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रविवार, अप्रैल 12, 2009

एक और अनेकः सच्चा शरणम् अखिलं मधुरम्

कभी पहले जब मैं नियमित चर्चा करता था तब मैं ज्यादा से ज्यादा उन चिट्ठों को टटोलता था जो भीड़ में गुम से रहते थे। अपनी इस कोशिश में कई अच्छे लिखने वालों का पता चला था जिनमें से ज्यादातर पसंद और पाठक के मामले में हम से कहीं आगे निकल गये हैं। ऐसे ही एक ब्लोगर के ब्लोग का पता मुझे तब चला था और उसकी लिखी कवितायें अन्य ब्लोगरस से थोड़ा जुदा सी लगी थीं। चर्चा में हमने उसकी कविताओं की चर्चा भी की और आज वो ही एक और अनेक के तीसरे एपिसोड का मेहमान है। अगर अभी तक अंदाज नही लगा पाये तो बता दूँ ब्लोगर का नाम है हिमाँशु जो पेशे से अध्यापक हैं।

जगजीत सिंह की गायी हुई एक गजल की लाईनें हैं, "अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफर के हम हैं, रूख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं"। इसी तर्ज में हिमाँशु का अपने बारे में कुछ यूँ कहना है -
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफिर का नसीब सोचते रहतें हैं किस ओर किधर के हम हैं।
पढ़ने सुनने के मामले में हिमाँशु जिस तरह का शौक रखते हैं वैसा ही उनके लिखे में दिखता भी है। इनके चिट्ठों में से एक है, सच्चा शरणम्। जिसमें उनकी ताजातरीन पोस्ट है - गाने आया जो अनगाया है अब तक वो गीत रे। ये दरअसल भावानुवाद है रविन्द्रनाथ की गीतांजलि से और इसे हिमाँशु ने नही बल्कि उनके पिताश्री प्रेम नारायण 'पंकिल' जी ने किया है -
गाने आया जो अनगाया है अब तक वो गीत रे
वीण खोलते कसते वासर गये अमोलक बीत रे ।
देखा बदन न उसका उसके स्वर न सुन सके कान
उसकी पगध्वनि का ही बस कर पायी श्रुति संधान
गृह समीप पथ से निकला जब मंथर गति मनमीत रे
वीण खोलते कसते वासर गये अमोलक बीत रे ।
लेकिन इस भावानुवाद से पहले जो उन्होंने पोस्ट किया था वो उनका खुद का ही लिखा था। क्या आपने कभी कुछ महसूस किया है कुछ और वो क्या लगा आपको। महसूस करने के मामले में हिमाँशु का कहना है, महसूस करता हूँ, सब तो कविता है -
मैं रोज सबेरे जगता हूँ
दिन के उजाले की आहट
और तुम्हारी मुस्कराहट
साफ़ महसूस करता हूँ ।
चाय की प्याली से उठती
स्नेह की भाप चेहरे पर छा जाती है ।

फ़िर नहाकर देंह ही नहीं
मन भी साफ़ करता हूँ,
फ़िर बुदबुदाते होठों से सत्वर
प्रभु-प्रार्थना के मंद-स्वर
कानों से ही नहीं, हृदय से सुनता हूँ ।
अगरबत्ती की नोंक से उठता
अखिल शान्ति का धुआँ मन पर छा जाता है ।
उनके चिट्ठे को और बाँचता हूँ तब यही लगता है कि लेखन कला उन्हें विरासत में ही मिली है। हमारे साथ कई बार होता है कंप्यूटर खोलते तो ब्लोग लिखने के लिये हैं लेकिन फिर गेम खेलने लग जाते हैं। वैसा ही कुछ जरूर उनके बाबूजी के साथ हुआ होगा तभी तो पंकिल जी लिख बैठे, दिया राहु लिख चन्द्रमा लिखते-लिखते -
पथिक पूर्व का था चला किन्तु पश्चिम
दिया राहु लिख चन्द्रमा लिखते-लिखते ।

यह बुढ़िया स्वयं खा रही है ढमनियाँ
सिखाती है औरों को सदगुण ही सुख है
लबालब भरेगा सलिल कैसे ’पंकिल’
जो औंधा किया अपनी गागर का मुख है,
चिकित्सक बना भी तो कैसा अनाड़ी
दिया टाँक मिर्गी दमा लिखते-लिखते ।
उनके क्षेत्र के नेता भी बड़े निराले हैं, ऐसे ही एक नेता गधे में बैठ, जूते की माला धारण किये नामांकन भरने गये और जनता इनसे देश के उद्धार की आश लिये इनके पीछे पीछे। कोई आश्चर्य नही ये चुनाव जीत भी जायें। इसी घटना पर लिखी इनकी पोस्ट में विश्लेषण की भरमार देखिये -
स्वनामधन्य ये महानुभाव गधे पर क्यों बैठे ? गधा तो शीतला मइया का वाहन है, अतः भागवत जी तो महामारी लेकर आ गये । भोली जनता को गधा बनाने वाला ऐसा गधा (माफ करें) कहाँ मिलेगा ? यदि निरीह प्राणी की ही बात है तो गधा तो ’रजक’ (धोबी) वर्ग का सम्मानित जीव है । खुर भी चलाता है, दाँत भी चलाता है, भार भी ढोता है । सेवक है, सुशील है, सत्कर्मी है । अच्छा होता ’भागवत जी’ मेमने पर बैठ गए होते ! अंग्रेजी कवि ’विलियम ब्लेक’ ने मेमने (लैम्ब ) को सबसे निरीह माना है - न पूँछ, न सींग । कोई भेंड़ भी चुन सकते थे, समयानुसार भोजन कर लेते, जैसे नेता जनता का कर लिया करते हैं । जूते की माला की जगह कुर्सी लटका लेते - कुर्सी भी तो चलती है संसद में; चला भी लेते, उस पर बैठ भी जाते । ऐसी अभद्रता किस लोकतंत्र की धरोहर है ? जनता तुम्हारा जूता देख रही है जिसे गले से निकालकर किसी के गाल पर चला सकते हो । ऐसी सुबुद्धि को शत-शत बार प्रणाम ।
हिमाँशु अक्सर ही कविता लिखते रहते हैं लेकिन फिर भी कई बार उन्हें कहना पड़ता है, मैंने कविता लिखी -
मैंने कविता लिखी
जिसमें तुम न थे
तुम्हारी आहट थी
और इस आहट में
एक मूक छटपटाहट

मैंने कविता लिखी
जिसमें इन्द्रधनुष नहीं था
हाँ, प्यासे कुछ लोग थे
क्योंकि उसमें बादल था
दुनिया में तो देखते आये थे अक्सर हिंदी ब्लोग जगत में भी सुनने में आ ही जाता है, आप सोच रहे हैं क्या? यही पात-पात में हाथापायी बात-बात में झगड़ा, इसी शीर्षक में वो लिखते हैं -
गांव गिरे औंधे मुंह
गलियां रोक न सकीं रुलाई
’माई-बाबू’ स्वर सुनने को
तरस रही अंगनाई,
अब अंधे के कंधे पर
बैठता नहीं है लंगड़ा

पूजा के दिन गंगाजल की
घर-घर हुई खोजाई
दीमक चाट रहे कूड़े पर
मानस की चौपाई,
कट्टा रोज निकाल रहे हैं
बन कर पिछड़ा-अगड़ा ।
हिमाँशु को SMS भी आते हैं, एक दिन ऐसा ही एक आया -
एक आदमी मंदिर गया
रोने लगा-
"हे राम’ मेरी बीवी खो गयी है" .
राम जी बोले,
"बाजू वाले हनुमान मंदिर में जा के बोल,
क्योंकि मेरी भी उसी ने ढूंढी थी"....
अपने बाबूजी की लिखी रचनाओं के लिये हिमाँशु ने एक ब्लोग बनाया है, नाम है अखिलं मधुरम्। इस पर लिखी रचनाओं को समझने के लिये हमारी जैसी साधारण समझ से नही चलेगा। उसके लिये हिंदी का अच्छा खासा ज्ञान चाहिये। कुछ बानगियाँ देखिये -
गहन तिमिर में दिशादर्शिका हो ज्यों दीपशिखा मधुकर
मरु अवनी की प्राण पिपासा हर लें ज्यों नीरद निर्झर
तथा मृतक काया में पंकिल भर नव श्वाँसों का स्पंदन
टेर रहा है नित्य नूतना मुरली तेरा मुरलीधर।।16।।
कुछ और देखिये -
“पिंडलि पर आँकू”, कहा श्याम “लतिका दल में खद्योत लिये।
नव कदलि-खम्भ मृदु पीन-जघन पर पुष्पराग दूँ पोत प्रिये!
विरॅंचू नितम्ब पर नवल नागरी व्रजवनिता बेचती दही।
पदपृष्ठप्रान्त में अलि-शुक-मैना मीन-कंज-ध्वज-शंख कही्।
फिर बार-बार बाँधू केहरि-कटि पर परिधान नवल धानी।
अन्तर्पट पर रच दूँ लिपटी केशव-कर में राधा रानी।”
हो चतुर चितेरे! कहाँ, विकल बावरिया बरसाने वाली ।
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन-वन के वनमाली ॥54॥
हिमाँशु ने एक नया प्रयत्न भी किया है और वो है अपनी लिखी कविताओं का गान और इनके कविता गान को आप सुन सकते हैं - नया प्रयत्न में, आवाज भी कविता जितनी ही मधुर है। नया प्रयत्न में उनकी लिखी काफी सारी खुबसूरत कवितायें हैं। अगर आप काव्य प्रेमी है तो जाईये वहाँ और खुद ही रसपान कीजिये।

हिमाँशु, अंग्रेजी में भी कवितायें लिखते हैं और ये आप इनके चिट्ठे Literary Look में पढ़ सकते हैं।

अब हिमाँशु से की गयी सवालों की त्रिवेणी -
तरूण: आप के प्रोफाइल से पता चलता है कि आप अध्यापन से जुड़ें हैं, तो क्या बतायेंगे कि किस विषय से? क्या आपके छात्र आपके ब्लोगस के बारे में जानते हैं। कभी स्कूल के समारोह में अपनी कोई कविता पढ़ी क्या आपने?
हिमाँशु: अपने ही कस्बे के डिग्री कॉलेज में एक साल से हिन्दी साहित्य पढ़ाता हूँ । बहुत से छात्र मेरे इण्टरनेट प्रेम को जानते हैं । कुछ एक पढ़ते भी हैं, जिनके पास सुविधा हो । अपने कस्बे का अकेला ऐसा उपयोक्ता हूँ जिसने इण्टरनेट केवल ब्लॉगिंग जैसी किसी वस्तु के लिये लिया हो, अन्यथा यहाँ इण्टरनेट परीक्षा परिणाम जानने के साधन के सिवा कुछ समझा नहीं जाता । बहुतों ने तो शुरु-शुरु में पूछा भी, "कितना रिजल्ट देखना है आपको कि घर पर इण्टरनेट ले आये ?" मैं निरुत्तर हूँ अभी तक।

कुछ मित्रों के साथ बैठकी में कविता पढ़ लिया करता था, लोग इसके प्रति सीरियस नहीं थे । छात्रों को खूब कविता सुनायी है, पर समारोह में नहीं, व्यक्तिगत - आफिस में या घर पर जब वह कुछ पूछने आते हैं, और कविता का जिक्र चल जाया करता है । आजकल हिन्द-युग्म से जुड़े ’मनीष वन्देमातरम’ मेरे कस्बे के पास ही रह रहे हैं, उन्हें सुनाता हूँ।

तरूण: अखिलं मधुरम् में एक स्क्रोल बार दौड़ता रहता है जो उस ब्लोग को शुरू करने की वजह बताता है। श्री प्रेम नारायण पंकिल जी के बारे में थोड़ा कुछ बताईये।
हिमाँशु: श्री प्रेम नारायण ’पंकिल’ मेरे पिता जी हैं । स्थानीय इण्टर कॉलेज में अंग्रेजी के प्रवक्ता थे, पिछली साल अवकाश प्राप्त कर लिया । पिता जी ने अपने शिक्षा व अध्यवसाय से स्वयं को एक विद्वान और श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में निर्मित किया, परन्तु प्रदर्शन से दूर रहे । लगातार लिखते रहे, आस-पास की पत्रिकाओं में अपने आप किसी ने छाप दिया तो ठीक, नही तो अपना समस्त काव्य-कर्म उसी चिरन्तन के सम्मुख परसते रहे और संतुष्ट हो लिये । एक निर्विकार स्वरूप । मेरी अपनी जिद से मैंने ’अखिलं मधुरम’ पर उनकी रचनायें देनी शुरु कीं । बहुत लिखा है उन्होंने, आज भी लिख रहे हैं ।

तरूण: आपकी कविताओं में दर्शन शास्त्र का असर साफ दिखता है लेकिन अगर मल्लिका शेरावत (या आपकी कोई फेवरिट) आपको प्यार का दर्शन समझाने की जिद करे तो आप इसे कहाँ (किस जगह) सीखना चाहेंगे?
हिमाँशु: मेरा एक बैठका है । उसी में अतिथियों के आने जाने से लेकर अपने सभी सम्बन्धियों/ प्रियजनों के बीच मैं क्षुद्र-मति अपने कम्प्यूटर के साथ विहार करता हूँ । यहीं रोज की दिनचर्या के बीच, जीवन की आपाधापी में समय का एकांत ढूंढ़ता हूँ ( ठीक उसी तरह जैसे दो शब्दों के बीच छुपा अर्थ ) और अपना एक फलसफा बनता जाता है ( अगर कोई फलसफा है ) । कविता भी मेरे जीवन के इसी संस्कार से जन्म लेती है । कोशिश करुंगा, कि मल्लिका शेरावत यहीं पधारें - यहाँ भीड़ में बहुत कुछ समझने की जिद रहती है मेरी ।


अंत में, इतना ही कहूँगा कि हमेशा हंसते रहिये क्यूँकि एक तो ये फ्री है और दूसरा कई बिमारियाँ दूर रखता है। और अगर ये बातें काफी नही है हंसने के लिये तो इतना ही कहूँगा कि जीव जंतु और जानवर ही हैं जो नही हँसते, सिर्फ इंसान ही हैं जिन्हें हँसना आता है। और आपमें से जो हसँते रहते हैं उनके लिये हिमाँशु की लिखी ये कविता पेश किये जाता हूँ - आपका हँसना
आपके हँसने में
छ्न्द है
सुर है
राग है,
आपका हँसना एक गीत है।

आपके हँसने में
प्रवाह है
विस्तार है
शीतलता है,
आपका हँसना एक सरिता है।

आपके हँसने में
शन्ति है
श्रद्धा है
समर्पण है,
आपका हँसना एक भक्ति है।

आपके हँसने में
स्नेह है
प्रेम है
करुणा है,
आपका हँसना एक भाव-तीर्थ है।

आपके हँसने में
आपका विचार है
अस्तित्व है
रहस्य है,
आपका हँसना स्वयं आप हैं।

मेरे जीवन में
आपकी तरलता है
स्निग्धता है
सम्मोहन है,
मेरा जीना आपका हँसना है।
कुछ देर के लिये इसे हमारे ही भाव समझिये, अगली बार फिर मुलाकात होगी एक दूसरे ब्लोगर और उसकी अनेक पोस्टस के साथ।

- तरूण

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रविवार, अप्रैल 05, 2009

एक और अनेकः अशोक का कृषि दर्शन

अपने पर्सनल चिट्ठे पर जब मैं दूरदर्शन के पुराने दिनों की याद कर रहा था तो उसमें डा अनुराग ने एक टिप्पणी में कहा था, जो एक प्रोग्राम कुछ खासा अच्छा नही लगता था वो था कृषि दर्शन, कमोबेश यही हमारी भी कहानी थी। कृषि दर्शन बहुत बोरिंग लगता था क्योंकि उसकी बातें एक बच्चे की समझ से ऊपर की बातें होती थीं। लेकिन उस टिप्पणी से हमें याद आया एक ऐसा ब्लोगर जिसने इसी को अपने ब्लोगर का सबजेक्ट चुना। जी हाँ आज के हमारे एक ब्लोगर हैं, अशोक पांडेय जो खेती बाड़ी के नाम से ब्लोग लिखते हैं।

मैं अभी उनका ब्लोग देख रहा था तो जो सबसे पहली पोस्ट दिखी वो थी एक ऐसे व्यक्ति के बारे में जो शिक्षा से तो वैज्ञानिक था लेकिन कर्म से एक सिक्यूरिटी गार्ड वो भी कनाडा में। अशोक ने शीर्षक रखा था, "वैज्ञानिक करें सिक्‍यूरिटी गार्ड का काम, तो कैसे हो कृषि अनुसंधान !"। इस पोस्ट में कुछ टिप्पणियाँ सहानुभूति की आयी तो कुछ उस वैज्ञानिक को कोसती। सहानुभूति जताकर भी कुछ नही होने वाला ना ही उस व्यक्ति को कोसकर, इंडिया में ऐसे ना जाने कितने पढ़े लिखे हैं जिनके पास काम नही है। काम कोई भी खराब नही होता है लेकिन पढ़े लिखे लोग शायद चाहकर भी इंडिया में वो काम नही कर सकते जो दूसरे देशों में जाकर। क्योंकि अगर इंडिया में करते हैं तो आस पास का समाज ताने मार मार उसको वैसे ही मार देगा। यहाँ अमेरिका में अभी एक बड़ी कंपनी के एक CEO को पिज्जा डिलीवर करते देखा था।

अशोक लिखते हैं -
घोषित तौर पर कृषि क्षेत्र सरकार के एजेंडा में भले ही सबसे ऊपर हो लेकिन जमीनी सच्‍चाई हमेशा इसके विपरीत ही नजर आती है।
आगे उनका कहना है,
इधर अपने देश में कृषि अनुसंधान का हाल यह है कि इस क्षेत्र में वैज्ञानिकों की घोर कमी है, जिसके चलते कई परियोजनाओं के ठप पड़े होने की बात कही जाती है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के विभिन्‍न संस्‍थानों के कृषि वैज्ञानिकों के करीब 38 फीसदी अर्थात 2500 पद खाली हैं।
ये तो जमीनी सच्चाई है लेकिन इन सबसे आंखे मूँदे हम गर्व करते हुए गाते हैं, मेरे देश की धरती सोना उगले। ऐसे हालात रहे और किसान आत्म हत्या करते रहे तो ये धरती क्या उगलेगी क्या निगलेगी ये तो वक्त ही बतायेगा।

ऐसा भी नही है कि एक किसान को खेती के सिवा कुछ नही सूझता, उसकी कोई संवेदना नही होती, होती है जी और ये अशोक के साथ भी है। इसलिये अपनी एक पोस्ट में आम आदमी की संवेदना पर लिखते हुए रघुवीर सहाय की कविता पेश करते हैं - आज फिर शुरू हुआ

आज फिर शुरू हुआ जीवन
आज मैंने एक छोटी-सी सरल-सी कविता पढ़ी
आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा

जी भर आज मैंने शीतल जल से स्‍नान किया

आज एक छोटी-सी बच्‍ची आयी, किलक मेरे कन्‍धे चढ़ी
आज मैंने आदि से अन्‍त तक एक पूरा गान किया

आज फिर जीवन शुरू हुआ।
लेखों में विभिन्नता बरकरार रहती है, तभी तो खेतों से खलिहान से यदा कदा जब इधर उधर पहाड़ियों पर नजर डालते हैं तो बात करने लगते हैं एक पहाड़ी पर बसे मुंडेश्‍वरी मंदिर की जो कि पुरातत्‍व के आईने में भारत का प्राचीनतम मंदिरों में आता है।
विख्‍यात इतिहासकार एनजी मजुमदार ने शिलालेख का गहन अध्‍ययन करने के उपरांत संवत्‍सर का आशय गुप्‍तकाल से लगाते हुए शिलालेख की तिथि 349 ईस्‍वी निर्धारित की। उनका विश्‍लेषण Indian Antiquity, February, 1920 Edition में प्रकाशित हुआ। श्री मजुमदार का स्‍पष्‍ट मत है कि मुंडेश्‍वरी शिलालेख समकोणीय ब्राह्मी लिपि में है, जो 500 ईस्‍वी के बाद देश में कहीं भी देखने को नहीं मिलती। उनके मुताबिक हर्षवर्धन के काल में जिस ब्राह्मी लिपि का प्रयोग देखने को मिलता है वह न्‍यूनको‍णीय है।
यही नही प्राप्त शिलालेखों पर बताते हैं -
मुंडेश्‍वरी मंदिर के काल निर्धारण का मुख्‍य आधार वहां से प्राप्‍त शिलालेख ही है। अठारह पंक्तियों का यह शिलालेख किन्‍हीं महाराज उदयसेन का है, जो दो टुकड़ों में खंडित है। इसका एक टुकड़ा 1892 और दूसरा 1902 में मिला। दोनों टुकड़ों को जोड़कर उन्‍हें उसी साल कलकत्‍ता स्थित इंडियन म्‍यूजियम में भेज दिया गया। 2’8”x 1’1” का यह शिलालेख संस्‍कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में है। लेख की भाषा में कुछ व्‍याकरणिक अशुद्धियां हैं और शिला टूट जाने के कारण जोड़ के बीच के कुछ शब्‍द गुम हो गए हैं। हालांकि विद्वानों ने अपने शोध के आधार पर उनकी पुनर्रचना की है। ब्राह्मी लिपि के उक्‍त शिलालेख का चित्र और बिहार राज्‍य धार्मिक न्‍यास परिषद द्वारा किया गया उसका देवनागरी लिप्‍यंतरण और हिन्‍दी अनुवाद इस आलेख के साथ यहां प्रस्‍तुत किया गया है।
जय जवान, जय किसान का नारा देने वाले लाल बहादुर के देश में किसानों और कृषि को शायद इग्नोर किया जा रहा है तभी तो कृषि क्षेत्र में पड़ोसियों से भी पिछड़ गया भारत, और ये बात भी एक पोस्ट के जरिये बता रहे हैं अशोक।
कृषि उत्पाद के मामले में भारत, दक्षिण एशिया का दिग्गज देश नजर आता है, लेकिन अगर पिछले आंकड़ों को देखें तो खाद्य फसलों की उत्पादनशीलता छोटे पड़ोसी देशों से भी कम है। यहां तक कि अफगानिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों में भी पिछले दो दशकों में फसलों की उत्पादकता के मामले में भारत की तुलना में विकास दर ज्यादा रही है।
अशोक ने अपनी पहली पोस्ट १८ मई, २००८ के दिन लिखी थी और पोस्ट थी - लोहे की बढ़ी कीमतें हैं महंगाई का रक्तबीज। इसकी शुरूआत ही उन्होंने किसानों के बढ़ती आत्म हत्या पर बात उठाते हुए करी -
खच्चर बोझ भी ढोता है और गाली भी सुनता है। हमारे देश में किसानों की स्थिति उस निरीह जानवर से बेहतर नहीं है। पहले से ही आत्महत्या कर रहे किसानों के लिए हाल की महंगाई प्राणलेवा है, इसके बावजूद उन्हें इसका बोझ उठाने को विवश किया जा रहा है। महंगाई रोक पाने में सरकार की नाकामी का मुख्य कारण उसकी नीतिऔर नियत में यह खोट ही है।


इनकी पहली पोस्ट पर ज्ञान दत्त पांडेजी की टिप्पणी थी -
यह अत्यंत हर्ष और संतोष का विषय है कि आप जैसे खेतीबाड़ी से जुड़े लोग भी ब्लॉगोन्मुख हो रहे हैं। और आपकी पोस्ट से स्पष्ट है कि आप सम्बन्धित विषयों पर सुस्पष्ट विचार रखते हैं।

नियमित लिखते रहें और ब्लॉगों पर सब्स्टेंस वाली टिप्पणियां करते रहें। आपको निश्चय ही सशक्त ब्लॉगर बनना है।


और एक दूसरी टिप्पणी थी, डा.चंद्रकुमार जैन की -
माटी की सेवा करते हैं,
कलम से नाता गहरा है.
धरती माता के आँगन में,
ये माटी-पुत्र का पहरा है.


कुल मिलाकर बात इतनी भर है कि अगर जाने पहचाने विषयों से परे कुछ अलग सा जानना है या पढ़ना चाहते हैं तो खेती बाड़ी पर जाईये क्योंकि किसान और उसका खेत हमेशा से ही इस देश की पहचान रही है और ये पहचान बनी रहनी चाहिये।

एक और अनेक की इस दूसरी (पहली चर्चा थी, महेन की बतियाँ) चर्चा से कुछ नया इसमें जोड़ा है और वो ये कि जिस किसी भी ब्लोगर की यहाँ बात करेंगे उससे ३ सवाल भी पूछेंगे। इसी क्रम में बगैर पूर्व चेतावनी के अंतिम क्षण में हमने अशोक से ३ सवाल पूछे।

तरूणः आम आदमी के लिये जहाँ कृषि एक बोरिंग सा विषय होता है वहीं आपने इस विषय को अपने ब्लोग के लिये क्यों चुना?
अशोक पांडेयः मैं खुद एक किसान हूं और मुझे अपने गांव व खेतों से काफी लगाव है, इसलिए मैंने अपने ब्‍लॉग के लिए यही विषय चुना। मुझे लगा कि किसान का पक्ष सही तरीके से एक किसान ही रख सकता है।

तरूणः कुछ समय पहले और आजकल भी यदा कदा सुनने में आता है किसानों की आत्म हत्या के बारे में, भारत जैसे कृषि प्रधान देश में ये होता देख और सुन आपको कैसा लगता है? इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिये क्या कुछ किया जा सकता है?
अशोक पांडेयः इस देश में भगवान और किसान को सबसे अधिक बेवकूफ समझा जाता है और उन्‍हें सबसे अधिक छला जाता है। कृषिप्रधान देश होने के बावजूद यहां सबसे अधिक उपेक्षित कृषि और किसान ही हैं। किसान की आत्‍महत्‍या की बात सुन मेरा खून खौलने लगता है। वैसा ही दर्द होता है जैसा एक भाई के मरने पर दूसरे भाई को होता है। इस देश के बहुसंख्‍यक किसान हिन्‍दीभाषी हैं, जबकि यहां की राजकाज की भाषा (राजभाषा) व्‍यावहारिक रूप से आज भी अंगरेजी है। इसका परिणाम है कि किसान के हाथ पैर तो मुक्‍त हैं लेकिन उसकी जुबान पर ताला लगा है। किसान की जुबान का ताला खोल दो, उसके हाथों में इतनी ताकत है कि वह अपनी किस्‍मत खुद संवार लेगा। आज यदि किसानों के बेटे नक्‍सली या अपराधी बन रहे हैं तो उसका कारण उनकी यह उपेक्षा ही है। सरकार उनके लिए कुछ नहीं करती तो मजबूरी में वे अपराध या नक्‍सलवाद की डगर पकड़ते हैं।

तरूणः अगर आप से पूछा जाय कि बालीवुड, हालीवुड या आपकी भोजपुरी (बिहारवुड) में से किसी एक हिरोईन को एक शाम की डेट (एक यादगार शाम बिताने के लिये) के लिये चुनें तो आप किसे चुनेंगे? और कहाँ लेकर जायेंगे?
अशोक पांडेयः एक से काम नहीं चलेगा जी, हम तो भीड़ में रहना पसंद करते हैं। मेरा वश चले तो मैं हॉलीवुड, बॉलीवुड, पॉलीवुड सभी को बुला लूं और कहूं कि खेत की मेड़ पर घूमते हुए मटर की हरी-हरी छेमियां खाते हैं और चांदनी रात में खलिहान में बैठकर चैता, कजरी का आनंद लेते हैं।

ये था अशोकजी से पूछे गये सवाल-जवाब का सिलसिला, अगली बार फिर लेकर आयेंगे किसी एक ब्लोगर और उसकी अनेक पोस्टों को "एक और अनेक" में।

[आप में से जिन्होंने कभी भी मेरे पर्सनल चिट्ठों पर अपनी टिप्पणी नही छोड़ी, उनसे अनुरोध है कि कम से कम एक टिप्पणी वो वहाँ किसी भी एक चिट्ठे में अपने असली ईमेल एड्रैस और ब्लोग पते के साथ छोड़ दें। जिससे अगर उनको या उनके चिट्ठों का नंबर आता है तो उससे सवाल पूछने के लिये हमारे पास उसका ईमेल पता हो। ये सिर्फ आप्शनल है अगर नही भी छोड़ेंगे तो भी चर्चा तो की जायेगी, बस सवाल-जवाब वाला सेक्शन नही दे पायेंगे। इस नोट को सेल्फ प्रमोशन ना समझा जाये। ;)]

[कल की संगीत चर्चा जो कभी नही से देर भली की तर्ज पर की गयी]

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