१८-११-२००९

पहला थरथराता चुंबन नहीं लेता कोई दूसरे प्यार में

 

आज की चर्चा करने के पहिले कल की ग्राहक सेवा कर ली जाये।डा.अनुराग आर्य ने फ़रमाइश की कि कुछ लेखों की चर्चा की जाये:एक ही विषय को अलग अलग नजरिये से देखने का प्रयास .....यहाँ देखे ....पहली पोस्ट कबाडखाना से
ओर दूसरी पोस्ट महेश जी की तीसरी पोस्ट जिसे पाठको के लिए सिफारिश करना चाहूँगा ...वो है विधु जी की ये पोस्ट
ओर चौथी पोस्ट
संजय जी की जो अभी लिखी गयी है आज ......इसके अलावा महेन की दूसरा प्यार की सिफारिश भी करना चाहूँगा ...

image कबाड़खाना और महेशजी वाली पोस्टों में ओमपुरी की जीवनी पर मीडिया में बयानबाजी के बाद स्त्री/पुरुष के संबंधों की पड़ताल और लेखकों के विचार हैं। अंतरंग संबंधों पर लेखन : अवधारणा और बाजार में प्रख्यात कथाकार अब्दुल बिस्मिलाह का मानना है---इसमें संदेह नहीं कि आत्मकथा या कहानी के जरिए अपनी या अपने पति की जिंदगी के अंतरंग प्रसंगों को लिखा जाना एक साहस का काम है। इसे नकारात्मक ढंग से न लेकर सकारात्मक ढंग से लिया जाना चाहिए । ए क स्त्री ने जो झेला है, भोगा है, वह लिख रही है। लेकिन सवाल यह है कि इसका साहित्यिक स्तर क्या है। आ॓मपुरी के मामले में बाजार एक बड़ा फैक्टर है। स्त्रियों द्वारा अंतरंग प्रसंगों को लिखा जाने का मामला इतना सरल नहीं है जितना समझा जा रहा है। यह आत्मकथा है तो साहित्यिक स्तर देखा जाना चाहिए ।

image वहीं कवियत्री अनामिका कहती हैं--सामान्यतौर से लोग नकारात्मक उदाहरणों से सीखते हैं। यह इसलिए लिखा जा रहा है कि आने वाली पीढ़ी अपनी मां, बहनों की तकलीफों को समझे। इसलिए संदर्भ सहित बातें रखी जाती हैं। क्योंकि जाने-अनजाने लोग ऐसा करने से एक बार सोचें। यह लेखन आत्मनिरीक्षण का एक अवसर देता है।

महेशजी पोस्ट में मैत्रेयी पुष्पा का लेख है। इस सारे मामले पर अपनी बात रखते हुये मैत्रेयीजी कहती हैं--अगर इस सच्चाई से संबंधित व्यक्ति आहत या क्रोधित होता है तो यह तय है कि वह अभी खुद को गिलाफों में छिपाकर रखना चाहता है।

मणिपुर की लोह स्त्री शर्मीला की कहानी - शर्मीला समय की उचाइयों पर...

में विधु जी शर्मीला के बारे में जानकारी देती हैं :image दरअसल ११सितम्बर १९५८ मैं बने ए ऍफ़ एस पी ए [आर्म्स फोर्स स्पेशल पॉवर एक्ट ]जिसे पूर्वोतर राज्यों अरुणाचल मेघालय असम मणिपुर नागालेंड और त्रिपुरा जैसे राज्यों मैं सेना को विशेष ताकत देने के लिए पारित किया गया था ]शर्मिला ने इस एक्ट के खिलाफ अकेले आवाज उठाई ,वर्तमान मैं शर्मिला के हक और पक्ष मैं सैकडों आवाजें मणिपुर की घाटियों मैं लगातार गूंज रही हें ...अपने राज्य मैं ए ऍफ़ एस पी ए की क्रूरता ,भ्रष्टचार और अमानवीयता के खिलाफ और इस एक्ट को समाप्त करने एवं अपने राज्य मैं शान्ति स्थापित करने के लिए उसने पिछले तकरीबन .9 सालों से मुँह से पानी की ना तो एक बूँद ग्रहण की है ना भोजन किया है ...उसे जबरदस्ती नाक से नली [ट्यूब ]द्वारा भोजन -पानी दिया जाता है ,साल मैं वो एक बार रिहा होती है और दुसरे दिन पुनः गिरफ्तार कर ली जाती है उसके रिहा और गिरफ्तार होने का सिलसिला पिछले 9 वर्षों से लगातार बदस्तूर जारी है,

इसके अलावा डाक्साब ने महेन के जिस दूसरे प्यार वाली कविता का जिक्र किया उसका लिंक नहीं दिया। है न गड़बड़झाला। दूसरे प्यार की बात जब आदमी करता है तो हवा नहीं देता। बहरहाल आप पहिले कविता बांच लीजिये पहिले तब बात की जाये:

दूसरे प्यार में नहीं लिखी जाती
पहली अर्थहीन प्रेम-कविता
पहला थरथराता चुंबन
नहीं लेता कोई दूसरे प्यार में
दूसरे प्यार के बारे में
नहीं लिखता कोई अभिज्ञान
और ना ही होता है शिला-लेखों में उसका वर्णन

मतलब साफ़ है। दूसरा प्यार हाथ बचाकर किया जाता है और पूरी कोशिश की जाती है कि सुबूत मिटा दिये जायें। हमने जब यही बात डा.अनुराग से कही कि मालिक दूसरा प्यार आयेगा पहले पहला प्यार तो निपट जाये। इस पर डा.साहब ने हमें हड़का दिया- ज्यादा मौज ठीक नहीं ठाकुर। हमें लगा सरदार गुस्से में है इसलिये पहिले उसकी पोस्टों लगा दो इसके बाद आगे का हिसाब किताब देखा जाये।

image एक ठो नये उस्ताद हैं सागर । जब मन आता है अपने सागर से कोई मोती निकालकर थमा देते हैं। अनगढ। जाओ बच्चा मौजकरो इस्टाइल में।कुछ दिन पहले उन्होंने लिखा:

सौ बातों की एक बात कहूँ.

'मुझे तुम्हारा शरीर चाहिए'

मतलब कोई झाम नहीं कोई झांसा नहीं। ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर वाले अंदाज में लिखी इस अनगढ़ सी कविता को जब मैंने पढ़ा तो लगा कि  जैसे कोई कहे मुंबई मराठी की है वैसे ही सागर हड़का के कह रहे हैं मुझे तुम्हारा शरीर चाहिये।

फिलहाल,

इसे प्यार कह लो

या

मेरी बेशर्म-बयानी...

कहकर सागर ने अपनी बात कही। एक जवान बालक की हिम्मत कहें या बेवकूफ़ी कि वो ऐसे ठसके से ये बात कह रहा है। प्रेम के अन्य सभी उपादानों /अवयवों को फ़ुटा दिया। भाग जाओ तुम सब हमें केवल शरीर चाहिये। अर्जुन की तरह फ़ोकस साफ़। इस तरह की कविताओं पर शायद कोई आगे लिखे। शायद यह भी लिखे –इसमें कविता क्या है ये तो लफ़्फ़ाजी है। प्रेम को शरीर तक सीमित रखने का बचकाना प्रयास। लेकिन अब है तो है। आप देखे चाहे न देखें। सागर को जो कहना है कह दिया।

रवि कुमार रावतभाटा ने इस कविता पर टिपियाया :बेहतर...
प्रेम की अवधारणा को चुनौती दे रहें हैं आप?
भावुक लोग आपके लिए एक स्तम्भ बनवा देंगे...

अल्लेव साहब ने अगली कविता में स्तम्भ खुदै बनवा दिया। लटकाओ :

सोचता हूँ...

एक स्तम्भ बनवा दूँ शहर में!

यहां चर्चाकार यह कहना चाहता है कि सागर जैसे जहीन-जवान बालक टिप्स दे रहे हैं कि प्यार-उवार में चांद,चातक, चांदनी-वांदनी की रोमानी शब्दावाली की जगह ये बिंदास माल लगा के देखा जाये। माइलेज ज्यादा मिलेगा।

पल्ल्वी त्रिवेदी पुलिस में अधिकारी हैं। अब अगर वे लिखें --जी चुरा ले गया वो टूटे दांत वाला लड़का.... तो कोई अनजान आदमी तो यही कहेगा न कि जब पुलिस वाले अपना ही सामान चोरी जाने से नहीं बचा पा रहे हैं तो दूसरे की चोरी क्या बचायेंगे? लेकिन नहीं भैया मामला थोड़ा और टाइप का है। मासूम और प्यारा और दुलारा। कहानी आप उधरिच बांचिये।आनन्दित होने की गारण्टी है।

पल्लवी की इस पोस्ट पर  कुश ने टिपियाया है--वाह.. दिल ले गयी ये पोस्ट तो.. बड़े दिनों बाद की आमद और वो भी इतनी खुशनुमा.. आज ही मैंने भी एक पोस्ट ठोंकी है..

अब बताओ दिल की चोरी भी वायरसी इफ़ेक्ट है गोया। भोपाल में चोरी होगी तो जयपुर में भी वारदात होगी। लेकिन हमको तो पता है कि कुश का असल मकसद तो अपनी पोस्ट की जानकारी देना है। वे इस पोस्ट में शादी-विवाह का आंखो देखा हाल सुना रहे हैं जसदेव सिंह बने हुये। देख लीजिये थोड़ा मन रह जायेगा बालक का।दूल्हा वर्णन करते हुये बालक लिखता है:image दुल्हे के बिना बारात कैसी.. ? घोड़े पर बैठा दूल्हा बारात का हिस्सा कभी नहीं होता वो बात अलग है कि बारात उसी की होती है.. हिसाब से उसको सबसे आगे चलना चाहिए पर वो बेचारा सबसे पीछे घोड़ी पर अपने नाते रिश्तेदारों के बच्चो को अपने पीछे बैठाये चुपचाप बर्दाश्त करता रहता है.. और लोग बाग़ भी कम नहीं है.. घोड़ी के पीछे ऐसे ऐसे मुस्टंडे बच्चे बिठा देते है.. कि घोड़ी ही बैठ जाए.. पर हाँ दूल्हा इसी बात से खुश हो जाता है कि चलो जनरेटर वाला तो उसके पीछे है..

अब जब बिना दूल्हा बने कुश ई सब बता सकते हैं तो हम काहे नहीं जो आलरेडी दूल्हागिरी छांट चुके हैं। अपने लेख में दूल्हे के बारे में लिखते हुये मैंने लिखा था: बारात का केन्द्रीय तत्व तो दूल्हा होता है। जब मैं किसी दूल्हे को देखता हूं तो लगता है कि आठ-दस शताब्दियां सिमटकर समा गयीं हों दूल्हे में।दिग्विजय के लिये निकले बारहवीं सदी किसी योद्धा की तरह घोड़े पर सवार।कमर में तलवार। किसी मुगलिया राजकुमार की तरह मस्तक पर सुशोभित ताज (मौर)। आंखों के आगे बुरकेनुमा फूलों की लड़ी-जिससे यह पता लगाना मुश्किल कि घोड़े पर सवार शख्स रजिया सुल्तान हैं या वीर शिवाजी ।पैरों में बिच्छू के डंकनुमा नुकीलापन लिये राजपूती जूते। इक्कीसवीं सदी के डिजाइनर सूट के कपड़े की बनी वाजिदअलीशाह नुमा पोशाक। गोद में कंगारूनुमा बच्चा (सहबोला) दबाये दूल्हे की छवि देखकर लगता है कि कोई सजीव बांगड़ू कोलाज चला आ रहा है।

बच्चा कुश को शताब्दियों के कोलाज के रूप में कब देख पायेंगे?

सवाल अस्तित्व का.............में इस बात पर विचार किया है कि अपने समाज में विवाह के बाद लड़कियों के नाम बदल जाते हैं। सुनिये वन्दना अवस्थी से! लेकिन नहीं भाई वे वन्दना अवस्थी तो विवाह के पहले थीं। विवाह के बाद तो उनका सरनेम बदलना होगा। वे वंदना अवस्थी से वंदना अवस्थी दुबे हो गयें। अपने नाम अवस्थी बचाने के लिये उनको मेहनत भी करनी पड़ी। वे बताती हैं:image

खुद मुझे अपने नाम को बचाए रखने के लिए, अपने सरनेम को लगाये रखने के लिए ज़द्दोज़हद करनी पड़ी है, तब जबकि हमारा परिवार बहुत शिक्षित और उच्च पदाधिकारियों का परिवार है. लम्बे समय तक मेरे द्वारा "अवस्थी" का इस्तेमाल करने पर परोक्ष और कभी-कभी प्रत्यक्ष भी टीका-टिप्पणी हुई. जबकि दोनों परिवारों का मान रखने के लिए मैंने दोनों सरनेम अपनाए हुए थे. लेकिन अब परिवार ने इसे स्वीकार कर लिया है, अनमने ढंग से ही सही.

 

 

शादी आज भी एक जरुरी चीज़ हैं औरत को औरत समझे जाने के लिये । ये सवाल सुमन जिंदल ने उठाया है। वे लिखती हैं:कै का चुनाव बड़ा मुद्दा हैं उन महिला के लिये जो शादी करके पारिवारिक सुख की कामना भी करती हैं । बहुत से करियर ऐसे हैं जहाँ बहुत सी चीजों को छोड़ना होता हैं । भारतीय समाज की यही विडम्बना हैं की आज भी औरत की मजबूती या कमजोरी प्रजनन की क्षमता से की जाती हैं । शादी आज भी एक जरुरी चीज़ हैं औरत को औरत समझे जाने के लिये ।

 

image दुनिया ने तजुर्बातो हवादिश की शक्ल में जो कुछ मुझे दिया वो लौटा रहा हूं मैं" -शिल्पकार 100 वीं पोस्ट यह कहते हुये ललित शर्माजी ने अपनी सौवीं पोस्ट पूरी की। ललित शर्माजी को बधाई! ब्लागिंग की दुनिया के बारे में उनका कहना है--यदि किसी बीमार आदमी को, जो मरने वाला हो और इस ब्लॉग की दुनिया से जोड़ दिया जाये तो उसे ले जाने वाले यमदूत भी भाग जायेंगे. और वह ठीक हो जायेगा. ललितजी तो लगता है सबरे अस्पताल बंद करवा देंगे। मेडिकल कालेज में ब्लागिंग सेमिनार करवाने का विचार है भाईजी का!!
ये फोटू भी गजब है न! सौवीं पहेली के विजेता की सौंवी पोस्ट ! क्या शानदार जोड़ा है।

बधाई हो जी शानदार!

image शिरीष मौर्य को  को युवा कविता के लिए प्रगतिशील वसुधा द्वारा संयोजित तथा लीलाधर मंडलोई द्वारा अपने पिता की स्मृति में स्थापित लक्ष्मण प्रसाद मंडलोई सम्मान (वर्ष २००९) शिरीष को उनके तीसरे कविता संग्रह "पृथ्वी पर एक जगह" के लिए दिया गया है। शिरीष को सम्मान देने की अनुशंसा विष्णु नागर, चंद्रकांत देवताले तथा अरुण कमल के तीन सदस्यीय निर्णायक मंडल ने सर्वानुमति से की है।

उनके बारे में बताते हुये बोधिसत्व ने लिखा: शिरीष की कविता पर कुछ न कहना चाहते हुए भी यह कह रहा हूँ कि हिंदी में कम कवि हैं जिनके पास इतनी सुगठित भाषा और विराट भाव संसार है।
शिरीष को इस सम्मान के लिए बधाई ।

एक लाईना
image 1.बा'रा'त निकली है... तो दूर तलक जायेगी...: बारात निकल ली हमको बुलाया तक नहीं! हम बाजा बजा देंगे।

2.अपने नींड में लौटने को व्याकुल एक परिंदा========दीपक 'मशाल': बस का इंतजार कर रहा होगा

 

3.दीवाना हुआ बादल.....: कोई पकड़ के शादी करा देगा निकल जायेगी सब दीवानगी

 

4.सचिन पर बाउन्सर मत फेंको ..: वो सौरभ गांगुली नहीं है, छक्का पड़ जायेगा।

 

5. और जब मै भी कार्टून बनाने बैठा तो.....: अपने आप खुद की तस्वीर बना गया

 

6. आपातकालीन गर्भनिरोधक क्या कोई आपदा तो नहीं लाएगा?: लायेगा तो देखा जायेगा। इत्ती आपदायें झेलते हैं एक और सही।

7.लड़की भगाकर अर्थात् हरण करके उससे विवाह करने का चलन पौराणिक काल से चला आ रहा है: अब भी परम्परा निर्वाह धड़ल्ले से हो रहा है।

8.अब समय आ गया है हिन्दुविरोधी-देशद्रोही जिहाद व धर्मांतरण समर्थक सैकुलर गिरोह के भ्रामक दुष्प्रचार को खत्म करनें का: समय की सरकार अपने दम पर है या गठबंधन सरकार है?

9.अमर उजाला में 'शब्द-शिखर' ब्लॉग की चर्चा: लोगों को बिना चर्चा के चैन नहीं पड़ता आजकल।

10.दारोगा - ऐ - जिन्दान इनके 'पंख कलम' कर दो !: जो हुकुम मेरे आका। आप अगली पोस्ट लिखो। ये काम तो समझो हो गया।

 

11.दुनिया या प्रेम में खुलती खिड़की: सालों साल ताकी जाती हैं भाई जान!

 

12.शर्ट पर ठहरी हुई सिलवट: पर जरा प्रेस मार लिये होते तिवारी जी, इत्ते ब्लागर आते जाते देखते हैं।

13.एक रुपया कहां से आया...खुशदीप: इसे हिसाब की कापी में क्यॊं नही चढ़ाया?

14.कहे कवि सुनो तब नानी याद आ जाये:टूटे फूटे पंहुचे घर जब भंग सर चढ़ जाये

15.मल्टी-नेशनल बोतल में दो लीटर गंगा!: मन चंगा तो कठौती में गंगा।
16.हमी से मोहब्बत, हमीं से लड़ाई …: ई त अच्छा राग् है भाई!!!

17.हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन, हिन्दुओं के पैसे से .....: बोले तो मियां की जूती मियां की चांद

 

18. क्या बच्चे पैदा करना औरतों की कमज़ोरी है?: ये भी कोई पूछने की बात है ।

19.स्वप्न देखने के लिये टिकट लेना कतई ज़रूरी नहीं है ।: ये बढ़िया गुरु! बिना टिकट रेल पर बैठकर सो जाओ। टीटी टिकट मांगे तो कह दो हम तो सपना देख रहे हैं।

20.साला! मालूम कैसे चलेगा कि मुसलमान है?: देख लो मेकेनिक है तो मुसलमान वर्ना कुछ और।

21.लड़की ने सलमान को थप्पड़ मारा: लड़की ने जो शराब पी थी उसका नाम भी बताओ भाई।


मेरी पसंद

image उस,
भीड़ भरी गली जिसमें
मैं यूँ ही ठेला जा रहा था
जैसे हम अक्सर गुजार देते हैं जिन्दगी
ना कुछ अपनी /
ना अपना कोई कन्ट्रोल
बस बहाव के साथ चलते
रहने की मजबूरी
तुम,
उस दिन मुझे फिर दिखायी दिये थे
उसी भीड़ भरे रैले में
फिसलते हुये उंगलियों से छूटती गई
तुम्हारी कलाई
तुम ठहर गये मेरे शर्ट पर
किसी सलवट की तरह
और तुम्हारे पलटे हुये कॉलर ने
पूछा था मेरा हाल
कानों में फुसफुसाते हुये
मैंने,
महसूस किया था उस दिन भी
तुम्हारी साँसों में
बची रह गई गर्मी को /
तुम्हारे पसीने की गंध में
महकती अधपकी रोटियों को /
उस भीड़ के सीने पर
तुम्हारे जमे हुये कदमों को
और,
अपने उखड़ते हुये कदमों पर
तरस भी आया था
शायद,
तुम अब भी
उसी चूल्हे से चिपके हुये हो
बिल्कुल नही बदले
हालांकि,
मैंने अपनी पाठशाला में पढ़ा था
कि सदाचार के चूल्हे पर
नैतिकता की आँच से रोटियाँ नही सिंकती
और तुम तो जानते ही हो कि
कि अधपकी रोटियाँ कच्च-कच्च करती हैं दाँतों में
मुझे,
अधपकी रोटियों से आती है
आटे की गंध
मैं,
कच्ची रोटियाँ नही खा सकता

मुकेश कुमार तिवारी

image मिलते रहिये मिलाते रहिये
लोगों से बतियाते रहिये
शायद बात कोई बन जाये !
देखते रहिये दिखाते रहिये
सपनों को चमकाते रहिये
शायद कोई सच हो जाये !
राह को एक पकड के रहिये
चलते रहिये चलते रहिये
शायद मंजिल ही मिल जाये !
बूंदो पर भरोसा रखिये
बूंद बूंद जमाते रहिये
शायद गागर भी भर जाये !
मेरे करने से क्या होगा
ना सोचें, बस करते रहिये
काम कोई पूरा हो जाये !
हंसते रहिये हंसाते रहिये
काम किसी के आते रहिये
शायद जीवन फल पा जायें ।

आशा जोगलकर

अंधियारे के जितने भी थे संबन्धी

दहलीजों ने भेजा जिनको कभी नहीं कोई आमंत्रण
अंधियारे के जितने भी थे संबन्धी बन अतिथि आ गये
नभ ने गलियारों के परदे हटा किरण को पास बुलाया
लेकिन क्षितिजों पर से उमड़े बादल गहरे घने छा गये

अभिलाषा की हर कोंपल को बीन बहारें साथ ले गईं
जीवन की फुलवारी केवल बंजर की पहचान हो गई
यौवन की पहली सीढ़ी पर पूजा की अभिशापित लौ ने
झुलसायी आँखों में सँवरे सपनों की हर इक अँगड़ाई

सन्ध्या ने करील के झुरमुट में जितने भी दीपक टाँगे
उनसे दिशा प्राप्त करने में असफ़ल हो रह गई जुन्हाई

रजनी के आँचल में सिमटे अभिलाषा के निशा-पुष्प सब
और एक यह घटना जैसे पतझर को वरदान हो गई
जितनी भी रेखायें खींची, बनी सभी बाधायें पथ की
खड़ी हो गईं आ मोड़ों पर अवरोधों के फन फ़ैलाये

जीवन की गति को विराम दे गई शपथ वह एक अधूरी
जो गंगा के तट हमने ली थी हाथों में नीर उठाये
होठों पर की हँसी दिशायें बदल बदल आँखों तक पहुंची
और बही बन धारायें जो गज़लों का उन्वान हो गईं

राकेश खण्डेलवाल

और अंत में 

चर्चा का काम हम सुबहै कर लिये थे। लेकिन इसके बाद कम्प्यूटर लटक गवा बोले तो हैंग कर गवा। उसको लटका ही छोड़कर हम दफ़्तर चले गये। शाम को घर आये तो लटका हुआ कम्प्यूटर औकात में आ गया था और पोस्ट नेट पर जाने के लिये बेचैन। इस बीच देखे कि आदि चिट्ठाकार आलोक कुमार एक ठो पोस्ट ठेल चुके थे। उसका भी उठा लीजिये लुत्फ़ देखिये--मिस्र ने पहले ग़ैर - रोमन डोमेन नाम के लिए आवेदन किया – .

अब फ़िलहाल इतना ही। कल की चर्चा अब क्या करें सुबह? देखा जायेगा। अभी तो मौज करें। वैसे आज बता दें कि चर्चा का दिन कुश का था। लेकिन बालक लगता है अपना बाजा बजवाने के लिए बारात रिहर्सल में जुटा है।

कल की चर्चा का दिन शिवकुमार मिसिर का होता है लेकिन वे आजकल आरामफ़र्मा हैं। बीमार फ़र्मा होकर आरामफ़र्मा रहे हैं। इंशाअल्लाह जल्दी ही ठीक-ठाक होकर आपसे रूबरू होंगे।

तौ अब हमें चली। आप मौज करो। जो होगा देखा जायेगा। :)

मिस्र ने पहले ग़ैर - रोमन डोमेन नाम के लिए आवेदन किया - .مصر

मिस्र वालों ने .मिस्र - लेकिन अरबी में - .مصر - नाम के लिए आवेदन कर दिया है। वैसे मिस्र के डोमेन नाम .eg वाले हैं - जैसे भारत के .in हैं। ये भी खूब रहा - रोमन तो छोड़ा ही, दाएँ से बाएँ भी, यानी एक तो परवल की मिठाई, और ऊपर से आँवले का मुरब्बा भी! अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह।


खबर देने के लिए सागर नाहर को धन्यवाद। वैसे मिस्र की अरबी मैंने गूगल अनुवादक से उठाई है, अगर कोई गलती हो तो ठीक कर दें, यूँ अपना इस मामले में अलिफ़ के आगे भूरा अक्षर ऊँट बराबर ही है।

१७-११-२००९

जो चले वे ही आगे बढ़े

आजकल नेट पर मुक्तिबोध जन्मदिन सप्ताह मनाया जा रहा है। इस मौके पर आयी पोस्टें ब्लागवाणी ने यहां संकलित की हैं। देखिये।
मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में के ये अंश मुझे अक्सर याद आते हैं:
उदरम्भरि बन अनात्म बन गये,
भूतों की शादी में क़नात-से तन गये,
किसी व्यभिचार के बन गये बिस्तर,

दुःखों के दाग़ों को तमग़ों-सा पहना,
अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना,
असंग बुद्धि व अकेले में सहना,
ज़िन्दगी निष्क्रिय बन गयी तलघर,

अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया!!

बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गये,
करुणा के दृश्यों से हाय! मुँह मोड़ गये,
बन गये पत्थर,
बहुत-बहुत ज़्यादा लिया,
दिया बहुत-बहुत कम,
मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम!!

व्यभिचार के बिस्तर के साथ न तो व्यभिचार होता है न वह व्यभिचार करता है लेकिन वह व्यभिचार में सहायक होता है। इनकी संख्या बढ़ रही है।

मुक्तिबोध मराठी माणूस थे। हिन्दी कवि। इधर कल ठाकरे साहब ने तेन्दुलकर को समझाइस दी कि वे मुंबई को सबकी बताकर राजनीति न करें। सचिन कोई राजनीतिज्ञ तो हैं नहीं। लेकिन उनके सहज बयान पर राजनीति कर गये उनके प्रशंसक।इस पर प्रदीप परिहार ने उनको समझाइश दी:
मुझे नहीं लगता इस बयान से शिवसेना के वोट बैंक में इजाफा में होगा । असल में पिछले सत्ताह एसबीआई भर्ती परीक्षा में केवल मराठीमानुष का मुद्दा उठाकर राज ठाकरे मीडिया में थे ।अब सचिन का अपमान करके बाल ठाकरे मीडिया में बने हुए है । दोनों ही चाचा बतीजे को हमारी सलाह ये है कि अभी भी वक्त है सुधर जाओं । नहीं ंतो मराठी जनता ही तुम दोनों को सबक सिखाएगी ।


हम तो मनोरंजन के लिये सिनेमा देखते हैं यह सब देखना है तो ... पैसे क्यों खर्च करें में दर्शकों की सिनेमा के बारे में समझ की तरफ़ इशारा करते हुये शरद कोकास ने लिखा:
लेकिन इस बीच दर्शकों की एक नई समझ विकसित हुई है और वे बेसिर-पैर की फिल्मों को नकार रहे हैं इनमें न केवल भूत-प्रेत,अपराध, फूहड़ हास्य ,सस्ते रोमांस आदि की फिल्में है बल्कि दर्शक तकनीकी दृष्टि से कमज़ोर फिल्मों को भी नापसन्द कर रहा है । इसके बावज़ूद निर्माता करोड़ों रुपये खर्च कर ऐसी निरर्थक फिल्में बना रहे हैं ।
वहीं दूसरी तरफ़ ऐसे फ़िल्मकार भी हैं :
लेकिन समाज की चिंता करने वाले फिल्मकार इससे निराश नहीं है वे अपनी गाँठ का पैसा लगाकर ऐसी फिल्में बना रहे हैं और बिना किसी व्यावसायिक उद्देश्य या लोकप्रियता की फिक्र किये बगैर अपने काम में लगे हैं ।

13,14,15 नवम्बर को भिलाई में जन संस्कृति मंच द्वारा “ मुक्तिबोध स्मृति फिल्म एवं कला उत्सव “ की रपट विस्तार से देखिये अच्छा लगेगा।

दालों की आपसी बहस ब्लागरों की बहस से भी ऊंचे स्तर की हो गयी और दाल रिपोर्टर शेफ़ाली पाण्डेय ने बिस्तर पकड़ लिया। पूरी खबर विस्तार से !

अर्कजेश लिखते हैं:

गढ्ढे खोदोगे तुम्ही पहले गिरोगे
कोई नागा नहीं है इस नियम में।

दिल में अपने एक तुम सागर बसा लो
फ़ासला धरती-गगन में नहीं है।



तभी तो कहते है पिता एक विशाल बरगद की माफिक होते है .....दुःख ओर मुश्किलों को अपनी बांहों में छिपाए ..
ये टिप्पणी है डा.अनुराग आर्य की सुशील छौक्कर की इस पोस्ट पर। इसमें वे अपने पिता के जीवट को याद करते हुये बताते हैं:
अजीब सी हालत हो गई थी हम सब की। खासकर पिताजी की। सारा पैसा पानी में चला गया। पहले ही इतना कर्ज हो चुका था। मैं सोचने लगा अब आगे क्या होगा। अगले दिन हम सब बैठे हुए थे तब मैंने पिताजी से पूछा “अब क्या होगा पापा?” उनका जवाब एक लाईन में आया “अभी हाथ नही गड़े धरती में मेरे” और बाहर निकल गए। आज भी कोई परेशानी आती है तो पिताजी के कहे ये शब्द मुसीबतों से लड़ने का ज़ज़्बा दे जाते है।


समीरलाल आशा पर आकाश के बदले देश को टिकाने का प्रस्ताव पेश कर गये। चार लाईन की कविता सुनाने के लिये भाई लोग चालीस लाइन की भूमिका ठेल जा रहे हैं और आप कुछ नहीं कर पाते सिवाय माडरेशन में वाह-वाह करने के।
अब आये हैं तो सुन ही लीजिये भाई कवि कहता है:

जब भी मांगा हमने तुमसे, हक बतलाना भूल गये
तुम तो थे नादान मुसाफिर, आना जाना भूल गये
जैसा भी तुम कहते आये, हमने जीना सीख लिया
पर तुमसे आशा पानी की, क्यूँ बरसाना भूल गये


आनन्द वर्धन ओझा जी प्रख्यात साहित्यकारों से जुड़े अपने आत्मीय और अनूठे संस्मरण पेश करते हैं। आज देखिये अप्रतिम गद्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी से जुड़ी उनकी यादें। वे लिखते हैं:
बेनीपुरीजी के घर से जाने के बाद मैं अपनी उद्दंडता में उनके हकलाकर और अटक-अटककर बोलने की नक़ल उतारता। अपने भाई-बहनों के साथ मिलकर परिहास करता। मेरी माताजी के कानों में मेरे अभिनय और परिहास के स्वर पड़ते, तो वह आकर वर्जना दे जातीं; लेकिन जैसे ही वह आंखों से ओझल होतीं, मैं अपनी कारगुजारियों से बाज़ न आता। एक-आध महीने में ही बेनीपुरीजी के बारे में मेरा आकलन इतना परिपक्व हो गया था कि बगल के कमरे में पढ़ने के लिए बलात् बैठाया गया मैं भविष्यवाणियाँ किया करता कि बेनीपुरीजी अमुक प्रश्न का कोई उत्तर न देंगे; अमुक का इतने क्षणों के बाद यह उत्तर देंगे और जब शब्दों के थोड़े अन्तर से उनके मुख से वही उत्तर निकलता, तो हमारी हँसी रोके न रुकती।


मास्टर साहब जानकारी देते हैं--बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दिलाने की डगर पर चलना उत्तर-प्रदेश के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण मास्साब आप ई बताइये कौन काम चुनौती पूर्ण नहीं होता। कुछ करना अपने आप में चुनौती पूर्ण काम है क्योंकि वह न्यूटन के जड़त्व के नियम का प्रतिरोध करता है।

इस बीच मास्साब ने एक चुनौती पूर्ण काम कर दिया और विवेक निराला जी का ब्लाग बनवा दिया। आप देखिये विवेक क्या कहते हैं अपनी ओपनिंग पोस्ट में:
क्या हमारे कंसर्न से ही किसान गायब है? विदर्भ से लेकर बुंदेलखंड तक किसानों की आत्महत्याएं क्या हमें आंदोलित नहीं करतीं? मुक्त बाज़ार से लेकर दलित और स्त्री विमर्श करने वाले हमलोग क्या सचमुच आत्मरति के शिकार हैं? जबकि मुक्त बाज़ार के मसीहा खाद्यान्न का कोई विकल्प नहीं ढूंढ सके हैं ऐसे में सचमुच सृजन करने वाले किसान के पक्ष में न बोलना हमारे समय में गद्दारी नहीं? सुधा के शब्द उधार लेकर कहें तो क्या ये साइलेंस ऑफ़ वायलेंस नहीं?


मनोज जी पेश करते हैं हरीश प्रकाश गुप्त की लघुकथा --दास न छाड़े चाकरी... देखिये काम में लगने केपहले एक सरकारी कर्मचारी क्या-क्या करता है:
आफिस के रास्ते पड़ने वाले लगभग आधा दर्जन मन्दिरों की चौखट पर माथा टेकते आफिस कब आ गया उसे ध्यान ही न रहा। उसने झट से अपनी साइकिल स्टैण्ड में लगाई और गंगा जी को प्रणाम किया। आफिस की कुर्सी पर बैठने से पहले उसने मेज पर शीशे के नीचे लगी देवी-देवताओं की तमाम फोटुओं को सादर चरण स्पर्श किया और काम में लग गया।


गौतम राजरिशी की अभी तक आप गजलों से बोर करते रहे। अरे ये हम नहीं वे खुद कह रहे हैं भाई।
मिथिलावासियों को वैसे भी गप्प-सरक्का का व्यसन होता है। मैं मैथिल हूँ और अचानक से ये मैथिल होना मेरे ब्लौगर होने को धिक्कारने लगा कि कैसा मैथिल हूँ कि अभी तक बस अपने लिखे ग़ज़लों से बोर करता रहा हूँ आपसब को।.

इस अपराध बोध कि दूर करने के लिये वे तान्या की मम्मी की आवाज में मैथिली कवि विद्यापति का गीत -
हे हर, हमहु पैहरब गहना अब आपको तान्या, तान्या की मम्मी के बारे में जानने का मन हो तो वहीं जाइये सुनिये/पढिये और सराहिये।

एक लाईना


  1. क्या जेल फ्लाप हो सकती है?: हां ,बशर्ते वो सिनेमा हो।:

  2. छोटी सी मुस्कान भिडू:ये लफड़ा वरदान भिडू

  3. देश का बदला हुवा वातावरण है:जम्हुआते हुये हो रहा जागरण है

  4. क्यूं टूट गये? :जरा सी बात पर फ़ूट गये?

  5. मुआवज़े में भेदभाव - देने वाला सेकुलर, विरोध करने वाला साम्प्रदायिक (एक माइक्रो पोस्ट) :मुआवजे के साथ मुफ़्त में

  6. क्या फ़िर से ??? : वही दास्ताने इश्क दोहरायी जायेगी?

  7. आजकल ज़रा बीमार हूँ : और यह खबर सुनते ही दालों के भाव बढ़ गये

  8. कबाडी और साहित्यकार ! : दोनों एक ही ग्रुप में धर दिये गये

  9. हिंदी को गाय और ब्राह्मण की तरह पवित्र मत बनाईये :पवित्रता में बरक्कत नहीं आजकल

  10. होशियारी दिखाने के चक्कर में हम अपना ही कबाड़ा कर जाते हैं : इसके बाद फ़िर कोई होशियारी दिखाते हैं

  11. बसंत का गीत : जाड़े में गा दिया

  12. किस मुगालते में है बाल ठाकरे ? :किसी मुगालते में नहीं बुजुर्गियत के पाले में हैं बावरे!



मेरी पसंद


जुए के तले ही सही
जो चले
वे ही आगे बढ़े

जिनकी गर्दन पर भार होता है
उनके ह्रदय में ही क्षोभ होता है

कैद होते हैं जिनके अरमान
वे ही देखते हैं मुक्ति के स्वप्न

जो स्वप्न देखते हैं
वे ही लड़ते हैं

जो लड़ते हैं
वे ही आगे बढ़ते हैं

जो खूँटों से बँधे रहे
बँधे के बँधे रह गये

जो अपनी जगह अड़े रहे
अड़े के अड़े रह गये।
शिवराम

और अंत में

फ़िलहाल इतना ही। आपका दिन मौज-मजे में बीते। मस्त रहें। मुस्कराइये-मजा आयेगा।

१६-११-२००९

और मेरे हृदय की धक्-धक् पूछती है– वह कौन


 -^-


कल १४ नवम्बर था-  "बाल दिवस" या कहें कि जवाहर लाल नेहरू का जन्म दिवस ;  जिनके विषय में बाबा नागार्जुन ने लिखा था -



आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !


देश ने और देशवासियों ने सरकारी / असर कारी / अ - सरकारी  और अन् + असरकारी अलग अलग विधि विधान से इसे   मनाया और अपने अपने ढंग से जवाहर लाल और बालकों के प्रति उनके प्रेम को याद किया| ब्लॉग जगत में बाल दिवस के अवसर पर बच्चों पर केन्द्रित कई  प्रकार की विचारात्मक, सूचनात्मक , संवेदनात्मक, ........ आदि आदि सामग्री यथासम्भव उपलब्ध कराई गयी| वह सारी आप ब्लॉगवाणी तथा चिट्ठाजगत संकलकों पर जा कर गत ३२ घंटे की प्रविष्टियों को खंगालते हुए स्वरुचि के अनुसार ( या अपनी- अपनी  टिप्पणियों के आदान-प्रदान की सीमारेखा और तय नीति अनुसार ) देखभाल / पढ़ सकते हैं | वैसे रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी ने इसका एक  लघु संस्करण भी तैयार किया है - 



कई प्रविष्टियाँ यद्यपि इसमें छूट गयी हैं किन्तु उनके लिए शास्त्री जी ने सौजन्यता व विनम्रता पूर्वक इसे मानवीय चूक के रूप में लेने का आग्रह किया है | अत: किसी को उनसे किसी प्रकार की शिकायत मन में नहीं लानी चाहिए क्योंकि चर्चा करने वाली की भी अपनी सीमाएँ होती हैं |

हाँ तो, हम बात कर रहे थे बाल दिवस के साथ नाभिनाल सम्बद्ध जवाहर लाल नेहरू की|  पता नहीं क्यों जवाहरलाल नेहरु चाचा के साथ मैं सदा चीन का दागदार (चिन्हित) चेहरा चीन्हने में जुट जाती हूँ ? (ये अलंकार नहीं है भाई!, चक्कर है च का !!) | इसी सहसंबंध के कारण ही हो सकता है कि मुझे  भारत के पड़ोसी चीन के संबंधों पर लिखा एक लेख भी नेहरू जी के जन्मदिवस के अवसर पर, एकदम सही समय पर आया लगा| लेख विश्लेषणात्मक और सुचिन्तित है, जिसे लिखा है हमारे वरिष्ठ मित्र व `स्वतंत्र वार्ता' (दैनिक हिन्दी पत्र) के सम्पादक डॉ. राधेश्याम शुक्ला जी ने - 


अमेरिका, चीन और भारत के संबंधों का एक विश्लेषण


अमेरिका और चीन आज दुनिया के दो सर्वाधिक श्क्तिशाली देश हैं। इन दोनों के अंतर्संबंध इतने जटिल हैं कि उनकी सरलता से व्याख्या नहीं की जा सकती। उनके बीच न कोई सांस्कृतिक संबंध है, न सैद्धांतिक, बस शुद्ध स्वार्थ का संबंध है। इसलिए न वे परस्पर शत्रु हैं, न मित्र। इनमें से एक भारत का पड़ोसी है, दूसरा एक नया-नया बना मित्र। पड़ोसी घोर विस्तारवादी व महत्वाकांक्षी है। ऐसे में भारत के पास एक ही विकल्प बचता है कि वह अमेरिका के साथ अपना गठबंधन मजबूत करे। यह गठबंधन चीन के खिलाफ नहीं होगा, क्योंकि अमेरिका भी न तो चीन से लड़ सकता है और लडऩा चाहता है। लेकिन चीन की बढ़ती शक्ति से आतंकित वह भी है और भारत भी। इसलिए ये दोनों मिलकर अपने हितों की रक्षा अवश्य कर सकते हैं, क्योंकि चीन कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो जाए, वह अमेरिका और भारत की संयुक्त शक्ति के पार कभी नहीं जा सकता।


१३ नवम्बर को प्रख्यात हिन्दी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्मदिवस भी था| ठीक विधानसभा की जूतमपैजार के कुछ  दिन बाद | मुक्तिबोध मूलतः मराठीभाषी थे, उनके भाई मराठी के जाने माने  कवियों में गिने जाते हैं | है न कमाल, एक भाई मराठी का  कवि दूसरा हिन्दी का|

सीखिए- सीखिए कुछ तो! वर्चस्व के लडैतो !!


नेट पर इन दिनों देशकाल ने इस अवसर पर मुक्तिबोध सप्ताह की आयोजना की हुई है|  इसके अर्न्तगत मुक्तिबोध पर केन्द्रित कई वैचारिक आलेख आप वहाँ समयानुसार पढ़ सकते हैं| स्मरणपूर्वक इस अवसर पर चर्चा के इस मंच पर उनकी एक बहुप्रसिद्ध लम्बी कविता `अँधेरे में' का एक बहुत छोटा-सा अंश आपको यहाँ पढ़वाने का लोभ संवरण नहीं हो पा रहा -


http://cmsdata.webdunia.com/hi/contmgmt/photogalleryimg/Photo/1187B_Gajajnan-Madhav-Muktibodh.jpg
ज़िन्दगी के…
कमरों में अँधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार;
आवाज़ पैरों की देती है सुनाई
बार-बार….बार-बार,
वह नहीं दीखता… नहीं ही दीखता,
किन्तु वह रहा घूम
तिलस्मी खोह में ग़िरफ्तार कोई एक,
भीत-पार आती हुई पास से,
गहन रहस्यमय अन्धकार ध्वनि-सा
अस्तित्व जनाता
अनिवार कोई एक,
और मेरे हृदय की धक्-धक्
पूछती है–वह कौन
सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई !
इतने में अकस्मात गिरते हैं भीतर से
फूले हुए पलस्तर,
खिरती है चूने-भरी रेत
खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह–
ख़ुद-ब-ख़ुद
कोई बड़ा चेहरा बन जाता है,
स्वयमपि
मुख बन जाता है दिवाल पर,
नुकीली नाक और
भव्य ललाट है,
दृढ़ हनु
कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति।
कौन वह दिखाई जो देता, पर
नहीं जाना जाता है !!
कौन मनु ?



हिन्दी के नाम पर हुई अ - वैधानिक ( ?)  जूताजोरी के बाद हिन्दी की उपयोगिता को लेकर अंग्रेजी वालों के मध्य एक परिचर्चा कराने का विचार अपने एन डी टीवी वालों को वालों समय की माँग जैसा लगा (सही पहचाना,  यह वही अर्थशास्त्रीय / बाजार की माँग और आपूर्ति वाली माँग है बंधु !)| तो उन्होंने बिना देर लगाए इस अनुष्ठान को करने करवाने के लिए अलग अलग दिशाओं से पुरोहितों को  ( न-न, वक्ताओं को) आमंत्रण भेजे|  अब इस अनुष्ठान का विधिविधान देखने से आप चूक गए हों तो उसकी बानगी देख सकते हैं -

एन डी टी वी (अंग्रेजी )चैनल में हिन्दी की उपयोगिता पर निरर्थक बहस



आज शाम आठ बजे, टी वी चैनल - एन डी टी वी -(अंग्रेजी) में परिचर्चा का एक कार्यक्रम आयोजित था । विषय था -
हिन्दी का मुद्दा।
xxx
सभी लोगों ने अंत में एकमत से अंग्रेजी को ही भारत की संपर्क भाषा घोषित किया और कहा की अंग्रेजी से ही भारत का उत्थान होगा और अंग्रेजी ही देश की एकता को सुरक्षित रख सकती है. खुले आम हिन्दी और भारतीय भाषाओं की धज्जिया उडाई गयी । भारतीयता का न ही कोई बोध था, किसी में और न ही हिन्दी के प्रयोग के बारे में कोई जानकारी ही थी उन लोगो के पास. सभी लोगों ने हिन्दी को ही देश की समस्याओ का मूल कारण बताया और इससे जल्द से जल्द निजात पाने का फरमान घोषित कर दिया । वाह रे वाह भारत के बुद्धिजीवी और वाह रे वाह एन डी टी वी चैनल। धन्य हो बरखादत्त .




देश -दुनिया और समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर निरंतर लोग सद्प्रयासों में लगे हैं क्योंकि स्त्री को उसका समुचित मान-सम्मान दिए बिना कोई भी वर्ग,जाति, देश, समाज कभी अपनी ह्रासमान स्थितियों से उबर ही नहीं सकता| हमारे देश में एक दबंग, सच्ची और ईमानदार महिला पुलिस अधिकारी हुआ करती थीं| `थीं' इसलिए, क्योंकि तेजस्वी महिलाओं की स्वायता को नष्ट कर के अंगूठालगाऊ महिलाओं को आगे करने वाली सिंहासनारूढ़ सत्ता ने उन्हें दरकिनार कर दिया और ...| खैर, वे आज भी सक्रिय हैं और बड़े बड़े काम कर रही हैं| एक समाचार उनके विषय में -




किरण बेदी को देश का मुख्य सूचना आयुक्त बनाने की मुहिम

निष्पक्ष और निडर पुलिस अधिकारी के तौर पर ख्यात रहीं किरण बेदी को देश का मुख्य सूचना आयुक्त बनाने की मुहिम को और बल मिल गया है। बेदी ने अब खुद सामने आ कर कहा है कि उन्हें यह पद मंजूर करने से कोई एतराज नहीं।..........................
किरण बेदी से अच्छी सख्सियत नही हो सकती भारत में इस पद को सम्हालने के लिए ।
अगर सरकार को अपनी पुराणी गलतियाँ सुधारनी है तथा सच की थोडी सी भी शर्म है तो तुंरत किरण बेदी को इस पद पर नियुक्त कर दे।
पर इस की उम्मीद कम ही दिखायी पड़ती है , क्योंकि सच की तो कोई कदर ही नहीं है सरकार के घर ।
जो कांग्रेस बेशर्मी से कौडा जैसे नेता को समर्थन देती रही वो सच और ईमान दारी तो चाहती ही नही



महिलाओं की ऐसी-तैसी और इज्जत-उतार-अभियान देश, बस्ती, गली, कूचे, घर-बाहर, बाज़ार, संस्था, देश, परदेस,  लिखने, पढने, जीने मरने जैसे हर नुक्कड़ और हर शिखर पर हर कहीं चल रहा है, चलता आ रहा है, बस उजागर होने की कसर बची रहती है सदा-सर्वदा| उजागर  हों भी क्यों ? अंततः वे निरंकुशों की लिप्सा शांत करने का सामान-भर ही तो हैं !! कोई देख कर, कोई बोल कर, कोई लिख कर, कोई नोच कर, कोई मार कर, कोई भोग कर सभी तो लगे हैं अपनी लिप्सापूर्ति में ( स्त्री की देह को माध्यम बना कर )| यहाँ भी वे भोगे जाने के लिए शापित हैं -



रेड कॉरिडोर में कराहता सेकेंड सेक्स

माओवादी संगठनों ने सामाजिक राजनीतिक बदलाव की मुहिम छोड़ कर महिलाओं का बर्बर उत्पीड़न शुरू कर दिया है उत्तर प्रदेश,बिहार झारखण्ड और छतीसगढ़ के सीमावर्ती आदिवासी इलाकों में जहाँ इंसान का वास्ता या तो भूख से पड़ता है या फिर बन्दूक से ,माओवादियों ने यौन उत्पीडन की सारी हदें पार कर दी हैं |माओवादी , भोली भाली आदिवासी लड़कियों को बरगलाकर पहले उनका यौन उत्पीडन कर रहे हैं फिर उन्हें जबरन हथियार उठाने को मजबूर किया जा रहा है वहीँ संगठन में शामिल युवतियों का ,पुरुष नक्सलियों द्वारा किये जा रहे अनवरत मानसिक और दैहिक शोषण बेहद खौफनाक परिस्थितियां पैदा कर रहा है वो चाहकर भी न तो इसके खिलाफ आवाज उठा पा रही है और न ही अपने घर वापस लौट पा रही हैं |इस पूरे मामले का सर्वाधिक शर्मनाक पहलु ये है कि जो भी महिला कैडर इस उत्पीडन से आजिज आकर जैसे तैसे संगठन छोड़कर मुख्यधारा में वापस लौटने की कोशिश करती हैं ,उनके लिए पुलिस बेइन्तहा मुश्किलें पैदा कर दे रही है ।शांति, बबिता, आरती, चंपा, संगीता...ये वो नाम हैं जिनसे चार -चार राज्यों की पुलिस भी घबराती थी। लेकिन आज पीडब्ल्यूजी एवं एमसीसी की ये सदस्याएं, पुरूष नक्सलियों के दिल दहलाने वाले उत्पीड़न का शिकार हैं।  







आप ने अभिनेता ओमपुरी के जीवन प्रसंगों पर केन्द्रित उनकी पत्नी नंदिता की पुस्तक "अनलाइकली हीरो: ओम पुरी" को लेकर हो रही चर्चाओं के विषय में सुना पढ़ा होगा ही| मेरी चिंता इस सब के बीच पति पत्नी संबंधों के विघटन को लेकर थी| इस लेख से अधिक विस्तार व तथ्यपूर्वक घटनाक्रम की जानकारी मुझे श्री आलोक तोमर जी द्वारा उनके मध्य समझौता कराने की पहल से जुड़े घटनाक्रम द्वारा निरंतर मिल रही थी| कल दोपहर तोमर जी ने जैसे ही मुझे सूचना दी कि ओमपुरी और नंदिता दोनों अभी यहीं बैठे हैं और स्थिति यह है कि दोनों के मध्य सब ठीक हो गया है व अभी अभी पति पत्नी ने सहज भाव से परस्पर एक दुसरे को चूमा भी है| पारिवारिक विघटन की छाया एक दम्पती के परिवार से टल जाने के हर्षातिरेक से भर मैंने बात करनी चाही तो उधर से सीधे नंदिता से ही चैट हो गयी और यह भी पता चला कि विमोचन के समय अब ओमपुरी ही नंदिता की पुस्तक के अंशों का पाठ भी करेंगे| यह घटना भले ही किसी के एकदम वैयक्तिक जीवन से संबंद्ध हो, किन्तु यह तो प्रमाणित करती ही है कि पति पत्नी संबंधों के बीच ज़रा-सा बित्ते-भर अवकाश दीखते ही नज़ारा करने वालों और उसे खाइयों का रूप देने में बाहर से कोई कसर नहीं छोड़ता| कोई विरला ही अपना होता है, जो इन का लाभ उठाए बिना उन्हें वापिस साथ जोड़ मिला सकता है| ओमपुरी जी, नंदिताजी और तोमर जी को बधाई देनेका अवसर है यह|






ऐसे प्रसंगों के लेखन और बाज़ार वाले समीकरण पर केन्द्रित एक आलेख कबाड़खाना पर आया है, उसे आप अवश्य बाँचें -

 

अंतरंग संबंधों पर लेखन : अवधारणा और बाजार




आत्मकथा के आयाम में बहुत चितेरे होते हैं, जो पाठकों को आकर्षित करते हैं, किंतु उससे कहीं अधिक आकर्षित करते हैं समाज और निजी जिंदगी के प्रवाह में डूबते-उतराते रिश्ते। संबंधों की अंतरंगता हर किसी के जीवन के खास पहलू होते हैं। उन संबंधों की याद में लोग भावुक होते हैं, जिंदगी से तृष्णा व वितृष्णा होती है और फिर किसी हवा के झोंके के साथ उससे गाहे-बगाहे सामना भी करना पड़ता है।
पाश्चात्य संस्कृति में पति-पत्नी के रिश्ते की बुनियाद या हकीकत जो भी हो लेकिन भारतीय परिवेश में इसके मायने अहम हैं। साहित्य, फिल्म के अलावा राजनीति की चमचमाती जिंदगी में संबंधों की अपनी अहमियत है और अंतरंग प्रसंगों को चटखारे लेने की परंपरा भी नई नहीं है। यही कारण है कि पत्रकार नंदिता पुरी द्वारा लिखी गई किताब ‘अनलाइकली हीरो : द स्टोरी ऑफ ओमपुरी’ लोकार्पण होने के पहले ही सुर्खियां बटोर रही है और ओमपुरी के बयान के कारण विवादों की चपेट में है। किसी की जिंदगी के महत्वपूर्ण और पवित्र हिस्सों को सस्ते और चटखारे वाली गॉसिप में बदलना किसी विश्वासघात से कम नहीं है।



 


अब पुनः आते हैं अपने ब्लॉगजगत के  घटनाक्रम में | मुझे गत दिनों रह रह कर एक कथा बहुत याद आती रही, जब  दो शिष्यों ने गुरु की सेवा को आधा आधा बाँटने  के चक्कर में गुरु को ही आधा आधा बाँट लिया था और सोते गुरु को मक्खी से बचाने की चेष्टा में गुरु जी का देह-भंग कर डाला था| ऐसे ही प्रसंगों के लिए नीतिकार कह गए हैं कि मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु अधिक अच्छा होता है| दलों में बँटे शिष्यों की चाँव-चाँव सुन कर यह कथा बार बार स्मरण हो आती रही|  बुरा भी लगता रहा | मैं अथवा मेरे जैसे कई लोग जिस पहल को नहीं कर सके उस पहल का दायित्व लिया खुशदीप ने  ब्लॉगिंग की 'काला पत्थर'... लिख कर -





मेरी उस फेहरिस्त में अनूप शुक्ल जी भी हैं और गुरुदेव समीर लाल जी समीर भी...ये मेरी अपनी पसंद है...ये मेरे अपने आइकन है....मैंने एक प्रण लिया...जिस तरह का स्तरीय और लोकाचारी लेखन मेरे आइकन करते हैं...उसी रास्ते पर खुद को चलाने की कोशिश करूंगा...अगर एक फीसदी भी पकड़ पाया तो अपने को धन्य समझूंगा...धीरे-धीरे ब्लॉगिंग करते-करते मुझे तीन महीने हो गए...इस दौरान दूसरी पोस्ट और टिप्पणियों को भी मुझे पढ़ने का काफी मौका मिला...जितना पढ़ा अनूप शुक्ल जी और गुरुदेव समीर के लिए मन में सम्मान और बढ़ता गया...लेकिन एक बात खटकती रही कि दोनों में आपस में तनाव क्यों झलकता है...या वो सिर्फ मौज के लिए इसे झलकते दिखाना चाहते हैं....क्या ये तनाव ठीक वैसा ही है जैसा कि चुंबक के दो सजातीय ध्रुवों के पास आने पर होता है...जितना इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश की, मेरे लिए उतनी ही ये रूबिक के पज्जल की तरह विकट होती गई...जैसा पता चलता है कि समीर जी भी शुरुआत में चिट्ठा चर्चा मंडल के साथ जुड़े रहे....किसी वक्त इतनी नजदीकी फिर दूरी में क्यो बदलती गई...
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चिट्ठा चर्चाओं के ज़रिए उछाड़-पछाड़ के खेल से हिंदी ब्लॉगिंग में राजनीति के बीजों को पनपने ही क्यों दिया जाए...राजनीति किस तरह बर्बाद करती है ये तो हम पिछले 62 साल से देश के नेताओं को करते देखते ही आ रहे हैं..





इस प्रकरण का सबसे अच्छा पक्ष समीरलाल जी का बड़प्पन है | वह इसलिए क्योंकि स्थापित हो जाने, या स्वयं गुरु बन जाने, या किसी स्वार्थ के बिना किसी को सार्वजनिक रूप से अपने से अधिक महत्व देना व अपने `तत्सम्बन्धी' निर्माण में किसी के योगदान को रेखांकित करना वास्तव में प्रशंसनीय है|  अधिकाँश लोग ऐसी विनम्रता केवल स्थापित होने से पूर्व किसी न किसी स्वार्थ वश ही दिखाते हैं|  परन्तु समीर जी और अनूप जी के मध्य ऐसा कोई कारण नहीं है क्योंकि समीर जी स्थापित और लोकप्रिय हो चुके हैं| ऐसे में उनकी ये स्वीकारोक्तियाँ उनका बड़प्पन ही दिखाती हैं| अतः  इस का स्वागत किया जाना चाहिए तथा यह आशा भी कि भविष्य में लोग अपने व्यक्तिगत मन मुटाव को सार्वजनिक मंचों पर अथवा अपने से इतर लोगों के बीच हँसी या विवाद का रूप नहीं लेने देंगे|






चर्चा बहुत लम्बी व समय बहुत अधिक हो गया है | इन गंभीर बातों के साथ आपको छोड़ जाने का जी नहीं होता| सो पहले आप श्रीश जी की एक कविता का रसास्वादन करें -




Shreesh Pathak


' सोचता हूँ; कितना कठिन समय है, अभाव, परिस्थिति, लक्ष्य...
'हुंह; सोचने भी नहीं देते, सब मुझसे ही टकराते हैं और घूरते भी मुझे ही हैं..'
समय कम है और समय की मांग ज्यादा,
जल्दी करना होगा..!
'ओफ्फो..! सबको जल्दी है..कहाँ धकेल दिया..समय होता तो बोलता भी मुझे ही...'

इतने संघर्षों में मेहनत के बाद भी..
आशा तो है पर..डर लगता है...
जाने क्या होगा..?

कविता को   यहाँ   पूरा पढें |




अनंतिम 

और सप्ताह में टाईमपास करने की समस्या का निदान काजल कुमार जी के इस कार्टून को देख कर स्वतः ढूँढ लें  क्योंकि हमें चर्चा करते हुए पूरे ७ घंटे हो गए हैं | अगले सप्ताह सामना होने तक आपके लिए सर्वमंगल की कामनाओं के साथ विदा लेती हूँ





Kajal Kumar

आओ टाइम पास का नया तरीक़ा दिखाऊं.













पुनश्च : चर्चा के प्रारंभ में "कल १४ नवम्बर था"  क्योंकि 
(१)  -   मैं आप से ५.३० घंटे पीछे हूँ 
और 
(२) - चर्चा भी १५ की सायं लिखी गयी है |








१५-११-२००९

रेडिफ़लैण्ड की अज़ब-ग़ज़ब ब्लॉग दुनिया

funSha_17_sb

अजब-गजब दुनिया है रेडिफ़ लैण्ड की हिन्दी ब्लॉग दुनिया. मैंने यहाँ बेतरतीब गोता लगाने की कोशिश की. कुछ कड़ियाँ बेहद पुरानी भी हो सकती हैं. यहीं पर मुझे यह काम की कड़ी भी मिली –

http://tucmuc.blogspot.com

तो, सबसे पहले तो आप ऊपर दी गई कड़ी (टकमक या टुकमुक?) पर ही विचरण करें. वहां से यदि आप जल्द और सुरक्षित वापस आ जाएँ, तो आगे देखें – (बस, ये ध्यान रखें कि यदि आपके ब्राउज़र पर हिन्दी के बजाए कचरा दिखे तो व्यू>एनकोडिंग> यूनीकोड - यूटीएफ़8 कर दें. रेडिफ़ में इसके जैसी और भी ढेरों समस्या है, पर फिर भी जनता जाने क्यों वहां चिपकी रहती है...)

गिरीश सिंह –

बनावटी जीवन’

भागदौड़ वाली इस जीवनशैली में हर शक्स एक अनजानी सी दौड में अनजाने लक्ष्य के पीछे दौड़ रहा है। मैं भी अपनों से दूर ऐसे ही किसी अनजाने लक्ष्य के पीछे दौड़ रहा हूँ। क्या पाना है?, कैसे पाना है?,कुछ पता नही। क्या आपने किसी कुत्ते को अनजाने वाहन के पीछे भागते देखा है? सवाल यह नही कि वो क्यो भाग रहा है? अगर वह उस वाहन को पकड़ भी लेगा तो करेगा क्या?

http://girishsingh.rediffiland.com/blogs/2009/10/05/.html

विशाल सारस्वत –

save environment

पर्यावरण के किसी भी तत्व में होने वाला अवांछनीय परिवर्तन, जिससे जीव जगत पर प्रतिकूल प्रभाव
पड़ता है, प्रदूषण कहलाता है। पर्यावरण प्रदूषण में मानव की विकास प्रक्रिया तथा आधुनिकता का महत्वपूर्ण योगदान है। यहाँ तक मानव की वे सामान्य गतिविधियाँ भी प्रदूषण कहलाती हैं, जिनसे नकारात्मक फल मिलते हैं। उदाहरण के लिए उद्योग द्वारा उत्पादित नाइट्रोजन आक्साइड प्रदूषक हैं। हालाँकि उसके तत्व प्रदूषक नहीं है। यह सूर्य की रोशनी की ऊर्जा है जो कि उसे धुएँ और कोहरे के मिश्रण में बदल देती है।

http://bhuthegreat.rediffiland.com/blogs/2009/10/03/save-environment-1.html

अख़्तर रिज़वी –

दोस्तों

,सबसे पहले तो आप सभी को ..हिंदी पर्व की ढेर सारी शुभकामनायें...!! आप सोच रहे होंगे के हमने हिंदी दिवस को हिंदी पर्व क्यूँ लिखा..? तो दोस्तों जो चीज़ वर्ष में एक बार बहुत धूमधाम से मनाई जाये तो उसे पर्व नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे...? हर वर्ष १४ सितम्बर आते ही हम सब का हिंदी प्रेम जाग उठता है हम जोर शोर से इसे एक पर्व की तरह मानानेकी तय्यारियों में लग जाते हैं..जगह जगह हिंदी सम्मलेन कार्यालयों, में हिंदी पखवाडे ,रेडियो और दूरदर्शन से हिंदी दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों की रिपोर्ट,सर से पैर तक अंग्रेजी में नहाये हुए ,अंग्रेजी वर्दी पहने नेताओं के भाषण,कहीं निबंध प्रतियोग्यतएं तो कहीं अन्ताक्षरी...और उसके बाद.....इतिश्री.....अगले वर्ष फिर देखेंगे....??

http://meakhtarrizvi.rediffiland.com/blogs/2009/09/15/n.html

कमल दुबे –

Chhattisgarh main Aisa Bhi Hota Hai…

ऐसा भी होता है? छतीसगढ़ में निलंबन और बहाली

छत्तीसगढ़ शासन के परिवहन विभाग में हाल में हुई तीन निलंबित अधिकारियों की बहाली इन दिनों चर्चा में है, सी बी आई के एक केस(Stayed) में ये तीनो ही चार्जशीटेड हैं और जिनके खिलाफ गैरजमानती गिरफ्तारी वारंट जारी हैं. इनमें से दो अधिकारी जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट तक गए थे. लेकिन वहाँ भी उन्हें सिर्फ चार सप्ताह की ही मोहलत मिली थी और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सी बी आई की विशेष अदालत में सरेंडर कर वहाँ से जमानत लेने के निर्देश दिए थे.

http://kdbaba.rediffiland.com/blogs/2009/09/13/Chhattisgarh-main-Aisa-Bhi-Hota-Hai.html

अंजू पंग्ती

जो बीत गया.............

अक्सर ऐसा भी होता है
जो बीत गयी, सो बात गयी

क्या सच में ऐसा होता है
जो बीता है, वो बात गयी

कुछ अंतर्मन के द्वंदों में
उलझे कुछ, ऐसे फन्दों में

ना जीत सके अपना ही मन
ना हार सके, अपनों का मन

कुछ ऐसी गांठे है पड़ती
जो वक़्त के, साथ नहीं खुलती

वो हो जाती कुछ और गहन
धीरे धीरे, कुछ और सघन

http://anjupangty.rediffiland.com/blogs/2009/09/05/.html

राजेश पंकज –

प्रेम के दोहे

मन का नाता न तोड़ना, बाँध प्रेम की डोर।

मन मुआ तो जग मुआ, ठौर कहीं न और॥

प्रीत की बंसी बाजती, मन का नाचत मोर।

मीत कहे तो यामिनी, मीत कहे तो भोर॥

जीवन के आकाश तले ज्यों, पतंग उडावे डोर।

जीवन तो अनमोल रे!, मीत मोल है और॥

http://rajeshpnkj.rediffiland.com/blogs/2009/05/16/.html

भारत –

हमें तो अपनों ने लूटा,
गैरों में कहाँ दम था.
मेरी हड्डी वहाँ टूटी,
जहाँ हॉस्पिटल बन्द था.
मुझे जिस एम्बुलेन्स में डाला,
उसका पेट्रोल ख़त्म था.
मुझे रिक्शे में इसलिए बैठाया,
क्योंकि उसका किराया कम था.
मुझे डॉक्टरों ने उठाया,
नर्सों में कहाँ दम था.
मुझे जिस बेड पर लेटाया,
उसके नीचे बम था.
मुझे तो बम से उड़ाया,
गोली में कहाँ दम था.
और मुझे सड़क में दफनाया,
क्योंकि कब्रिस्तान में फंक्शन था
नैनो मे बसे है ज़रा याद रखना,
अगर काम पड़े तो याद करना,
मुझे तो आदत है आपको याद करने की,
अगर हिचकी आए तो माफ़ करना.......

http://hotbharat.rediffiland.com/blogs/2009/04/15/poem-1.html

राजेश यादव –

तनहाई मे जब भी सोचा करोगे.....

तुझ बिन नहीं मुझको जीना सनम
करले तू चाहे जितना भी सितम
मर भी गये हम तो भी कुछ गम नहीं
इक दिन तड़पोगे तुम भी यहीं
मेरी याद तुमको रुला जाएगी
इस बात का मुझको है पूरा यकीन
तनहाई मे जब भी सोचा करोगे
हर सांस मे मुझको ही ढूंढा करोगे
जब भी जुबान अपनी खोलोगे साथी
हर लफ्ज़ पे नाम मेरा ही पाओगे
जीने न देंगे हम चैन से तुझको
तेरी हर फरियाद में हम गूंजा करेंगे

http://rajcomp98.rediffiland.com/blogs/2009/11/12/a.html

श्याम –

नि:शब्द

कुछ शब्द

बामुश्किल

उनसे कुछ कहने

मनस्तल से निकल

जुबां तक आए

देख कर सम्मुख

उनका अतिशीतित अंदाज

नि:शब्द ही रह गए।

http://shyamgkp.rediffiland.com/blogs/2008/12/06/.html

राज कुमार –

Naari.........?

नारी क्या है.........? नारी एक माँ है , बेटी है ,बहू है , पत्नी है और इन सबके बाद एक कुशल ग्रहिणी है , जो सबको संभालती है , ग्रहस्थी चलाती है
लेकिन आज इसी नारी को क्या हो गया है , हम उसे एक नौकर से ज्यादा नही समझते एक भोग की तुझ वास्तु से ज्यादा नारी की कोई इज्जत हमारी यानी की पुरुष प्रधान समाज मैं नही
रही आखिर इसकी वज़ह क्या है , हम अपने परिवार को समय नही दे पाते , माँ - बाप के लिए , बच्चों के लिए हमारे पास समय नही है . समय का अकाल सा पड़ गया है, हमारे पास यार - दोस्तों मै बैठने का समय है , उनसे गप्प मारने का समय है . लेकिन परिवार के लिए समय नही है . और बीवी कुछ बोल दे तो हम उसकी पिटाई कर दे ते है या उसे उसके मायके भेज देते है !
मुझे एक कहानी याद आ रही है .

http://meriduniya123.rediffiland.com/blogs/2009/11/09/Naari.html

अमिता शर्मा –

शादीयाफ्ता इश्‍क की दास्‍तां

'शादीयाफ्ता' शब्‍द सुनते ही सजायाफ्ता शब्‍द दिमाग का दरवाजा खटखटाने लगता है। शादी के बारे में आमराय तो यही है कि यह वो बला है जिसका काटा उफ् तक नहीं करता। शादी के आपनी ही पत्‍नी से इश्‍क की कोई दास्‍तां भी हो सकती है कहने वाला कोई सिरफिरा ही हो सकता है यह एक स्‍थापित सत्‍य सा है। कोई भी यह सुनने वाला झट से कह देगा शादी के बाद दासता तो देखी है पर इश्‍क की दास्‍तां न सुनी न देखी है। शादी के बाद इश्‍क शेष ही कब रहता है अगर कुछ रहता है तो वह इश्‍क कर अवशेष होता है।
पर मैं यह बात दावे के साथ पूरे होशोहवास में, दुरूस्‍त दिमागी हालत में, कह रही हूं। कलमकार की शंकर की तरह तीसरी आंख जो होती है। वह दिखने वाली वस्‍तु के अंदर का भी देख लेता है। वर्डसवर्थ इसे "इनवर्ड आई" कहते थे। मेरी तीसरी आंख ने अपने देश के एक बहुचर्चित नेता में प्रेमी शहंशाह शाहजहां की झलक देखी है। बल्कि मेरा तो मानना है वह शाहज‍हां से भी ऊँचे दर्जे का प्रेमी कहा जा सकता है।

http://webmedia.rediffiland.com/blogs/2008/11/04/.html

 

यूँ तो और भी ऐसे सैकड़ों (हजारों?… शायद हाँ!) हैं, मगर अभी के लिए इतना ही. आप अगर वहाँ कुछ खोजबीन करना चाहें तो लिंक यह रही.

१४-११-२००९

हमहूँ मुक्तिबोध बनिके बीड़ी सुलगैबे।

 

1.प्लास्टिक डिस्पोजल : अस्सी से सौ साल खा जायेगा भैया तब तक बैठो, टिपिया।

2.शायद वो नज़्म थी .:तभी किसी शोख गीत से चिहुंक गयी।

3.कहा था तुमने की कभी बुझना नहीं.....मैं लगातार जल रहा हूँ॥: आओ जिसको रोटियां-फ़ोटियां सेंकनी हो आकर सेंक ले।

4.इस वारदात में मेरा कोई हाथ नहीं है: फ़िर ससुर ये बारदात हो कैसे गयी?

5.मियां करे दलाली, ऊपर से दलील!!: जो सुनेगा वो करेगा सरेआम जलील

6.हम बोलें क्या तुमसे के क्या बात थी: रहने दो बातें बिन बात की

7.हमारा डिकोड तंत्र !: अपना काम करके ही मानता है।
8.प्लेटफार्म पर भटकता बचपन :बिना प्लेटफ़ार्म टिकट के टहलता मिला
9.हमहूँ मुक्तिबोध: बनिके बीड़ी सुलगैबे।

10.बता, तेरा धर्म क्या है बे?: एक ठो पोस्ट लिखनी है धर्म पर!
11.बहुत हो गया अब देखिए तरह तरह की मोनालिसा: इसके लिये कोई लियो नार्दो द विंसी थोड़ी चाहिये।

12. समंदर ने मुझे प्यासा ही रखा...: उसके फ़्रिज में मिनरल वाटर था ही नहीं।

13.मंगल के घर में शनि बैठा है .. क्‍या यह खिल्‍ली उडानेवाली बात है ??: बिल्कुल नहीं बशर्ते शनि नियमित किराया देता रहे।

14. ब्लॉगर दोस्तों, आपके बिचार !:  भी हिटलरी हैं क्या?

15.मैं नाम तलाश रही हूँ : खो गया है तो एफ़ आई आर करा दीजिये पहिले।

16. एक मोटर साईकिल जो सालों पहले खड़ी की थी अब उसकी हालत देखिये….: पेड़ की नीव बन गयी है।

17. मोमबत्तियाँ बुझा देती हूँ और आँसू पोछ देती हूँ: दो काम ही निपट जायेंगे।

18.अब किसानों को गन्ने की मूल्य 180 रुपए प्रति क्विंटल मिलेगा: दलाली के बारे में कोई खुलासा नहीं है।

19.ढोंगी बाबाओं के अमीर भक्त: पत्रकार हषवर्धन के निशाने पर

20.न भाषा की जरूरत और न ही लिपि की दरकार: आज ऐसे ही चलेगा, बाल दिवस है सरकार।

21.हिन्दी के मुंह पर हिंदुत्व का तमाचा: ह वर्ण की आवृति से अनुप्रास अलंकार की छ्टा दर्शनीय है।

ज्ञानजी जन्मदिन मुबारक

ये एक लाइना लिखकर हम चर्चा पोस्ट कर दिये थे तब ध्यान आया कि आज तो ज्ञानजी पैदा लिये थे और विवेक सिंह अच्छे बनने की कसम खा लिये हैं। देखिये विवेक का चलते चलते:

image ज्ञानदत्त जी हो गये, चौवन साला आज ।

करत रहें ब्लॉगिंग सदा, कभी न आयें बाज ॥

कभी न आयें बाज, दुआयें लगें हमारी ।

करते ब्लॉगर-श्रेष्ठ बिलागिंग सबसे न्यारी ॥

विवेक सिंह यों कहें, मचाते मन में हलचल ।

इलाहबाद में बसें, सुनें गंगा की कलकल ॥

वैसे ज्ञानजी के पिछले जन्मदिन पर हम एक ठो पोस्ट लिख चुके हैं --

बाल दिवस पर ज्ञान दिवस

ऊ पोस्ट आज भी काम करेगी। इसके पहले के और लेख उनकी तारीफ़ में लिखे गये वे हैं:

ज्ञानजी, जन्मदिन मुबारक!

ज्ञानजी हिंदी ब्लागजगत के मार्निंग ब्लागर हैं

इन लेखों में हमने जो कहा वो आज भी सच है, सच के सिवा कुछ नहीं है। ज्ञानजी ने भी एक लेख में लिखा था--मित्रों, आप तो मेरा पर्सोना ही बदल दे रहे हैं!

ये लेख अभी मैंने दुबारा पढ़े और आनन्दित हुआ। देखे शायद आप भी आनन्दित हों।

ज्ञानजी को एक बार फ़िर जन्मदिन मुबारक।

१३-११-२००९

तनावग्रस्त पुरुषों की मदद कीजिए....

दो दिन पहले , बहुत दिन के गैप के बाद लॉगिन हुई तो सन्देशों व चैटों की बाढ आ गयी अच्छा लगा कि कम से अपनी अनुपस्थिति दर्ज हुई है :)
आज फिर लिखने से बच रही थी और बहाना था कि आज की चर्चा तो हो चुकी ।लवली ने उसमे घोषणा की है कि वे आज से विज्ञान सम्बन्धी चिट्ठों की चर्चा करेंगीं।
स्त्री विमर्श के संदर्भ मे अक्सर यह सुनने को ही मिलता है कि ये वे औरते हैं जिनके घर कभी बसे नही और मर्दों से इन्हें चिढ है ,इनका स्त्री विमर्श दर अस्ल इनकी भड़ास ही है।यूँ कहने को और भी बहुत कुछ कहा जाता है लेकिन बसंती की तर्ज़ पर यूँ कि देखने वाली बात ये है कि इन्हीं उत्तर औपनिवेशिक विमर्शों के ज़रिए इतिहास मे दफ्न हो गयीं , दमित अस्मिताओं ने सर उठाना सीखा है और अब उनके बारे मे बात होती है ...ब्लॉग पर भी।

देखने वाली बात यह भी है कि स्त्री की इस भड़ास को मज़ाक का विषय , मज़े का विषय भी बनाया जा चुका है , यूँ कि पुरुष स्त्री को मारे (आँख या कुछ भी) यह सामान्य बात है (हाथी चूहे को रौब दिखाए , कुछ अजीब नही ) पर चुटकुला तभी बनता है कि जब स्त्री पुरुष को मारे , जैसे चुटकुलों मे चूहा हाथी को कहे 'अबे सुन बे '- केवल एक बिम्ब है सच मे स्त्री चूहा है और पुरुष शेर है यह नही कहना चाहती ;सशक्त और दमित के सम्बन्ध दिखाना भर मकसद है ।"जब वी मेट" मे अकेली लड़की जब रात को स्टेशन पर छूट जाती है यही होता है।स्टेशन मास्टर भी ज्ञान देता है -अकेली लड़की खुली तिजोरी की तरह होती है !
ऑलरेडी सशक्त का किसी दमित से स्वेच्छा से पिटना खबर भी है और चुटकुला भी।और स्त्री से खुशी से पिटना भी मज़ा है (ईव टीज़िंग के दौरान लड़की थप्पड़ मारने की बात कहे तो शोहदे कहते हैं न 'मारो तो सही मैडम !') इसी को समझ कर चीन के इस व्यक्ति ने यह व्यवसाय ढूंढ निकाला।यह व्यक्ति सच मे भले न हो लेकिन यह चुट्कुला तो है ही जिसके पीछे की प्रवृत्ति पर अभी मैने बात की।
उत्तर-पूर्वी चीन के शेनयांग के जियाओ लिन नाम का यह शख्स एक जिम का कोच है। उसने तनावग्रस्त महिलाओं को अपनी भड़ास निकालने के लिए खुद को एक पंचबैग की तरह इस्तेमाल करने के लिए पेश किया है। लिन को आधे घंटे तक पीटने के लिए महिलाओं को करीब सात सौ रुपए खर्च करने पड़ते हैं। उनका कहना है कि ऐसा करके वह तनावग्रस्त महिलाओं की मदद कर रहे हैं।


उस पर से यह भी कि वे जल्दी थक भी गयीं और बातें करने लगीं (अशक्त होने का प्रमाण भी प्रस्तुत है )यूँ भी तनाव ग्रस्त महिलाओं की मदद को कुछ पुरुष कभी भी आतुर पाए जाते हैं :)
न ही छेड़ने वाले पुरुष कहीं पिटते हैं न ही पतियों का पिटना या मानसिक शोषण कोई सामान्य घटना है ।



महफूज़ अली said...

aap yeh punch bag wala job kar lijiye..... kam se kam maar khaane ke baad khoobsoorat ladkiyon ka saath bhi milega....to sara dard waise hi door ho jayega..... hahahahahaha....... aur paise to khair milenge hi milenge..... hahahaha......


डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

ksii ko bhi kar lijiye, dono men majaa hai.....paisaa hai.....aish hai........
badhaai agrim pesh hai.......

pankaj vyas said...

aap koi bhi job kare, mujhe helpar bana lijiyega, maja aayega...


अन्तर सोहिल said...

दोनों कार्य एक साथ भी किये जा सकते हैं।
आपका पहला प्रतिद्वंदी मैं हूं, अभी और भी आते ही होंगें।
Anonymous said...

नौकरी न कीजिये, घास खोद खाईये
हमारी राय में तो आप अपना व्यवसाय ही करे तो सही है :)

आप तनावग्रस्त महिलाओं की मदद करें तो भला है
(लेकिन ये सेवा तनावग्रस्त पुरुषों के लिये कभी भी भूल कर उपलब्ध नहीं कराईयेगा...)

RAJNISH PARIHAR said...

दुसरे वाला जॉब ठीक रहेगा....कल को काम ही आएगा साथ में ट्रेनिंग भी हो जायेगी....


dhiru singh {धीरू सिंह} said...

दूसरा वाला ठीक लग रहा है . वैसे भी पिट तो रहे है पिट्ने के लिये पैसा मिल जाये तो क्या बुरा है

(प्वाइंट टू बी नोटेड - पिटने के लिए पैसा किसी स्त्री को नही मिलेगा, वे तो यूँ ही मुफ्त मे पिट लेती हैं , बलत्कृत हो लेती हैं वगैरह वगैरह )

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

पंचबैग वाला पार्ट टाइम कर लीजिए।:)
बाकी शहरों की सैर तो वाकई मजेदार है।

Vivek Rastogi said...

हिट मी जाब बढ़िया है वह तो मैं भी करने की सोच सकता हूँ, अच्छी तरकीब है पर उसकी मार्केटिंग करना भी टेढ़ी खीर है। :)

वाणी गीत said...

हिट मी जॉब - ये जॉब या व्यवसाय ... सबसे बेहतर लगा ..!!

यूँ इस मुद्दे पर भेजा बन्द करके राय दी जाए तो मै भी शायद यही कहती कि दूसरे वाला व्यवसाय कीजिए क्योंकि उसमे वाकई कष्ट की जगह आनन्द है ।लेकिन ये सलाह देते हुए ध्यान रखें - आपके शब्द आपकी मानसिकता बयाँ कार्ते हैं और फिर धीरे धीरे आपकी कार्यशैली मे आ जाते हैं इस तरह कि उसमे कुछ अजीब नही लगता ।

चर्चा विज्ञान आधारित चिठ्ठों की

नमस्कार, चिठ्ठाचर्चा के विज्ञान चर्चा के अंक में मैं लवली आपका हार्दिक अभिनंदन करती हूँ. चिठ्ठाचर्चा की १०००वीं पोस्ट पूरी होने की ख़ुशी में अनूप जी ने पोस्ट लिखी. मैंने आदतन उसपर विज्ञान चर्चा के लिए किसी को नियुक्त करने के लिए कहा क्योंकि कई विज्ञान आधारित चिठ्ठे चर्चाकार की नजरों में आने से छूट जाते थे. अनूप जी ने मेरी टिप्पणी के जवाब को सवालनुमा बनाते हुए मुझे जवाब दिया "विज्ञान चर्चा लवली करेंगी?"

मैं बहुत अनियमित ब्लॉगर हूँ, पर और कोई नाम ऐसा दिखा नहीं कि जिसे लेकर जिम्मेवारी उठाने से बचूं ..और विज्ञान प्रचार-प्रसार का मौका भी नही छोड़ना चाहती थी इसलिए अनियमितता की शर्त के साथ तैयार हो गई.

आज की चिठ्ठा चर्चा पोस्टों पर कम चिठ्ठों पर अधिक...अगर आपका कोई विज्ञान विषयक चिठ्ठा है, जिसकी चर्चा आप यहाँ चाहते हैं, तो कृपया टिप्पणी में लिंक देने का कष्ट करें. मैं अपनी जानकारी के अनुसार जिन चिठ्ठों को अब तक पढ़ती आई हूँ उनका उल्लेख करके आज से विज्ञान चर्चा आरंभ कर रही हूँ.


सबसे पहले विज्ञान को लोकप्रिय बनाने वाले चिठ्ठे तस्लीम की नई पोस्ट - बहुत घातक सिद्ध हो रहा है प्रेमचन्द का सांप काटने का “मंत्र” ...फिर हिन्दी ब्लॉगर्स के लिए दो अवार्ड- नामिनेशन खुला है, साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन द्वारा.

अगर आपकी रूचि विज्ञान कथाओं और फंतासी में है तो आपके लिए कल्किआन हिंदी अच्छी जगह हो सकती है...वैसे एक हास्य विज्ञान कथा "प्लैटिनम की खोज" यहाँ भी चल रही है लिखने वाले हैं जीशान जैदी जी जिन्हें रूचि है, देख सकते हैं. यह है शरद जी का ब्लॉग "न जादू न टोना" सिर्फ अन्धाविश्वाशों के विरुद्ध एक सार्थक प्रयास .. अंतिम पोस्ट है -"मुझे कर्णपिशाचिनी की सिद्धी प्राप्त है।".

डाक्टर प्रवीण जी महिलाओं को ब्रेस्ट कैंसर से बचाव की जानकारी दे रहे हैं मीडिया डाक्टर में. मेरी सिफ़ारिश है महिलाएं जरुर पढें.

वैसे यह विज्ञान का मामला सीधे - सीधे नही है, पर विज्ञान किसलिए है, इसलिए की प्रकृति को मानव के अनुकूल बना सके..तो आप यह पोस्ट अवश्य पढ़े और सोंचिए की प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किस कगार पर ले जाता है मानव को... चिठ्ठा है इयत्ता-प्रकृति. प्रकृति से ही संबधित यह है बाल सुब्रमण्यम जी का चिठ्ठा कुदरतनामा जिसकी अंतिम पोस्ट है - "गिद्धों को खाते हैं बपाटला के लोग" उसके बाद अपडेट नही हुआ..

जाते -जाते एक जरुरी बात पंकज अवधिया जी का चिठ्ठा बड़े दिनों से अपडेट नही हुआ ..वे अक्सर वैज्ञानिक खोजों के बहाने जेब साफ करने वाले उपक्रमों पर लिखते थे....कोई भाई -बंधु उनके बारे में जानकारी दे सके तो आभारी रहूंगी.

आज के लिए इतना ही फिर मिलते हैं अगली विज्ञान चर्चा में....आपका दिन शुभ हो.

१२-११-२००९

मन पछितैहै अवसर बीते

 

महाराष्ट्र में विधायक द्वारा हिन्दी में शपथ लेने पर उसकी पिटाई पर अलग-अलग प्रतिक्रियायें देखने को मिलीं। धीरू सिंह मानते हैं कि वन्देमातरम ,मराठी हिन्दी जैसे विवाद प्रायोजित है क्योकि महंगाई पर ध्यान ना जाए वहीं अर्कजेश कहते हैं कि हिन्दी बोलने पीट दिया किसी ने तो इसमें नया क्या है भाई ये तो बहुत दिन से होता आ रहा है।

लवली ने अपने लेख आदिमानव और ईश्वर की खोज में बताया है कि मानव का समाजीकरण प्रकृति की जैविक व्यवस्था के विरुद्ध था. अंतर्विरोधों से संघर्ष करते हुए मनुष्य समाजिकता और सभ्यता की सीढियाँ चढ़ता गया, जटिल होता गया...ईश्वर की अवधारण को कई रूपों में (जैसे चित्रों, गीतों, कहावतों, कहानिओं और लिखित दस्तावेजों द्वारा) अगली पीढी को हस्तान्तरित करता गया..और इसके साथ कई पिढि़ओं से संग्रहित भय (जो उसे अपने बनैले पूर्वजों से विरासत मिला था)भी जटिल होता गया. ईश्वर की अवधारण भी देशकाल समाज के अनुसार बदलती रही...जो आज आपके सामने कई नवीनतम रूपों में उपस्थित है.

इस आलेख को बेहतरीन बताते हुये प्रवीण शाह ने टिप्पणी व्यक्त की परन्तु इस चर्चा के मूल भाव को तभी समझा जा सकता है जब पाठक ईश्वर और धर्म संबंधी माँ के दूध के साथ मिले अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त होने का साहस दिखा सके...

 

                             

image समीरलाल आजकल घणे आध्यात्मिक होते जा रहे हैं। उनके लेखन का स्तर ऊंचा हो गया है और वे अब इशारों में बात करने लगे हैं। आज देखिये उन्होंने क्या पता-कल हो न हो!!-एक लघु कथा के माध्यम से सीख दी कि -जब मिले, जैसे मिले, खुशियाँ मनाओ! क्या पता-कल हो न हो!! 

इस समीर संदेश को पकड़ा खुशदीप सहगल ने और कहा

कल क्या होगा, किसको पता
अभी ज़िंदगी का ले ले मज़ा...
गुरुदेव, बड़ा गूढ़ दर्शन दे दिया....क्या ये पेड़ उन मां-बाप के बिम्ब नहीं है जिनके बच्चे दूर कहीं बसेरा बना लेते हैं....साल-दो साल में एक बार घर लौटते हैं तो मां-बाप उन पलों को भरपूर जी लेना चाहते हैं,,,,

समीरलालजी ने खुशदीप की बात को सही करार दिया और कहा- बहुत सही पकड़ा खुशदीप...यही तो वजह है कि तुम... :)  अब इस पकड़म-पकड़ाई में हम यह समझ नहीं पा रहे हैं कि तुम और इस्माइली के बीच क्या है? इसे कौन पकड़ेगा? क्या यह अबूझा ही रह जायेगा?

जगदीश भाटिया लिखते हैं -हिंदी ब्लॉग खोज रहे हैं? आपके बगल में ही है अगला हिंदी ब्लॉग

इस ज़िद को बचाये रखना अल्पना जी में कहानीकार अल्पना मिश्र द्वारा एक पुरस्कार को लेने से मना कर देने की कहानी पढ़िये और अल्पना मिश्र की बड़ाई कीजिये।
कर ली है नौकरी,तोड़ दी बंदूक,फ़िर छोड़ेंगे नौकरी,फ़िर खरीद लेंगे बंदूक। में अनिल पुसदकर अपनी नयी नौकरी पकड़ने की बात बताते हैं और कहते हैं:
नई नौकरी कोई नई बात नही है लेकिन इस बार मेरे साथ एक नया परिवार भी है ब्लाग परिवार सो इस बार की खुशी आप सभी से बांट रहा हूं।ये थोड़ा लम्बी चली ऐसी दुआ करना।मुझे नौकरी की ज़रुरत नही है फ़िर भी मै भी नौकरी करके नौकरी छोड़ू की ईमेज भी तोड़ना चाहता हूं।आप लोगों का स्नेह,आशीर्वाद निश्चित ही मेरा मनोबल बढायेगा।

 

वर्ष-2009 : हिन्दी ब्लॉग विश्लेषण श्रृंखला (क्रम-9) में जानिये हिन्दी ब्लागिंग के सफ़र के बारे में।

 

एक लाईना:

१.कर ली है नौकरी,तोड़ दी बंदूक,फ़िर छोड़ेंगे नौकरी,फ़िर खरीद लेंगे बंदूक।: अब ये मत पूछियो की कारतूस कहां से आयेंगे।

२. कैटी भाभी से चुपके चुपके शादी करली? दगाबाज कहीं के!: पत्तल उठवाने तक न पहुंचे।

३."सजा मौत की दे दो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"): मिलेगी शास्त्रीजी सब मिलेगी लेकिन सीनियारिटी से।

४.कुछ यादें इक गृह विरही की ....: घर में बैठकर लिखी जा रही हैं।

५. वो कोन था??: जो जान बचाकर निकल लिया।

६.आदमी को पकाने की विधि !!!!: सबको पता है यहां वही तो चल रहा है।

७.गलत समझने का आनंद !: ही कुछ और होता है।

८.तुम्हारा सौन्दर्य और मेरा पागलपन.: अक्सर ब्लाग पर मिलते हैं।

९. चिट्ठाचर्चा: ये दुरूह आत्मपीडक कर्म कर कैसे लेते हैं आप?: परपीड़ा का भाव जोड़ लेते हैं बस हो जाता है।

१०.हम भैंस को माता क्यों नहीं कहते...खुशदीप:चलो तुम शुरू कहना।

११.खामोश रात में तुम्हारी यादें--------------(मिथिलेश दुबे ): बहुत हल्ला मचाती हैं।

मेरी पसंद

image "ऐसा नही है कि ये धुंध नया है !!"

धुंध होते आए हैं
और आँखें मात खाती रही हैं
जब जाड़े के दिनों में
साइकिल पे निकला करता था
सुबह-सुबह ट्यूशन के लिए,
ये धुंध तब भी किया करती थी परेशान
ये धुंध तो हटाये नही हटती थी
जब बारहवीं की परीक्षा में
पहले निस्कासित और फिर बाद में
अनुतीर्ण होना हो गया था
इस धुंध ने हाथ पकड़ लिए थे मेरे
जब एक उमरदराज़ औरत के प्रेम में था
और निकलना चाहता था
और तब भी जब मुझे पड़ने लगे थे
मिर्गी के दौड़े अचानक से
पढ़ाई पूरी होने के बाद
रोजगार की तलाश में
जब निकल आया था घर से मैं
तब भी बिल्कुल यही धुंध छाई हुई थी चेहरे पे
आज भी धुंध हैं कुछ
और मैं जानता हूँ आगे भी रहेंगे ये
क्यूँकि जिंदगी बिना धुंधों के सफर नही करती
अभी तक के सारे धुंधों से तो
निकाल लाए हो तुम,
ऊँगली पकड़े रखा है मेरा
और अकसर पूछते हो
कि मैं कहीं लडखड़ा तो नही रहा
और आश्वस्त हो जाते हो जान कर कि मैं सकुशल हूँ.
पर मैं सोंचता हूँ उन दिनो के बारे में
जब धुंध तो होगी, पर तुम नही रहोगे
तब मैं कैसे निकलूँगा उन धुंधों से पापा !!!

ओम आर्य

image

सपने में आई एक लड़की
अनदेखी सी
अनजानी सी
पर लगती थी
पहचानी सी
बतला रही थी
खिलखिला रही थी
जीने की आरजू जगा रही थी
फेर कर उंगलियाँ बालों में
खूब सारा दुलार लुटा रही थी
बैठाकर फिर मुझे साईकिल पर
मेरे सपनों को पंख लगा रही थी
कुछ दूर चली और बोली
चल साथी ऐसा करते है
किसी चेहरे पर मुस्कान रखते है...........
बहुत दिन हो गए
आसमान को एक ही रंग में रहते
आ अपने सपनों का रंग उस पर रंगते है.....
तलाशता रहा जिसे जिंदगी की गलियों में
ना जाने क्यूँ?
वो सपनो के चौराहों पर
मुस्कराती मिला करती है। सुशील कुमार छौक्करimage जब मैं प्रेम करता हूँ
तो अनुभव करता हूँ
कि सम्राट हूँ अपने समय का
मेरी अधीनता में है समूची पृथ्वी
इस पर विद्यमान तमाम चीजें
और मैं सूर्य की ओर दौड़ाए जा रहा हूँ अपना अश्व ।

निज़ार क़ब्बानी

और अंत में: फ़िलहाल इतना ही। कल ई-स्वामी की पोस्ट देखी जो उन्होंने चर्चा के बारे में लिखी। इसमें मेरी एक पुरानी पोस्ट की लिंक भी थी। उसमें मैंने लिखा था:

किसी चीज को पटरा करने के दो ही तरीके होते हैं:-

1.उसको चीज को टपका दो(जो कि संभव नहीं है यहां)

2.बेहतर विकल्प पेश करो ताकि उस चीज के कदरदान कम हो जायें.

झटकों में ऊर्जा होती है.उसका सदुपयोग किया जाना चाहिये.बात बोलेगी हम नहीं.ऐसे अवसर बार-बार नहीं आते.पता नहीं अगली मिर्ची कब लगाये कोई.

आपको अगर इस चर्चा से कोई झटका लगा हो तो उसका सदुपयोग करिये। पता नहीं अगला अवसर कब आये! मनपछितैहै अवसर बीते।

देखिये मिशिर सी बाकी सब छीलने के बाद गन्ना छीलते कित्ते क्यूट लग रहे हैं। बाकी क्या छील चुके हैं ये आपको उनसे खुद पूछना चाहिये वे बता भी रहे हैं आपको जानना है तो उनके ब्लाग पर जाइये और देखिये क्या शानदार रचनायें दे रहे हैं वे आजकल।

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१०-११-२००९

गर्व का हजारवाँ चरण : प्रत्येक ज्ञात- अज्ञात को बधाई


funny hindi Orkut scraps

आज का दिन बहुत विशेष है और इसे संयोग ही कहा जाएगा कि इस दिन की चर्चा का दायित्व अनायास ही मुझे करने का सुयोग मिला है | जिन कारणों से आज का दिन ऐतिहासिक है, उनमें से कुछेक का उल्लेख क्रमवार यहाँ किए जाने से पूर्व  इस चर्चा-मंच की परिकल्पना करने वाले संस्थापक, सभी चर्चाकार साथियों, इसकी साज सज्जा और रखरखाव आदि में प्रारंभ से आज तक अपने योगदान से निरंतर सहयोग देने वाले  हितैषी व अभिन्न शुभचिंतकों, मित्रों, सहृदय पाठकों, अपनी राय से अवगत कराने वाले बंधुओं व किसी भी रूप में इस से संबंद्ध प्रत्येक ज्ञात- अज्ञात व्यक्तित्व को आज मैं बधाई और धन्यवाद देना चाहती हूँ क्योंकि चर्चा के इस मंच पर आज मैं उपस्थित हुई हूँ चिट्ठाचर्चा की यह १००० वीं प्रस्तुति लेकर | इसका समस्त श्रेय इसके चर्चा मंडल के श्रम, समर्पण, निरंतरता, दायित्वबोध, पारस्परिकता, समयबद्धता, नूतनता के प्रति उत्साह, निरपेक्षता और निष्पक्षता को जाता है| प्रारंभ से व समय समय पर इसमें जो नए साथी जुड़ते गए, वे आज भी जुड़े हैं| भले ही वे आज नियमित रूप से चर्चा के लेखन से नहीं जुड़े हुए किन्तु वे आज भी इसकी चर्चा मंडली के स्थाई सदस्य हैं और चर्चा के इस मंच का मान हैं| उन सभी के प्रति यह मंच आभारी है, कृतज्ञ है, धन्यवादी है| .... और उस से भी बढ़ कर आभारी है  हिन्दी के नेट लेखन का तथा इस चर्चा मंच को जीवंत बनाए रखने वाले उन स्नेही साथियों का जिन्होंने  नित आकर इसे अपना दुलार, स्नेह सम्मान दिया|


आने वाले समय में कई और ऐसे मंचों की आवश्यकता अनुभव होगी, वे गठित होंगे, हो रहे हैं, स्वाभाविक है; किन्तु चर्चा के इस मंच की उपादेयता, ऐतिहासिकता व कालक्रम में इसकी सर्वांगीणता निस्संदेह है, प्रामाणिक है, सर्वविदित है,  चिरकालिक   और स्थाई है| इसमें कोई दो राय नहीं हो सकतीं| चर्चा के इस मंच के इतिहास को इन  अर्थों में बारम्बार दुहराना प्रासंगिक ही नहीं अवश्यम्भावी भी है कि आने वाले समय में इस नए इलेक्ट्रोनिक माध्यम को जनप्रिय बनाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपनी परम्परा ( भले ही वह चार-छह-आठ-दस वर्ष पुरानी ही क्यों न हो) विदित होनी चाहिए|  इन सन्दर्भों में  उस इतिहास  का खाका कुछ ऐसा है -





http://lh4.ggpht.com/_gonR097kmxE/SWiy93bY55I/AAAAAAAAFME/gjMCrVvhSUc/Anup%20Shukla%20(2)_thumb.jpgभारतीय ब्लाग मेला: सन २००४ के अखिरी दिन थे। उन दिनों हम लोगों को पता चला कि अंग्रेजी भाषा के चिट्ठाकार भारतीय ब्लाग मेला का आयोजन करते हैं। इसमें लोग बारी-बारी से ब्लागर ब्लागर ब्लाग मेला का आयोजन करते थे। जिस ब्लागर को आयोजन करना होता उसके ब्लाग पर लोग अपनी पोस्ट के लिंक दे देते और फ़िर वह उसके बारे में लिखता था। उदाहरण के लिये आप देखिये यजद का आयोजन जिसमें अतुल अरोरा, जीतेंन्द्र चौधरी के साथ-साथ मैंने भी अपनी पोस्ट के लिंक दिये थे। इसके बाद उसकी चर्चा की थी यजद ने अपने ब्लाग पर।

हम बड़े खुश हुये कि अंग्रेजी ब्लागर के मेले में हम भी अपनी दुकान चला रहे हैं। उन दिनों हिंदी के ब्लागर कम थे सो हम लोग भिड़ने के लिये अंगेजी ब्लागरों पर निर्भर थे। कोई न कोई बात हो जाती कि बहस करते रहते।

अंग्रेजी के ब्लागरों के अलावा एक बार (३७ वें संस्करण) ब्लाग मेला का आयोजन देबाशीष ने भी किया था। देबाशीष कुछ व्यक्तिगत चिट्ठे ब्लाग मेला के नियम के अनुसार शामिल नहीं किये थे।

सुनामी मेला और बहसबाजी: जनवरी २००५ का पहला ब्लाग मेला मैडमैन के जिम्मे था। सुनामी तूफ़ान हाल ही में आ के गया था। इसलिये मैडमैन ने सुनामी स्मृति ब्लाग मेला आयोजित किया। पहले की तरह हिंदी ब्लागर्स ने अपनी पोस्ट नामीनेट की। मैडमैन ने निम्नकारण बताते हुये हिंदी ब्लाग की चर्चा करने से मना कर दिया:-

That's it for this week, folks. I know some Hindi blog entries were nominated, but I've left them out of this mela, not because I'm a snobbish bastard, but because:


1) I studied Hindi for 10 years at school, and speak the language fluently, but haven't read any big chunks of Hindi since 1990. So my reading speed has reduced to a crawl.


2) The thin strokes of the text coupled with the low resolution of a PC monitor made it even harder to read the entries.


3) Some of the spelling mistakes (mostly misplaced matras) didn't help either.

करेले पर नीम चढ़ा कमेंट किया किसी सत्यवीर ने। उसने लिखा-
I agree that hindi blogs should have a different blog mela. It is better to keep regional languages at a different forum.

बस फ़िर क्या था। बमचक मच गई। हिंदी-अंग्रेजी बबाल मचा। देबाशीष(Indiblogger) जीतेंन्द्र चौधरी और इंद्र अवस्थी )
ने इसका विरोध किया। अंतत: खिसिया के मैंड्मैन ने अपना कमेंट का बक्सा बन्द कर दिया।

चिट्ठाचर्चा की शुरुआत :इसके बाद अतुल ने गुस्से से फ़नफ़नाती हुई पोस्ट लिखी- तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ? । मैंने मौज ली अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है । लेकिन हमें यह भी लगा कि हर समय हा हा, ही ही करना ठीक नहीं तो हम गम्भीर हो लिये। हमने चिट्ठाचर्चा ब्लाग शुरू किया। स्वागतम पोस्ट में हमने लिखा था-
भारतीय ब्लागमेला के सौजन्य से पता चला कि हिदी एक क्षेत्रीय भाषा है.यह भी सलाह मिली कि हिंदी वालों को अपनी चर्चा के लिये अलग मंच तलाशना चाहिये.इस जानकारी से हमारेमित्र कुछ खिन्न हुये.यह भी सोचा गया कि हम सभी भारतीय भाषाओं से जुड़ने का प्रयास करें.

इसी पोस्ट में हमने हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं के ब्लाग की चर्चा भी करने का मन बनाया था। कुछ दिन अंग्रेजी, सिंधी, गुजराती और मराठी के चिट्ठों की चर्चा करते भी रहे।

शुरुआती प्रतिक्रियायें: शुरुआत चिट्ठाचर्चा की अच्छी ही रही। हिंदी के अलावा अंग्रेजी के ब्लागरों ने इसमें रुचि दिखाई। प्रसेनजित ने अगले भारतीय ब्लाग मेले में इसका जिक्र किया। शायद आलोक ने कहा था कि वे तमिल चिट्ठों की चर्चा का काम देखेंगे।

शुरुआत के दिन: शुरू के दिनों में हम चर्चा एक माह में एक बार करते थे। फ़िर शायद पन्द्रह दिन में करते थे। सब मिलकर चर्चा करते थे। देबाशीष, अतुल, जीतेंद्र और मैं। आप शुरुआत के चिट्ठे देखें तो आपको हिदी ब्लाग जगत के साथ भारतीय ब्लाग जगत की तमाम बेहतरीन पोस्टें देखने को मिल जायेंगी।

मन उचट गया: शुरुआत के दिन अच्छे लगे। फ़िर जब संकलक आ गये तब लगा कि हम चर्चा करके कौन सा तोप चला रहे हैं। लोगों को ब्लागस के बारे में पता तो चल ही जाता है संकलकों से। इसके बाद धीरे-धीरे हमारे आलस्य ने हमारे उत्साह पर विजय पायी और चिट्ठाचर्चा हो गयी धरासायी।

फ़िर उछलकूद लेकिन गुप्त वाली: फ़िर देबाशीष ने कहा कि चिट्ठाविश्व के लिये चर्चा करो। चिट्ठाविश्व हिंदीब्लाग जगत का पहला संकलक है शायद जिसके बाद नारद , ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत आये। हम एक गुप्त ब्लाग में चर्चा करते और वह संक्षिप्त चर्चा चिट्ठाविश्व में पोस्ट हो जाती। अच्छा लगा कुछ दिन। फ़िर धीरे-धीरे वह भी बंद हो गया।

चिट्ठाचर्चा का अपहरण: इन्हीं दिनों शायद सितम्बर ,२००५ में किसी शहजादे ने चिट्ठाचर्चा का अपहरण कर लिया। बाद में मित्रों के प्रयासों से, शायद गूगल को भी लिखा गया था ,चिट्ठाचर्चा की वापसी हुई। लेकिन जब वापसी हुई तब तक........

पूरा वृत्तांत पढने के लिए आप को यहाँ जाना होगा, यहाँ आपको निम्न बिन्दुओं पर जानकारी मिलेगी -
  • दनादन चर्चा, महारथी चर्चाकार
  •  नारद की अनुपस्थिति में चर्चा
  • एक लाइना, आलोक पुराणिक और चिट्ठाचर्चा
  • नये चर्चाकार, विविधता 
  • बदलता समय और चिट्ठाचर्चा का स्वरूप  
  • फ़िलहाल की चिट्ठाचर्चा मेरी नजर में 



आप सभी से निवेदन है कि चर्चा के इस मंच को अपना स्नेह इसी अविचल  भाव से देते रहें व सद्भाव बनाए रहें|


 बधाई और धन्यवाद के क्रम से आगे बढ़ते हैं |





अभी अभी शलाका पुरुष प्रभाष जी हमारे मध्य नहीं रहे हैं| उन पर हिन्दी ब्लॉग जगत ने कई सुचिंतित व मार्मिक लेख लिखे| वह क्रम अभी भी चल रहा है| इसी कड़ी में जनसत्ता में प्रकाशित प्रभाष जी के सुपुत्र का यह आलेख मुझे पिताजी के माध्यम से पढने को मिला|










कल एक इमेल  सन्देश मुझे  वरिष्ठ व प्रख्यात भाषावैज्ञानिक प्रो. सुरेश कुमार जी का प्राप्त हुआ, जिसे पढ़ कर मुझे रोमांच हो आया| उसका अविकल पाठ यहीं दे रही हूँ -

प्रभाष जी नहीं रहे. उनके बिना हिन्दी पत्रकारिता पहले जैसी नहीं रहेगी. ’जनसत्ता’ के (मुख्यतया)7 नवम्बर के अंक में विभिन्न व्यक्तियों और संस्थाओं ने उन्हें जैसे याद किया उसकी रिपोर्टें छपी हैं. उनमें प्रभाष जी के लिए प्रयुक्त विशेष्य विशेषणों की एक सूची नीचे दी जा रही जिससे उनके केन्द्रीय व्यक्तित्व की एक झलक मिलती है. यह झलक उस बॄहत्तर प्रतिमा का अंश है जिसने ’जनसत्ता’ के 8 नवम्बर के अंक में (पृष्ठ 6-7 पर) उनके विषय में प्रकाशित लेखों में (जिन्हें ’विशेषण  डिस्कोर्स’ कहा जा सकता है) आकार ग्रहण किया है. सूची इस प्रकार है :

  • अभिभावक जैसा सम्पादक
  • हिन्दी पत्रकारिता का सूर्य
  • हिन्दी पत्रकारिता का शिखर पुरुष
  • हिन्दी पत्रकारिता का युग पुरुष
  • पत्रकारिता का शलाका पुरुष
  • पत्रकारिता का सशक्त स्तम्भ
  • निर्भीक पत्रकारिता का सशक्त स्तम्भ
  • पत्रकारिता का महान स्तम्भ
  • जनपक्षीय पत्रकारिता का महान और मज़बूत स्तम्भ
  • देश का वरिष्ठ पत्रकार
  • विलक्षण और प्रेरक पत्रकार
  • मूर्धन्य पत्रकार
  • उत्कृष्ट पत्रकार
  • निष्पक्ष पत्रकार
  • निष्पक्ष और बेबाक पत्रकार
  • हिन्दी पत्रकारिता का बडा हस्ताक्षर
  • खेल पत्रकारिता का भीष्म पितामह
  • हिन्दी पत्रकारिता के पुरोधाओं में से एक
  • उच्च कोटि का लेखक व चिन्तक
  • सुविख्यात, निडर व उत्कृष्ट लेखक
  • अपनी बेजोड लेखन शैली के लिए विख्यात
  • भाषा का जादूगर
  • शब्द और भाषा का जादूगर
  • लोकतन्त्र का सच्चा प्रहरी
  • असाधारण बौद्धिक और पेशेवर निष्ठा वाला
  • असाधारण बौद्धिक साहस का धनी
  • सर्वमान्य बुद्धिजीवी
  • बेलाग बोलने वाला बुद्धिजीवी
  • पत्रकारों की पूरी पीढी के लिए प्रेरणा स्रोत
  • प्रेरणा पुरुष
  • जन-पुरुख
 -     सुरेश कुमार
Prof Suresh Kumar
A-45, Welcome Apartments
Sector 9, रोहिणी
Delhi-110085




व्यक्तिगत रूप से प्रभाष जी पर केन्द्रित  जिन लेखों ने मुझे इन दिनों विशेष प्रभावित किया वे हैं -

प्रभाष जोशी  :  समय का सबसे समर्थ हस्ताक्षर

अभी न होगा मेरा अंत 

प्रभाष जोशी के न होने का अर्थ 

प्रभाष जोशी हिंदी के अंतिम समर्पित सेनानी




आज कवि सुदामा पाण्डेय धूमिल का जन्मदिवस है | रोचक (?) तथ्य यह है कि नेट पर तीन स्रोतों पर जाने से आप को जन्मतिथि को लेकर तीन अलग अलग स्थितियाँ दिखाई देंगी, जिन्हें मैंने नीचे सहेज दिया है | आप इस अवसर पर उनकी कुछ कविताओं की बानगी देखिए और फिर नीचे दी गयी वे प्रतिकृतियाँ भी |






(१)

मेरे सामने
तुम सूर्य - नमस्कार की मुद्रा में
खड़ी हो
और मैं लज्जित-सा तुम्हें
चुप-चाप देख रहा हूँ
(औरत : आँचल है,
जैसा कि लोग कहते हैं - स्नेह है,
किन्तु मुझे लगता है-
इन दोनों से बढ़कर
औरत एक देह है)


(२)

मेरी भुजाओं में कसी हुई
तुम मृत्यु कामना कर रही हो
और मैं हूँ-
कि इस रात के अंधेरे में
देखना चाहता हूँ - धूप का
एक टुकड़ा तुम्हारे चेहरे पर
(3)


रात की प्रतीक्षा में
हमने सारा दिन गुजार दिया है
और अब जब कि रात
आ चुकी है
हम इस गहरे सन्नाटे में
बीमार बिस्तर के सिरहाने बैठकर
किसी स्वस्थ क्षण की
प्रतीक्षा कर रहे हैं
(४)
न मैंने
न तुमने
ये सभी बच्चे
हमारी मुलाकातों ने जने हैं
हम दोनों तो केवल
इन अबोध जन्मों के
माध्यम बने हैं




धूमिल की कुछ कविताओं का अंग्रेजी रूपान्तर पढने का चाव रखने वालों के लिए भी नेट पर सामग्री है|




पुस्तकें खरीदने के लिए सुदूर बैठे पाठक अनुपलब्धता की बात नहीं कह सकते|




नेट पर जन्मतिथियों की स्थिति 



यहाँ (१) ....................................................        ................        .... (२)

जन्म: 09 नवम्बर 1936
निधन: 10 फरवरी 1975
उपनाम
धूमिल
जन्म स्थान
खेवली, जिला वाराणसी, उत्तरप्रदेश
कुछ प्रमुख
कृतियाँ

संसद से सड़क तक (1972), कल सुनना मुझे, सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र (1983)
विविध
कल सुनना मुझे काव्य संग्रह के लिये 1979 का साहित्य अकादमी पुरस्कार
जीवनी
धूमिल / परिच
Sudama Panday 'Dhoomil' (सुदामा पांडेय 'धूमिल') (November 7, 1936February 10, 1975, known mostly as Dhoomil, was a renowned Hindi poet from Varanasi, who is known for his revolutionary writings and his 'protest-poetry' [3][4], along with Muktibodh.
Known as the angry young man of Hindi poetry due to his rebellious writings [5], during his lifetime, he published just one collection of poems, 'Samsad se Sarak Tak', 'संसद से सड़क तक' (From the Parliament to the Street), but another collection of his work, titled "Kal Sunana Mujhe" 'कल सुनना मुझे' was released posthumously, which in 1979, went on to win the Sahitya Akademi Award in Hindi [6][7].




(३)
-   अब यहाँ हिन्दी पृष्ठ पर देखें | यहाँ अभी पृष्ठ बनने की प्रक्रिया में है, सो जन्मतिथि का उल्लेख नहीं है|


 

अस्तु, आगे बढ़ते हैं |







हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए आज का दिन कई अर्थों में महत्वपूर्ण है  क्योंकि आज लक्ष्मीमल्ल सिंघवी का भी जन्म दिवस है |





डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी ने हिंदी के वैश्वीकरण और हिंदी के उन्नयन की दिशा में सजग, सक्रिय और ईमानदार प्रयास किए। भारतीय राजदूत के रूप में उन्होंने ब्रिटेन में भारतीयता को पुष्पित करने का प्रयास तो किया ही, अपने देश की भाषा के माध्यम से न केवल प्रवासियों अपितु विदेशियों को भी भारतीयता से जोड़ने की कोशिश की। वे संस्कृतियों के मध्य सेतु की तरह अडिग और सदा सक्रिय रहे। वे भारतीय संस्कृति के राजदूत, ब्रिटेन में हिन्दी के प्रणेता और हिंदी-भाषियों के लिए प्रेरणा स्रोत थे। विश्व भर में फैले भारत वंशियों के लिए प्रवासी भारतीय दिवस मनाने की संकल्पना डॉ. सिंघवी की ही थी। वे साहित्य अमृत के संपादक रहे और अपने संपादन काल में उन्होने श्री विद्यानिवास मिश्र की स्वस्थ साहित्यिक परंपरा को गति प्रदान की। भारतीय ज्ञानपीठ को भी श्री सिंघवी की सेवाएँ सदैव स्मरण रहेंगी।[२]


कल का दिन हिन्दी के नाम पर कलंक लगाने वाले इतिहास का एक अन्यतम दिवस रहा| जब हिन्दी में शपथ लेने पर विधान सभा में हाथापाई और चाँटाबाजी  हो गयी| मन बार बार यही कहने का होता है ( जो बात निराला जी ने मुंशी प्रेमचंद  के अंतिम दिनों में हुई भेंट के संस्मरण लिखते समय कही थी) .... जाने दीजिए, निराला जी के शब्द क्या दुहराऊँ  .... अपने मुँह से क्या कहूँ अब!


  हिन्दी की इस दशा / दुर्दशा का सारा पाप हमारा है | हमने अपने स्वार्थपने, नीचता, आत्मकेंद्रिकता, छल प्रपंच और कलुष से माँ का चीर तार तार कर दिया है | कोई भी भाषा अपने बोलने वालों के चरित्र की वाहक होती है| किसी भी भाषा -समाज का चरित्र देखना हो तो उसकी भाषा की स्थिति को देख लीजिए....... |


यह धिक्कार हम पर है कि हमारी माँ बीच चौरस्ते निर्वस्त्र हुई जाती है और हम अपने अहम् पोसते केवल दूसरों की रेखाएँ छोटी करने की वितंडा में लीन हैं| ईश्वर हमें सद्बुद्धि दे |



इसी दुर्घटना पर आधारित एक लेख पढ़ा जाना चाहिए -


महाराष्ट्र विधानसभा के नये सत्र के पहले दिन मनसे के विधायकों ने मराठी भाषा के नाम पर ,हिन्दी में शपथ लेने वाले सपा विधायक अबू आजमी के साथ जो गुंडागर्दी की है. उसकी जितनी निन्दा की जाय कम है, ये न केवल भारतीय संविधान का अपमान है बल्कि हिन्दी भाषा के लिये यह बहुत बडा खतरा बन गया है.उस भाषा के लिए जो देश के लाखों- करोडो लोगो की अपनी भाषा है. आज जब अंग्रेजी हमारी भाषाओं के लिये खतरा बन गई है, उस समय सभी भारतीय भाषाओं को मिलकर इसके खिलाफ़ लड्ना चाहिये. इस तरह की हरकतें न केवल हमारी अखंडता और एकता में अनेकता को खत्म कर रही है. साथ ही जनसामान्य के बीच खाई भी पैदा कर रही है.



कुछेक पठनीय लेख और देखें -

 स्त्रियों को कु-पाठ पढाने की घिनौनी कोशिश...

एक-दूसरे के साथ जीने-मरने की कसमे क्या केवल कागजी बातें है...? सब मरे यह ज़रूरी नहीं लेकिन कुछ लोग ऐसे करते है तो उसकी आलोचना नहीं की जानी चाहिए. किसी को चिता में जबरन बिठाने का कोई अग्यानी ही समर्थन करेगा.  जोशी जी ने साथ-साथ जीने-मरने की उसी भावना का सम्मान किया था, जो अब लुप्त होती जा रही है. मै भी इस भावना का सम्मान करता हूँ. भविष्य में भी करता रहूँगा. शर्म तो उन नकली लोगो को आनी चाहिए जो समाज को-प्रगतिशील मूल्यों  के नाम पर-दिशाहीन कर रहे है. औरतो को गलत पाठ पढ़ा रहे है. मै ऐसे लोगो के खिलाफ लिखता रहूँगा और शर्मिंदा होता रहूँगा कि समाज का सत्यानाश करने वाले भी जिंदा है. वे लोग अपने स्टार पर मुझे भी गरियाते रहेंगे  कि 'ये पिछडा -गंवार कहाँ से आ गया, जो अनैतिकता के दौर में नैतिकता का कुपाठ पढा  रहा है? छिः...इसे तो मध्य युग में होना था', लेकिन मै हूँ aur अपनी मुहिम में लगा हुआ हूँ.



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सुकृति आर्ट गैलरी में कलाकारों की कृतियां डिस्प्ले की गयी थीं। उदघाटन की रस्म भंवरी देवी ने अदा की। पर ये रस्म अदायगी नहीं थी। पुरुष को समझने की कोशिश करते चित्रों की मुंहदिखाई की रस्म भंवरी से बेहतर कौन निभाता। वैसे भी, उन्होंने पुरुष की सत्ता को जिस क़दर महसूस किया है, शायद ही किसी और ने किया हो पर अफ़सोस… अगले दिन मीडिया ने उनका परिचय कुछ यूं दिया, फ़िल्म बवंडर से चर्चा में आयीं भंवरी…!
+++
इस मौक़े पर चर्चित संस्कृतिकर्मी हरीश करमचंदानी ने 15 साल पुरानी कविता सुनाई, मशाल उसके हाथ में। भंवरी देवी के संघर्ष की शब्द-यात्रा।
+++
 [[और अंत में... एक बड़े अधिकारी की पत्नी ने कहा, भंवरी देवी को प्रदर्शनी की शुरुआत करने के लिए क्यों बुलाया गया? मुझसे कहतीं, मैं किसी भी सेलिब्रिटी को बुला देती! अफ़सोस कि ऐसा कहने वाली खुद को कलाकार भी बताती हैं। (कानों सुनी)]]



कुछ दिन से कई ईमेल द्वारा एक आह्वान की सूचना मिल रही थी आज सोचा जा कर उसे देखा जाए| जो देखा वह यह पाया -





This message from the youth of the community should be read in its letter and spirit that while we want to go home we do not want to sit with the government who trivialises the issue of our return.It isnt as if we had merrily left one day only to return now because they will pay us 7.5 lac rupees.Make no mistake about it.Let the government first show some resolve.Let them fast track cases related to killing of Kashmiri Pandits.Let there atleast be one conviction.Let them de-encroach the land of our shrines.




कवि प्रियंकर की वैवाहिक वर्षगाँठ की सूचना मुझे उन्हीं द्वारा अपनी धर्मपत्नी के लिए जारी इस रोचक और स्नेह पूर्ण सन्देश से मिली

Priyankar PaliwalPriyankar Paliwal सहजीवन के शानदार बीस वर्ष और प्रमिला के लिये एक गीत :

Twenty years of conjugal bliss and a song for Pramila :




आप ने सबसे ऊपर लगा "चल-चित्र" देखा होगा उसका सम्बन्ध भी खोज रहे होंगे तो बात यह है कि वह अनिमेटेड चित्र  मानो इनकी भावना को ही व्यक्त कर रहा है जब ये कहते हैं कि -

अपने तमाम गुस्से के साथ मैं बाहर आया। बाहर आकर मैनें मन ही मन यह इच्छा जाहिर की कि काश यह एक सामान्य फिल्म निकल जाये। इस फिल्म मे वह सब वहो ही नहीं जिसकी इच्छा लिये मैं एक सौ चालीस – पचास किलोमीटर आया था। मैं सोचता रहा कि काश यह डॉक्युमेंट्री फिल्म निकल जाये। काश सीरी फोर्ट मे अजीबोगरीब नियम लगाने वाले का लैपटॉप खो जाये, तमाम।



स्वगत  पर कुछ दिन पूर्व आई प्रविष्टि पर भी एक दृष्टि डालें -



संदेह - दृष्टि
बोर्हेस ने ‘द रिडल ऑफ पोएट्री’ में कहा है- ‘सत्तर साल साहित्य में गुज़ारने के बाद मेरे पास आपको देने के लिए सिवाय संदेहों के और कुछ नहीं।‘ मैं बोर्हेस की इस बात को इस तरह लेता हूं कि संदेह करना कलाकार के बुनियादी गुणों में होना चाहिए। संदेह और उससे उपजे हुए सवालों से ही कथा की कलाकृतियों की रचना होती है। इक्कीसवीं सदी के इन बरसों में जब विश्वास मनुष्य के बजाय बाज़ार के एक मूल्य के रूप में स्थापित है, संदेह की महत्ता कहीं अधिक बढ़ जाती है। एक कलाकार को, निश्चित ही एक कथाकार को भी, अपनी पूरी परंपरा, इतिहास, मिथिहास, वर्तमान, कला के रूपों, औज़ारों और अपनी क्षमताओं को भी संदेह की दृष्टि से देखना चाहिए।





गत दिनों सुशांत सिंहल जी से उनकी साईट के माध्यम से परिचय हुआ| प्रो. योगेश छिब्बर जी की एक कविता ने उनसे परिचय करवाया |  पिछले दिनों  वन्दे मातरम्  को लेकर जिस प्रकार का अवांछनीय वातावरण निर्मित किए जाने की घटनाएँ हुई हैं, उन दिनों माँ, जननी, मातृ-भू, माता आदि  संकल्पनाओं को अनायास ही राष्ट्र व धरती के साथ जोड़ कर देखने वाली परम्परा का स्मरण हो आता रहा| वह परम्परा भले ही वेद की ऋचाओं में "माता भूमि: पुत्रोहम् पृथिव्या: " का आदेश हो अथवा लंका जय के पश्चात राम का लक्ष्मण को लंका के वैभव को धूल समझने का विमर्श देते समय कहा गया -


अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते |
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी || 



या आधुनिक हिन्दी साहित्य में भारतेंदु काल से काव्य में  राष्ट्रभक्ति और भारत माता की प्रतिष्ठा करने की परम्परा| सभी स्थानों पर जननी व जन्मभूमि एक शब्द युग्म की भांति आते हैं| मेरे  मन की डूबती उतराती संवेदनाओं पर जिस कविता ने मरहम रखा, उसे पढ़ कर एक बारगी तो आप भी दंग रह जाएँगे| यहाँ  उसका यथावत् पाठ देखिए -


दुःख थे पर्वत, राई अम्मा
हारी नहीं लड़ाई अम्मा ।

लेती नहीं दवाई अम्मा,
जोड़े पाई-पाई अम्मा ।

इस दुनियां में सब मैले हैं
किस दुनियां से आई अम्मा ।

दुनिया के सब रिश्ते ठंडे
गरमागर्म रजाई अम्मा ।

जब भी कोई रिश्ता उधड़े
करती है तुरपाई अम्मा ।

बाबू जी तनख़ा लाये बस
लेकिन बरक़त लाई अम्मा।

बाबूजी थे छड़ी बेंत की
माखन और मलाई अम्मा।

बाबूजी के पांव दबा कर
सब तीरथ हो आई अम्मा।

नाम सभी हैं गुड़ से मीठे
मां जी, मैया, माई, अम्मा।

सभी साड़ियां छीज गई थीं
मगर नहीं कह पाई अम्मा।

अम्मा में से थोड़ी - थोड़ी
सबने रोज़ चुराई अम्मा ।

अलग हो गये घर में चूल्हे
देती रही दुहाई अम्मा ।

बाबूजी बीमार पड़े जब
साथ-साथ मुरझाई अम्मा ।

रोती है लेकिन छुप-छुप कर
बड़े सब्र की जाई अम्मा ।

लड़ते-सहते, लड़ते-सहते,
रह गई एक तिहाई अम्मा।



अनंतिम
अब उसी  नगर का एक और चेहरा देखें और मुझे विदा दें | हाँ इतना ध्यान अवश्य रखें कि चर्चा की १००० वीं  प्रविष्टि  होने की या अन्य सूचनाओं पर बधाई आदि देने से बढ़कर कुछ अधिक भी कहें| चर्चा पर किए जाने वाले श्रम में किसी चर्चाकार का कोई स्वार्थ नहीं होता है अतः चर्चा के इस मंच पर जब जब आप को किसी भी प्रकार का श्रम और समर्पण दिखाई दे तो अपनी भावनाओं को अवश्य व्यक्त करें , ये भावनाएँ औपचारिक शाबाशी से जितनी इतर होती हैं उतनी सुखदाई होती हैं | आप के लिए सर्वमंगल की कामनाओं  सहित इस चित्र के साथ अब विराम लेती हूँ |







 

चिट्ठाजगत में ताजातरीन

चिट्ठाचर्चा क्यों ?

यह चिट्ठा.दुनिया की हर भाषा के किसी भी चिट्ठाकार के लिये इस चिट्ठे के दरवाजे खुले हैं.यहां चिट्ठों की चर्चा हिंदी में देवनागरी लिपि में होगी. भारत की हर भाषा के उल्लेखनीय चिट्ठे की चर्चा का प्रयास किया जायेगा.अगर आप अपने चिट्ठे की चर्चा करवाना चाहते हैं तो कृपया टिप्पणी में अपनी उस पोस्ट का उल्लेख करें.यहां हर उस पोस्ट का जिक्र किया जा सकता है जिसकी पहले कभी चर्चा यहां नहीं हुयी है.चाहे आपने उसे आज लिखा हो या साल भर पहले हम उपयुक्त होने पर उसकी चर्चा अवश्य करेंगे. वैसे यहां कोई बंधन नही है पर सामाजिक नजरिये से नकारात्मक ब्लाग की चर्चा से हम बचने का प्रयास करेंगे. यह काम सामूहिक रूप से हिंदी चिट्ठाकारों की सहमति सहयोग से होगा पूरा आलेख यहाँ >>
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