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शनिवार, अगस्त 18, 2007
फक्त तुझ्याचसाठी
चर्चाकारः
Sanjay Tiwari
लो जी ब्लागवाणी का नया संस्करण. मराठी में. और यह संदेश है कि कृपया आमचा व्यापर करा. मेरे लिए तो बहुत मजा हो गया. मराठी भूल रहा था अब रवां हो जाएगा. और चिट्ठाचर्चा में जल्द ही मैं मराठी चिट्ठों को भी शामिल करना शुरू कर दूंगा.
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शनिवार, अगस्त 11, 2007
तो हो जाए एक चिट्ठा वर्कशाप?
चर्चाकारः
Sanjay Tiwari
ब्लागर मीट तो होती रहती है. क्यों न एक वर्कशाप की जाए? ऐसे नये चिट्ठाकारों को एक जगह ले आया जाए जहां पुराने चिट्ठाकार उनकी समस्याओं का समाधान करें. तकनीकि पहलुओं पर आ रही समस्याओं का निदान करें. एकाध प्रेजेन्टेशन हो जाए. एक दिन का वर्कशाप हो तो कैसा रहेगा?
केवल अच्छा विचार कहने से बात नहीं बनेगी. अपना सुझाव दीजिए और क्या सहयोग कर सकते हैं, यह भी बताईये.
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बुधवार, अगस्त 01, 2007
नये फुरसतिया का जन्म
चर्चाकारः
Sanjay Tiwari
आज अक्षरग्राम में आलोक ने गणितीय गणना कर बताया है कि किस तरह हिन्दी चिट्ठे लगातार बढ़ रहे हैं. सक्रिय चिट्ठाकारों की संख्या में भी अच्छी खासी बढ़ोत्तरी हुई है. अभी तक न पढ़ा हो तो यहां से वहां तक का सफर हो सकता है. पाठकों की आवाजाही के बारे में जानना हो तो विपुल बता रहे हैं कि चिट्ठाजगत पर आवाजाही कैसे बढ़ी है.
दोनों ओर से अच्छे संकेत मिल रहे हैं. लेकिन यह खबर तो आप पढ़िये ही. मैं चर्चा किसी और कारण से कर रहा हूं. एक नये फुरसतिया का जन्म हुआ है. नहीं समझे? भइया/बहिनों वर्डप्रेस पर एक नया ब्लाग दिख रहा है. नाम है फुरसतिया. प्रथम दृष्टया ये कानपुरी फुरसतिया तो लगते नहीं. लेकिन हैं कौन अपनी पहचान भी नहीं छोड़ गये हैं. नये चिट्ठाकार हैं. इसलिए इस चर्चा में शामिल हो गये हैं. कुछ और नये चिट्ठाकार जो इस महीने में सक्रिय दिखें वे इस तरह हैं-
1. किश्तों की जिन्दगी
2. विनीत उत्पल
3. हिन्दी टीवी मीडिया
4. निस्मार्ग
5. सूर्य आत्मा
6. उम्दा सोच
7. आयुर्वेद
8. बेस्ट आफ हिन्दी
इसके अलावा भी बहुत से नये चिट्ठे बने हैं जैसा कि आलोक जी अपने विश्लेषण में बता रहे हैं. मैं तो मुश्किल से आठ-नौ ही खोज पाया. आपकी नजर में कोई आया हो तो अपनी टिप्पणी के साथ उसका नाम जोड़ सकते हैं.
दोनों ओर से अच्छे संकेत मिल रहे हैं. लेकिन यह खबर तो आप पढ़िये ही. मैं चर्चा किसी और कारण से कर रहा हूं. एक नये फुरसतिया का जन्म हुआ है. नहीं समझे? भइया/बहिनों वर्डप्रेस पर एक नया ब्लाग दिख रहा है. नाम है फुरसतिया. प्रथम दृष्टया ये कानपुरी फुरसतिया तो लगते नहीं. लेकिन हैं कौन अपनी पहचान भी नहीं छोड़ गये हैं. नये चिट्ठाकार हैं. इसलिए इस चर्चा में शामिल हो गये हैं. कुछ और नये चिट्ठाकार जो इस महीने में सक्रिय दिखें वे इस तरह हैं-
1. किश्तों की जिन्दगी
2. विनीत उत्पल
3. हिन्दी टीवी मीडिया
4. निस्मार्ग
5. सूर्य आत्मा
6. उम्दा सोच
7. आयुर्वेद
8. बेस्ट आफ हिन्दी
इसके अलावा भी बहुत से नये चिट्ठे बने हैं जैसा कि आलोक जी अपने विश्लेषण में बता रहे हैं. मैं तो मुश्किल से आठ-नौ ही खोज पाया. आपकी नजर में कोई आया हो तो अपनी टिप्पणी के साथ उसका नाम जोड़ सकते हैं.
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मंगलवार, जुलाई 31, 2007
ये क्या कर रहे हो चिट्ठाकारों
चर्चाकारः
Sanjay Tiwari
यहां मैं एक सवाल उठा रहा हूं. किसी को नाराज करने के लिए नहीं सिर्फ सवाल करने के लिए सवाल उठा रहा हूं.
विभिन्न एग्रीगेटरों पर हाल में जो शीर्षक मुझे दिखे हैं उनमें से कुछ नीचे मैं दे रहा हूं, आप भी पढ़िये-
HONEST BORE VRS SINGAPORE SHOPPERS
maiN bujh gayaa to hamesha ko bujh hi jaaungaa...
DATING VERSUS DATES OF BILLS
Discussion
Colourful paintings - रँग बिरँगी तस्वीरें - Quadri colorati
HONEST BORE VRS SINGAPORE SHOPPERS
O PIYAA
Daily Links
New Posts for July 30, 2007 and July 31, 2007
अब आप बताईये यह सब क्या हो रहा है? क्या यह हिन्दी चिट्ठाकारी के लिहाज से ठीक है? एक तरफ हमारे आलोक भैया हैं नई-नई हिन्दी शब्दावली का श्रृजन करते रहते हैं. अब देखिए आज ही उनकी पोस्ट आयी है शब्दकोष गूगल पट्टी में. और दूसरी तरफ वे लोग भी हैं जिन्हें हिन्दी में शीर्षक देने से भी परहेज हो रहा है.
हम ऐसा क्यों कर रहे हैं?
विभिन्न एग्रीगेटरों पर हाल में जो शीर्षक मुझे दिखे हैं उनमें से कुछ नीचे मैं दे रहा हूं, आप भी पढ़िये-
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Colourful paintings - रँग बिरँगी तस्वीरें - Quadri colorati
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अब आप बताईये यह सब क्या हो रहा है? क्या यह हिन्दी चिट्ठाकारी के लिहाज से ठीक है? एक तरफ हमारे आलोक भैया हैं नई-नई हिन्दी शब्दावली का श्रृजन करते रहते हैं. अब देखिए आज ही उनकी पोस्ट आयी है शब्दकोष गूगल पट्टी में. और दूसरी तरफ वे लोग भी हैं जिन्हें हिन्दी में शीर्षक देने से भी परहेज हो रहा है.
हम ऐसा क्यों कर रहे हैं?
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शुक्रवार, जुलाई 20, 2007
एक अलिंकित चर्चा
चर्चाकारः
Sanjay Tiwari
महाशक्ति पर प्रमेन्द्र प्रताप सिंह लिखते हैं " कुछ दिनों पूर्व देखने में आया था कि कुछ चिट्ठाकारों के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से महाशक्ति का बहिस्कार किया जा रहा था और इसकी छाप निश्चित रूप से चिट्ठाचर्चा पर दिखती है।"
तो लिंकित मन की एक पोस्ट पर जगदीश भाटिया टिप्पड़ी करते हैं "यहां यह देखना भी जरूरी होगा कि चिट्ठाचर्चा न होने से भी क्या पाठकों में कमी आयी है? इससे मेरी इस भावना को बल मिलेगा कि आने वाले समय में एग्रीगेटरों से ज्यादा चिट्ठाचर्चा का महत्व होगा।"
दोनों ही बातों का केन्द्रीयभाव यह है कि चिट्ठाचर्चा नियमित हो, निष्पक्ष हो, शसक्त हो और सर्वसमावेशक हो. पहले तो मैं प्रमेन्द्र से क्षमाप्रर्थी हूं कि अपनी पिछली दो चर्चाओं के दौरान मैं उनका उल्लेख नहीं कर सका. यह मेरी नासमझी और नादानी है. और संयोग कहें या दुर्योग कि मसिजीवी की चर्चा के बाद लगातार दो चर्चाएं मैंने ही की हैं. इस दौर में कोई नाराज होता है तो इसकी सारी जिम्मेदारी मेरी है. हो सके तो मुझे माफ कर देना प्रमेन्द्र और उन सभी से मैं क्षमा चाहता हूं जिनके चिट्ठों का उल्लेख मैं नहीं कर सका.
हिन्दी चिट्ठासंसार कई मायनों में अनोखा है. यहां दिल की जुबान बोली जाती है. शायद इसीलिए रूठने-मनाने का एक अंतहीन सिलसिला चलता ही रहता है. मानों कोई गृहस्थी है. एक तरफ से सम्भारो तो दूसरी ओर से दरकने लगती है. दूसरी ओर सम्हारो तो तीसरा कोना भसकने लगता है. और यह सब होते हुए भी कोई गृहस्थी का त्याग नहीं करता. शायद इसीलिए गृहस्थी अन्य तीन आश्रमों (ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ, सन्यास) से श्रेष्ठ है.
यह आत्मीयता का परिचायक है. अहिंसा का जन्म इसी भाव से होता है और भारतीय परिवार में इसकी ट्रेनिंग जन्मजात होती है. मां ने खाने में देर की तो रूठकर बैठ गये. बाप ने कोई मांग पूरी नहीं की रूठकर घर से चार कदम दूर जा खड़े हुए. हम इसकी परिभाषा भले न कर पायें लेकिन हम जानते हैं कि अन्न का दाना मेरे पेट में नहीं जाएगा लेकिन तड़प उसे होगी. और अपनेपने का यही भाव हमारे सत्याग्रह का आधार बन जाता है.
यह सत्याग्रह चलता रहे. और केवल गलबहियां ही क्यों कभी मन करे तो तकरार के गरारे का भी आनंद लिया जा सकता है. आखिर हम सबके अंदर शिशुवत कोमल हृदय तो है ही. इष्टदेव की एक कविता इन भावों को ज्यादा सटीकता से बयां करती है कि -
न डरना शेर की दहाड़ से
और बकरी के मिमियाने से डर जाना.
गिर पड़ना आंगन में ठुमकते हुए,
हौसला रखना फिर भी एवरेस्ट के शिखरों पर फतह की.
न समझ पाना छोटी-छोटी बातें और
बेझिझक सुझाना बेहद मुश्किल मसलों के हल.
सूखे हुए पौधों वाले गमलों में डालना पानी,
नोच लेना नए बौर.
रूठ जाना बेबात
और फिर न मानना किसी के मनाने से.
खुश हो जाना ऐसे ही किसी बात से.
डूब जाना किसी भी सोच में,
वैसे बिल्कुल न समझना
दादी किसकी चिन्ता करती हैं बेकार,
दादा क्या सोचते रहते हैं लगातार?
आखिर में एक बात कहे देता हूं, कान खोलकर सुन लो, जाने की बात कभी न करना कोई भी. यहां से जाएं आपके दुश्मन.
क्या कहा?
कौन?
दुश्मन नंबर एक मैं ही हूं....
तो ठीक है यह लो अपनी लकुटि कमरिया, मैं तो चला... नमस्ते...
तो लिंकित मन की एक पोस्ट पर जगदीश भाटिया टिप्पड़ी करते हैं "यहां यह देखना भी जरूरी होगा कि चिट्ठाचर्चा न होने से भी क्या पाठकों में कमी आयी है? इससे मेरी इस भावना को बल मिलेगा कि आने वाले समय में एग्रीगेटरों से ज्यादा चिट्ठाचर्चा का महत्व होगा।"
दोनों ही बातों का केन्द्रीयभाव यह है कि चिट्ठाचर्चा नियमित हो, निष्पक्ष हो, शसक्त हो और सर्वसमावेशक हो. पहले तो मैं प्रमेन्द्र से क्षमाप्रर्थी हूं कि अपनी पिछली दो चर्चाओं के दौरान मैं उनका उल्लेख नहीं कर सका. यह मेरी नासमझी और नादानी है. और संयोग कहें या दुर्योग कि मसिजीवी की चर्चा के बाद लगातार दो चर्चाएं मैंने ही की हैं. इस दौर में कोई नाराज होता है तो इसकी सारी जिम्मेदारी मेरी है. हो सके तो मुझे माफ कर देना प्रमेन्द्र और उन सभी से मैं क्षमा चाहता हूं जिनके चिट्ठों का उल्लेख मैं नहीं कर सका.
हिन्दी चिट्ठासंसार कई मायनों में अनोखा है. यहां दिल की जुबान बोली जाती है. शायद इसीलिए रूठने-मनाने का एक अंतहीन सिलसिला चलता ही रहता है. मानों कोई गृहस्थी है. एक तरफ से सम्भारो तो दूसरी ओर से दरकने लगती है. दूसरी ओर सम्हारो तो तीसरा कोना भसकने लगता है. और यह सब होते हुए भी कोई गृहस्थी का त्याग नहीं करता. शायद इसीलिए गृहस्थी अन्य तीन आश्रमों (ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ, सन्यास) से श्रेष्ठ है.
यह आत्मीयता का परिचायक है. अहिंसा का जन्म इसी भाव से होता है और भारतीय परिवार में इसकी ट्रेनिंग जन्मजात होती है. मां ने खाने में देर की तो रूठकर बैठ गये. बाप ने कोई मांग पूरी नहीं की रूठकर घर से चार कदम दूर जा खड़े हुए. हम इसकी परिभाषा भले न कर पायें लेकिन हम जानते हैं कि अन्न का दाना मेरे पेट में नहीं जाएगा लेकिन तड़प उसे होगी. और अपनेपने का यही भाव हमारे सत्याग्रह का आधार बन जाता है.
यह सत्याग्रह चलता रहे. और केवल गलबहियां ही क्यों कभी मन करे तो तकरार के गरारे का भी आनंद लिया जा सकता है. आखिर हम सबके अंदर शिशुवत कोमल हृदय तो है ही. इष्टदेव की एक कविता इन भावों को ज्यादा सटीकता से बयां करती है कि -
न डरना शेर की दहाड़ से
और बकरी के मिमियाने से डर जाना.
गिर पड़ना आंगन में ठुमकते हुए,
हौसला रखना फिर भी एवरेस्ट के शिखरों पर फतह की.
न समझ पाना छोटी-छोटी बातें और
बेझिझक सुझाना बेहद मुश्किल मसलों के हल.
सूखे हुए पौधों वाले गमलों में डालना पानी,
नोच लेना नए बौर.
रूठ जाना बेबात
और फिर न मानना किसी के मनाने से.
खुश हो जाना ऐसे ही किसी बात से.
डूब जाना किसी भी सोच में,
वैसे बिल्कुल न समझना
दादी किसकी चिन्ता करती हैं बेकार,
दादा क्या सोचते रहते हैं लगातार?
आखिर में एक बात कहे देता हूं, कान खोलकर सुन लो, जाने की बात कभी न करना कोई भी. यहां से जाएं आपके दुश्मन.
क्या कहा?
कौन?
दुश्मन नंबर एक मैं ही हूं....
तो ठीक है यह लो अपनी लकुटि कमरिया, मैं तो चला... नमस्ते...
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सोमवार, जुलाई 16, 2007
भोज-भात और साधुवाद
चर्चाकारः
Sanjay Tiwari
हिन्दी ब्लागिंग में साधुवाद का युग बीत गया इसलिए मैं आतंकवादी बनना चाहता हूं. मुझे इस ढांढस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि क्या साधुवाद का कोई युग होता है. मैं और मेरी चिट्ठाकारी अक्सर ये बाते करते हैं कि काश ऐसा होता तो कैसा होता, काश वैसा होता तो कैसा होता? क्या खाक होता. सब बेहतर हो रहा है लेकिन जिन्दगी बेहतर नहीं हो रही है. और इसी बेहतरी की खोज में मैं जा गिरा एक दिन अष्टधातु के कुंए में. देखा वहां मेरी टिप्पड़ियों के खिलाफ एक लंबी टिप्पड़ी रखी हुई थी. मैं वापस आ गया फिर से अपनी चिट्ठाकारी की दुनिया में, ढाई आखर प्रेम का लिखने.
अब मैं हे दुखभंजन, मारूति नंदन का जाप करूंगा. हनुमान जी से प्रार्थना करूंगा हे भगवान यहां कोई गांधी जी की धोती न खींचे. इसके बाद भी जो अपनी आदत से बाज नहीं आयेगा उसके लिए सलवा-जुड़ूम की वेबसाईट शुरू हो गयी है. वैसे चिट्ठाकारों के लिए यमदूत का भी आभिर्भाव हो गया है. मुश्किल समय है, चिट्ठाकारों. ढाई आखर प्रेम के सांवरे कब समझोगे तुम. वाली कहावत अब हलक के नीचे उतारना ही पड़ेगा. नहीं तो वे भी कह देंगे कि हर एक बात पर कहते हो कि तू क्या है.
अरे हिन्दीसेवा वाली बात तो भूल ही गये. तो मेरी एक विनती है कि प्लीज हिन्दी की सेवा मत करिए.
न्यूयार्क में जो लोग बैठे हैं वे घर की मुर्गी को विश्वमंच पर प्रतिष्ठित करेंगे. यह भी स्थापित सत्य है कि जैसे घर की रक्षा कुलीन स्त्री से होती है. वैसे ही समाज की रक्षा भाषा से होती है. यह लेख नहीं है, विचार भी नहीं है फिर क्या है? (अन्यथा न लें, खादिम की सीआरपी का मामला हैं.) राखी ने कपड़े उतारे तो आधा देश उधर को हो लिया है. फिलहाल मैं उधर को नहीं जा रहा हूं. मैं उधर को जा रहा हूं जहां खुशी बटोरने का एटीएम लगाया जा रहा है. इसके बाद उस भोज-भात का बचा-खुचा बटोरने पहुंच जाऊंगा जहां कल मसालेदार अरवी भी परोसी गयी थी.
क्या कहा, ज्ञान बघारने के चक्कर में चर्चा टर्चा हो गयी. तो चलिए चार दोस्तों को इकट्ठा कर समवेत स्वर में कहते हैं -
संजय तिवारी शेम शेम
अब मैं हे दुखभंजन, मारूति नंदन का जाप करूंगा. हनुमान जी से प्रार्थना करूंगा हे भगवान यहां कोई गांधी जी की धोती न खींचे. इसके बाद भी जो अपनी आदत से बाज नहीं आयेगा उसके लिए सलवा-जुड़ूम की वेबसाईट शुरू हो गयी है. वैसे चिट्ठाकारों के लिए यमदूत का भी आभिर्भाव हो गया है. मुश्किल समय है, चिट्ठाकारों. ढाई आखर प्रेम के सांवरे कब समझोगे तुम. वाली कहावत अब हलक के नीचे उतारना ही पड़ेगा. नहीं तो वे भी कह देंगे कि हर एक बात पर कहते हो कि तू क्या है.
अरे हिन्दीसेवा वाली बात तो भूल ही गये. तो मेरी एक विनती है कि प्लीज हिन्दी की सेवा मत करिए.
न्यूयार्क में जो लोग बैठे हैं वे घर की मुर्गी को विश्वमंच पर प्रतिष्ठित करेंगे. यह भी स्थापित सत्य है कि जैसे घर की रक्षा कुलीन स्त्री से होती है. वैसे ही समाज की रक्षा भाषा से होती है. यह लेख नहीं है, विचार भी नहीं है फिर क्या है? (अन्यथा न लें, खादिम की सीआरपी का मामला हैं.) राखी ने कपड़े उतारे तो आधा देश उधर को हो लिया है. फिलहाल मैं उधर को नहीं जा रहा हूं. मैं उधर को जा रहा हूं जहां खुशी बटोरने का एटीएम लगाया जा रहा है. इसके बाद उस भोज-भात का बचा-खुचा बटोरने पहुंच जाऊंगा जहां कल मसालेदार अरवी भी परोसी गयी थी.
क्या कहा, ज्ञान बघारने के चक्कर में चर्चा टर्चा हो गयी. तो चलिए चार दोस्तों को इकट्ठा कर समवेत स्वर में कहते हैं -
संजय तिवारी शेम शेम
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मंगलवार, जुलाई 10, 2007
खादिम, सारा दिन
चर्चाकारः
Sanjay Tiwari
राकेश जी की संक्षिप्त चर्चा के बाद, अब एक अति संक्षिप्त चर्चा.
तो सत्ते की तिकड़ी बीत जाने के बाद भी संसार कायम है इसलिए अध्याय वहां से शुरू करते हैं जहां शास्त्री जे सी फिलिप की दक्षता पर रश्क किया गया. और इस रश्क पर मुश्क यह कि जे सी फिलिप किताब लिखेंगे. अपनी तरह लोगों को भी सक्रिय बना देंगे. फिर चिट्ठाजगत के सक्रियता क्रमांक का क्या होगा? कुछ नहीं होगा. हिन्दी हैं, हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा. अब कोई सवाल उठाये कि क्या हिन्दी के चिट्ठाकार बेकार की चर्चा ज्यादा करते हैं तो जवाब भी वहीं मिलता है- सही है. यह मूल्यवान टिप्पड़ी किसकी हो सकती है, अंदाज लगाईये...... मैंने तो समीरलाल नाम लिया नहीं, आप हर बात के लिए नाहक ही उनपर शक करते हैं. आजकल उनका कार्य बड़े-बड़े आकार ले रहा है. उनको फुर्सत कहां है.
सक्रियता बढ़ी है यह बात सारे पैरामीटर कह रहे हैं. विषयों का विस्तार हुआ है विविधता भी आयी है. किसी ने रपट तैयार की कि ताज के नाम पर देश लुटा तो किसी ने कहा ताज को वोट न देकर क्या तीर मार लिया. बाकी ताज चर्चा के सारे लिंक यहीं मिल जाएंगे. हम क्यों टाईम खोटी करें? वैसे ताज चर्चा से मितली आये और थकान का अहसास हो तो ननिहाल में गरमी की छुट्टियां बिता आइये. क्या कहा, आप नहीं जाना चाहते? यहीं खाट बिछाकर लेटेंगे, बैठेंगे, आराम करेंगे. जरूर करिए. मुझे तो ड्यूटी पूरी करनी है इसलिए आगे चलता हूं.
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर नहीं रहे. चिट्ठाकारों ने अपने-अपने स्तर पर श्रद्धांजली दी. किसी ने उन्हें असहमति की राजनीति में मुखर आवाज कहा तो किसी ने कहा कि उन्हें गुजरात के फाफड़े बहुत पसंद थे. उनके जाने से संसद की सबसे मुखर आवाज खामोश हो गयी है. चंद्रशेखर जी को हमसभी ब्लागरों की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि.
वैसे इसी आपदकाल में एक आवाज कलकत्ते से मुखर हुई है. उस आवाज ने कहा है कि फुरसतिया जी वहां गये थे, लेकिन जो लौटे वे फुरसतिया नहीं थे. फिर कौन थे? आना फुरसतिया का, जाना एक मित्र का. वैसे राजस्थानवाले भैया ने भी सूचना भेज दी है कि वे फिर आ गये हैं? बड़े दिनों बाद महाशय भी जगह-जगह टिप्पड़ी करते पाये जा रहे हैं. उम्मीद है जल्द ही इनके लेख भी आने शुरू हो जाएंगे. क्या कहा इस विरह पर कविता हो जाए. तो लीजिए दो पंक्तियां इनके चिट्ठे से हाजिर हैं-
नज़रें थक गई, आँखें भर आई।
पर फीर भी वह नज़र न आई॥
कविता में वर्तनी दोष ढूंढ लिया. भाई इसे तो मैंने जस का तस रख दिया है. वैसे हिमाचल में बारिश से जनजीवन अस्त-व्यस्त है इसलिए घूम-फिर कर लौट आये ब्लागरों से अनुरोध है कि हिमाचल न जाएं, बल्कि यहीं से एक दक्ष पत्रकार की तरह समीक्षा करते रहें. फिलहाल चिट्ठाजगत में स्वस्थ बहस का सक्रिय विषय है पूजा का प्रतिरोध फिल्मी है या वास्तविक?
आप बहस में हिस्सा लीजिए, मैं तो चला चंदा जुटाने. मुझे टिप्पड़ियां जो खरीदनी है.
एक मिनट
कौन बोला?
क्या?
पंगेबाज का नाम क्यों नहीं लिया?
अच्छा. बहुत पंगेबाजी करते हो. वह पंगेबाज तो तुम फंदेबाज.
कुछ भी कर लिया जाए ये सुधरनेवाले नहीं है.
तो सत्ते की तिकड़ी बीत जाने के बाद भी संसार कायम है इसलिए अध्याय वहां से शुरू करते हैं जहां शास्त्री जे सी फिलिप की दक्षता पर रश्क किया गया. और इस रश्क पर मुश्क यह कि जे सी फिलिप किताब लिखेंगे. अपनी तरह लोगों को भी सक्रिय बना देंगे. फिर चिट्ठाजगत के सक्रियता क्रमांक का क्या होगा? कुछ नहीं होगा. हिन्दी हैं, हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा. अब कोई सवाल उठाये कि क्या हिन्दी के चिट्ठाकार बेकार की चर्चा ज्यादा करते हैं तो जवाब भी वहीं मिलता है- सही है. यह मूल्यवान टिप्पड़ी किसकी हो सकती है, अंदाज लगाईये...... मैंने तो समीरलाल नाम लिया नहीं, आप हर बात के लिए नाहक ही उनपर शक करते हैं. आजकल उनका कार्य बड़े-बड़े आकार ले रहा है. उनको फुर्सत कहां है.
सक्रियता बढ़ी है यह बात सारे पैरामीटर कह रहे हैं. विषयों का विस्तार हुआ है विविधता भी आयी है. किसी ने रपट तैयार की कि ताज के नाम पर देश लुटा तो किसी ने कहा ताज को वोट न देकर क्या तीर मार लिया. बाकी ताज चर्चा के सारे लिंक यहीं मिल जाएंगे. हम क्यों टाईम खोटी करें? वैसे ताज चर्चा से मितली आये और थकान का अहसास हो तो ननिहाल में गरमी की छुट्टियां बिता आइये. क्या कहा, आप नहीं जाना चाहते? यहीं खाट बिछाकर लेटेंगे, बैठेंगे, आराम करेंगे. जरूर करिए. मुझे तो ड्यूटी पूरी करनी है इसलिए आगे चलता हूं.
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर नहीं रहे. चिट्ठाकारों ने अपने-अपने स्तर पर श्रद्धांजली दी. किसी ने उन्हें असहमति की राजनीति में मुखर आवाज कहा तो किसी ने कहा कि उन्हें गुजरात के फाफड़े बहुत पसंद थे. उनके जाने से संसद की सबसे मुखर आवाज खामोश हो गयी है. चंद्रशेखर जी को हमसभी ब्लागरों की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि.
वैसे इसी आपदकाल में एक आवाज कलकत्ते से मुखर हुई है. उस आवाज ने कहा है कि फुरसतिया जी वहां गये थे, लेकिन जो लौटे वे फुरसतिया नहीं थे. फिर कौन थे? आना फुरसतिया का, जाना एक मित्र का. वैसे राजस्थानवाले भैया ने भी सूचना भेज दी है कि वे फिर आ गये हैं? बड़े दिनों बाद महाशय भी जगह-जगह टिप्पड़ी करते पाये जा रहे हैं. उम्मीद है जल्द ही इनके लेख भी आने शुरू हो जाएंगे. क्या कहा इस विरह पर कविता हो जाए. तो लीजिए दो पंक्तियां इनके चिट्ठे से हाजिर हैं-
नज़रें थक गई, आँखें भर आई।
पर फीर भी वह नज़र न आई॥
कविता में वर्तनी दोष ढूंढ लिया. भाई इसे तो मैंने जस का तस रख दिया है. वैसे हिमाचल में बारिश से जनजीवन अस्त-व्यस्त है इसलिए घूम-फिर कर लौट आये ब्लागरों से अनुरोध है कि हिमाचल न जाएं, बल्कि यहीं से एक दक्ष पत्रकार की तरह समीक्षा करते रहें. फिलहाल चिट्ठाजगत में स्वस्थ बहस का सक्रिय विषय है पूजा का प्रतिरोध फिल्मी है या वास्तविक?
आप बहस में हिस्सा लीजिए, मैं तो चला चंदा जुटाने. मुझे टिप्पड़ियां जो खरीदनी है.
एक मिनट
कौन बोला?
क्या?
पंगेबाज का नाम क्यों नहीं लिया?
अच्छा. बहुत पंगेबाजी करते हो. वह पंगेबाज तो तुम फंदेबाज.
कुछ भी कर लिया जाए ये सुधरनेवाले नहीं है.
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