रश्मि रविजा का ब्लॉग हैं अपनी उनकी सबकी बात .
बैक 2 बैक दो पोस्ट हैं
पहली पोस्ट में रश्मि ने
"माताओं-पिताओं द्वारा अपने ही बच्चों के पालन-पोषण में विभेद पर आलेख लिखा"
और दूसरी पोस्ट में
"जब माताओं-पिताओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं होती और लक्ष्मी
या लक्ष्मियाँ ही उनके घर की रौनक बढ़ाती है तब वे इस सच को ख़ुशी-ख़ुशी
स्वीकार कर, अपनी बेटी को हर सुख-सुविधा ..आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करने
का प्रयत्न करते हैं."
दोनों पोस्ट सोचने के लिये सामग्री लिये हैं पर एक प्रश्न अनुतरित रह गया है शायद रश्मि की अगली पोस्ट उस पर ही आये
क्या जिनके सिर्फ बेटी हैं और वो उसको आगे बढने का अवसर देते हैं , मानसिक रूप से उसको वो आजादी भी देते हैं जो बेटो को देते हैं यानी क्या वो बेटी की आय पर अपना अधिकार मानते हैं ? क्या वो बेटी की शादी को उसकी नियति मानते हैं और अविवाहित बेटी को लेकर परेशां रहते हैं .
समीर लाल की एक पुरानी पोस्ट बिटिया का बाप पर आयी टिपण्णी और मंथन सहज याद आगये . देखिये
समीर कहते हैं "आज न जाने कितने शिब्बू हमारे समाज में हैं जो कभी प्रगतिशील कहलाये मगर
अपने स्वार्थवश बिटिया का जीवन नरक कर गये. इंसान की सोच कितनी पतनशील हो
सकती है?"
पल्लवी सक्सेना का ब्लॉग हैं मेरे अनुभव (Mere Anubhav)
नयी पोस्ट है ऐसा भी होता है कभी-कभी ...
पोस्ट मे पल्लवी ने गृहणी और कामकाजी महिला के महत्व पर विमर्श आमंत्रित किया हैं . आज भी गृहणी और कामकाजी महिला को अलग अलग माना जाता हैं . क्या कामकाजी महिला गृहणी नहीं होती हैं .
पल्लवी लिखती हैं "लेकिन फिर भी मुझे खुद कभी-कभी ऐसा लागने लगता है कि कामकाजी होना ज्यादा
अच्छा है। अब जैसे उदहारण के तौर पर यदि मैं कहूँ तो मेरे बेटे की कक्षा
में उसके जितने भी दोस्त हैं उन सभी दोस्तों की मम्मियाँ जॉब करती है जिसके
चलते उसे भी ऐसा लगता है कि मेरी माँ को भी जॉब करनी चाहिए क्यूंकि उसे
ऐसा लगता है कि यदि मैं जॉब नहीं करती तो मैं कुछ नहीं करती अर्थात मुझे
बहारी दुनिया के विषय में कोई जानकारी नहीं जिसके चलते मैं यहाँ इंगलेंड
में रहने लायक नहीं हूँ। दरअसल उसकी ऐसी भावना या ऐसी सोच उसके नज़रिये से
गलत नहीं है, क्यूंकि उसकी पढ़ाई यही से शुरू हुई है और जब से उसे थोड़ी
बहुत समझ आयी है, तब से उसने यही देखा है उसकी माँ के अलावा बाकी सभी
बच्चों की माँयें यहाँ जॉब करती है। जबकि इंडिया में उसकी दादी, नानी
चाचीयाँ कोई जॉब नहीं करता। तो स्वाभाविक है उसके मन में यही छवि बननी ही
थी, कि इंडिया में सभी औरते ऐसी ही होती है जो केवल घर में रहती है। इसलिए
उन्हें बाहर की दुनियाँ के विषय में कोई खास जानकारी नहीं होती है।"
विमर्श घूम कर फिर वही आजाता हैं की नौकरी क्यूँ करना हैं क्या महज ये दर्शाने के लिये की हम भी कुछ हैं ? गृहणियां इस शब्द को आज कि स्थितियों मे कैसे परिभाषित करेगे । इस लिंक पर आये कमेन्ट पढना ना भूले और राज किशोर की चोखेर बाली पर आयी पोस्ट इन्हें चांद चाहिएपर हुई बहस भी सहज याद आ ही गयी ,
राज किशोर कहते हैं "लेकिन ऐसी स्त्रियों की उपस्थिति से कौन इनकार कर सकता है जो अपने स्त्रीत्व के आकर्षण का अवसरवादी लाभ उठाती हैं? वे जानती हैं कि पुरुष की नजर में वे काम्य हैं और इस काम्यता का लाभ उठाने की लालसा का दयनीय शिकार हो जाती हैं। किसी को एमए में र्फस्ट होना है, किसी को, अपात्र होने पर भी, लेक्चररशिप चाहिए, कोई चुनाव का टिकट पाने के लिए लालायित है तो किसी को, परिवार की आय कम होने के बावजूद, ऐयाशी और मौज-मस्ती का जीवन चाहिए। किसी को टीवी पर एंकर बनना है, कोई फिल्म में रोल पाने के लिए बेताब है, कोई अपनी कमजोर रचनाएं छपवाना चाहती हैं, किसी को जल्दी-जल्दी प्रमोशन चाहिए तो कोई लाइन तोड़ कर आगे बढ़ना चाहती है। कोई-कोई ऐसी भी होती है जो खुद पीएचडी का शोध प्रबंध नहीं लिख सकती और अपने प्रोफेसर-सुपरवाइजर से लिखवा कर अपने नाम के पहले डॉक्टर लिखना चाहती है।"
राज किशोर कहते हैं "लेकिन ऐसी स्त्रियों की उपस्थिति से कौन इनकार कर सकता है जो अपने स्त्रीत्व के आकर्षण का अवसरवादी लाभ उठाती हैं? वे जानती हैं कि पुरुष की नजर में वे काम्य हैं और इस काम्यता का लाभ उठाने की लालसा का दयनीय शिकार हो जाती हैं। किसी को एमए में र्फस्ट होना है, किसी को, अपात्र होने पर भी, लेक्चररशिप चाहिए, कोई चुनाव का टिकट पाने के लिए लालायित है तो किसी को, परिवार की आय कम होने के बावजूद, ऐयाशी और मौज-मस्ती का जीवन चाहिए। किसी को टीवी पर एंकर बनना है, कोई फिल्म में रोल पाने के लिए बेताब है, कोई अपनी कमजोर रचनाएं छपवाना चाहती हैं, किसी को जल्दी-जल्दी प्रमोशन चाहिए तो कोई लाइन तोड़ कर आगे बढ़ना चाहती है। कोई-कोई ऐसी भी होती है जो खुद पीएचडी का शोध प्रबंध नहीं लिख सकती और अपने प्रोफेसर-सुपरवाइजर से लिखवा कर अपने नाम के पहले डॉक्टर लिखना चाहती है।"
कितनी सहजता से नारी की उपलब्धि को महज उसके शरीर की उपलब्धि मान लिया जाता हैं