रविवार, जून 20, 2010

ब्लॉग लेखन की संभावनाएँ और खतरे

subhash rai

“..कुछ लोग खुलेपन के नाम पर नंगे हो जाते हैं. नग्नता सहज हो तो कोई ध्यान नहीं देता. जानवर कपडे तो नहीं पहनते, पर कौन रूचि लेता है उनकी नग्नता में? छोटे बच्चे अक्सर नंगे रहते हैं, पर कहाँ बुरे लगते हैं? यह सहज होता है. बच्चे को नहीं मालूम कि नंगा रहना बुरी बात है, पशुओं को इतना ज्ञान नहीं कि नंगापन होता क्या है, यह बुरा है या अच्छा. पर जो जानबूझकर नंगे हो जाते हैं ताकि लोग उनकी ओर देखें, उन्हें घूरे या उनकी बात सुनें, वे असहज मन के साथ प्रस्तुत  होते हैं. यह नग्नता खुलेपन के तर्क से ढंकी नहीं जा सकती. ऐसे लोग भी मजाक के पात्र बन जाते हैं. असहज प्रदर्शन  होगा तो असहज प्रतिक्रिया भी होगी. लोग फब्तियां कसेंगे, हँसेंगे और हो सकता है, कंकड़, पत्थर भी उछालें…”

डॉ. सुभाष राय का यह आलेख पिछले हफ़्ते रचनाकार समेत बात बेबात, नुक्कड़ इत्यादि ब्लॉगों में भी छपा. सुभाष राय ने बहुत ही बेबाकी से हालिया हिंदी ब्लॉगों की दशा-दिशा पर टिप्पणी की है. उम्मीद है, इनकी बातों से बहुतों को अपनी आखें खोलने में मदद मिलेगी.

ब्लॉगों की दुनिया धीरे-धीरे बड़ी हो रही है. अभिव्यक्ति के अन्य माध्यमों के प्रति जन्मते अविश्वास के बीच यह बहुत ही महत्वपूर्ण घटना है. कोई भी आदमी अपनी बात बिना रोक-टोक के कह पाए, तो यह परम स्वतंत्रता की स्थिति है. परम स्वतंत्र न सिर पर कोऊ. यह स्वाधीनता बहुत रचनात्मक भी हो सकती है और बहुत विध्वंसक  भी. रोज ही कुछ नए ब्लॉग संयोगकों  से जुड़ रहे हैं. मतलब साफ है कि ज्यादा से ज्यादा लोग न केवल अपनी बात कहना चाह रहे हैं बल्कि वे यह भी चाहते हैं कि लोग उनकी बात सुने और उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करें. यह प्रतिक्रिया ही आवाज को गूंज प्रदान करती है, उसे दूर तक ले जाती है. जब आवाज दूर तक जाएगी तो असर भी करेगी. पर क्या हम जो चाहते हैं वह सचमुच कर पा रहे हैं? क्या हम ऐसी आवाज उठा रहे हैं जो असर करे? और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि हमें कैसे पता चले कि हमारी बात का असर हो रहा है या नहीं ?

यहाँ एक बात समझने की है कि लोग एक पागल के पीछे भी भीड़ की शक्ल में चल पड़ते हैं, एक नंगे आदमी का भी पीछा करते  हैं  और उसका भी जो सचमुच जागरूक है, जो बुद्ध है, जो जानता  है कि लोगों कि कठिनाइयाँ क्या हैं, उनका दर्द क्या है, उनकी यातना और पीड़ा  क्या है. जो यह भी जानता है कि इस यातना, पीड़ा या दुःख  से लोगों को मुक्ति कैसे मिलेगी. अगर हम लोगों से कुछ कहना चाहते हैं तो यह देखना पड़ेगा कि हम इन तीनों में से किस श्रेणी में हैं. कहीं हम कुछ ऐसा तो नहीं कहना चाहते जो लोग सुनना ही नहीं चाहते और अगर सुनते भी हैं तो सिर्फ मजाक उड़ाने के लिए. यह निरा पागलपन के अलावा  कुछ और नहीं है. एक ब्लॉग पर मुझे एक तथाकथित क्रांतिकारी की  गृहमंत्री को चुनौती दिखाई पड़ी. उस वक्त जब नक्सलवादियों ने दर्जनों  जवानों की हत्या कर दी थी, वे महामानव यह एलान  करते हुए दिखे कि वे खुलकर नक्सलियों के साथ हैं, गृह मंत्री जो चाहे कर लें. उनकी पोस्ट  के नीचे कई टिप्पड़ियाँ थीं, जिनमें कहा गया था , पागल हो गया है. जो सचमुच पागल हो गया हो, वह व्यवहार में इतना नियोजित नहीं हो सकता, इसीलिए उस पर अधिक  ध्यान नहीं जाता पर जो पागलपन का अभिनय कर रहा हो, जो इस तरह लोगों का ध्यान खींचना चाह रहा हो, वह भीड़ तो जुटा लेगा, पर वही भीड़ उस पर पत्थर भी फेंकेगी, उसका मजाक भी उड़ाएगी.

कुछ लोग खुलेपन के नाम पर नंगे हो जाते हैं. नग्नता सहज हो तो कोई ध्यान नहीं देता. जानवर कपडे तो नहीं पहनते, पर कौन रूचि लेता है उनकी नग्नता में? छोटे बच्चे अक्सर नंगे रहते हैं, पर कहाँ बुरे लगते हैं? यह सहज होता है. बच्चे को नहीं मालूम कि नंगा रहना बुरी बात है, पशुओं को इतना ज्ञान नहीं कि नंगापन होता क्या है, यह बुरा है या अच्छा. पर जो जानबूझकर नंगे हो जाते हैं ताकि लोग उनकी ओर देखें, उन्हें घूरे या उनकी बात सुनें, वे असहज मन के साथ प्रस्तुत  होते हैं. यह नग्नता खुलेपन के तर्क से ढंकी नहीं जा सकती. ऐसे लोग भी मजाक के पात्र बन जाते हैं. असहज प्रदर्शन  होगा तो असहज प्रतिक्रिया भी होगी. लोग फब्तियां कसेंगे, हँसेंगे और हो सकता है, कंकड़, पत्थर भी उछालें.

कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो किसी की प्रतिक्रिया की परवाह नहीं करते, भीड़ भी जमा करना नहीं चाहते, लोगों का ध्यान भी नहीं खींचना चाहते पर अनायास उनकी बात सुनी जाती है, उनके साथ कारवां जुटने लगता है, उनकी आवाज में और आवाजें शामिल होने लगाती हैं. सही मायने में वे जानते हैं कि क्या कहना है, क्यों कहना है, किससे कहना है. वे यह भी जानते हैं कि उनके कहने का, बोलने का असर जरूर होगा क्योंकि वे लोगों के दर्द को आवाज दे रहे हैं, समाज की पीड़ा को स्वर दे रहे हैं, सोये हुए लोगों को लुटेरों का हुलिया बता रहे हैं. केवल ऐसे लोग ही समय की गति में दखल दे पाते हैं. असल में ऐसे ही लोगों को मैं स्वाधीन  कह सकता हूँ. स्व और कुछ नहीं अपने विवेक और तर्क की बुद्धि है. अगर व्यक्ति विवेक-बुद्धि के अधीन होकर चिंतन करता है, तो वह समस्या की जड़ तक पहुँच सकता है. फिर यह समझना कठिन नहीं रह जाता कि समाधान  के लिए करना क्या  है.

आजकल ब्लॉगों पर लिख रहे हजारों लोग इन्हीं तीन श्रेणियों में से किसी न  किसी में मिलेंगें. अगर आप किसी लेखन की गंभीरता और शक्ति का मूल्यांकन टिप्पड़ियों की संख्या से करेंगे तो गलती करेंगे. बहुत भद्दी और गन्दी चीज ज्यादा प्रतिक्रिया पैदा कर सकती है. कई बार ज्यादा प्रतिक्रिया आकर्षित करने के लिए लोग ब्लॉगों पर इस तरह की सामग्री परोसने से बाज नहीं आते. अभी हाल में एक ब्लाग अपने अश्लील आमंत्रण के लिए बहुत चर्चित हुआ था. वहां टिप्पड़ियों  की बरसात हो रही थी. पर इस नाते उस गलीच लेखन को श्रेष्ठ नहीं ठहराया  जा सकता. चर्चा में आने की व्याकुलता कोई रचनात्मक काम नहीं करने देगी. ऐसे ब्लॉगों के होने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि वे उन लोगों को भी विचलित  करते हैं जो किसी गंभीर दिशा में काम करते रहते हैं. मेरी  इस बात का अर्थ यह भी नहीं लगाया  जाना चाहिए कि जहाँ ज्यादा टिप्पड़ियाँ आतीं हैं, वह सब इसी तरह का कूड़ा लेखन है. ब्लॉगों की इस भीड़ में भी वे देर-सबेर पहचान ही लिए जाते हैं, जो सकारात्मक और प्रतिबद्ध लेखन में जुटे हैं. चाहे वे सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर विचारोत्तेजक  टिप्पड़ियाँ हों, चाहे  ह्रदय और मस्तिष्क को मंथने वाली कविताएं हों, चाहे देखन में छोटे लगे पर घाव करे गंभीर वाली शैली में लिखे जा रहे व्यंग्य हों.  सैकड़ों की सख्या में ऐसे ब्लाग दिखाई पड़ते हैं, जो अपनी यह जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं. उनसे हमें उम्मीद रखनी होगी.

दरअसल निजी और सतही स्तर पर गुदगुदाने वाले प्रसंगों से हटकर हम ब्लागरों को अपने समय की समस्याओं पर केन्द्रित होने की जरूरत है. भ्रष्टाचार, गरीबी, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, सामाजिक रुढियों से उपजी दर्दनाक विसंगतियां और मनुष्यता का अवमूल्यन आज हमारे  देश की ज्वलंत समस्याएं  हैं. आदमी चर्चा से बाहर हो गया है, उसे  केंद्र में प्रतिष्ठित करना है. सत्ता के घोड़ों की नकेल कसकर रखनी है, ताकि  वे बेलगाम मनमानी दिशा में न भाग सकें. इन विषयों पर समाचार माध्यमों में भी अब कम बातें होती हैं. वे विज्ञापनों के लिए, निजी स्वार्थों के लिए बिके हुए जैसे लगने लगे हैं. पूंजी का नियंत्रण पत्रकारों को जरूरत से ज्यादा हवा फेफड़ों में खींचने नहीं देता. वे गुलाम बुद्धिवादियों की तरह पाखंड चाहे जितना कर लें पर असल में वे वेतन देने वालों की  वंदना करने, उनके हित साधने और कभी-कभार उनके  हिस्से में से अपनी जेब में भी कुछ डाल कर खुश हो लेने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कर पाते. ऐसी विकट स्थिति में अगर ब्लागलेखन की  अर्थपूर्ण स्वाधीनता  अपनी पूरी ताकत के साथ समने आती है तो वह लोकतंत्र के पांचवें स्तम्भ की तरह खड़ी  हो सकती है. जिम्मेदारियां  बड़ी हैं, इसलिए हम सबको मनोरंजन , सतही लेखन और शाब्दिक नंगपन  से मुक्त होकर वक्त के सरोकार और मनुष्यता के प्रति प्रतिबद्धता के साथ आगे आकर अग्रिम मोर्चे  की खाली जगह ले लेनी है. मैं मानता हूँ कि अनेक लोग सजग और सचेष्ट हैं, अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं पर आशा है सभी ब्लागर  बंधु अपना कर्तव्य और करणीय समझ सही पथ का संधान करेंगे.

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शनिवार, जून 19, 2010

शनिवार की चर्चा

नमस्कार मित्रो!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर शनिवार की चर्चा के साथ हाज़िर हूं। मेरी पिछली चर्चा के पोस्ट पर एक भाई ने कमेंट किया था कि

हमारे ब्‍लाग की भी आप चर्चा करें। इसके लिए क्‍या करना होगा। बताएं।

इसने, लगा मेरे मुंह पर एक तमचा जड़ दिया हो। ये क्या करना होगा, बताएं शब्द ने हमारे देश को काफ़ी नुकसान पहुंचाया है। आये दिन देखता सुनता हूं, इस जुमले को! कभी

---  मेरे बेटे को नौकरी पर लगवा दीजिए, इसके लिए इसके लिए क्‍या करना होगा। बताएं।

--- मेरा फलाँ जगह ट्रांसफ़र करवा दीजिए, इसके लिए इसके लिए क्‍या करना होगा। बताएं।

--- मेरे बच्ची का दाखिला करवा दीजिए, इसके लिए इसके लिए क्‍या करना होगा। बताएं।

मैं आहत हूं। चर्चा मंच् के एक-क पोस्ट के लिए मैं घंटों मेहनत करता हूं, सैंकड़ों पोस्ट पढता हूं, फिर भी कोई दोस्त कहता है --- इसके लिए इसके लिए क्‍या करना होगा। बताएं।

हम चिट्ठा चर्चाकार अगली चर्चा लिखने के पहले एक बार इस वाक्य को याद कर लीजिएगा, मैं आपसे रेक्वेस्ट करता हूं, कि आप ऐसा करें,इसके लिए इसके लिए क्‍या करना होगा। बताएं।

इस मंच से मैं आप सबसे निवेदन करता हूं कि ऐसा क्या किया जाए कि फिर कोई ब्लॉगर मित्र ऐसा वाक्य न लिखे, इसके लिए इसके लिए क्‍या करना होगा। बताएं।

 

चलिए अब चर्चा शुरु करते हैं।

 

 

 

 

आलेख

मेरा फोटोसंगीता पुरी जी जन-जन तक ज्योतिष को पहुंचाने के सद्प्रयास में लगी हैं। पिछले आलेखों में उन्होंने चर्चा की थी कि किसी भी जन्‍मकुंडली में सूर्य की स्थिति को देखकर बालक के जन्‍म के पहर की जानकारी कैसे प्राप्‍त की जा सकती है।
दरअसल ज्‍योतिष में जब भी सिर्फ कुंडली की चर्चा की जाती है , तो वह जन्‍मकुंडली यानि लग्‍न कुंडली ही होती है। भविष्‍यवाणियों में सटीकता लाने के लिए चंद्रकुंडली , सर्यूकुंडली या अन्‍य अनेक प्रकार की कुंडली बनाए जाने की परंपरा शुरू हुई है। लेकिन ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ की माने तो आज भी लग्‍नकुंडली ही किसी व्‍यक्ति के व्‍यक्तित्‍व का दर्पण है , जो उसके पूरे जीवन के विभिन्‍न संदर्भो के सुख दुख और जीवन भर की परिस्थितियों के उतार और चढाव की जानकारी दे सकता है, जिसपर चर्चा करने में अभी कुछ समय तो अवश्‍य लगेगा।

यह इस क्रम का छठा अंक है। मुझे तो बहुत अच्छी जानकारी मिल रही है। आप भी पढें।

संगीता जी आपकी चेष्टाएं झिलमिला उठीं हैं। आपकी ईमानदारी व प्रयासों की जितनी भी तारीफ की जाए कम है।

My Photoराजेश उत्साही जी की जीवन की सार्थकता की तलाश जारी है। 26 साल तक एकलव्‍य संस्‍था में होशंगाबाद, भोपाल में काम किया फिर बाल विज्ञान पत्रिका चकमक का सत्रह साल तक संपादन। बच्‍चों के लिए साहित्‍य तैयार करने की कई कार्यशालाओं में स्रोतव्‍यक्ति की भूमिका निभाई। फिलहाल बंगलौर में हैं। तीन ब्‍लागों- गुल्‍लक, यायावरी और गुलमोहर- के माध्‍यम से दुनिया से मुखातिब हैं। इस बार मैंने चुना है उनकी गुल्लक पर प्रस्तुत एक रुका हुआ फैसला : शादी के लड्डू।

यह बात उन दिनों की है जब उनका दिल टूट चुका था। और टूटे दिल के टुकड़ों को समेटना और फिर से दिल लगाने के लिए उन्हें  बहुत हिम्‍मत जुटानी पड़ी। उनका दिल टूटा लेकिन अपने ही हाथों से। क्योंकि उनका मानना था कि अगर जीवन में सुखी रहना है तो जिससे प्‍यार करो उससे शादी कभी मत करो। इसलिए उन्होंने लड़्की के अभिभावक को कह दिया है,

“मैं बगावत करके शादी कर सकता हूं, पर उसको वो खुशी नहीं दे पाऊंगा जिसकी वो हकदार है। इसलिए बेहतर यही होगा कि आप कोई और अच्‍छा सा लड़का देखकर उसका विवाह कर दें।”

मेरा फोटोस्वतंत्रता और स्वाधीनता प्राणिमात्र का जन्मसिद्ध अधिकार है। क्रान्ति की ज्वाला सिर्फ पुरुषों को ही नहीं आकृष्ट करती बल्कि वीरांगनाओं को भी उसी आवेग से आकृष्ट करती है। 1857 की क्रान्ति की अनुगूँज में जिस वीरांगना का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, वह झांसी में क्रान्ति का नेतृत्व करने वाली रानी लक्ष्मीबाई हैं। 18 जून 1858 को भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की इस अद्भुत वीरांगना ने अन्तिम सांस ली पर अंग्रेजों को अपने पराक्रम का लोहा मनवा दिया। तभी तो उनकी मौत पर जनरल ह्यूगरोज ने कहा- ‘‘यहाँ वह औरत सोयी हुयी है, जो व्रिदोहियों में एकमात्र मर्द थी।”
उनकी पुण्य तिथी पर उन्हें स्मरण करते हुए आकाक्षा जी कहती हैं

''खूब लड़ी मरदानी, अरे झाँसी वारी रानी/पुरजन पुरजन तोपें लगा दई, गोला चलाए असमानी/ अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी/सबरे सिपाइन को पैरा जलेबी, अपन चलाई गुरधानी/......छोड़ मोरचा जसकर कों दौरी, ढूढ़ेहूँ मिले नहीं पानी/अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी।''

लो आया खाप का मौसम........................घुघूती बासूती

की प्रस्तुति Mired Mirage पर पढिए। कह रही हैं लोगबाग अपने शहर, अपने संसार के कायदे कानूनों से कुछ तंग से थे। उन्हें पसन्द था स्वतन्त्र रहना और उनकी धरती के वासी खापी थे यानि खापीकर खप करते थे या यह कहिए कि बताते थे कि कैसे जिएँ, कैसे उठें, बैठें, ब्रश करें कि दातुन और ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर या दाएँ से बाएँ आदि, किससे बोलें, किसके साथ हँसे, किससे प्रेम करें किससे विवाह करें आदि आदि। सो वे आभासी संसार की तरफ बढ़ चले। सुना था यहाँ सामान्य शिष्टता के अतिरिक्त कोई कानून नहीं हैं।

अच्छे दिन लम्बे कहाँ चलते हैं ? वैसे भी खाप प्रदेश के लोग यहाँ भी बहुतायत में रहते हैं सो यह भी हो सकता है। खाप के कई भाई बहन हैं जो नियन्त्रण में ही विश्वास रखते हैं। संख्या सदा सही के साथ नहीं होती, होती तो हमारे देश को ऐसे नेता मिलते? खैर जो होगा सो देखा जाएगा। बहुत हुआ तो कुछ बोरिया बिस्तरा गोल करने को बाध्य हो जाएँगे, और भी अखापी दुनिया होंगी इस आभासी दुनिया से आगे।

 


संस्मरण

अगर आप समाज में बदलाव लाना चाहते हैं तो इसकी शुरुआत घर से होती है। पहले आप ख़ुद में बदलाव लाएँ, अपने घर में बदलाव लाएँ और फिर अपने आस-पास या अपने साथ उठने-बैठने वालों को बदलें। कह रही हैं सृजनगाथा पर नीलम शर्मा ‘अंशु’!

इसी क्रम में अंशु को अचानक नीलोफ़र याद हो आई। उसे हैरानी होती कि क्या यह वही नीलोफ़र है? यादाश्त की सुईयाँ पीछे घूमती है जब आज से सोलह-सतरह वर्ष पूर्व एक साधारण सी युवती सरकारी नियुक्ति पर एक छोटे से शहर से महानगर कोलकाता आती है।
पढिए एक संस्मरण जिसमें नीलोफ़र के कानों में तो यही शब्द गूंज रहे थे, ख़ानदान की इज्ज़त लड़की, ख़ानदान की रौनक कुहू ....। पिशीमोनि ! मैं आपकी कुहू।’

अंत तक पठनीयता से भरपूर होना ही इसकी सार्थकता है जिसके जरिये ..... विषय को समझने का ईमानदारी से प्रयास किया गया है और यही इसका निहितार्थ भी है।!

 

 

कविताएं

जागती आँखों से स्वप्न देखना जिनकी  फितरत है वह दिगम्बर नासवा जी कहते हैं

मैने कई बार
सच की चाशनी लपेट कर
कई
झूठ बोले हैं

कई बार अंजाने ही
झूठ बोलते अटका हूँ
पर हर बार मेरी बेशर्मी ने
ढीठता के साथ सच पचा लिया

इस ढीठता के साथ अत्म मंथन भी किया उन्होंने, और जो सच सामने आय वह यह है कि

सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
वीभत्स सच को कोई देखना नही चाहता
सच आँखें फेर लेता है

झूठ का इतना सही सच मैंने पहले नही पढा, आप भी पढ़िए! यभी सच है कि असल मे झूठ ही एक ऐसा सच है जिसके बिना हम नहीं रह सकते... झूठ को सच का जामा पहना कर कभी अपने को तो कभी दूसरो को खुश करने की कोशिश मे लगे रहते हैं!!

डॉ० डंडा लखनवी ने नुक्कड़ पर रवीन्द्र कुमार राजेश की कविता की अविव्यक्ति समय की रामायण गीता। प्रस्तुत की है। यह एक बहुत सुन्दर रचना है। इसमें कवि के उद्गार उत्तम हैं... 

सबकी अपनी व्यथा कथा है, अपनी राम कहानी,

भाग्य भरोसे चले ज़िदगी, क्या राजा, क्या रानी,

द्वापर  की   द्वौपदी   विवश   है, त्रेता   की सीता।

                               समय की रामायण गीता॥

पाने की चाहत में  भटका  कुछ  भी नही मिला,

औघड़ दानी बन   बैठा मन, रहता खिला-खिला,

मेरे जीवन   का  अमरित  घट कभी नहीं रीता।

                             समय की रामायण गीता॥

My Photoअल्पना वर्मा की कविता निर्वात इस बात को हमारे सामने लाती है कि कभी कभी ऐसा ही होता है सब कुछ होते हुए भी निराशा घेर लेती है! और उन्होंने उन्हें सुन्दर अभिव्यक्ति दे दी है | देखिए


रास्ते ठहरे हुए हैं ,
सूर्य भी धुन्धला गया ,
दिन बुनती हूँ तो
रात की चादर बनता जाता है!
तक रही हूँ आसमाँ ,
शायद कभी रोशन भी हो,
खोजती हूँ वो सितारे ,
जो कभी ,
बिखरे थे आकाश में !
शब्द थे साथी मगर ,
वो भी कहीं जा सो गए,
भाव थे हमराह पर ,
किस राह जाने खो गए ,
है शिथिल देह ,
और मन निर्जीव सा
हर तरफ फैला हुआ है
मौन' किस निर्वात का ,
शून्य में ठहराव ये
अंत ही होता मगर ,
ज़िन्दगी...
चलते रहने के बहाने ढूँढ़ ही लेती है !

रचना निर्वात एक सहज भावबोध की कविता है , जिसका आशावादी समापन इसकी विशेषता है , उपलब्धि है । यह कविता आपके विशिष्ट कवि-व्यक्तित्व का गहरा अहसास कराती है। इस कविता की कोई बात अंदर ऐसी चुभ गई है कि उसकी टीस अभी तक महसूस कर रहा हूं।

My Photoश्यामल सुमन की कविता बचपन को पढ़कर एक भावनात्मक राहत मिलती है। इसे पढते वक़्त यह रचना हमें बचपन की वीथियों में बरबस खींच कर ले जाती है! ना जाने कितने चिर परिचित दृश्य आँखों के आगे चलचित्र की तरह घूम जाते हैं!

याद बहुत आती बचपन की।
उमर हुई है जब पचपन की।।
बरगद, पीपल, छोटा पाखर।
जहाँ बैठकर सीखा आखर।।
नहीं बेंच, था फर्श भी कच्चा।
खुशी खुशी पढ़ता था बच्चा।।
खेल कूद और रगड़म रगड़ा।
प्यारा जो था उसी से झगड़ा।।
बालू का घर होता अपना।
घर का शेष अभीतक सपना।।
रोज बदलता मौसम जैसे।
क्यों न आता बचपन वैसे।।

आपकी कविता पढ़ने पर ऐसा लगा कि आप बहुत सूक्ष्मता से एक अलग धरातल पर चीज़ों को देखते हैं। पढ़ने वाले को उसकी अपनी कथा लगती है। आपकी कविता अपनी आत्मीयता से पाठक को आकृष्ट कर लेती है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने 37 साल पहले एक कविता लिखी थी कामुकता में वह छला गया। यह कविता एक सच्चे, ईमानदार कवि के मनोभावों का वर्णन।

देख अधखिली सुन्दर कलिका,
भँवरे के मन में आस पली।
और अधर-कपोल चूमने को,
षट्पद के मन में प्यास पली।।

प्रतिछाया को समझा असली,
और मन ही मन में ललचाया।।

सत्यता समझ ली परछाई,
कामुकता में वह छला गया।
नही प्यास बुझी उस भँवरे की,
इस दुनिया से वह चला गया।।

इस कविता के शीर्षक से ही भावनाओं की गहराई का एह्सास होता है। कविता की व्याप्ति इतनी बड़ी हो कि वे जन समान्य को समेट सकें। यह काम आपकी कविता बखूबी करती है।

मेरा फोटोपेशे से कॉपीरायटर तथा विज्ञापन व ब्रांड सलाहकार. दिल्ली और एन सी आर की कई विज्ञापन एजेंसियों के लिए और कई नामी गिरामी ब्रांडो के साथ काम करने के बाद स्वयं की विज्ञापन एजेंसी तथा डिजाईन स्टूडियो का सञ्चालन. करने वाले ARUN C ROY का भूख के बारे में मानना है कि
कई प्रकार की
होती हैं
भूख और
कई आकर की भी
होती हैं

उनकी इस इस कविता में उपहास के साथ आक्रमकता भी है जो इसे विशेष दर्जा प्रदान करती है। कहते हैं

बदलते हुए स्थान और भाव के साथ
बदल जाते हैं
भूख के मायने

भूख
अपनी पूरी रंगीनियत में
है होती
जब वह होती है
पांच सितारा होटलों की लाबी में
कारपोरेट के बोर्ड रूम में
स्टॉक एक्सचेंज की रैलियों में

आपकी इस कविता में निराधार स्वप्नशीलता और हवाई उत्साह न होकर सामाजिक बेचैनियां और सामाजिक वर्चस्वों के प्रति गुस्सा, क्षोभ और असहमति का इज़हार बड़ी सशक्तता के साथ प्रकट होता है।

सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर प्रस्तुत है प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता रावेन्द्र कुमार रवि जी का एक प्रेम-गीत 'ओ मेरे मनमीत'.!
सोच रहा-
तुम पर ही रच दूँ
मैं कोई नवगीत!
शब्द-शब्द में
यौवन भर दूँ,
पंक्ति-पंक्ति में प्रीत!
हर पद में
मुस्कान तुम्हारी
ज्यों मिश्री-नवनीत!

रवि जी आपने इस कविता में अपने-आपको बहुत अच्छी तरह से बखूबी ढ़ाला है, और ऐसा लग रहा है कि आप बोल रहें हो या नहीं, आपकी कविता ज़रूर बोल रही है।

ग़ज़लें

मेरा फोटोअर्चना तिवारी जी मैं एक शिक्षिका हैं। शिक्षा पर सभी का अधिकार है इसलिए वे उन बच्चों को पढ़ाती हैं जो निर्धन हैं शुल्क नहीं दे सकते। बचपन से उन्होंने सुना है, देखा है कि कलम में बड़ी शक्ति होती है, वह धाराओं का रुख मोड़ सकती है...तो वे भी कलम के साधन से शब्दों के रास्ते आशाओं की मंजिल पाने की कोशिश कर रही हैं|
बस आँखों में दिखता पानी एक निहायत खूबसूरत और सशक्त रचना है! इसकी लयबद्धता और छंदमय रचना बेहद प्रभावित करती है।

सूखे खेत, सरोवर,झरने,बस आँखों में दिखता पानी

हाहाकार मचा है जग में,छाए मेघ न बरसा पानी।

भ्रष्टाचार के दलदल में अब,अपना देश धंसा है पूरा

कौन उबारे, सबके तन में ठंडा खून रगों का पानी।

अब रक्षक को भक्षक कहिए,कलियां रौंद रहे है माली

लोग तमाशा देख रहे हैं,किसकी आंख से छलका पानी।

खेती किस किस से जूझेगी,किसका किसका हल ढूंढेगी

एक साथ इतने संकट हैं,आंधी,बिजली,सूखा,पानी।

प्रेम वचन शीतल वानी है जिससे पीर मिटे सब मन की

सूखे, झुलसे तरू के तन की जैसे प्यास बुझाता पानी।

इस कविता/ग़ज़ल पए इस्मत ज़ैदी का कहना है

 

 बहुत उम्दा कविता ! अर्चना जी आप की ये पूरी कविता लय में और वज़्न में है ,बहुत सटीक शब्दों का चयन किया है आपने। पढ़ कर साहित्य पढ़ने की संतुष्टि प्राप्त होती है। बधाई हो !! सब से बढ़कर जिस समस्या पर ये कविता है हमें उस संबंध में अब जाग जाना चाहिए।

 

मेरी पसंद


My Photoआज की मेरी पसंद है संगीता स्वरूप जी की रचना सच बताना गांधारी।

हे गांधारी !

तुम्हारे विषय में बड़ी जिज्ञासा है

उत्तर  पाने की तुमसे आशा है

जानना चाहती हूँ  तुमसे कुछ तथ्य

क्या बता पाओगी पूर्ण सत्य ?

पूछ ही लेती हूँ तुमसे आज

लोगों को बड़ा है तुम पर नाज़ ...

कहते हैं सब कि गांधारी पतिव्रता थी

पति के पदचिह्नों  पर चला करती थी

किया था तुमने पति  का अनुसरण

प्रतिज्ञा कर दृष्टिहीनता को किया वरण

पर  सच बताना  गांधारी

क्या यह तुम्हारा  सहज ,

सरल, निर्दोष  प्रेम था ?

दया  थी पति  के प्रति

या फिर  मन का क्षेम  था ?

यदि प्रेम  की   अनुभूतियों  ने

तुमसे  ऐसा  कराया

तो क्षमा  करना गांधारी

मेरा मन इस कृत्य के लिए

तुमसे सहमत नहीं हो पाया .

पति की इस लाचारी को

अपने नेत्रों से आधार प्रदान करतीं

बच्चों की  अच्छी परिवरिश  से

सच ही उनका कल्याण  करतीं

अपनी दूरदर्शिता से तुम

राज्य   का उत्थान करतीं

जब लडखडाते  धृतराष्ट्र  तो

तुम  उनका संबल  बनतीं .

पर तुमने तो हो कर विमुख

अपने कर्तव्यों  को त्याग दिया

हे  गांधारी !

कहो ज़रा ये तुमने क्या किया ?

पर  सच तो यह है  कि--

नारी  मन कौन  समझ पाया है

उसके हृदय के भूकंपों को

कब कौन जान पाया  है ?

मन के  भावों को  अन्दर  रख

रोज  सागर  मंथन करती है

मंथन से निकले हलाहल को

स्वयं रोज पिया करती है

शायद  तुमने भी तो उस दिन

चुपचाप  विषपान किया था 

आक्रोशित  मन के उद्वेलन  को

तुमने चुपचाप सहा था

आजीवन दृष्टि विहीन रहने में

मुझको  तेरा आक्रोश  दिखा है

सच कहना  गांधारी ---

ऐसा  कर क्या तुमने

सबसे प्रतिकार लिया है ?

धोखा   खा कर शायद यह

प्रतिक्रिया हुई ज़रूरी

समझ सकी हूँ बस इतना ही

कि  यह थी तेरी  मजबूरी

मौन  रहीं तो  बस  सबने

तुमको था देवी जाना

असल क्या था मन में तुम्हारे

यह  नहीं किसी ने  पहचाना ......

 

 

बस!

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