गुरुवार, जनवरी 22, 2009

ओबामा ओबामा ओबामा बजा.....

हम भारतीय चुनाव और शपथ-ग्रहण समारोह के इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि अपने देश में चुनाव और शपथ-ग्रहण समारोह न हो तो किसी और देश का चुनाव और शपथ-ग्रहण समारोह को देखकर खुश हो लेते हैं.

अब देखिये न, ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत गए. जीत गए तो राष्ट्रपति भी बन गए. बन गए तो शपथ-ग्रहण कर लिया. शपथ ग्रहण कर लिया तो अब अमेरिका को वही चलाएंगे. लेकिन उनके राष्ट्रपति बनने से हम भारतीय भी बहुत खुश हैं. पिछले कई दिनों से समाचार चैनल, अखबार, रेडियो पर ओबामा छाये हैं.

ब्लॉग पर भी वही छाये हैं. बादल की तरह. उनके ऊपर पोस्ट की बरसात हो रही है.

आज तो अनूप जी ने भी ओबामा के ऊपर पोस्ट लिख दी है. वे लिखते हैं, एक ठो ओबामा इधर भी लाओ यार.

अब ये बात उन्होंने किससे कही है, ये अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है. 'इधर भी लाओ यार' से उनका मतलब ये तो नहीं कि वे कानपुर या लखनऊ के लिए ओबामा मांग रहे हैं. नहीं, ये बात मेरे मन में इसलिए आई कि अगर वे कानपुर और लखनऊ के लिए मांग रहे हैं तो ठीक नहीं.

आख़िर मायावती जी और उनके प्रशंसक उनकी तुलना ओबामा से पहले ही कर चुके हैं. खैर, अनूप जी अपनी पोस्ट में लिखते हैं;


अपने देश में भी लोग कहने लगे हैं यार एक ठो ओबामा इधर भी चाहिये। यहां भी आये तो कुछ काम बनें। ओबामा का मतलब अगर अल्पसंख्यक, अश्वेत, वंचित समुदाय से आने की बात है तो भारत में ऐसे कई ओबामा टुकड़ों-टुकड़ों में आये और कालांतर में अपनी गति को प्राप्त हुये। एक नहीं कई।

भारत में ओबामा अगर टुकड़े-टुकड़े में आयेंगे तो अपनी गति को प्राप्त होंगे ही. टुकड़े की गति क्या हो सकती है? टुकड़ा ख़तम हो जाता है. साबुत आते तो कुछ होता भी. टुकड़ा चाहे एक हो या कई, उसकी गति यही होनी है.

अनूप जी आगे लिखते हैं;


यह संयोग है कि आज अमेरिका की हालत पतली सी है। सेनायें फ़ंसी हैं। बैंको को डुबा या मिलके उनके लालों नें। अमेरिका धिरा है तमाम बवालों में। सो उनको ऐसा आदमी चाहिये जो फ़ालतू की फ़ूं-फ़ां में टाइम वेस्ट की बजाय अपनी हालत ठीक कर दे।

शब्दों के संयोजन पर ध्यान दीजिये.

बैंकों को डुबो दिया मिलके उनके लालों ने
अमेरिका घिरा है तमाम बवालों में

मेरे कहने का मतलब ये कि न चाहते हुए भी अनूप जी पोस्ट लिखते-लिखते कविता की तरफ़ चले थे. वो तो कोई ध्यान न दे इसके लिए इन दो लाइनों को पैराग्राफ का हिस्सा बना दिया.

वैसे कोई छायावादी विद्वान यह बात आसानी से साबित कर सकता है कि पहली लाइन में 'लालों' का मतलब कम्यूनिस्ट लोगों से है. अगर ऐसा हो गया तो अमेरिका के साम्राज्यवादी छायावादी विद्वान के हवाले से कह सकते हैं कि; "हमारे बैंक ठीक-ठीक चल रहे थे. 'लालों' ने उन्हें डुबो दिया.

अनूप जी का कहना है कि भारत और अमेरिका एक मामले में एक जैसे हैं. और वो है 'अभिमन्यु' का इंतजार करने के मामले में. इस बात को बताते हुए उन्होंने एक कविता लिख डाली है.

मैं कह रहा था न कि कविता की तरफ़ पहले ही मुड़ चुके थे. शायद उस मोड़ से सुस्त कदम रस्ते जाते थे इसलिए ठिठक गए और वापस आ गए. लेकिन बाद में कविता लिख ही डाली. आप यहाँ पर कविता के अंश और उनकी पोस्ट पर पूरी कविता पढ़िये.

वे लिखते हैं;

लेकिन अभिमन्यु पैदा करने के भी
एक कायदे का बाप चाहिये।
ऐसा बाप जो कायदे सेउसकी मां को चक्रव्यूह भेदन की
कहानी सलीके से सुनाये।
ऐसे कि मां बोर न हो
जम्हुआकर सो न जाये।
सातों दरवाजे तोड़ने की कथा पूरी सुने फ़िर आराम से सो जाये
ताकि अभिमन्यु आये तो चक्रव्यूह के अंन्दर ही न मारा जाये।

कायदे का बाप चाहिए? तो फिर पहले अर्जुन का इंतजार करना पड़ेगा. वैसे भी ज्यादातर चांस यही है कि आज का अभिमन्यु (अमिताभ बच्चन की फिलिम आज का अर्जुन के तर्ज पर) चार द्वार तोड़कर बोलेगा; "पाँच बज गए. हमारी ड्यूटी ख़तम. अब कल दस बजे वापस आऊंगा तो आगे के द्वार तोडूंगा."

वैसे ओबामा को 'इधर' लाने के आह्वान से दिनेश राय द्विवेदी जी सहमत नहीं दिक्खे. उन्होंने तो अपनी टिप्पणी में एलान कर दिया कि;


हमें नही चाहिए ओबामा। हम अपना कुछ खुद बना लेंगे।

ये भी सही है. अभी डॉलर का भाव रूपये के मुकाबिले बहुत ऊपर है. ऐसे में नीति यही कहती है कि इंपोर्ट अभी बहुत मंहगा पड़ेगा. अपने देश में ही कुछ तैयार करना पड़ेगा.

अच्छा, ओबामा जी अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो ज्यादातर लोगों ने कहा कि ओबामा जी ने इतिहास रच दिया. लोगों की इस बात से एक बार फिर से साबित हो गया कि कविता-कहानी की तरह इतिहास भी रचा जाता है.

खैर, ओबामा जी ने इतिहास रचा इस बात को स्वीकार करने में एस एन विनोद जी को संकोच हो रहा है. वे लिखते हैं;


इतिहास रचा गया! बिल्कुल ठीक! इतिहास बराक ओबामा ने रचा, इसे स्वीकार करने में मुझे संकोच है. यूं भारत के प्राय: सभी समाचार-पत्र और टेलीविज़न चैनल पिछले दो दिनों देश को शिक्षित करते देखे गए कि 'ओबामा ने इतिहास रचा.

समाचार पत्र और न्यूज़ चैनल देशवासियों को शिक्षित कर रहे हैं और हम हैं कि उनके शिक्षक बनने के ख़िलाफ़ जब-तब उतर आते हैं. अपने संकोच के बारे में बताते हुए विनोद जी आगे लिखते हैं;


मैं समझता हूं ये अतिरेकी उद्गार है. अति उत्साह में ऐसा ही होता है. गुब्बारे के पिचक जाने के बाद ऐसे उत्साही कलमची स्वयं ही संशोधन को आतुर हो उठेंगे.

वैसे मेरा मानना है कि कलमची लोगों के जब उनके उद्गार को संशोधित करने का समय आएगा तो वे किसी और के द्बारा इतिहास रचवा रहे होंगे. पचास बहाने हैं इतिहास रचने के. और भी भ्रम है ज़माने में ओबामा के सिवा...

अपने संकोच को जिगासा में परिवर्तित कर विनोद जी आगे लिखते हैं;


हमारे भारत में मौजूद विदेशी मामलों के विशेषज्ञ 'ओबामा-उदय' को भारत के लिए हितकारी मान रहे हैं. इस बिन्दु पर सहज-जिज्ञासा यह कि क्या सचमुच अमेरिका, भारत का मित्र साबित होगा?

अमेरिका किसका मित्र साबित हुआ है आजतक? मित्रता बहुत बलिदान मांगती है. और अमेरिका बलिदानी हो जाए ऐसा होने का चांस कमे है.

विनोद जी की इस पोस्ट पर द्विवेदी ने अपनी टिप्पणी में लिखा;


इतिहास हमेशा जनता ही रचती है।

जनता भी गजब 'चीज' है. जो चाहे इसे खा जाता है. वैसे मेरा मानना है कि कविता रचते-रचते जब बोर हो जायेगी तो इतिहास भी रच ही डालेगी एकदिन. बस वो दिन कब आएगा, ये नहीं पता.

खैर, अमेरिकन ओबामा से आते हैं भारतीय अभिमन्यु पर. कुछ लोग नरेन्द्र मोदी को अभिमन्यु समझते हैं. इनमें से कुछ उद्योगपति भी हैं.

बड़ी बात है कि नहीं. आज संजय जी ने उनके राज्य के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के दस अवगुण गिनाने के बहाने नेता के गुणों पर प्रकाश डाला. हम तो सोचकर पोस्ट पढ़ें गए कि नरेन्द्र मोदी के अवगुण क्या-क्या हैं, ये पढ़ेंगे लेकिन संजय जी ने झांसा दे दिया.

उन्होंने नेता के गुण गिनाये. वे लिखते हैं;


नरेन्द्र मोदी के वे खास अवगुण जिनकी वजह से वे प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है. और जिन्हे लायक माना जा रहा है, उनमें यह मौजूद है….

इतना लिखने के बाद उन्होंने असली नेता के दस गुण गिनाये. ये गुण हैं;

1.नेता ऐसा हो जो भाई समान हो
2.नेता ऐसा हो जो जाति का कल्याण करे:
3.नेता ऐसा हो जो पानी-बिजली-सड़क देने का वादा करे और करता रहे:
4.नेता ऐसा हो जो जवाँ मर्द हो:
5.नेता ऐसा हो जो अपने परिवार से प्रेम करे:
6.नेता ऐसा हो जो दोनो हाथों से दान करे:
7.नेता ऐसा हो जो वफादार हो:
8.नेता ऐसा हो जो अल्पसंख्यको का हितेशी हो:
9.नेता ऐसा हो जो शान्तचीत हो:
10.नेता हो तो गाँधी हो:


संजय जी ने हेडिंग्स डालकर विवेचना भी लिखी है. ठीक वैसे ही जैसे हम परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर लिखते थे. विवेचना तो आप उनकी पोस्ट पर जाकर पढ़ लें.

संजय जी की ये पोस्ट शाश्वत जी की समझ में आ गई. उन्होंने अपनी टिप्पणी में एलान किया;

हम तो समझ गए, एक बार देश की साड़ी जनता भी समझ जाए तो मजा आ जाए

वैसे मेरा मानना है कि जनता कुछ समझती है तो भी और कुछ नहीं समझती तो भी, मज़ा ही आता है.
संजय जी की ये पोस्ट पढ़कर सूमो जी को लगा कि मोदी जी के जितने अवगुण संजय जी ने गिनाये, वे कम हैं. उन्होंने अवगुणों की लिस्ट आगे बढ़ाते हुए अपनी टिप्पणी में लिखा;

मोदी टेलीविजन वालों और मीडिया को आलतू फालतू देकर पालतू नहीं बनाता.
मोदी बहुत भ्रस्टाचारी है, दो दर्जन कुरते है इसके पास.

मोदी जी के अवगुण के बारे में जानकारी लेने गए केवल हमही निराश नहीं हुए. अनिल रघुराज जी भी निराश हो गए. जैसे हम निराश होकर चिट्ठाचर्चा में लिख बैठे कि हम निराश हुए वैसे ही अनिल जी चिटठा में लिख बैठे. उन्हें लगा कि अवगुण नहीं जान पाये तो सद्गुण की ही बात कर ली जाय.

इसलिए उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के हवाले से बताया कि मोदी जी में एक सद्गुण है. वो क्या है? वे लिखते हैं;

संजय भाई ने नरेन्द्र मोदी के पाँच अवगुण गिनाये तो मुझे लगा कि क्यों न उनका एक सद्गुण गिना दिया जाए। आज ही इंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट छपी है जो बताती है कि वे झूठ बोलने में ज़बरदस्त महारत रखते हैं। उनके सत्य की कलई ख़ुद उन्हीं के सरकारी विभाग ने खोली है। आप भी यह रिपोर्ट पढ़ें और उनके इस सद्गुण की दाद दें। शुक्रिया।

अच्छा, जिन्हें भ्रम हो कि ऊपर दिया गया पैराग्राफ पोस्ट की झलक है, मैं उनका भ्रम कोसों दूर फेंकते हुए ये बताना चाहता हूँ कि ये केवल एक पैराग्राफ नहीं है. ये पूरी पोस्ट है.

अनिल जी की ये पोस्ट पढ़कर मुझे अपने सीए के शुरुआती साल की ट्रेनिंग की याद आ गई. हुआ ये कि हम नए-नए ऑडिटर बने थे. एक चाय कंपनी की ऑडिट करने गए. रूटीन ऑडिट थी. डेबिट साइड में एक फिगर वाऊचर में तो था, कैशबुक में नहीं था. हमें लगा कि मैं नया आर्टिकिल क्लर्क हूँ. ऐसे में 'ऑडिट नीति' ये कहती है कि अपने सीनियर से सलाह लूँ. सीनियर फर्म के पार्टनर भी थे.

मैंने अपने सीनियर से कहा; " सर, ये फिगर कैशबुक में डेबिट साइड में दिखाई नहीं दे रहा है." उन्होंने फट से कहा; "तो क्रेडिट साइड में चेक कर लो."

मतलब ये कि अवगुण पढने को नहीं मिले तो सद्गुण पढ़ लो. लेकिन कुछ पढ़ो ज़रूर.

अनिल जी की इस पोस्ट पर पंगेबाज जी ने टिप्पणी में लिखा;

अरे वाह आपकी तो लाटरी निकल आई .. मोदी गरियाऊ समीती के चेयर मैन को और क्या चाहिये बधाई हो जी . वैसे आपको कसम है कभी भि ये अंधो वाला चशमा उतार कर किसी और मुख्यमंत्री या देश के केंद्रीय मंत्रियो की करतूते ना देखना. अगर दिख भी जाये तो गांधी के बंदरो की प्रतिमूर्ती बने रहने का आपका इत्ते साल का अनुभव किस काम आयेगा लगे रहो चिढनखोरी मे :)

इस टिप्पणी को लिखने के बाद पंगेबाज जी को लगा कि उन्होंने छोटी टिप्पणी लिखी है. इसलिए वे लौटकर आए और इससे भी बड़ी एक टिप्पणी लिख डाली. आप टिप्पणी अनिल जी के ब्लॉग पर जाकर पढ़ लें.

संजय भाई को ये बात अच्छी नहीं लगी कि उन्होंने तो मोदी जी के दस अवगुण गिनाये और अनिल रघुराज जी ने अपनी पोस्ट में उनकी संख्या पाँच बताई. उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा;

यार आप भी ना...जितना होता है उससे कम कर देते हो. मैने मात्र दस कारण बताए और आपने उसके भी कम कर पाँच कर दिये.

उनकी इस टिप्पणी पर अनिल रघुराज जी ने कुशल मीडिया-कर्मी की तरह अपनी गलती मानी और अपनी पोस्ट में दिए गए नम्बर ऑफ़ अवगुण में सुधार किया.

वैसे एक बात मैं बता चलूँ. संजय जी और अनिल जी की पोस्ट पढ़कर मुझे लगा कि व्यंगकारों की संख्या में बढोतरी होती जा रही है. ये अच्छा है.

कुछ कवितायें पढ़िये.

बसंत आने को है. हर साल जब बसंत के आगमन का समय नज़दीक आता है, कवि-कवियित्री कवितायें लिखते हैं. सही बात भी है. सावन और बसंत अगर कवियों से कवितायें न लिखवा ले तो दो कौड़ी का सावन और ढाई कौड़ी का बसंत.

लेकिन ऐसा क्यों है कि हाल के सालों में बसंत पर लिखी गई कवितायें पढने से लगता है जैसे उसके आने पर लिखी गई कविताओं में शिकायत ही रहती है. लगता है जैसे ज्यादातर कवियों और कवियित्रियों ने इस बात पर सहमति भर ली है कि बसंत अब बसंत नहीं रहा.

आप पूर्णिमा बर्मन जी की कविता पढ़िये. हमें उनकी कवितायें बहुत पसंद हैं. पूर्णिमा जी ने बसंत की तीसरी कविता लिखी है जो उनके अनुसार;


पिछले साल दूसरी व्यस्तताओं के चलते रह गई, इस बार वसंत बीतने से पहले प्रस्तुत है-

हरी घास परग
दबदी टाँगों से कुलाचें भरता
कोयल सा कुहुकता
भँवरे सा ठुमकता
फूलों के गुब्बारे हाथों में थामे
अचानक गुम हो गया वसंत
मौसमों की की भीड़ में बेहाल परेशान
बिछड़ा नन्हा बच्चा
जैसे मेले की भीड़ में खो जाए माँ

तो क्या अब बसंत ऋतुराज नहीं रहे? वे आगे लिखती हैं;

मौसम तो सिर्फ छे थे
जाने पहचाने
लेकिन भीड़ के नए मौसम
वसंत बेचारा क्या जाने
.....................................
.....................................
वसंत
नन्हा दो माह का बच्चा
इस भीड़ में गुम न होता तो क्या होता?

डॉक्टर अमर ज्योति जी की गजल पढ़िये.

बाग़बां बन के सय्याद आने लगे;
बुलबुलों को मुहाजिर बताने लगे।

भाईचारा! मुहब्बत! अमन! दोस्ती!
भेड़ियों के ये पैग़ाम आने लगे।

आपसे तो तक़ल्लुफ़ का रिश्ता न था;
आप भी दुनियादारी निभाने लगे!

दर्द वो क्या जो गुमसुम सा बैठा रहे!
दर्द तो वो है जो गुनगुनाने लगे।

शैलेश जैदी जी की गजल पढ़िये. वे लिखते हैं;


तत्काल कोई बीज भी पौदा नहीं बना.
दुख क्या अगर प्रयास सफलता नहीं बना.

माना कि लोग उससे न संतुष्ट हो सके,
फिर भी वो इस समाज की कुंठा नहीं बना.

वो है सुखी कि उसके हैं ग्रामीण संस्कार,
वो अपने गाँव-घर में तमाशा नहीं बना.

आज बस इतना ही. सोचा था कि आज चर्चा जल्दी करूंगा. लेकिन आज बंगाल बंद होने के कारण आफिस में कर्मचारियों की कमी है. लिहाजा काम करने की वजह से वक्त नहीं मिला. इसलिए चर्चा करने में और देर हो गई. आज फिर से साबित हो गया कि;

मैन प्रपोजेज
नेता डिस्पोजेज

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बुधवार, जनवरी 21, 2009

बीता हुआ कोई क्षण नहीं लौटता







कल की चिट्ठाचर्चा और आज की चर्चा के बीच बराक ओबामा ने अमेरिकी राष्ट्रपति की शपथ ले ली| वाशिंगटन में माईनस ४ डिग्री सेल्सियस के तापमान के बावजूद जुटे लोगों ने आज तक वहाँ ऐसे समारोह में जुटने वाली संख्या के सारे रेकोर्ड तोड़ दिए। अमेरिका के इतिहास में तो निस्संदेह यह एक ऐतिहासिक क्षण था। वे प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति हैं.जिस देश में अश्वेतों को मतदान का अधिकार १९६५ में मिला हो, उस देश में यह घटना एक बड़े वैश्विक परिवर्तन की लहर की शुरुआत है।


न्यूयॉर्क टाईम्स द्वारा जारी आधिकारिक चित्रों को आप चाहें तो यहाँ देख सकते हैं।


और कुछ अन्य चित्रों को यहाँ भी - देखिए -



अन्यभारतीय भाषाओं से

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मकर संक्रांति पर दिनेशराय द्विवेदी जी ने हाड़ौती में एक बहुत रोचक व सामयिक प्रविष्टि लिखी, उसे पूरी तो आप वहीं जा कर पढ़ें, पर अंश के दर्शन यहीं कर लें -


हाड़ौती



उश्याँ बरस को आरंभ मंगळ सूँ होणी छावे नँ, जीसूं तेरा अपरेल नँ जद भगवान सूरजनाराण मंगळ म्हाराज का घर मँ परबेस करे तो ऊँ दन बैसाखी मनावे छे। अर ऊं दन ही सूरजनाराण का बरस को आरंभ होवे छे। ऊँ क आस पास ही आपणी गुड़ी पड़वा भी आवे छे। दो म्हीनाँ ताईं जद भगवान सूरजनाराण को मुकाम गुरू म्हाराज बरहस्पति जी क य्हाँ रह छ। तो कोई भी आडो ऊँळो काम करबा की मनाही छ। अब आपण परथीबासियाँ का तो सारा काम ही आडा ऊँळा होवे। जीसूँ ही आपण याँ दो म्हीनां क ताईं मळ का म्हीना ख्हाँ छाँ। अर य्हाँ में भगवद् भजन, कथा भागवत अर दान पुण्य का कामाँ क अलावा दूसरा काम न्हँ कराँ। आज ऊ एक म्हींनो पूरो होयो। आज सूँ फेर सारा काम सुरू होता। हर बरस सुरू हो ही जावे छे। पण ईं बरस आज क दन ही बरहस्पति जी खुद भी घरणे फ्हली सूँ ई बिराज रिया छे। अब दोन्यूँ को मिलण अर साथ 10 फरवरी ताँईं रहगो जीसूँ व्हाँ ताईं आडा ऊँळा काम, जासूँ आपण मंगळ काम ख्हाँ छाँ न होवेगा, जश्याँ सादी-ब्याऊ, मुंडन आदी।


पंजाबी

अभी अभी लोहिड़ी गयी है, तो पंजाबी के गिद्दे का रसास्वादन कीजिए


ਗਿੱਧੇ ਵਿੱਚ ਤੂੰ ਨੱਚਦੀ
(गिद्दे विच तूँ नच्चदी )


रूप दे शिकारी
अख रखदे कमारीआं 'ते
असीं वी नी रहिणा किसे कोलों डरके
किहड़ा लंघ जू जटी दे वल अख करके

*
*
अड़ीए अड़ीए अड़ीए
रुसे माहीए दा की करीए
अंदर वड़े तां मगरे वड़ीए
चुंनी लाह पैरां विच धरीये
इक वारी बोलो जी
आपां फेर कदे ना लड़ीए

**

छंने उते छंना
छंना कदे वी ना डोलदा

पोह-माघ दा रुसिआ माहीआ
हाले वी नी बोलदा

**

नी तूं नच नच नच
नी तूं हौली हौली नच
डिग पवे ना गुआंढीआं दी कंध बलीए
तेरा गिधा सारे पिंड दे पसंद बलीए

**

गिधे विच तूं नचदी
मार मार के अडी
मुंडे वी बैठे ने
बैठे ने मूंह टडी


**



गुजराती

सुन्दरम की एक गुजराती ग़ज़ल को कई मित्र इसी लिपि में समझ लेंगे; विशेषत: लावण्या जी :-)

નમું તને, પથ્થરને? નહીં, નહીં,
શ્રદ્ધા તણા આસનને નમું નમું :
જ્યાં માનવીનાં શિશુ અંતરોની
શ્રદ્ધાભરી પાવન અર્ચના ઠરી.

કે મુક્ત તલ્લીન પ્રભુપ્રમત્તની
આંખો જહીં પ્રેમળતા ઝરી ઝરી.
તું માનવીના મનમાં વસ્યો અને
તનેય આ માનવ માનવે કર્યો;

મનુષ્યની માનવતાની જીત આ
થયેલ ભાળી અહીં, તેહને નમું.
તું કાષ્ઠમાં, પથ્થર, વૃક્ષ, સર્વમાં,
શ્રદ્ધા ઠરી જ્યાં જઇ ત્યાં, બધે જ તું.

તને નમું, પથ્થરનેય હું નમું, શ્રદ્ધા તણું આસન જ્યાં નમું તહીં



मराठी को अगली बार के लिए स्थगित किया है।



विश्व से
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- अन्टार्कटिका में १ करोड़ ५० लाख वर्ष से भी पूर्व के एक जलाशय के अद्भुत वर्णन पढने- देखने के लि यहाँ जाएँ



- डायबिटीज के बारे में यह शोध आप-हम के लिए एकदम नया है, सावधान! अपनी खानपान की आदतें सही रखिए, सुधारिए।



- इस समाचार से आप चौंकेंगे जरूर। भारत में बाल मजदूरों के मामले में जब अभिनय करने वाले बाल कलाकारों तक के लिए कोर्ट आदेश जारी कर रहा है, तो उन के समान्तर इसे रख कर देखें कि कैसे व क्यों वैज्ञानिक अपने बच्चों को शोध की वस्तु के रूप में प्रयोग कर रहे हैं।



अंश चर्चा : अभिलेखागार से
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चर्चा को चर्चा ही रहने दो कोई नाम दो

पिछले कुछ दिन से देख रहा था कि चिठ्ठे कम लिखे जा रहे थे और चर्चायें ज्यादा। एकाध बार ऐसा भी देखने को मिला कि कुछ चिठ्ठाकार बँधु पसड़ गये कि हमरी पोस्ट काहे नही बांची? वही कुछ अति उत्साही चर्चाकार ऐसे भी आगे आये जिन्होने चिठ्ठो के उगते ही चर्चा की गुगाली कर डाली ।

यह सब जहाँ उत्साह जगाता है कि वह महायज्ञ जो अनुप शुक्ला जी ने शुरू किया उसमें इतने सारे चिठ्ठाकार भाई इतने प्रेम से आहूति दे रहे हैं, वही मेरे मन मे कुछ प्रश्न छोड़ रहा है। अपने शंकालु दिमाग में जो विचार घुमड़ रहे हैं उन्हे यहाँ उकेर दे रहा हूँ , कृपया इन्हें मेरे निजी विचार समझ कर मत व्यक्त करिये ।


  • चिठ्ठा चर्चा को नारद का पूरक नही समझना चाहिये। हर चर्चाकार की रूचि अलग होती है, उसे अपने हिसाब से चर्चा करने की खुली छूट होनी चाहिये , जिन चिठ्ठो को वह छोड़ दे, ऐसा मान लिया जाये कि या तो उस दिन चर्चा के लायक नही थे या फिर चर्चाकार की रूचि मे फिट नही बैठे। यह आवश्यक नही कि उसे पूरक चर्चा के द्वारा सबको फिर से पढ़ाया जाये, नारद किसलिये है फिर?
  • अगर चर्चाकार ज्यादा हो गये हो तो अब विभिन्न भाषाओं , श्रेणियो के हिसाब से चर्चा हो।
    कभी कभी कुछ टिप्पणियों से ऐसा लगा कि कुछ नये चिठ्ठाकारो मे यह भ्रम है कि सब चिठ्ठाकार कुछ खास चिठ्ठाकारो की ही चर्चा करते हैं , जैसे मानो कि कोई काकस हो। मैं यहाँ यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि कुछ पुराने चिठ्ठाकारो में आत्मीय संबध इसलिये बने कि वे गिने चुने ब्लागरो के जमाने से एक दूसरे को जानते हैं पर काकस जैसा कुछ नही यहाँ। बात सिर्फ व्यक्तिगत रूचि का है। उदाहरण के लिये, हो सकता है कि मुझे लाल्टू, नीरज दीवान और ईस्वामी के तीखे तंजो की या फिर फुरसतिया, जीतू वगैरह की हास्य की चर्चा करना ज्यादा अच्छा लगता हो और वही जीतू को उन्मुक्त की तकनीकि कौशल का बखान सुहाता हो। इसमें व्यक्तिगत संबध कही से नही आते।
  • चर्चा समीक्षात्मक हो , ड्राईंगरूम मे बैठकर विदेशनीति पर चर्चा करना अलग है और पान की दुकान पर खड़े होकर शोऐब अख्तर की लुच्चई की सुर्रेबाजी अलग। हम कैसी चर्चा चाहते हैं चिठ्ठाचर्चा में?

फिलहाल इतने ही विचार है अपने दिमाग में। आप सबके सुझावो का इंतजार रहेगा।


अब देखे क्या लिखा गया।

लाल्टू जी ने वाघा के आडंबर की धज्जिया उड़ा दी। साथ ही चित्रो के लिंक के लिये उन्हे धन्यवाद देना चाहूँगा।

बिहारी बाबू ने समाज में नैतिकता का सर्टिफिकेट बाँटने वालो की खासी मौज ली है। अगर बिहारी बाबू इस लेख के दूसरे संस्करण में इन तथाकथित संगठनो, सर्टिफिकेट बाँटने वालो के चरित्र की पोल खोल दें तो मजा दुगुना हो जाये।

त्रिवेणी कविता की विधा के बारे में समीरलालजी का ज्ञानपरक लेख है, बुकमार्क करके रखने लायक है मेरे जैसो के लिये जिन्हे कभी कभी तुकबंदी की खब्त सूझती है।

अब कुछ और मस्त ब्लागो की चर्चा।

  • एरियाना हफिंगटन को जानते हैं? वही जिन्होने कैलिफोर्रनिया के चुनाव में आर्नोल्ड श्वाजनेगर से पंजा लड़ाया था। उनके इस ब्लाग पर बड़े पत्रकार लिखते हैं। एक बार जरूर देखिये।
  • मिर्ची सेठ के पसंदीदा ब्लाग मे शामिल है ब्रिज सिंह का यह जबरदस्त तकनीकि ब्लाग। अगर मेरी जानकारी ठीक है तो ब्रिज सिंह भी कनपुरिया हैं।
  • क्या आपको पता है दीपक चोपड़ा, शेखर कपूर , नंदिता दास और राहुल बोस भी ब्लाग लिखते हैँ? नही, अमां कहाँ रहते हो आप भी। इंटेंट ब्लाग हफिंगटन पोस्ट से बीस ही है।
  • और यह देखिये भारत को जहाँ हम विकसित बनाने के सोच रहे हैं सूचना क्रांति के जरिये तो कुछ दिलजले भी हैं दूसरी तरफ।




स्त्री लेखन
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इस बार आप को मिलवा रही हूँ स्वर्गीय शैलप्रिया जी से ; जिनका लिखा पढ़ कर तो आप भावुक होंगे ही, स्तब्ध भी होंगे किंतु इनके सुपुत्र अनुराग अन्वेषी ने जिस प्रकार अपनी माँ को मान - सम्मान, अश्रुपूर्ण भावांजलि (या जाने कितने शब्दों से आप संबोधित करेंगे, पढ़ कर ) दी है, उसके बाद मन से एक ही आवाज आती है कि कैसी होगी वह माँ, जिसने ऐसे संस्कार दिए कि इतनी श्रद्धावनत, मातृभक्त संतान पाईं| दोनों भाईयों ( अनुराग जी के बड़े भाई प्रियदर्शन को आप स्वयं वहीं जाकर जानिए ), को इतना भावाकुल पढ़ कर आप की सहज ही माँ के प्रति श्रद्धा हिलोरे लेने लगेगी। मैं अधिक नहीं लिखूँगी, एक बार किसी भी एक लिंक पर आप इनके किसी ब्लॉग पर पहुँच जाएँगे तो स्वत: अन्य सब को पढ़ने के लोभ से अछूते नहीं रहेंगे |


ये हैं बानगी देते कुछ अंश शैल जी का औपचारिक परिचय, असली परिचय वहीं मिलेगा।






जन्म 11 दिसंबर 1946, मृत्यु 1 दिसंबर 1994, शिक्षा : एमए, कविताओं का संकलन : अने लिए (1983), चांदनी आग है (1992), घर की तलाश में यात्रा (1995)। इन तीन संकलनों को देखकर कहना पड़ता है कि वह मूल रूप से कविताकर्मी रहीं। कभी-कभार दूसरी विधाओं में भी उन्होंने लिखा। ऐसे ही लेखन का संग्रह है 'जो अनकहा रहा' (1995) और फिर बची-खुची उनकी कुछ रचनाएं आईं 'शेष है अवशेष' (2000) में।



शैल जी की एक कविता
निष्कर्ष

आम आदमी से
खैरियत पूछते हुए
जूझती
हूं अपने से।

अखबारी
कतरनों
के बीच
शांति तलाशते लोग
गुमराह
सीढ़ियां तय करते हैं।

उनमें अपने को भी शामिल महसूसती हूं बार-बार।

भटकाव की दिशा में

फन काढ़े नाग की कोठरी में

मणि की प्राप्ति नहीं हो सकती।

शक्तिहीन
रीढ़ के पीछे

वार
करते कभी सोचा है

कि
यह अपने लोग हैं,

यह
अपनी धरती है,
यह अपनी ही माटी है,
यह अपना ही खून है।

- शैलप्रिया


यहाँ से मूल
पाठ तक जा सकते हैं

माँ की आखिरी शाम
Thursday, December 25, 2008 3:35 PM


मेरे लिए 1 दिसंबर 1994 की रात बेहद काली थी। इसी रात तकरीबन 10 बजे पराग भइया ने दिल्ली से फोन कर बताया कि मां की तबीयत बेहद खराब है, हमलोग कल उसे लेकर रांची आ रहे हैं। मैंने पूछा - प्लेन से या ट्रेन से। भइया का जवाब था - प्लेन से। उसके इस जवाब से मैं समझ गया कि 1 दिसंबर की शाम माँ की जिंदगी की आखिरी शाम हो गई। बहरहाल, मैं उन यातनादायी दौर से फिर गुजरने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा, इसलिए इस चर्चा को यहीं पर रोक कर एक दूसरी बात कहूं। माँ की मौत के बाद उनकी एक कविता ने हमसबों का ध्यान अपनी ओर खींचा। यह कविता माँ की कविताओं के दूसरे संकलन 'चाँदनी आग है' में शामिल है। 'एक संदेश' नाम की इस छोटी-सी कविता में माँ ने दिसंबरी शाम से आखिरी बार मिलने की बात कही है। वाकई, इस संयोग ने मुझे हैरत में डाल दिया।
आप भी पढ़ें माँ की यह कविता :


एक संदेश
ओ दिसंबरी शाम।
आज तुमसे मिल लूँ

विदा बेला में
अंतिम बार।
सच है,
बीता हुआ कोई क्षण
नहीं लौटता।
नहीं बाँध सकती मैं
तुम्हारे पाँव।
कोई नहीं रह सकता एक ठाँव





अंत में

आगामी सप्ताह की चर्चा के लिए मैं उपलब्ध न रहूँगी, इलाहाबाद की यात्रा पर जा रही हूँ, जहाँ २७/१/२००९ को अपनी पुस्तक "समाज-भाषाविज्ञान : रंग- शब्दावली : निराला- काव्य" के विमोचन में सम्मिलित होना है। अत: आगामी चर्चा अब लौटने के पश्चात ही सम्भव हो पाएगी। जो मित्र इलाहाबाद में रहते हैं, उनसे उस दिन सम्मिलित होने का आग्रह, निमंत्रण है।

आप सभी का प्रत्येक दिन सपरिवार मंगलमय हो, उल्लासमय हो।

इस बार इतना ही, शेष अगली बार .......

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