<body><iframe src="http://www.blogger.com/navbar.g?targetBlogID=16767459&amp;blogName=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%BE+%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A4%BE&amp;publishMode=PUBLISH_MODE_BLOGSPOT&amp;navbarType=BLUE&amp;layoutType=CLASSIC&amp;homepageUrl=http%3A%2F%2Fchitthacharcha.blogspot.com%2F&amp;searchRoot=http%3A%2F%2Fchitthacharcha.blogspot.com%2Fsearch" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" height="30px" width="100%" id="navbar-iframe" title="Blogger Navigation and Search"></iframe> <div id="space-for-ie"></div>

एक था राजा एक थी रानी पर कुछ अलग ये कहानी

May 17, 2008 को प्रकाशित। लेखकः masijeevi

 

हम चिट्ठाचर्चा जैसे सामुहिक मंच के दुरुपयोग के लिए कुख्‍यात रहे हैं :) तो लंबी छुट्टी के बाद आज इस चर्चा में इसी दुरुपयोग की परंपरा का जारी रखते हुए जिस चिट्ठे की चर्चा कर रहे हैं वह एक अंग्रेजी चिट्ठा है। उसकी भी एक पोस्‍ट भर, बस पसंद आ गई तो लीजिए आपके लिए पेश है।

अपने अंग्रेजी चिट्ठे "अरे क्‍या बात है" में हिन्‍दी के (भी) चिट्ठाकार सुनील दीपक ने  इतालवी फिल्‍मकार रोबर्टो रोसेलिनी और उनकी भारतीय प्रेशर सोनाली के प्रेम संबंध की शानदार खोजपरक पड़ताल की है। ये खोजपरकता उस शुष्‍क विश्‍वविद्यालयी शोध से बिल्‍कुल अलग है जिससे हमारा साबका रोजाना पड़ता है। 51 साल के रोसेलिनी फिल्‍म निर्माण के सिलसिले में भारत आते हैं और यहॉं एक प्रतिष्ठित फिल्‍मनिर्माता की 27 वर्षीय पत्‍नी सोनाली से प्रेम कर बैठते हैं जो दो बच्‍चों की माता भी है। भारत के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री के गुपचुप सहयोग के साथ ये युगल इटली भाग जाता है, एक बच्‍चा सोनाली साथ ले जाती हैं किंतु दूसरा यहॉं पिता के पास छूट जाता है। इसके बाद सोनाली-रोसेनिली की कहानी के सूत्र मिलने बंद हो जाते हैं। पर यहीं तो चिट्ठाकार का चिट्ठाकारपना शुरू होता है-

All these questions were going around in my head as I searched for answers. I could piece together many things because I could search in English and Italian, as well as some minor sources in Spanish and French that gave crucial information. This search was exclusively through internet. I didn’t find much about how people had felt, the emotional part of this story and perhaps it is better that way since I can imagine that even after all these years, many of these memories must be still very painful for all those who are still alive. Roberto died in 1977. Harisadhan Dasgupta probably died in 1986 or around that. It is not clear if Sonali Rossellini is still alive. Yet their children are around and probably they carry the scars of this event.

एक शानदार पोस्‍ट जिसके लिए लिखने वाले का सुनील दीपक होना जरूरी है। जो भारतीय है और इतालवी भी, संस्‍कृति व भाषा के स्‍तर परिपक्‍व भी। चवन्निया नैतिकता के आग्रहों से मुक्‍त। एक शानदार पोस्‍ट जो लिखी तो  अंग्रेजी में गई है  पर संभव हो तो आपको भी पढ़नी चाहिए।

कैटरीना कैफ़ के साथ आलोक पुराणिक की जुगलबंदी

April 25, 2008 को प्रकाशित। लेखकः अनूप शुक्ल

हूँ अजीम मैं शायर, मैं हूँ महाकवि : दिल को बहालने को गीतकार ये ख्याल अच्छा है।

....तो मेरे हक़ में दुआ करोगे ! : वायदा नहीं कर सकते लेकिन कोशिश करेंगे।

हनुमान जयंती के दिन भाई समीर " उड़नतश्तरी "से साक्षात् मुलाकात : साधुवाद, साधुवाद!

ब्लॉग मतलब बिंदास लिख : लोग चाहें पढ़ें या न पढ़ें।

अजब-गजब मुशायरा :मुशायरे के शोर से सहम कर गांव की सरहद पर गीदड़ों ने बोलना बन्द कर दिया था।

ई पापा बहुत हरामी हौ! : पटक के मारा जाये।

खोये वहीं पर ..... : फ़िर मिलेंगे चिंतित न हों।

अस्सी वर्षीया कैटरीना कैफ :के दर्शन करा रहे हैं चालीस जमा कुछ के आलोक पुराणिक!

बापू कैद में (व्यंग्य नाटक) कर रहें राजेन्द्र त्यागी। देखिये न!

धोती खुल गई भैया !! कस के बांधना चाहिये, अच्छा हुआ लंगोट पहने थे।

हर बार जिंदगी , जीत गयी! : ये बढि़या रहा!

ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' की ब्लॉग-वसीयत : लीक हो गयी। शिवकुमार मिश्र ने जिम्मेदारी ली।

मेरी पसंद

किस ने किया , किस का इंतज़ार ?
क्या पेड़ ने , फल फूल का ?
फल ने किया क्या बीज का ?
बीज ने फ़िर किया पेड़ का ?
हर बार जिंदगी , जीत गयी !

प्रेमी ने पाई परछाईँ ,
अपने मस्ताने यौव्वन की ,
प्रिया की कजरारी आंखों में ,
शिशु मुस्कान चमकती - सी ,
और ,उस बार भी जिंदगी जीत गयी !

हर पल परिवर्तित परिदृश्यों में ,
उगते रवि के फ़िर ढलने में ,
चन्दा के चंचल चलने में ,
भूपाली के उठते स्पंदन में ,
रात - यमन तरंगों में ,
हर बार जिंदगी जीत गयी !

साधक की विशुद्ध साधना में ,
तापस की अटल तपस्या में ,
मौनी की मौन अवस्था में ,
नि: सीम की निशब्द क्रियाओं में
मुखरित , हर बार जिंदगी जीत गयी !

लावण्या

विदा की बात मत करना

April 24, 2008 को प्रकाशित। लेखकः अनूप शुक्ल

भौको मत, एम्.फिल हो जाने दो ये शीर्षक है विनीत कुमार की आज की पोस्ट का। विनीत गाहे बगाहे में अपने कालेजियेट किस्से सुना रहे हैं और मजे ले लेकर सुना रहे हैं। आप न पढ़ें हों पढि़ये तो मजा आयेगा। उनके ब्लाग का उपरका मंजिल में लिखा है-जब हां जी सर ....हां जी सर कल्चर में दम घुटने लगे और मन करे कहने का कि - कर लो जो करना है .... ।जिन लोगों ने कभी पोस्टर बाजी की है उनको विनीत का दर्द अपना दर्द लगेगा जब वे पढ़ेंगे-
रात मे जब माता जागरण के पोस्टर के ऊपर मै दुनिया को बदल देने वाली पोस्टर लगता तो मिरांडा हौस के आगे बहुत सारे काले कुत्ते भौकने लगते, बहुत दूर तक मुझे दौडाते । कभी छिल जाता, कभी गिर जाता और सारे पोस्टर बिखर जाते। मै रोते हुये कहता, क्यो भौकते हो, विचारधारा छुड़वा दोगे क्या, एम्.फिल मे हो जाने दो। एक बार तो हॉस्टल से आटे की लाई बनाकर ले गया था और कुत्ते के चक्कर मे सब गिर गयी। दुबारा बनाकर पोस्टर लगाने मे चार बज गये थे।


पंकज अवधिया के लेख हम ज्ञानजी की वुधवारी पोस्ट में बांचते रहते हैं। इस बार की पोस्ट का उनका शीर्षक था विकास में भी वृक्षों को जीने का मौका मिलना चाहिये |हेडिंग संजय तिवारी को तकलीफ़ देने वाली लगी। कुछ लोगों के एतराज पर उन्होंने अपनी बार फिर से रखी कि पंकज अवधिया जी के लेख भाषण ही होते हैं। इस लेख पर नीरज रोहिल्ला ने टिपियाया भी-
मुझे तो इस टाईटल में कोई दम्भ या भाषण नहीं दिख रहा । हो सकता है मुझे भाषा की समझ न हो, लेकिन आज दो बातों से निराशा हुयी है ।

१) पहला तो बिना बाता का मुद्दा बनाकर एक पोस्ट डालना ।
२) फ़िर उसके बाद भी मुद्दे का पीट पीट कर दम निकालने का दूसरी पोस्ट में प्रयास करना ।

आपकी लेखनी सशक्त है, यदि आप इसे विवादों के स्थान पर कुछ मौलिक लिखने में लगायेंगे तो मेरे जैसे पाठकों को बडी खुशी मिलेगी


पंकज अवधिया जी कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हैं शायद और उन्होंने हिंदी ब्लाग जगत से इस्तीफ़ा अपनी पोस्ट पर पटक दिया। इस पर संजय तिवारी की टिप्पणी है -

मैं जानता हूं जमीन से जुड़ा आदमी यह शायद ही लिखे कि विकास में वृक्षों को भी मौका मिलना चाहिए. मुझे दुख हुआ कि आप जैसा जमीनी आदमी ऐसा कैसे लिख सकता है. यही सवाल हमने ब्लाग पर भी किया है.

दूसरी बात कि आपके लेखों में मुझे तथ्यों का अभाव हमेशा खटकता है. यह इसलिए भी हो सकता है कि एक पाठक के तौर पर मैं तार्किक मजबूती के लिए तथ्यों की अपेक्षा करता हूं.

ये दो सवाल अगर आपको अपमानजनक लगते हैं और आपको ठेस पहुंची है तो मैं आपसे पहले ब्लाग जगत को विदा बोलता हूं.


यह सब देखकर अहसास होता है कि मानव उम्र दराज होने के साथ साथ अपना बचपना कितने यत्न से बचा के रख सकता है। पंकज अवधिया जी और संजीव तिवारी जी आप लोग ऐसे विदाई मांगेगे तो क्या मिल जायेगी। टाइम खोटी करते हैं जी आप लोग। कविता करिये विस्फोट करिये लेकिन ई विदा की बात मत करिये। ई लो एक ठो कविता याद आ गयी। बहुत दिन बाद। शुक्रिया दोनों साथियों का कि उनके चलते याद आई। लिख रहा हूं ताकि बाद में भी काम आये-

मेरी पसन्द
विदा की बात मत करना

अभी मदहोश आंखों में कनक कंगन नहीं फ़ूले
अम्बर की अटारी में नखत नूपुर नहीं झुले।


न काजर आंज पायी है, न जूड़ा बांध पायी है
यहां भिनसार की बेला उनीदे आंख आयी है।

कह दो मौत से जाकर न जब तक जी भर जिंदगी जीं लें
विदा की बात मत करना।

रचनाकार -पता नहीं है जी। रचना भी अधूरी है लेकिन पूरी करेंगे खोज के। :)

हर तरफ हर जगह है उसी का नूर...

April 19, 2008 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami

इस चिट्ठा प्रविष्टि पर आज नजर पड़ी तो लगा कि इसे तमाम दुनिया को बताना चाहिए कि इसे अवश्य देखें. गीत सम्मोहक तो है ही, वीडियो संयोजन अत्यंत सम्मोहक.

तमाम दुनिया को आप भी फारवर्ड करें, उन्हें बताएं, देखें-दिखाएं व सम्मोहित हों...

चिट्ठे की कड़ी है - http://lifeteacheseverything.blogspot.com/2008/04/blog-post_18.html

Labels: ,

जिक्र तेरा कर के हम, हाजिर जवाबी हो गए

March 11, 2008 को प्रकाशित। लेखकः अनूप शुक्ल




कल अजित वडनेरकर ने शब्द-सफ़र की जगह शख्सियत-सफ़र कराया। अनीता खरबंदा के अनीताकुमार में बदलने की कथा सुनाई। अनीताजी लिखती हैं-
कॉलेज के जमाने से ही हमें किताबों से बहुत प्यार था, लायब्रेरी हमारे लिए दूसरे घर जैसी होती थी। ऑफ़िस की नौकरी में हम किताबों से दूर हो गये थे, अब वो दिन फ़िर से लौट आए और हमें ऐसा लगा कि हम जैसे बहुत सालों बाद अपने घर लौट आये हों।


और भी बहुत कुछ कहती हैं वे और उनके लेख पर आयी टिप्पणियां। अजितजी की मेहनत की तारीफ़ वही करें।



दो दिन पहले मुम्बई के ही शशि सिंह का भी हल्ला हुआ। शशिसिंह हिंदी ब्लागिंग भले न करें लेकिन ब्लागिंग की चिंता जरूर करते हैं। और कहते हैं-
नि:संदेह बहस एक सार्थक प्रक्रिया है, मगर बहस के नाम पर जो आये दिन निरर्थक बातें होते रहती है वो मेरी नजर में सिर्फ और सिर्फ 'बेवकूफी' है। इससे हिन्दी ब्लॉग जगत की बहुत सारी रचनात्मक ऊर्जा जाया हो रही है। इस तरह की बहसों के प्रतोस्ताओं से अनुरोध है कि विरोधाभासों के बीच जीने की आदत डालिए और उन ब्लॉगर से अपील जो अपने लेखन से अपना या समाज का कुछ भला करना चाहते हैं कि वे इस तरह की निरर्थक बातों में न फंसे।


ऊपर के दोनों लेख ब्लागरों के संबंधित थे। अनीताजी के सफ़र पर आई प्रतिक्रियाओं की मात्रा शशि सिंह के इंटरव्यू से काफ़ी अधिक है। इसके कारण शायद बोलहल्ला का अनियमित और लोगों द्वारा कम पढ़ा जाना हो!

चोखेरवाली के बारे में अमर उजाला में लेख छपा। संपादकीय कैंची के चलते कुछ नाम कट गये होंगे। रचनाजी ने इसपर अपना मत रखा। आप दोनों देख लें। इसके बाद चंद एक-लाइना बांचे।

१.स्त्रियों को अपढ रखें, और देखें परिणाम : वही ढाक के तीन पात!

२. शादी पर आउटसाइड सपोर्ट:मांगते हुये आलोक पुराणिक ने महिला दिवस की शुरुआत की।

३.स्वामी जी और गब्बर सिंह :दोनों एक साथ काकेश के अड्डे पर दिखे। पुलिस सतर्क!

४.नारी तुम केवल सबला हो । :गाने वाला नर अगला हो!

५.विवाहेतर संबंधों पर झूठ बोलना स्वीकार्य!? :मतलब कि झूठ बोलने के लिये भी विवाहेतर संबंध बनाने जरूरी हैं!

६.चार चिट्ठा चोर और आठ दस नंबरी :इनकौ इतिहास कौन लिखै!

७. क्या सचिन से जलते हैं धोनी? :सचिन इस बात को बखूबी समझते हैं! आपको क्या बतायें!

८.चोखेरबालियॉं अमरउजाला में : छा गयीं। लेकिन रचना सिंह छूट गयीं!रचना बजाज भी जी!

९.संघी ऊपर से नीचे तक इतने फ्रॉड क्यों हैं? :ये अन्दर की बात है जी।

१०.मेरी व्यस्तता और मंत्री का मुण्डन :दोनों प्रायोजित हैं!

११. और होली मनाने के बारे में ये लिखते हैं....: इनकी छ्वाडौ कुछ अपन सुनाओ!

१२.चोर बलैया ले :आलोक पुराणिक की।


मेरी पसंद


आज हमने छु लिया, तो वो गुलाबी हो गए |
देखकर उस रूप को, हम भी शराबी हो गए ||

मेरे सीने में सिमटकर, गिनते हैं वो धड़कने |
सांसे पढ़ पढ़ कर जरा हम भी किताबी हो गए ||

महफिले तेरी इनायत, चर्चा भी सरे आम है |
जिक्र तेरा कर के हम, हाजिर जवाबी हो गए ||

अब तो चेहरा बाँट कर, सच दिखा दो तुम प्रिये |
होगी मुश्किल गर् ये, आंसू भी नवाबी हो गए ||

विनोद कुमार

चिट्ठा चर्चा परिचय


दुनिया की किसी भी भाषा के चिट्ठे की चर्चा का प्रयास। इस प्रस्तुति में हमारी कोशिश होगी कि विभिन्न भाषाओं की चुनिंदा प्रविष्टियों का ज़िक्र करें।

चर्चाकार मंडली

Review My Blog at HindiBlogs.org

Read this Blog in Roman (English) , Gujarati, Bengali, Telugu, Tamil, Punjabi, Malayalam, Oriya, Kannada and Simhali Lipi.

चर्चा खोज


हालिया चर्चा

पाठक उवाच

पुरानी चर्चायें

कड़ियाँ

प्रबंधन