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शुक्रवार, जुलाई 10, 2009

एक पापाराज्‍़ज़ी चर्चा बरास्‍ता ट्विटर

चर्चा से पहले देख लें कि पिछले 24 घंटे में किसने क्‍या लिखा

अब ये भी कोई बात हुई एग्रीगेटर से तो कोई भी पता चला लेगा कि किस चिट्ठाकार ने क्‍या लिखा, ऐसे में चर्चाकार क्‍या भाड़ भूंज रहा है ? तो हमारा जबाव है कि हर चर्चाकार बराबर उद्यमी नही होता कोई कोई ऊधमी भी होता है। इस लिहाज से हमने सोचा है कि आज तनिक तांक झांक की जाए... बोले तो गॉसिप। आज हमने कुछ चर्चाकारों के ट्विटर, फेसबुक, आर्कुट में झांककर देखा कि वहॉं क्‍या खिचड़ी पक रही है, ये एक मायने में चर्चाकारी में पॉपाराजी परंपरा ही है। कोई ये न पूछे कि अमित अगर डिनर के बाद डबल एस्‍प्रेसो पीते हैं तथा आधिकारिक रूप से घोषणा करते हैं कि ये काफी उस काफी से बुरी है तो... इसमें क्‍या खास बात है। जी हुजूर कुछ खास नहीं है.. खास का दावा भी नहीं है.... आम का दावा है। ये ब्‍लॉगर की आम जिंदगी की चर्चा है।   ये भी बता दें कि .... अमित को विंडोज7 की डीवीडी मिल गई (शश.. किसी से कहना नहीं)...और ये भी कि पिछले सात घंटे से अमित बिना बिजली के बीएसईएस को कोस रहे हैं-

amit

amitgupta

  • BSES sucks big time. Our building's power has been out for 9 hours, registered complaint 4 times in last 4 hours & still not fixed!!
  • Had a double shot of espresso at Costa after dinner - now its confirmed, I don't like it. Lavazza at Barista is damn better!about 12 hours ago from web
  • Ice Age 3 is pretty darn good, way too better than Ice Age 2.about 14 hours ago from PockeTwit
  • Got Windows 7 RC DVD + PC Quest mag, thanks to @baxiabhishek

वैसे अमित की चर्चा सबसे वहले इसलिए कि ब्‍लॉगिंग के इस छोटे संस्‍करण में वे खासे नियमित हैं। लेकिन बाकी चिट्ठाकार भी वहॉ अपने दुखड़े-सुखड़े रोते-गाते हैं। अब आपको न पता हो तो बता दें कि संजय बेंगाणीजी ने किसी को अपनी कार मंगनी दी और अगले ने ले जा भेड़ी कहीं.. ऐसे में कोई खिसियाकर सिर्फ यही कह सकता है..हे हे हे कोई नहींचलो चोट तो नहीं लगी न (पर नुकसान तो हुआ न...उसका क्‍या)

संजय

  • मित्र को गाड़ी दी थी. अच्छी खबर किसी को ज्यादा चोटें नहीं आई. बूरी खबर गाड़ी का कचरा हो गया. :( 

आलोकजी रसोई में हैं और शिकायत ये कि रसोई में भी एसी चाहिए

पप्पू कांट डांस साला। रसोई में भी एसी चाहिए #गर्मी #पप्पू

कुश को गर्मी से कोई शिकायत नहीं उन्‍हें बारिश से शिकायत है कि कंबख्‍त तब क्‍यों आती है जब हम व्यस्‍त हों। काश कोई कुश को गाकर सुनाए कि तेरी दो टकिया कि नौकरी मेरा लाखों का सावन..

  ये बारिशे भी कितनी जालिम होती है.. हमेशा तब आती है जब आप बहुत बिजी होते है.. Read more: http://tinyurl.com/ndetzg

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रिक्शा बाहर उल्टा पड़ा है.. घर में तवे का भी यही हाल है... किसनू सोच रहा है बारिश रुक जाये तो चूल्हा चालु हो... बंटी बालकनी में आ चुका है.. खुश हो रहा है.. ट्यूशन से छुट्टी..! हे भगवान ये बारिश ऐसे ही होती रहे..
कहा ना मैंने.. हर बारिश की अपनी अलग कहानी है.

इनके अलावा सीधे या बरास्‍ता चिट्ठाजगत जिन चिट्ठाकारों ने अपनी पोस्‍ट की मशहूरी ट्विटर पर की हैं उनकी सूची ये है-

 

radhikabudhkarradhikabudhkar   कभी सुना हैं इंटरनेटीय संगीत ?   http://is.gd/1rSfI#vaniveenapani10:54 AM Jul 9th

Himanshu Himaanshu  मुरली तेरा मुरलीधर 10   http://is.gd/1s3BA #akhilam  -madhuram  about 21 hours ago

Kirtish BhattBamulahija  प्रणबदा... पेश कीजिये!!  http://bit.ly/h224Gabout 21 hours ago 

Dineshrai Dwivedidrdwivedi1Icon_lock पुरुषोत्तम ‘यक़ीन’ के चंद दोहे  http://is.gd/1s9Ll #anvaratabout 19 hours ago 

Ravishankarraviratlami  महावीर सरन जैन का संस्मरण : डॉ उदय नारायण तिवारी    http://is.gd/1sam5 #rachanakarabout 18 hours ago

             raviratlami   अशोक गौतम का व्‍यंग्‍य : दरबारी रागी, सरकारी रागी   http://is.gd/1sam0    #rachanakarabout 18 hours ago

ajit wadnerkarshabdavali   गप्पी, बातूनी और बतोलेबाज    http://is.gd/1sBTG#shabdavaliabout 10 hours ago   

Dineshrai Dwivedidrdwivedi1Icon_lock  राजस्थान का बजट न्यायार्थियों के लिए बहुत निराशाजनक    http://is.gd/1sJqg    #teesarakhambaabout 7 hours ago

 

अभी तक इस्‍तेमाल न कर रहे चिट्ठाकारों को याद दिलाया जाए कि यदि आप ट्विटर पर भी हैं तो चिट्ठाजगत का एक जुगाड़ खुदबखुद आपकी नई ब्‍लॉगपोस्‍टों की जानकारी आपके ट्विटर पर अपडेट कर देता है। अधिक जानकारी के लिए आप यहाँ देख सकते हैं।

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शुक्रवार, मई 08, 2009

वोट से बनो कि बिन वोट पप्‍पू तो तुम्‍हें ही बनना है

हमारा मानना रहा है कि भारतीय राजनीति और कला का बहुत गहरा नाता है ! जब जब राजनीति में सरगर्मियां और हलचल बढती है कला की सभी विधाओं में रचनात्मक उर्जा बढी हुई दिखाई देने लगती है ! खासकर ब्लॉग लेखन जो कि आजकल का सबसे आधुनिक कला- रूप है में मात्रात्मक और गुणात्मक विकास होता है ! राजनीति , राजनीतिक व्यक्तियों , संस्थाओं की निंदा , आलोचना , उपहास , व्यंग्य न हो करने को तो ब्लॉग में क्या खाक लिखा जाएगा ? चुनाव  वो भी लोकसभा के आ गए तो ब्लॉग लेखन में भी रचनाओं की बहार - सी आ गई है ! कविता , किस्सा , कहानी , कार्टून हर स्टाइल में मौसम के अनुरूप पोस्टें आईं ! चुनाव के प्रंग से लदे फदे ऎसे माल से तंग आकर शेफाली पांडे जी को लिखना पडा कि बस आज से कोई चुनावी व्यंग्य नहीं आज से खालिस गंभीर कविता लिखूंगी ~! बामुलाहिज़ा के ब्लॉग पर कसाबी आतंकवाद पर कार्टून देखने लायक है ,साथ ही मायावती की मासूमियत भी ! भई जो तंज़ कार्टून में है वो किसी विधा में नहीं है ! खैर ! मेरी आप सबसे गुज़ारिश है कि पूरा देश मिलकर जो चुनाव आयोग को कंफ्यूज़िया रहा है वो न करें ! कोई कहता है कि चुनाव आयोग ध्यान दे ,   तो कोई कहता है चुनाव - आयोग ध्यान न दे ! अब अंशू जी के ब्लॉग को पढकर चुनाव आयोग के कान ( अगर वो हैं तो ) पर जूं रेंगेगी क्या ?

मेरी गली और देश के सारे के सारे पप्पूओं के साथ जो अन्याय हो रहा है मेरे हिसाब से उसपर मानवाधिकार आयोग को जल्द ध्यान देने की ज़रूरत है ! उनके नाम को खामख्वाह बदनाम किया जा रहा है ! जो जन्म से पप्पू नाम के साथ बड़ी हुए हैं वो जी कैसे रहे होंगे इसपर संवेदनशीलता से विचार करना चाहिए ब्लॉगरों को ! एक ब्लॉगर ही हैं जिनसे ऎसी बातों से मुद्दा निकालने की उम्मीद की जा सकती है ! अब जो पप्पू भी नहीं बने वोट भी नहीं डाला उनका ऎक्स्पीरियेंस भी पढ डालिए हो सकता है आगे काम आए ! टेंशन –प्वाइंट पर जाकर मुंह छिपाए घूम रहे पप्पू थोडा रिलीव्ड महसूस कर सकते हैं ! पर आपको बताए दूं यहां पोस्ट नहीं पोस्ट की बच्चा ही मिलेगा ! :) भई लिख ही रहे हैं तो थोडी टेंशन आप भी ले ही लो हाथ खोलो की बोर्ड पर ताकि पढने वाला भी समझ पाए कि आप लिखना ही चाहते थे ब्लॉग वाणी की लिस्ट में आ जाना भर इरादा नहीं था आपका !  चुनावी काउंट डाउन शो जल्द ही शुरू होने वाला है अब गिनना बाकी है जो कि सबसे आसान काम है भारतीयों के लिए ! आखिर इतनी बढी आबादी की जनगणना से गिनने की प्रेक्टिस करते आए हैं हम ! मंसूर मतदान के बाद के समय सोलह मई की गिनती के लिए तैयार कर रहे हैं-

बोल घड़े में डाल चुके अब गिनती करना है ,
पोल खुलेगी जल्दी ही, अब गिनती करना है.
सब ही सर वाले तो सरदार बनेगा कौन?
दार पे चढ़ने वालो की अब गिनती करना है.

गूंगे बहरे शेर के पकडे जाने की कहानी का रहस्य जानने के लिए पल्लवी त्रिवेदी जी के ब्लॉग पर जाइए ! पढकर मुस्कुराए बिना नहीं रहेंगे ! इलेक्शन के दिन एक तत्पर और ज़िम्मेदार वोटर को पप्पू बनाया जाने के लिए विवश करते सरकारी तंत्र पर व्यंग्य अवश्य पढिए चाय - चिंतन में !  वैसे शर्मिंदगी केवल पप्‍पूपन की ही नहीं है, मसलन पीएम साहब क्‍वात्रोची की वजह से शर्मिंदा हैं।  शर्मिंदगी की वजहें और भी हैं मसलन औरत औरत होना जो रोजाना मरती है या फिर अल्‍पवयस्‍क पत्नी की होना जिसे कानून भी पटकता फटकता है।

क्या हम दुनिया के किसी भी भाग से ऐसे समाचार नहीं सुनते हैं कि दो या पाँच या सात वर्ष की बालिका के साथ बलात्कार किया गया।  किसी भी अवस्था में इस तरह के अपराध के होने की संभावना तो बनी ही रहती है।  इसी तरह से बाल विवाह पूरी तरह से प्रतिबंधित हो जाने पर भी यह स्थिति तो बनी ही रहेगी कि कानून से निगाह बचा कर कोई बाल विवाह हो ही जाए और उस अवस्था में कोई पति अपनी 15 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ बलात्कार कर दे।  ऐसी अवस्था में उस कृत्य को अपराध घोषित किया जाना क्या आवश्यक नहीं है?

 

और अंत में आमने-सामने :

आमने

सामने

कानून में 15 वर्ष से कम की पत्नी क्यों?

औरत रोज़ाना मरती है...

मैने यह दृश्य पहली बार देखा... आप भी देखिए कुमार गंधर्व के सुपुत्र मुकुल शिवपुत्र भोपाल की सड़कों पर भीख मांग रहे हैं ।
प्रीत की रीत ये मनाने का हुनर हो शायद ...
हाय दिस इज रामप्यारी स्पीकिंग

पादुका प्रक्षेपण करने वालों के लिए नई रेंज आई है......

गूगल को बताइए अपनी कहानी, वह सुनना चाहता है आपकी जुबानी। टैक्नोलाजी, बच के रहना
राहुल का बयान, सन्नाटे में लालू हंगामा क्यों बरपा है?
खिसियाये लालू, मीडिया पर भड़के मैं पप्‍पू बन गया
आज भी गाये जाते हैं प्रभाती रामू के रण में जन गण मन

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शनिवार, जनवरी 10, 2009

साझा ब्लोगरूपी दीवार में टंगी धूल पड़ी तस्वीर हैं हम

पिछली बार अंधेरे में जब तीर चलाया तो वो किसी को जा लगा इसलिये सोचा इस बार शिकार भी हम बनते हैं और शिकारी भी। अभी कुछ समय पहले पढ़ा था हिंदी के लिये 'आने वाला साझे ब्लोग का दौर हैं' (शायद ऐसा ही कुछ) लेकिन जाने क्यों मुझे लगता है वो दौर तो शायद जा चुका। जब नया-नया ग्रुप ब्लोग बनता है तो ज्यादातर लोगों की क्रियाशीलता बनी रहती है फिर धीरे-धीरे वो खत्म हो जाती है। अभी तक बने सभी साझा ब्लोग इसके शिकार हो चुके हैं, ज्यादातर इन ब्लोगस में या तो मोडरेटरस ब्लोग ठेले जाते हैं या कभी कभार कोई अन्य दो तीन जन। बाकि कंट्रीब्यूटरस दीवार में धूल पड़ी तस्वीर जैसे टंगे रहते हैं। हम भी कोई अपवाद नही हैं ऐसे ही २-३ ब्लोगस में हम भी टंगे हुए हैं, साथ ही साथ ऐसी कुछ तस्वीरें आप दायीं तरफ की साईड बार में टंगी हुई देख सकते हैं। चलिये टंगना टंगाना तो लगा रहेगा, अब थोड़ी चर्चा हो जाये।

कहीं का पत्थर कहीं का रोड़ा
एक नेता कितने ही घोटाले क्यों ना कर ले, उस पर अपराध के कितने ही केस क्यों ना चले, जनता और देश का तिया पांच करने में वो कोई कसर ना छोड़े, ऐसे लोग तो पहले रूखसत नही होते लेकिन अगर ऐसा हो भी जाये सबके मुँह से उनके लिये फूल ही झरते हैं सबको अचानक उनका पर्सनल व्यक्तित्व याद आ जाता है लेकिन एक आम आदमी पर, एक कड़क अफसर पर इस तरह के छींटें पड़ जायें और बदकिस्मती से रूखसत हो जाये तो -
आज का सच यह है कि गौतम गोस्वामी कैंसर से झूझते हुए, सिर्फ़ ४१ साल कि उम्र में इस दुनिया से रुखसत हो गया। बाढ़ घोटाले कि जांच चल रही है और चलती रहेगी। गौतम कि मौत कि खबरें जब अख़बारों में छपी तो उनमें कई कई बार बाढ़ घोटाले का जिक्र किया गया। गौतम कि अन्तिम संस्कार में केवल दो बड़े अधिकारी शामिल हुए। जांच पूरी होने से पहले ही गौतम को दोषी मान लिया गया था। मृत्यु के बाद भी यह लाजवाब अधिकारी वह सम्मान प्राप्त नहीं कर सका जिसका वो हक़दार था।
निर्भय होकर भय पर चिंतन कर रहे हैं प्रभात, उनका कहना है -
मानिये न मानिये बीमा कंपनियों के भय मैनेजमेंट इतना तगड़ा है कि उनके आप कायल हो जायेंगे। बच्चे से पूछा जाता है कि अगर आपके पापा गुम हो जायेंगे, तो आप क्या करेंगे।
चलिये मानना छोड़िये, अगर सच में गुम हो गये तो सोचिये क्या होगा? चारों तरफ फैले गिद्धों के बीच एक जवान विधवा का संघर्ष और समाज के ताने जिंदगी दुभर बना देंगे। कम से कम शायद ये भय बाद के लिये कुछ सहारा बन जाये। समाज अभी भी वहीं है जहाँ १९२५ में था, इसीलिये आभा कह उठती है, हम लड़कियाँ हैं, हमारा घर कहीं नहीं होता -
लड़कियों की सामाजिक हैसियत पर १९२५ में लिखे अपने उपन्यास निर्मला में प्रेमचंद ने एक सवाल उठाया था। वो सवाल आज भी जस का तस कायम है। हालात बदले हैं लेकिन लड़कियों की दशा नहीं बदली है। कुछ तबकों में बदली सी दिखती है, उन तबकों में प्रेम चंद के समय में भी बदली हुई सी थी। बड़ा वर्ग आज भी वहीं खड़ा है जहाँ १९२५ में खड़ा था। आज भी लड़कियाँ दोहरे बरताव का शिकार हैं।
पैसा ये कैसा, पैसा ये ऐसा, ये हो मुसीबत, ना हो मुसीबत, मानते हैं ना इस बात को लेकिन कभी सिक्कों का सफर सोच कर देखा है। अरे रे रे, सोचना शुरू करके दिमाग पर जुल्म ना ढायें, आपके लिये ये काम पहले ही कर दिया गया है। किसने? अजीतजी ने और कौन भला।

सत्यम की सफलता का ज्ञान बँट रहा है, अगर अभी तक मूल मंत्र नही लिया तो जाकर ले आईये, ज्ञान देते हुए ज्ञानजी लिखते हैं -
बाइबल की कथा अनुसार पतिता को पत्थर मारने को बहुत से तैयार हैं। पहला पत्थर वह मारे जो पाक-साफ हो!
ये बाइबल के जमाने की बात थी, अब जमाना बदल चुका है। अब पाक साफ लोग पत्थर नही बम मारते हैं, अब जो जहाँ रहता है वहीं ना अपने को साफ करके रखेगा, जो पाक में रहकर अपने को साफ रखे वो पाक साफ।

जब महानायक को रेखा नही मिली तो भला गरीब को कैसे मिल सकती है और वो भी जेट रेखा। लेकिन फिर भी आलोकजी अगड़म बगड़म कोशिश तो कर ही रहे हैं दिलवाने की -
फुल सूटेड बूटेड टाई वाला वह बंदा प्राइवेट जेट से उतरा और कटोरा हाथ में लिया और भीख मांगने की प्रेक्टिस करने लगा। मैंने पूछा-भई जेट से उतरे, तो भिखारी कैसे। वह बोला- कोई ढंग से खा पी ले, तो इसमें आपको क्या एतराज है। भीख मांगना प्रोफेशनल काम है, जेट चलाना पर्सनल काम है। दोनों अलग अलग हैं।
खैर डिट्टो ये बात यहाँ हम गोरों को पहले ही समझा चुके हैं शायद इसीलिये दूजी बार वो कार के लिये भीख माँगने कार में ही गये। अब भीख की बात चली है तो एक ब्रेकिंग न्यूज दे दूँ, ब्रिटेन की पोर्न इंडस्ट्रीज वालों को भी अब भीख चाहिये, मैं सोच रहा हूँ वो भीख माँगने कैसे जायेंगे।

अब लेते हैं एक कमर्शियल ब्रेक, जल्द वापस लौटते हैं, तब तक आप ये विज्ञापन बाँचिये - क्या आपके ब्लोग में लोग नही आते, क्या आपको टिप्पणी नही मिलती, क्या आपके भी मीठे मुँह से हमारी तरह लाल मिर्ची निकलती है जो आपके चाहने वालों को आपके ब्लोग के पास फटकने नही देती। अगर ऐसा है तो अब घबरायें नहीं, डाक्टर चिपलूनकर लेकर आयें हैं इस मर्ज का शर्तिया ईलाज, सुदूर हिमालय के दूरदराज ईलाकों से लायी जड़ी-बूटियों से बनायी गयी है ये गुणकारी दवा जो आपकी ब्लोगदानगी (मर्दानगी की ही तर्ज में पढ़ें) फिर से लौटा सकेगी। आपके चेहरे पर खोई मुस्कान लाने की गारंटी, दवा के लिये मिलें या लिखें, आपसे महज एक क्लिक की दूरी पर। ध्यान रहे हमारी कोई और ब्रांच नही है।

और लीजिये आदि चिट्ठाकर आलोक कुमार हाजिर हुए हैं अब तक की अपनी सबसे लंबी पोस्ट बल्कि महा लंबी पोस्ट लेकर।

राधिका ने जब लिखा हर काश पर खत्म होता एक आकाश!, तो प्रकाश मेरे पास दौड़ा चला आया और बोला कि हर काश पर तो मैं भी खत्म होता हूँ, मेरा क्या? हमने एक लम्बी श्वास भरी और कहा हम ये लिख पाते, काश...

हम चर्चा भी करते हैं तो कोई इधर देखता नही मगर, वे चाय भी पीते हैं तो बन जाती है खबर, अब आप बतायें यहाँ भी क्या हम कह सकते हैं, काश...

अगर तुम होती तो कैसा होता, तुम ये कहते तुम वो कहती लेकिन इतनी रोमांटिक सी बात को छोड़ शिवजी कह रहे हैं कि अगर चिट्ठाकार सरकारी मुलाजिम होता तो कुछ ऐसे ही नजारे देखने को मिलते -
चिट्ठाकारों की हड़ताल का असर सब क्षेत्रों में देखने को मिला. इस असर का असर यह हुआ कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने एक कमिटी का गठन किया. इस कमिटी में हिन्दी मंत्री, सांस्कृतिक मंत्री, सदाचार मंत्रालय के राज्य मंत्री थे. इस कमिटी ने चिट्ठकारों से मुलाकात की.
आंखे भी होती हैं दिल की जुबाँ, अगर ऐसा है तो फिर तस्वीर के लिये क्या कहेंगे। अमित की सुने तो कहेंगे - तस्वीर भी बोलती हैं, जो तस्वीरें इन्होंने दिखायी हैं उनमें से २ तस्वीरों ने मुझे याद दिला दिया वो विडियो जो मैने कुछ महीनों पहले बनाया था, आप भी देख लीजिये।




सब लोग उस प्रदेश के मुख्यमंत्री को गरियाने में व्यस्त रहें और वहाँ ये बोर्ड लगा रहा - सावधान प्रगति का काम चालू है। आज जब वो बोर्ड थोड़ी देर के लिये हटा तो संजय ने खबर सुनाई -
भारत के किसी राज्य का अपना पहला अतिआधुनिक डेटा-सेंटर गुजरात में कार्यरत हो गया है. इस बात का महत्त्व इसलिए भी है कि देश के बाकी राज्य अभी इस पर विचार ही कर रहें है, (या उनकी मुख्यमंत्री अपने जन्मदिन के लिए चौथ उगाही में लगी है ) तो आइ.टी. का बादशाह माने जाने वाला कर्णाटक इसके लिए टेंडर निकालने तक ही पहुँच पाया है.


कहीं सुर-ताल कहीं गीत
अभिवादन में Hello एक लंबी कविता होती है और Hi होता है हाईकू, अब आप समझ ही गये होंगे तो आइये थोड़ा उदाहरण भी देख लें। अल्पना की कल्पना की ये उड़ान है हाईकू का उदाहरण -
नैनों की बातें,
कंपकंपाता मन,
हुआ मिलन

अब हाईकू के बाद जाकर हैलो भी बाँच आओ, साथ में कुछ दुलर्भ चित्र दिखा रही हैं लावण्या जी।

ज्योत्स्ना ने कहा ये आपके लिये, इसलिये बगैर कुछ और कहे आपके ही नजर कर देते हैं -
तुम्हारी याद के तकिये पर सिर रख कर के सोती हूँ
उठे गर दर्द दिल में तो तुम मुझको जगा देना

तुम्हारी महकी राहों का उजाला मैं न बन पायी
अंधेरे आयें राहों में तो तुम मुझको जला लेना
पारूल हार से थोड़ा उदास दिखती हैं, तभी तो -

वक्त के दिए घाव है
वक्त के साथ भर जायेंगें ......
हम तो इस सोच में है
ये गम लेकर किधर जायेंगें ?
लेकिन लगता है ये बात निर्मलाजी ने सुन ली, इसलिये उन्होंने प्रति उत्तर में लिखा -
जीवन को संघर्श मान जो चल पडते हैं बाँध कफन,
नहीं डोलते हार जीत से,नहीं देखते शीत तपन.
न डरते कठिनाईयों से न दुश्मन से घबराते हैं,
वही पाते हैं मंजिल देश का गौरव बन जाते हैं


मनीष बता सुना रहे हैं २००८ का पायदान संख्या 22 का गीत आँखों से ख्वाब रूठ कर

ज्ञान-विज्ञान के गलियारे
इस गलियारे में पढ़िये -
  • पायरेसी को कैसे कम किया जा सकता है.
  • अपना नाम कंप्यूटर की सिस्टम घड़ी (clock) में कैसे दिखायें



  • रब ने बना दी जोड़ी
    1. मानव शरीर किस लिए है? झुकने के लिये, इसलिये झुको न!
    2. ताऊ को मिला बराबरी का जोडीदार कौन मांडू के राक्षस रूपी पेड़ "बाओबाब"

    3. करिए जरा विचार...! क्यों ब्लाग विचार के साथ व्यभिचार

    4. किससे लड़ें - पाकिस्तानी आतंकवाद से या देशी राजनीतिक आतंकवाद से ओ बॉय दोनों आप्शन आतंक ही आतंक

    5. नेपाल तो बदलकर रहेगा, आप चाहे जो सोचें अब हम भी क्या करें आदमी ही है कि सोचता है



    नये हस्ताक्षर
    हमारी पिछली चर्चा में शास्त्रीजी ने कहा था, नये चिट्ठों को भी स्थान मिलना चाहिये इसलिये इस बार से ये नया कॉलम शुरू किया है जिसमें १ या २ चिट्ठों की बात करेंगे।
    अशोक शर्मा लेकर आये हैं प्रसिद्ध कवि विरेंददा पर समर्पित ब्लोग - विरेन्द्र डंगवाल, और साथ में ब्लोग की पहली पोस्ट ही शुरू की चेतावनी के साथ -
    अवैधानिक चेतावनी :
    ये शायद साहित्य की दुनिया की पहली जीवनी है जिसमें जीवनी से पहले चेतावनी को महत्व दिया गया है। चेतावनी इसलिये क्योंकि भूल से भी कोई इसे वीरेन डंगवाल पर शोध या वीरेन डंगवाल समग्र समझने का धोखा ना खा जाये। यह शोध इसलिये नहीं है क्योंकि इसमें निष्कर्ष नहीं है कि वीरेन डंगवाल क्या हैं? उनकी सीमाएं और संभावनाएं कहाँ तक हैं? वगैरा.. यह ब्लॉग वीरेन डंगवाल समग्र इसलिये नहीं है, क्योंकि उन्हें देखने के लिये दो आंखें और समझने के लिये एक दिमाग नाकाफी है। ये ब्लॉग उनके बारे में मोहब्बत और श्रृद्धा के उद्वेगों का नतीजा है। इसमे दिमाग की कसरत की कसर रह जाने की भी मुक्कमल संभावना है। सो इसे संभल कर ही पढ़ा जाये। लेखक की तरफ़ से किसी बात की गारंटी नही है पर यहाँ जितना लिखा है, है सभी सच ही..
    विरेंददा की कविता का एक नमूना पेश है -
    प्रार्थनाग्रृह ज़रूर उठाये गए एक से एक आलीशान!
    मगर भीतर चिने हुए रक्त के गारे से
    वे खोखले आत्माहीन शिखर-गुम्बद-मीनार
    ऊँगली से छूते ही जिन्हें रिस आता है खून!
    आखिर यह किनके हाथों सौंप दिया है ईश्वर
    तुमने अपना इतना बड़ा कारोबार?
    अपना कारखाना बंद कर के किस घोंसले में जा छिपे हो भगवान?
    कौन - सा है वह सातवाँ आसमान?
    हे, अरे, अबे, ओ करुणानिधान !!!
    अब अशोक का ही एक दूसरा ब्लोग इंडियन पेपराजी, अंग्रेजी में होते हुए भी हिन्दी एग्रीगेटर ब्लोगवाणी की शोभा कैसे बना है जब तक आप ये बूझिये हम कहीं और नज़र दौड़ाते हैं।

    प्रकाशित गजल लेखक चंद्रभान भारद्वाज इंदौर से लेकर आये हैं अपना ब्लोग - भारद्वाज ब्लोग, आप सोच रहे हैं ना प्रकाशित गजल लेखक क्या बला हुई? तो बता दें इसका मतलब है वो जिनकी पुस्तकें पहले प्रकाशित हो चुकी हों। दादा उम्रदराज दिखते हैं लेकिन एनर्जी ऐसी कि ब्लोग से भी छलक-छलक जाये, नमूना खूद देख लीजिये -
    मानता था मन सगा जिसको दगा देकर गया;
    प्यार अक्सर ज़िन्दगी को इक सज़ा देकर गया।

    दर्द जब कुछ कम हुआ जब दाग कुछ मिटने लगे,
    घाव फ़िर कोई न कोई वह नया देकर गया।

    जानता था खेलना अच्छा नहीं है आग से,
    पर दबी चिनगारियों को वह हवा देकर गया।

    याद आता है उमर भर प्यार का वह एक पल,
    जो उमर को आंसुओं का सिलसिला देकर गया।

    आंसुओं में डूब कर भी ढूंढ लेते हैं हँसी
    प्रेमियों को वक्त यह कैसी कला देकर गया।

    द्वार सारे बंद थे सब खिड़कियाँ भी बंद थीं,
    पर समय कोई न कोई रास्ता देकर गया।

    हम कभी बदले स्वयं वातावरण बदला कभी,
    दर्द ऐसे में खुशी का सा मज़ा देकर गया।


    अब अंत में, चर्चाकारों से एक नम्र निवेदन। कृप्या अपने हिस्से और दिन का ही माल उठायें, दूसरे के दिन के लिये आया ज्यादा बिक्री वाला माल उठाने की चेष्ठा ना करें। देखिये ना नोटपेड जी ने तेल फुलेल, इत्र पाऊडर क्या देखा ले उड़ीं और अपने हिस्से के माल को हाथ तक ना लगाया। यही नही मृत्यु, जीवन, ससुर, असुर किसी को भी ना छोड़ा, अब तीसरे खंबे वाले कुछ राय दें तो आगे सोचें।

    अब आप ब्लोगवाणी के विजेट या कोड की मदद से अपनी पोस्ट को पसंद करवा सकते हैं, ज्यादा जानकारी के लिये यहाँ देखिये। हो सकता है पीछे पीछे चिट्ठाजगत का कोड भी आता होगा।

    अब अगले शनिवार तक के लिये दीजिये ईजाजत आपके दिन हँसते हुए बीते.

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    गुरुवार, दिसंबर 11, 2008

    गब्बर चिट्ठाचर्चाकार संवाद

    (वैसे तो मूलत: यह चर्चा 19 मार्च 2007 को की गई थी. इस बीच, हिन्दी चिट्ठाकारी में हजारों पोस्टें ठेल दी गई हैं, और चिट्ठाकार पांच सौ से बढ़कर पांच हजार हो गए हैं, मगर परिस्थितियां घेला भर नहीं बदली हैं. संदर्भ - आज की चर्चा. इसी लिए इसे रीठेल कर रहे हैं. मज़े लें. गब्बर सांभा संवाद तो हर फ्रेम में, हर माहौल में फिट बैठ ही जाता है... )

    गब्बर तो नहीं, परंतु समय के अनुसार सांभा ढल गया है और वह चिट्ठाचर्चाकार बन गया है. प्रस्तुत है गब्बर - सांभा संवाद के ताज़ा अंश-


    गब्बर - अरे ओ सांभा
    सांभा - जी, सरकार...

    ग.- तो कितने हिन्दी चिट्ठाकार हैं?

    सां.- जी, सरकार पांच सौ...


    ग.- और दिन में कितने चिट्ठे चर्चा के लिए आ जाते हैं?
    सां.- जी, सरकार, यही कोई पंद्रह बीस...

    ग.- और तू पंद्रह-बीस चिट्ठों की भी ढंग से चर्चा नहीं कर पाता. ऊपर से बहाने बनाता है कि चिट्ठों पर ताला लगा है? बहूत नाइंसाफी है ये बहूत नाइंसाफ़ी.

    सां.- सरकार,...


    ग.- और क्यों क्या तेरे कन्ने कोई और काम धाम नईं था क्या जो तू बेमतलब और फ़ालतू चिट्ठाचर्चा लिख-लिख कर तमाम जनता को बोर करता फिरता है?
    सां.- जी, सरकार...


    ग.- उदर ये भासा ऊसा का क्या चक्कर है? कबी तू बंगाली मोशाय बनके लीखता होय, कबी तू मद्रासी बोन जाता है, कबी तू कविता करता है और कबी तू फ़ोकट का कुंडलियां तो कबी व्यंज़ल मारता है? कबी तू मध्याह्न में आ जाता है तो कबी फुरसत में लिखता बेठा रहेता है और कबी हैदराबादी तो कबी कुवैती बानी बोलता है. तो क्या तू पूरे देस-परदेस में घुमता फिरता है और क्या तेरे में बहुभाषी आत्मा घुस रहेला है?
    सां.- हाँ, सरकार...


    ग.- हाँ सरकार के बच्चे? क्या तू पाठकों को बेवकूफ़ समझता है? तू सुद्द हीन्दी क्यों नहीं लीखता है? और ई का चक्कर है कि तू कुछ चिट्ठों को तो बड़े प्रेम प्यार से बांचता है चर्चा करता है, और बाकी को छोड़ देता है? स्त्री नाम धारी चिट्ठाकारों के चिट्ठे तो तू बांच लेता है बाकी को फेंक देता है? कुछ चिट्ठों की बड़ी प्रशंसा मारता है तो कुछ चिट्ठों की खिल्ली उड़ाता है. बड़ी यारी दुसमनी निभाता है अपने चिट्ठाचर्चा के जरिए? सुना है तूने बहुत ग्रुप बना लिया है कोटरी बना लीया है?
    सां.- सरकार, सरकार...



    ग.- सरकार के बच्चे, ये बता तू चिट्ठाचर्चा में फोकट की खाली चरचा मारता है कि कुछ गंभीर समीक्षा-वमीक्षा भी करता है? कि बेफ़ालतू की खाली कड़ियाँ थमाकर भाग जाता है. जब तू चिट्ठाचर्चाकार बन गएला है तो अपने काम में प्रोफ़ेशनल एटीट्यूड क्यों नहीं लाता? चलताऊ काम क्यों करता है? या तो तेरे को चिट्ठाचर्चाकार नहीं बनना था, और जब बन गएला है तो गाहे-बगाहे बहाना क्यों बनाता है?
    सां.- नहीं, सरकार...


    ग.- चोप्प! अब सुन. अबी मेंने जो तेरे को सुनाया, उसपर ध्यान मार. भेजा उसपे लगा. मेरे को कोई कंट्रोवर्सी नईं मांगता. जो जो पिराबलम मेंने तेरे को ऊपर बताया उसे ठीक करके फिर चिट्ठाचर्चा लिखना. और, जरा जल्दी जल्दी सीख, अपने चिट्ठाचर्चा मैं स्टैंडर्ड ला. समझा क्या? और नहीं समझा तो ये बी समझ - आज मेरे सामने आदमी अकेला तू है और मेरे इस पिस्तौल में गोली पूरी की पूरी छ: है. हा हा हा हा हा हा हा हा हा ...

    सां.- जी, सरकार.


    चिट्ठाचर्चाकार सांभा तब से अपने टर्मिनल का कुंजीपट टिपियाते बैठा है. उसकी उंगलियाँ धड़ाधड़ चल रही हैं, परंतु गोली के भय से वह एक लाइन टाइप करता है और चार लाइन मिटाता है. उसकी पोस्ट माइनस में चली गई है. वह पोस्ट करे तो करे क्या?

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    गुरुवार, अक्टूबर 16, 2008

    पूरा विश्वास उठ चुका है!!!

    फुरसतिया जी का हम पर से पूरा विश्वास उठ चुका है. उठ भी जाना चाहिये. ऐसी हरकत बार बार कि अभी चर्चा कर रहे हैं, करते हैं, करेंगे और फिर नहीं कर पायेंगे कब तक कोई झेले. मगर हमारी भी मजबूरी..करें क्या?

    पिछले तीन सप्ताह से तो कायदे से टिपिया भी नहीं रहे हैं, जो सामने पड़ गया. टिपिया दिया..और बस!!!
    होता है ऐसा फेज भी. हम तो यही मानते हैं कि चलता है.

    विवेक के अति आभारी हैं कि फुरसतिया महाराज को रोज चर्चवाने को मना लिए हैं.
    अच्छा ही है, हमारे लिए कुछ बचा ही नहीं.

    बस, हमारी लवली जी ने अपनी ब्लॉगिंग का एक साल पूरा किया और सबको धन्यवाद दिया, वो बताने के सिवा थोड़ा ही बचा है. न जाने किस भयवश उन्होंने अपनी प्रोफाईल ही अलग कर ली अपने ब्लॉग से और फोटो भी. एक वो कि अच्छी सी फोटो हटा ली और एक हम, कि अपनी नई नई टांके जा रहे हैं.

    फिर उनके सिवाय, वकील साहब द्विवेदी साहेब ने अजब ही खुलासा किया. हमारे लिए तो वाकई जानकारी ही के समान थी:

    मैं जानता था कि इस वास्तविकता को जान कर कुछ लोगों को दुख होगा। लेकिन यह वास्तविकता है। मैं ने यह कदापि नहीं कहा था कि 65% रिश्ते ऐसे हैं। मैं कह रहा था कि इतने लोग इन रिश्तों को मान्यता देते हैं।

    वैसे दिनेशराय द्विवेदी जी हमेशा ही कुछ नया सा संदेश लाते हैं जो विस्मित कर देता है. वो गुणों की खान हैं, अतः बलवान हैं हमारी नजरों में. आपकी आप जानों.

    आज जो सबसे सालिड पोस्ट लगी वो थी शिव कुमार मिश्रा जी की. आज उन्होंने साबित कर दिया कि वो हमारे ही अनुज हैं. स्नेहवश आशीष कहने को जी चाहता है. सोचता हूँ कि पास होता तो सर पर हाथ फेर देता और कहता कि वाह!! क्या बात है. क्या दोहे लिखे हैं!!!

    आज तो अरूणा राय जी कुछ अलग रंग में ही आईं...और समझिये कि छा गईं. कहती हैं:

    जब वे सबसे ज्‍यादा
    निश्चिंत और बेपरवाह होते हैं
    उसी समय जाने कहां से
    आ टपकता है
    एक चूजा
    भविष्‍यपात की सारी तरकीबें
    रखी रह जाती हैं
    और कृष्‍णबाहर आ जाता है...
    बहुत जबरदस्त प्रस्तुति!!!


    मीडिया नारद ने सूचित किया कि आज याने १५ अक्टूबर को माननीत भू.राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम जी की जन्म दिन है मगर कहीं कोई चर्चा नहीं. आज असल संतो की यही हालत है..मगर नकल वाले संत अपने बेटों को कानून से बचा ऐश कर रहे हैं. आप भूलना भी चाह उनका जन्म दिन तो वो भूलने न देंगे.

    शब्दों का सफर आज तिल का ताड़ बनाये दे रहा है..वो तो खैर हमेशा ऐसा ही करते हैं. जिस शब्द को हम तिल समझते हैं, उसकी ऐसी व्याख्या करते हैं कि ताड़ ही बन जाता है. अजित भाई को साधुवाद.

    आज आलोक जी जैसे व्यंग्यकार और हर बात आराम से हजम कर जाने वाले हमारे मित्र भी भावुक हो लिए:

    सर आपको कैसा फील हो रहा है-वह टीवी रिपोर्टर फिर एक बदहवास बाप से पूछ रही है।

    यह सुनकर मुझे जो फील हो रहा है, वह बताने योग्य नहीं है क्योंकि वह छपनीय नहीं है।


    आज उनका हृदय बोला जो मुझमें धड़का एक अपनापा सा लगता है इस शख्स से..शायद सबको लगता हो.

    अभी तो बस इतना ही...बाकी देखी जायेगी. फुरसतिया जी तो आने ही वाले हैं फिर से.

    एक निवेदन, भाई विवेक, आप मेरा वाला दिन ले लो...बड़ी मुश्किलें चल रही हैं..और फिर अब चार हफ्ते में भारत भी निकलना है. ये ज्यादा भारी लफड़ा है.

    अंत में:

    forcc

    बायें से दायें:

    घनश्याम गुप्ता जी, रजनी भार्गव जी, अनूप भार्गव जी, राकेश जी, समीर लाल...राकेश जी किताब ’अंधेरी रात का सूरज’ के विमोचन के अवसर पर.

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    गुरुवार, सितंबर 18, 2008

    मैडम आपको क्या परेशानी है??

    शीर्षक देखकर भागे चले आये मानो कि बम फूटा हो. अरे महाराज, संदर्भ तो समझ लो कि दौड़ते ही रहोगे? यह ब्रह्म वाक्य नीलिमा जी की उस पोस्ट का हिस्सा है जिसमें वो बुजुर्गों के और नई पीढ़ी के बीच बढ़ती संवादहीनता की वजह से बुजुर्गों की हालत पर दुखी हैं एवं कहती हैं कि :

    पीढियों के बीच बढती संवादहीनता हमारे अतीत और जडों को सुखा रही है !! अपनी वृद्ध पीढी के प्रति हमारा यह रवैया बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब विद्यालयों में बच्चे "वृद्धों की उपयोगिता" पर निबंध लिख रहे होंगे !


    -वाकई, बहुत अहम मुद्दा उठाया है. पठनीय पोस्ट. हमारी खास रेकमेन्डेशन इसलिए भी कि हम खुद उसी बुजुर्गियत की दिशा में अग्रसर हैं.

    वैसे बम फूटा की बात पर एक बात याद आई. जब न्यूयार्क में ९/११ अटैक हुआ या लन्दन में बम फटा और उसकी तस्वीर टीवी पर देखी, लोगों को घटना स्थल से उल्टी दिशा में भागते देखा मगर जब दिल्ली की तस्वीरें देखी तो लोग उसी दिशा में भाग रहे थे जहाँ बम फूटा..देखने कि क्या फूटा?? जैसे, सब टिप्पणी पर चली चर्चा जब खत्म हो गई. शांति छा गई तब राज भाटिया जी निकले आजादी की लड़ाई का बिगुल सधाते:

    आप सब से निवेदन हे की इस जगह ऎसी बाते करके किसी का अपमान ना करे, क्योकि यहां हम ने किसी को नही देखा ना ही किसी के बारे जानते हे फ़िर क्यो दुशमनी करे, अगर दोस्ती नही कर सकते तो चुप रहॊ, उन से दुर रहो, आप भी मस्त रहो , दुसरो को भी मस्त रहने दो, मैं भी ९०% टिपण्णीयो मे बहुत कम शव्द लिखता हु, और कभी कभी सिर्फ़ :) से ही काम चलता है,
    आप सब आजाद हैं ओर दुसरो को भी आजाद रहने दो यही मेरी शिकायत है और आप सब से प्राथना भी कि अब और नही, सब अपनी अपनी मस्ती मे रहॊ.


    वैसे बात तो १०० टके सही है..आभार भाटिया जी.


    आज शायदा जी ने कहा:

    चुप के बियाबान में आवाज़ का बूटा रोप भी दें, तो सुबहोशाम उसे पानी कौन देगा? अनमनी उदारता के किसी क्षण में ईश्‍वर ने अगर अधर में लटकी दुआ को ज़मीन पर जाने का हुक्‍म भी दे दिया, तो तारे की तरह टूटकर गिरती उस दुआ को हथेलियां फैलाकर लोकेगा कौन?


    शुरुवात में कहती हैं:.

    "टूटी पलक को यूं ही ज़मीन पर गिरने नहीं दिया जाता... रोक लिया जाता है गाल पर ही। उल्टी हथेली पर रख, आंख बंद करके एक दुआ मांगी जाती है और कभी किसी को बताया नहीं जाता कि मांगा क्या गया। "


    यही मंतर कालेज के समय हमारे एक मित्र भी हमें दे गये थे. विश्वास मानिये, पूरी पलक के बाल गिरा गिरा कर हथेली पर उल्टी धर के उड़ा दिये मगर बात नहीं बनी. उसकी तो शादी भी हो गई और हम बिना बाल की पलक लिये बहुत दिनों तक डोलते रहे बिना किसी को बताये, इसमें मंतर में बताना मना है. :) मगर यहाँ मसला दूसरा है. एक बेहतरीन लेखन का नमूना है, पढ़िये और आनन्द उठाईये.


    वैसे, न जाने क्यूँ, क्या लफड़ा हुआ है कि भाई शिव कुमार मिश्र अपनी ईमेज बनाने के गुर सीखने में लग लिए हैं. लिखते तो हमेशा से क्लासिक व्यंग्य हैं, आज जरा अल्ट्रा क्लासिक टाईप लिख गये- और अपने मित्र कम गुरु से जिनकी ईमेज कबीर की है (गुमान ही होगा- वरना डॉ अनुराग ने उनके पोस्ट पर टीपते हुए कही दिया: सिर्फ़ गरियाने से अगर कोई कबीर बन जाता तो देखना यहाँ....इत्ते कबीर होते की उनके सरनेम से पहचानना पड़ता....) जितना गुरु से मूँह बाये सीखे, सब बता मारे.

    ये गुरु को सुनने के चक्कर में लगे हैं और उधर सचिन मिश्रा बता रहे हैं कि गुरु कैसे कैसे!! ..

    वैसे अनिल पुसडकर जी ने जैसे ही सचिन मिश्रा जी से शब्द पुष्टिकरण (वर्ड वेरीफिकेशन) हटाने की मांग की उन्होंने तुरंत उसे हटा कर टिप्पणी की कि :

    "आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है. आगे से आपको यह दिक्कत नहीं होगी, आभार. " (लगा कहीं टेलीफोन लग गया है)

    काश, सभी वर्ड वेरीफिकेशन धारी इस भावना को समझ हम टिप्पणीकारों पर रहम करते. :) कई ईमेल आते हैं कि वर्ड वेरीफिकेशन गुगल के साथ आया है, कैसे हटाये. बात तो सही है. डिफॉल्ट सेटिंग यही है और गुगल है भी दमदार आईटम. अब कोई उसके साथ आये तो हटायें कैसे-मगर उसने इसकी सुविधा दी है:

    डेश बोर्ड से सेटिंग में जायें फिर सेटिंग से कमेंट में और सबसे नीचे- शो वर्ड वेरीफिकेशन में ’नहीं’ चुन लें, बस!!!


    गुगल बुरा नहीं मानेगा, हमने कह दिया है. :)

    आज एक विशेष चिट्ठे ’ओशो चिन्तन’ के बारे में जानकारी देना चाहूँगा जिसकी की कम ही चर्चा होती है. यह चिट्ठा नियमित रुप से राजेन्द्र त्यागी जी द्वारा संचालित है एवं इस पर रोज आचार्य रजनीश जो कि बाद में ओशो के नाम से जाने गये, का एक प्रवचन रहता है. जीवन के विभिन्न आयामों पर उनके चिन्तन और दर्शन पर उनके प्रवचन अति प्रभावी हैं.

    आज एस बी सिंह जी ने रंग-ए-सुखन पर ब्रज का लोक गीत पंडित जसराज की आवाज में सुनवाया : मृगनयनी के यार. आनन्द आ गया.

    मग्गा बाबा के प्रवचन सुन हमेशा की तरह मन प्रसन्न हुआ. आज उन्होंने गौतमबुद्ध और यशोधरा के मिलन की कथा सुनाई. हम मग्गा बाबा की जयकारा लगा आये. आप भी सुन आईये, अच्छा लगेगा.


    आज कविताओं में:

    आज कविताओं में स्वाति जी की प्रस्तुति उस त्वेष का योवन गजब की रही. वहाँ कट पेस्ट की सुविधा नहीं है वरना कुछ हिस्सा तो आपको यहीं पढ़वा देते.

    कभी भाई वीनस केसरी स्कूल के दिनों में खीज उतारते एक कविता डायरी में लिख लिए थे. कुछ नया विचार दिमाग में नहीं आया तो वहीं खिजियाई कविता चिपका दिये, कुकडू कू $$$$$$$ -के नाम से. मस्त है!!!

    आजकल पर ओमकार चौधरी जी को पढ़ें ’तेरे मेरे बीच की ये दीवार’ :

    कई दिन की बारिश में
    दरकी हैं कई दीवारें
    भरे पड़े हैं पानी से रास्ते
    भरी पड़ी हैं गलियां सारी
    .... आगे पढ़िये ..


    आज आये नये चिट्ठे:

    आप सभी का हार्दिक स्वागत है. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाऐं:


    1. आवाज़


    2. कालापानी


    3. मेरी कलम


    4. श्री प्रह्लाद नारायण मित्तल (स्वर्गीय)


    5. The S60 Blog


    6. आपका दोस्त


    7. Homoeopathy....Beyond Horizons


    8. समीर

    चिट्ठाकार: FIGHT AGAINST TERRORISM ...एक सालह- महाराज-ब्लॉग का नाम फाईट अगेन्सट टेरोरिज़म कर लो और चिट्ठाकार समीर.. सलाह बस है-हमारी नाम राशि हो, इसलिए स्नेह फूट पड़ा, मानना, न मानना, तुम्हारी इच्छा. :)

    9. जाहिर है...


    10. रंगीला मित्र मंडल


    11. News36


    12. गुरुवाणी


    13. महाकौशल


    14. MEDIA STUDENTS OF INDIA


    15. चेतन पंचाल



    ------

    और भी ढ़ेर सारा लिखे थे, पता नहीं कैसे उड़ गया...यही लफड़ा है उड़न तश्तरी का. कब न उड़ जाये..चलते चलते बवाल के दो शेर:

    कौन कहता के, मौत आई तो मर जाऊंगा ?
    मैं तो दरिया हूँ, समंदर में उतर जाऊंगा !!

    ख़ुद पुकारेगी जो मंज़िल, तो ठहर जाऊंगा !
    वरना खु़द्दार मुसाफ़िर हूँ, गुज़र जाऊँगा !!


    -बहुत खूब (छोटी टिप्पणी-जबकि पढ़े भी हैं दोनों शेर और कंठस्थ भी कर लिए हैं, फिर भी)

    आज की तस्वीर: (चित्र एवं पंक्तियाँ दोनों समीर लाल द्वारा) :)

    (निम्न पंक्तियाँ वीनस केसरी की कविता में कुकडू कू और ओमकार चौधरी जी कविता में टर्र-टर्र टुर्र-टुर्र के प्रयोग से उत्साहित होकर)

    जिन्दगी की कांव कांव,
    कहीं धूप तो कहीं छांव!!


    p1

    अब चलते हैं-जय हो!!!

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    बुधवार, जुलाई 04, 2007

    आज की भड़भड़िया चर्चा

    आज अनजाने में ही एक चिट्ठाचर्चा , हमारी चर्चाकारी से बेहतर, वैसे ही हो चुकी है जो कि हमारे मित्र जगदीश भाटिया ने अपने अनोखे और निराले अंदाज में की है. हम तो उसे ही कट पेस्ट कर देते. परमिशन भी मांगे थे. मालूम भी है वो दे देंगे मगर भारत है, क्या करें. जब तक परमिशन आयेगी-दिन सरक जायेगा, बातें महत्ता खो देंगी. इस लिये बस लिंक दिये दे रहे हैं तो वहाँ तक की चर्चा इस लिंक पर देखें. मजा आने की गारंटी, जगदीश भाई की तरफ से हमारी.

    अब आगे बढ़ना ही जिन्दगी है तो हम भी बढ़ें. क्या आपको पता है कि ब्लॉगर पर आप अपने पोल और सर्वे करवा सकते हैं जैसा कि नारद करता है कि आप स्त्री हैं कि पुरुष. बिना इसका ध्यान रखे कि एक वर्ग और है. चुनाव तक लड़ने का अधिकार है मगर नारद पढ़ने का नहीं. खैर, उसे छोड़ें. हरि इच्छा के आगे क्या कहें. मगर ऐसे पोल आप कैसे कर सकते हैं बता रहे हैं अंकुर भाई . सीख गये और आसमान पर नजर दौडाई और रोज की तरह आज भी आज की शायरी और सामान्य ज्ञान प्राप्त किया. आज, आज के विचार की कमी खली, आदत जो पड़ गई है. वैसे, यह मात्र प्रस्ताव है कि अगर यह तीन दैनिक पोस्टों को एक कर दिया जाये और शीर्षक रहे-आज का विचार, शायरी और सामान्य ज्ञान. तो एक ही क्लिक में काम चल जाये और नारद के संसाधनों का भी उपयोग सभी के द्वारा बराबरी से हो सके. यह मात्र आज का हमारा विचार है, बाकि जैसा आप उचित समझें.

    अनिल जी की रचना विड्म्बना देखें-सव, एक सुन्दर रचना है. और भी दुर्लभ चीज देखना हो तो सागर भाई हेमंत दा का दुर्लभ गीत सुना रहे हैं और अमित दुर्लभ चित्र दिखा रहे हैं. चाहे कुछ देख दिखा लो, मगर कमलेश भाई का डिक्लेरेशन कि मैं भी इंसान हूँ देखना न भूलना. हमने न सिर्फ देखा बल्कि टिपियाया भी है. :) अब ध्यान रखते हैं.

    अनिल रघुराज जी की लेखनी के तो हम व्यक्तिगत तौर पर कायल हैं और आज उस पर और मुहर लग गई जब उन्होंने क्यूबा के कास्त्रो के विचार हिन्दी में लिखे यह कहते हुये कि आत्मा जैसे होते हैं विचार . आज पहली बार पढ़ा और दिनेश पारते जी ने तो मानो लुट ही लिया-क्या रचना है!! हम तो पूछने वाले थे कि क्या भाई, आपने ही लिखी है?? गजब भाई गजब- आकांक्षा मानकर चले कि उन्होंने ही लिखी है तो उसका कुछ भाग यहाँ न दें तो पाप कहलायेगा, सच में:

    हे कृष्ण मुझे उन्माद नहीं, उर में उपजा उत्थान चाहियेअब रास न आता रास मुझे, मुझको
    गीता का ज्ञान चाहियेनिर्विकार निर्वाक रहे तुम, मानवनिहित् संशयों परकिंचित
    प्रश्नचिन्ह हैं अब तक, अर्धसत्य आशयों परकब चाह रही है सुदर्शन की, कब माँगा है
    कुरुक्षेत्र विजयमैने तो तुमसे माँगा, वरदान विजय का विषयों परमन कलुषित न हो,
    विचलित न हो, ऐसा एक वरदान चाहियेमुझको गीता का ज्ञान चाहिये



    .....पूरी रचना यहाँ पढ़ें . वाह, बधाई, मित्र. उनकी पुरानी रचनायें भी पढ़ें.

    लिखे तो राजीव रंजन जी भी चाँद पर बेहतरीन क्षणिकायें हैं मगर कोशिश करके भी हम टिपिया नहीं पाये, पता नहीं क्या समस्या है.

    रचनाकार ने बेहद नाजुक कहानी विजय शर्मा जी की सुहागन सुनाई, हम तो ऐसा खोये कि टिपियाना ही भूल गये, जो अभी देख पाये. माफ कर देना भाई, चर्चा के बाद कोशिश करते हैं.

    राजेश पुरकैफ भाई
    से बारिश के मंजर की एक अलग तस्वीर देखें-हमने कह दिया है: किसी की मस्ती, किसी की उजड़ी बस्ती चन्द्र भूषण जी ने कहा लट्ठलट्ठे का सूत कपास-शीर्षक देख कर पढ़ना शुरु किया और पहली लाईन देख कर बंद-आपका दिल करे तो पढ़ें . मेरी मंद बुद्धि है, गहराई समझ नहीं पाता. मगर अधिकतर चंद्र भूषण जी लिखा पसंद करता हूँ तो बता दिया.

    सब चुप रह जायें तो भी मेरे भाई मसिजीवी न चुप रहेंगे, तो उनकी सुनो चिट्ठाजगत की गोपनियता पर ....


    अभी यही रुकते हैं, वादा है कि कल सुबह आगे की कवरेज दूंगा बिना नागा.....जरा, हड़बड़ी में भागना पड़ रहा है....कोई भी कुछ न सोचे मैं वापस आ रह हूँ...क्षमा मित्रों.

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    गुरुवार, जून 21, 2007

    एक फुलकी खुश्बु है, कीसी दीलकी जुबानी है


    कोई मलयाली, हिन्दी में चिट्ठा लिखेगा तो?

    कोई केरली, कोई जापानी और कोई अमरीकी हिन्दी में चिट्ठा लिखेगा तो?

    और कोई ख़ालिस गुजराती , हिन्दी में चिट्ठा लिखेगा तो?

    वह कैसा लिखेगा?

    जाहिर है, उसकी हिन्दी में उसकी अपनी मातृभाषा के अंश घुस आएंगे - जैसे कि हमारी अपनी हिन्दी में अंग्रेजी घुसपैठ कर चुकी है.

    शुद्धतावादियों से आग्रह है कि वे भी अपनी उत्साहवर्धक टिप्पणियां ही दें, व शुद्ध हिन्दी लिखने के लिए तमाम ऐसे चिट्ठाकारों को थोड़ा सा समय अवश्य दें. समय सबको सिखा देता है.

    तो, आइए, इस ग़ैर हिन्दी भाषी के इस हिन्दी चिट्ठा प्रविष्टि का स्वागत् करें व इनके प्रयासों की सराहना करें.

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    रविवार, जून 17, 2007

    आइए, आज मालवी जाजम बिछाएं...


    (मालवी जाजम के चिट्ठाकार - श्री नरहरि पटेल)

    भाई ई-स्वामी ने कोई दो साल पहले ख्वाहिश जाहिर की थी कि कोई मालवी चिट्ठा शुरू करवाई जाए...

    इधर कुछ समय से इक्का दुक्का मालवी चिट्ठे शुरु हुए हैं. देर से ही सही, उनकी ख्वाहिश अब पूरी हो गई.

    आज चर्चा करते हैं मालवी जाजम की.

    मालवी जाजम का पहला चिट्ठा 10 जून को प्रकाशित हुआ और आज 17 जून के आते तक उसमें 7 चिट्ठे मालवी में प्रकाशित हो चुके हैं. यदि रफ़्तार यही रही, जिसके लिए हमारी शुभकामनाएँ हैं , तो यह चिट्ठा मालवी भाषा-बोली की उपस्थिति इंटरनेट पर दर्ज कराने में मील का पत्थर साबित होगा.

    प्रस्तुत हैं मालवी जाजम के कुछ चुनिंदा पोस्ट -

    मालवी ग़ज़ल


    कसी लुगायां हे...

    सीधी सादी,कसी लुगायां हे
    भोली भाली,कसी लुगायां हे

    जनम की मां,करम की अन्नपूर्णा
    भूखी तरसी, कसी लुगायां हे

    पन्ना,तारा,जसोदा मां, कुन्ती
    माय माड़ी, सकी लुगायां हे

    कुंआरी बिलखे हे,परणी कलपे
    घर से भागी,कसी लुगायां हे

    गूंगी-गेली,वखत की मारी हे
    खूंटे बांधी, कसी लुगायां हे

    फ़ांसी-फ़न्दो,तेल ने तंदूर
    लाय लागी,कसी लुगायां हे

    टीप:

    लुगायां:औरतें
    माड़ी:मां
    परणी:ब्याहता
    लाय: आग

    ****

    भाटो फ़ेकीं ने माथो मांड्यो..

    मालवी का यशस्वी हास्य कवि श्री टीकमचंदजी भावसार बा अपणीं रंगत का बेजोड़ कवि था.घर -आंगण का केवाड़ा वणाकी कविता में दूध में सकर जेसा घुली जाता था.मालवी जाजम में या बा की पेली चिट्ठी हे....खूब दांत काड़ो आप सब.आगे बा की नरी(अनेक) रचना याद करांगा.

    कविता को सीर्सक हे..
    भाटो फ़ेकी ने माथो मांड्यो...

    लकड़ी का पिंजरा में चिड़ियां बिठई
    चोराय पे जोतिसी ने दुकान लगई
    भीड़ भाड़ देखी ने एक डोकरी रूकी
    लिफ़ाफ़ो उठायो तो चिट्ठी दिखी

    साठ बरस की डोकरी ने बिगर भणीं
    बंचावे भी कीसे भीड़ भी घणीं
    अतरा में एक छोरो बोल्यो ला मां... हूं वांची दूंगा
    जेसो लिख्यो वेगा वेसो कूंगा


    लिख्यो थो...
    प्रश्न पूछ्ने वाले तुम्हारी अल्हड़ता और सुंदरता पे
    आदमी मगन हो जाएगा
    और आते महीने तुम्हारा लगन हो जाएगा.

    ***-***

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    बुधवार, जून 13, 2007

    तीन साल की इगा का चिट्ठा


    मासुमियत की दुनिया में, किलकारियों की गूँज के साथ आपका स्वागत है।....

    तीन साल की इगा भी चिट्ठाकारी - हिन्दी चिट्ठाकारी में उतर चुकी हैं. ऊपर की पंक्ति उसके ब्लॉग का टैगलाइन है.

    उनके चिट्ठे का नाम है - मेरा बचपन

    इगा अपनी पहली भारत यात्रा पर उत्साहित है, और वह कुछ यूँ लिखती है -

    मेरी पहली भारत यात्रा ( की तयारी )

    सोमवार की सुबह तक (११ -जून) मुझे पता ही नहीं था कि इन्डिया जाना क्या होता है| पापा-मम्मी पिछले कुछ दिनों से लगातार व्यस्त चल रहे थे | ख़ूब प्लानिंग भी चल रही थी | पूरे घर मे सामान बिखरा हुआ , अटैचीयां खुली हुई| मेरे लिए तो अच्छा था , खेलने के लिए नए और अजीबो-गरीब खिलौने थे | मम्मी के कपड़े, सारियाँ , गहने , नया मोबाईल फ़ोन -हर चीज़ मुझे जैसे बुला रही हो, " आओ , मुझसे खेलो" |
    लेकिन जैसा कि हमेशा होता है, मेरी माँ मुझे कभी भी मेरे पसंद वाले खिलोने से खेलने नहीं देती | कभी भी कुछ उठाया तो - Sami ! डोंट टच ( Sami Dont Touch!! ) की गुहार लगाने लगती हैं | अब उन्हें कैसे समझाया जाये कि बिना छुए हुये मैं कैसे खेल सकती हूँ खिलौनों से |

    अब यदि अपने मोबाइल -कैमरे से आपने मेरी तस्वीर खींची है तो मेरा पुरा हक बनता है कि मैं देखूं कि फोटो कैसी आयी है | अलबत्ता , मुझे कैमरा(फोन) हाथ मे लेकर ही अपनी फोटो देखना पसंद है | अब यदि आपको फोन के गिर कर टूटने का डर है तो वो आपकी समस्या है | उसके लिए मैं क्या कर सकती हूँ |
    सबसे ज्यादा गुस्सा मुझे तब आया जब ममा ने अपना पुराना फोन मुझे बहलाने के लिए दे दिया| मैं छोटी हूँ पर नए और पुराने फोन का भेद समझती हूँ | वो तो ढंग से चल भी नहीं रहा था | ना कोई कैमरा , ना रंगीन स्क्रीन | मैंने साफ जता दिया कि मुझे फालतू फोन दे कर टरकाने की उनकी सारी कोशिशें नाकाम होंगीं |
    ( पापा अभी काम कर रहा है, फुर्सत मे उससे और लिखावाउंगी )


    आखिरी लाइन आपने सही पढ़ी. इगा अभी अपने पापा से लिखवाती है.

    इगा, तुम जल्दी बड़ी होओ और फिर खुद लिखो. इन्हीं कामनाओं के साथ,

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    सोमवार, अप्रैल 23, 2007

    दूरदर्शन का अदूरदर्शी चेहरा...



    पिछले दिनों भारतीय टीवी समाचार चैनलों ने हिन्दी चिट्ठाकारों को इतना आंदोलित और उद्वेलित कर दिया कि अंततः उन्होंने विरोध स्वरूप अपने कम्प्यूटर के कुंजीपट उठा ही लिए.

    सुनील तथा रीतेश को एक तालिबानी किशोर द्वारा एक मासूम व्यक्ति का गला काटने के फुटेज दिखाया जाना जहाँ परेशान करता है वहीं मीडिया युग विदेशी चैनल द्वारा विदर्भ के किसानों की आत्महत्या पर एक विदेशी टीवी चैनल के कवरेज की जानकारी देते हुए सवाल खड़ा करते हैं कि सरकार और प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं?

    टेलिविजन के नव पपाराजियों की धुलाई को सुरेश सही मानते हैं - जिससे इत्तेफ़ाक नहीं रखा जा सकता - क्योंकि, फिर, ये भी तो एक तरह की तालिबानी विचारधारा ही हुई. ममता को टीवी पर ऐशअभि की अधिकता से बदहजमी हो गई. सर्वेश ऐशअभि शादी के दौरान दिखाए गए हया उर्फ जाह्नवी के नाटक को टीवी चैनलों के टीआरपी की ललक से जोड़कर सवाल खड़े कर रहे हैं. हर्षवर्धन बालाजी भगवान के दरबार में बिग बी भगवान के हाजिरी की कहानी बताते हुए टीवी भक्तों की भी बातें बता रहे हैं. दीपक, मीडिया के उस शोर को यह कह कर खारिज करते हैं - ‘जिन पर माया का वरद हस्त, उनको मिलना ही चाहिए दर्शन का पहला हक.' रियाज़ भी व्यथित हैं कि जब भारत का मीडिया बाज़ार के दो देवताओं की एक आडंबरपूर्ण शादी के पीछे पगलाया हुआ था तब किसी ने एलेन जांस्टन के बारे में पूछा भी नहीं. उमाशंकर तो सीधे-सीधे टीवी संपादकों को मदारी की श्रेणी का मानने के लिए कुछ अकाट्य तर्क दे रहे हैं.


    और, अब चिट्ठाचर्चा पाठकों से कुछ सवाल -

    अंकुर दुविधा में है. क्या आप उसकी मदद कर सकते हैं? दीपक को बताएं कि सौंदर्य-बोध दिल से होता है या फिर नज़रों से? विकास का स्थायी भाव क्या है? ज्ञानदत्त की असली खुशी की दस कुंजियाँ क्या हैं? काकेश किसके आदेश पर काक-वाणी प्रसारित कर रहे हैं? कमल किसे तो हीरो और किसे मालामाल बना रहे हैं? चतुर्भुज को बताएँ कि क्या मनुष्य पशु-पक्षियों के बराबर पहुंच गया है? यूनुस को समझाएँ कि मुम्बई, मुम्बई है या महज़ एक बड़ा कूड़ाघर? चन्द्रशेखरन को यह स्पष्ट किया जाए कि किसान सो रहे हैं या जाग रहे हैं?

    चलते चलते -

    एक दोहा:

    लिखता है तो बिकना सीख

    नहीं तो भूखा रहना सीख

    एक शेर-

    अब नहीं काफी महज़ आलोचना

    आग कलमों को उगलना चाहिए

    एक संस्मरण :

    लोग कह रहे हैं उसके जाने के बाद

    तू उदास और अकेला रह गया होगा

    मुझे कभी वक़्त ही नही मिला

    ना उदास होने का ना अकेले होने का ..

    और, अंत में -

    सुनील की खुशी से मनोरंजक बातचीत सुनें तरकश पर तथा सुनील के चिट्ठा- व्यक्तित्व पर नीलिमा द्वारा डाली गई एक शोध-परक दृष्टि यहाँ पढ़ें.

    चित्र : ऊपर दिया गया चित्र, ठोकरें खाने वाले किस चिट्ठे के बाजूपट्टी का हिस्सा है?

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    सोमवार, अप्रैल 16, 2007

    चिट्ठाकार कवि सम्मेलन



    ये सच नहीं है कि चिट्ठापाठकों द्वारा और चिट्ठाचर्चा में भी कविताओं को तरजीह नहीं दी जाती. ये क्या - देखिए तो, आज चिट्ठाचर्चा में धुंआधार कवि सम्मेलन हो रहा है -

    अनहद नाद

    मां सब कुछ कर सकती है

    रात-रात भर बिना पलक झपकाए जाग सकती है

    पूरा-पूरा दिन घर में खट सकती है

    धरती से ज्यादा धैर्य रख सकती है

    बर्फ़ से तेजी से पिघल सकती है.....

    हिन्द-युग्म

    माँ, क्या तुम्हारा कर्तव्य नहीं?

    ...तुम कहती हो,

    हर सवाल का जवाब है

    तुम्हारे पास...सच?

    जवाब दे पाओगी?

    कल, जब पूछा जायेगा...

    "दादी, पेड़ क्या होता है?....

    शब्द सृजन

    देख उजड़ती फसल को, रोता रहा किसान.

    बेटा पढ लिख कर गया, बन गया वो इंसान.

    देख उजडती फसल को, रोता रहा किसान.

    सारी उम्र चलाया हल, हर दिन जोते खेत.

    बूढा हल चालक हुआ, सूने हो गए खेत.

    दो बेटे थे खेलते इस आंगन की छांव.

    अब नहीं आते यहां नन्हें नन्हें पांव. ......

    हिन्द युग्म

    मिथ्या

    क्या है जीवन, क्या है लक्ष्य,

    क्या है इस जीवन का लक्ष्य,

    क्या है इन श्वासों का मतलब,

    क्या वह जीवन व्याख्या है?

    अजब है अचरज, अजब अचंभा,

    इस दुनिया का गोरखधंधा,

    जिस आयाम में रहता है,

    अनभिज्ञ उसी से रहता है,....

    हम भी हैं लाइन में

    प्यार की निष्ठाओं पर उठते सवालों के बीच रहता हूँ इस घर में

    शब्द ,जब मौन की धरातल पर सर पटक चुप हो जायें

    आस्था, जब विडम्बना की देहली पर दस्तक देने लगे

    गीली आँखों के कोने में कोई दर्द , बेलगाम पसरा हो

    तनहाइयां ,जब चीख के बोलना भूल जायें....

    दीपक बाबू कहिन

    अपने मौन से मैत्री कर लो

    मैं बोलूँ अपनी बात

    वह सुनते नज़र आते हैं

    कभी लगता है कि मुझे कुछ

    कहते देख रहे हैं

    पर गुनते नज़र नहीं आते

    मुझे नहीं लगता कि वह

    मेरा कहा सुन पाते हैं....

    घुघूती बासूती

    मेहरबानी मेरे दोस्त

    मेहरबानी मेरे दोस्त तूने मुझे उड़ना सिखा दिया,

    चाँद सितारों की सैर करा स्वर्ग दिखा दिया,

    सुनहरे सपनें दिखा मुझे प्यार करना सिखा दिया,

    तूने ही तो मुझे प्रेम सोमरस प्याला पिला दिया,

    जड़वत थी मैं अब तक तूने हिला दिया,

    मर मर कर जी रही थी, जी जी कर मरना सिखा दिया ।....


    राजीव रंजन प्रसाद

    शक

    तुम याद आये और हम खामोश हो गये

    पलकों पे रात उतरी, शबनम से रो गये

    सौ बार कत्ल हो कर जीना था फिर भी मुमकिन

    अश्कों के सौ समंदर पीना था फिर भी मुमकिन

    फटते ज़िगर में अंबर आ कर ठहर गया है

    टुकडे बटोर कर दिल सीना था फिर भी मुमकिन

    नफरत नें तेरे दिल को पत्थर बना दिया है

    सपनों नें तेरी आँखें देखीं की सो गये

    पलकों पे रात उतरी, शबनम से रो गये....

    ब्रह्मराक्षस का शिष्य

    ब्रह्मराक्षस का शिष्य

    बावड़ी की उन घनी गहराईयों में शून्य

    ब्रह्मराक्षस एक पैठा है ,

    व भीतर से उमड़ती गूँज की भी गूंज ,

    हड़्बड़ाहट- शब्द पागल से

    गहन अनुमानिता

    तन की मलिनता

    दूर करने के लिए, प्रतिपल

    पाप-छाया दूर करने के लिए, दिन-रात

    स्वच्छ करने -

    ब्रह्मराक्षस....

    कुछ लम्हे

    सपने..जो अक्सर टूट जाया करते हैं......

    खामोश शाम के साथ -साथ

    सपने भी चले आतें हैं।

    बिस्तर पर लेटते ही

    घेर लेते हैं मुझे

    और नोचने लगते है अपने पैने नाखूनो से ..

    जैसे चीटियों के झुंड में कोई मक्खी फंस गयी हो

    घर , कार, कम्प्यूटर, म्यूजिक सिस्टम, मोबाईल , महंगे कपड़े ,डांस पार्टी ,वगैरह -2

    मक्खी के शरीर से खून टपकने लगता है.....

    हिन्द-युग्म

    आओ जेहादियों

    साठ सालों से सभी नोचते आ रहे हैं,

    आ , तू भी आ

    आ ,मेरी पथराई निगाहों से पानी निचोड़ ले,

    ओ , धर्म के रखवाले,

    इंसानियत के ठेकेदार,

    इस जहां से

    मिटती मानवता की कहानी निचोड़ ले।....

    और, अंत में...

    कवि सम्मेलन के दौरान हिन्दी कवि का परिचय पढ़ा गया. आप भी अवश्य पढ़ लें.



    चित्र - क्या आप बता सकते हैं कि यह किस हिन्दी चिट्ठे से लिया गया है?

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    रविवार, अप्रैल 15, 2007

    मुग्‍धा नायिकाओं के देश में आइनों का व्‍यापारी

    अक्‍सर देखने में आता है कि विवेक और उन्‍माद चिट्ठाजगत में बारी बारी से आते हैं, ओर देखो अनचाहे ही मोहल्‍ला जिसे 'वी लव टू हेट' ही इसे तय करने लगा है। नहीं नहीं ये नही कि वह जब कहता है तब हम विवेकशील हो जाते हैं वरन ये कि जब वह विवेकशील होने का अवकाश देता है तो हम वैसा हो पाते हैं। खैर सारे बांचेय चिट्ठे यहॉं देखें, खुशकिस्‍मती से आज चारों ओर शांति कायम है हालांकि अभी अरुण अलविदा कह रहे हैं पर हम उम्‍मीद करते हैं कि वे यहीं रहेंगे। खुद मोहल्‍ले ने भी इस बार हिंदू मुसलमान का सवाल प्‍यार के बरक्‍स उठाया है, ठीक ही लगता है- मिंयॉं बीबी राजी तो भाड़ में जाए काजी। लेकिन शाम होते न होते उन्‍होंने इसे भी जोड़ दिया बजरंगियों से...... इनैं कितेक बेर कहली पर यू नी मान्‍नैं।
    पर चिट्ठाकारों ने नजरअंदाज करने की कला सीख ली है ओर विवादों के अनन्‍तर विवेक को विराम न देने की नीति अपनाई जा रही दिख रही है। कमल शर्मा की ओर से वैकल्पिक मीडिया के तौर पर रेडियो पर सूक्ष्‍म विचार-



    रेडियो एफएम के साथ 30 रुपए से लेकर 500 रुपए तक की हर रेंज में ईयर फोन के साथ मिलते हैं। दो पैंसिल सेल डाल लिए, और जुड़ गए देश, दुनिया से। यह आकाशवाणी है...या...बीबीसी की इस पहली सभा में आपका स्‍वागत है...। आया न मजा.... क्‍या खेत, क्‍या खलिहान, पशुओं का दूध निकालते हुए, उन्‍हें चराते हुए, शहर में दूध व सब्‍जी बेचने जाते हुए, साइकिल, मोटर साइकिल, बस, रेल, दुकान, नौकरी, कार ड्राइव करते हुए सब जगह समाचार, मनोरंजन वह भी 30 रुपए के रेडियो में..

    अन्‍य विवेकप्रधान विचारप्रधान पोस्‍टों मे ज्ञानदत्‍त पांडेय विकलांगता पर संवेदनशीलता की राय दे रहे हैं। दीपक भारतदीप का चिंतन में जलसंकट की ओर ध्‍यानाकर्षण है। छत्‍तीसगढ़ी नगाड़े के अनवरत स्‍वरों की सूचना सुनिए अंगारे पर। लचर भारतीय कूटनीति पर अफसोस मेरा कमजोर भारत शीर्षक पोस्‍ट में। उधर ममता को अझेल्‍य टीवी सीरीयल भी देख सकने की क्षमता पर गर्व है- जाओ आप भी समझाने की कोशिश कर देखो। मीडिया के गैर-जिम्‍मेदाराना व्‍यवहार पर रोष व्‍यक्‍त कर रहे हैं विप्‍लव। अच्‍छी चीजों की तारीफ की सलाह मिल रही है अपूर्व से। प्रियदर्शन बॉलीवुड की मौलिकता पर सवाल करते हैं, मौलिकता ही कहानी से जुड़ाव देती है।


    प्रेम करने की ललक, धोखा खाने की कसक, अकेले होने की तकलीफ, असहाय होने की कातरता, घुटने टेकने की मजबूरी, लड़ने की चाहत, तमाम उल्टे हालात के पार जाने का जज्बा- ये सब वो चीजें हैं जो दुनिया के किसी कोने में हो, उनमें हमारी परछाई होती हैं।


    वैसे ज्‍यादा विचार करना भी ठीक नहीं वायुदोष का इससे गहरा संबंध है- आई हैव नो क्‍लयू। और हॉं अनुराग मुस्‍कान कुत्‍तों के बहाने आदमियत पर एक बहस चला रहे हैं


    वैसे भी डॉगी आजकल बहुत पहुंच वाले हो गए हैं। इंसान जब से इंसान के लिए समस्या बना है तब से डॉगी समाधान बन गए हैं। डॉगी लोग को खतरा सूंघने की जिम्मेदारी देकर ही तो हम और आप आतंकवाद की तरफ से बेफिक्र हो लिए हैं। नतीजा यह कि इंसान अब इंसान से ज्यादा डॉगी पर भरोसा करता है।


    फुरसतिया अपने सुभाषितों के नए बंडल के साथ आए हैं और नायिका भेद में ब्‍लॉगर का स्‍थान निर्धारण कर रहे हैं-


    हर ब्लागर के अंदर एक अदद मुग्धा नायिका रहती है। जो अपनी खूबसूरती पर फिदा होती है। कोई नायिका किसी से भी पूछे- बताओ मैं कैसी लग रही हूं तो किसी के पास भी -बहुत अच्छी, खूबसूरत कहने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। ऐसे ही अगर कोई ब्लागर अपनी पोस्ट दिखाता है तो बहुत अच्छा लिखा है से कम कुछ नहीं सुनना चाहता है। अगर उसने सुन भी लिया तो इसके बाद निश्चित तौर पर वह आपके खिलाफ़ राशन पानी लेकर चढ़ जाता है

    चर्चा लिखे जाने तक 22 लोग टिप्‍पणी में इसे अच्‍छा बहुत अच्‍छा ही कह चुके थे, जिन्‍होंने इससे कम कहा है उनके साथ क्‍या होने वाला है अनूप बता चुके हैं :)

    हम खचेढ़ू चिंतामणि के अगले अंक में उत्‍साह पर विचार कर रहे हैं। और हॉं आज की बड़ी खबर है कि कल कि बड़ी खबर होगी हिंदी ब्‍लॉगिंग पर पहली कवर स्‍टोरी जन सत्‍ता में । इसी बात की तस्‍दीक बाद में खुद लेखिका ने नोटपैड पर की। एक और जोरदार खबर यह कि जाने अनजाने नए ब्‍लॉगर से एक प्रयोग हो गया कि एक ब्‍लैंक पोस्‍ट डल गई, टाईटल ये इशारा करता था कि चिट्ठाचर्चा है ( ड्यू भी थी....आखिरकार अब तक न हो सकी है) इस खाली पोस्‍ट को खूब हिट मिले और यह दिन भर की चौथी सबसे लोकप्रिय पोस्‍ट बन गई- अरे भई कुछ करो इस रेटिंग का।

    कुछ सूचनाएं भी हैं- मसलन ये कि अब हिंदी में ब्‍लॉगिंग हो सकती है....नहीं समझ आया न। जाकर देखो तब भी नहीं समझ आएगा। और जीतू लाएं हैं बिछुड़े लोगों को खोजने का तरीका। रवि रतलामी ने यह भी बताया कि दीवानापन उनके शहर भी पहुँच गया है। और है सूचना एक बड़ी शादी की। और चंद महत्‍वपूर्ण पुस्‍तकानुभव जो हमारी मानें तो जरूर पढ़े जाने की मांग करते हैं। घर से भागकर शादी करके कोई कैसा महसूस करता है या आवारा कुत्‍ते की मौत पर शहर कैसा महसूस करता है जाने अंकुर से। अविनाश नाराज न हों ये पहले ही कह दिया गया है।


    अब बातें कविताओं की-

    रीतेश की कविता का शीर्षक है न्‍यायप्रिय और सत्‍यनिष्‍ठ, शुभ्रा की कविता का शीर्षक है एक बुत-


    पहले होठों से मुस्कान छीनी
    फ़िर मन मस्तिष्क से विचार,
    फ़िर भावनाओं को दफ़न कर,
    उसे भावशून्य बना दिया गया
    अब वह एक शून्य था


    हरिहर ने टीसती रचना मेरी मर्जी शीर्षक से लिखी है। रमा द्विवेदी दो रचनाएं बेशुमार तन्‍हाइयाँ और एक और परीक्षा शीर्षक से लाईं हैं। बेजी की रचना से कुछ पंक्तियॉं


    तू कहे तो…
    इन बूँदों को...
    सागर से बढा दूँ मैं ...
    सावन में बरसा दूँ ...
    झरने में गिरा दूँ मैं ...
    सरगम की रागों में ...
    रंगों की महफ़िल में...
    आँछल के तारों में ...
    गोदी में छिपा दूँ मैं...


    इन सबके अलावा कुछ टेलीग्राम मार्का पोस्‍ट भी हैं। गद्य में भी और कविता में तो हैं ही।




    आज की तस्‍वीर आरंभ से

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    शुक्रवार, अप्रैल 13, 2007

    हिन्दू मुस्लिम खुदा और भारत

    यह खिलवाड़ है, जो कईयों के लिए खेल है. खिलाड़ी खेल रहे है अपना खेल. उकसा कर तमाशा देखना, फिर बदनाम करना. क्या बाहरी दुनियाँ क्या नेट-जगत, यही खिलवाड़ जारी है. क्या अब यह खिलवाड़ बन्द करेंगे?

    रवि रतलामी जी अपनी असहजता व्यक्त करने के लिए पहले ही इस विषय पर चिट्ठाचर्चा कर चुके है.
    तो अज्ञानी चिट्ठाकारों, अपने चिट्ठे की रेटिंग की, क्लिक दर की कुछ चिंता करो और अपने चिट्ठे को हरा रंग दो. या तो हरा हरा लिखो या चिट्ठे को केसरिया बाना पहनाओ.
    मगर सभ्य भाषा शायद समझ में नहीं आती, न ही उसके पीछे छीपा दर्द ही. रचनाजी इतनी दूःखी हुई है की उन्होने निर्दाष नारद को ही अलवीदा कहने का मन बना लिया. रचनाजी रणछोड़ मत बनीये.

    यह पहली बार हुआ है ऐसा तो नहीं, फिर से वही वही बाते एक विराम के बाद क्यों उठाई जा रही है? जहाँ कई लोग मोहल्ला पर इक्कठे हुए वहीं क्रिया की प्रतिक्रिया रूप गुटो में बटे दुसरे पक्ष पंगेबाज, ये क्या हो रहा, लोकमंच (जिसकी मरम्मत का काम जारी है) ने अपनी तरफ से मोर्चा सम्भाला. जब इस प्रकार के खिलवाड़ चल रहे होते है, तब अज्ञात टिप्पणीकार दोनो पक्षो पर ज्वनशील पदार्थ डाल आनन्द लेता रहता है तथा घूँघट में छीप नारद के कर्ता-धर्ताओं को नामर्द कहता है.

    इस कौलाहल में जो महत्वपूर्ण चिट्ठे टी.आर.पी. में पीछड़ गए उनका उल्लेख यहाँ आवश्यक हो रहा है. एक प्रविष्टी है अफ्लातुनजी द्वारा लिखी गई, मीडिया प्रसन्न, चिट्ठाकार सन्न
    इस माध्यम (चिट्ठाकारी) में सबसे जरूरी है पारदर्शिता । कहीं का ईंट और कहीं का रोड़ा जोड़ते वक्त यदि स्रोतों का जानबूझकर जिक्र न हो या अथवा किसी के अन्य स्थलों पर लिखे गये बयानों को ऐसे जोड़ देने से मानो वे बयान भी वहीं दिये गये हों बवेला ज्यादा होता है । ऐसे में चिट्ठालोक में विश्वसनीयता ज्यादा तेजी से लुप्त हो जाती है और लुप्त हो जाते हैं पाठक टेलिविजन, अखबार या रेडियो फोन कम्पनियों से व्यावसायिक सौदा तय कर के चाहे जितने पूर्व-निर्धारित, निश्चित
    विकल्पों वाले एस.एम.एस. प्राप्त कर लें और उन्हें फ़ीडबैक की संज्ञा दें , इन माध्यमों में संवाद मोटे तौर पर एकतरफा ही होता है । संजाल पर परस्पर होने वाले संवाद की श्रेष्ठता इन सब पर भारी है । ऐसे में अन्य माध्यमों द्वारा संजाल पर हाथ आजमाने को जरूर बढ़ावा दिया जायेगा ।

    फिर दिल्ली की राष्ट्रीय मीडिया हस्तियाँ अपने कारिन्दों को अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया समूहों की नकल करने के लिए प्रोत्साहित ही करेंगी अथवा नहीं ? क्योंकि कागजी घोड़ों से भी तेज होता है साइबर घोड़ा ।

    और आँखे खोलने के लिए प्रयाप्त दुसरी शुएब की प्रविष्टी, हिन्दू, मुसलिम भारत और खुदा.

    दो हाथ वाले, चार हाथ वाले, बगैर हाथ वाले और बगैर दिखाई देने वाले, क़बरों मे सोए हुए सूली पर लटके हुए हर किसम के ख़ुदा हमारे देश मे मौजूद हैं। आप जाओ यहां से, हम भारतीयों को किसी दूसरे ख़ुदा की ज़रूरत नहीं। हम भारती ख़ुद ख़ुदा हैं ख़ुद क़यामत मचाते हैं, ख़ुद लुटेरे हैं, ख़ुद फितनेबाज़ भी हैं, ख़ुद दंगा फसाद मचाते हैं, अपने फैसले हम ख़ुद करते हैं। हम भारती हैं अपनी मर्ज़ी के राजा हैं - आप जाओ यहां से, हमारा किसी भी ख़ुदा पर ईमान नहीं।

    मगर इन सब से दूर कहीं पंगेबाज ललकार रहा है, “डरते क्यूँ हो, कुछ तो बोलो...” और संत बना मोहल्ला लिखता है, “स्टोप हेट...बन्द करो यह नफरत”। शर्म करो यह तस्वीर दिखा कर आग में पानी डाल रहे हो या पेट्रोल? मीडिया के पेंतरे खुब आजमा रहे हो, कहीं और की तस्वीरे किसी और ही संदर्भ में दिखा कर नफरत फैलाना बन्द करो.

    बहुत हुआ, अब बन्द करो.

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    चिट्ठा चर्चा- एक और महिला चिट्ठाकार

    पिछले कुछ दिनों से गिरिराज जोशी के यहाँ नेट का कनेक्शन सही नहीं चल रहा और उसकी वजह से वे नियमित चर्चा नहीं कर पा रहे हैं। कई दिनों से तो उनकी कोई खोज खबर भी नहीं है। वैसे वे किसी काम में व्यस्त होते हैं तो चर्चा का जिम्मा मुझे सौंप देते हैं। कल मुझे भी याद नहीं रहा कि आज चर्चा का जिम्मा उनका है और उनकी अनुपस्थिती में मेरा। कल रात १० बजे ध्यान आया कि चर्चा लिखनी तो रह ही गई, अब क्या होगा?? ऐसे में मदद के लिये आई कोटा राजस्थान की डॉ गरिमा तिवारी! उन्होने कहा आप निश्चिंत हो घर जाईये आपका काम सुबह मिल जायेगा, और वाकई ऐसा हुआ भी जब सुबह आकर मेल चैक की तो गरिमाजी ने चर्चा कर मुझे मेल में भेज दी थी।
    डॉ गरिमा ने अभी जमा तीन चार पोस्ट ही लिखी है पर नारद पर पंजीकरण ना होने से किसी के नजर में नहीं आई। गरिमा परिचर्चा में सबसे सक्रिय सदस्यों में से एक हैं और बहुत सुन्दर कवितायें लिखती है।
    यहाँ से शुरु होती है डॉ गरिमा की लिखी चर्चा।

    आज कल महिला अधिकार के चर्चा हर मोड पर मिल जाते हैं उसी कडी मे कुछ नया जोडते हूए उन्मुक्त जी संजीदगी के साथ बता रहे है
    व्यक्ति' शब्द पर उठे विवाद पर सबसे पहला प्रकाशित निर्णय Chorlton Vs. Lings (१८६९) का है। इस केस में कानून में पुरूष शब्द का प्रयोग किया गया था। उस समय और इस समय भी, इंगलैंड में यह नियम था कि पुलिंग में, स्त्री लिंग भी शामिल है। इसके बावजूद यह प्रतिपादित किया कि स्त्रियां को वोट देने का अधिकार नहीं है। "
    तो यही आशीष जी पत्रकारिता पर निराश हो रहे हैं, पर और लोगो की हताशा को नही बल्कि अपने नाम कि तरह हिम्मत से नयी दिशा मे बढने के लिये अग्रसर भी हैं|
    लेकिन एक बात तो तय है कि अब पहले जैसी पत्रकारिता संभव नहीं है। अब तो जो है, इन्‍हीं के बीच में से रास्‍ता निकालना होगा। लेकिन हाथ पर हाथ रखकर बैठना भी सही नहीं है।

    इस सबके बीच महाशक्ति जी कहा चुप बैठने वाले हैं, ये समाजवाद पर शक्ति प्रहार कर रहे हैं.. देखिये कैसे! और रवि रतलामी जी तकनीक क्षेत्र मे नयी रोशनी दिखा रहे हैं.. आप खुद ही देखिये और जानिये मै किस तरफ इशारा कर रही हूँ!

    यहाँ तक गम्भीरता से पढते आये तो अब "मस्ती की बस्ती" मे भी गोता लगा लिया जाये... हाँ तो मस्ती के बस्ती मे गोता लगाते वक्त एक कथानक याद आ गया..." एक पंडित जी कहते थे, भईया हमरे ऑमलेट बनाना तो उमे प्याज मत डालना हम ब्राम्हण है ना" नही समझ मे आया ... तो देखिये... कैसे बनते है हम मह्त्वपूर्ण

    मान लीजिये किसी आनुवांशिक या अन्य कारण से - जिसमें आपका कोई दोष नहीं है, आप साढ़े छह फ़ुट के हो गये तो आप हो गये महत्वपूर्ण।
    कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि वे खाने में नमक नहीं लेते और पीने में शराब के अलावा कुछ नहीं लेते। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि दारू पी लेते हैं मगर चाय किसी हालत में नहीं पीते या वे अल्लमगल्लम सब कुछ खा लेते हैं मगर पालक नहीं खाते।

    और भी महत्वपूर्ण होने के कायदे कानून है.. पढिये और महत्वपूर्ण बनिये ...

    जनाब अब तक मस्ती के बस्ती मे ही घूम रहे हैं तो यथार्थ के दुनिया मे भी कदम रखिये... घबराईये नही जिन्दादिल अपूर्व कुलश्रेष्ठ आपका जिन्दादिली से स्वागत कर रहे हैं... आपको यथार्थ मे आसमान छूने के उपाय या यूँ कहिये कि रास्ता दिखा दिया चलना तो आपको है.. तो सैर कर ले आसमान का.. फिलहाल ब्लाग.. जब ये मंत्र जिन्दगी मे अपनायेंगे तो अपनी जिन्दगी मे भी|
    इसी जमीनी हकिकत को एक नया दर्जा भी मिल रहा है... कल्पना ही कहिये.. खुदा नहीं आता यहाँ.. आ जाये तो पहले यहा के पंडितो और मौलवियो पर शामत आ जाये... तब हम ईंसान बन के रहने लगे.. तब को धर्म के नाम पर दंगा ना हो... शूऐबजी कह रहे हैं
    शुक्र है आज हम भारतीयों के नौजवान बच्चे हर किसम की ज़ंजीरों से आज़ाद हैं - एक आज़ाद देश मे मज़े से सांस ले रहे हैं। और धर्मों की परवाह किए बगैर अपने देश की तरक्की मे सब एकसाथ जुटे हैं। माईक्रोसॉफ्ट, याहू, गूगल पंटागॉन और नासा दुनिया की हर तरक्की मे हमारे भारती बच्चे बराबर शामिल हैं। और आज हमारी नई पीढी के बच्चे शान से सीना तान कर कहते हैं: हम भारती हैं - कोई धर्म हमारे देश से बडा नहीं - और हम ना हिन्दू हैं ना मुस्लमान बल्कि अपने देश के ख़ुद ख़ुदा हैं।

    अब इतने भी संजीदा ना हो जाईये.. मनीषा जी एक मजेदार तथ्य ले कर आयी हैं .. गाँधीजी जहाँ कागज के टुकडे़ भी सँभाल के रखते थे.. अब हम भारतीय आपातकालीन स्थिती के लिये भी बचत नही कर रहे हैं... है ना मजेदार तथ्य.. वक्त के साथ सब कैसे बदलता है,तो मसिजीवी अपने एकालाप मे ही व्यस्त लग रहे हैं, और बिहारी बाबू नेताओं की समीक्षा मे लगे हूये है... पर क्या नेता जी समझ पायेंगे...??

    कमल शर्मा जी कर रहे हैं व्‍हर्लपूल इंडिया लिमिटेड कि समीक्षा... जानिये क्या होगा व्‍हर्लपूल का भविष्य। और चंद्र प्रकाश जी जो बताते है बात पते की आज खोल रहे हैं ढोल की पोल... देखिये..
    ढोल की पोल अपनी जगह.. पर मुहब्बत का दिया इन सब बाधाओ से दूर जलता रहता है.. उसे बुझाना का दम किसमे...
    वो कहते है ना.... प्यार मे ऐसी ताकत होती है कि पर्वत भी सर झुकाता है,कुछ ऐसा ही बताने कि कोशिश मे है रन्जू जी
    तुझे सोचा है इतना महसूस किया है रूह से
    कि बस अब तेरी जुदाई का भी हम पर कोई असर नही

    और योगेश जी अपने बदलते हूए गाँव की पीडा या यूं कहिये अपने प्यार को सम्भाल रहे हैं
    बीमारी तब से बढी जब पडे शहर के पांव.
    कितना बूढा हो गया वो मेरे वाला गांव.


    बदल गया है गाँव पर नही.. आज भी उसी पुराने ढकोसले पर चला रहे हैं हम, जो कहने को आधुनिकता का चोंगा भर बदला है, पर मन दिल दिमाग वही 40 साल पुराना... अगर ऐसा ना होता तो पंकज जी को उमर-प्रियंका के शादी पर हूये बवाल को लेकर यह लेख नही लिखना पडता
    उमर-प्रयंका अपने घर लौटना तो चाहते हैं उनके साथ पूरे देश और न्यायालय का समर्थन भी है, लेकिन उनके घर और समाज के सम्मान की चिंता करने वाले लोगों के बयान और तेवरों को देखकर उमर-प्रयंका के चेहरे पर उभरे भावों से तो ये नहीं लगता कि वे जल्द से जल्द अपने घर जाने को तैयार हो जाएँगे। अब उनके लिए ये तय करना वाकई मुश्किल है कि कौन उनका है कौन पराया।


    यहाँ तक की चर्चा की है गरिमा ने और आगे मैं कर रहा हूँ प्रतीक को हम चिट्ठा जगत कामदेव कहते हैं क्यों कि वे सबसे अच्छी अच्छी तस्वीरें लेकर आते हैं पर कल उनके साथ पंकज भाई को कामदेव बनने का भूत लग गया और दोनो ही मंदिरा बेदी के पीछे पड़ गए। और जहाँ प्रतीक अपने टाइमपास वाले चिट्ठे पर मंदिरा की Maxim में छपी तस्वीरों को बता रहे हैं तो पंकज बैंगाणी अपने स्तम्भ पर और सागर अपनी पसंदीदा अभिनेत्री की तस्वीरों को देखकर दोनों जगहों पर प्रलाप करते पाये गये.. हे मंदिरा तूने यह क्या किया..... लाहौल विला....

    आज की सबसे दुखद: खबर यह है कि चिट्ठाजगत में हो रहे विवादों से दुखी हो कर रचना बजाज जी ने चिट्ठा लिखना बंद करने का फैसला किया है जो हम सबके लिये वाकई आघात जनक है। रचना कहती है
    …..…..ज्यादातर इस तरह का लिखा जा रहा है कि एक चिट्ठा समझने के लिये कम से कम चार अन्य चिट्ठे पढने जरूरी हैं..हम आपके पास आते हैं तो परिचित नामों को ढूँढते ही रह जाते हैं….आप बिल्कुल हिन्दुस्तानी मीडिया की तरह हुए जा रहे हैं जिससे ऊब कर ही हम यहाँ आए थे…३० पेज के अखबार और चौबीसों घन्टे की खबर से परेशान होकर…मानो खबरों के बाहर जिन्दगी है ही नही….
    सब नये लेखकों (या शायद पुराने लेखक लेकिन नये चिट्ठाकार!)से भी कुछ न कुछ सीखने को मिलेगा ही..लेकिन फिलहाल जितना सीखा उतना ही काफी है..माना कि कम ज्ञान खतरनाक होता है लेकिन अत्यधिक ज्ञान शायद उससे भी ज्यादा खतरनाक!!
    हम आपका बोझ कम करना चाह्ते हैं, और अब से अपने ‘फेवरिट‘ की लिस्ट से ही नये पोस्ट देख लिया करेंगे.
    अपनी सेहत का खयाल रखियेगा, आजकल ओवर टाइम काम जो कर रहे हैं

    चिट्ठा चर्चा मंडल की तरफ से और अपनी तरफ से मैं रचनाजी से अनुरोध करना चाहता हूँ कि कृपया आप ऐसा ना करें। आप जो चिट्ठे ना पढ़ना चाहें ना पढ़ें पर कम से कम लिखना तो बंद ना करें। प्लीज रचना जी अपने निर्णय पर एक बार फिर से विचार करें।
    पंगेबाज, पंगे लेते लेते और गलियॊं और होहल्ले के मुकदमें को जनता की अदालत में सौंपने के बाद एक बहादुर बच्चे अंकित की बहादुरी को सलाम कर रहे हैं, वाकई उस छोटे से बच्चे अंकित की बहादुरी को मैं नमन करता हूँ।

    मोहिन्दर कुमार आज एक अच्छी गज़ल ले कर आये हैं और पूछ रहे हैं
    आज तक किसने किसी गुमशुदा
    अजनबी की शिनाखत की है
    कुछ के हिस्से में है जमीदोजी
    कुछ चिताओं पर चढ खाक में मिल जायेंगे
    हश्र हर एक को मालूम तो है लेकिन
    कब किसने ईमान पर चलने की जुर्रत की है


    एक दिन पहले तक हम तुम गंगू हैं.. हिन्दू नाहीं.. कहने वाले अभयजी आज माफी मांग रहे हैं कि
    हमारा एक ठो प्रस्ताव है.. जैसे बॉम्बे का नाम बदल कर मुम्बई किया गया है.. कलकत्ता का नाम बदल कर कोलकाता किया गया है..उसी तरज पर हम लोगो को चहिये कि हिन्दू का नाम बदल कर गंगू किया जाय.. टिप्पणी कर के सिगनेचर कैम्पेन में सहयोग कीजिये..


    हिन्द युग्म पर कवि मित्रों की महफिल बढ़ती जा रही है और अब रंजना भाटियाजी भी उस महफिल से हमें उनकी अपनी कवितायें और गज़लें पढ़ायेंगी। और इस कड़ी में उन्होने अपनी पहली गज़ल लिखी है..... जिसे मैं यहाँ लिख नहीं पा रहा हूँ आप खुद ही वहाँ जा कर पढ़िये

    साहब सलाम ... रमाशंकर जी आज महिला प्रशाषनिक अधिकारियों से पूछे जा रहे प्रश्नों से बड़े रोष में है। आज का दिन गज़लों के नाम रहा, एक और सुन्दर गज़ल प्रकाशित हुई है अन्तर्मन
    पर हम खड़े तकते रहे इन आशियानों पर क़हर
    ख्वाब सारे जल गए पर ना पड़ी उसकी नज़र
    दूसरों के दर्द को भी देख आंखें न हों नम
    ऐ ख़ुदा नाचीज़ को इस तू न दे ऐसा हुनर


    अनाम रह कर बेहूदा टिप्प्णीयाँ करने पर प्रमोद जी के रोष और कमल जी के उनका समर्थन करने पर काकेशजी अपनी बैचेनी कुछ यूं व्यक्त कर रहे हैं
    आज मैं बैचेन हूँ.. इसलिये नहीं की मेरी पिछली पोस्ट “निश:ब्द” की तरह पिट गयी.. इसलिये भी नहीं कि मुझे फिर से “नराई” लगने लगी … इसलिये भी नहीं कि मुझे किसी ‘कस्बे’ या ‘मौहल्ले’ में किसी ने हड़का दिया हो .. इसलिये भी नहीं कि मेरा किसी ‘पंगेबाज’ से पंगा हो गया हो .बल्कि इसलिये कि मुझे ‘नाम’ की चाह ना रखने वाले अनामों ,बेनामों का गालियां सुनना अच्छा नहीं लग रहा
    .
    काकेश अनाम रहने वालों को अच्छे अच्छे सुझाव भी दे रहे हैं मसलन
    आप अनाम-बेनाम-गुमनाम नहीं हो सकते लेकिन आप चाहें तो अनामचंद , बेनामदास या गुमनाम कुमार रख सकते हो . आजकल बाजों का भी बहुत महत्व है ( बहुत दूर दूर की देख लेते हैं ) तो आप चालबाज , तिकड़मबाज , दंगेबाज रख सकते हैं . यदि कोई नया सा नाम रखना हो तो फिर फंटूस , कवि कानपुरी , निंदक , चिंतक जैसे नाम रख लें . वैसे एक राज की बात बताऊं आप अपना नाम कोई स्त्रीलिंग में रख सकें तो बहुत अच्छा

    इसी विषय पर अनामदास भी कह रहे हैं कि
    अनाम लोगों के संदेश को नाम वालों के मुक़ाबले ज़रा ज़्यादा ग़ौर से सुनना चाहिए क्योंकि उसमें संदेश प्रमुख होता है न कि उसे भेजने वाला. गुप्त मतदान के महत्व को लोकतंत्र में रहने के कारण आप अच्छी तरह समझते हैं. अनाम लोग अक्सर जनभावनाओं के प्रतिनिधि होते हैं, टीवी पर जो आदमी कहता है कि 'महँगाई बहुत बढ़ गई है' वह अनाम ही होता है. गुप्त टिप्पणी करने वाले को एक आम मतदाता समझने में क्या कष्ट है?

    पोलियो की दवाई पर एक मुस्लिम समाज के कुछ लोगों द्वारा विरोध किये जाने पर पोलियो से अपाहिज हुए एक मुस्लिम की पर शैलेष भारतवासी एक मुसलमान की आत्मकथा को यूं व्यक्त कर रहे हैं
    अब्बा!
    काश!
    मैं दो घूँट पीकर
    नामर्द बन गया होता।

    अल्लाह उन सबको बुद्धि दे जो पोलियो की दवाई से अपने बच्चों को दूर रख कर अपने बच्चों के साथ देश का भविष्य भी बर्बाद करने पर तुले हैं।
    आज की तस्वीर हमेशा की भाँति डॉ सुनील दीपक जी के चिट्ठे छायाचित्रकार से।

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