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मंगलवार, दिसंबर 28, 2010

नव वर्ष आ !

नमस्कार मित्रों!

आज के कुछ पोस्ट ने इतना प्रभावित किया कि एक और चिट्ठा चर्चा प्रस्तुत करने का लोभ संवरण नहीं कर सका।

My Photoएक ब्लॉग है नीलाभ का मोर्चा इस पर Hirawal Morcha प्रस्तुत करते हैं देशान्तर के तहत कवि  जीवनानन्द दास का जीवन परिचय और उनकी कुछ रचनाएं।

बांग्ला कविता में जीवनानन्द दास का महत्व है और रहेगा। उनकी कविता तीव्र अन्तर्विरोधों और समाज से सामंजस्य न बैठा पाने की कविता है। अपने चारों ओर के समाज की पतनशीलता से विमुख हो करजीवनानन्द दास ने या तो धुर बंगाल के ग्रामीण परिवेश में शरण ली या फिर हिन्दुस्तान, मिस्र, असीरिया और बैबिलौन के धूसरअतीत में। इसीलिए उनकी कविता में आक्रोश की जगह अवसाद का पुट अधिक गहरा है। वे बेहतर समाज की इच्छा तो करते हैं,पर उसकी राहों का सन्धान करने की जद्दोजहद उनकी कविता में नहीं है। इसीलिए सरसरी नज़र से पढ़ने वाले को ऐसा महसूस होसकता है कि उनकी कविता पलायन की कविता है; लेकिन उनकी कविता में मनुष्य और उसके सुख-दुख, हर्ष-विषाद की निरन्तरउपस्थिति इस बात को झुठलाती है और उसे यों ही ख़ारिज नहीं किया जा सकता। इस अर्थ में उनकी कविता की प्रासंगिकता बनीरहेगी। "एक अद्भुत अँधेरा" जैसी कविता तो मानो आज का दस्तावेज़ है।

एक अद्भुत अँधेरा
एक अद्भुत अँधेरा आया है इस पृथ्वी पर आज,
जो सबसे ज़्यादा अन्धे हैं आज वे ही देखते हैं उसे।
जिनके हृदय में कोई प्रेम नहीं, प्रीति नहीं,
करुणा की नहीं कोई हलचल
उनके सुपरामर्श के बिना भी पृथ्वी आज है अचल।

जिन्हें मनुष्य में गहरी आस्था है आज भी,
आज भी जिनके पास स्वाभाविक लगती है
कला या साधना अथवा परम्परा या महत सत्य,
सियार और गिद्ध का भोज

My Photoकिसी भी विषय को डोरोथी कुछ अलग अंदाज़ में सोचती हैं और फिर उनकी लेखनी एक सशक्त कविता लेकर हाज़िर हो जाती है। बीतना एक साल का भी उनकी सोच और लेखनी का कमाल है। कवयित्री कहती है

काल की दहलीज पर ठिठका हुआ ये साल
बुझते मन से देख रहा है उस भीड़ को जो
घक्का मुक्की करते गुजर रही है सामने से
उसे अजनबी आंखों से घूरते
बड़ी ही हड़बड़ी और जल्दबाजी में.

कवयित्री का विचार या मनःस्थिति इस कविता में अधिक कौशल के साथ व्‍यक्‍त होती है। भाषा, भाव, और विचार का निर्वाह उनकी विशिष्‍ट काव्‍य क्ष‍मता का परिचायक है।

बिछुड़ने का दर्द समेटे
ढूंढता है इस वक्त
कोई ऐसा दिल
जो सहेजेगा
उस की यादों को
और करेगा ढेरों बातें
उसके बारे में
धुधलाने या गुमने
न देगा उसे
या उसकी यादों को।

इसे पढ़कर ऐसा लगा मानों कवयित्री की अनुभूति, सोच, स्मृति और स्‍वप्‍न सब मिलकर काव्‍य का रूप धारण कर लिया हो।

आखर कलश पर कुछ ग़ज़लें- श्रद्धा जैन की प्रस्तुत की गई है। वैसे तीनों ही ग़ज़लें बहुत अच्छी हैं, आपके विचारार्थ एक यहां पेश कर रहा हूं, बिना कुछ विशेष टिप्पणी के।

हश्र औरों का समझ कर जो संभल जाते हैं
वो ही तूफ़ानों से बचते हैं, निकल जाते हैं
मैं जो हँसती हूँ तो ये सोचने लगते हैं सभी
ख़्वाब किस-किस के हक़ीक़त में बदल जाते हैं
ज़िंदगी, मौत, जुदाई और मिलन एक जगह
एक ही रात में कितने दिए जल जाते हैं
आदत अब हो गई तन्हाई में जीने की मुझे
उनके आने की ख़बर से भी दहल जाते हैं
हमको ज़ख़्मों की नुमाइश का कोई शौक नहीं
कैसे ग़ज़लों में मगर आप ही ढल जाते हैं

शिवकुमार मिश्र ने एक बहुत ही मज़ेदार पोस्ट लगाई है, सिंगिंग रिअलिटी-शो ला रा लप्पा ला का फिनाले। एक बेहद रोचक अंदाज़ में, जिसके वे सिद्धहस्त तो हैं ही, शिव जी ने इस पोस्ट को कल न्यूज दैट मैटर्स नॉट के लिए लिखी थी आज हमारे लिए फिर से लिखी है। उनके इतनी मेहनत करने का राज भी इसी पोस्ट में है कि विख्यात मेंटोर और कुख्यात गायक श्री दलेर मेंहदी ने उनसे कहा; "रब्ब राखां पुत्तर. चक दे फटे. जिन्दा रह पुत्तर." बस वो दुगुने उत्साह से जुट गए और कहते हैं कल मुंबई में हुआ ला रा लप्पा ला नामक सिंगिंग रिअलिटी शो का फायनल तमाम अस्वाभाविक घटनाओं के लिए वर्षों तक याद किया जाएगा. ज़ीहाँ टीवी द्वारा आयोजित इस टैलेंट हंट के फिनाले में शुरुआत ही अच्छी नहीं रही. कार्यक्रम में अथिति के रूप में आये अक्षय कुमार अपनी कार से उतरकर पैदल चलते हुए अपनी सीट तक गए. उनके ऐसा करने से निराश तमाम दर्शकों ने यह कहते हुए हंगामा शुरू कर दिया कि उन्हें ठग लिया गया. अपनी बात को स्पष्ट करते हुए इन लोगों ने बताया कि उन्हें आशा थी कि अक्षय कुमार ज़ी उड़ते हुए, कूदते हुए या फिर तार के सहारे आसमान से उतरेंगे और उनके ऐसा नहीं करने की वजह से इन दर्शकों का पैसा वसूल नहीं हुआ.

पेट पकड़कर हंसने के लिए बाक़ी के अंश शिव जी से ही सुनिए।

My Photoकंचन सिंह चौहान जी की प्रस्तुति   गया साल.. एक नज़र और आने वाले की शुभकामना....! बीत रहे साल के लेखाजोखा के साथ-साथ आने वाली साल के पैग़ाम भी लेकर आई है। बताती हैं, “वर्ष भी कुछ अजीब सा ही रहा...! पारिवारिक रूप से बेहद खराब....! साहित्यिक उपलब्धियों की दृष्टि से काफी अच्छा...!” उनके इस मिश्रित अनुभवों वाले साल के इस संस्मरण के साथ एक ग़ज़ल भी है,

किसे कब हँसाये, किसे कब रुलाये,
ना जाने नया साल क्या गुल खिलाये।

रहम वीणापाणि का इतना हुआ है,
के हम भी अदीबों के संग बैठ पाए

लिहाफों, ज़ुराबों में ठिठुरे इधर हम,
उधर कोई छप्पर की लकड़ी जलाये।
इस वर्ष की अंतिम पोस्ट...! नव वर्ष खूब सारा उत्साह, उपलब्धियाँ, मानसिक शांति और प्रेम ले कर आये सबके जीवने में, इस शुभकामना के साथ, मिलते हैं एक नवीन दशक में।

Rangnath Singh मिर्ज़ा ग़ालिब के जन्म दिन पर उन्हें याद करते एक पोस्ट लिखी है गालिब जो मर गया है तो हर शायर-दिल उदास है। कहते हैं ‘आज गालिब का जन्मदिन है। 'जन्मदिन की बधाई' की जो अंतरध्वनि है वह गालिब के फलसफा-ए-जिंदगी का विपर्यय ही रचती है। गालिब ने कभी चाहा था कि -

रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो।

हम-सुखन कोई न हो और हम-जबाँ कोई न हो।।

आगे कहते हैं ‘गालिब जैसे शायर को आज भी कुछ खास तरह के लोग ही याद कर रहे हैं। गालिब के ही तर्ज पे कहें तो गालिब जो मर गया है तो हर शायर-दिल उदास है.....

लेता नहीं मेरे दिल-ए-आवारा की खबर।

अब तक वह जानता है कि मेरे ही पास है।।

हर इक मकान को है मकीं से शरअ असद।

मजनूँ जो मर गया है,तो जंगल उदास है।।

दालान पर रंजन जी के है CNN - IBN अवार्ड समारोह !! यह एक बहुत सुलझी और सशक्त कलम से लिखा गया संस्मरण है जो लाइव कमेंट्री की तरह सारे दृष्य को आंखों के सामने साकर कर देता है।

लॉबी में खडा था - राजदीप से मुलाकात हुई - ब्लैक कलर के बंद गला में 'गजब के स्मार्ट दिख रहे थे ! स्वभाव से शर्मीला हूँ सो थोड़ी देर बाद आकाश को फोन किया और वो मुझे 'दरबार हौल में पहले से निर्धारित एक टेबल पर् बैठा दिए ! चुप चाप ! थोड़ी दूर पर् थे - 'कुमार  मंगलम बिरला - अपने दादा जी और दादी जी के साथ ' सभी से मिल जुल रहे थे ! धीरे - धीरे  सभी गेस्ट पहुँचाने लगे - वो सभी लोग थे - जिनको आज तक हम जैसे लोग सिर्फ 'अखबार और टी वी ' में ही दिखते थे ! प्रणव मुखर्जी , नितिन गडकरी , सुशील मोदी , ज्योतिराजे सिंधिया , रवि शंकर प्रसाद , विजय त्रिवेदी , सर मेघ्नंद देसाई , "सुधांशु मित्तल" और मालूम नहीं कितने लोग .....हम तो अपने टेबल पर् ऐसे बैठे थे - जैसे इन लोगों से रोज ही मुलाक़ात होती हो .....;)

रंजन जी की लेखनी के साथ-साथ उनकी हाजिर जवाबी भी काफ़ी प्रभावित करती है

नितीश को इन्डियन ऑफ द इन्डियन का अवार्ड मिला - मेरे बगल में एक विदेशी और बेहद ख़ूबसूरत - शालीन  महिला बैठी थीं - जब नितीश को अवार्ड मिला तो - खुशी से आंसू आ गए - यह सम्मान - सभी बिहारी के लिये था ! हम तो कुर्सी से खडा हो गया - सबसे देर तक ताली बजाया - विदेशी महिला ने मुझसे पूछा - ये कौन हैं ? मैंने बोला - अगला 'प्रधानमंत्री' :))

मेरा फोटोऔर अंत में राजेन्द्र स्वर्णकार जी के साथ हम भी कह रहे हैं नव वर्ष आ ! 

 

New Year 2011 - Animated Wallpapers

... नव वर्ष आ ...

ले आ नया हर्ष

नव वर्ष आ  !

आजा तू मुरली की तान लिये ' आ !

अधरों पर मीठी मुस्कान लिये ' आ !

विगत में जो आहत हुए ,  क्षत हुए ,

उन्हीं कंठ हृदयों में गान लिये ' आ !

आ ' कर अंधेरों में दीपक जला !

मुरझाये मुखड़ों पर कलियां खिला !

युगों से भटकती है विरहन बनी  ;

मनुजता को फिर से मनुज से मिला !

सुदामा की कुटिया महल में बदल !

हर इक कैक्टस को कमल में बदल !

मरोड़े गए शब्दों की सुन व्यथा ;

उन्हें गीत में और ग़ज़ल में बदल !

कुछ पल तू अपने क़दम रोक ले !

आने से पहले ज़रा सोच ले !

ज़माने को तुमसे बहुत आस है !

नदी को समंदर को भी प्यास है !

नये वर्ष ! हर मन को विश्वास दे !

तोहफ़ा सभी को कोई ख़ास दे !

जन जन प्रसन्नचित हो आठों प्रहर !

भय भूख़ आतंक से मुक्त कर !

स्वागत है आ, मुस्कुराता हुआ !

संताप जग के मिटाता हुआ  !!

नव वर्ष आ ,  मुस्कुराता हुआ  !!!

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सोमवार, दिसंबर 27, 2010

सोमवार २७.१२.२०१० की चर्चा

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर हाज़िर हूं चिट्ठा चर्चा के साथ।

जब नया-नया ब्लॉगर बना था तो कुछ पता ही नहीं था कि ब्लॉगिंग क्या होती है। वो तो जी-मेल का एक अकाउंट था उसे ही खोल कर मेल पढ रहा था और कुछ गूगल का प्रचार टाइप का था जिसे टीपता गया मेरा ब्लोग तैयार, वरना उन दिनों मैं समझता था कि यह बड़े लोगों की चीज़ है जैसे अमिताभ, आडवाणी आदि।

ब्लोग तो खुल गया पर कोई पढने न आवे। तो बड़ी कुफ़्त हुई कि इसे कोई पढता क्यों नहीं है। बाद में जाना कि ब्लॉग-एग्रीगेटर नाम की कोई चीज़ होती है, और फिर उसके बारे में, उसके योगदान के बारे में भी जाना।

फिर तो खोज-खाज के एग्रीगेटर तक भी पहुंचा। उनदिनों के दोनों एग्रीगेटर चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी पर पंजीकरण हुआ, लगा कारू का खजाना मिल गया। धीरे-धीरे कुछ लोग आने शुरु हुए।

आज दोनों एग्रीगेटर नहीं हैं। पुराने ब्लॉगर तो एक-दूसरे से मिल-मिलाकर बातचीत कर लेते होंगे पर नए ब्लॉगर की क्या दशा-दुर्दशा होती होगी भगवान जाने। साथ ही चिट्ठाजगत द्वारा नए पंजीकृत हुए ब्लॉगरों की जानकारी भी मिल जाया करती थी। पर अब तो नए ब्लॉग के बारे में पता भी नहीं चलता।

मैंने यह बात एक पोस्ट में टिप्पणी देते हुए कही थी, आज इस मंच से पुनः कहना चाहूंगा कि जो स्थापित, श्रेष्ठ और सीनियर ब्लॉगर हैं वे ज़्यादा नहीं तो सप्ताह में एक दिन नए ब्लॉगर को दें, उनकी हौसला-आफ़ज़ाई करें। इससे न सिर्फ़ उनका मनोबल बढेगा बल्कि मार्गदर्शन भी होगा।

तो आइए आज की चर्चा शुरु करें
 मेरा फोटोबहुत दिनों के बाद दिखे अंतरजाल पर डॉ. मनोज मिश्र। अरे वही  मा पलायनम ! वाले। सोचा धर लाऊं। लगता है इतने दिनों बाहर बैठ कर कुछ विचार मंथन कर रहे थे। हम भ्रष्टन के और सब भ्रष्ट हमारे ....... पोस्ट द्वारा कहते हैं ‘यह बीत रहा साल तो घोटालों और महाभ्रष्टों की भेंट चढ़ गया।’ बात चुनावों की ओर ले जाते हुए कहते हैं सामाजिक परिवर्तन के नाम पर चुनावों में भ्रष्टाचार की जो गंगा बही है , अफ़सोस है इसकी चर्चा मीडिया के राष्ट्रीय पन्नों पर तो छोड़िये ,आंचलिक पन्नों पर भी नहीं हुई।

मैं तो बस इतना ही कहूंगा कि

सारा जीवन अस्‍त-व्‍यस्‍त है

जिसको देखो वही त्रस्‍त है ।

जलती लू सी फिर उम्‍मीदें

मगर सियासी हवा मस्‍त है ।

मैं ऐसा दिखता हूं...आपबीती... पर निखिल आनन्द गिरि एक बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति प्रस्तुत करते हैं। वे एक ज़रूरी कवि हैं – अपने समय व परिवेश का नया पाठ बनाने, समकालीन मनुष्य के संकटों को पहचानने तथा संवेदना की बची हुई धरती को तलाशने के कारण। उनकी कविता बनमानुस...हमें सोचने पर मज़बूर कर देती है, क्योंकि यह कविता मौजूदा यथार्थ का सामना करने की कोशिश का नतीजा है।

एक दुनिया है समझदार लोगों की,
होशियार लोगों की,
खूब होशियार.....
वो एक दिन शिकार पर आए
और हमें जानवर समझ लिया...
पहले उन्होंने हमें मारा,
खूब मारा,
फिर ज़बान पर कोयला रख दिया,
खूब गरम...
एक बीवी थी जिसके पास शरीर था,
उन्होंने शरीर को नोंचा,
खूब नोचा...
जब तक हांफकर ढेर नहीं हो गए,
हमारे घर के दालानों में....

इस कविता पर हमें बस इतना कहना है,

किन लफ़्ज़ों में इतनी कड़वी, इतनी कसैली बात लिखूं

शेर की मैं तहज़ीब निभाऊं या अपने हालात लिखूं

मेरा फोटोएक आलसी का चिठ्ठा पर गिरिजेश राव ने पुरुष की तरह एक कहानी लिखी है क्योंकि उनका कहना है, ‘मुझे स्त्री मन की कोई समझ नहीं है।’ हमारी साधारण समझ पर उन्होंने एक असाधारण कहानी रची है।

दोनों अपने अपने ब्लॉग पर प्रेम की कहानियाँ लिखते थे। जब वह लिखता तो लड़के की तरह ही लिखता था - अपनी देखी हर खूबसूरत समझदार लड़की से कुछ कुछ चुरा कर एक सुन्दरी को गढ़ता और आह भरते सोचते हुए लिख देता कि काश! उसे कोई लड़की अपनी जैसी मिली होती तो पूरे संसार को आसमान पर टाँग आता और धरा पर सब कुछ फिर से शुरू करता - मनु और श्रद्धा! आगे तो आप ब्लोग पर ही पढें।

यह कहानी हृदय फलक पर गहरी छाप छोड़ती है। एक स्‍त्री का अस्तित्‍व अपने अतीत, वर्तमान और भविष्‍य से जूझता हुआ खुद को ढूंढता रहता है। स्मृतियों और वर्तमान के अनुभव एक-दूसरे के सामने आ खड़े होते हैं तो लिखना रोक कर आईने में खुद को निहारती। चेहरे की लकीरों को निगाहों से मसल कर सलवटों को भूल जाती। उसे अपने बच्चे की सुध भी आती।

इस कहानी पर मुझे तो बस इतना कहना है,

क़तरे में दरिया होता है, दरिया भी प्यासा होता है,

मैं होता हूं वो होता है, बाक़ी सब धोखा होता है!

My Photoएक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर में अंतर समझना है तो स्वास्थ्य-सबके लिए पर कुमार राधारमण की पोस्ट ज़रूर पढें। मॉडर्न मेडिसिन के अलावा एक्युपंक्चर और एक्युप्रेशर भी इलाज का बेहतरीन तरीका हो सकते हैं। इनमें बेशक इलाज में ज्यादा वक्त लगता है, लेकिन कोई साइड इफेक्ट नहीं होता। हमारे देश में ये सिस्टम बहुत चलन में नहीं हैं लेकिन चीन में ज्यादातर इन्हीं के जरिए इलाज किया जाता है। हालांकि अब ये तरीके अपने यहां भी इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं।

एक्युपंक्चर पॉइंट्स के साथ मिलाकर योग किया जाए तो एक्यु योग कहलाता है। जैसे कि एक्युपंक्चर या प्रेशर से शुगर के मरीज के स्प्लीन (तिल्ली) या पैंक्रियाज पॉइंट को जगाया जाता है और साथ में शलभासन कराया जाता है, जोकि स्प्लीन या पैंक्रियाज के लिए फायदेमंद है। अस्थमा में फेफड़ों के पॉइंट्स को दबाने के अलावा प्राणायाम कराया जाता है। अगर मरीज को योग और एक्युप्रेशर पॉइंट, दोनों की जानकारी हो तो अच्छा है।

ये एक ऐसी विधा है जो अभी उतनी प्रचलित नहीं है, पर मुझे बस ये कहना है कि

ख़ुश्बू के बिखरने में ज़रा देर लगेगी

मौसम अभी फूलों के बदन बांधे हुये है।

My Photoबड़े लोग अपनी चलाते हैं, वे बदमिजाज होते हैं – अजित गुप्‍ता जी का कहना है अजित गुप्‍ता का कोना पर । कहती हैं,

“हम दोहरी जिन्‍दगी जी रहे हैं। एक तरफ अपने संस्‍कारों से लड़ रहे हैं जो हमारे अन्‍दर कूट-कूटकर भरे हैं और दूसरी तरफ उस पीढ़ी को अनावश्‍यक परेशान कर रहे हैं जिसने छोटे और बड़े का भेद मिटा दिया है।”

कुछ अच्छी सीख देती इस पोस्ट में वे कहती हैं,

“यहाँ ब्‍लाग जगत में हम जैसे लोग भी आ जुटे हैं। अपने बड़े होने का नाजायज फायदा उठाते रहते हैं और लोगों को टोकाटोकी कर देते हैं। किसी की भी रचना पर टिप्‍पणी कर देते हैं कि यह ठीक नहीं है, वह ठीक नहीं है। इसे ऐसे सुधार लो उसे वैसे सुधार लो। कहने का तात्‍पर्य यह है कि हम जैसे लोग अपनी राय का टोकरा लेकर ही बैठे रहते हैं।”

इस मुझे तो बस इतना कहना है,

चाहकर इसलिए सच कह नहीं पाया

सचकहा जिससे भी सच को सह नहीं पाया

धूल में तिनका मिला है बस इसी कारण

दूर तक वह संग हवा के बह नहीं पाया ।

My Photopragyan-vigyan पर Dr.J.P.Tiwari हमेशा कुछ अलग और नया प्रस्तुत करते हैं। इस बार वो लेकर आए हैं राम के निवेदन का निहितार्थ (भाग-२)

कहते हैं

एक सत्संग में 'सेतुबंध' की चर्चा और चित्रण करते हुए कथावाचक बता रहे थे वानर - रीछ शिलाखंड ला-लाकर नल और नील को दे रहे थे. और वे दोनों उन शिला खण्डों पर राम -राम लिख कर सेतु का निर्माण कर रहे थे. तत्क्षण ही मन-मष्तिष्क में राम द्वारा 'रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग' की स्थापना का उद्देश्य कौंध गया, और वह उद्देश्य था -'धर्म को विज्ञान से जोड़ने का' . राम तो स्वयं ही विज्ञान रूप हैं - "सोई सच्चिदानंद घन रामा / अज विज्ञानं रूप बल धामा //".

डॉक्टर तिवारी का मानना है ‘आत्मा और शरीर का भेद, आत्मा की अजरता - अमरता के सिद्धांत को जानकर ही समाजद्रोही, संविधानद्रोही, प्रकृति द्रोही  और संस्कृतिद्रोही से लोहा लिया जा सकता है. सामाजिक और राष्ट्रीय हित के कार्य भी अध्यात्म और विज्ञान के सामंजस्यपूर्ण मेल से ही किया जाना श्रेयष्कर होता है। अध्यात्म जिसकी व्याख्या चरित्र सिद्धांत, पाप-पुण्य से करता है. विज्ञान उसी को 'द्रव्यमान सिद्धांत' से.’

विस्तृत जानकारी के लिए इस आलेख को पढें। हम तो बस यही कहेंगे कि,

हरि अनंत हरि कथा अनंता ।

कहहिं सुनाहिं बाहुबिधि सब संता ।।

आज बस इतना ही। छोटी ही सही, चर्चा की एक अंतराल के बाद शुरुआत की है आगे नियमित रहने की कोशिश रहेगी। फिर मिलेंगे। तब तक के लिए ..

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सोमवार, दिसंबर 13, 2010

सोमवार (१३.१२.२०१०) की चर्चा

नमस्कार मित्रों! मैं मनोज कुमार एक बार फिर हाज़िर हूं सोमवार की चर्चा के साथ। कुछ दिन के अंतराल के बाद आया हूं। ऐसी कोई खास व्यस्तता न होते हुए भी कुछ ऐसा होता गया कि इस मंच से चर्चा करने का समय निकाल नहीं पाया।

मेरा फोटोआज की चर्चा शुरु करते हैं संजय ग्रोवर जी के एक नए ब्लॉग सरल की डायरी से। इस पर इन्होंने एक कथा पोस्ट की है जिसका शीर्षक है सारांश-2 .. एक व्यंग्य कथा के ज़रिए संजय जी व्यवस्था के विकृत चहरे को अपने कलम की साधना से उकेरने का बेहतर प्रयास किया  है। कहानी का एक अंस है

बाहर हवा जिस तरफ़ बह रही है, सारे फूल-पत्ते-धूल-धक्कड़ और इंसान उसी दिशा में उड़ रहे हैं। पड़ोसी जो गुण्डों के चलते रोहिनी से कटे-कटे रहते थे, अब गुण्डों के होते रोहिनी के साथ आ खड़े होते हैं। रोहिनी और सोनी, गुण्डों के साथ मिलकर नारी-मुक्ति की लड़ाई को आगे बढ़ातीं हैं। विष्णु आज-कल हर शाम गुण्डों के लिए फूल लाता है।

सारांश -२ हिला देने वाली 'कथा 'है। आंधी के साथ निर्जीव बस्तुएं बहती हैं --सूखे .निर्जीव पत्ते और धूल . .संवेदनाएं जब , जिन लोगों की मर जाती हैं ऐसी ही आंधी की प्रतीक्षा करते हैं। संजय ग्रोवर की कहानी से गुज़रना एकदम नए अनुभव से गुज़रना है क्योंकि इसमें यथार्थ इकहरा नहीं है, बल्कि यहां आज के जटिलतम यथार्थ को उघाड़ते अनेक स्तर हैं।

कुमार राधारमण पेश कर रहे हैं एक बेहद ज़रूरी आलेख प्लास्टिक से ज्यादा खतरनाक है तंबाकू! हालाकि सुप्रीम कोर्ट ने गुटखा और पान मसाला की प्लास्टिक पाउच में बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का फैसला सुनाया है। फैसला स्वागत योग्य है लेकिन इससे तंबाकू के उपयोग, उससे होने वाली स्वास्थ्य हानि और ब़ढ़ते खतरनाक रोगों में कोई कमी आ जाएगी ऐसा नहीं लगता।

तंबाकू के ब़ढ़ते खतरे और जानलेवा दुष्प्रभावों के बावजूद इससे निपटने की हमारी तैयारी इतनी लचर है कि हम अपनी मौत को देख तो सकते हैं लेकिन उसे टालने की कोशिश नहीं कर सकते। यह मानवीय इतिहास की एक त्रासद घटना ही कही जाएगी कि कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका की सक्रियता के बावजूद स्थिति नहीं संभल रही। क्या तंबाकू के खिलाफ इस जंग में हमें हमारी नीयत ठीक करने की जरूरत नहीं है?

तम्बाकू धीमे जहर के रूप में समाज के सभी वर्ग के लोगों को प्रभावित कर रहा है। तम्बाकू के लिए जनजागरण में मीडिया के साथ ब्लॉगजगत की भी अहम भूमिका हो सकती है। और इसमें राधारमण जी आपने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है इस पोस्ट को लगा कर।

आज की सच्चाई पर एक लडकी के मनोभावों को दर्शाती सुन्दर रचना पेश की है एक बेफिक्र दिखने वाली लड़की अरुण चन्द्र रॉय ने।

वह जोमेरा फोटो

३०  वर्षीया लड़की

हाथ में कॉफ़ी का मग लिए

किसी बड़े कारपोरेट हाउस के

दफ्तर की बालकनी की रेलिंग से

टिकी है बेफिक्री से

वास्तव में

नहीं है उतनी बेफिक्र

जितनी रही है दिख .

भय की कई कई परतें

मस्तिष्क पर जमी हुई हैं

जिनमे देश के आर्थिक विकास के आकड़ो से जुड़े

उसके अपने लक्ष्य हैं
जिन्हें पूरा नहीं किये जाने पर

वही होना है जो होता है

आम घर की चाहरदीवारी में

एक भय है

उन अनचाहे स्पर्शों का

जो होता है

हर बैठक के बाद होने वाले 'हाई टी' के साथ

वह बचना चाहती है उनसे

जैसे बचती हैं घरेलू औरते आज भी

एक भय

परछाई की तरह

करता है उसका पीछा

लाख सफाई देने पर भी कि

नहीं है उसका किसी से

कोई अफेयर

तमाम भय के बीच

जब सूख जाते हैं उसके ओठ

एक ब्रांडेड लिप-ग्लोस का लेप चढ़ा

तैयार हो जाती है वह

एक और मीटिंग के लिए

उतनी ही बेफिक्री से.

वास्तव में

जितनी बेफिक्र नहीं है वह.

बहुत ही यथार्थवादी कविता है.....चेहरे के अंदर का छुपा कशमकश बयाँ करती हुई ...जिनसे लोंग या तो सचमुच अनभिज्ञ होते हैं या दिखावा करते हैं...जान कर भी ना जानने का..

इस कविता का उत्कर्ष ही यही है कि यह जीवन के ऐसे प्रसंगों से उपजी है जो निहायत गुपचुप ढंग से हमारे आसपास सघन हैं लेकिन हमारे तई उनकी कोई सचेत संज्ञा नहीं बनती। आपने उन प्रसंगों को चेतना की मुख्य धारा में लाकर पाठकों से उनका जुड़ाव स्थापित किया है। नारी मन की गहराई, उसका अन्तर्द्वन्द्व, नारी उत्पीडन, मान-अपमान में समान भावुक मन की उमंगे, संवेदनशीलता, सहिष्णुता आदि पर काव्य में अभिव्यक्ति दी गई है, जो कि वस्तुतः सुलझी हुई वैचारिकता की प्रतीक है।

दोस्त ! प्रेम के लिये वर्ग दृष्टि ज़रूरी है शरद कोकास जी की कविता है जो इस भूमिका के साथ शुरु होती है

प्रेम में सोचने पर भी प्रतिबन्ध..? ऐसा तो कभी देखा न था ..और उस पर संस्कारों की दुहाई ..। और उसका साथ देती हुई पुरानी विचारधारा ..कि प्रेम करो तो अपने वर्ग के भीतर करो.. । लेकिन ऐसा कभी हुआ है ? ठीक है , प्यार के बारे में सोचने पर प्रतिबन्ध है, विद्रोह के बारे में सोचने पर तो नहीं । फिर वह विद्रोह आदिम संस्कारों के खिलाफ हो , दमन के खिलाफ हो या अपनी स्थितियों के खिलाफ़ ..।  देखिये " झील से प्यार करते हुए " कविता श्रंखला की अंतिम कविता में यह कवि क्या कह रहा है ...

 मेरा फोटो

मैं झील की मनाही के बावज़ूद

सोचता हूँ उसके बारे में

और सोचता रहूंगा

उस वक़्त तक

जब तक झील

नदी बनकर नहीं बहेगी

और बग़ावत नहीं करेगी

आदिम संस्कारों के खिलाफ ।

इस कविता को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि जीवन को उसकी विस्‍तृति में बूझने का यत्‍न करने वाले कवि हैं। जो मिल जाए, उसे ही पर्याप्‍त मान लेने वाले न तो दुनिया के व्‍याख्‍याता होते हैं और न ही दुनिया बदलने वाले। दुनिया वे बदलते हैं जो सच को उसके सम्‍पूर्ण तीखेपन के साथ महसूस करते हैं और उसे बदलने का साहस भी रखते हैं।

Devendra Gehlod ने जख़ीरा पर प्रस्तुत किया है शेख इब्राहीम "ज़ौक"- परिचय।

खाकानी-ए-हिंद शेख इब्राहीम "ज़ौक" सन १७८९ ई. में दिल्ली के एक गरीब सिपाही शेख मुह्ब्ब्द रमजान के घर पैदा हुए | १९ साल कि उम्र में आपने बादशाह अकबर के दरबार में एक कसीदा सुनाया | इस कसीदे का पहला शेर यह है-

जब कि सरतानो-अहद मेहर का ठहरा मसकन,

आबो-ए-लोला हुए नखो-नुमाए-गुलशन |

ग़ालिब भी ज़ौक कि शायरी के प्रसंशक थे बस उन्हें ज़ौक कि बादशाह से निकटता पसंद नहीं थी

कहते है 'ज़ौक' आज जहा से गुजार गया,

क्या खूब आदमी था खुदा मग्फारत करे |

आज बस इतना ही। फिर मिलेंगे।

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सोमवार, नवंबर 08, 2010

सोमवार (०८.११.२०१०) की चर्चा

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर हाज़िर हूं।

दीपावली के पटाखों की गूंज से मन थोड़ा शांत हुआ तो चर्चा के लिए कुछ ब्लॉग्स की खोज में निकला। अपने मन को सकून देने के लिए अपना-अपना तरीक़ा होता है। कुछ प्रकृति की शरणस्थली में चले जाते हैं। मैं पुस्तकें पढता हूं। कविता कौमुदी से गिरिधर शर्मा की पंक्तोयों में कहें तो

मैं जो नया ग्रंथ विलोकता हूं,

भाता मुझे वो नव मित्र सा है।

देखूं उसे मैं नित बार-बार,

मानो मिला मित्र मुझे पुराना॥

पर मेरी भी वही स्थिति है जो प्रेमचन्द ने ‘विविध प्रसंग’ मे कहा है, कि

“पुस्तक पढना तो चाहते हैं, पर गांठ का पैसा ख़र्च करके नहीं।”

हां पुस्तकालय में पुस्तकें मिल जाती हैं। बेकन ने कहा था,

“पुस्तकालय ऐसे मंदिरों की तरह हैं जहां प्राचीन संतों-महात्माओं के सद्गुणों से परिपूर्ण तथा निर्भ्रांत पाखंडरहित अवशेष सुरक्षित रखे जाते हैं।”

अब हम ठहरे ब्लॉगर। ब्लॉगजगत में पुस्तकालय ढूंढने निकले तो कुछ उसी तरह से सजा एक ब्लॉग मिला जिसका नाम था ‘पुस्तकायन’। जब आप इसकी पोस्ट पढ रहे होते हैं तो इसके बैकग्राउंड में रैकों पर सजी पुस्तकें किसी पुस्तकालय में बैठे होने का बोध कराती रहती हैं।

इस ब्लॉग के आमंत्रण वाक्य काफ़ी प्रेरित करते हैं,

यह एक सम्मिलित प्रयास है... अपने पाठन का अधिक से अधिक लाभ उठाने और उसकी महक दूसरों तक पहुँचाने का ... पुस्‍तकायन ब्‍लॉग इसके सभी सदस्‍यों का समान रूप से बिना रोक टोक के है ... इस ब्‍लॉग पर सभी तरह की विचाराधारा या कोई खास विचाराधारा न रखते हुए भी सदस्‍य बना जा सकता है। आलोचनात्‍मक, वस्‍तुनिष्‍ठ और शालीन प्रस्‍तुति अपेक्षित है ।

इसके उत्स में इसके ब्लॉगस्वामी  का कहना है,

अकसर पढते हुए...किताबों से गुजरते हुए...कुछ अंश..पंक्तियाँ...पैराग्राफ हमें काफी पसंद आते हैं ...प्रभावित करते हैं...सामान्‍य से ज्‍यादा सम्‍प्रेषित हो जाते हैं...चौंकाते हैं... कभी अपनी शैली से, शिल्‍प से, आलंकारिकता से और कभी विचारों के नएपन से... ऐसे में उन्‍हें साझा करने का मन करता है... कई बार इसी तरह दूसरे मित्रों के द्वारा हम अच्‍छी किताबों से परिचित हो जाते हैं... इसी जरूरत की उपज है यह ब्‍लॉग... आप कोई पुस्‍तक पढ रहे हैं, ... पुस्‍तक का नाम, प्रकाशक का नाम, प्रकाशन वर्ष का विवरण देकर लिखिए पुस्‍तक के पसंदीदा अंश...साथ ही अपनी आलोचनात्‍मक विचार भी रख सकते हैं पुस्‍तक के बारे में, लेखक के बारे में... कम से कम या अधिक से अधिक जितना भी लिखना चाहें...
साथ ही कहानी, लम्‍बी कविता या प्रभावशाली लेख की भी संदर्भ सहित विवेचनात्‍मक प्रस्‍तुति दी जा सकती है

मुझे तो ये बातें इतनी प्रेरक लगीं कि मैं तो झट से इसका सदस्य बन गया। आप भी बनिए ना!

वाल्तेयर की कई बातें काफ़ी प्रेरक हैं। जैसे उन्होंने यह कहा,

“हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊं फिर भी विचार प्रकट करने के आपके अधिकारों की रक्षा करूंगा।”

इसी तरह पुस्तकों के संदर्भ में मुझे उनकी यह सूक्ति याद आती है,

“मनुष्यों के सदृश्य ही पुस्तकों के साथ भी यह बात है कि बहुत थोड़ी संख्या में ही महत्वपूर्ण कार्य करती हैं, शेष का भीड़ में लोप हो जाता है।”

ब्लॉग के संदर्भ में भी यही बात है। ऐसे ही कुछ महत्वपूर्ण ब्लॉग की चर्चा करना आज की चिट्ठा चर्चा का मेरा उद्देश्य है। आइए इसी तरह के एक और ब्लॉग पर आपको लिए चलते हैं।

साइरस का कथन है,

“अच्छा स्वास्थ्य एवं अच्छी समझ जीवन के दो सर्वोत्तम वरदान हैं।”

जहां एक ओर ‘पुस्तकायन’ अच्छी समझ विकसित करने में सहायक है वहीं अच्छे स्वास्थ्य के लिए हमें निरंतर सामग्री मुहैया करता ब्लॉग है स्वास्थ्य-सबके लिए । कुमार राधारमण इसके ब्लॉगस्वामी हैं। स्वास्थ्य संबंधी अद्यतन जानकारी यहां पाया जा सकता है।

मैंने इसके ब्लॉगस्वामी से पूछा कि क्या कारण है कि जबकि कई डाक्टर साहित्य का ब्लॉग चला रहे हैं,तब आपने साहित्य का छात्र होने के बावजूद स्वास्थ्य का ब्लॉग चलाने की सोची? तो उन्होंने बताया कि

“मैं काफी समय से महसूस कर रहा था कि अखबारों में स्वास्थ्य के संबंध में काफी भ्रामक खबरें छपती हैं। रोज़ नए अनुसंधान से लोगों को भरमाया जाता है मगर बाद में सालों साल उन अनुसंधानों का कोई अता-पता नहीं चलता। इसलिए लोगों तक ठोस खबरें ही पहुंचाई जानी चाहिए। मेरी कोशिश रही है कि केवल वही ख़बरें लूं जिनमें दवाओं के ट्रायल चूहों तक सीमित नहीं हैं,बल्कि मनुष्य पर भी उनके प्रयोग कुछ हद तक उत्साहवर्द्धक रहे हों क्योंकि जो बीमार है,वह संबंधित खबर को बहुत आशा और गंभीरता के साथ देखता है,उसके साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता।”

अभी हाल में ही एक पोस्ट आया है मोटापा घटाने में सहायक है घृतकुमारी।

मैंने जब उनसे जनना चाहा आपके ब्लॉग पर हर चिकित्सा विधासे जुड़ी खबरें दिखती हैं.......
तो उनका उत्तर था - हां,ठीक कह रहे हैं। ब्लॉगिंग शुरु करने से पहले मैंने गौर किया कि स्वास्थ्य के विषय में ब्लॉग पर कैसी सामग्री उपलब्ध है। मैंने देखा कि एलुवेरा से ही फुंसी से लेकर एड्स तक का इलाज़ करने का दावा करता है, तो कोई सिर्फ आयुर्वेद से। मैं मानता हूं कि ये एकांगी दृष्टिकोण हैं। कोई भी चिकित्सा विधा स्वयं में पूर्ण नहीं है, सब एक दूसरे के पूरक हैं। इसलिए,जहां कहीं भी संभव हो, सभी विधाओं में इलाज़ के विकल्पों की ओर ध्यानाकर्षण किया जाना चाहिए। कुछ हद तक इसलिए भी कि कई कारणों से कई बार रोगी किसी विधा विशेष में ही समाधान जानना चाहता है।
राधारमण जी खुद कोई चिकित्सक नहीं हैं। कुतूहलवश मैंने जानना चाहा अखबार में छपी खबरों की प्रामाणिकता आप कैसे जाचते हैं?
तो कहते हैं  - यह एक बड़ी चुनौती है। मैं अपने स्तर से केवल इतना कर सकता हूं कि उन खबरों को प्राथमिकता दूं,जिनमें डाक्टरों को कोट किया गया हो अथवा जो स्वयं डाक्टरों द्वारा लिखे गए हों। फिर भी चूक की संभावना तो रहती है।

इस तरह के ब्लॉग जिस पर समाज को कुछ खास किस्म की जनकारी दी जा रही हो न केबराबर टिप्पणी देख कर उसके ब्लॉगस्वामी को दाद देनी पड़ती है। जब मैंने राधारमण जी से पूछा, - क्या परिश्रम की तुलना में नगण्य टिप्पणियां देखकर मन हतोत्साहित नहीं होता?
उनका उत्तर था - नहीं। अनिवार्यताओं को टिप्पणी की दरकार नहीं होती। फिर, ब्लॉग जगत में टिप्पणी के मायाजाल से सभी परिचित हैं। मैं इस दलदल का हिस्सा नहीं बन पाउंगा। पाठकों का ब्लॉग पर आना ही बहुत है,टिप्पणी करें न करें।

 

स्वास्थ संबंधी यदि आपको कुछ रोग निवारक आसान नुस्खे. चाहिए तो मिलिए dr.aalok dayaram से उनके इस ब्लॉग पर। इस ब्लाग में सामान्य एवं जटिल रोगों में हितकारी घरेलू इलाज का विवेचन किया गया है। डा.आलोक का कहना है इन नुस्खों के घटक पदार्थ आसानी से प्राप्त हो सकते हैं और सावधानी पूर्वक उपयोग करने से इनके कोइ दुष्परिणाम भी नहीं होते हैं।

पढने योग्य इनके अन्य ब्लाग हैं--

अगर बीसवीं सदी में राष्ट्रवाद एक बहुत प्रभावी धारणा थी तो वर्त्तमान सदी में यह एक पिछड़ेपन की धारणा मात्र है। आधुनिकता का संघर्ष जो अपूर्ण रह गया, वह तब तक चलता रहेगा जब तक एक सामान्य बात पूर्ण तौर पर प्रतिष्ठित नहीं होती - वह है 'मानव ही सबसे बड़ा सच है उससे बढ़कर और कुछ नहीं! इसी की जनपक्षधर चेतना का सामूहिक मंच है जनपक्ष।

एक और ऐसा ही ब्लॉग है जो समाज सेवा में लगा है। इसका नाम है भाषा,शिक्षा और रोज़गार। इसके ब्लॉगस्वामी खुद को शिक्षामित्र कहलाना पसंद करते हैं। उनका कहना है “रोज़ी-रोटी का मसला सुलझे, कविता-कहानियां भी तभी सुहाती हैं.!” दिन भर में अनगिनत पोस्ट डालते हैं, सभी शिक्षा जगत से संबंधित। उद्देश्य है लोगों को इस विषय से संबंधित जानकारी एक जगह सहज सुलभ हो और सबसे पहले हो।   शिक्षामित्र से जब मैंने पूछा कि अगर वे कुमार जलजला टाइप टिप्पणी कहीं नहीं कर रहे, तो फिर अपने नाम से ब्लॉगिंग क्यों नहीं?जवाब मिला - नाम में क्या रखा है, मैं बेनामियों की प्रतिष्ठा के लिए काम कर रहा हूं।
मेरा दूसरा सवाल था - ब्लॉगिंग के लिए भाषा,शिक्षा और रोज़गार विषय क्यों? शिक्षामित्र का तर्क था-अपनी-अपनी पसंद है। ब्लॉगिंग शुरु करने के पहले, मैंने गौर किया कि ब्लॉग पर क्या-क्या हो रहा है और क्या नहीं हो रहा। मैंने पाया कि न सिर्फ ब्लॉग पर, बल्कि देश की किसी वेबसाईट पर भी इन विषयों पर सामग्री उपलब्ध नहीं है। मुझे लगा कि गूगल के सुझाव के मुताबिक ही बाकी लोग तो व्यक्तिगत अनुभव और घर के फोटो आदि शेयर कर ही रहे हैं, तो मुझे कोई ऐसा फील्ड खोजना चाहिए जिसमें कोई काम नहीं हो रहा या नाममात्र काम हो रहा है। पूछते हैं,"यों भी, क्या आप सोचते हैं कि किसी को आपके अनुभव या कविता-कहानी में वास्तविक दिलचस्पी है? ऐसा नहीं है। लोग इसलिए ऐसी सामग्री देखते हैं कि सर्वत्र वही सब उपलब्ध है। आप जरूरत की दूसरी सामग्री देंगे, तो वह भी चलेगा।"
मगर इसका रेस्पांस कैसा है? आपके ब्लॉग पर टिप्पणियां तो नहीं के बराबर हैं, फिर इस प्रकार के ब्लॉग का आप क्या भविष्य देख रहे हैं? शिक्षामित्र का दो टूक कहना है - मैंने यह ब्लॉग टिप्पणी के लिए शुरु नहीं किया है। इसलिए टिप्पणी वाले कॉलम में साफ घोषणा भी की गई है कि टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। मोटे तौर पर रेस्पांस भी ठीक ही है। लगभग 250 पेज रोज़ पढ़े जा रहे हैं। अब तो कई पाठक नौकरी के लिए बायोडाटा भी मेल करने लगे हैं। कई अन्य पाठक करिअर के संबंध में व्यक्तिगत प्रश्न का उत्तर चाहते हैं।   क्या इतनी सफलता कम है?"

Laughing out loudइस सप्ताह इतना ही। इसी तरह के ब्लॉग्स लेकर फिर आऊंगा। तब तक के लिए विदा।

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सोमवार, अक्टूबर 18, 2010

सोमवार १८.१०.२०१० की चर्चा

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर हाज़िर हूं।

आज विजयदशमी है। असुरों पर विजय के उपलक्ष्य में हम विजयादशमी का पर्व मनाते हैं।  बिना विनय के विजय नहीं टिकती। आज कोलकाता में “मांएर बिदाई” है। पिछले चार पांच दिनों के उत्सवीय माहौल के बाद आज सेनूर खेला होगा और फिर कोला-कोली। हम सब एक दूसरे से गले मिलेंगे। प्रेम-सौहार्द्र और भाईचारे का प्रतीक। विनय हो तो यह भी टिकाऊ है वरना … यहां तो हर कोई … समझदार है।

वर्धा चर्चा की चर्चा की आंच चारो तरफ़ फैली है। हम अपने लिए आचार संहिता बना लें। तभी हमारे आचरण में बदलाव आएगा। हर कोई दुनिया को बदलना चाहता है, लेकिन खुद को बदलने के बारे में कोई नहीं सोचता। ये मैं नहीं कहता। कहीं पढा था। मन किया तो लिख दिया। दुनिया बदलने का काम आसान नहीं। पर हौसला होना चाहिए।

ये माना है मुश्किल सफ़र ज़िन्दगी का,

मगर कम न हो हौसला आदमी का.

ये भी मैं नहीं कहता। ये कहना है कुँवर कुसुमेश जी का! (title unknown) उनकी ग़ज़ल का शीर्षक है अंधरों से कोई भी डरने न पाए / अंधरों पे कब्ज़ा रहे रोशनी का!

पर सवाल है कि इसे समझे कोई तब ना। कहते हैं

समझने को तैयार कोई नहीं है,

किसे फ़र्क समझाऊँ नेकी-बदी का.

जुलाई से ब्लॉगिंग कर रहे हैं। इन तीन-चार महींनो में महज़ तीन पोस्ट आई है, जो इस बात का द्योतक है कि वो कंटेट और क्वालिटी में विश्‍वास रखते हैं, क्वांटिटी में नहीं। एक और क्वालिटी के पोस्ट में वो कहते हैं,

विरासत को बचाना चाहते हो ,

कि अस्मत को लुटाना चाहते हो.

तुम्हारी सोंच पे सब कुछ टिका है,

कि आख़िर क्या कराना चाहते हो.

बहुत संवेदनशील और जिम्मेदारियों का एहसास करने वाली रचना लिखते हैं कुंवर जी, यह तो आभास हमें हो ही गया है, और मुझे विश्‍वास है कि आने वाले दिनों में इनकी पोस्ट इस बात की तसदिक करेगी। कुंवर जी मूलतः एक कवि हैं और इनके तीन काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।

इनकी रचनाओं का उत्कर्ष ही यही है कि यह जीवन के ऐसे प्रसंगों से उपजी है जो निहायत गुपचुप ढंग से हमारे आसपास सघन हैं लेकिन हमारे तई उनकी कोई सचेत संज्ञा नहीं बनती। कुंवर जी उन प्रसंगों को चेतना की मुख्य धारा में लाकर पाठकों से उनका जुड़ाव स्थापित करते है।

दौरे- मुश्किल से जो बचा जाये,

मुश्किलों में वही फँसा जाये .

ये उलट - फेर का ज़माना है,

आजकल किसको क्या कहा जाये.

इनकी रचनाएं एक ऐसी संवेद्य रचनाएं हैं जिसमें हमारे यथार्थ का मूक पक्ष भी बिना शोर-शराबे के कुछ कह कर पाठक को स्पंदित कर जाता है। मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन को समय के ठहराव के बिम्ब पर प्रवाहित इनकी ग़ज़लें मन को बहुत झकझोड़ती हैं। रचनाएं भाषा शिल्‍प और भंगिमा के स्‍तर पर समय के प्रवाह में मनुष्‍य की नियति को संवेदना के समांतर, दार्शनिक धरातल पर अनुभव करती और तोलती है।  

new parichay

अब एक कार्टून

कार्टून:- रावण के बाक़ी मुंहों का जुगाड़ भी हो गया...

दहन होगा ना इस पुतले का ...?!

 

My Photoमेरे ऊपर पूछे गए प्रश्‍न का उत्तर मिले या ना मिले राजेन्द्र स्वर्णकार जी बड़े अच्छी बात कह गए हैं, दोहों में। देखिए शस्वरं पर उनकी पोस्ट कितने रावण !

हालाकि इस विषय पर मैं उनसे न सहमत होते हुए पुरातन पंथी कहलाना पसंद करूंगा पर उनकी सोच कहीं न कहीं सही ज़रूर है। एक और दिक़्क़्त आई मुझे कि उनके ब्लॉग पर ताला लगा हुआ है इसलिए कुछ कोट करना मेरे लिए संभव नहीं है। हां टिप्पणियों से ही कुछ बातें और उस पोस्ट की विशेषता समझाने की कोशिश करता हूं।

दोहों के विषय में क्या कहा जाए सभी आईना दिखा रहे हैं .....! रावण कहाँ नहीं दिखता ...'यहाँ' भी और समाज में भी .....!! अपनी रचना में उन्होंने कहा है रावण दहन के पीछे इतना धन व्यय करने के बजाए गरीबों को बाँट दिया जाये ...जलने के बाद भी रावण कहाँ मरते हैं .....वो तो हम सब में जिन्दा है ....!!  अगर किसी एक का भी घर ग़रीबी की मार झेल रहा है तो रावण कहां मरा? अगर अशिक्षा, भुखमरी जैसी स्थिति है तो इसका मतलब किसी न किसी रूप में रावण का विद्यमान होना ही है!

लीक से हटकर सोचने का साहस बहुत कम लोग करते हैं। राजेन्द्र जी ने किया है। मुझे पोस्ट अच्छी लगी और रवाण दहन की परंपरा बंद हो इस से इत्तेफ़ाक़ न रखते हुए भी यह मानता हूं कि सचमुच आज रावण चारों ओर दिखाई दे रहे हैं , विभिन्न रूपों में। पर दहन न कर क्या हम जो चाहते हैं पा लेंगे? हां यह अवश्य है कि आज के परिवेश में विचारों में परिवर्तन की ज़रुरत है। एक और टिप्पणी अच्छी लगी उसे भी पेश करता हूं, ये टिप्पणी उन्हीं कुंवर जी की है जिनकी चर्चा ऊपर कर आया हूं-

लेखन में ज़बरदस्त मेसेज और शैल्पिक कसाव देखने को मिलता है. मेरा भी एक दोहा देख लें:-
राम तुम्हारी भी रही, लीला अपरम्पार.
एक दशानन मर गया, पैदा हुए हज़ार
.

  पुनश्च :

राजेन्द्र जी ने मेल से अपनी पोस्ट भेजी है, कुछ चुने हुए दोहे लगा रहा हूं-

काग़ज़ और बारूद का पुतला लिया बनाय !

घट में रावण पल रहा , काहे नहीं जलाय ?!

लाख – करोड़ों खर्च कर’ हाथ लगावें आग !

इससे बेहतर , बदलिए दीन – हीन के भाग !!

लाखों हैं बेघर यहां , लाखों यहां ग़रीब !

मत फूंको धन , बदलदो इनका आज नसीब !!

हर बदहाली दहन हो , जिससे देश कुरूप !

रोग अशिक्षा भुखमरी , रावण के सौ रूप !!

विजय पर्व आधा अगर , इक राजा इक रंक !

पूर्ण विजय होगी , मिटे जब हिंसा - आतंक !!

आइए अब आपको एक यथार्थ से रू-ब-रू करवाते हैं। जैसा कि आपको मालूम है कि हम ब्लॉग की चर्चा कर रहे हैं तो यह भी एक ब्लॉग ही होगा। इस पर रेखा श्रीवास्तव जी बता मेरा फोटोरही हैं कि कुछ लोग आज भी (लिंक है) संकीर्ण मानसिकता के शिकार हैं और पुनर्विवाह हो जाने के बाद भी एक विधवा को सधवा मानने को तैयार नहीं हैं। आहत स्वर में कहती हैं,

“हम कहाँ से कहाँ पहुँच रहे हैं और हमारी सोच कहीं कहीं हमें कितना पिछड़ा हुआ साबित कर देती है? हमें अपने पर शर्म आने लगती है.”

इस आलेख में सदियों से मौजूद स्‍त्री विषय कुछेक प्रश्‍न ईमानदारी से उठाए गए हैं। अपनी शिकायत दर्ज कराई गई है  स्‍त्री नियति की विविध परतों को उद्घाटित किया गया है और भेद-भाव की शिकार स्‍त्री को विद्रोह के लिए प्रेरित भी किया है।

 

चाहते हो गर 

अग्नि से बचना 

तो ,

जुगुप्सा की प्यास पर 

काबू पाओ 

मिल जायेंगे फिर 

मीठे झरने 

बस तुम 

चिंगारी को 

मत हवा दिखाओ ...

My Photoकहना है संगीता स्वरूप जी का। अपनी पोस्ट जुगुप्सा की प्यास के ज़रिए संयत कवित्‍व से भरपूर कविता द्वारा वो बताती हैं कि

बढ़ जाती है तब

जुगुप्सा की प्यास 

न ही कोई शीतल 

झरना  बहता है   

अपने - अपने 

अहम के दावानल में 

फिर इंसान 

स्वयं ही 

स्वयं को झोंकता है .

उनका व्‍यापक सरोकार निश्चित रूप से मूल्‍यवान है। काव्‍यभाषा सहज है। इनमें कल्पना की उड़ान भर नहीं है बल्कि जीवन के पहलुओं को देखने और दिखाने की जद्दोजहद भी है।

एक और पोस्ट रेखा जी का आज द्रवित कर गया। पोस्ट का शीर्षक है समझौते से मौत तक ! पोस्ट है नारी ब्लॉग पर। ब्लॉग खुलते ही एक गाना शुरु हो जाता है , फ़िल्म साधना का

जिस कोख में इनका जिस्म ढला

उस कोख का कारोबार लिया

जिस कोख से जनमे कोपल बन कर

उस तन का करोबार किया

औरत ने जनम दिया मरदों को

मरदों ने उन्हें बाज़ार दिया

रेखा जी कहती हैं

“दहेज़ हत्याओं पर अभी अंकुश नहीं लगा है और न ही लगेगा जब तक कि दहेज़ देने और लेने वाले इस समाज का हिस्सा बने रहेंगे. फिर जब देने वाले को अपनी बेटी से अधिक घर और प्रतिष्ठा अधिक प्यारी होती है और समाजमें अपनी वाहवाही से उनका सीना चौड़ा हो जाता है तो फिर क्यों आंसूं बहायें?”

एक दहेज के कारण हुई मौत का हवाला देते हुए कहती हैं

“दहेज़ के विवाद को समझौते या किसी तरह से खुद को बेच कर लड़के वालों की मांग पूरी करने की हमारी आदत ही हमारी बेटियों की हत्या का कारण बनता है. जहाँ बेटी सताई जाती है, वहाँ के लोगों की मानसिकता जानने की कोई और कसौटी चाहिए? अगर नहीं तो समझौतों की बुनियाद कब तक उसकी जिन्दगी बचा सकती है? इनके मुँह खून लग जाता है वे हत्यारे पैसे से नहीं तो जान से ही शांत हो पाते हैं. ऐसे लोग विश्वसनीय कभी नहीं हो सकते हैं. इसमें मैं किसी और को दोष क्यों दूं? इसके लिए खुद माँ बाप ही जिम्मेदार है , जिन्होंने अपनी सामर्थ्य से अधिक दहेज़ माँगने वालों के घर में रिश्ता किया. उसे अपने पैरों पर खड़ा होने दीजिये. अब मूल्य और मान्यताएं बदल रहीं है. बेटी किसी पर बोझ नहीं है वह अपना खर्च खुद उठा सकती है. उस घर में मत भेजिए कि उसके जीवन का ही अंत हो जाये.”

अंत में एक अपील भी है उनकी -

संकल्प करें की दहेज़ लोलुप परिवार में बेटी नहीं देंगे उसको सक्षम बना देंगे और उसको आहुति नहीं बनने देंगे.

रेखा जी हम आप की बात से पूरी तरह सहमत हैं। आपके इस संकल्प को हमने दशकों पहले लिया था। एक बहन खो चुके हैं इस कुप्रथा के कारण, क्योंकि ह्मने संकल्प लिया था कि न दहेज लेंगे, न देंगे। उसकी मौत ने तोड़ा नहीं हमें, बल्कि संकल्प और भी दृढ हुआ है। क़नूनन जो सजा दिलवा सकते थे दिलवाई। हम तो जो देहेज लेकर शादी करता है उसकी बारात या शादी का हिस्सा भी नहीं बनते, चाहे वह कितना भी घनिष्ठ संबंधी ही क्यों न हो!

मैंने शुरु में दो लाइन कही थी, फिर कहने का मन बन गया। हम अपने लिए आचार संहिता बनालें। तभी हमारे आचरण में बदलाव आएगा। हर कोई दुनिया को बदलना चाहता है, लेकिन खुद को बदलने के बारे में कोई नहीं सोचता।

मेरी पसंद

My Photoआज की मेरी पसंद है रचना दीक्षित की कविता आसरा। अपना परिचय देते हुए कहती हैं

“रचना हूँ मैं रचनाकार हूँ मैं , सपना हूँ मैं या साकार हूँ मैं, रिश्तों में खो के रह गया संसार हूँ मैं, शून्य में लेता नव आकार हूँ मैं, अपने आप को ही खोजता इक विचार हूँ मैं, लेखनी में भाव का संचार हूँ मैं, स्वयं से ही पूंछती की कौन हूँ मैं, इसी से रहती अक्सर मौन हूँ मैं,”

प्रकृति से कविता में बहुत कम आए दो वृक्षों के बिम्बों का सहारा लेकर कवयित्री अपने पाठक को एक गहरा चिंतन आवेग सौंपती है जिसके स्पंदन से पाठक बच नहीं पाता। इस रचना की संवेदना और शिल्पगत सौंदर्य मन को भाव विह्वल कर गए हैं। रचना जी की इस कविता में से भावनाऒं का ऐसा रस उठा कि हमें कई पल रुक कर उन नीम और गुर्च के पेड़ों को निहारने पर विवश कर गया। जिंदगी के कई शेड्स इस कविता में ऐसी काव्‍यभाषा में प्रकट हुए हैं, जो मुझे यह कहने पर विवश कर रहे हैं कि रचना जी आप आज के समय की समर्थ कवयित्री हैं ।

दूर से निहारती हूँ तुम्हें.

सुना है,

गुणों का अकूत भंडार हो तुम.

वैसे, हूँ तो मैं भी.

तुम में भी एक दोष है,

और मुझ में भी.

तुम्हारा असह्य कड़वापन,

जो शायद तुम्हारे लिए राम बाण हो

और मेरा, दुर्बल शरीर.

मुझे चाहिए,

एक सहारा सिर्फ रोशनी पाने के लिए.

सोचती हूँ फिर क्यों न तुम्हारा ही लूँ.

अवगुण कम न कर सकूँ तो क्या,

गुण बढ़ा तो लूँ.

आओ हम दोनों मिलकर

कुछ नया करें.

किसी असाध्य रोग की दवा बनें.

दूर से निहारती हूँ तुम्हें,

जानती हूँ, मैं अच्छी हूँ,

पर बहुत अच्छी बनना चाहती हूँ.

कहते हैं,

नीम पर चढ़ी हुई गुर्च बहुत अच्छी होती है.

बोलो! क्या दोगे मुझे आसरा,

अपने चौड़े विशाल छतनार वक्षस्थल पर?

आज बस इतना ही। फिर मिलेंगे।

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सोमवार, सितंबर 20, 2010

सोमवार की चर्चा (२०.०९.२०१०)

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर सोमवार की चर्चा के साथ हाज़िर हूं। इसी सप्ताह हिन्दी दिवस था। तो दिवस को समर्पित करते हुए कुछ विद्वानों के विचार रखते हुए आज की इस चर्चा का शुभारंभ करते हैं।

मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज़्ज़त करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिन्दी की इज़्ज़त न हो, यह मैं नहीं सह सकता। - विनोबा भावे

भारतेंदु और द्विवेदी ने हिन्दी की जड़ें पताल तक पहुँचा दी हैं। उन्हें उखाड़ने का दुस्साहस निश्‍चय ही भूकंप समान होगा। - शिवपूजन सहाय

हिंदी दिवस सरकारी तौर पर हिंदी को राजभाषा (राष्ट्रभाषा नहीं) के रूप में स्वीकार करने की सांविधानिक तिथि। भारत की विभिन्न बोलियों और भाषाओं में भिन्न्ता होने के बावज़ूद एकसूत्रता के तत्व मौज़ूद थे। जिसके रहते वे भारत के राष्ट्रीय एकीकरण में कभी बाधा बन कर नहीं उपस्थित हुईं। उनका घर एक ही था खिड़्कियां कई थीं। हिंदी में इन खिड़कियों के अंतस्संबंधों को परखने तथा क़ायम रखने की क्षमता है। इसीलिए हिंदी हिन्दुस्तान की अस्मिता है। हिंदी है तो हिन्दुस्तान रहेगा। इसके बग़ैर एक विखंडित संस्कृति के सिवा कुछ नहीं बचेगा।

मेरा फोटोजब शब्द मिलते हैं तो आपस में प्रेम और भाईचारा बढता है। कुछ इसी तरह के भाव लेकर साधना वैद जी इसकी परिणति से हमें अवगत करा रही हैं। कहती हैं

भावों की भेल,
आँखों का खेल,
शब्दों का मेल,
प्यार की निशानी है !
होंठों पे गीत,
नैनों में मीत,
पाती में प्रीत,
जोश में जवानी है !

सुदर्शन ने कहा था प्रेम स्वर्गीय शक्ति का जादू है। इसके द्वारा राक्षस भी देवता बन जाता है। वहीं स्वामी विवेकानंद ने कहा था प्रेम असंभव को संभव कर देता है। जगत्‌ के सब रहस्यों का द्वार प्रेम ही है।

मेरा फोटोहाल ही में दिल्ली और जोधपुर में डॉक्टरों की हड़ताल ने लोगो को दहला दिया। एक के बाद एक होती मौतों ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर क्या वजह है कि मौत से दो-दो हाथ करने वाले हाथों ने अपना काम छोड़ दिया है। देर रात आए एक मरीज की मौत हालांकि डॉक्टरों की लापरवाही नहीं थी। पर उत्तेजित परिजनों ने इसके लिए डॉक्टरों को दोषी ठहरा कर उत्पात मचाया। जिसका नतीजा अगले दिन हड़लात थी। रोहित जी जब बोलते हैं तो बिन्दास ही बोलते हैं पर आज बता रहे हैं डॉक्टर बोले तो …. ? 

कुछ सीधे से सवाल उठाते हुए पूछते हैं जब डॉक्टर जानते हैं कि उनकी जरा सी लापरवाही मरीजों की जान ले लेती है, तो क्या उन्हें हड़ताल करनी चाहिए। सरकारी अस्पतालों में गरीब औऱ निम्न मध्यम वर्ग के मरीज ज्यादा आते हैं। ऐसे में उनकी जान से खिलवाड़ क्यों। इतिहास से कुछ तथ्यों का हवाला देते हुए बताते हैं गुलाम भारत में पिछली सदी में एक महान जीव विज्ञानी हुए थे जगदीश चंद्र बसु। जिस कॉलेज में वो पढ़ाते थे, उसमें उनकी तनख्वाह अंग्रेज प्रोफेसरों से कम थी। इस अन्याय के खिलाफ उन्होंने भी विरोध जताया। वो भी एक दो दिन नहीं पूरे दो साल तक।  एक हाथ पर विरोध की काली पट्टी बांधी औऱ बिना तनख्वाह लिए पढ़ाते रहे। हार कर दो साल बाद अंग्रेजी सरकार झुक गई।

डॉक्टरों के अपने तर्क हैं, अपनी मांगे भी। पर इन सब पाटों में पिसता है आम भारतीय नागरिक। जान जाती है गरीब, निम्म औऱ मध्यम वर्ग की। ऐसे में बेबस औऱ लाचार समाज कैसे जानलेवा हड़ताल का समर्थन करे।

मेरा फोटोइसी पोस्ट पर बिहारी (बड़े) भाई कहते हैं “हम त बहुत सा बात कह चुके हैं..इसलिए अभी बस आपके बात से सहमति,असहमति अऊर कहें त बैलेंस बनाते हुए अपना हाज़िरी लगा रहे हैं.” दरअसल उन्हों ने भी एक पोस्ट इस विषय पर लगाई थी। शिर्षक था देवदूत। पढिए यहां।

इस पोस्ट को लगाने का उनका आशय शायद दिव्या जी के पोस्ट से रहा हो। पर पहले यह देखें कि दिव्या जी ने क्या कहा रोहित जी के पोस्ट पर “आज देश को ज़रुरत है एक जागरूक 'परशुराम' की जो अपने फरसे से चिकित्सकों को नेस्तनाबूद कर दे।” यह आक्रोश वाजिब है। डॉक्टरों पर हो रहे आत्याचार और नाइंसाफ़ी से क्षुब्ध होकर उन्होंने एक पोस्ट लगाया था और तमाम प्रश्न किया था। पेशे से डॉक्टर दिव्या जी ने आप डॉक्टर हैं या कसाई शीर्षक से एक पोस्ट लगाई थी। १४७ टिप्पणियों के साथ वहां काफ़ी विचार मंथन हुआ और चर्चा सफ़ल रही।

इस विषय पर अलग-अलग मत हैं। सबके पक्ष में कुछ तर्क, कुछ औचित्य और बहुत दम है।

My Photoअत्याचार की बात चली तो लगे हाथ आपको लिए चलते है शब्दकार पर जहां आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' प्रस्तुत कर रहे हैं सामयिक कविता : मेघ का सन्देश : --------संजीव सलिल'।

देख अत्याचार भू पर.
सबल करता निबल ऊपर.
सह न पाती गिरे बिजली-
शांत हो भू-चरण छूकर.

प्रकृति पर भी निर्मम आत्याचार करने से हम बाज नहीं आ रहे। तभी तो तरह-तरह की प्राकृतिक आपदाओं का हमें सामना करना पड़ता है। और अग्र कवि हृदय हो ‘सलिल’ जी जैसा तो शब्दों का कमाल देखिए

तूने लाखों वृक्ष काटे.
खोद गिरि तालाब पाटे.
उगाये कोंक्रीट-जंगल-
मनुज मुझको व्यर्थ डांटे.

‘सलिल’ जी

आपने अपनी कविता में पर्यावरण पर हो रहे अत्याचार को लेकर कुछ जरूरी सवाल खड़े किए हैं। विगत कुछेक दशकों में हमारे पर्यावरण में जितने बदलाव आए हैं उसकी चिंता आपकी कविता में बहुत ही प्रमुख रूप में दिखाई देती है। हमने इस बदले वातावरण में जिस तरह से अपनी प्रकृति का दोहन और शोषण कर डाला है वह आपकी कविता में चिंता का विषय है। तभी तो आपका मेघ कहता है

गगनचारी मेघ हूँ मैं.
मैं न कुंठाग्रस्त हूँ.
सच कहूँ तुम मानवों से
मैं हुआ संत्रस्त हूँ.

मेरा फोटोजब मन संत्रस्त होता है तो उसके कुछ कारण भी होते हैं। ऐसे ही एक कारण पर ध्यान खींच रहे हैं चरैवेति चरैवेति पर अरुणेश मिश्र कहते उन्हें एक छन्द : त्यागने वाले मिले । देखिए इनकी जीवन के सच को बयान करती पंक्तियां।

सुमनोँ को मिला
जहाँ गन्ध पराग
वहाँ कण्टक
मतवाले मिले ।
कितनी बड़ी त्रासदी
है जग मेँ
अपनाकर
त्यागने वाले मिले ।

शब्द सामर्थ्य, भाव-सम्प्रेषण, संगीतात्मकता, लयात्मकता की दृष्टि से कविता अत्युत्तम हैं। जीवन के कटु यथार्थ को चित्रित करती कविता  नए आयाम स्पर्श कर रही है।

मेरा फोटोज़िंदगी के श्वेत पन्नों को न काला कीजिये परिकल्पना पर रवीन्द्र प्रभात की ये ग़ज़ल मेरी पसंद है।


ग़ज़ल
ज़िंदगी के श्वेत पन्नों को न काला कीजिये
आस्तिनों में संभलकर सांप पाला कीजिये।
चंद शोहरत के लिए ईमान अपना बेचकर -
हादसों के साथ खुद को मत उछाला कीजिये।
रोशनी परछाईयों में क़ैद हो जाये अगर -
आत्मा के द्वार से खुद ही उजाला कीजिये।
खोट दिल में हर किसी के यार है थोडी-बहुत
दूसरों के सर नही इल्ज़ाम डाला कीजिये ।
ताकती मासूम आँखें सर्द चूल्हों की तरफ ,
सो न जाये तब तलक पानी उबाला कीजिये।
जब तलक प्रभात जी है घर की कुछ मजबूरियाँ ,
शायरी की बात तब तक आप टाला कीजिये ।

आज बस इतना ही।

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सोमवार, सितंबर 13, 2010

सोमवार (१३.०९.२०१०) की चर्चा

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार सोमवार की चर्चा के साथ एक बार फिर हाज़िर हूं।

downloadसरोकार पर arun c roy ने लगा रखी है सीढियां!  ये बैसाखी नहीं है। यह वो माध्यम है जिस के द्वारा कवि कहता है

सीढ़ियों की पीठ पर
चढ़ कर
पहुँच जाते हैं लोग
कहाँ से कहाँ

गुलज़ार साहब फरमा गए हैं कि वहाँ तक सीढी नहीं रास्ते पहुँचते हैं...कई मोड़ों से गुजरकर!! यह कवि भी कुछ इसी तरह के भाव प्रस्तुत करते हुए कहता है,

धैर्य का
दूसरा नाम होती हैं
सीढियां
जो मंजिल तक तो
पहुचाती हैं
लेकिन
हिस्सा नहीं बन पाती
मंजिल तक पहुँचने की ख़ुशी का

अरुण जी बहुत सटीक बात रख दी है आपने सीढियो मे माध्यम से। आप एक समर्थ सर्जक हैं। आपके संकल्‍प और चयन की क्षमता से आपकी रचनाधर्मिता ओत-प्रोत है।

My Photoक्वचिदन्यतोअपि..........! पर Arvind Mishra जी ने एक बड़ा ही सामयिक प्रश्‍न खड़ा किया है। पूछते हैं ये क्या हुआ ? कब हुआ ?? जब हुआ तब हुआ ?? कुछ न पूछो! अपनी बात को रखते हुए कहते हैं, “कितने नए ब्लॉगर आये और टिप्पणी रूपी  प्रोत्साहन के अभाव में दम तोड़ गए -कोई मर्सिया भी नहीं हुआ!” ये एक बात हुई। दूसरी तरफ़ यह भी कहते हैं कि, “लोग या तो ब्लॉग पढना कम कर रहे हैं या फिर ईमानदारी से टिप्पणियाँ न देकर पक्षपात कर रहे हैं!”

अरविंद जी कि इन बातों पर ज़रा ग़ौर कीजिए,

“जीवन में कुछ संतुलन और उत्तरदायित्व बोध तो रखना ही होगा नहीं तो यह जीवन कितना निरर्थक ,निस्तेज सा ही नहीं हो जाएगा ...?”

अरविन्द जी की कुछ बातों से असहमति की गुंजाइश न के बराबर है, जैसे, “आपसे  कोई ब्लाग खुद को पूरा पढवा ले ..तब वह टिप्पणी डिजर्व कर जाता है!”

ब्लॉग विचार विमर्श के माध्यम हैं ,चर्चा परिचर्चा के फोरम हैं -यह ब्लागों  की मूल प्रकृति है -यदि हम इस मुक्त चिंतन प्रवाह और उसकी विचार सरणियों को बंद कर रहे हैं तो समझिये सरस्वती का अपमान सा कुछ कर रहे हैं - सिर धुन गिरा लाग पछताना जैसा ही ...!

अरविंद जी से सहमत होते हुए उनको उद्धृत करते हुए इसे मैं अपनी बात भी बताता हूं और आपसे भी जानना चाहता हूं कि आपके विचार क्या हैं, इस मामले में

“ब्लॉग पर लिखते जाना और टिप्पणी का आप्शन बंद कर देना किसी तानाशाही से कम नहीं है ..संवाद का गला घोटना है ...उस देश में जहाँ संवादों का एक भरा पूरा इतिहास पुराण रहा है ...गिनाऊ क्या ? परशुराम -लक्ष्मण संवाद ,अंगद -रावण संवाद ,हनुमान रावण संवाद ----संवादों पर पहरा मत लगाओ हे  मित्रों .....इतिहास को जानो पहचानो ......”

वेल, एक और संवाद मैं जोड़ देता हूं, चिठियाना-टिपियाना संवाद!

(इस पर पहरा क्यों???????)

 

My Photoबात को यहीं से आगे बढाते हुए उन्हें, जिनकी बातों ने अरविंद जी को पोस्ट लिखने को प्रेरित किया, एक शे’र पेश कर रहा हूँ।

कुछ अपने गिरेबां में भी झांक कर देखो
और अपनी गलतियों को तोलो कभी कभी

ये मेरे शे’र नहीं हैं, पर मेरे भी हैं। कुछ शे’र जब बहुत अच्छा लगते हैं तो सबके हो जाते हैं। अब देखिए ना Mahendra's Blog पर Mahendra Arya की पूरी ग़ज़ल अंतर की ग्रंथियों को खोलो कभी कभी! ही इतनी अच्छी है कि इसे अपनी ग़ज़ल कहने का दिल कर रहा है। ग़ज़ल पर आने के पहले उनकी बात पर आता हूं। कल किसी पोस्ट पर पढा था " मिच्छामी दुक्कड़म "! इसका अर्थ तब मुझे नहीं पता था। महेन्द्र जी इसका अर्थ बताते हुए कहते हैं,

“जैन समाज में एक बहुत अच्छी प्रथा है . वर्ष में एक दिन सभी एक दूसरे से मिल कर हाथ जोड़ कर कहते हैं - " मिच्छामी दुक्कड़म " . इस का अर्थ होता है की इस पूरे वर्ष में मेरे किसी भी कार्य या वचन से जाने या अनजाने रूप से आपका दिल दुख हो तो मुझे क्षमा करें . इसी भावना पर आधारित है मेरी ये नयी ग़जल .”

कितनी अच्छी प्रथा है। आज मैं भी आप सबों से कहता हूं, " मिच्छामी दुक्कड़म "   पर एक हम हैं, कि साल भर सबका दिल दुखाने का सुख लूटते रहते हैं। और ऐसे में सबसे आह्वान है महेन्द्र जी के स्वर में,

मन को उलट पलट के टटोलो कभी कभी
अंतर की ग्रंथियों को खोलो कभी कभी
कुछ घाव छोटे छोटे नासूर बन न जाये
मरहम लगाके प्यार की धो लो कभी कभी

महेन्द्र जी उम्दा शब्द चयन, बिलकुल पानी की धार की तरह बह रही है आपकी ग़ज़ल!

बातों पे खाक डालो जो चुभ गयी थी दिल में
कुछ जायका बदल के बोलो कभी कभी

पर यहां तो कई हैं जो कहते कि अब तुम हमसे न बोलो अभी-अभी।

महेन्द्र जी का एक शे’र

मन भर ही जाए जो गर अंतर की वेदना से
कहीं बैठ कर अकेले रो लो कभी कभी

महेन्द्र जी आपकी ये ग़ज़ल सादगी के अंदाज में ताना मारती है.......  और साथ ही कभी अनुरोध और विनती भी करती है तो कभी सांत्‍वना के स्‍वर भी। आप की इस ग़ज़ल में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं। अच्छी ग़ज़ल, जो दिल के साथ-साथ दिमाग़ में भी जगह बनाती है।

My Photo१४ सितंबर हमारे देश में हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर को समर्पित एक पोस्ट हृदय पुष्प पर राकेश कौशिक प्रस्तुत कर रहे हैं बिंदी!

स्वर-व्यंजन ही नहीं मात्र यह भारत माँ की बिंदी है।
तोड़ी कितनी बार बिखेरी फिर भी अब तक जिंदी है।।
मातृभूमि नीचे कर आँखें पीट रही है अपना मांथा।
लगता है हो गई बाबरी देख-देख अपनों की भाषा।
हिमगिर भी गंभीर हो गया चिंतित है कुछ बोल न पाता।
देख रहा टकटकी लगाए खंडित होती अपनी आशा।
गुमसुम सरिता का जल कहता मुझको भी अब मौन सुहाता।
निज भाषा  को मान नही तो कैसे गाऊं कल-कल गाथा।

वाकई लाजवाब!!!! पूरा इतिहास याद दिला दिया अपने तो! शब्दों का चयन और भाषा सब कुछ बहुत अच्छा लगा और सर्वोपरि तो देश भक्ति और भाषा भक्ति की भावना!!

मेरा फोटोउच्चारण पर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 700 वे पुष्प समर्पित करते हुए कहते हैं “700 वाँ पुष्प” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)!

“भारत माँ के मधुर रक्त को,
कौन राक्षस चाट रहा?”

आज देश में उथल-पुथल क्यों,
क्यों हैं भारतवासी आरत?
कहाँ खो गया रामराज्य,
और गाँधी के सपनों का भारत?
आओ मिलकर आज विचारें,
कैसी यह मजबूरी है?
शान्ति वाटिका के सुमनों के,
उर में कैसी दूरी है?
क्यों भारत में बन्धु-बन्धु के,
लहू का आज बना प्यासा?
कहाँ खो गयी कर्णधार की,
मधु रस में भीगी भाषा?

कविता विचारोतेजक और आंतरिक करूणा से भरी है और हृदय फलक पर गहरी छाप छोड़ती है।

मेरा फोटोये अद्भुत है। अनोखा है। जो रचना रवीन्द्र पर रचना दीक्षित प्रस्तुत कर रही हैं। शीर्षक मिलन बिल्कुल सटीक है, क्योंकि इस ऐंग्लो-हिन्दी कविता में हिन्दी और अंग्रेज़ी का बहुत सुंदर मिलन प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

ढूंढा तुझे बहुत, ऑंखें हुई न चार

बुझ गये मन के दीप,

मन मंदिर भी हुआ char..

क्या क्या विघ्न पार करके

अब पहुंची हूँ तेरे par .........

मेरे मन की डोर आ लगी है

आज तेरे door .....से

मिल गया है संकेत मुझे

कुछ मेरी ओर से कुछ तेरी ore....से

आप एक समर्थ सर्जक हैं। सुंदर प्रयोग.. भाषा की सीमा से परे जाकर अच्छी कविता!

आखर कलश पर नरेन्द्र व्यास प्रस्तुत कर रहे हैं नासिरा शर्मा की कहानी- हथेली में पोखर!

यहाँ से वहाँ तक मकानों के जंगल फैले हुए थे। जो घने सायेदार पुराने दरख्त थे, वे कॉलोनी के नक्शे ने पहले ही काटकर खत्म कर दिए थे। हल्की धूप के बादल घरों को घेरे रहते, जिसमें रेत और सीमेंट के कण मिले होते। बाजार दूर था। मजदूरों की जरूरत के मुताबिक जो चाय की झुग्गी ओर इकलौता ढाबा वजूद में आया था, उसका अब कोई निशान बाकी नहीं रह गया था। लोगों ने बसना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे सारे घर बस गए थे। चहल-पहल ने माहौल बदल दिया था। मिलना-मिलाना भी शुरू हो गया और कुछ दूरअंदेश लोगों ने मिलकर एक कमेटी भी बना ली थी, ताकि बाकी बची सहूलियतों की प्राप्ति में आसानी हो।

आकाश में मूसलाधार बारिश हो रही थी, जो पोखर में गिरकर बताशे फोड रही थी। घर के कच्चे आँगन में चुसनी आम से भरी बालटी के सामने काजल व केसर आम चूस रहे थे। घर भरा है। माँ-पिताजी, चाचा-चाची, दादा-दादी और उसकी दोनो बहनें...अतीत और वर्तमान गड्डमड्ड हो चुका था। वह एक साथ बच्चा और मर्द दोनों की शक्ल में नजर आ रहा था। गाँव का वह घर कभी शहर जैसा लगता और शहर का घर कभी गाँव जैसा। सुख की अनुभूति से कैलाश के रोम-रोम में आराम की कैफियत भरदी थी। उसके हाथों में फैलाव अब दोनों छोरों को छू रहे थे।

इस कहानी पर राजेश जी का कहना है नासिरा जी ने बहुत सहजता से पानी की गहराती समस्‍या और गांव और शहर के बीच फैलती खाई की तरफ इशारा कर दिया है। वे कहानी के अंत में हमें ऐसे मोड़ पर छोड़ देती हैं कि हमें खुद तय करना है कि आखिर कैलाश ने निर्णय क्‍या किया होगा। जब हम तय करेंगे तो उसमें हमारा सोच भी होगा ही। कहानी की सफलता इसमें ही है।

मेरा फोटो''कौन कहता है कि आसमाँ में छेद हो नहीं सकता..'' ये कहना है मसि-कागद पर दीपक 'मशाल' का। कहते हैं आदमी की तरह चलता कुत्ता और तुम्हें मेरी याद भी नहीं आती.. हुँह..----------------->>>दीपक मशाल। इस शीर्षक से आपको तो पता चल ही गया ही होगा कि इस पोस्ट में दो बाते हैं। एक है आदमी की तरह चलता कुत्ता है। ये ५ मिनट ४२ सेकेंड का विडिओ है। आप ज़रूर देखें, बांध कर रख देता है यह। कुदरत का अद्भुत करिश्मा।

और दूसरा है एक कविता।

उस याद की बिल्लौरी आँखें

हो जातीं उदास

और मुझे आता कुछ तरस सा

उसके हाल पर, बेचारगी पर

तब ताज़ी हवा के नाम पर खोल देता मैं खिड़कियाँ

खोल देता दरवाज़े सारे

इस पोस्ट पर वीणा जी कहती हैं बहुत सुंदर कविता है और वीडियो भी। हिम्मत नहीं हारने वालों की ही जीत होती है...!!

मेरा फोटोपरिकल्पना पर रवीन्द्र प्रभात बता रहें हैं प्रेम तकलीफ है .....पर आदमी बनने के लिए जरुरी है तकलीफ से गुजरना ....! कहते हैं

शुरू की जानी चाहिए मृत्यु से
जीवन की बात
समझना चाहिए
ज़िंदगी को एक छोटा सा सफ़र
बगैर भ्रम को पाले हुए जीना हो तो.....

आखिरी मुलाक़ात के साथ दे गयी थी मुझे
भावनाओं की पोटली में बांधकर , कि-
" बाबू !
प्रेम तकलीफ है .....पर आदमी बनने के लिए
जरुरी है तकलीफ से गुजरना ....!"

यह चकित करती प्रेम कविता है। यह प्रेम ठेठ जमीनी अंदाज में हैं भावावेग से भरी कविता। बहुत सारी दिक्‍कतों के बीच यह प्रेम ही है जो रोशनी बनकर उम्‍मीद की राह बनाता है।

My Photoभाषा,शिक्षा और रोज़गार पर शिक्षामित्र कहते हैं हिन्दी का पाया आज भी मजबूत! कहते हैं अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार के बहाने राजभाषा हिन्दी को उखाड़ने की तमाम कोशिशों के बावजूद हिन्दी आज भी समाज में पूरी मजबूती के साथ ख़ड़ी है। स्कूलों की शुरुआती प़ढ़ाई से लेकर उच्चतम स्तर की व्यावसायिक प़ढ़ाई तक में अंग्रेजी का बोलबाला बनाए रखने के सारे हथकंडे भी जनभाषा हिन्दी को नहीं डिगा सके हैं। आज भी हिन्दी देश की सबसे ब़ड़ी संपर्क भाषा है।

ये तथ्य "नईदुनिया" द्वारा हिन्दी दिवस के मौके पर कराए गए विशेष सर्वे में सामने आए हैं। राजधानी दिल्ली सहित हिन्दी भाषी आठ राज्यों में किए गए इस सर्वे के नतीजे बताते हैं कि सिर्फ ३४ प्रतिशत लोग ही मानते हैं कि हिन्दी की हैसियत कम हो रही है। यह भी राय सामने आई कि हिन्दी दिवस या हिन्दी पखवाड़ा जैसे आयोजन हिन्दी के प्रचार प्रसार में मददगार साबित होते हैं।

बहुत अच्छा आलेख है यह। हर वर्ष हिंदी दिवस के अवसर पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करके सरकारी विभा़ग अपने को भाषा और संचार की मुख्य धारा से जोड़ता है। सरकारी संस्थाओं का ज्यों-ज्यों आम जनता से संपर्क बढ़ता जाएगा त्यों-त्यों उन पर हिंदी का दबाव भी बढ़ता जाएगा। जैसे-जैसे आम जनता की पहुंच प्रशासन के गलियारों में बनती जाएगी हिंदी के लिए अपने आप जगह बनती जाएगी। हिंदी क्षेत्र पर अगर बाजार का दबाव है तो बाजार पर भी हिंदी की जबर्दस्त दबाव है। आज बाजार हिंदी की अनदेखी कर ही नहीं सकता।

अनूप जी ने एक जगह कहा था अपनी पोस्ट अगर लगे कि चर्चा में शामिल किया जाए तो उसकी भी चर्चा करनी चाहिए। इस सप्ताह हमने दो पोस्टें डाली है।

(१) मनोज पर फ़ुरसत में … अमृता प्रीतम जी की आत्मकथा “अक्षरों के साये”

(२) राजभाषा हिन्दी पर साहित्यकार - दुष्यंत कुमार

 

बस। अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे।

 

चलते-चलते आप सबों से कहता हूं, " मिच्छामी दुक्कड़म "! 

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