शनिवार, जुलाई 17, 2010

अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो

इस चर्चा में दिये गये पहले लिंक को देखकर हो सकता है आप में से कुछ लोग कहें कि इस मंच का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है लेकिन हम तो यही कहेंगे कि शुक्र मनाईये कम से कम इस्तेमाल तो किया जा रहा है वरना तो देश में कई चीजें हैं जिनका इस्तेमाल ही नही हो रहा। जैसे आइपीएल में खेलने के लिये इत्ते ज्यादा क्रिकेट खिलाड़ी हैं लेकिन एशियाड में टीम भेजने के लिये उनका इस्तेमाल ही नही किया जा रहा, देश में पानी से भरी कई नदियाँ हैं लेकिन फिर भी बिजली पैदा करने के लिये उनका इस्तेमाल नही किया जा रहा, जनसंख्या नियंत्रण के लिये इतने साधन हैं फिर भी ज्यादातर लोगों द्वारा उसका इस्तेमाल नही किया जा रहा, इससे पहले ये चर्चा ये लिस्ट थमाते थमाते खत्म हो जाये हम वो लिंक ही आपको थमा देते हैं, आप बताईयेगा ढोल ज्यादा शोर करता है या मीडिया, अब इसे पढ़कर भी अगर आपके चहरे में मुस्कान ना आये तो हम यही कहेंगे देखिये साहेब आप अपनी मुस्कान का इस्तेमाल नही कर रहे।

अब ये कोई जनाब हैं जो अपने को समय बताते हैं और कहते हैं समीर लाल, धीरू सिंह, शिवम् मिश्रा जैसे लोगो का अब क्या होगा??, इनका जो होगा वो तो बाद में होगा लेकिन ये लोग हैं कौन? हम सब भूल गये हैं। लेकिन इतना तो तय है आटो वालों की तो निकल पड़ेगी।

अब पता नही वो इंजीनियर अपने इस ईजाद को अपने गुरूदेव को समर्पित कर पाये कि नही लेकिन ये ब्लोगर इतने मासूम हैं कि अपनी इस पोस्ट को अपने गुरूदेव को समर्पित कर रहे हैं। वजह सिर्फ इतनी है कि उन्होंने उन्हें ब्लोग से धकियाके चिट्ठे तक पहुँचाया दिया। लेकिन इनका और भी बहुत कुछ कहना है -

तरक़्क़ी याफ़्ता व मोहज़्ज़ब समाजों में छोटी छोटी और मामूली मामूली बातों पर शुक्रिया अदा करने का रिवाज है, लेकिन पिछड़े समाज़ों में मन्ज़र इसके बिल्कुल उलटा है, वहाँ शुक्रिया अदा करने के बजाए हमेशा एतेराज़ किये जाते हैं। उनकी मंतिक़ यही होती है कि उसकी ज़िम्मेदारी है लिहाज़ा उसे अदा करना चाहिए। अगर ड्राईवर है तो ड्राईवरी करनी चाहिए, मुहाफ़िज़ है तो उसे पहरा देना चाहिए और अगर सफ़ाई करने वाला है तो उसे सफ़ाई करना चाहिए।यह सोंच हकीकत मैं सही नहीं है

पंजाब स्क्रीन नाम का चिट्ठा देखा और देखकर वाकई में लगा कि स्क्रीन ही है क्योंकि नीचे न्यूज चैनल के किसी स्क्रीन की तरह ब्रेकिंग न्यूज आ रही थी जिसमें आवाजाही का लेखाजोखा दिखाया जा रहा था। इस स्क्रीन में आने की हमारी वजह सिर्फ इत्ती थी - भूखे बच्चों की तसल्ली के लिए, माँ ने फिर पानी पकाया देर तक। सच मानिये नसीबों वाली माँ थी वरना तो कई ऐसी माँयें भी हैं जिनको पकाने को पानी भी नसीब नही होता।

स्वप्नमहल नाम के इस चिट्ठे की पोस्ट पढ़कर हम अपने को ये कहने को मजबूर हो गये मैं नासमझ, अब ये इतने समय तक गायब रहने की वजह से था या कुछ और आप जाकर पढ़िये और हमें भी बताये कि वो लिखने वाले ने अपने लिये लिखा या सिर्फ लिखने के लिये लिखा।

अपने विचार में एक कहानी पोस्ट की गयी है, ऊँच-नीच, तो अगर अभी तक लिखने में कुछ ऊँच-नीच हो गयी हो तो माफ करें क्योंकि इस बहाने ही सही आप चर्चे में तो हैं।

एक हैं पुरूषोत्तम जो अपने कुछ दोस्तों को ढूँढ रहे हैं वजह सिर्फ इतनी है कि वो उन्हें अपने साथ मयखाना ले जाकर उन्हें कुछ जाम पिलाना चाहते हैं क्योंकि

निकले चौराहे पर
जिन्दगी जीने के लिए
कुछ यार मिल गए! बोले
चल मैखाने ,पीने के लिए
हमने सोचा !
इंसान जब पैदा होता है
तो पीता है, हम भी पीयेंगे
फिर इन्हीं दोस्तों के संग,
खुलकर जियेंगे

आगे का हाल आप खुद जाकर देखिये। नाम है मस्तकलम, लिखने वाले का नही बल्कि चिट्ठे का, लिखने वाले हैं सुदामा सिंह। उन्होंने अपनी इस पोस्ट बोलो क्या-क्या खरीदोगे...? में एक बहुत ही विचारणीय बात उठायी है -

भले अपने गांव वाली फुलमतिया चार-छ: पेबंद लगी पुरन की साड़ी लपेटे अपने शहीद हुए सिपहिया पति के मुवावजे के लिए सड़क-सड़क की ख़ाक छानती दिखे.........अपने दायरे में सिमटा हुआ याद करता हूँ वो दिन जब आज की फटेहाल फुलमतिया कल को मिसेज फूलमती वाइफ़ ऑफ सूबेदार मेजर सूरज सिंह कहलाती थी।


बेटा तुम्हारे पिता ने इसे इतनी बार धोया है कि, अगल सा अपने नाम को सार्थक कर रहें हैं ये बताकर।

वो बिहारी को तो आप जानता होगा, वो ही बड़का बिहारी जो ब्लोगर बनने के लिये घर छोड़ दिया था। अब वही हमका आपका छोटा छोटा सीख देने में तुला है। -

एक बार का बात है. हम लोग ट्रेन से कलकत्ता से पटना जा रहे थे. गाड़ी में एगो सज्जन चिनिया बादाम (मूँगफली) खा रहे थे, अऊर छिलका ओहीं जमीन पर गिराते जा रहे थे. हम लोग का आदत है कि सब छिलका एगो अखबार में लपेट कर बाहर फेंक देते हैं. ऊ भाई जी मान के बईठे थे कि रेलवे उनका सम्पत्ति है

देखा ना कित्ता सही सीख दिये हैं कि मूँगफली का छिलका ट्रेन की जमीन में नही ट्रेन से बाहर की जमीन पर गिरायें। बाहर का जमीन बड़ा है इसलिये जल्दी से गंदा नही दिखेगा।

आप सोच रहे होंगे कि चर्चा के टाईटिल का चर्चा से तो कोई लिंक ही नही है, है क्यों नही जनाब वैसा ही लिंक है जैसा अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो में आने वाले शब्दों का एक दूसरे से। वैसे आप ज्ञानी जन क्या बतायेंगे कि इस 'अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो' का मतलब क्या होता है। हमारी अक्ल कहती है कि कई जमाने पूर्व अक्कड़ और बक्कड़ नाम के दो शैतान भाई रहे होंगे जिनकी शैतानियों से तंग आकर उनके अंग्रेजी कम जानने वाले माँ-बाप ने उनसे बोला होगा - अक्कड़ बक्कड़ बॉम्बे गो (यानि अक्कड़ बक्कड़ बॉम्बे चले जाओ) जो कि कालांतर में बिगड़ कर वो हो गया जो इस पोस्ट का टाईटिल। लो जी चर्चा के टाईटिल का चर्चा से लिंक हो गया।

(चर्चा की जनसंख्या का काउंटर कहता है कि आधी से ज्यादा आबादी हमें नही जानती होगी तो सोचा हम भी बताते चलें कि हमारा भी यही हाल है, हम भी नही जानते।)

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गुरुवार, जुलाई 15, 2010

साइबर संसार कितना "हेंडी" है .......

रजनीश ने एक बड़ी मजेदार बात कही थी....की बेईमान कभी ईमानदार से ईष्या नहीं रखता .....ओर ईमानदार हमेशा बेईमानो से ईष्या रखते है ...क्यूंकि बेईमान अपनी बेईमानी में जितना साहसी है ईमानदार अपनी ईमानदारी में उतना साहसी नहीं है .....देर रात ऐसी बाते पढने से बेहतर  डिस्कवरी  चैनल में किसी शेर को जंगली भैसे से मात खाते देखना है ...या  वर्ल्ड  मूवी चैनल पर  सब टाइटल  के संग किसी क्लासिक मूवी  को   म्यूट  करके देखना  है  .....खैर ...जाने दीजिये ..
.क्या सचमुच चौबीस घंटे उम्र है किसी विचार की नेट पर .....मै इत्तेफाक नहीं रखता ....शायद कुछ लोग असहमत हो ...पर तमाम कवायदों के बीच भी कुछ लेख ...लिखने वाले आशवस्त करते है ....


हथकड़   खालिस पाठको के लिए है ..लिखने वाला भी इसी दुनिया का है ...हर पोस्ट एक कन्फेशन सी मालूम होती है ..थोड़ी  बेधड़क .थोड़ी उलझी हुई....फिर भी अजनबी सी नहीं लगती ..कहने वाले  इसे भदेस   कह सकते है ...पर   जाने क्यों  हेंग ओवर की ये शल्य क्रिया अपनी ओर आकर्षित करती है ...इसे पढता हूँ तो  रविन्द्र कालिया का" ग़ालिब छूटी शराब" याद आता है  .ओर एक ओर शख्स  महेन..
मेरी मांसपेशियों और मस्तिष्क के तनाव भले ही दूर न होतें हों मगर मैं उन पर केन्द्रित हुए ध्यान से मुक्त होता महसूस करता हूँ. मैं अपने पास संगीत को बजते हुए सुनना चाहने लगता हूँ. मित्रों के प्रति उनकी सदाशयता के लिए आभार से भरने लगता हूँ. बड़ी मौलिक बातें करता हूँ, ऐसी बातें जिन्हें आप होश में इसलिए नहीं कहते कि आपको अपने प्रेम का क्रेडिट कार्ड आल रेड्डी फ्रीज हुआ दीखाई देता है मगर पीते ही मैं कह पाता हूँ कि 'मैं तुमसे प्रेम करता हूँ' उस समय प्रेम की उत्त्पत्ति का स्रोत महत्वपूर्ण नहीं होता कि ये वासना से है या चाहना से. बस ऐसे ही कई साल बीत गए हैं.

दीप्ति ऐसी ही है .जैसी आजकल की लडकिया है ..बेबाकी से बोलने ओर जीने वाली ...वे बोल चाल की भाषा लिखने में इस्तेमाल करती है ...उनका लिखा पढने पर लगता है उन्होंने कही एडिट नहीं किया है .कही रुकी नहीं है ....बस कंप्यूटर खोला है ओर मन उतार दिया है ....

लड़कियाँ ऑफ़िस में कम काम करती हैं। काम चोरी करती हैं। बस में सीट के लिए झगड़ती हैं। ऊंची आवाज़ में बात करती हैं। ये वही लड़कियाँ हैं जो मासिक चक्र के दौरान भी भरी बस में चढ़कर ऑफ़ीस जाती हैं। वहाँ दिनभर काम करती है और घर आने पर पूरा काम करती हैं। ये वही लड़कियाँ है जो बस में चढ़े चंचल नौजवानों की फ़ब्तियाँ सुनती हैं। ऑफ़ीस में कई पढ़े लिखें साथियों की बेहूदा बातें सुनती हैं। घर में घरवालों की सुनती है और बच्चों की सारी ज़िम्मेदारी निभाती हैं। बावजूद इसके उन्हें चाहिए कि वो चुप रहे। रातों को जागकर पढ़े ज़रूर, लड़कों को पढ़ाई में पछाड़े ज़रूर लेकिन नौकरी ना करें। नौकरी करें अगर तो महीने का कोई भी दिन हो बस में सीट के लिए लड़ाई ना करें। ऑफ़ीस में भाग भागकर काम करें। घर पर भी काम करें। ये तो धर्म है हमारा। ये सब कुछ करें और चुप रहे।


अनुराग कश्यप  जीवट वाले आदमी है ....वक़्त के थपेड़ो से वे भी जूझे है .पिछले दिनों  मोहल्ला में बड़ी बहसे हुई...कुछ गहमा गहमी भी ...पर इससे इतर  कुछ पुरानी कतरने मिली ..जिनपे नजर डालने के बाद आपको अपने पुराने स्ट्रगलईया  दिन याद आ सकते है ..शायद वो सपने भी जिन्हें   आपने   दुनियादारी के चलते  संदूक में बंद करके रख दिया है 


 
सीख रहा हूं इसलिए आपसे फाइनेंस लेना पड़ता है। बिना किसी डिग्री के अपने दिमाग, क्रिएटिविटी के दम पर कुछ करना चाहता हूं। ऐसी लाइन में जहां सबकुछ मेरा हो। न कोई रिश्वत देनी पड़े। न अहसान लेना पड़े। जरूरत पड़ी तो लिखूंगा, सब करुंगा पर कभी भी किसी कीमत पर सरकारी जॉब, एमबीए, नौ से पांच रुटीन ऑफिस जॉब नहीं करूंगा। वही करुंगा जो अच्छा लगता है।
जब फुरसत मिलेगी सीधे घर आऊंगा क्योंकि मुझे आप लोगों से बेइंतहा प्यार है। अगर आप लोग डॉली से ऐसी चिट्ठी लिखवाएंगे तो मैं बेवजह परेशान ही होऊंगा। आप लोग प्यार से इनकरेजिंग चिट्ठी लिखेंगे तभी मैं कुछ कर पाऊंगा। आप लोग मेरी वजह से इतने इनसिक्योर होते हैं इसीलिए मैंने निश्चय किया है कि कुछ भी करूंगा, जो सही सोचूंगा वही करूंगा पर आपको रेग्युलर चिट्ठी लिखूंगा। अब आप लोगों को मुझसे शिकायत नहीं होगी।
आपको सिर्फ मेरे ऊपर भरोसा रखना होगा। इतना कि आप सोचें मैं जो भी करूंगा अपने भले के लिए ही करूंगा। आपके प्यार के लिए। आपकी इज्जत के लिए। आप भी नहीं चाहोगे कि आपकी खुशी के लिए कुछ ऐसा करूं कि मैं सारी ज़िंदगी त्रस्त रहूं। कुढता रहूं। वो न कर सकूं जो मैं तहे दिल से चाहता हूं।

ओर देखिये  दुनिया की हर मां एक उम्र में आकर जीरोक्स कोपी सी लगती है .......


मां, मुझे सिर्फ मेरी आज़ादी दे दो। रो कर या प्यार से मुझे वापस न बुलाओ। मैं घर आने से सिर्फ इसलिए डरता हूं कि अगर घर पर ये सब बातें कहूं तो आप लोगों की आंखों में आंसू आ जाते हैं और मैं खुद को गलत साबित करने लग जाता हूं। परेशान होता हूं। जब नॉर्मल हालात में सोचता हूं तो यही ख्याल में आता है कि आपने पूरी आज़ादी तो दी है पर मैं मानसिक तौर पर अब भी अपने आपको आपकी सोच विचारों से आज़ाद नहीं कर पाया हूं। हमारे बीच में प्यार है, इमोशन है। सब है। पर साथ ही में एक कम्यूनिकेशन गैप भी है। मैं कोई औरों के बेटे की तरह आवारा नहीं हूं। नालायक नहीं हूं, पर मैं जो सोचता हूं, जो इच्छा रखता हूं वो करना चाहता हूं। मुझे अपनी रिस्पॉन्सबिलिटी ज्ञात हैं पर अभी उन्हें भूल कर सीखना चाहता हूं। मैं आपका नाम ऊंचा करना चाहता हूं। सिर्फ चाहने से तो कुछ नहीं होगा। करना भी होगा। और अगर काम में बिजी रहता हूं खाली वक्त में पढ़ता हूं, सोचता हूं तो कोई गुनाह नहीं करता।





कुंवारे ...  युवा ओर हेंड्ससम   लड़के भी दिमाग रखते है ...ओर साथ में उसे इस्तेमाल करना भी जानते है ....शक -शुबह दूर करने के लिए यहाँ चटका लगाए ......मय फोटो सबूत मिलेगा ...


अब ये सब तो ठीक... ऐसा ही जुगाड़ तंत्र अपने काम में भी चलता है. गनीमत है अपनी नौकरी में बस काम से मतलब होता है. कैसे हो रहा है इससे किसी को मतलब नहीं है. एक दिन मेरे बॉस बड़े खुश हुए तो कहा डोक्यूमेंट कर दो ये काम कैसे हो रहा है... अब तिकड़म और जुगाड़ का डोक्यूमेंटेशन और नामकरण होने लगा तब तो... खैर बिना नामकरण और डोक्यूमेंटेशन के ही सब कुछ चल रहा है. ठीक वैसे ही जैसे इन तस्वीरों में सब कुछ सही सलामत चल रहा है. ऐसे तंत्र हर जगह चल जाते हैं हर क्षेत्र में ! आप जहाँ भी जिस क्षेत्र में भी काम करते हों... ऐसे तिकड़म लगाया कीजिये कभी कुछ नहीं रुकेगा.
प्रेम कविताये भी ऐसे लिखी जाती है .......शायद आवारा लोग ऐसे ही लिखते है .बड़ी गोल्ड फ्लेक  फेफड़ो के नीचे उतार  कर ...वे हर कविता लिखने के बाद तसल्ली करना चाहते है ..के उनकी कविता पूरी हुई के नहीं......
जब,
बौद्धिकता के ऊसर खेत में,
मृत इतिहास के उर्वरक से पोषित,
'पालतू खरपतवार'
के बीच में से ही कोई,
'जंगली फूल' पल्लवित होगा.
जब,
'प्रेम' और 'कविता' का,
कोई भी यौगिक...
खालिस 'प्रेम कविता' होगा.
जब,
'लज्जा' और 'कौमार्यता'...
जैसे शब्दों के,
पुल्लिंग गढ़े जा चुके होंगे.
जब,
एकलव्य और अंगुली-माल के,
अनैतिक सम्बन्ध...
...समाप्त होंगे.
और जब,
लाल स्याही ख़त्म हो चुकी होगी,
 मेगी कि आराधना (लिओनार्डो डा विन्ची ) - यूफिजी, फ्लोरेंस

तब,
सरोकारों को मृत्यु दंड देके,
हम,अपनी कलम की नोक तोड़ देंगे.
हाँ  तब,
हे, विश्व की अभिशप्त प्रेमिकाओं !
हम लिखेंगे तुम्हारे लिए...

 ...आखिर प्रेम कवितायेँ तो 'टूटी कलम' से भी लिखी जा सकती हैं.

दूसरी ओर ये महाशय है ....इस तरह प्रेम कहानिया कहना इनका शगल है ......ओर इन्हें इससे कोई गुरेज नहीं ......एक ही स्केच में मोहब्बत ..बेवफाई ओर दुनियादारी के रंग.....बिना किसी ओर कलर  पेन्सिल का  इस्तेमाल किये हुए .....

अमृता ने कान में सोने की बालियाँ पहनी है... मैं उनमें ऊँगली घुमाते हुए कहता हूँ “तुम्हारा बाप सचमुच चोर था”. अगली चिठ्ठी में वो लिखती है “साले, इस अंदाज़ से तो तुमने मेरी तारीफ़ भी नहीं की थी, याद है तब मैं कटे शीशम की तरह गिरी थी !”

हम दोनों हरी दूब पर लेट कर आसमान देख रहे हैं... फिलहाल हमपे आसमान गिरा है. उहापोह की स्थिति है मैं क्या संभालूं क्या नहीं.


बाहर/सड़क/दोपहर/करीब एक बजे

“आज के डेट में पचास लड़का किसी कॉलेज से घसीट के लाइए... और यहीं डाकबंगला चौराहा पर सबको गोली से उड़ा दीजिए, कोई आंदोलन नहीं होगा, मेरा गाईरेंटी है.”

मेरे मित्र जब यह बात उत्तेजना में कहते हैं तो एक इंकलाबी मुहिम में शामिल हुआ युवा, पेट्रोल के बढे दाम पर  एक चुनावी दल के बिहार बंद के आह्वान पर कहता है “मादरच*** केंद्र में समर्थन करता है यहाँ के लोग को चूतिया बना रहा है... हम लोग जो मुख्य विपक्षी हुआ करते थे, इसी के कारण आज हासिये (सही पढ़ा) पर चले गए हैं”
बना रहे बनारस में पंकज बिष्ट के लिखे एक लेख  को  सिलेवार  पोस्ट किया गया है ....उसी में एक लेख के कुछ हिस्से है ......


 एक पल को मैं कल्पना तो कर सकता हूं कि मैंने एक शब्द भी न लिख होता,पर क्या मैं यह सोच भी सकता हूं कि मैं अपने बच्चों के बगैर भी रह सकता था ! इसलिए अगर उनके लिए ही मैंने अपनी अमूल्य जिंदगी का इतना लम्बा समय कतर-ब्यौंत में गंवाया तो भी अफसोस कैसा ? इसलिए अब तक यह लेखक नहीं,एक थके और हताश आदमी का प्रलाप था। क्या एक लेखक का मूल्यांकन करते समय यह याद किया जाएगा कि उसने कितने ऐंन्द्रिय सुख भोगे,कितनी औरतों के साथ वह सोया। वह विला या बंगले में रहा या नहीं,और कितने पुरस्कारों से उसे सम्मानित किया गया?
शायद सेनेका ने कहा है कि 'अंधेरे में सब औरतें एक-सी होती हैं।' पहली बार जब मैंने यह बात पढ़ी थी तो मुझे बहुत बुरा लगा था। पर बात का मर्म मेरी समझ में अब आ गया। अगर आप औरत को सिर्फ एक शारीरिक इकाई,एक भोग्य वस्तु मानते हैं तो वास्तव में सब एक बराबर हैं। ईमानदारी की बात है,मैंने औरतों को प्रकाश में भी देखने की कोशिश की,इसलिए अफसोस कैसा ? क्या जानवर (स्टड वुल) न हो पाने का ?



नेट  ने   इस दुनिया को  एक ओर नयी शै दी   है ....'नेट बेवफाई .'.......इस पर  मनीषा कुलश्रेष्ट  का लिखा बहुत ही दिलचस्प लेख है ...वे लिखती है
इमोशनल बेवफाई वन नाईट स्टेंस से भी ज्यादा खतरनाक है दामपत्य के लिए .सोशल नेटवर्किंग साइट्स चाहे कितनी ही लोकप्रिय क्यों न हो मगर वे खिडकिय है जहाँ से न केवल अजनबी  ,बल्कि अतीत में छूटे गए लोग भी हमारे घरो में झाँक जाते है ओर हम उनके घरो में ......
आगे वे एक जगह लिखती है .

हम मानव अपनी मूल पाशविक प्रवर्ति (भाई लोग स्पेलिंग मिस्टेक सुधार ले )  से  बहुत ऊपर उठ  तो गये है पर पोली गेमि अब भी रोमांच देती है .खास तौर से पुरुषो को ".चेंजिंग गेम "!पीछा करना ओर हस्तगत करना ! फिर वही ढाक के तीन पात !रोमांच काफूर उब तारी !फिर थोड़े समय मानव रह कर बिता दिए फिर आदमिता जगी ,ऐसे में साइबर संसार कितना "हेंडी" है  .......

पूरा लेख आप इस माह के नया ज्ञानोदय(जुलाई 2010 का अंक यहां से डाउनलोड कर सकते हैं) में पढ़िए   .

चलते चलते  डा. सुषमा नैथानी की स्वपनदर्शी पर कहा  गया एक फलसफा ......


किसी अबावील की तरह दिन उड़ते है
पंजों में दबाये जीवन

हर रोज़ कुछ शब्द बचे रहते है
कुछ प्यार बचा रहता है
सौ संभावनाएं सर उठाती हैं
उम्मीद बची रहती है
उसी का बँटवार है
उसी में कुछ बचे रहते है हम ...

पुनश्च ;..  सीरिया और अरब जगत के सर्वाधिक प्रसिद्ध कवियों में से एक   निज़ार क़ब्बानी   ... इस कवि की कविताओं का अनुवाद सिद्धेश्वर सिंह जी ने किया है ....उनके ब्लॉग कर्मनाशा पर  ये कविता  ..बताती है  आदमियत के  तमाम हिस्से  एक से है ...भले ही वे किसी देश ..काल के हो

बारिश से भरी रात की तरह
हैं तुम्हारी आँखें
जिनमें डूबती जाती है मेरी नाव।

अपनी ही प्रतिच्छाया में
लुप्त होती जाती है
मेरी तहरीर।

नहीं होती
होती ही नहीं
आईनों के पास
याददाश्त जैसी कोई चीज।



शुभ रात्रि

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