आज की चर्चा करने के पहिले कल की ग्राहक सेवा कर ली जाये।डा.अनुराग आर्य ने फ़रमाइश की कि कुछ लेखों की चर्चा की जाये:एक ही विषय को अलग अलग नजरिये से देखने का प्रयास .....यहाँ देखे ....पहली पोस्ट कबाडखाना से
ओर दूसरी पोस्ट महेश जी की तीसरी पोस्ट जिसे पाठको के लिए सिफारिश करना चाहूँगा ...वो है विधु जी की ये पोस्ट
ओर चौथी पोस्ट संजय जी की जो अभी लिखी गयी है आज ......इसके अलावा महेन की दूसरा प्यार की सिफारिश भी करना चाहूँगा ...
कबाड़खाना और महेशजी वाली पोस्टों में ओमपुरी की जीवनी पर मीडिया में बयानबाजी के बाद स्त्री/पुरुष के संबंधों की पड़ताल और लेखकों के विचार हैं। अंतरंग संबंधों पर लेखन : अवधारणा और बाजार में प्रख्यात कथाकार अब्दुल बिस्मिलाह का मानना है---इसमें संदेह नहीं कि आत्मकथा या कहानी के जरिए अपनी या अपने पति की जिंदगी के अंतरंग प्रसंगों को लिखा जाना एक साहस का काम है। इसे नकारात्मक ढंग से न लेकर सकारात्मक ढंग से लिया जाना चाहिए । ए क स्त्री ने जो झेला है, भोगा है, वह लिख रही है। लेकिन सवाल यह है कि इसका साहित्यिक स्तर क्या है। आ॓मपुरी के मामले में बाजार एक बड़ा फैक्टर है। स्त्रियों द्वारा अंतरंग प्रसंगों को लिखा जाने का मामला इतना सरल नहीं है जितना समझा जा रहा है। यह आत्मकथा है तो साहित्यिक स्तर देखा जाना चाहिए ।
वहीं कवियत्री अनामिका कहती हैं--सामान्यतौर से लोग नकारात्मक उदाहरणों से सीखते हैं। यह इसलिए लिखा जा रहा है कि आने वाली पीढ़ी अपनी मां, बहनों की तकलीफों को समझे। इसलिए संदर्भ सहित बातें रखी जाती हैं। क्योंकि जाने-अनजाने लोग ऐसा करने से एक बार सोचें। यह लेखन आत्मनिरीक्षण का एक अवसर देता है।
महेशजी पोस्ट में मैत्रेयी पुष्पा का लेख है। इस सारे मामले पर अपनी बात रखते हुये मैत्रेयीजी कहती हैं--अगर इस सच्चाई से संबंधित व्यक्ति आहत या क्रोधित होता है तो यह तय है कि वह अभी खुद को गिलाफों में छिपाकर रखना चाहता है।
मणिपुर की लोह स्त्री शर्मीला की कहानी - शर्मीला समय की उचाइयों पर...
में विधु जी शर्मीला के बारे में जानकारी देती हैं :
दरअसल ११सितम्बर १९५८ मैं बने ए ऍफ़ एस पी ए [आर्म्स फोर्स स्पेशल पॉवर एक्ट ]जिसे पूर्वोतर राज्यों अरुणाचल मेघालय असम मणिपुर नागालेंड और त्रिपुरा जैसे राज्यों मैं सेना को विशेष ताकत देने के लिए पारित किया गया था ]शर्मिला ने इस एक्ट के खिलाफ अकेले आवाज उठाई ,वर्तमान मैं शर्मिला के हक और पक्ष मैं सैकडों आवाजें मणिपुर की घाटियों मैं लगातार गूंज रही हें ...अपने राज्य मैं ए ऍफ़ एस पी ए की क्रूरता ,भ्रष्टचार और अमानवीयता के खिलाफ और इस एक्ट को समाप्त करने एवं अपने राज्य मैं शान्ति स्थापित करने के लिए उसने पिछले तकरीबन .9 सालों से मुँह से पानी की ना तो एक बूँद ग्रहण की है ना भोजन किया है ...उसे जबरदस्ती नाक से नली [ट्यूब ]द्वारा भोजन -पानी दिया जाता है ,साल मैं वो एक बार रिहा होती है और दुसरे दिन पुनः गिरफ्तार कर ली जाती है उसके रिहा और गिरफ्तार होने का सिलसिला पिछले 9 वर्षों से लगातार बदस्तूर जारी है,
इसके अलावा डाक्साब ने महेन के जिस दूसरे प्यार वाली कविता का जिक्र किया उसका लिंक नहीं दिया। है न गड़बड़झाला। दूसरे प्यार की बात जब आदमी करता है तो हवा नहीं देता। बहरहाल आप पहिले कविता बांच लीजिये पहिले तब बात की जाये:
दूसरे प्यार में नहीं लिखी जाती
पहली अर्थहीन प्रेम-कविता
पहला थरथराता चुंबन
नहीं लेता कोई दूसरे प्यार में
दूसरे प्यार के बारे में
नहीं लिखता कोई अभिज्ञान
और ना ही होता है शिला-लेखों में उसका वर्णन
मतलब साफ़ है। दूसरा प्यार हाथ बचाकर किया जाता है और पूरी कोशिश की जाती है कि सुबूत मिटा दिये जायें। हमने जब यही बात डा.अनुराग से कही कि मालिक दूसरा प्यार आयेगा पहले पहला प्यार तो निपट जाये। इस पर डा.साहब ने हमें हड़का दिया- ज्यादा मौज ठीक नहीं ठाकुर। हमें लगा सरदार गुस्से में है इसलिये पहिले उसकी पोस्टों लगा दो इसके बाद आगे का हिसाब किताब देखा जाये।
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सौ बातों की एक बात कहूँ. 'मुझे तुम्हारा शरीर चाहिए' मतलब कोई झाम नहीं कोई झांसा नहीं। ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर वाले अंदाज में लिखी इस अनगढ़ सी कविता को जब मैंने पढ़ा तो लगा कि जैसे कोई कहे मुंबई मराठी की है वैसे ही सागर हड़का के कह रहे हैं मुझे तुम्हारा शरीर चाहिये। फिलहाल, इसे प्यार कह लो या मेरी बेशर्म-बयानी... कहकर सागर ने अपनी बात कही। एक जवान बालक की हिम्मत कहें या बेवकूफ़ी कि वो ऐसे ठसके से ये बात कह रहा है। प्रेम के अन्य सभी उपादानों /अवयवों को फ़ुटा दिया। भाग जाओ तुम सब हमें केवल शरीर चाहिये। अर्जुन की तरह फ़ोकस साफ़। इस तरह की कविताओं पर शायद कोई आगे लिखे। शायद यह भी लिखे –इसमें कविता क्या है ये तो लफ़्फ़ाजी है। प्रेम को शरीर तक सीमित रखने का बचकाना प्रयास। लेकिन अब है तो है। आप देखे चाहे न देखें। सागर को जो कहना है कह दिया। रवि कुमार रावतभाटा ने इस कविता पर टिपियाया :बेहतर... अल्लेव साहब ने अगली कविता में स्तम्भ खुदै बनवा दिया। लटकाओ : सोचता हूँ... एक स्तम्भ बनवा दूँ शहर में! यहां चर्चाकार यह कहना चाहता है कि सागर जैसे जहीन-जवान बालक टिप्स दे रहे हैं कि प्यार-उवार में चांद,चातक, चांदनी-वांदनी की रोमानी शब्दावाली की जगह ये बिंदास माल लगा के देखा जाये। माइलेज ज्यादा मिलेगा। |
| पल्ल्वी त्रिवेदी पुलिस में अधिकारी हैं। अब अगर वे लिखें --जी चुरा ले गया वो टूटे दांत वाला लड़का.... तो कोई अनजान आदमी तो यही कहेगा न कि जब पुलिस वाले अपना ही सामान चोरी जाने से नहीं बचा पा रहे हैं तो दूसरे की चोरी क्या बचायेंगे? लेकिन नहीं भैया मामला थोड़ा और टाइप का है। मासूम और प्यारा और दुलारा। कहानी आप उधरिच बांचिये।आनन्दित होने की गारण्टी है। पल्लवी की इस पोस्ट पर कुश ने टिपियाया है--वाह.. दिल ले गयी ये पोस्ट तो.. बड़े दिनों बाद की आमद और वो भी इतनी खुशनुमा.. आज ही मैंने भी एक पोस्ट ठोंकी है.. |
| अब बताओ दिल की चोरी भी वायरसी इफ़ेक्ट है गोया। भोपाल में चोरी होगी तो जयपुर में भी वारदात होगी। लेकिन हमको तो पता है कि कुश का असल मकसद तो अपनी पोस्ट की जानकारी देना है। वे इस पोस्ट में शादी-विवाह का आंखो देखा हाल सुना रहे हैं जसदेव सिंह बने हुये। देख लीजिये थोड़ा मन रह जायेगा बालक का।दूल्हा वर्णन करते हुये बालक लिखता है: अब जब बिना दूल्हा बने कुश ई सब बता सकते हैं तो हम काहे नहीं जो आलरेडी दूल्हागिरी छांट चुके हैं। अपने लेख में दूल्हे के बारे में लिखते हुये मैंने लिखा था: बारात का केन्द्रीय तत्व तो दूल्हा होता है। जब मैं किसी दूल्हे को देखता हूं तो लगता है कि आठ-दस शताब्दियां सिमटकर समा गयीं हों दूल्हे में।दिग्विजय के लिये निकले बारहवीं सदी किसी योद्धा की तरह घोड़े पर सवार।कमर में तलवार। किसी मुगलिया राजकुमार की तरह मस्तक पर सुशोभित ताज (मौर)। आंखों के आगे बुरकेनुमा फूलों की लड़ी-जिससे यह पता लगाना मुश्किल कि घोड़े पर सवार शख्स रजिया सुल्तान हैं या वीर शिवाजी ।पैरों में बिच्छू के डंकनुमा नुकीलापन लिये राजपूती जूते। इक्कीसवीं सदी के डिजाइनर सूट के कपड़े की बनी वाजिदअलीशाह नुमा पोशाक। गोद में कंगारूनुमा बच्चा (सहबोला) दबाये दूल्हे की छवि देखकर लगता है कि कोई सजीव बांगड़ू कोलाज चला आ रहा है। बच्चा कुश को शताब्दियों के कोलाज के रूप में कब देख पायेंगे? |
सवाल अस्तित्व का.............में इस बात पर विचार किया है कि अपने समाज में विवाह के बाद लड़कियों के नाम बदल जाते हैं। सुनिये वन्दना अवस्थी से! लेकिन नहीं भाई वे वन्दना अवस्थी तो विवाह के पहले थीं। विवाह के बाद तो उनका सरनेम बदलना होगा। वे वंदना अवस्थी से वंदना अवस्थी दुबे हो गयें। अपने नाम अवस्थी बचाने के लिये उनको मेहनत भी करनी पड़ी। वे बताती हैं: |
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शादी आज भी एक जरुरी चीज़ हैं औरत को औरत समझे जाने के लिये । ये सवाल सुमन जिंदल ने उठाया है। वे लिखती हैं:कै का चुनाव बड़ा मुद्दा हैं उन महिला के लिये जो शादी करके पारिवारिक सुख की कामना भी करती हैं । बहुत से करियर ऐसे हैं जहाँ बहुत सी चीजों को छोड़ना होता हैं । भारतीय समाज की यही विडम्बना हैं की आज भी औरत की मजबूती या कमजोरी प्रजनन की क्षमता से की जाती हैं । शादी आज भी एक जरुरी चीज़ हैं औरत को औरत समझे जाने के लिये । |
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दुनिया ने तजुर्बातो हवादिश की शक्ल में जो कुछ मुझे दिया वो लौटा रहा हूं मैं" -शिल्पकार 100 वीं पोस्ट यह कहते हुये ललित शर्माजी ने अपनी सौवीं पोस्ट पूरी की। ललित शर्माजी को बधाई! ब्लागिंग की दुनिया के बारे में उनका कहना है--यदि किसी बीमार आदमी को, जो मरने वाला हो और इस ब्लॉग की दुनिया से जोड़ दिया जाये तो उसे ले जाने वाले यमदूत भी भाग जायेंगे. और वह ठीक हो जायेगा. ललितजी तो लगता है सबरे अस्पताल बंद करवा देंगे। मेडिकल कालेज में ब्लागिंग सेमिनार करवाने का विचार है भाईजी का!! ये फोटू भी गजब है न! सौवीं पहेली के विजेता की सौंवी पोस्ट ! क्या शानदार जोड़ा है।बधाई हो जी शानदार! |
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उनके बारे में बताते हुये बोधिसत्व ने लिखा: शिरीष की कविता पर कुछ न कहना चाहते हुए भी यह कह रहा हूँ कि हिंदी में कम कवि हैं जिनके पास इतनी सुगठित भाषा और विराट भाव संसार है। |
एक लाईना |
मेरी पसंद
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अंधियारे के जितने भी थे संबन्धी दहलीजों ने भेजा जिनको कभी नहीं कोई आमंत्रण अभिलाषा की हर कोंपल को बीन बहारें साथ ले गईं सन्ध्या ने करील के झुरमुट में जितने भी दीपक टाँगे रजनी के आँचल में सिमटे अभिलाषा के निशा-पुष्प सब जीवन की गति को विराम दे गई शपथ वह एक अधूरी राकेश खण्डेलवाल |
और अंत में
चर्चा का काम हम सुबहै कर लिये थे। लेकिन इसके बाद कम्प्यूटर लटक गवा बोले तो हैंग कर गवा। उसको लटका ही छोड़कर हम दफ़्तर चले गये। शाम को घर आये तो लटका हुआ कम्प्यूटर औकात में आ गया था और पोस्ट नेट पर जाने के लिये बेचैन। इस बीच देखे कि आदि चिट्ठाकार आलोक कुमार एक ठो पोस्ट ठेल चुके थे। उसका भी उठा लीजिये लुत्फ़ देखिये--मिस्र ने पहले ग़ैर - रोमन डोमेन नाम के लिए आवेदन किया – .।
अब फ़िलहाल इतना ही। कल की चर्चा अब क्या करें सुबह? देखा जायेगा। अभी तो मौज करें। वैसे आज बता दें कि चर्चा का दिन कुश का था। लेकिन बालक लगता है अपना बाजा बजवाने के लिए बारात रिहर्सल में जुटा है।
कल की चर्चा का दिन शिवकुमार मिसिर का होता है लेकिन वे आजकल आरामफ़र्मा हैं। बीमार फ़र्मा होकर आरामफ़र्मा रहे हैं। इंशाअल्लाह जल्दी ही ठीक-ठाक होकर आपसे रूबरू होंगे।
तौ अब हमें चली। आप मौज करो। जो होगा देखा जायेगा। :)
दुनिया ने तजुर्बातो हवादिश की शक्ल में जो कुछ मुझे दिया वो लौटा रहा हूं मैं" -शिल्पकार 100 वीं पोस्ट
उदरम्भरि बन अनात्म बन गये,
अजीब सी हालत हो गई थी हम सब की। खासकर पिताजी की। सारा पैसा पानी में चला गया। पहले ही इतना कर्ज हो चुका था। मैं सोचने लगा अब आगे क्या होगा। अगले दिन हम सब बैठे हुए थे तब मैंने पिताजी से पूछा “अब क्या होगा पापा?” उनका जवाब एक लाईन में आया “अभी हाथ नही गड़े धरती में मेरे” और बाहर निकल गए। आज भी कोई परेशानी आती है तो पिताजी के कहे ये शब्द मुसीबतों से लड़ने का ज़ज़्बा दे जाते है।
क्या हमारे कंसर्न से ही किसान गायब है? विदर्भ से लेकर बुंदेलखंड तक किसानों की आत्महत्याएं क्या हमें आंदोलित नहीं करतीं? मुक्त बाज़ार से लेकर दलित और स्त्री विमर्श करने वाले हमलोग क्या सचमुच आत्मरति के शिकार हैं? जबकि मुक्त बाज़ार के मसीहा खाद्यान्न का कोई विकल्प नहीं ढूंढ सके हैं ऐसे में सचमुच सृजन करने वाले किसान के पक्ष में न बोलना हमारे समय में गद्दारी नहीं? सुधा के शब्द उधार लेकर कहें तो क्या ये साइलेंस ऑफ़ वायलेंस नहीं?











नौकरी न कीजिये, घास खोद खाईये
हमारी राय में तो आप अपना व्यवसाय ही करे तो सही है :)
आप तनावग्रस्त महिलाओं की मदद करें तो भला है
(लेकिन ये सेवा तनावग्रस्त पुरुषों के लिये कभी भी भूल कर उपलब्ध नहीं कराईयेगा...)
दुसरे वाला जॉब ठीक रहेगा....कल को काम ही आएगा साथ में ट्रेनिंग भी हो जायेगी....