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गुरुवार, सितंबर 11, 2008

और भी काम हैं जमाने में...

जब दो तीन महिने भारत से ठकुरासी करके लौटते हैं तो पहले दिन ऒफिस जाते ही दस मिनट हालचाल पूछने का शिष्टाचार निभाने के बाद ऐसा काम लादा जाता है कि प्राण ही निकल आते हैं. लगता है कि गये ही क्यूं इतने दिनों के लिए भारत और गये थे तो लौटे क्यूं? बॉस को देखकर लगता है कि बस चले तो यहीं दबोच कर मारें.

कुछ ऐसे ही भाव, माफ करियेगा, फुरसतिया जी के लिए इस समय मेरे मन में मचल रहे हैं. आज ही इत्ती ऊँची टंकी से ४८ घंटे आराम करके उतरे हैं और ये हैं कि हालचाल तो दूर, पहले ही घोषणा किये चाय सिडुक रहे हैं कि आज समीर लाल चर्चा करेंगे.

क्या खाक चर्चा करें? हाथ तो चले की बोर्ड पर. अभी दिन भर ऒफिस करके लौटे हैं. आज तो पूरी टिप्पणियां भी नहीं निपटा पाये इनके चलते.

कहते हैं आज प्रलय आने वाला था. सब छुप छुपा गये, किसी ने कुछ नहीं लिखा, बस हो गई चर्चा. वैसे अगर प्रलय आ जाता तो बचता सिर्फ मैं. इत्ती ऊँची टंकी पर चढ़ा था कि बच ही जाता पक्का. और सबसे पहले लिपटाते वो जो धरती पर बैठे आँख बंद किये चाय पी रहे थे.

सब टीवी चैनल कांव कांव मचाते रहे तो प्रमोद भाई रांची मोहल्ला वाले बोले कि जबरदस्ती डरवाते हैं. वैसे ऐसा कह भर देने से भी कई बार डर जाता रहता है. वैसे अगर नीशु भाई की कविता चाहे जिस पर लिखी हो, इस प्रलय से जोड़ कर उसके इन्तजार में माना जाये तो भी फिट हो जा रही है.

वो नहीं आये,
जाने क्या बात हुई,
वादा तो किया था ,
निभाने के ही लिए,
फिर क्यों साथ नहीं आये,
राह तकते रहे उस गली का,
जिससे गुजरना था उनको,..........


ये बिल्कुल वैसा ही वाकया है जैसा कि एक बेहतरीन गज़लकार, ब्लॉगजगत के नये चेहरे वीनस केसरी गरिमा जी की कविता को हमें टंकी से उतारने का मनुहार मान कर देख रहे हैं. कहते हैं कि एक दिन पहले लिख देती तो पहला शेर समीर जी की पोस्ट पर काम आ जाता.

लौट आओ कि अंधरी ये रात हुई
अब तक खफ़ा हो, ये क्या बात हुई.......

मजाक अलग, लेकिन गरिमा जी की गज़ल ऊँचाई पर है, जरुर पढ़िये. वैसे जब गीत गज़ल की दिशा में पठन हेतु निकल ही पड़े हैं तो श्रृद्धा जी को भी जरुर पढ़ियेगा, बड़ी मर्मस्पर्शी गजल है:

मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए


मगर जब प्रलय आने ही वाला था तो थोड़ा तो आशावादी रहतीं. कपड़े अपने आप ही धुल जाते, जबरदस्ती मेहनत की. हम तो इस चक्कर में नहाये तक नहीं, कि उसी में छपाक छपाक नहा लेंगे, काहे पानी खराब करें. यूँ भी नहाने से इतने सालों में कोई फायदा तो हुआ नहीं. जिस रंग पैदा हुए थे, वही रंग बने रहे-पानी गया नाली में. साबुन ब्याज में.


ऐसा नहीं कि प्रलय प्रलय ही हाहाकार मचा है. ऐसे में ज्ञानचक्षु खोलने विवेक गुप्ता जी आये कहे कि उस मशीन के प्रयोग से प्रलय नहीं, सृजन की ओर पहला कदम बढ़ेगा. बात समझाई भी, मगर टीवी एतन चिल्ला चिल्ला कर बोला कि हम तो डरे हुए रहे.

प्रलय टाईप ही एक समाचार कविता वाचक्नवी जी कहने लगीं कि गुजारा भत्ता के लिए शादी जरुरी नहीं . है तो अच्छी बात मगर ये क्या, शादी भी नहीं भई और हर्जाना भर रहे हैं. अरे नाराज मत होईये, बिल्कुल सही है, ऐसा ही होना चाहिये.

एक नर समर्थक मोर्चा खोले हमारे ई-गुरु राजीव भी बैठे हैं. उनकी चाहत है कि जो भी उनके साथ आना चाहे, ध्यान रहे वो योद्धा हैं, वो यह लोगो अपने यहाँ लगा ले:

Blogs Pundit इस पर क्लिक करके

क्या पता, कौन सा प्रलय आयेगा. हम तो बस राम राम जप रहे हैं.

बिहार वाली बाढ़ भी तो लगभग प्रलय ही थी. इस दुखद त्रासदी पर प्रभात रंजन जी का नजरिया देखिये:

ये जो मंज़र-ऐ विकराल है ,क्या है
हर तरफ़ हश्र है,काल है ,क्या है ?
पानी-ही-पानी है उफ़ ,हर जगह ,
कोशी क्यूँ बेकरार है ,क्या है ?.......

ऐसे सब माहौल में मेहन भाई ने अमीर खुसरो रचित गीत ’मोहे सुहागिन कीनी रे’ सुनवाया, बहुत आनन्द आ गया. आप भी आनन्द ले लें.

रोहित जैन जी न जाने कहीं व्यस्त हैं, कहते हैं ’और भी काम हैं जमाने में’ और अपने मन के भाव कहने फैज साहब के बेहतरीन शेरों की लड़ी लगा दी. बढ़िया है व्यस्त रहो और ऐसे ही शेर सुनवाते रहो. भगवान भला करेगा.

प्रलय सामने खड़ा हो तो अच्छे अच्छों की यादों की पोटली खुल जाती है इसलिये शोभा जी यादों की पोटली खोली, तो कतई अचरज नहीं हुआ.

शौकीन लोगों को इन सब से कुछ अंतर नहीं पड़ता. अब देखिये, अमित खान-पान के शौकीन, लगे चाकलेट गाथा सुनाने.

महेन्द्र मिश्रा जी भी सोचे होगें सृष्टि खत्म हो ही रही है तो क्यूँ न हंसते हंसते चला जाये, बस लगे हंसाने.

अब आप लोग हंसते रहिये. हम तो कुश की चिट्ठाचर्चा जहाँ पर आई उसके बाद जितना बांच सके, लिख मारे. अब ये बंद हो तो आगे बांचे और फिर नये चिट्ठाकारों को ढ़ूंढ़ें. हमे मालूम है लगभग सभी छूट गये हैं. मगर पहला दिन है, आप समझ सकते हैं. शायद कोई भला मानस बैलेन्स चर्चा मध्ययान चर्चा के नाम से कर दे, जिसमे कभी संजय बैंगाणी की महारथ थी.

अच्छा नहीं लग रहा, मगर बंद करना ही होगा. कृप्या अन्यथा न लें. बस अनुराग वत्स की यह पेशकश और देख लें.

चित्र साभार: अनुराग वत्स :


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रविवार, अगस्त 26, 2007

द साईलेंस इज़ डेफनिंग

जी हाँ आपने "खामोशी की आवाज़" जैसे जुमले सुने होंगे पर उदाहरण ज्यादा न देखे होंगे। तो पढ़िये अशोक जी चक्रधर की नवीनतम पोस्ट जो उन्होंने न्यूयॉर्क में संपन्न विश्व हिन्दी सम्मेलन पर लिखा। और शायद ये हिन्दी ब्लॉगजगत की पहली ऐसी पोस्ट है जिसे बिना कुछ लिखे टिप्पणियाँ मिलीं। फुरसतिया ध्यान दें ;)

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शनिवार, मई 05, 2007

मोबाइल का नया रिंगटोन और जलोटा जी के जालिम भजन

आज मन बड़ा प्रसन्न है। बड़े दिनों बाद पेट भर चिटठे पढ़े। रूखे सूखे नहीं, बेहद लज़ीज़। हर दिन ऐसे पकवान नसीब नहीं होते या फिर शायद अपनेराम ही टेबल पर ध्यान न देते हों। तो देर किस बात की? चलिये मेरे साथ चिटठों के रोचक सफ़र पर।

पांडेय जी की रेलगाड़ी हसन जमाल के लेख के विवादास्पद प्लेटफॉर्म पर उतरी, उतरते ही उन्होंने पाया कि हसन मुसलमान हैं, फिर उन्होंने पाया कि जमाल साहब को इंटरनेटोफोबिया है और इस पर बात करने की बजाय वे बात कर बैठे इंटरनेट के प्रति बढ़ते आब्शेसन की। ख़ैर, जब लिखने बैठे हों, बीवी चित्कार कर रही हो की फ्रिज में एक भी सब्जी नहीं है दोपहर को क्या तुम्हारा भेजा परोसूं, चेयर पर टिक कर बच्चा छिली हुई पेंसिल को लगातार छिलते हुये लगातार पूछ रहा हो, "ये क्या है डैडी?" और दरवाज़े पर पेपरवाला छुट्टी के दिन साहब से पैसे की उम्मीद में खड़ा हो तो विषय से भटकाव अवश्यमभावी है। लो अपन भी चल पड़े पटरी बदलने। बहरहाल अपन न हसन जमाल के पक्ष में हैं न विपक्ष में, कभी कभी बेपेंदी का होना अच्छा लगता है।

जगदीश ने इंटरनेट से कमाई के मैगजिनाई लेख की चर्चा की तो पंगेबाज ने चिट्ठाकारों को कमाई करने के न केवल अभिनव तरीका सुझा दिया बल्कि एक प्रभावशाली परियोजना की प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी बना डाली।

यह सारी अथाह धनराशि भैस बाईसा के दम पर भूसे और उसके उत्पाद दूध, घी, दही, छाछ, पनीर तथा उसके अनन्य उत्पाद उपले, खाद, गौमूत्र की कमाई है। अब जाकर पता चला कि चल सम्पत्ती किसे कहते हैं? ...वो जमाने हवा हुये जब चाणक्य ने नन्द वंश की जड़ों में मट्ठा डाला और नन्द वंश समाप्त, अब तो लालूजी ने भारतीय रेल यात्रियो को मट्ठा पिला पिला कर भारतीय रेल को फ़ायदे में पहुचा दिया है। पता चला है कि मुलायम जी की भी सारी की सारी कमाई भैंसबाइसा ने कमा कर दी है।

कमाई की बात सुनी नहीं कि बिहारी बाबू निकल पड़े चंदा करने, विज्ञापनी आय से मरहूम खिलाड़ियों के लिये एक ठो "किरकेटर आपदा कोष" बनाने की सिफ़ारिश लेकर।

प्रमोद चिट्ठों में प्रयुक्त हिन्दी की गुणवत्ता से हलकान हैं। नसीहत के तौर पर कहते हैं,

"बुरी हिंदी दुरुस्त करने के लिए...एक छोटा, टिकाऊ, मजबूत नोटबुक खरीदें। वो सारे शब्द जो अलग-अलग मौकों पर आपमें भय जगाते रहे हैं, मसलन- ‘अकिंचन’, ‘शब्दाहत’, ‘निस्त्राण’, ‘अनिमेष’- इनकी एक विस्तृत सूची बना लें, और लिखने के दरमियान जब उलझन हो, वाक्य में ऐसा एक शब्द गूंथ दें। देखियेगा भाव की मार्मिकता कैसे तत्क्षण सप्राण हो उठेगी! इसके साथ-साथ यह भी कर सकते हैं कि हर पैरा के अंत में दोहा-ग़ज़ल की दो लाइनें ठेल दें। ज्यादा अच्छा हो ऐसी ज़बान से टीपी गई हो जो आपकी अपनी न हो! इससे एक सीधा फ़ायदा यह होगा कि भाव का सामंजस्य बैठ रहा है कि नहीं सोचते हुए आप माथाफोड़ी नहीं करेंगे। बुरी हिंदी लिखना शुरु करेंगे और दौड़ते हुए सबसे आगे निकल जाएंगे!"

अभिषेक अपने चिट्ठे में चिट्ठियों के बारे में nostalgic हो गये, पत्रों को miss किया पर अंत में disclaimer लिख गये, "कृपया इसके लिए मुझे पुरानी विचाराधारा का ना समझें... वैसे तो मैं बहुत प्रगतिशील सोच रखता हूँ"। अभय ने खिंचाई का मौका न गंवाते हुये टिपिया दिया, "चिट्ठियों की बात अलग थी...फोन तो प्रेत- का रूप है...वैसे आप प्रगतिशील होने से ब‌चें, पतनशील होने के बारे में सोचें"।

अतुल अरोरा बड़े दिनों बाद मैदान में उतरे, पर लगता है कलम की धार फिर तेज़ करनी होगी। चुटकाला सुनाया, विडियो दिखाया फिर भी लोगों ने गणितीय त्रुटि पर आपत्ति दर्ज कर दी। इधर कमल को देखो, न केवल बाबू भाई कटारा से मिल आये वरन उनसे एक प्रतिज्ञापत्र भी लिखवा लाये।

भुवनेश ने चिट्ठा लिखा, पर शीर्षक में चूक कर बैठे। फिर रायटर की खबरों की तरह संशोधित शीर्षक से लेख लिखा। पर कमल ऐसे सभी चिट्ठों से तंग आ चुके हैं

पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूं कि हिंदी के ब्लॉग लेखक हिंदू, मुस्लिम और ईसाई की लड़ाइयां लड़ रहे हैं। कोई कह रहा है कि फलां ब्लॉग वाला मुस्लिमों के लिए लिख रहा है और हिंदू के खिलाफ जहर उगल रहा है। कोई ब्लॉग कह रहा है कि हिंदू अच्छे हैं और मुस्लिम लड़ाकू...यह अच्छा नहीं हैं कि हम एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाएं और लड़े। लड़ना है तो देश के आर्थिक विकास के लिए लड़ो....समाज की बेहतरी के लिए लड़ो...बेहतर स्वासथ्य सुविधाएं और शिक्षा के लिए लड़ो...हमारा देश जब आर्थिक प्रगति की ओर तेजी से बढ़ रहा है तब हमें जाति, धर्म और संप्रदाय के विवाद खड़े करना शोभा नहीं देता।

अनामदास ने अपने चिट्ठे में पुनः सही नब्ज़ पकड़ी है। देशभक्ति और देशप्रेम में फ़र्क बताते हुये लिखते हैं

सबसे ख़तरनाक बात जो देशभक्त बार-बार कहते हैं-"देश इंसान से बड़ा है"। यह सरासर ग़लत बात है कि देश इंसान से बड़ा है, कोई भी व्यवस्था किसी जीवित इंसान (से) बड़ी नहीं हो सकती। देश एक व्यवस्था है जिसे इंसान ने ही बनाया है, इसमें व्यापक हित दिखता है कि व्यवस्था बनी रहे इसलिए कोई भी व्यवस्थावादी यही कहेगा कि देश बड़ा है लेकिन कोई सच्चा मानवतावादी इसे स्वीकार नहीं कर सकता।

चिट्ठे की भावना से सहमत हूँ पर अपनराम को लगता है कि दोनों शब्दों में बाल बराबर ही फ़र्क है। और यह भी लगता है कि ये उद्गार शायद किसी अनिवासी भारतीय के ही हो सकते हैं, वजह शायद हैं परदेश की मिट्टी के संपर्क होते ही "भारत एक बेहतरीन देश है", यह मानते रहने की बाध्यता से मुक्ति और सरकारी भोंपूओं पर बजते वृंदगान के माध्यम से होते इनडॉक्ट्रिनेशन से सांस्कृतिक इंसूलेशन। यह फर्क शायद वैसा ही है जैसा कि अमित ने अपने अंग्रेज़ी चिट्ठे में लिखा है,

In USA you can kiss in public places but cannot shit; in India you can shit in public places but cannot kiss.

रचनाकार में असग़र वजाहत का संस्मरण छपा है, ईरान में "भारतीय होने का महत्व"

बदलते समाज में युवा सभी वर्जनाओं से मुक्ति पा रहे हैं। संस्कृति और इतिहास भी वर्जनायें ही बनी हैं। सुनील असमंजस में हैं कि पुरानी पीढ़ी के लोग फिर भी क्यों आस लगाये बैठे हैं।

शायद यह मानव प्रवृति है कि अपनी यादों को बना कर रखे और जब नयी पीढ़ी उन यादों का महत्व न समझे तो गुस्सा करे...यह समय का अनवरत चक्र है जो नयी बरसियाँ, समारोह बनाता रहता है। साइकल पर घूमने निकला...एक चौराहे पर...रुक गया। माईक्रोफोन लगे थे, सूट टाई पहन कर नगरपालिका के एक विधायक खड़े थे, कुछ अन्य लोग "संघर्ष समिति" के थे। वे सब लोग भाषण दे रहे थे। नवंबर 1944 को वहाँ बड़ी लड़ाई हुई थी जिसमें संघर्षवादियों ने जान खोयी थी। उनके बलिदान की बातें की गयीं...थोड़े से लोग आसपास खड़े थे उन्होंने तालियाँ बजायीं...पर शहर के पास इन सब बातों के लिए समय नहीं था। चौराहे पर यातायात तीव्र था, गुजरते हुए कुछ लोग कार से देखते और अपनी राह बढ़ जाते। पीछे बास्केट बाल के मैदान में लड़के चिल्ला रहे थे, अपने खेल में मस्त।

नीरज ने लड़कियों पर किया अपना शोध प्रबंध सार्वजनिक किया, कई "पर्ल्स आफ विज़डम" प्रस्तुत किये, बानगी देखिये

  • लड़के जिनकी गर्ल फ्रेंड होती है और जिनकी नहीं होती है, में केवल एक फर्क होता है, पहले वाले लोग "लड़कियों से बात करते हैं" और दूसरे वाले "लड़कियों के बारे में बात करते हैं"।
  • आपके मित्र कभी नहीं चाहते कि आपकी कोई गर्ल फ्रेंड बने, वरना वो कैंटीन में किसके साथ बैठ कर मौज करेंगे।
  • लड़कियों के हर सवाल के जवाब का अंत एक सवाल से करें।
  • ज्यादा से ज्यादा लड़की आपको शालीनता से मना कर सकती है, लेकिन इस प्रकार की कई असफलताओं के बाद ही व्यक्ति सफल होता है।
  • इस पर समीर कहाँ मौका चूकने वाले थे, तपाक से बोले, "खूब शोध चल रहा है। वैसे मैने देखा है, रॉकेट पर शोध कोई करता है और उड़ाता कोई और है"।

    "हिंदी फ़िल्मों और क्रिकेट से बरबाद हुये" सुरेश हिन्दी फिल्मों में मराठी पात्रों के चरित्रिकरण से ख़फा हैं। ख़फा मोहिंदर भी हैं, कहीं कवि के झोले में आय से ज़्यादा संपत्ति होने से तो नहीं? कविताओं की ही बात चली तो अभय ने प्रकाशित की हैं केदारनाथ अग्रवाल की कुछ सुंदर कवितायें, मुझे तो ये बड़ी जंची

    मैंने उसको
    जब जब देखा
    लोहा देखा।
    लोहे जैसा
    तपते देखा,
    गलते देखा,
    ढलते देखा,
    मैंने उसको
    गोली जैसा
    चलते देखा!
    आज का चित्र

    सुरेश के चिट्ठे से

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    शनिवार, अप्रैल 28, 2007

    इंटरनेट के तार के पंछी

    अनूप ने डपटकर पूछा क्यों आजकल बड़ा जी चुराते हो चिट्ठा चर्चा से। कहीं ऐसा तो नहीं कि शनिवार को चर्चा न करने का कोई धार्मिक तोड़ निकाल लाये हो। मैंने कहा नहीं चिट्ठे इतने लिखे जाने लगे हैं कि अब चर्चा करना मुशकिल होता जा रहा है। अनूप बोले तुम तो खामखां टेंशन लेते हो ये बोलो कि चिट्ठे पढ़ने का शऊर ही नहीं है तुम्हारे पास, पचास प्रतिशत चिट्ठे तो कवितायें हैं, उसमें से आधी अतुकांत जो तुम्हारी लयकारी के पैमाने पर फिट नहीं बैठतीं पर कम से कम बेजी की कविता देख लो, सरल भाषा में लिखा है, कोई युग्म वुग्म का चक्कर नहीं है। मैंने कहा चलिये कविता न सही बकिया चिट्ठे तो हम बाँच ही लिया करते थे पर अब तो हर तरफ खेमेबाजी है, सारा ब्लॉगमंडल मुहल्ला के नाम पर कब्बडी खेल रहा है, कुछ लोग तो इसी का नाम लेकर झांसा भी दे देते हैं, बात क्रिकेट की नाम मुहल्ला का। अनूप बोले तुम खेमेबाजी से डर रहे हो या गलत खेमे में होने से? मैं बोला, "अनूप ये तो कई लोग कह ही रहे हैं कि हिन्दी चिट्ठाकारी का हनीमून पीरीयड खतम हुआ और पंगेबाजी का शुरु और अपनी तो पंगों से वैसे भी फटती है"। अनूप बोले, "किस ने कहा, हनीमून तो शुरु हुआ है अभी, अब तो लोग ब्लॉगिंग कर ना करें अखबारों में ज़िक्रित हो रहे हैं, गोया पेपर ब्लॉगर कोई जुमला होता तो फिट बैठता"। मैंने कहा, "वई तो, ब्लॉगिंग से ज्यादा मेटा ब्लॉगिंग"। अनूप ने हामी भरी, बोले, "अब बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे, तुम्हारी तरह मैं भी व्यथित हूं, पर इंटरनेट के तार पर हमारे जैसे और भी पंछी हैं ये भरोसा रखो, तुम्हें कोई गुप्त रोग नहीं हुआ है। तुम अकेले नहीं हो जो कंफ्यूज्ड हो, नौ साल आईटी में रहकर मिर्ची सेठ तक समझ नहीं पाये, दुविधा छोड़ो, तुम्हारी ब्लॉगराईन तो वैसे भी मायके में हैं, तो रविश के फ्रिज से एक ग्लास ठंडा पानी पियो और अच्छे बच्चे की तरह लिखने बैठो चर्चा नहीं तो जीतू की जगह नारद का कामकाज तुम्हारे हवाले करवा देता हूं फिर साइबर गलियों में घूमते फिरना हेल्मेट पहने"। मरता क्या न करता।

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    शनिवार, मार्च 24, 2007

    तकिये के नीचे पिस्तौल रखकर सोइयेगा

    हिन्दी चिट्ठाकारी में पत्रकारों के पदार्पण पर अनूप के चिट्ठे ने मानो हम सब के मन की बात कह दी हो। मेरा ख्याल है कि अब इस कांड पर पटाक्षेप हो जाना चाहिये। ये पहला ऐसा मौका नहीं होगा जहाँ विधा का कद कलाकार से ज्यादा हो गया। चिट्ठाकारी की मूख्याधारा में मिडिया की च्रचा से काफी बवाल खड़ा हुआ पर सबसे हास्यास्पद बात लगी नारद पर लगाये नियमों की व्याख्या पर। नारद शब्द ही फसाद से जुड़ा है। मेरे ख्याल से ज़्यादातर लोगों ने खामख्वाह इस मुद्दे को पीटा ये जानते हुये भी कि नारद के संचालक जो चाहें वो नियम बनाने को स्वतंत्र हैं। ये बेसिरपैर का प्रलाप बंद करें, नंदीग्राम पर नहीं तो पास्ता के उपर ही लिखें।

    अफ़लातून नंदीग्राम की घटना की विवेचना करते हुये लिखते हैं, "जो कम्युनिस्ट कल तक हर मामले में कारण-अकारण टाटा-बिड़ला को गाली देते थे, उन्हीं की सरकार आज टाटा के साथ गले में हाथ डालकर खड़ी है और किसानों-मजदूरों-बटाईदारों पर लाठी-गोली चला रही है।" चौपटस्वामी का आकलन है कि इसी लिए चाह कर भी जागृत और सचेतन बंगाल बुद्धदेव भट्टाचार्य को नरेंद्र मोदी होने नहीं देगा।

    ब्लॉगजगत में नये हस्ताक्षरों में रवीश सबसे ज्यादा आकर्षित करते हैं। हर बार चर्चा के समय सोचता हूँ कि पेशेवर लेखकों को कम फुटेज देना चाहिये, जी ये मेरा एक पूर्वाग्रह है। पर रवीश के लेखन में कोई कैमोफ्लॉज नहीं है। मेरे ख्याल से वो स्वयं भी यह जानते हैं, अपना मन उढ़ेल कर रख देते हैं, कई बार पाठकों का मन नम करने के लिये। मीरा नायर की नई फ़िल्म नेमसेक के बारे में लिखा, समीक्षा नहीं वरन फिल्म की तर्ज़ पर। अपनी जड़ों से ये लगाव मेलोड्रामाटिक लगता है, बकौल रवीश "यह कोई साहित्यिक नोस्ताल्ज़िया नहीं है"। सचाई भी यह है कि कंक्रीट के जंगलों में गुम हम में से उन सब को ये दर्द सालता रहता है जो ऐसी जगहों से आये हैं जो महानगरों में एलएस कहलायेंगी, जंगल जहाँ पर बच्चे सुराही और गौरैया नहीं पहचानते, अमरूद के पत्तों का स्वाद नहीं जानते और न जानते हैं बेशरम की सूखी डंडी से साईकिल का टायर चलाना। सागर ने गुलज़ार की पंक्तियाँ क्या खुब उद्धत कीं
    लवें बुझा दी है अपने चेहरों की, हसरतों ने
    कि शौक पहचानता ही नहीं है।
    मुरादें दहलीज ही पे सर रख कर मर गई हैं
    मैं किस वतन की तलाश में यूँ चला था घर से
    कि अपने ही घर में भी अजनबी हो गया हूँ आकर।
    भारत के चुकंदर बनने से ख़ुमार कुछ उतरा होगा, मैं तो छटवां विकेट गिरने पर ही टीवी बंद कर बैठा था। यह खेल इंडिया का नया धर्म है, विज्ञापनदाताओं ने ये धर्मावतरण करवाया है। हम क्रिकेट फैनाटिक बन बैठे हैं। खीज ऐसी कि बीसीसीआई तक को भंग करवा दें। अब फिर किसी के घर को तोड़ेंगे और किसी की तस्वीर पर जूतों का हार चढ़ायेंगे। पर विज्ञापन चलते रहेंगे। सट्टेबाजों से लेकर प्रसारकों की तिजोरियों भर रही हैं। पैसे की ही बिसात पर बॉब वुल्मर जान दे बैठे। प्रमोद चैपल को मशवरा देते हैं, "हुज़ूर, होटल के कमरे में अकेले मत सोइयेगा, और सोना ही पड़े तो तकिये के नीचे एक पिस्तौल रखकर सोइयेगा"। रवीश को कहना पड़ा कि "कृपया क्रिकेट को धर्म या राष्ट्र मत बनाइये। इन दो रास्तों से सिर्फ धोखाधड़ी करने वाले घुसते हैं। जो ईमानदार हैं वो सीमा पर पहरा दे रहे हैं।"

    कमल शर्मा रियेल्टी के निवेशकों को चेतावनी दे रहे हैं। लिखते हैं, "निवेश गुरु जिम रोजर्स का कहना है कि रियॉलिटी में काफी सट्टेबाजी हो चुकी है और सारी खरीद तो सट्टात्मक थी। यानी सच्चाई से दूर।" हमने निरंतर में काफी पहले ही इस बुलबुले के बारे में लिखा थाबायिंग फ्रेंज़ी के शिकार सुनें तब ना। सेठ होशंगाबादी ने अपनी कंटीजेंसी योजना का खुलासा किया,
    मंदी की आशंका से सहमकर मैंने तो योजना बना ली है। बचत तो कुछ नहीं है, बस पीएफ का पैसा थोड़ा बहुत। सेठगिरी छोड़कर, बस दो भैंस व दो बकरी खरीदूंगा, शायद मंदी काट लूं।
    भगत सिंह की जन्म शताब्दि पर तिर्यक विचारक लिखते हैं, "मुझे नहीं पता कि 23 मार्च को भारत के शहरी युवा क्‍या कर रहे होंगे...सोचता हूं इस बार पता करूं कि भगत सिंह को याद रखने वाले हमारे देश में कितने मुक्तिकामी नौजवान बचे हैं"। अनिल का मत है कि क्रांति कोई अचानक हुआ विस्फोट नहीं है। वह तो एक सतत प्रक्रिया है।

    भारत की हर समस्या के नेपथ्य में जिस नाईं विदेश मंत्रालय इस्लामाबाद को देखता है वैसे ही लोकमंच विश्व के हर त्रास के पीछे इस्लामवाद को। अब डॉ. डैनियल पाइप्स को खींच लाये है खेमे में, जो लाख कुरेदने पर भी बोल पड़
    "दीर्घकालावधि में समय-समय पर आतंकवाद इससे सम्बद्ध रहा है...परन्तु ऐतिहासिक रूप से आतंकवाद इस्लाम के साथ सम्बद्ध नहीं रहा है।"
    और चलते चलतेः चिट्ठों की और खासकर अच्छे चिट्ठों की संख्या तेज़ी से बढ़ती जा रही है और मेरे ख्याल से चर्चा मंडळी मानेगी की काम काफी कठिन होता जा रहा है। निश्चित ही हमें और हाथों की दरकार है। यदि आप में से कोई चर्चादल में शामिल होना चाहता है तो टिप्पणी द्वारा संपर्क करें।

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    शनिवार, मार्च 17, 2007

    आई एम लविंग इट

    रवि ने ख़बर दी कि दैनिक हिंदुस्तान के हिन्दी व अंग्रेज़ी संस्करणों में हिन्दी चिट्ठों पर लेख छपा है। इस लेख के बारे में सबसे पहले तो यही कहना चाहूंगा कि मुख्यधारा का मीडिया किस कदर आत्ममुग्धता और बेखबरी के आलम में पड़ा होता है यह इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। लेख में एक जगह कहा गया है कि "हिन्दी ब्लॉगिंग को क्या हिंदुस्तान नज़रअंदाज़ कर सकता है", ये नादान भूल गये कि इनके समूह से ही प्रकाशित कादंबिनी पत्रिका में गौरी पालीवाल, जो सराय की छात्रवृत्ति पर इस साल शोध भी कर रही हैं, ने सबसे पहले हिन्दी चिट्ठों के बारे में लिखा था। खैर कादंबिनी तो समूह में हाशिये पर ही पड़ी रही होगी तो इसके लेखों की कौन परवाह करता होगा। एनडीटीवी के पत्रकारों का मन इस नये लॉलीपॉप को चूस चूस कर भी भर नहीं रहा, पहले मिडडे, फिर हिंदुस्तान, मीडिया के इनके दोस्त वही देख रहे हैं जो ये दिखा रहे हैं और यही बात दूर तलक जायेगी। धुरविरोधी के चिट्ठे पर अविनाश ने भोलेपन से लिखा, "नीलेश की रपट एकांगी है। मुझसे जब बात हुई, तब मैंने उन्हें नारद के बारे में विस्तार से बताया था। पता नहीं क्यों उन्होंने ज़िक्र तक नहीं किया।" अमिताभ इस में कुछ षड़यंत्र के पदचाप सुन रहे हैं। शिल्पा ने लिखा, "शायद इसलिये जलन हो रही है कि आपका नाम नहीं लिखा गया"। सृजन बोले, "कम से कम रवि रतलामी जी का जिक्र हुआ, यह संतोष की बात लगी"। पर सौ टके की बात कही पंकज ने, "गलती उनकी नही है. हमारी है। अपनी पहचान खुद बनानी पडती है…कहीं ना कहीं रह ही गई है…आज की दुनिया में प्रचार का भी उतना ही महत्व है"।

    मेरे इस विषय पर दो विचार हैं, पहला कि ये कि मुख्यधारा के मीडिया में चिट्ठों के ज़िक्र से चिट्ठामंडल का भला ही होगा, ये चीटों की फिरोमोन ट्रेल है, लोग आप तक ज़रूर पहुँचेंगे। दूसरा यह, की भाड़ में जायें, क्या हम ब्लॉगिंग इनके लिये करते हैं, मेरी अतुकांत कवितायें जो नवनीत ने लौटा दी थीं वो मैं गर्व से अपने ब्लॉग पर छापुंगा, मुझे परवाह नहीं। तुम पत्रिका छापते हो तो निरंतर हम भी छापते हैं। तुम एयर वेव्स की सवारी करते हो तो पॉडकास्टिंग हम भी करते हैं। हम पत्रकार भी हैं, प्रकाशक भी, हम वकील भी हैं, पुलिस और जज भी, हम समाजसेवी भी हैं, गृहस्थ भी। और हमें पैसे दे कर भी तुम्हारे मन का नहीं लिखवा सकते, हमारे सर पर किसी संपादक, किसी विज्ञापनदाता का पेपरवेट नहीं रखा। बाकी जवाब मुक्ति के दिन ही देंगे। हिन्दी चिट्ठा जगत में टीवी पत्रकारों के पदार्पण पर ही मानो मान्या ने लिखा
    तुमसे मिलना, एक अजीब-अद्भुत संयोग
    विपरीत धाराओं से मैं और तुम
    उलझ जाते हर बार जब भी मिलते
    ना तो मैं तुम्हारी सुनती, ना तुम मुझे समझते
    दोनों बस अपनी ही रौ में बहते
    टीवी पत्रकारों की ही बात करते हैं। सूचक ने लिखा, "कैमरों में कैद तस्वीरों से सच दिखता है। पर उसे पेश करने के तरीके से वो धुंधला हो जाता है।" इधर अविनाश की लगाई चिट्ठाई आग से उनका घर ही फुंका जा रहा है, कुछ लोग सिटिंग आन द फेंस भी मज़ा ले रहे हैं, "आई एम लविंग इट"। दिलीप कुमार के अहं की बात करने वाले लोग न जाने क्यों जब भी इकट्ठा होते हैं, सर फुट्टोवल की स्थिति आ जाती है। खैर कभी मेरे आराध्य रहे अमिताभ कर खिलाफ़ माहौल गर्माता जा रहा है। पर योगेश हिन्दी ब्लॉगमंडल में मुहल्ला पुराण और फिर छद्मनाम पर हुये कसैली चर्चाओं से दूर जाने की सलाह दे रहे हैं।

    यदि आप कभी रेडियो के दीवाने रहे हैं तो फरमाइशी गीतों के कार्यक्रमों में ‘झुमरी तिलैया’ का नाम अवश्‍य सुना होगा। 1950 से 1980 तक रेडियो से प्रसारित होने वाले फिल्मी गीतों के फरमाइशी कार्यक्रमों में शायद ही किसी गीत को सुनने के लिए झुमरी तिलैया के श्रोताओं ने फरमाइश न भेजी हो। पढ़िये कमल शर्मा की रोचक प्रविष्टि। सिलेमा में पढ़िये ईरानी फिल्मों के बारे में, प्रमोद आप IMDB की कड़ियाँ भी दिया कीजीये।

    पंजाब प्रकाशसिंह बादल ने सत्ता संभालते ही पूर्वमुख्‍यमंत्री और उनके परिवारजनों पर आय से अधिक संपत्ति रखने के कानूनी मामलों में फाँस लिया। भुवनेश जानते हुये भी सवाल कर रहे हैं कि क्या ये पूर्वनियोजित है।
    इस प्रकार की घटनाएं कांग्रेस के जगजाहिर चरित्र पर तो सवालिया निशान लगाती ही हैं उससे भी ज्यादा न्यायपालिका पर भी सवाल खड़े करती हैं। हालांकि ऐसी घटनाओं के लिए उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालयों पर सवाल उठाना तो ठीक नहीं होगा क्योंकि इन्हीं के कारण आज भी एक आम भारतवासी न्यायपालिका पर विश्वास करता है। परंतु जो मामले निचली अदालतों से संबंधित हैं, उनमें एक समय विशेष पर ही अदालत द्वारा कार्रवाई करना संदेह पैदा करता है।
    अनूप ने चुटकी ली, "राजनीति की मंडी बड़ी नशीली है, इस मंडी ने सारी मदिरा पी ली है।"

    सेठ होशंगाबादी का विचार है , "धन का चरित्र पानी की तरह नहीं होता कि यह पहले खाली जगह में जाए। यह तो पहले भरी जगह जाता है। जब आर्थिक विकास होता है तो सबसे पहले और ज्यादा लाभ उनको होता है जिनकी तिजौरियां भरी होती हैं।"

    सुनील ने हिजाब पर विचारोत्तेजक लेख लिखा ह,ै और इसमें मोदीवाद की झलक पा कर संजय झूम पड़े ;)। सुनील ने लिखाः
    मुझे तस्लीमा की बात सही लगती है कि सब बुरके, हिजाब, सिर ढकने वाले कपड़े, पृतवादी समाज के द्वारा स्त्री को दबाने के अलग अलग तरीके हैं, इसलिए भी कि यह आप को क्या पहने या न पहने को चुनने की स्वतंत्रता नहीं देता.
    और चलते चलतेः

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    शनिवार, मार्च 10, 2007

    चलते हैं दबे पाँव मेरे हाथ भी

    चर्चा में देरी के लिये करिये क्षमा, उम्मीद है महफ़िल में अभी बुझी नहीं शमा!

    ईस्वामी शॉपिंग फ्रैंज़ी के शिकार अपने मुलक की हरकतों से हैरान हैं। बताते हैं कि शकीरा को यह नितंब झूठ न बोलें कहते देखने के लिये 3650/- के टिकट रखे गये हैं। कौन जायेगा देखने? अरे भिया जहाँ के शहरों में रेव पार्टी में कथित ट्राँस म्यूज़िक सुनने के लिये लोग हज़ारों पेल देते हैं, स्पेंसर से बासी कटी सब्ज़ियों से बच्चों को महंगा न्यूट्रीशन दिया जाता है और मल्टीप्लेक्स में 30 रुपये की 50 ग्राम पॉप कॉर्न स्टाइल से खाई जाती है वहाँ जे कौन सी बड़ी रकम है। शुक्र ये है की शकीरा संक्रांति का टीवी पर सीधा प्रसारण भी होगा, डेविलिश ब्रांड रवीश बताते हैं
    कमर के...बलखाने से दर्द नहीं होता। झटका लगता है। वो भी शकीरा को नहीं। टीवी के लफंदर दर्शकों को...ये दर्शक कौन हैं? ये हिंदुस्तान की समस्त सामाजिक समस्याओं का मानवीय समुच्य है...मगर उसे शकीरा तो नहीं मिल सकती न। वो तो अब आने वाली है। अभी तक वह ओंकारा के बिल्लो चमनबहार पर ही दिल लुटा रहा था। बीड़ी जला रहा था। इस बार शाका लाका करेगा।
    हिन्दी ब्लॉगजगत में जो काम टीवी 18 समूह चाह कर भी न कर पाया वो एनडीटीवी ने बड़े बढ़िया तरीके से शुरु किया। आईबीएन को श्रेय देना चाहिये ये पहले करने का, जहाँ उनके पत्रकार अपने आफ तहे रिकार्ड्स बोल से चर्चित रहे हैं। अविनाश, रवीश कुमार के बाद अब पंकज पचौरी और संजय अहिरवाल भी (दिबांग की डिक्शन कमज़ोर थी पर क्या लेखन भी? वो क्यों नहीं लेन में?) खैर अपन तो कांस्पिरेसी थियोरी के बुनकर हैं तो ज़ाहिर तौर पर इस मीडिया समूह की कुछ योजना ज़रूर है, यह दीगर बात है कि करन जौहर के साथ उनके अपकमिंग इंटरटेन्मेंट चैनल के न अप होने के संकेत हैं न कमिंग के। योजनाबद्ध हो या स्पौंटेनियस, उन्होंने बकौल जनार्दन भैया काफी गंडगोल भी किया और इनके चक्कर में अपने राम को लोगबाग कम्यूनिस्ट पुकारने लगे

    एनडीटीवी पर लौटें तो हिन्दी ब्लॉगजगत से नोट छापने (अच्छा भैया नोट नहीं तो कम से कम लाभ कमाने) के लिये कई समूह उतारू हैं, एनडीटीवी का अपना ब्लॉगिंग प्लैटफॉर्म है पर ब्लॉगर को चुना, पता नहीं क्यों। नीलीमा ने चिट्ठाकार पर एक खबर की कड़ी भेजी, मुझ जैसे कई लोगों ने महसूस किया कि स्पॉटलाईट खामख्वाह पत्रकारों के चिट्ठों पर, फुटास की ललक हमें नहीं होती का? हमने माना के तगाफ़ुल ना करोगे लेकिन, ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक। नाम नीलीमा का भी था, तो कुछ असला बारूद उनके कने भी है। क्या है कोई बताता नहीं है, सिर्फ हिंट। जीतू भी आजकल बहुत छुपाने लगे हैं, सबके स्टैटकाउंटर पर उनकी नज़र है, हलचल की मेरी जां उन्हें ख़बर है। मुद्दे की बात ये कि हिन्दी ब्लॉगजगत अभी तो काफी छोटा है, कुल जमा 400 लोग, रवि भैया को अब भी ज़्यादा हिट्स अपने अग्रेज़ी चिट्ठे से ही मिल रही हैं। पर आप लोग हवाई किले बना रहे हैं, शोध कर रहे हैं। मालिक अभी तो क्रिटीकल मॉस भी नहीं बन पाया है। रोपाई ही चल रही है और हार्वेस्टर तैनात हैं। सोचो यार ज़रा!

    पांडेय जी भी परेशान है, समाजवाद की बातें उनके पल्ले नहीं पड़तीं। अज़दक ने सिंगूर में टाटा के व्वयावसायिक प्रक्रम पर नाक भौं सिकोड़ी तो वे बोले,
    मान लीजिये आज आप पूरी दुनिया की सम्पदा सभी लोगों मे बराबर बांट दें। क्या होगा? कुछ समय के लिये आमोद-प्रमोद और सीधे consumption से जुडा व्यवसाय जूम कर जायेगा। पर दुनिया की समग्र अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ जायेगी। दो साल बाद समग्र सम्पदा (जो आज की सम्पदा से कम होगी) फिर उसी अनुपात में बंट जायेगी, जिसमें आज है। ज़रूरत धन के समाजवादी बंटवारे की नहीं, धन की समग्र मात्रा बढाने वालों की है। किसान को आप सशक्त बनायें, पर टाटा को डकैत बता कर नहीं।
    सागर भी कम परेशान नहीं। अपनी पोस्ट मिटा दी। कईयों ने, टिप्पणियाँ भी वापिस लीं। गूगल इत्ती जल्दी नहीं मिटायेगा और जिसने पढ़ा उसके मन से हटाना न मिटाना भैये। अपना लिखा मिटाना गलत मानता हूं मैं, धुरविरोधी को भी कहा मैंने, HTML में टैग होता है, काट दो, करेक्शन दिखे तो। हो सकता है दो साल बाद अपना लिखा फिर पढ़ो तो हंसी आये, या फिर रोना। सोच के लिखो, वरना कहना पड़ेगा
    लाज़िम थे मुझपे ये लम्हात भी,
    चलते हैं दबे पाँव मेरे हाथ भी।
    प्रतीक परेशान नहीं हैं, जिया खान के हॉट चित्र छापे हैं, यहाँ बेरोमीटर पर खास प्रभाव नहीं पड़ा। सर्फिंग कुछ ज़्यादा होने लगी है आजकल।

    चलते चलते, दिल्ली में हिन्दी चिट्ठाकारों का मिलन होने जा रहा है। अगर आप दिल्ली में है तो ज़रूर शामिल हों और छाछ पियें पिलायें

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    बुधवार, मार्च 07, 2007

    नये हस्ताक्षर - 2

    खुशी की बात है कि मुख्यधारा के मीडिया के अनेक लोग हिन्दी चिट्ठाकारी से जुड़ रहे हैं। इस औपचारिक और सधे लेखन से निश्चित ही हिन्दी चिट्ठों का रसूख़ बढ़ेगा। कुछ चिट्ठे शायद आप पढ़ चुके होंगेःसाथ ही पढ़ें भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दी मासिक पत्रिका "भारतीय पक्ष"।

    ये भी पढ़ें

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    सोमवार, मार्च 05, 2007

    नये हस्ताक्षर - 1

    नार्थ साउथ डिवाईड और भाषाई विवादों के फेर में न पड़ कर तिरुवनन्तपुरम के निवासी चन्द्रशेखरन नायर ने अपना हिन्दी चिट्ठा शुरु किया है। ये पूर्व सैनिक हैं और अच्छी खासी हिन्दी लिख लेते हैं। अगर उनका चिट्ठा न पढ़ा हो तो ज़रूर पढ़ें और उनका उत्साहवर्धन करें।

    एक और ब्लॉग दिखा, शायद आप देख चुके हों। इलाहाबाद के ज्ञानदत्त पाण्डेय "रेल गाड़ी हांकते हैं" (उत्तर मध्य रेलवे में मुख्य यात्री यातायात प्रबंधक हैं)। पाण्डेय जी मानते हैं कि हिन्दी चिट्ठाजगत रूखा सूखा सा है,
    "हिन्दी के चिठेरों में वह जज्बा देखने को नही मिलता. अभी तो सब भूख, गांव की मड़ई, कवितायें, हिन्दुस्तान की बदहाली जैसे नान-कन्ट्रोवर्शियल मुद्दों पर की-बोर्ड चला रहे हैं. कैसे वो तकनीकें जानें जिससे उनका चिठ्ठा चमक सके और उस पर ढेरों क्लिक हों"
    नये हस्ताक्षर में हम आपको नये चिट्ठों के बारे में बताते रहेंगे। चिट्ठाकार मंडली आप का भी साथ चाहिये।

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    शनिवार, मार्च 03, 2007

    संघर्ष का टिकट पास होगा, सुविधा का रिजर्वेशन नहीं

    चर्चा में सबसे पहले तो सभी चिट्ठाकारों और उनके परिवार को रंगों के पुनीत पर्व होली की गुलाल भरी शुभकामनायें। तरकश ने इस अवसर पर ठिठौली की मस्तीभरे कार्टून और "मस्त चकाचक भंग के नशे में दी गई उपाधियाँ"। हिन्दी चिट्ठाजगत को एक सूत्र में पिरोने के इस शरारत भरे प्रयास के लिये तरकश टीम बधाई और रंगभरे गुब्बारों की पात्र है। इस अवसर पर पढ़ें अनूप का फरमाईशी लेख भी जिसमें न प्रेम के पुराने किस्से हैं न इश्क-फिश्क की कौनो दास्तान, न ही कोई किस्सा, बकौल शुकुल "...अब इस उमर में क्या खाक मुसलमां होंगे"। पर प्यार के वैकल्पिक उपायों के खोज में अनूप ने कई किस्सों का खासा मिश्रण बना डाला।

    रवीश कुमार ने अपने ब्लॉग पर चूतिया शब्द क्या इस्तेमाल कर दिया हिन्दी ब्लॉगजगत के नाखून उग आये हैं। इरफ़ान के बहाने एक दूसरे के विचारों की लानत मलानत करने के बाद अब दूसरों को विचार रखने से भी रोकना चाहते हैं। भईया दूसरे के विचारों को पढ़ कर मंदाग्नि कि शिकायत हो जाती है तो ब्लॉगिंग काहे करते हो? जाओ अपनी शाखा में दंड पेलो। इंसान बनना है तो सब्र रखो, पढ़ो और पढ़ने दो, लिखो और लिखने दो। इंसान की तरह अपने विचार रखो, इस भले मानस ने तो तुम्हारी बेहूदी टिप्पणियाँ छाप भी दीं, वो भी जो तुमने Anonymous की चूड़ीयाँ पहन कर दागीं, तालीबानी कहे जाने से इतनी चिढ़ है तो पहले उनके जैसी हरकतें करना तो बंद करो। मैं तो सभी चिट्ठाकारों को यही कहुंगा टिपपणी कर सबमिट बटन दबाने से पहले एक बार सोच लो कि क्या यह तीप्पणी तुम अपने ब्लॉग पर छापते?

    इधर चिट्ठाकारों के नी जर्क रिएक्शन का ये आलम है उधर एनडीटीवी का चिट्ठाकार दल अपने उठाये "असल मुद्दों" पर चिट्ठा पाठकों कि बेरूखी से हताश है,
    असली हीरो के अभाव में हमने मुन्ना भाईयों जैसे गली के लुक्‍कों की ताजपोशी कर दी है. हमारा हीरो डॉन बनकर आता है तो हम ताली बजाकर कहते हैं यह लक्ष्य अच्छा है. हीरो और विलेन एकरुप हो गए हैं...निठारी को स्वीकारने में समाज अभी थोडा हील-हुज्‍जत भले कर रहा है लेकिन हफ्ता बीतने दीजिये, देखिये, निशब्द को कितने प्यार से स्वीकारता है. समाज भयानक उदारता के साथ एक्सेप्टिंग हो रहा है.
    ब्लॉगिंग विधा के नये रंगरूट रवीश से प्रोबेशन पीरीयड का उन्माद छुपाये नहीं छुप रहा
    समय अब पलछीन है। तो मैं कह रहा हूं कि महीनों तक लिखी जाने वाली रचनाएं अब से कालजयी नहीं कहलायेंगी। वो तो पूरे काल को खा पीकर रची जाती हैं। ब्लॉग के दौर में दैनिक लेखन ही कालजयी हैं। इसलिए रोज़ के लिखे हुए को आप कमतर न मानें। जितनी देर में राजकमल प्रकाशन वाले किसी कालजयी रचना का प्रूफ पढ़ेंगे उतनी देर में ब्लॉग रचनाओं की प्रतिक्रिया आ जाती हैं।
    अविनाश ने कहा कि "प्रेमचंद के ज़माने में ब्लाग होता तो वो लाखों कहानियाँ लिख गए होते"। "ब्लॉग मंडूकों" को सुन कर आनंद मिला होगा पर बात पूरी सही नहीं लगती, प्रेमचंद तो सहस्त्रों बरसों में एक पैदा होता है। अभी तो ब्लॉगरों को लिखना ही सीखना है, अनूप जैसे उदाहरण विरले ही हैं जिनके चिट्ठे के ठोंगे नहीं बनते। मनोहर श्याम जोशी जी सुनते तो आपत्ति करते, सुना है वे रचनायें डिक्टेट करता थे और कई रचनायें एक साथ "फ्लोर" पर रहती थीं। "बदमास" जोशी जी के लेखन का सिंहावलोकन करना हो तो सराय के रविकांत का यह दृष्टांत लेख अवश्य पढ़ें।

    और चलते चलते, अपने ब्लॉगशिविर को नये रूप में ढाल चुके रमण वर्डप्रेस प्रयोक्ताओं को खबरदार कर रहे हैं। मिर्ची सेठ की दुकान फिर खुली है और बता रहे हैं कि सजाल से पढ़ें NCERT की किताबें

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    शनिवार, फ़रवरी 24, 2007

    धर्म से पहले जीवन आता है

    सूचक आशावान व्यक्ति हैं, अब भी टीवी बहसों में मर्यादा की अपेक्षा रखते हैं
    एक चैनल को क्या सूझी कि वो दो समझदारों के साथ "वन साइज डजेंट फिट एवरी वन" पर बहस करे...सवाल ये है कि क्या ये बहसें अपनी मर्यादा जानती हैं? जिस कार्यक्रम की बात यहीं हो रही है उसमें सभी हंस हंस कर ये बता रहे थे कि साइज से क्या, क्यों और कैसे...वे हंस क्यो रहे थे! शर्म से।
    महंगाई जैसे विषयों पर सरोकार रखने वाले छद्म लेखों के बाद लोकमंच अब अपनी औकात पर आ रहा है। भले ही ख़बरों के थाल पर परोसा जा रहा हो पर खोमचा वैमनस्य का ही है। "इस्लाम के अपमान के नाम पर ब्लागर को चार साल की कैद", "पाकिस्तान में नये पाठ्यक्रम का कट्टरपंथियों ने विरोध किया" जैसी खबरोंं को प्रमुखता।

    इस्लाम और मुसलमान शब्दों के प्रति भारतीय पूर्वाग्रह अद्वितीय है। यह विषय हिन्दी ब्लॉग जगत में गये हफ्ते से इरफ़ान के रूप में छाया रहा। मोहल्ले में इरफ़ान के हवाले से अविनाश ने एक लेख लिखा, मुद्दे सही पर ट्रीटमैंट अतिनाटकीय। यह चर्चा मुद्दे पर ही। ओम ने प्रतिक्रिया में कहा, "मैं तो हिंदू हूं पर दिल्ली में बिहारी कहा जाता हूँ...मुझे घिन्न हो गई हैं ऐसी व्यवस्था से..."। प्रियंकर ने लिखा, "समाज में कई स्तरों पर जाति, धर्म और भाषा को लेकर भेदभाव भी है। सारा के साथ स्कूल में अंडे वाली घटना को समाजीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा मान कर देखना चाहिये जो बहुधा संख्याबहुलता से अनुकूलित होती दिखाई देती है। कोलकाता में मेरे बेटे को यदि रहना और पढना है तो उसे मांसाहारी वातावरण में ही रहना होगा...इसे किसी सामाजिक अन्याय की तरह देखने की बजाय समाजशास्त्रीय प्राचलों के आधार पर देखना बेहतर होगा"। मैं सहमत हूँ।

    पर यह हमारा ही समाज है जहाँ सहस्त्रों बरसों पहले मुस्लिम शासकों ने जो किया उसकी दुहाई देकर आज तक मुसलमानों को कोसा जा रहा है। उन्हीं मुग़लों का बनाया ताजमहल बस एक हेरीटेज मोन्यूमेंट है। और जिन अंग्रेज़ों ने २०० सालों तक पैरों तले रौंदा उनकी भाषा और संस्कृति के तलुवे चाटने में ज़रा भी हया नहीं। मुसलमान शासक काफ़िर हमलावर रह गये और अंग्रेज़ हमलावर सॉफिस्टीकेटेड शासक। मदरसा बुरा है, पर मिशनरी स्कूल और वैदिक स्कूल दूध के धुले हैं। मदरसों से हर बच्चा आतंकवादी हो कर निकलता है और बाकी स्कूलों से कल्चर्ड अंग्रेज़ बन कर। भारतीय कौन सा स्कूल बना रहा है फिर आजकल? क्या हम अब भी उपनिवेश नहीं हैं? जगदीश ने कहा, "यह जो दुनिया-समाज हम सारा को दे रहे हैं न अविनाश, यह तुम्हारी, मेरी और मोदी जैसों की ही बनाई है और हमीं को ध्यान देना होगा इस तरफ।" मुनीश ने लिखा, "ये दुखद सत्य है कि अधिकाँश मुसलमान धर्मांध हैं, मुट्ठी भर लोग की पढ़े लिखे और प्रगतिवादी हैं। जब पाकिस्तान क्रिकेट मैच जीतता है तो वे खुशियाँ मनाते हैं"। यह भारत में ही हो सकता है जहाँ इस तरह के फोकलोर प्रचुरता से मशहूर हों, मुसलमान अशिक्षित है, मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा करता है, मुसलमान आतंकवादी है। इन्हीं के दम पर मुख्याधारा से इन्हें अलग रखिये, अपना न बनने दीजीये और "मुसलमान के घर कटार पर हिन्दू के यहाँ तो कुत्ते भगाने के लिये लाठी तक नहीं होती" के आग्रह पर कट्टरता को गाली देते हुये खुद कट्टर बन जाईये। मस्त देस है मेरा! जीवन से पहले धर्म आता है यहाँ। धुरविरोधी की तरह कहने को जी करता है कबीरः
    कितना दुर्बल धर्म हमारा एक पशु गन्दा कर जाता
    और एक पशु की खातिर ही भारत आपस में लड़ जाता
    इससे तो मैं भला नास्तिक, चादर ताने सो रिया
    गणपति बप्पा मोरिया।
    चलते चलतेः भारतीय और अतर्राष्ट्रीय सिनेमा पर एक नया ब्लॉग सिलेमा प्रशंसनीय है अगर पढ़ा न हो तो आज ही पढ़ें।

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    शनिवार, फ़रवरी 17, 2007

    देर है पर अंधेर नहीं

    चर्चा के दरबार में देर है पर अंधेर नहीं, यह साबित करने के लिये पेश आज की डीलेड चर्चा।

    केबल पर पैनल चर्चाओं में समय के टोटे का हाल सुना रहे हैं अज़दक, पर मृणाल थोड़ी गंभीरता से कह रहे हैं

    अखबार और टेलीविज़न चैनल बमवर्षक विमानों की तरह जिस ब्रेकिंग न्यूज़ की गोलाबारी हमारे बेडरूम और मस्तिष्क पर कर जाते हैं वह विषय महत्वपूर्ण विषय बन जाता है। परेशान करने वाली बात यह है कि क्या हम इतने सीमित बुद्धि वाले प्राणी हैं कि एक समय में हम कई ध्यान देने योग्य मुद्दों को भुलाकर केवल एक विषय को सर्वाधिक महत्वपूर्ण और गम्भीर मान पाते हैं।

    रवि रतलामी ने गूगल एडसेंस के साथ अपने तजुर्बे के हवाले से राय ज़ाहिर की कि "हिन्दी चिट्ठाकारी भी व्यावसायिक रूप से सफलता के झंडे गाड़ने के लिए तत्पर और तैयार है, बस समय की बात है"। इस पर ताउ बोल बैठे, "मेरे विचार से इस लेख का लिंक हर जगह होना चाहिए।" जाल पर हिन्दी का बोलबाला ऐसा बढ़ रहा है कि रवि जैसे चिट्ठाकारों के लेख लोग लिंक क्या समूचा उड़ा कर ही चैंप देते हैं।

    पूनम ने "उनको" जगाने के लिये चाय बनाई। दो कप बनाई। रोज़ बनाती हैं पर मेरे ख्याल से चाय में चीनी नहीं मिलातीं। वो "उनके" गुड मार्निंग कहने पर खुद ब खुद घुल जाया करती है। पूनम पहले चाय में अदरक डालती थीं, अब नहीं डालती। अदरक डालने से चाय "ढाबे वाली" बन जाती है। पूनम ने "उनकी" चाय कभी नहीं पी। पूनम जिद्दी हैं। जिद्दी मैं भी हूँ। पूरे पाँच मर्तबा कविता पढ़ी। छठवीं बार पढ़ने से पहले नज़र आई उड़न तश्तरी की टिप्पणी, "मन की उहापोह का सजीव चित्रण, बधाई! बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कहती रचना"। कविता छठवीं बार नहीं पढ़ी मैंने। जब समीर ने नहीं पढ़ी तो मैं क्यों पढ़ूं?#

    वैंलैटाईंस डे जैसे हर डे से विचलित अतुल "लखनवी" की धपजी उन्हें मन्ना डे के दर्दीले पार्श्वगीतों के साथ लौकी थमा लर निकल पड़ी शॉपिंग डे पर और ताउ ने हमारे मौकापरस्त देश की परंपरा को कायम रखते हुये घोषणा कर दी ब्लॉग रीडर्स डे की!

    हिन्दी ब्लॉगजगत में मेम (Meme) खास लोकप्रिय नहीं। रचना ने "अपने बारे में पाँच तथ्य" के टैग में अपना पक्ष दिया और बकौल उनमुक्त चार "जी" और एक "भाई" को टैग किया।

    हिन्दी विकीपिडिया पर अनूप के लेख पर कई पाठकों ने सवाल किया कि लिखना तो है पर आखिरकार विकीपीडीया पर लिखें कैसे। मितुल ने इसी पर हिंदिनी पर दो भागों में लेख लिखा। लेख के भाग 1 और भाग 2 ज़रूर पढ़ें।

    बजट क्या है और इसे कैसे प्रस्तुत किया जाता है जानें लोकमंच पर

    मासीजीवी बता रहे हैं कि गोदना विमर्श में हिंदी अब हाशिए पर नहीं है। घुघूती बासूती ने टिप्पणी की "अब गर्दन पकड़कर लोगों को हिन्दी पढ़वा नहीं सकते तो उनकी गर्दन पर लिख तो सकते हैं।"

    आज का चित्र

    आज का चित्र, शुऐब के चिट्ठे पर हमारे राष्ट्रपति की चित्रमय झांकी से

    #दिल पे मत लो यारों!

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    रविवार, जनवरी 28, 2007

    सिंहासन पर बैठा, उनके तमगे कौन लगाता है?

    मित्रों चिट्ठा चर्चा में आये अवरोध के लिये क्षमाप्रार्थी है यह दल। मेरी ओर से प्रस्तुत हैं २६ जनवरी के चिट्ठों की संक्षिप्त चर्चा।

    गणतंत्र दिवस के अवसर पर अनूप ने प्रकाशित किया हरिशंकर परसाई का लेख ठिठुरता हुआ गणतंत्र, कितने ही साल पहले लिखा गया पर आज भी प्रभावी।

    प्रधानमंत्री किसी विदेशी मेहमान के साथ खुली गाड़ी में निकलती हैं। रेडियो टिप्पणीकार कहता है, "घोर करतल-ध्वनि हो रही है।" मैं देख रहा हूं, नहीं हो रही है। हम सब तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं। बाहर निकालने का जी नहीं हो रहा है। हाथ अकड़ जायेंगे। लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं, फिर भी तालियां बज रहीं हैं। मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं, जिनके पास हाथ गरमाने के लिये कोट नहीं है। लगता है, गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है। गणतन्त्र को उन्हीं हाथों की ताली मिलतीं हैं, जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिये गर्म कपडा़ नहीं है।

    नैस्डैक के भवन पर भारतीय तिरंगे की छटा दिखा रहे हैं जीतेंद्र पर रचना संशय में हैं

    हर दिन की मुश्किल से आम आदमी परेशान है,
    आज तक भी गुम नारी की पहचान है,
    नौकरी विहीन निराश नौजवान है,
    फिर कैसे कह दें? ये देश महान है!

    लोकमंच पर पढ़िये सिंगूर का सच और पानी पर राजनीति के शिकार राजस्थान के किसानों की व्यथा

    मानव मन भी अद्भुत है। बालपन में माँ बाप उलाहना देते रहते हैं, "क्या छोटे बच्चों की तरह बिहेव कर रहे हो!" जब बड़े हो जाते हैं तो ताने सुनने को मिलते हैं, "आप का तो बचपना अब तक नहीं गया"। तो उमर का तकाज़ा भले हो कि उमर पहचानी जाय, पर उमर बढ़ रही है यह पहचानने में उमर बीत जाती है। गीतकार जी बढ़ती उमरिया की पहचान का लिटमस परीक्षण प्रस्तुत करते हुये कहते हैं

    तन की बिल्डिंग की छत पर जब उग आयें पौधे कपास के
    बिस्तर पर जब गुजरें रातें, करवट लेकर खांस खांस के
    जब हिमेश रेशमिया की धुन, लगे ठठेरे की दुकान सी
    याद रहें केवल विज्ञापन जब झंडू की च्यवनप्राश के
    बाहर से ज्यादा अच्छे जब दॄश्य लगें घर के अंदर के
    सपनों के यायावर, ये हैं लक्षण ढलती हुई उमर के

    मनीशा बता रही हैं की तिरुमला मंदिर के चढ़ावे में भगत जाली नोट दे रहे हैं। "देते हैं भगवान को धोखा इंसां को क्या छोड़ेंगे?" पर समीर ने दो टूक टिप्पणी की, "जब अपने आराध्य तक पहूँचने का मार्ग भी पैसा बन जाये तो क्या सच्चा और क्या झूठा. गलत ही सही, मगर वो दर्शन तो कर पाया वरना २४ घंटे लाईन में लगने के बाद भी मात्र ३ सेकेंड के दर्शन होते"

    कृष्ण विवर यानि ब्लैक होल, न्यूट्रॉन और पलसर जैसे शब्द यदि आपको उत्साहित करते हैं तो पढ़िये अंतरिक्ष चिट्ठे पर आशीष का यह रोचक आलेख

    अंत में एक छोटा सा सवाल, इस प्रविष्टि के शीर्षक को किन लेखक की रचना से लिया गया है? बिना गूगल किये बता सके सकें हों तो हम सब की दाद स्वीकारें।

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    शनिवार, जनवरी 13, 2007

    सीमित बुद्धि के कयासी निष्कर्ष

    मेहरबान कद्रदान, आज की चिट्ठा चर्चा में तेज़ सुर्खयों का करें पान


    • गाँधी पर बहस बढ़ी जा रही है। पहले अनूप ने सृजन शिल्पी को छेड़ दिया, उसके बाद सागर के बाबा रामदेव द्वारा कवि प्रदीप को चापलूस पुकारने के वक्तव्य का समर्थन करने पर ऐसी खबर ली कि वे बीमार ही पड़ गये। अब अगला जवाबी चिट्ठा किसका होगा इंतज़ार रहेगा।
      बड़े से बड़े समाजशास्त्री भी सामाजिक, राजनैतिक घटनाऒं का पोस्टमार्टम/व्याख्या कर सकते हैं, वर्तमान के आधार पर भविष्य का पूर्वानुमान लगा सकते हैं लेकिन सटीक भविष्यवाणी नहीं कर सकते। ऐसा संभव ही नहीं है। इसी तरह अतीत में घट चुकी घटनाऒं पर कुछ अपने तर्क और ‘डाटा’ रखकर यह कहना कि अगर ऐसा होता तो आज वैसा होता कहने का कोई मतलब नहीं होता। क्योंकि जिस समय आप इस तरह के तर्क पेश कर रहे होते हैं तो वे केवल आपकी सीमित बुद्धि के कयासी (अनुमानित) निष्कर्ष होते हैं। बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति(यों) भी तमाम अपनी काबिलियत के चरम पर होने के बावजूद किसी भी घटना के बारे में ऐसी कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकते जिसके होने की प्रतिशतता १००% हो। गांधीजी के दक्षिण अफ्रीका जाने तक का जीवन भी एक आम सत्यवादी व्यक्ति का जीवन था और ऐसी कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती थी कि यह व्यक्ति एक दिन देश क्या विश्व का विलक्षण व्यक्तित्व बनेगा।
    • अपने ब्लॉग थीम के स्क्युबल थीम से बेहतरीन रूपांतरण करने के बाद तरुण का अपराध बोध बुनो कहानी से निट्ठला चिंतन तक जा पहुंचा है इस उम्मीद से कोई कहानी पूरी कर उनके मन को हल्का करेगा। भाई ऐ भाई! अरे कोई सुन रहा है भाई!

    • गुरु के आगे नतमस्तक हैं जगदीश हालांकि भावावेश में वे अभिषेक बच्चन के अभिनय(?) तक की तारीफ कर गये। पर ये क्या तारीफ तो नितिन भी कर रहे हैं निश्चित ही अभिषेक ”आज खुश तो बहुत होंगे तुम..हैं..???" वैसे समझ ये नहीं आता कि हिन्दी का "ह" भी न समझ पाने वाले दक्षिण के ये दिग्दर्शक (सब्र रखो मणि के अंधभक्तों, प्रियदर्शन को भी लपेटे में ले रहा हूं) हिन्दी पटकथा समझ कैसे लेते हैं, ये सोनिया गाँधी का भाषण तो है नहीं कि फकत बोलने की जरूरत हो, समझने की नहीं। नितिन गुलज़ार के गीत के कई बोल भी नहीं समझ पाये। ये तो सब के साथ होता है, मनबोल देखें, एक खोजो सेंकड़ों मिलेंगे। जगदीश ने लिखाः
      ख्वाब कभी पूरे नहीं हो पाते, जब आप देश की सबसे बड़ी कम्पनी बनाने का ख्वाब देखते हैं, एक बहुत बड़ा सपना होता है यह और जब आप इसे छू लेते हैं तो आपका सपना होता है उसे दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनी बनाना। बहुत ही रोमांचकारी लगता है उस इतिहास पर फिल्म देखना जिस इतिहास को आपने स्वयं देखा हो।
    • मंदाकिनी की बहन की घुमावदार सरंचना स्पष्ट रूप से देख रहे हैं लोग, यूंही
    • मुंबई की चौपाल, जहाँ नई पीढ़ी के लोग बुज़ुर्गों के साथ बैठकर एक साथ बात करते हैं, को जाल पर भी खींच लाई हैं नीलिमा।
    • इधर संवाद की महिमा बखुबी समझने वाले ईपंडित वर्डप्रेस से ब्लॉगर धाम की ओर पलायन करने को उतारू हैं और रोक कोई नहीं रहा। उधर वर्डप्रेस खेमे से अलग हुये लोगों के नये शगूफ़े हबारी पर हो रही है नुक्ताचीनी
    • "हम सब ज्ञानी हैं" का नारा लगाकर जीतेंद्र ने सहेजना शुरु किया है सुझावों का खजाना
    • सूचक को विश्वास है कि पत्रकार बदलेंगे, मीडिया युग बदलेगा। जब खबरों के चैनलों और मनोरंजन चैनलों के बीच का अंतर घटता रहा हो तो यह आशावादिता ही शायद काम आये। सवाल जायज है पर जवाब टीआरपी में है
      ये सवाल अपने आप में ही जायज हो जाता कि कितना देखना है और कितना दिखाना है। कितना बेचना है और कितना बचाना है। क्या खबर के नाम पर हर जानकारी देना दर्शक को बांधे रखता है। बीमारी बताइए। दोष बताइए। दोषी बताइए। पर नाट्य रूपांतरण क्यों। क्या बच्चे को समझाना है या एडल्ट को।
    • संजय ने खोज निकाली एक नई विक्शनरी और उधर पंकज ने मंतव्य का वाढदिवस बरसी की तरह मना डाला
    • विदेशी हवा में देसी गंध को तरसते ईस्वामी ने साफ सुथरी फिल्म बनाने के आरोपी सूरज बड़जात्या को क्लीन चिट दे दी
      “विवाह” देखना टाईम-ट्रैवल कर के सतयुग का चक्कर लगा आने जैसा है. चरित्रों का अच्छापन, उनकी पारंपरिकता और और उनकी भावुकता अवास्तविक और अतिशय लगती है. लेकिन वहीं फ़िल्म के कुछ संवाद, कुछ तत्व आम भारतीय रोज़मर्रा वाले जीवन के इतने करीब और सही हैं की दूसरी चीजों पर उपजी खीज़ कम हो जाती है. कुछ भी कहें सूरज बडजात्या को ‘जिस्म’ और ‘मर्डर’ जैसी फ़िल्मों के समय में इस प्रयास के लिए दाद देनी होगी!

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    शनिवार, दिसंबर 30, 2006

    संभावनाओं का बिगुल

    वर्ष 2006 हिन्दी चिट्ठाजगत के लिये 2007 की संभावनाओं का बिगुल बजाते हुये जा रहा है। यह साल हिन्दी के जाल पर फैलाव की नींव का पत्थर साबित होगा, मेरा अनुमान है कि चिट्ठाकारों की संख्या इस साल करीब 60 प्रतिशत बढ़ी जो जाल पर भारतीय भाषाओं के प्रयोग की कथित मुश्किलातों के मद्देनज़र उल्लेखनीय संख्या है।

    पिछले साल तक ब्लॉगमंडल पर चर्चा होती थी कि युनीकोड की राह न चलने के कारण कितने ही हिन्दी जालस्थल, जिनमें प्रमुखतः प्रोपायटरी या अन्य ट्रूटाइप फाँट्स प्रयोग करने वाले समाचार साईट हैं, डायनोसार होने की कगार पर हैं पर पद्मा और मेधास जैसे प्रयासों से अयूनिकोडित जालस्थलों के युनीकोड स्वरूप को देखना अब संभव है। हालांकि ये जानकारी आन दी फ्लाई यानि तुरतफुरत परिवर्तित हो कर दिखती है और यदि यूनीकोडित सामग्री को ये परिवर्तक स्टोर कर भी रखें तब भी मुझे अनुमान नहीं कि ये जुगाड़ लंबी दूरी की कवायद में कहाँ आ रुकेंगें और गूगल इस यूनीकोडित सामग्री को खोज पायेगा कि नहीं। पर जैसा की बांगला में कहावत है, नहीं मामा से काना मामा अच्छा। यूनीकोड के जाल पर उपयोग और समाचार माध्यमों की इस पर निर्भरता को देखते हुये उनका इस ओर बढ़ना ज़रुरी है और इस पर किया जाने वाला खर्च लाभप्रद ही साबित होगा।

    जाल पर हिन्दी में लिखना अब कहीं आसान है, अनुनाद के चिट्ठाकार समूह पर समय समय पर प्रेषित कड़ियों से यह यात्रा दिखती है, ढेरों उपाय हैं, और अब अगर कोई ये कहे कि पर्याप्त जुगाड़ नहीं हैं तो मैं इसे महज़ बहानेबाज़ी ही मानुंगा। वर्डप्रेस जैसे माध्यमों में सीधे हिन्दी में टिप्पणी लिखने के लिये प्लगईन आ गये हैं शायद कुछ दिनों में पोस्ट सीधे लिखने के हिन्दी संपादित्र का भी आ जाय। ब्लॉगर, जिसका अब भी अधिकांश लोग प्रयोग करते हैं और वर्डप्रेस की ५० एमबी की डेटा सीमा के मद्देनज़र आगे भी करेंगे, के लिये अगर कोई ऐसा सीधा जुगाड़ बन सके तो कितना अच्छा हो।

    तरकश निश्चित ही चिट्ठाजगत की शान में इज़ाफा करने वाले प्रकल्पों में से है। उभरते चिट्ठाकारों के पोल में नामांकित चिट्ठाकारों की सूची देखकर खुशी होती है, इनमें से कई न केवल अच्छा लिखते हैं वरन नियमित लिखते हैं और दुसरे का लिखा टिप्पणियों से सराहते भी हैं।

    गाँधी पर चिट्ठामंडल पर जो बहस हुई वह स्वस्थ चिट्ठामंडल का परिचायक है और आगे भी ऐसी चर्चायें जारी रह सकें इस लिये ज़रूरी है कि व्यक्ति नहीं विचारों की बात हो, आक्षेप निजी स्तर पर न हों और समर वैचारिक हों। अच्छा यह भी हो कि परिचर्चा जैसे फोरम में होने वाली बहसों को चिट्ठों के द्वारा भी उठाया जाय ताकि ये संवाद केवल चिट्ठाजगत ही नहीं एग्रीगेटरों के माध्यम से हिन्दी चिट्ठाजगत के बाहर भी गुंजायमान हों। ग्लोबल वायसेस आनलाईन की एक प्रतिनिधि से हाल ही में चर्चा हुई और यह पता चला कि वे भारतीय भाषाओं के संवाद में रुची रखते हैं पर यह मानते हैं कि ये समुदाय बाहरी ब्लॉगमंडल से जुड़े नहीं है। मैं और अनूप यह प्रयास कर रहे हैं कि जीवी जैसे माध्यमों से हम हिन्दी चिट्ठा जगत की उल्लेखनीय चर्चाओं को कुंयें के बाहर भी परोंसे। जीवी जैसे माध्यम भले हमें खास हिट न दे सकें पर मुख्यधारा का मीडिया ऐसे समाचार श्रोतों पर नज़र रखता है और हमे इसका लाभ लेना चाहिये।

    किंचिंत व्यक्तियों पर आधारित प्रकल्पों की आयु अधिक नहीं हो सकती, निरंतर के साथ मैंने यह महसूस किया है और चिट्ठाचर्चा के साथ अनूप ने यह साबित कर दिखाया है कि भागीदारी की ईंट से चिट्ठाचर्चा जैसी भव्य और टिकाउ ईमारत खड़ी की जा सकती है। हालांकि हर प्रकल्प के साथ रिंगमास्टर की उपस्थिति और रुचि चाहिये भी और अनुगूँज के लिये हमें ऐसे रिंगमास्टर की तलाश है जो इसे अपना कर समृद्ध कर सके। देसीटून्ज़ भी ऐसा एक प्रयास रहा जिसमें हम आपकी भागीदारी की भी उम्मीद करते हैं, अगर आप गंभीर या औपचारिक लेखन में रुची रखते हैं तो बुनो कहानी, निरंतर और तरकश जैसे माध्यम भी हैं।

    हिन्दी चिट्ठे बाँचने के लिये और नवीनतम चिट्ठों की जानकारी के लिये अब अनेक माध्यम हैं और यह सूची शायद् 2007 में भी आपके काम आयेः

    http://narad.akshargram.com
    http://chitthacharcha.blogspot.com
    http://groups.google.com/group/charcha
    http://www.hindiblogs.com
    http://hindi-blog-podcast.blogspot.com
    http://hindi-b-h.blogspot.com/
    http://www.technorati.com/faves/Indiblogger
    http://www.myjavaserver.com/~hindi/ (फिलहाल बंद है)
    http://feedraider.com/u/debashish/r/dpf9x/

    आप सभी के लिये नववर्ष की हार्दिक मंगलकामनायें!

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    रविवार, दिसंबर 24, 2006

    कस्मे वादों से गूँज रहा है गली मोहल्ला

    रवि परेशान हैं कि मोबाइल कंपनियों मोबाइलें तो बेचती हैं मगर यूजर्स मैनुअल में दो पन्ने मोबाइल मैनर्स के लिए नहीं रखतीं
    आपका कोई पुराना मित्र, जिसके दर्शन महीनों से नहीं हुए होते हैं, अचानक-अकारण आपसे बे-वक्त मिलने आ पहुँचता है. यूँ ही आपके दर्शन करने. उसके हाथ में नया, चमचमाता हुआ, लेटेस्ट वर्जन का मोबाइल फ़ोन होता है. आपको देर से ही सही, समझ में आ जाता है कि दरअसल, आपके मित्र को नहीं, आपके मित्र के नए, कीमती, नए-फ़ीचर युक्त मोबाइल को आपसे मिलने की आवश्यकता थी.
    मनीषा बता रही हैं कि भारत में रोजगार का बाजार उछाल भर रहा है, केवल सूचना प्रोद्योगिकी ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी
    वर्ष 2007 की पहली तिमाही में यहां रोजगार के अवसरों में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी की संभावना है। वहीं, चीन में इस दौरान रोजगार में महज 18 प्रतिशत का इजाफा होगा यानी भारत इस मामले में एशिया में सबसे आगे है।
    भागमभाग देख कर भाग खड़े हुये शशि फिल्म से नाखुश हैं पर फिर भी कहते हैं
    जिस तरह मरा हाथी भी सवा लाख का होता है उसी तरह प्रियदर्शन की बुरी फिल्म भी दर्शकों के लिए हमेशा से पैसा वसूल हैं. तीन घंटे अगर आप अपने दिमाग के बगैर गुजारा कर सकते हैं तो इस समीक्षा को भूलकर सिनेमाघर की तरफ रूख किया जा सकता है.
    तरकश के उभरते चिट्ठाकार पुरस्कार आयोजन के लिये सरगर्मी तेज़ है। सब प्रचार पर निकले हैं,
    चुनाव का दौर है, देखो चारों ओर
    सफेद कपडे पहन के घूम रहे हैं चोर।
    घूम रहे हैं चोर, मचा रहे हैं हल्ला गुल्ला
    इनके कस्मे वादों से गूँज रहा है गली मोहल्ला।
    इन रेलमपेल में भी नायाब पोस्ट लिख बैठै शुकुल जी, उनके हर पोस्ट की हर लाईन पर वाह वाह करने को दिल करता है, कुछ उल्लेखनीय कथन
  • जैसे कि असफल लेखक श्रेष्ठ आलोचक की कुर्सी हथिया लेता है वैसे ही कभी इनाम न पाया हुआ व्यक्ति हमेशा बढ़िया तरह से बंटबारा कर सकता है।
  • इंडीब्लागीस में जो लोग अभी तक इनाम पाये हैं उन लोगों ने इनाम पाने के बाद सबसे पहला काम यह किया है कि लिखना छोड़ दिया या कम कर दिया। आलोक, अतुल, शशिसिंह इसके गवाह हैं। डर यही है कि उभरता हुआ चिट्ठाकार कहीं उखड़ता हुआ चिट्ठाकार न बन जाये!
  • अब मुन्ने की अम्मा हैं, मुन्ने के बापू हैं लेकिन मुन्ना कहीं दिखता नहीं। ये तो ऐसे ही है कि किसी विकास और शील रहित देश को कोई कहे कि वो विकासशील देश है।
  • मजाक क्या पद और गोपनीयता की शपथ है जो हम इसे खाकर भूल जायें। बिना मौज लिये तो हम सांस भी नहीं ले पाते। इहै हमार इस्टाइल बा!
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    शनिवार, दिसंबर 09, 2006

    मजहब अगर लकीर है, मैं क्यों बनूँ फ़क़ीर

    आज की चर्चा संक्षिप्त ही, क्योंकि मध्यान्ह चर्चा के बाद अपुन के पास कुछ बचा भी नहीं चरचने को।

    मनीषा ने युवा बने रहने के लिये कई नुस्खे बताये हैं। सतयुग होता तो अपनेराम अपना भी लेते इनमें से कुछ, आप देखें कछु काम का मिले तो। हिन्दी ब्लॉगजगत में एक और नये किस्म का चिट्ठा है सेक्स क्या, अच्छा प्रयास है।

    विषय से भटकने का आनन्द लेते हुये दीपक फंस गये ग्लोबल माकर्केटिंग नेटवर्क में, न केवल आसामान से गिरे बल्कि खजूर में भी अटके
    उन्होंने कम्पनी का रटा हुआ बायो-डाटा टेलीविजन के कुशल समाचार वाचक की तरह सुनाया. मैं अत्यन्त परेशानी की स्थिति में था खडी हुई ट्रेन को मन ही मन मौलिक गालियाँ दिए जा रहा था. आप गालियों की मौलिकता का अन्दाज़ा इससे लगा सकते हैं कि अगर उन्हें सार्वजनिक कर दूँ, तो ओंकारा के निर्देशक मुझे अपना संवाद-लेखक न रखने पर खुद को कोसने लगें.
    शुएब पूरे फार्म में चल रहे हैं और छ दिसंबर के राजनीतिकरण पर उन्होंने बढ़िया कटाक्ष किया, ख़ुदा की ज़ुबानी
    देखो उन बेघर इन्सानों को देखो, उन लोगों को जो ठंडी रातों में सड़कों पर बसेरा करते हैं। और तुम हो कि चले ख़ुदा के लिए घर बनाने? थू है तुम्हारी सोच और विचारों पर, अपने पड़ोसी के घर लाईट नही और चले हो मन्दिर और मस्जिद को रौशनी से जगमगाने? तुम्हारी करतूतों और अंधविश्वास पर ना हंसने को जी करता है और ना रोने को। ख़ुदा को तुम इन्सानों की इबादत और पूजा की कोनो ज़रूरत नहीं है। तुम इन्सान एक दूजे के लिए हो, एक दूसरे के दुःख सुख में साथ रहो - मगर प्लीज़ हमारे लिए ये मन्दिर मस्जिद ना बनवाओ क्योंकि हम तुम्हारे घर जमाई नहीं हैं।
    नीरज ने बेहतरीन टिप्पणी की
    सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या वीर,
    जिस दिन सोये देर तक भूखा रहे फकीर।
    ख़ुद में ही जब है ख़ुदा, यहाँ-वहाँ क्यों जाऊँ
    अपनी पत्तल छोड़ कर, मैं जूठन क्यों खाउँ।
    पाप न धोने जाऊँगा, मैं गंगा के तीर
    मजहब अगर लकीर है, मैं क्यों बनूँ फ़क़ीर।
    अंत में शिवाजी दास का शानदार (अंग्रेज़ी) लेख विरोध प्रदर्शनों में पुतला जलाने की प्रथा पर, ये हैं उनके कुछ काबिलेगौर सुझावों में से एक
    ज़्यादातर पुतले बड़े ही फूहड़ ढंग से बने होते हैं, जिस व्यक्ति का विरोध हो रहा है उससे ज़रा भी मेल नहीं खाते। अक्सर ये बस कपड़े और अखबारों जोड़जाड़ कर बना लिये जाते हैं इससे तमाशबीनों को यह पता नहीं चल पाता कि विरोध किस का हो रहा है जिससे विरोध का शर कम होता हैं। मेरा सुझाव है कि सरकार आईआईटी में ल्दन के मैडम टूसाड म्यूज़ीयम के साथ मिलकर पुतलों को बेहतर तरीके से डिज़ाईन करने के पाठ्यक्रम चलायें।

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    शनिवार, दिसंबर 02, 2006

    ख़ुदा को नाच पसंद है

    कल विश्व एड्स दिवस था, मुख्यधारा के मीडिया के लिये मौका था यूएनएड्स की वेबसाईट खंगाल कर कुछ "नई" जानकारी खोजकर रूटीन रपटों में जान डालने का। भारत जैसे देशों में, जहाँ पहले टीबी और अब एड्स जैसे रोगों को सामजिक कलंक के रूप में देखा जाता रहा है, संक्रमण के खिलाफ लड़ाई बेहद मुश्किल है, खास तौर पर ऐसी स्थिति में जब कोई कारगर इलाज़ मुहैया न हो। जब निरंतर पर एड्स पर विशेषांक प्रकाशित हुआ तो हमने यह ध्यान रखा कि "रोग" और "रोगी" की जगह हम "संक्रमण" और "संक्रमित" जैसे शब्द इस्तेमाल करें। दिल्ली स्थित एक पत्रकार, जो इस विषय पर लिखती रहती हैं, ने लेख के शुरुवाती खाके को पढ़कर मुझे लिखा था, "जो भी लिखें बस कयामत के दिन की छवि न बनायें, एड्स संक्रमित व्यक्ति भी 15 से 20 साल जी सकते हैं।" संवेदनशील मामला है, जब संबद्ध संस्थायें ही कोई रूख बनाने में असमंजस की स्थिति में हों तो फिर आम आदमी की क्या कहें। डॉ सुनील के लेख में ट्रकचालकों की एचआईवी के फैलाव में बड़ी भूमिका होने की बात पर यूएनएड्स की भारतीय प्रवक्ता ने हमें कहा था कि किसी समूह को कलंकित करना गलत है, पर यह तथ्य हमने फिर भी प्रकाशित किया, शतुरमुर्ग बने रहने से क्या होगा? रमण ने बीबीसी पर इस मौके पर प्रसारित रेडियो कार्यक्रम की प्रशंसा की है।
    इन (संक्रमित) लोगों ने बताया कि गाँव में किस तरह लोग इनका बहिष्कार करते हैं, और किस तरह से इन के परिवारों ने भी इन का साथ छोड़ दिया है...एक साहब बोले, "मैं ऐसे लोगों से नहीं मिला हूँ, शायद निचली जाति वालों में होता हो यह तो कर्मों का फल है...जैसे कर्म किए होंगे वैसा फल मिलेगा।" ऐसे लोगों के रवैये के कारण ही हमारे यहाँ दुर्दशा है। कार्यक्रम में बताया गया कि कुछ डॉक्टर भी रोगियों से अछूतों वाला व्यवहार करते हैं।
    साक्षी लिखती हैं कि हालात अब भी यों हैं कि सरकारी अस्पताल एड्स पीड़ितों को भर्ती करने के लिये राज़ी नहीं। ज़ाहिर है, दुनिया बदल रही है पर नज़रिया बदलने में वक्त तो लगता ही है।

    अमित ने मांगलिक ऐश की अभिनय कांगलिक अभिषेक से विवाह की खबर पर लिखा है। खबर थी कि ऐश को बला टालने के लिये पहले एक पीपल के पेड़ से कुँभ विवाह करना होगा। इस पर अमित ने कुछ संभावित परिस्थितयों की कल्पना कीः
  • पीपल का पेड़ और ऐश्वर्या की जोड़ी किसी फिल्म में साथ आते हैं। पेड़ बेहतर अभिनय करता है।
  • 2014 में ऐश्वर्या अपने दूसरे बेटे को एक पौधा खाते देखकर चीख पड़ती हैं, "रुको शैतान! वो तुम्हारा बड़ा भाई है!"
  • हिन्दी ब्लॉगजगत मे बहस चली है गाँधी पर और सागर कहते हैं,
    "भारत की आजादी में अप्रत्यक्ष रूप से द्वितीय विश्व के खलनायक हिटलर का योगदान भी कम नहीं था जिसने विश्व युद्द के दौरान ब्रिटेन की हालत इतनी खोखली कर दी कि मजबूरन अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा...क्रान्तियाँ कभी बिना खडग और बिना ढ़ाल के नहीं मिलती, अगर सिर्फ़ गांधीजी के तरीकों से आजादी की कामना करते तो शायद आज भी हम गुलाम ही होते!"
    इस बीच मैं यह अंदाज़ा लगाने में व्यस्त हूं की बीजेपी स्वामी रामदेव को किस क्षेत्र से अगला चुनाव लड़वायेगी। वैसे भी धर्मगुरुओं को सोचसमझकर ही बोलना चाहिये, आध्यात्म और राजनीति के बीच का दायरा कम हो चला है। उधर गांधीगिरी की एक नायाब मिसाल दे रहे हैं इंदौर के अतुल शर्मा।

    शुऐब पहली बार गये डिस्को में और जान लिया दुनिया के समीकरण को हल करने का, सही तरीका,
    "मसजिद में हिन्दू नही आ सकते और मंदिर में मुसलमानों का दाखिला नहीं, मगर ये डिस्को हर एक को खुशामदीद करता है, किसी के साथ भेदभाव नहीं, यहां सब एक हैं।"
    इस प्रविष्टि पर ढेर सारे पाठकों ने मधुशाला की "सेम टू सेम" पंक्तियाँ उद्धत कर दीं, क्या बात है साब विचारों का अकाल पड़ गया या अपनी हांकने के चक्कर में लोगबाग दूसरों की टिप्पणी पढ़ते तक नहीं? ईस्वामी ने भी लेख की प्रशंसा की और, बकौल समीर, अपने ई-प्रवचन में लिखा,
    "खुदा को नाच पसंद है - कभी किसी गुलाब की डाली को हवा में झूमते देखो"।
    जगदीश ने आर्थिक विकास के आंकड़ों का उल्लेख करते लिखा है,
    "हमारी अर्थव्यवस्था में कृषि का सहयोग अब मात्र 17.2% ही रह गया है जो कि 1990-91 के मुकाबले आधे से भी कम है। अब कोई यह नहीं कह सकता कि हम एक कृषि प्रधान देश हैं।"
    अनुनाद ने हामी भरी, "अर्थव्यवस्था का कृषि आधारित न रहना एक शुभ लक्षण है, शायद विकसित होने के लिये आवश्यक शर्त भी यही है।" पर अनुराग चिंतित नज़र आये,"कृषि पर निर्भर लोगों की संख्या घटी है ये अच्छा शगुन हो सकता है मगर कृषि की सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सेदारी एक चिंता का विषय है। कृषि अगर पीछे छूटेगी तो वो समाज की प्रगति को एक साथ कई साल पीछे खींच लेगी। हम लोग कितनी भी प्रगति कर लें खाना रोटी ही है।" अरे फिकर की बात क्या है, अपना भाई चीन हैं न!

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    शनिवार, नवंबर 25, 2006

    प्रेम याने प्रेम याने प्रेम होता है

    प्रस्तुत है आज की चिट्ठा चर्चा ज़रा संक्षिप्त रूप में।

    मुकेश बंसल कहते हैं कि हिंदी को अपनाने के मामले में हम दोहरे मापदंडों का इस्तेमाल करते रहे हैं,
    "हर पढ़ा-लिखा हिंदुस्तानी अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में डालना चाहता है, लेकिन सामाजिक तौर पर अंग्रेजी के महत्व का विरोध करता है। बातचीत में ज्यादा से ज्यादा अंग्रेजी बोलता है, लेकिन हिंदी के अखबार में अंग्रेजी के शब्द देख कर नाराज हो जाता है। उसकी खुद की जिंदगी में पैंट, शर्ट, टाई, हलो, हाय शामिल हो जाए तो अच्छा है, लेकिन अखबार की भाषा नहीं बदले। इस दोहरेपन से हम जितनी जल्दी मुक्त हों, उतना अच्छा होगा।"

    अपनी बात कहने के अपने मौलिक अधिकार का बखूबी उपयोग करते हुये रचना भारतीय क्रिकेट टीम के हारने के संभावित कारणों पर विवेचना कर रही हैं। सारे टेलीविज़न नेटवर्क इंटरनेट और मोबाईल के साधनों पर अपना आधिपत्य सिद्ध करने को आमादा हैं, NDTV ने भी अपना ब्लॉगिंग प्लैटफॉर्म मुहैया कराया पर जगदीश सख्त ख़फा हैं वहाँ प्रकाशित भद्दी, अशलील और नफरत फैलाने वाली टिप्पणियां देख। इस बीच जानिये कि लोग नौकरियाँ क्यों बदलते हैं और पढ़िये असल जीवन में कॉमेडी आफ एरर्स का उदाहरण, डॉ टंडन की कलम से
    मैने उससे कहा, "आप को रात मे सावधानी रखनी चाहिये या फ़िर आप गोलियों का सहारा भी ले सकती हैं।"
    "तो आप का कहना है कि यह सिर्फ़ रात मे ही होता है।"
    मैने उसकी बात को पकडा, "नही-नहीं! मेरे कहने का मतलब है किसी भी समय आप कर सकती है, जब भी आप का मूड करे, लेकिन पूरी सुरक्षा के साथ।"
    अब कि बार वह कुछ परेशान सी दिखी, "इसमे मूड से क्या मतलब।"
    मै उस का मतलब शायद कुछ-कुछ समझ रहा था, "यह हो जाता है, इसमे मूड की कोई बात नही है।"


    तुषार ने मंगेश पाडगावकर की मराठी कविता का सुंदर भावांतरण प्रस्तुत किया है
    प्रेम शेम कुछ नही, कहने वाले मिलते हैं
    प्रेम याने ढोंग ये भी सोचनेवाले मिलते हैं

    ऐसा ही एक व्यक्ति हमसे कहने लगा
    पाँच बच्चे हो गए मगर प्यार व्यार कुछ किया नहीं
    हमारा काम निकल ही गया, प्यार के सिवा चल ही गया

    उसे लगा मै मान गया
    लेकिन मैं उस दिन जान गया

    प्रेम याने प्रेम याने प्रेम होता है
    इनका और हमारा सेम नहीं होता है।
    नितिन पई के हवाले से खबर मिली चिट्ठे आफ स्टंम्प्ड के बारे में जो विभिन्न मुद्दों पर ठोस राय का मुज़ाहरा करता है। नितिन कुछ हिन्दी चिट्ठाकारों की तलाश में हैं जो कि इन चिट्ठों को हिन्दी में प्रस्तुत कर सकें। अगर आप को रुचि हो तो मुझे लिखें।

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    शनिवार, नवंबर 18, 2006

    द्विपक्षीय वार्तालाप के आकांक्षी

    प्रतीक को लगता है भारत में माईटी हार्ट फिल्म की शूटिंग पर पधारे ब्रेंजेलीना ने बॉडीगार्ड को भारत की हवा लग गई है तभी तो सारे नियमों को ताक में रख दादागिरी करते फिर रहे हैं। पुणे में इन्होंने एक छायाकार की गर्दन लगभग मरोड़ ही दी, एक स्कूटर सवार को टक्कर मार दी, जयपुर में बिना इजाजत अपना निजी विमान उतार लिया और अब मुंबई में एक स्कूल में बिना घोषणा शूटिंग और अभिभावकों से धक्कामुक्की। वैसे शुरुवात में सूरते हाल यह था कि "जब ब्रेंजेलीना न राज़ी, तो क्या करे पापाराज़ी", दोनों मीडिया को अपनी परछाई से भी दूर रख रहे थे और अब हर तईं बेशुमार चित्र छप रहे हैं, भई पहले ही ये काम हंसी खुशी करने देते। खामख्वाह तैश खाने का (या गीतकार समीर के अंदाज़ में कहें तो "हद से गुज़र जाने" का) जो चरित्र इन पहलवानों ने भारत में चटपट आत्मसात कर लिया वो वाकई कमाल का है, इसी प्रविष्टि में संजय की टिप्पणी पर नज़र डालें, कहते हैं,
    "'ब्लडी इंडियन' सुन कर इतना गुस्सा आया था की इच्छा हुई बन्दे को वहीं जमीन में गाड़ दें. अब कम से कम उस पर मुकदमा तो चलना ही चाहिए. क्योंकि इस गाली के साथ हमारी राष्ट्रीयता जुड़ी हुई है."
    इसके बावजूद प्रिय रंजन भारत की सॉफ्ट नेशन की छवि से परेशान हैं

    कभी चैट के समय जीतू ने एक बार मुझे कहा था कि जैसे ही हिन्दी का प्रचलन नेट पर बढ़ेगा सेक्स से लेकर जूते चप्पल बेचने वाले भी "यूनीकोड शरणम् गच्छामि" की तोतारटंत शुरु कर देंगे। अपनेराम का कहना था कि हम तो बस इतना चाहते हैं कि नेट पर हिन्दी की जयजयकार बढ़े, बस! अमिताभ ने दिल्ली में संपन्न भाषाई अखबारों के संपादकों के सम्मेलन का ज़िक्र किया है, अपने शशि भी वहां आमंत्रित थे, जहाँ तक मुझे पता है विहिप के तत्वावधान में यह आयोजन था। तो "द्विपक्षीय वार्तालाप" के आकांक्षी चाहते हैं कि अपना "हिन्दू" नेट सर्फिंग के वक्त भी सोता न रहे और "वैश्वीकरण की बाजारमूलक शक्तियों के सबसे बड़े हथियार" का उसी हथियार से जवाब दे। भले ही यह अस्त्र "पश्चिमी आविष्कार हो" पर "भारत की विविधतावादी संस्कृति" को नुकसान पहुंचाते "जेहाद" और "कण्डोम संस्कृति" के खिलाफ महाआरती का यह मंच बड़ा सुहाना लगता है। तो जीतू भाई, "अधिक से अधिक लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़ने के लिये लोकशिक्षण से जन-जागरण की तकनीक अपनाने" का समय आखिरकार आ ही गया, आपके अनुमान से कहीं पहले! जय हो! रचनाकार पर प्रकाशित हास्य रचना "कंप्यूटरजी को एक ख़त" में गोपाल चतुर्वेदी ने लिखा है,
    "भारत ज्योतिष संघ हर गांव में एक कंप्यूटर-मंदिर बनवाने को प्रस्तुत है. लोग आज जैसे हनुमानजी की शरण में जाते हैं, वैसे ही आपके दर्शन को जाएंगे. मन्नतें मानेंगे, चढ़ावा चढ़ाएंगे. हमारा पुजारी प्रसाद पाएगा. नाम आपका, नामा हमारा! आप करोड़ों देवताओं की श्रेणी में आ जाएंगे।"
    हिन्दी ब्लॉगर ने न्यू साईंटिस्ट पत्रिका के विशेषांक की चर्चा की है। मानव अंगों की फार्मिंग से प्रत्यारोपण में आंदोनकरी परिवर्तन और अंतरिक्ष विज्ञान में लंबी छलांग जैसे मानव और पृथ्वी के भविष्य से जुड़े लोमहर्षक और अविश्वसनीय तथ्यों का उल्लेख किया गया है। यूनीवर्सिटी ऑफ़ ब्रिटिश कोलंबिया के डेनियल पॉली की एक भविष्यवाणी का ज़िक्र करते वे लिखते हैं,
    "कुछ दशकों के बाद पूरी दुनिया शाकाहारी होनेवाली है. दरअसल पॉली साहब एक ऐसे यंत्र की कल्पना साकार होते देख रहे हैं, जिसके ज़रिए हम जंतुओं की भावनाओं और विचारों को जान सकेंगे, महसूस कर सकेंगे. ऐसे में किसी विचारवान जीव को मार कर खाने की अनैतिकता भला कितने लोगों को पचेगी!"
    इस पर अतुल ने टिप्पणी की,
    "लेकिन इन विज्ञानियों को अगर जगदीश चंद्र बसु का शोध याद आ जाता, जिन्होनें पौधों की भावनायें होने का प्रमाण दिया था, तब मनु्ष्य के खाने को क्या बचता?"
    मनीष ने उमराव जान के लिये लिखे जावेद अख़्तर के मर्मस्पर्शी गीत "अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो" की प्रशंसा की तो रचना खुद को अपनी कविता बेटी प्रकाशित करने से रोक न सकीं।
    सब कामों को वो कर लेगी,
    सब मुसीबतें वो हर लेगी,
    सबके सपने सच कर देगी,
    उसके सपने तो बुनने दो!!!
    उन्मुक्त ने पटना की महिला न्यायाधीश लीला सेठ की आत्मकथा आन बैलैंस का रोचक वर्णन किया है। लीला नामचीन लेखक विक्रम सेठ की माता हैं। यह प्रविष्टि इतनी अच्छी है कि इस पर समाजवादी जनपरिषद ने भी टिप्पणी की है ;) हितेंद्र ने अर्थशास्त्री फ्रेड्रिक आगस्ट की पुस्तक का ज़िक्र किया है, पुस्तक को डाउनलोड करने की कड़ी भी दी है उन्होंने।

    उधर समीर अपनी "लाल बत्ती की गाड़ी" से भावविभोर हो गये और लगे तरकश सलाम ठोकनें, तीर से बचने के लिये। ये रहा उनको लगा एक तीर,
    "कोर टीम में पोस्ट लेते समय तो बड़े खुश दिख रहे थे, कोई सरकारी कापरेटिव समझ रखा है क्या, कि बस अध्यक्ष बन गये, लाल बत्ती की गाड़ी मिल गई, अब ऐश करो, काम करने की क्या जरुरत"।
    खबरिया जी के हरिराम नाई "एक्सक्लूज़िव" खबर लाये हैं कि लोहा मंत्री राम विलास पासवान को आने वाले दिनों में लोहे के चने चबाने पड़ सकते हैं। पर भैये जो खबर पहले ही चैनलवा पर आ गई (edited word) वो काहे की एक्कूलूजिब?

    बढ़िया चिट्ठे पूंजी बाजार में जगदीश यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंश प्लान यानि युलिप के फायदे गिना रहे हैं। हिन्दी चिट्ठाजगत में इस तरह के विषयों पर टॉपीकल ब्लॉग की काफी कमी है। कितना ही अच्छा हो अगर हिन्दी लिखने पढ़ने वाले विविध पेशे से जुड़े लोग, डॉक्टर, चित्रकार, वैज्ञानिक अपने हिन्दी चिट्ठे शुरु करें।

    आज की फोटो

    आज का चित्र डॉ सुनील के चिट्ठे सेः

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