शनिवार, सितंबर 06, 2008

बिना पोस्टस के ब्लोग ठूँठ होते हैं

अभी कुछ दिनों पहले सैर पर निकला था तो मैंने देखे थे बहुत सारे शब्द, बगैर कपड़े के जो दौड़ रहे थे इधर उधर, बिल्कुल नंगधड़ंग बेमतलब एक दूसरे के पीछे भागते हुए छोटे बच्चे से नासमझ, शर्म और बेशर्मी से अनजान। इन शब्दों के सबसे पीछे था एक अकेला शब्द कपड़े पहने हुए, मुझे आश्चर्य से नंगधडंग शब्दों को देखता देख अपनी शर्म छुपाता कहने लगा - ये इनका शैशव काल है ना इसलिये, एक को कपड़ा पहनना सिखाता हूँ तो दूसरा भूल जाता है। अब मैं उससे क्या कहता कि आज से ३ साल पहले तो ये शब्द और उनके प्रणेता बड़े परिपक्व और अच्छे व्यवहार वाले होते थे, अचानक फिर से ये शैशव कैसा?

आज झरोखे में पेश है एक ही लेखक राजेन्द्र सिंह बेदी की लिखी हुई दो फिल्में, दोनों की ही कहानी भारत में नारी की दशा बयान करती है। ज्यादा झरोखे में पढ़िये हम शुरू करते हैं आज की चर्चा लवली के अनुरोध के साथ।
हमारे प्रिय कवि और हिन्दी के सबसे ज्यादा लिखने वाले ब्लॉगर श्री दीपक भारतदीप जी अपनी तथा अपनी जीवनसंगिनी के बुरे स्वास्थ्य की समस्या से बहुत परेशान हैं .आप सब से विनती है की उनके लिए प्रार्थना करें ..उनको इस वक्त हम सब के संबल की जरुरत है।
दीपकजी थोड़ा ब्लोगिंग और अपने आप को आराम दीजिये जल्दी से स्वास्थ्य लाभ करके आप नयी उर्जा के साथ लौटें यही कामना है।

पैसे और फेम दोनों की माया भी गजब की होती है, एक के पैसे से काली पट्टी बाँधे कानून की आँखे ऐसी चौंधयाई की उसे ये ही नही दिखा कि वो पाँच साल की सजा का बटन दबा रहा है या दस। नयनसुख बताते हैं -
लेकिन लगातार तीन दिन इंतजार के बाद पांच साल की सजा दी गई और उसमें से भी वे दो साल कम कर दिए जाएंगे जो संजीव नंदा विचाराधीन कैदी के रूप में काट चुके हैं।
अब बात करते हैं फैम की, अब निठल्ला है नही इसलिये दिये गये लिंक को उसका ही मान लिया जाय। तो बात कुछ यूँ है कि हम सोचते आये थे कि अपने बच्चों के अच्छे कामों की या उनकी तारीफ करते सुनते हुए माँ बाप की छाती चौड़ी हो जाती है। लेकिन ऐसी तारीफ हमने पहली बार सुनी, इनकी अपनी बेटी से झींगा कुश्ती तो हम तय मानकर चल रहे हैं। अपनी नयी किताब 'Through the Storm' में अपनी मुसीबतजदा बेटी की तारीफ करते हुए इन मोहतरमा का कहना है (अंग्रेजी में है हम हिंदी में बता रहे हैं ;)) -
ब्रिटनी ने १३ साल की उम्र में शराब पीनी शुरू की, १४ साल की उम्र में अपना कुँवारापन खोया और अगले साल यानि १५ साल की उम्र में ड्रग्स लेनी शुरू की।
आगे और भी है, आप यहाँ जाकर ये गुणगान देख सकते हैं, क्या सच क्या झूठ, सही गलत का गणित आप खुद लगाईये।

पाँच सितम्बर यानि टीचरस डे, बहुत लोगों ने अपने अपने तरीके से गुरूओं को याद किया। चिट्ठेकारों और मीडिया की मानसिकता में फर्क है ये तो सब मानते हैं ही वो टीचरस डे में भी दिखता है। चिट्ठेकार कुछ कुछ ऐसा-वैसा लिखकर गुरूदिवस मना रहे हैं, जरा बानगी देखिये (जिसकी बात रह जाये, टिप्पणी में अपना तरीका चिपका दे) -
गुरू जी राम-राम, नमन, हे गुरू, अध्यापक, शिक्षक, आचार्य, टीचर, मास्टर, तुम्हें प्रणाम,
मौन में जिसके वाणी हो...!
बाहर-बाहर कर दे खाली
भीतर-भीतर अमृत भर दे
कंकर को शंकर जो कर दे
उस गुरू को शीश नवाता हूँ
कुछ इस तरह से याद करते हैं आज गुरु जी का दिन है तो कुछ इस तरह ऐ ! टीचर तुझे सलाम ये तो था चिट्ठेकारों का याद करना, अब मीडिया वाले कुछ यूँ याद कर रहे हैं टीचरस को - Bollywood's Sexiest Teacher Roles, किसी टीचर के आगे ये शब्द हमने पहली बार लगा देखा इसलिये यहाँ बता दिया इसे उन नंगे दिखे शब्दों का असर ना समझें। लगे हाथ आपको मास्टर नाना से भी मिलाते चलें, ये उस वक्त के हैं जिस जमाने में मास्टर की समाज में बहुत इज्जत होती थी, उन्हें आजकल की तरह सैक्सी नही कहा जाता था।
कार्टून अभिषेक के सौजन्य से

गाहे-बेगाहे धमकने वाले विनीत का कहना है बिना ब्ऑयफ्रैंड के लड़कियां ठूंठ होती है -
स्त्री अभी संतान नहीं होने पर बांझ कहलाने के दर्द से मुक्त भी नहीं हो पायी है कि पुरुष समाज ने उसके दर्द को बढ़ाने के लिए एक और मुहावरा गढ़ लिया है।.......जिस लड़की के अब तक भी कोई ब्ऑयफ्रैंड नहीं है वो समझो ठूंठ है।
अब पढ़कर तो ऐसा ही लगा कि ये काफी बड़ी लड़कियों के लिये कहा गया है और अगर ऐसा है तो भाई लोग आप अभी पीछे हो यहाँ तो दूध के दाँत भी पूरे नही टूटे होते हैं और इस तरह का ही कुछ सुनने को मिलने लगता है।

पांच सितम्बर के दिन जब सारे शिष्य जय गुरू देव का जयघोष कर रहे थे वहीं एक मास्टरनी ढोल की पोल खोलने में आमदा थी, कह रही थीं बचपन के हत्यारे स्कूल -
स्कूलों को पहले दिन से ही ट्रेंड बच्चे चाहिये जो अपना काम समय पर पूरा करने, टेस्ट में नम्बर लाने, कक्षा मे चुप बैठने, अध्यापक के कहे को पत्थर की लकीर मानने, और अपनी समझ –सहजता-बालपन का त्याग करके इस दोहे का गूढार्थ समझ लें
बड़ी गंभीर बात है ये, हमे तो डर ये लग रहा है कि कहीं स्कूलों की देखा देखी माँ-बाप भी ये ना चाहने लगे कि कितना अच्छा हो सीधे ही ट्रेंड बच्चा पैदा हो जाये। यानि बचपना फिर सिर्फ किस्से कहानियों में पढ़ने को मिलेगा।

बालेन्दु देश से बाहर नजर दौड़ाते हुए कहते हैं फिर से शीत युद्ध की ओर लौट रही है दुनिया?
रूस अपनी नौसेना और वायुसेना को भी बड़े पैमाने पर सुसंगठित और हथियारबंद करने में लगा है। हाल में रूसी उप प्रधानमंत्री सर्गेई इवानोव ने कहा था कि हम करीब-करीब उतने ही जहाज बनाने में लगे हुए हैं जितने कि सोवियत संघ के जमाने में बनाया करते थे। इधर प्रधानमंत्री व्लादीमीर पुतिन ने यह कहकर अपने देश का आक्रामक रुख स्पष्ट किया है कि रूस काला सागर में अमेरिका समेत पश्चिमी देशों के जहाजों के जमाव का जवाब देगा।
चलिये नौबत शीत युद्ध तक ही है, यहीं तक रहे तो सबके लिये अच्छा है।

युद्ध के नाम से ही हमें ऐसा वैसा दिखने लगता है, इसलिये हम तो अब जा रहे हैं प्रीति के घर कोई अच्छी सी कविता पढ़कर आते हैं, अरे रे रे मेरा मतलब ब्लोग से है, मेरा सागर। शायद इन्हें पता था हमारे आने का इसीलिये ऐसे ऐसे आईने लगा रखे थे कि क्या बतायें। देखिये तो -
ये आईने भी,
दुश्मनी निभाते हैं,
जिन ख्वाबों से,
मैं डरती हूं,
उन ख्वाबों को ही,
दिखाते हैं,
पल-भर भी जो,
न ठहर सकें,
वो आशियां बनाते हैं
बाप रे, युद्ध के बमों के सामने भी कोई आशियाँ नही टिकता। वाह री किस्मत, यहाँ आने से पहले सिर्फ युद्ध के नाम से ऐसा वैसा दिख रहा था, अब आईने के नाम से भी यही दिख रहा है।
ये विनिता जी का आँगन दिख रहा है, यहीं चलकर देखते हैं शायद कुछ फूल वगैरह दिख जाय तो ये मन थोड़ा शांत हो, अरे ये क्या ये तो सबको फैमिली फोटो दिखा रही हैं। अले ले ले बड़े प्याले प्याले फोतो हैं ये तो

चलिये जब तक हम आज की चर्चा के लिये लास्ट कविता ढूँढते हैं तब तक आप चार्ली चैप्लिन की आत्मकथा बाँचिये और अगर चैप्लिन नही जमता तो रतलामी क्या बुरा है, फिर से गलती मेरा मतलब भोपाली।

आह आखिर मिल ही गयी, दुबई में जा कर ओस की बूँद मिली, स्वाति बिटिया के प्रेम में इतनी अभिभूत हो गयी कि आँखों से आँसुओं की जगह हाइकू टपकने लगे। अब इन्होंने इन आँसूरूपेण हाइकुओं को समेट के ले जाने के लिये सिर्फ छन्नी रखी हुई, इसलिये बड़ी मुश्किल से इतने ही आ पाये बकिया आप वही देखिये
ओस सी स्वच्छ
घर फूटी कोपल
हरी या लाल?


अब कुछ सूचनायें- आप लोगों से हमेशा एक मेल की दूरी पर रहने वाले जीतू के पन्ने ने अपने चार साल पूरे किये, और नीरजजी ने भी नीरज के एक साल पूरे किये।, एक साल पूरा होने पर उन्होंने जो पोस्ट लिखी है उसे सहेज के रखी जानी चाहिये क्योंकि इसमें उन्होंने अपना दिल उडेलने के बजाय सारे ब्लोगर ही उड़ेल के रख दिये हैं। नीरजजी आपको भी बधाई और हमें भी उड़ेलने के लिये धन्यवाद।

नाम इनका लवली लवली टाईप का है लेकिन काम इतना हिम्मत वाल करके आयीं हैं कि क्या कहें? कैसी हिम्मत? एक भारतीय भुजंग को लाने की, लवली लेकर आयीं हैं भारतीय भुजंग



एक दूजे के लिये
1. अरे …ये तो वही है कमबख्त इश्क़

2. बूढ़ी माँ को जंगल में छोड़ दिया बेटे ने, पहचानने से भी किया इंकार फिर कहता है तो क्या हुआ क्या मैं आत्महत्या कर लूँ?

3. अपने नेक सीख से ज़िन्दगी को सवाँरने वाला शिक्षक ये ही हैं वो हरदम जिनसे खिले गीत के छंद
झरोखा

दस्तक, संजीव कुमार और रेहाना सुल्तान अभिनीत ये फिल्म आयी थी १९७० में। राजेन्दर बेदी ने इसे लिखा भी था और निर्देशित भी किया था। फिल्म की कहानी कुछ यूँ थी कि अपने हीरो हीरोईन एक ऐसे मकान को किराये पर ले लेते हैं जहाँ पहले कोई तवायफ रहती थी। घर लेने के बाद हमेशा रात को कोई ना कोई आकर दस्तक देता था और उसी तवायफ के लिये पूछने लगता था। आगे का हाल फिल्म देख कर पता लगाईयेगा। संगीत था मदनमोहन का, गीत मजरूह के।

१. बैंया ना धरो, वो बलमा
२. हम हैं, माता-ए-कूचा बजार की तरह
३. माई री माई कासे कहूँ (मदन मोहन ने इस गीत को अपनी आवाज दी है)
४. तुमसे कहूँ एक बात

राजेन्द्र सिंह बेदी की लिखी एक दूसरी दमदार कहानी पर बनी फिल्म है, एक चादर मैली सी। १९८६ में ये फिल्म आयी थी जिसमें ऋषि कपूर, पूनम ढिल्लन और हेमामालिनी का मुख्य किरदार था। ये दोनों ही फिल्में देखने लायक हैं।

4. गंगा मौसी जरा बतायें आखिर अनपढ़ क्यों हैं मुस्लिम औरतें

5. बमों की हम पर नजर और नजर के हटते ही हमको लगी
विरह अगन सी तपन!!

6. आज लिखने का मन करता है अच्छा हुआ वक्त रहते कर गया वरना तो बुलावा आया था चलो भिखारी बने

7. रूप बदल के सयाने सैया आराम से आओ हम्मैँ कउनो जल्दी ना हौ

8. भगतसिंह ने कहा़ सावधान तोड़े गए सारे पुल एक दिन लौटकर पुकारेंगे तुम्हें

9. ग्वालियर में भाजपा से नरेंद्र या सुषमा स्वराज कोई भी हो, जादू नही रहा अब पहले जैसा

10. उद्योग वाला आलू और आलू वाली उद्योगनीति मिलकर बनाते हैं एक घनिष्ठ सम्बन्ध

11. हर ‘बाल्‍टी’ डस्‍ट-बीन नहीं होती और हर ‘डस्‍ट-बीन’ बाल्‍टी नहीं होता!! ना ये पहले होता था ना ये अब होता है इसलिये इतना ना सिखाओ कि मुन्ना थर थर कांपे रोज अंगनवा

चलो भईया भूल चूक लेनी देनी, फिर मिलेंगे अगले शनिवार।

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शुक्रवार, सितंबर 05, 2008

रँज लीडर को बहुत है, मगर आराम के साथ्

बेटियां


घोस्ट बस्टर ने अभय तिवारी की इज्रायल संबंधी लेखों की बखिया उधेड़नी शुरू की। लेकिन अभी वे इज्रायल पर ध्यान न लगाकर अभय पर ही टिके हैं। लेख से ज्यादा इसकी टिप्पणियां पठनीय हैं। ई-स्वामी मानते हैं कि अभय के लेख संतुलित हैं। दिवेदी जी कहते हैं बहस होनी चाहिये, शिवकुमार पूछते हैं -इस तरह की बहस कितनी जरूरी है! ज्ञानजी कहते हैं -अरब देशों का तेल निकल जाये तो सब समस्या हल हो जाये। शिवकुमार मिश्र को एतराज है कि उनको गलत कोट किया गया वहीं विजय शंकर चतुर्वेदी का कहना है-
ये लोग फुनगी पकड़कर कुतर्क करना शुरू करते हैं. जड़ की तरफ जाने का इनके पास धैर्य नहीं. अभय तिवारी के शोधपूर्ण आलेख के जवाब में इनकी वैचारिक दरिद्रता देखते ही बनती है|

पल्लवी नें अपनी पोस्ट का शानदार सैकड़ा पूरा किया। अपने अनुभव बांटते हुये वे विचार करती हैं
पल्लवी
-
.वो क्या चीज़ है जो अनजान होते हुए भी हमें एक दूसरे से जोड़े रखती है? शायद हम एक जैसे हैं इसलिए दूसरे के प्रयत्नों में हमें अपने प्रयत्न दिखाई देते हैं... जब कोई और हिम्मत हारता है तो हम सब उसकी हिम्मत बढाते हैं क्योकी उसके अन्दर भी हमें अपना सा ही एक अक्स नज़र आता है.


ममताजी आजकल इलाहाबाद की सैर पर हैं। खूब घूम रही हैं लिख रहीं हैं फोटो समेत। बहुत मेहनत ये पोस्ट लिखी है। अच्छी। आज वे स्वराज भवन घु्मायेंगी।

दिल्ली में ब्लागर मीट होने वाली है- जाइये न! बहुत लोग आने का तय कर चुके हैं।

इसे बांचिये- इंग्लिछ मात्तर का बेता हो के लोता है बेते!

नये चिट्ठाकार

    बेटियाँ होती हैं ठंडी हवाएं,
    तपते हृदय को शीतल करने वाली,
    बेटियाँ होती हैं सदाबहार फूल,
    खिली रहती हैं जीवन भर,
    रहती हैं चाहे जहाँ,
    महकाती हैं,
    सजाती हैं,
    माता पिता का आँगन
    बेटियाँ होती हैं मरहम,
    गहरे से गहरे घाव को भर देती हैं,
    संजीवनी स्पर्श से|
    अशोक लव

  1. संजीव ने जिला अभिवक्ता संघ दुर्ग की मासिक बुलेटिन शुरू की।


  2. अमित कुमार कोबचपन से ही अपने गांव के बारे में अख़बारों में छपी कतरनों को जमा करने का शौक़ था। सोचता थे अख़बारों में फालतू की इतनी बातें छपती हैं,...काम की नहीं। इसलिए स्थिति बदलनी चाहिए। बाद में लिखना शुरू किया। पेशेवर पत्रकारिता ईटीवी बिहार-झारखंड से शुरू की,...अब वॉयस ऑफ इंडिया राजस्थान में काम कर रहे हैं। तीन ब्लाग चलाते हैं- चार पहर, पुण्यार्क और मुनादी| चार पहर के अलावा बाकी में कुछ लिखा नहीं।


  3. जल प्रबंधन से संबंधित जा्नकारी देने के लिये इंडिया वाटर पोर्टल बहुत काम की साइट है। पानी की बातें चाहे वे बुंदेलखंड का सूखा हो या कोसी का कहर या फ़िर रेनवा्टर हार्वे्स्टिंग सभी की चर्चा यहां है।

  4. * जिस दिन रोटी ज्‍यादा बनानी होती थी और गरमी से मैं परेशान हो जाती तो आंटे की कई लोइयां मैं चूल्‍हे के भीतर फेंक देती थी।
    ** अब पढाई लिखाई में मेरा मन नहीं लगता था हर समय उसकी शक्‍ल आंखों के सामने घूमती रहती और उसका हिलता हाथ दिखता रहता। शशिप्रिया



  5. अम्बेदकर नगर के हिमांशु त्रिपाठी गली मोहल्ले की बात करते हैं।



  6. लेखक, कवि, पत्रकार अशोक लव ३० वर्षों के अध्यापन के बाद निजी कार्यों में व्यस्त। मोहयाल मित्र पत्रिका का १९८१ से संपादन। साहित्यिक एवं शैक्षिक लगभग ८० पुस्तकें प्रकाशित। शिखरों से आगे...! ब्लाग की शुरुआत कंचन के सहयोग से।


  7. २४ साल के अनजाने भारतीय कच्चा चिट्ठा ब्लाग स्पाट पर अगस्त, २००८ में शुरू किया। इसके पहले बेवदुनिया पर चिट्ठा चलाते थे।

  8. चित्तो एक साल से पहाड़ पर पक्षी की डिजाइन बना रहे हैं। अब तक लगभग 250 लीटर पेंट लग चुका है। पहाड़ पर सबसे छोटा पक्षी 40 फीट व सबसे बड़ा 120 फीट का बनेगा और कुल 120 आकृतियां बननी हैं।
    अजब-गजब



  9. पटना के दीप नारायन एक एक नई सोच के साथ अपना ब्लाग जून में शुरू किया। अब तक कुल आठ पोस्टें लिखीं।


  10. झारखंड की शशिप्रिया अपनी आत्मस्वीकृतियां लिखनी इसी माह शुरू की। दो पोस्ट लिख चुकी हैं। अंदाजे बयां शानदार, लेकिन आपकी टिप्पणियों के लिये अभी वहां है इंतजार!


  11. विवेक ने कोसी की खबरों के लिये ही ब्लाग शुरू किया क्या!


  12. अजब-गजब फ़रवरी ,२००८ से खबर संसार में हैं। शुरुआती पोस्टें सिनेमा, खेल और आफ़िस से। नवीनतम पोस्ट दम तोड़ता बचपन उनकी संवेदना का परिचय देती है।


एक लाइना


राजस्थान के दफ़्तर

  1. खुदा हूं देवता हूं :आजकल हर तरफ़ खुदाई चल रही है। लोग खोद के डाल जाते हैं।


  2. : अमानत : में खयानत न की जाये तो किसमें की जाये ये तो बतायें। आखिर कहीं तो करनी पड़ेगी न!


  3. विरह के दो रंग :मिलाकर ये कविता पेश है!


  4. मोहब्बत में कभी ऐसी भी हालत पायी जाती है:तबीयत और घबराती है जब बहलाई जाती है।


  5. रवीश, कुछ ज्यादा ही नहीं हो गई तारीफ!! इसी को कहते हैं- मन-मन भावै, मूड़ हलावै!


  6. अभय जी, आतंकवादियों को हीरो साबित करना कहाँ तक सही है? : हीरो का रोल घो्स्ट बस्टर को दिया जाये, अभय रहेंगे साइड हीरो।


  7. बहस :पढकर 'बिदक' गए थे फिर भी 'बहक' गए और 'बौराए' से 'बाँच' गए।


  8. अनोखी पहेली : बूझो तो जानें


  9. :आज कम से कम हम सब फक्र से कह सकते हैं स्त्री ही स्त्री का शोषण नहीं करती : उसे इस काम में हर तरफ़ से सहयोग मिल रहा है।



  10. अभिनव स्पर्ष तुम्हारा: मेरी कथा, व्यथा, गाथा को क्रमश: जिलाये, सुलाये, गुंजाये हुये है।


  11. अनिश्चित काल के लिये निठल्ला चिंतन बंद : लौट आ चिठेरे, तेरे पाठक तुझे टेरें।


  12. चिठीया हो तो हर कोई बांचे... : कोई बांचे न ब्लाग हमार!



  13. कोई बताएगा कि बच्चे का क्या दोष है ? यही कि वो बच्चा है।


  14. किताबों की अलमारी : साह्त्यिक झोले में डाले हैं!


  15. वो गुजरा बचपन वो बारिश: चाहिये!! अब कहां मिलेगा इत्ता पुराना रिकार्ड!



  16. काश बिहारियों की मूढ़ता धो सकती बाढ़: मतलब आप कह रहे हैं कि बाढ़ जमीन पर पड़ी गंदगी है और बिहारी मूढ़्ता पोंछा!


  17. Blogger Template: आओ जाने सीखें ब्लोगर टेंपलेट - पार्ट 1 : क्या फ़ायदा हमें बनवाना दूसरों से ही है!


  18. मैं हूं नटखट अंश तुम्हारा: ब्लागर हो गये, अब तो बड़े बन जाओ मीत!



  19. नमस्कार-नमस्कार: अरे चंदू भाई आओ लिखो बहुत हुआ उधार!


  20. ताऊ के ब्लाग की टूटी हड्डी फ़िर जुड़ी : कित्ते तो डाक्टर लग गये इलाज में।


  21. रोशन हो हर घर हर कोना : कैसे बिजली बत्ती तो सब गायब है!



  22. सूरज की लालिमा देखो :पहले काम निपटा लें वर्ना बास लाल हो जायेंगे।


  23. कौम के डर से खाते हैं डिनर हुक्काम के साथ: रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ


  24. बिगुल बजा दो महाक्राँति का : एक मिनट जरा कान बँद कर लेँ


  25. खिले गीत के छंद सुरभित पुष्पों का मकरंद !



  26. सब कुछ सापेक्ष है... मच्छर हत्या से मांसाहार समर्थन तक



  27. सब कुछ सापेक्ष है... बमों की हम पर नजर
  28. : है! वे मौका पाते ही फूट लेँगे।


मेरी पसन्द



पनीली ऑंखों में
गुजरा जमाना
अब भी कायम है
कुछ भूमिकाएँ भर बदलीं हैं
बाकी दुनिया यथावत है
पहले उसकी जरूरतें
कोई और पूरी करता था
अब कोई और करता है.

कीमत की उसे नहीं फिकर
कमतरी से है नफरत
नायाब से नायाबपना
उसे हमेशा ललचाता है.

एक दिन उसने पूछा--
पत्तियों के पीलेपन और
बालों के क्लिप के नीलेपन में
क्या संबंध हो सकता है
मैं नहीं समझ पाता
क्या बोलूँ.

हमने कहा--
तुम रूठ तो जाओ ज़रा
बला टले
मगर वह नहीं रूठी और टली भी नहीं
बोली-
उसे तो चाँद चाहिए
कहीं से भी लाकर दो
कैसे भी खरीदकर लाओ
किसी भी कीमत पर
कुछ न बचा हो तो
खुद को बेच आओ
मगर
चाँद लाओ.

मैंने पूछा--
मेरे बगैर करोगी क्या चाँद का
उसने कहा--
पहले लाओ तो
बाद में सोचेंगे.

वह पगली
नहीं जानती
इंसान का मैं-पना ही
उसकी ताकत है
जब वही झर जायेगा
चीज़ों के मायने बदल जायेंगे

आत्माराम शर्मा

और अँत मेँ


--- कल अधिकाँश पोस्टोँ पर समीरलाल जी की टिप्पणी इस तरह रही-
५ दिन की लास वेगस और ग्रेन्ड केनियन की यात्रा के बाद आज ब्लॉगजगत में लौटा हूँ. मन प्रफुल्लित है और आपको पढ़ना सुखद.
हम भी सोचे कि टिपियायेँ-
भन्नाना पुरवा से गड्रिया मोहाल की यात्रा से लौटा हूँ, हड्डियाँ हिल रहीँ है! सुखद नहीँ है! लेकिन मन दुखी नहीँ है! मौज है! आखिर ब्लागजगत मेँ लौटे हैँ।
या फिर ये
तीसरे कमरे से दुसरे कमरे मेँ लौटे हैँ। अभी पहले मेँ जाना है। बहुत झाम है इस दोहराव मेँ लेकिन क्या करेँ! करना है!

लेकिन फिर नहीँ लिखे। नकल मेँ फिर यह भी लिखना पडता-
पत्नी साथ मेँ नहीँ है लेकिन फिर भी विरह मेँ तप रहे हैँ। आप का तो विरह मेँ तपना जायज है क्योँकि भाभी जी साथ मेँ हैँ, हम किस भरोसे ये नियामत हासिल करेँ। पत्नी बाहर है। मन कर रहा है कविता पेल देँ लेकिन नहीँ किये। अगर हम करेँगे तो आप क्या करेँगे!


कल सतीश सक्सेना जी ने सलाह दी गम्भीर हो जाने की।- मगर आप हर कार्य ही "लाइट ले यार" मूड में ही करते हो हम कहने वाले थे अब हम कहाँ से सीरियस होँ। आप अकेले बहुत हो भाई! लेकिन पता हुआ कि वो बात उन्होँने अरुण के लिये कही थी।

अरविन्द जी का रोना है कि वे न घर के न रहे न घाट के। सिर्फ ब्लाग के हो कर रह गये हैँ।

--जितना लिखा उससे कहीँ बहुत रह गया। अवध बिहारी की कविता याद आती है-

इस खिडकी से जितना दिखता है,
बस उतना सावन मेरा है,
हैँ जहाँ नहीँ नीले निशान
बस उतना ही तन मेरा है!


बकिया मौज। कल की बात सुनियेगा निठल्ले तरुण से।

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