शनिवार, जून 23, 2012

ब्लॉग जगत में सैर-सपाटा और घुमक्कड़ी की चर्चा


ब्लौग की दुनिया में कुछ डॉक्टर भी बहुत बढ़िया पोस्ट लिखते हैं. डॉ. तारीफ दराल साब भी उनमें से एक हैं. बहुत आकर्षक कद-काठी और व्यक्तित्व के धनी डॉ दराल से मुलाकात सतीश सक्सेना जी की पुस्तक के विमोचन के दौरान हुई थी. घर लौटने की जल्दी और विमोचन के बाद की चहल-पहल में डॉ. साब से बात करने का मौका नहीं मिला. पिछले कुछ अरसे में उनके ब्लौग की तकरीबन हर पोस्ट पढ़ी है. उनका चुटकियाँ लेने का अंदाज़ बेहतरीन है. सैर सपाटे के शौक़ीन डॉ. साब हाल ही में पहाड़ों की सैर कर आये. काम भर के लायक ज़रूरी जानकारी देनेवाले ऐसे ट्रैवेलॉग ब्लौग में बहुत लोग नहीं लिखते. डॉ. साब के ट्रैवेलॉग में घुमक्कड़ी भी है और कुछ अनदेखी सी रह जानी वाली बातों का ज़िक्र भी.

मसूरी की किसी अनजान राह पर मिल गए एक अजनबी के पूछने पर डॉ. साब ने बताया, "बस यूँ ही छोटा सा जॉब करता हूँ". अजनबी ने कहा, "लगता तो नहीं है". सही भी है, डॉ. साब को देखकर कोई यह नहीं मान सकता कि वे मामूली जॉब करते होंगे. डॉ. साब से गुज़ारिश है कि वे एक ब्लौगर हैल्थ चेकअप कैम्प लगायें. इसी बहाने एक ब्लौगर मीट भी हो जायेगी और ब्लौगर जन अपनी सेहत का जायजा भी ले लेंगे. अगर इसमें डॉ. प्रवीण चोपड़ा को भी शामिल कर लें तो ब्लौगर दोस्तों के दांतों का मुआयना भी हो जायेगा.

घुमक्कड़ी पर उन्मुक्त जी ने भी बहुत सी पोस्ट लिखी हैं. वे कई दिनों के बाद लिखते हैं और उनकी पोस्टें छोटी होती हैं इसलिए मन नहीं भरता. यदि वे कहीं घूमने जाते हैं तो वहां देखी किसी छोटी सी बात पर अपनी पोस्ट की रचना करते हैं. उनकी पिछली पोस्ट में नैनीताल की यात्रा का वर्णन है. उन्मुक्त जी सैर करानेवाले गाइड और वाहन चालकों से बड़ी जल्दी घुलमिल जाते हैं और उनसे धंधे से जुड़ी बातें जान लेते हैं. उनकी पोस्टें लघु से लघुतम हो रही हैं. उन्मुक्त जी सुन रहे हैं?

इसी बीच गिरिजेश राव उड़ीसा (ओडिशा?) की यात्रा पर निकले. कोणार्क के गौरवशाली सूर्य मंदिर के उत्थान और ध्वंसन को वे उन्होंने सर्वथा नवीन दृष्टि और तथ्यों के प्रकाश में देखा है. मेरे लिए यह जानकारी अद्भुत है. उस विहंगम मंदिर के प्रस्तर खण्डों को गिराने की घटना पर होनेवाला खेद केवल कुछ सुन्दर उत्कीर्णित पत्थरों से होने वाला मोह मात्र ही नहीं है जैसा गिरिजेश ने अपने एक कमेन्ट में कहा है, "ज्ञान का वह स्तर जहाँ सभ्यता के चरमोत्कर्ष और संस्कृति उपलब्धि के प्रतीक पत्थर भर लगें, घटित होते हुये को यूँ साक्षी भाव से देखा जा सके कि बस समय का चक्र भर लगे; वहाँ नश्वर प्राणियों के जीवन भी माया मोह ही होते हैं। उस स्तर पर कुछ भी मायने नहीं रखता - इतिहास, विज्ञान, गणित, साहित्य, ब्लॉगरी सागरी सब माया! ब्रह्म सत्यं जगन्नमिथ्या...सीताराम सीताराम"

बात को बेहतर समझने के लिए इसी पोस्ट कमेंट्स में गिरिजेश और शिल्पा मेहता जी के बीच हुआ संक्षिप्त वार्तालाप पढ़ना ज़रूरी होगा.

बात घुमक्कड़ी की हुई है और अब मुल्क की सरहदों से हजारों मील दूर देशों के मुल्कों की पुलिस इस बात से अनजान अपनी गश्त में हलकान है कि किसी और दुनिया के लोग उनकी तारीफों के पर्चे बांच रहे हैं. पहले शिखा वार्ष्णेय जी ने बताया कि लन्दन की अपेक्षाकृत सभ्य पुलिस को देखकर वे अभी भी अकारण ही खौफज़दा हो जाती हैं मानो "जरुर इस डर के पीछे होगा "राज कोई पिछले जनम का". इन्हीं किसी की गोली से हुई होगी मेरी मौत." बाद में अदा जी ने भी कनाडा की पुलिस के बारे में अपना संस्मरण लिखा जिसमें उन्होंने बताया है कि वहां की पुलिस कित्ती भलीमानुस है. उनकी अगली पोस्टों में वे भारत की पुलिस को लेकर अपने सुखद अनुभव शेयर करेंगीं. अपनी पोस्ट की शुरुआत में उन्होंने जो बात लिखी है वह काबिल-ए-तारीफ है:
"जो इंसान अच्छा होता है वो बस अच्छा होता है । अच्छाई दिखाने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती है। अच्छाई कहीं भी, कैसे भी नज़र आ ही जाती है। आपको बार-बार बताने की ज़रुरत नहीं होती कि आप कितने अच्छे हैं। जैसे बुराई नहीं छुपती, वैसे ही अच्छाई नहीं छुपती। अगर आप अच्छे हैं तो, अच्छे ही रहेंगे चाहे परिस्थिति कैसी भी हो। अच्छाई बड़ी सरल सी चीज़ है, अगर आप उसे छुपायें तो छुपती नहीं है, और अगर दिखाना चाहें तो दिखती नहीं है। अच्छाई बैनर पर लिखी कोई तहरीर नहीं, जिसे कोई पढ़ कर जान जाएगा आप बहुत अच्छे हैं। अगर आप सचमुच अच्छे  हैं, तो आपकी चुप्पी भी बता देगी।"
इसलिए अब मैंने तय कर लिया है चुप रहूँगा क्योंकि एक चुप सौ बातों का जवाब होती है. लेकिन मैंने ऐसा किया क्या है जो मैं चुप रहूँ? खैर, ब्लौगिंग तो आदमी चुप रहकर भी कर सकता है.

सैरसपाटे विषयक पोस्ट के लिए श्रीमती आशा जोगलेकर की साल्ट लेक (अमेरिका) यात्रा का विवरण मिल गया. वे एक अल्पज्ञात ईसाई पंथ मोर्मोन्स का मंदिर देखने गयीं थी लेकिन जाने पर पता चला कि वहां तो साधारण ईसाइयों के लिए भी प्रवेश वर्जित है! लो जी! ये अमेरिका है! अब इस बारे में तो यही कहा जा सकता है कि अमेरिका में इतनी स्वतंत्रता है कि वहां एक पंथ को माननेवाले लोग अन्य पंथ को मानने वालों को अपने यहाँ प्रवेश नहीं देने के लिए स्वतन्त्र हैं. इसे कहते हैं निगेटिव में भी पौज़िटिव खोज लेना. लेकिन ये मोर्मोन्स तो मोरोंस निकले.

ब्लौगर विवेक रस्तोगी काम से जेद्दाह गए और उन्होंने खाने से पहले हर चीज़ का फोटो फेसबुक पर डालकर बहुतों का मन ललचाया. वहां पेट्रोल सस्ता होने की बात वे इतनी बार बता चुके हैं कि कई दोस्तों ने तो उनसे एक-दो जरीकेन भरके लाने की फरमाइशें भी कर दीं. उनके टैक्सी ड्राइवर ने बताया कि पाकिस्तान में मुशर्रफ़ के आने के पहले बिजली विभाग के 25% कर्मचारी चढ्ढी बनियान में बैठे रहते थे. इससे यह ज़ाहिर होता है कि पाकिस्तान में सरकारी नौकरी में महिलाओं की संख्या न के बराबर होगी. 

अब अपने देस में. दिलेर ब्लौगर ललित शर्मा लंबे अरसे से गाँव देहात में छुपे अल्पज्ञात रमणीय और पुरातात्विक महत्व के स्थलों का भ्रमण कर रहे हैं. इसी कड़ी में वह पहुंचे महाराष्ट्र में हिडिम्बा टेकरी. वहां बहुत कुछ देखने लायक तो था ही, अंत में उनकी मुलाकात गंजों के सर में शर्तिया बाल उगानेवाले सज्जन से हुई. बाल उगाने की शर्त और शुल्क के बारे में वहीं पढ़िएगा.

कुछ लिंक्स:

१. डॉ. अरविन्द मिश्र जी की पोस्ट - अब राम को कौन बताए कि वे कहां रहें? (मानस के रोचक प्रसंग -१). जिस प्रकार ज्ञानदत्त जी के लिए गंगा है उसी प्रकार मिश्र जी के लिए है मानस.

२. अली सैयद साब का 'लोक आख्यान' अनंत प्रेम. अब तो ब्लॉग में पुरस्कार की बात से ही रूह कांपती है लेकिन अगरचे किसी ब्लौगर को ओजमयी अलंकृत हिंदी के लिए पुरस्कार देना हो तो मेरी पहली पसंद अली साब होंगे.

३. बेचैन आत्मा श्री देवेन्द्र पाण्डेय की कविता 'पहली बारिश में...'. थाली भगौने की चिंता छोडो मांजी! बिटिया को भीग लेने दो. माटी का पुतला ऐसे न गलेगा!

४. रवीश कुमार - 'गैंग्स ऑफ वासेपुर है गुंडई की नवगाथा'. नो स्पॉइलर्स, नॉट एन ऑफिशियल रिव्यू, मस्ट रीड.

५. निखिल आनंद गिरी के सपने में कल रात आई थी पुलिस. और भी बहुत कुछ बीता इस कवि के साथ.

बस इतना ही. आगामी चर्चा के लिए देखते रहें 'चिटठा चर्चा'.

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शुक्रवार, जून 22, 2012

ब्लॉगिंग के टिप्स पूछते कुछ महारथी

कल देखा कि रविरतलामी जी ब्लॉग अड्डा पर ब्लॉगिंग की टिप्स देते पाये गये। विशेषज्ञ के तौर पर हिंदी ब्लॉगिंग का परिचय और शुरुआती जानकारी देते हुये लोगों को अपनी मातृभाषा में ब्लॉग लिखने के लिये प्रोत्साहित किया। वुधवार से शनिवार तक उनकी कोचिंग चालू है। जो पूछना हो पूछ लीजिये।

कुछ अच्छे और लोकप्रिय ब्लॉगों के संकलक में उन्होंने हिन्दीब्लॉगजगत ,जिसके सूत्रधार निशांत मिश्र हैं,
का जिक्र तो किया लेकिन  आशीष के  चिट्ठा संकलक को छोड़ दिया। रिश्तेदारों के अच्छे कामों का जिक्र करने में संकोच कैसा जी।

 इस विचार विमर्श में कुछ सवाल हिंदी ब्लॉगिंग में  पाठकों तक पहुंचने की ललक से संबंधित थे। एक सवाल था:
  • यहाँ ब्लॉग अड्डा पर हिंदी ब्लॉग्गिंग के बारे में चर्चा होगी, यह मैंने कभी सोचा भी नहीं था. सिर्फ अभी ख़ुशी के लिए एक हिंदी ब्लॉग शुरू किया था मैंने. अंग्रेजी के मुकाबले उसे पढ़नेवाले भी काफी कम हैं और समझनेवाले और भी कम. ब्लॉग जगत और हिंदी के इस रोमांच को चर्चा का रूप देने के लिए बहुत धन्यवाद. मैं केवल गूगल ट्रांस लिटरेशन की मदद से ही लिखती थी. इतने ढेर सारे और विकल्प देने के लिए आपकी आभारी हूँ. मेरे हिंदी ब्लॉग को आप यहाँ पढ़ सकते हैं....
    http://mydolchi.blogspot.in/ 
    डोलची ब्लॉग पर पहली ही पोस्ट देखी तो बड़ी रोचक लगी। देखिये एक फ़ोन की व्यथा कथा से शुरुआत है पोस्ट जो करनी पड़े, वो नौकरी है की:
     फोन के ग़र होता दिमाग
    तो खुद ही कह देता वो
    "ये भी कोई टाइम है नंबर घुमाने का?"
    पर चूँकि ऐसा नहीं है
    हम बेवक्त फोन उठाते हैं
    बकरी सा मिमियांते हैं
    बित्ती भर जुबां पे
    सैंकड़ों गालियाँ तौल जाते हैं 
    "Of  Course , No Problem और Sure Anytime " का
    रट्टा सा लगाते हैं 
    इस पोस्ट में देखिये कि संबंधों को पखने में क्या गलती करते हैं हम लोग :
    हमें रिश्तों को खींच-तान कर, ठोक-बजा कर परखने की इतनी आदत सी हो गयी है के हर मोड़ पर हम उन्हें कसौटी पर रख धरते हैं. हर ढलान पर उनकी पकड़ जांचते हैं. हर चढ़ाई पर हौंसले का सबूत मांगते हैं. भूल जाते हैं के कच्चे धागों में पिरोया नाज़ुक सा हार है यह, कुत्ते का पट्टा नहीं जो घडी घडी खींच कर पड़ताल करनी पड़े. 
    रेनड्राप नाम है ब्लॉगर का और इस पोस्ट से पता चलता है कि लखनऊ की रहने वाली हैं। फ़ोटोग्राफ़ी का भी शौक है। साल भर पहले तक की गयी ऊटपटांग बातों से पता चलता है कि वन्दना नाटू नाम है। अपनी एक पोस्ट लाखों हैं यहाँ दिलवाले... में अपने पिता के द्वारा फ़रमाइश किये जाने पर ये गाना गाने का जिक्र है। इसके बाद अपने पति के सीटी बजाते हुये गाने का ये वीडियो क्लिप लगाया।

     वन्दनाजी को हिंदी में लिखना जारी रखना चाहिये। ढेर पाठक मिलेंगे।

    एक और ब्लॉगर अनमोल आइंसटाइन ने रवि रतलामी जी से सवाल पूछा था:
    • मैँ एक कम उम्र हिन्दी ब्लॉगर हूँ। इसी 31 मई से नये ब्लॉग पर लिखना चालू किया है। मेरे ब्लॉग का पता है www.anmoldiary.blogspot.com

      कुछ सुझाव देँ और बतायेँ कि अधिक ब्लॉग रीडर कैसे बनाये जायेँ? 
      अब ब्लॉगरीडर बढ़ाने का उपाय तो रवि रतलामी जी बतायेंगे। लेकिन हम थोड़ा सा अनमोल के बारे में बता दें।  वर्तमान में ग्यारहवीं कक्षा में अध्ययनरत एक आम युवा छात्र! भविष्य में सैद्धांतिक भौतिक वैज्ञानिक और दार्शनिक! बनने की इच्छा रखने वाले अनमोल के रहने वाले हैं। आइंसटीन के प्रशंसक हैं।  उनके  ब्लॉग ब्रह्माण्ड पर उनके सपने देखिये:

      1. मेरा सपना है, महा एकीकृत सिद्धांत को पूर्ण करना और  ब्रह्माण्ड के अनसुलझे रहस्यों को सुलझाना !
      2. मेरा सपना है, सत्य की खोज करना और सदियों से चली आ रही विज्ञान और आध्यात्म के बीच होने वाली बहसों का सदा के लिए अंत करना और  विश्व के समस्त धर्मो का एकीकरण करके एक नया, तार्किक और वैज्ञानिक धर्म की स्थापना करना !
      3. मेरा सपना है, विश्व सरकार की स्थापना करना !
      अनमोल अपनी डायरी में अनमोल बातें लिखते हैं। एक मित्र का चरित्र चित्रण करते हुये  लिखा:

      ·         मैं कभी किसी का पक्ष नहीं लेता, अब चाहे बदले में मेरी माता श्री ही क्यूँ न हों! उचित और ईमानदारी वाली बात ही करता हूँ! गलत बात का बिलकुल भी समर्थन नहीं कर सकता, चाहे वो किसी ज्ञानी की ही बात क्यूँ न हो!

      ·         मुझे नहीं लगता कि मैं किसी से ईर्ष्या करता हूँ !
      शायद ये अनमोल के विचार हैं जो उन्होंने  मित्र के बहाने  लिखे। आरंभिक शिक्षा के बारे में अपने विचार बताते हुये  अनमोल लिखते हैं:
      परीक्षाओं में. परीक्षाएं बिना बताये कभी भी हो जानी चाहिए. उससे बच्चे का  वास्तविक लेवल पता चल सकेगा. अभी क्या है, परीक्षा का विषय और तारीख निश्चित कर दिया जाता है, बच्चे को ये भी पता होता है कि इस किताब में जो प्रश्न-उत्तर दिए गए हैं, केवल उसी से प्रश्न आने हैं. बच्चे उस विषय को अच्छे से रट लेते हैं या कुछ बच्चे समझ भी लेते हैं. बच्चा परीक्षाओं के समय पढ़ाई करके अपने ज्ञान के लेवल को थोड़े समय के लिए बढ़ा लेता है. पर यह केवल परीक्षाओं में अच्छे नम्बर लाने के उद्देश्य से किया जाता है. उसका ये ज्ञान परीक्षाओं के समय तक ही रहता है, उसी समय उसकी परीक्षा हो जाती है, और वो आने 20-30 के सामान्य लेवल को बढाकर 70-80 तक ले जाता है, उसके बाद वह सब कुछ भूल जाता है और फिर अपने 20-30 के सामान्य लेवल में आ जाता है.
       स्वर कोकिला श्रेया घोषाल के परम प्रशंसक अनमोल उनसे मिलने के किस्से विस्तार से बयान करते हैं।  अनमोल ने श्रेया घोषाल का एक वीडियो भी बनाया है। जिसे उन्होंने श्रेया घोषाल को समर्पित किया है। एक महीने लगे उनको यह खूबसूरत वीडियो बनाने में।


       अनमोल कानपुर में किस स्कूल में पढ़ते हैं। पता चलेगा तो अगली बार जब कानपुर जाऊंगा तो मिलने की कोशिश करूंगा इस भविष्य के वैज्ञानिक से। फ़िलहाल तो प्यार और शुभकामनायें ही कह रहा हूं।

      पिछले दो घंटे से ये ब्लॉग जगत की सैर करते हुये सोच रहा हूं - अद्भुत है यह ब्लॉगिंग की दुनिया। न जाने कितने रत्न मौजूद  हैं यहां।


      आज के लिये फ़िलहाल इतना ही। बाकी फ़िर। मजे करें तब तक।

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