताम-झाम के साथ
सुरक्षित रख लेना चाहते हैं
वे फूलों को सहेजना चाहते हैं

वे चाहते हैं
कि जब भी खोले अपना जादुई पिटारा
वही रंग-बिरंगा नाज़ुक अहसास
उन्हें अपनी उंगलियों के पोरों के
आसपास महसूस हो
वे इत्ती जोर से साँस खींचें
कि वही बेलौस ख़ुशबू
उनके रोम-रोम में समा जाए
रवि कुमार

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बुधवार, जनवरी 20, 2010

बसंत पंचमी पर कविताओं की चर्चा

आज बसंत पंचमी है. कह सकते हैं आज बसंत आ गया. सर्दी है फिर भी आ गया. सर्दी से जरा भी नहीं डरा. बसंत आता है तो कविताओं की भी बाढ़ आ जाती है. आखिर वह बसंत ही क्या जो लोगों को कवि-कर्म में लीन न कर दे. (स्माइली) साथ में कवितायें ना लाये.

कई बार तो ऐसा देखा गया है कि जो कवि बनना चाहते हैं वे बसंत पंचमी का इंतज़ार करते हैं. उन्हें अगर लोग दिसम्बर या जनवरी में कविता लिखने के लिए उकसायें भी तो भी वे कविता नहीं लिखते. टालते हुए कहते हैं; "अब इतना दिन कविता नहीं लिखे तो चार दिन और सही. बसंत पंचमी आ रही है. उस दिन लिखेंगे. उस दिन कवि बन जायेंगे". (स्माइली).

तो पेश है बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर कविताओं वाली एक चर्चा.

तो सबसे पहले पढ़िए नीशू तिवारी जी की कविता. शीर्षक है; "बसंत की फुहार में....फागुन की बयार में." तिवारी जी लिखते हैं;

बसंत की फुहार में,
फागुन की बयान में,
आम के बौरों की सुगंध,
दूर -दूर तक फैली है,


बाकी कविता आप उनके ब्लॉग पर जाकर पढ़िए. ये रहा लिंक. बसंती टिप्पणी भी कीजियेगा.

नारदमुनि जी की कविता पढ़िए. बसंत से किस बात की तुलना की है उन्होंने, यह देखिये. वे लिखते हैं;

तेरा जाना पतझड़
तेरा आना बसंत,
मन एक
कामनाएं अनंत।

पूरी कविता पढने के लिए यहाँ क्लिकियाइये.

डॉक्टर श्याम गुप्ता की कविता पढ़िए. वे लिखते हैं;

सखी री ! नव बसंत आये ॥
जन जन में ,
जन जन जन मन में ,
यौवन यौवन छाये ।
सखीरी ! नव बसंत आये ॥

यह रहा लिंक. यहाँ क्लिक्क कीजिये और पूरी कविता पढ़ डालिए.

इसी बसन्ती कड़ी में पढ़िए निपुण पाण्डेय 'अपूर्ण' की कविता. मुझे कवि का उपनाम बहुत भाया. 'अपूर्ण.' आप पढ़िए वे क्या लिखते हैं;

शुभ बसंत ये आया खिल उठी प्रकृति रे !
मुस्काते स्वागत गीत मधुर हर तरु से फूटे
शुभ्र पुष्प दल खिले खिले यूँ लगे महकने,
पल पल हर चंचल कोपल नयी छठा बिखेरे


पूरी कविता आप ब्लॉग पर पढ़ें. बसंती टिप्पणी से कवि का स्वागत करें.

सतीश एलिया जी की कविता पढ़िए. वे लिखते हैं; "बसंत कलेंडर पर लिखी तारीख नहीं है." फिर क्या है बसंत? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए वे बताते हैं;
................................
बच्ची की किलकारी है, चिडियों की चहचहाट है,
पति की प्रतीक्षा है, पत्नी के विरह का स्वर है
................................


इस कड़ी में पढ़िए राजीव रंजन प्रसाद जी की रचना. रचना १८ साल पुरानी है. वे लिखते हैं;

सुख की थाती का क्या करना
करने दो दुख को क्रीड़ा माँ
वीणा के तार से गीत बजे
मैं गा लूं जग की पीडा माँ

सुन्दर रचना है. आप पूरी रचना पढने के लिए यहाँ क्लिक कर दीजिये.

बसंत पंचमी को 'निराला' जी का जन्मदिन भी माना जाता है. आज अनूप शुक्ल जी ने अपना एक पुराना लेख फिर से प्रस्तुत किया है. 'निराला' जी के बारे में प्रसिद्द आलोचक स्व. रामविलास शर्मा लिखते हैं;

यह कवि अपराजेय निराला,
जिसको मिला गरल का प्याला;
ढहा और तन टूट चुका है,
पर जिसका माथा न झुका है;
शिथिल त्वचा ढलढल है छाती,
लेकिन अभी संभाले थाती,
और उठाये विजय पताका-
यह कवि है अपनी जनता का!

बहुत ही बढ़िया पोस्ट है. अनूप जी के ब्लॉग का लिंक यह रहा. वहां जाकर पढ़िए.

श्री उदय प्रकाश के ब्लॉग पर 'निराला' जी के एक कविता प्रस्तुत की गई है. इस लिंक के सहारे जाइए.

जहाँ कवि इस बात से आश्वस्त है कि बसंत आ गया है वहीँ डॉक्टर महेश परिमल को बसंत के आगमन पर संदेह है. संदेह क्या है, वे मानकर चल रहे हैं कि बसंत नहीं आया. लिहाजा वे बसंत को खोजने के लिए तमाम जगह जाते हैं. कहाँ-कहाँ जाते हैं, यह जानने के लिए उनके लेख को पढ़िए. वे लिखते हैं;

"पर वसंत है कहाँ? वह तो खो गया है, सीमेंट और कांक्रीट के जंगल में। अब प्रकृति के रंग भी बदलने लगे हैं। लोग तो और भी तेज़ी से बदलने लगे हैं। अब तो उन्हें वसंत के आगमन का नहीं, बल्कि ‘वेलेंटाइन डे’ का इंतजार रहता है। उन्हें तो पता ही नहीं चलता कि वसंत कब आया और कब गया। उनके लिए तो वसंत आज भी खोया हुआ है। कहाँ खो गया है वसंत? क्या सचमुच खो गया है, तो हम क्यों उसके खोने पर आँसू बहा रहे हैं, क्या उसे ढूँढ़ने नहीं जा सकते।"

पूरा लेख आप डॉक्टर परिमल के ब्लॉग पर पढ़िए. ये रहा लिंक.

बसंत के आगमन पर पॉडकास्ट भी सुनिए. कबाड़खाना पर अशोक पाण्डेय जी ने ताहिरा सैयद द्वारा गाया
गीत लगाया है
. ये रहा लिंक. सुन आइये. बहुत सुख मिलेगा.

आज की चर्चा में बस इतना ही. आप सब को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं.

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