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मंगलवार, अगस्त 09, 2011
शुक्रवार, दिसंबर 31, 2010
"मी विनायक सेन बोलतो "
चर्चाकारः
डॉ .अनुराग
पूने के उस सभागार में हेयर ट्रांसप्लां टेशन का अपना पेपर प्रजेंट करने के बाद अपने प्रशंसको के बीच बैठे डॉ मेहता अचानक अपनी तारीफ सुनकर भावुक हो उठे है .".हम सब बहुत बौने लोग है जिनके आसमान की हदे बहुत छोटी है ..असली लड़ाई तो विनायक ने लड़ी है "....अमेरिका में सेटल्ड रोज लाखो रुपये कमाने वाले उस डॉक्टर के व्यक्तित्व का ये रूप मुझे चौका देता है ....डॉ विनायक सेन उनके सीनियर थे....वे तब भी उनके हीरो थे ...तब अपनी प्रतिभा के कारण.....
उनके गिलास को भरने के बाद मुझमे विनायक सेन को ओर जानने की उत्सुकता है ..पर वे एक ओर गेर पेशेवर स्टेट मेंट देते है ...."अब इस समाज में कोई क्रान्ति संभव नहीं है ..यहाँ कोई बैचेनी स्थायी नहीं रहती " कुछ झुके सर सिर्फ हूम हां करते है ....ओर पेशेवर टिप्स की तलाश में नज़दीक आये कुछ युवा आहिस्ता से उठने लगते है .
कौन है ये विनायक सेन ?जिसको चिकित्सको का एक तबका भी अपने जमीर की आखिरी नस्ल के तौर पे देखता है ....
पच्चीस साल पहले देश के प्रतिष्टित मेडिकल कोलेज से निकलने के बाद वे उस रास्ते को चुनते है जिस पर मै ओर आप अब भी चलने में हिचकते है .....उनका कर्तव्य प्रेमचंद के मन्त्र ओर कफ़न पर "उफ़ " करके ख़तम नहीं होता ...... वे उस समाज के भीतर उसकी बेहतरी के लिए घुसते है जिसके पास अपनी व्यथा कहने के लिए वो भाषा या औजार नहीं है जिससे सभ्य समाज तारतम्य बैठाता है ...या रुक कर समझने की कोशिश करता है ....तमाम प्रतिकूलताओ ओर सीमायों के बावजूद उनकी प्रतिबद्ता एक अजीब सी जीवटता लिए न केवल कायम रहती है ....बल्कि अपनी नैतिक स्म्रतियो को बेदखल नहीं होने देती .... वे अपनी उस जिम्मेदारी का निर्वाह करते है जिसका बॉस केवल उनका जमीर है ..........
प्रगतिशीलता के तमाम बुलडोज़रो के बीच अपनी बौद्धिक इमानदारी की आँख न मुंदने देने वाला इंसान जो अपने संशय ईमानदारी से रखता है ..... अचानक देशद्रोही कैसे हो गया ?मेरे लिए ये भी ये यक्ष प्रशन है
इस देशद्रोह को दिनेश राय द्रिवेदी डिफाइन करते है
आंकड़े बताते है इस देश की आबादी २०१५ में शायद सबसे ज्यादा हो जायेगी .आंकड़े ये भी बत्ताते है पिछले कुछ सालो में संसद में मौजूद हमारे सांसदों में करोडपति सांसदों की संख्या में तीस प्रतिशत का इजाफा हुआ है ......आंकड़े याद दिलाते है सात लाख नौकर शाहों के इस देश में देश चलाने वाले नेताओ में तकरीबन कुछ लोग ही ग्रेज्यू वेट है ....आंकड़े भी अजीब होते है ... पर आंकड़े ये नहीं बताते के देशभक्ति आनुवंशिक नहीं होती ......लोक संघर्ष ब्लॉग कुछ यूँ बताता है
...कुछ तटस्थताओ के लिए भी साहस चाहिए ..इस समाज के कई प्रवक्ता है ....कई स्वीकृत कई स्व घोषित .....जो सिद्धांतो की भी बड़ी तर्क पूर्ण व्याखाए देते है .....यूँ भी लिज़ लिजी देश भक्ति कभी कभी हमारे आदर्शो को भी धुंधला कर देती है ......विज़न को भी ...
हाशिया एक विस्तृत लेख लिखता है ...जिसके हर पहलु को गंभीरता से पढने की आवश्यकता है
.बैरंग भी अपनी प्रतिक्रिया देता है ...ये कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं है
डॉ सेन का जुर्म यह रहा कि उन्होने आदिवासियों के लिये काम करते हुए उनके अधिकारों की बात की, उन पर हो रहे जुल्मों का जिक्र किया। उन्होने हिंसा का हमेशा सख्त विरोध किया चाहे वह माओवादियों की हो या सरकारी बलों की! डॉ सेन पुलिस और पुलिस समर्थित गुटों द्वारा व्यापक पैमाने पर किये जा रहे भूमि-हरण, प्रताड़नाओं, बलात्कारों, हत्याओं को मीडिया की रोशनी मे लाये; पीडित तबके के लिये कानूनी लड़ाई मे शामिल हुए। उनका अपराध यह रहा कि वो उस ’पीपुल’स यूनियन फ़ॉर पब्लिक लिबर्टीज’ की छत्तीसगढ़ शाखा के सचिव रहे, जिसने मीडिया मे ’सलवा-जुडुम’ के सरकार-प्रायोजित अत्याचारों को सबसे पहले बेनकाब किया।
इतने गुनाह सरकार की नजर मे आपको कुसूरवार बनाने के लिये काफ़ी है। फिर तो औपचारिकता बाकी रह जाती है। इस लोकतांत्रिक देश की पुलिस ने पहले उन्हे बिना स्पष्ट आरोपों के महीनो जबरन हिरासत मे रखा। फिर कानूनी कार्यवाही का शातिर जाल बुना गया। सरकार तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी किसी हिंसात्मक गतिविधि मे संलग्नता को प्रमाणित नही कर पायी। सरकार के पास उनके माओवादियों से संबंध का कोई स्पष्ट साक्ष्य नही दे पायी। पुलिस का उनके खिलाफ़ सबसे संगीन आरोप यह था कि जेलबंद माओवादी कार्यकर्ता नरायन सान्याल के ख़तों को दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाने का काम उन्होने किया। मगर इस आरोप के पक्ष मे कोई तथ्यपरक सबूत पुलिस नही दे पायी। उनके खिलाफ़ बनाये केस की हास्यास्पदता का स्तर एक उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि सरकारी वकील अदालत मे उन पर यह आरोप लगाता है कि उनकी पत्नी इलिना सेन का ईमेल-व्यवहार ’आइ एस आइ’ से हुआ था। मगर बाद मे अदालत को पता चलता है कि यह आइ एस आइ कोई ’पाकिस्तानी एजेंसी’ नही वरन दिल्ली का सामाजिक-शोध संस्थान ’इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट’ था। फ़र्जी सबूतों और अप्रामाणिक आरोपों के द्वारा ही सही मगर पुलिस के द्वारा उनको शिकंजे मे लेने के पीछे अहम् वजह यह थी कि उनके पास तमाम पुलिसिया ज्यादतियों और फ़र्जी इन्काउंटर्स की तथ्यपरक जानकारियां थी जो सत्ता के लिये शर्म का सबब बन सकती थी।
उत्सव धर्मी इस समाज में साल के आखिरी दिन उम्मीदों ओर आशयो से इतर बिनायक सेन पर लिखना पढना शायद अजीब लगे पर उनकी मौजूदगी किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है ....ओर अपने भीतर सिमटे इस समाज के लिए भी .....वैचारिक असहमतिया ..उम्र कैद की हक़दार नहीं होती.....
सच मानिए आप शायद असहमत हो........पर वे मुझ ओर आपसे कई ज्यादा बड़े देशभक्त है
चाहूँगा कोई भी प्रतिक्रिया या विचार रखते वक़्त इस चर्चा ओर टिप्पणियों पर भी नज़र डाले .....
अरुंधति.....क्रान्ति....नक्सल वाद .आदिवासी ओर वेंटीलेटर पे ये देश
उनके गिलास को भरने के बाद मुझमे विनायक सेन को ओर जानने की उत्सुकता है ..पर वे एक ओर गेर पेशेवर स्टेट मेंट देते है ...."अब इस समाज में कोई क्रान्ति संभव नहीं है ..यहाँ कोई बैचेनी स्थायी नहीं रहती " कुछ झुके सर सिर्फ हूम हां करते है ....ओर पेशेवर टिप्स की तलाश में नज़दीक आये कुछ युवा आहिस्ता से उठने लगते है .
कौन है ये विनायक सेन ?जिसको चिकित्सको का एक तबका भी अपने जमीर की आखिरी नस्ल के तौर पे देखता है ....
पच्चीस साल पहले देश के प्रतिष्टित मेडिकल कोलेज से निकलने के बाद वे उस रास्ते को चुनते है जिस पर मै ओर आप अब भी चलने में हिचकते है .....उनका कर्तव्य प्रेमचंद के मन्त्र ओर कफ़न पर "उफ़ " करके ख़तम नहीं होता ...... वे उस समाज के भीतर उसकी बेहतरी के लिए घुसते है जिसके पास अपनी व्यथा कहने के लिए वो भाषा या औजार नहीं है जिससे सभ्य समाज तारतम्य बैठाता है ...या रुक कर समझने की कोशिश करता है ....तमाम प्रतिकूलताओ ओर सीमायों के बावजूद उनकी प्रतिबद्ता एक अजीब सी जीवटता लिए न केवल कायम रहती है ....बल्कि अपनी नैतिक स्म्रतियो को बेदखल नहीं होने देती .... वे अपनी उस जिम्मेदारी का निर्वाह करते है जिसका बॉस केवल उनका जमीर है ..........
प्रगतिशीलता के तमाम बुलडोज़रो के बीच अपनी बौद्धिक इमानदारी की आँख न मुंदने देने वाला इंसान जो अपने संशय ईमानदारी से रखता है ..... अचानक देशद्रोही कैसे हो गया ?मेरे लिए ये भी ये यक्ष प्रशन है
इस देशद्रोह को दिनेश राय द्रिवेदी डिफाइन करते है
यदि Sedition का अर्थ देशद्रोह हो तो हमें लोकमान्य तिलक और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के लिए कहना होगा कि वे देशद्रोही थे जिस के लिए उन्हों ने सजाएँ भुगतीं। यह केवल एक शब्द के अनुवाद और प्रयोग का मामला नहीं है। दंड संहिता की जिस धारा के अंतर्गत डॉ. बिनायक सेन को दंडित किया गया है उसे इसी संहिता में परिभाषित किया गया है और इस का हिन्दी पाठ निम्न प्रकार हैं -
धारा 124 क. राजद्रोह
जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यप्रस्तुति द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करेगा, या पैदा करने का प्रयत्न करेगा, या असंतोष उत्तेजित करेगा या उत्तेजित करने का प्रयत्न करेगा वह आजीवन कारावास से, जिस में जुर्माना भी जोड़ा जा सकेगा या तीन वर्ष तक के कारावास से जिस में जुर्माना जोड़ा जा सकेगा, या जुर्माने से दंडित किया जा सकेगा।
स्पष्टीकरण-1 'असंतोष' पद के अन्तर्गत अभक्ति और शत्रुता की सभी भावनाएँ आती हैं।
स्पष्टीकरण-2 घृणा, अवमान या असंतोष उत्तेजित किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना सरकार के कामों के प्रति विधिपूर्ण साधनों द्वारा उन को परिवर्तित कराने की दृष्टि से आक्षेप प्रकट करने वाली टीका-टिप्पणियाँ इस धारा के अधीन अपराध नहीं हैं।
स्पष्ठीकरण-3 घृणा, अवमान या असंतोष उत्तेजित किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना सरकार की प्रशासनिक या अन्य प्रक्रिया के प्रति आक्षेप प्रकट करने वाली टीका-टिप्पणियाँ इस धारा के अधीन अपराध नहीं हैं।
जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यप्रस्तुति द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करेगा, या पैदा करने का प्रयत्न करेगा, या असंतोष उत्तेजित करेगा या उत्तेजित करने का प्रयत्न करेगा वह आजीवन कारावास से, जिस में जुर्माना भी जोड़ा जा सकेगा या तीन वर्ष तक के कारावास से जिस में जुर्माना जोड़ा जा सकेगा, या जुर्माने से दंडित किया जा सकेगा।
स्पष्टीकरण-1 'असंतोष' पद के अन्तर्गत अभक्ति और शत्रुता की सभी भावनाएँ आती हैं।
स्पष्टीकरण-2 घृणा, अवमान या असंतोष उत्तेजित किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना सरकार के कामों के प्रति विधिपूर्ण साधनों द्वारा उन को परिवर्तित कराने की दृष्टि से आक्षेप प्रकट करने वाली टीका-टिप्पणियाँ इस धारा के अधीन अपराध नहीं हैं।
स्पष्ठीकरण-3 घृणा, अवमान या असंतोष उत्तेजित किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना सरकार की प्रशासनिक या अन्य प्रक्रिया के प्रति आक्षेप प्रकट करने वाली टीका-टिप्पणियाँ इस धारा के अधीन अपराध नहीं हैं।
आंकड़े बताते है इस देश की आबादी २०१५ में शायद सबसे ज्यादा हो जायेगी .आंकड़े ये भी बत्ताते है पिछले कुछ सालो में संसद में मौजूद हमारे सांसदों में करोडपति सांसदों की संख्या में तीस प्रतिशत का इजाफा हुआ है ......आंकड़े याद दिलाते है सात लाख नौकर शाहों के इस देश में देश चलाने वाले नेताओ में तकरीबन कुछ लोग ही ग्रेज्यू वेट है ....आंकड़े भी अजीब होते है ... पर आंकड़े ये नहीं बताते के देशभक्ति आनुवंशिक नहीं होती ......लोक संघर्ष ब्लॉग कुछ यूँ बताता है
देश में जब तमाम सारी अव्यस्थाएं है तो उनके खिलाफ बोलना, आन्दोलन करना, प्रदर्शन करना, भाषण करना आदि लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं हैं लेकिन जब राज्य चाहे तो अपने नागरिक का दमन करने के लिए उसको राज्य के विरुद्ध अपराधी मान कर दण्डित करती है। डॉक्टर बिनायक सेन जल, जंगल, जमीन के लिए लड़ रहे आदिवासी कमजोर तबकों की मदद कर रहे थे और राज्य इजारेदार कंपनियों के लिए किसी न किसी बहाने प्राकृतिक सम्पदा अधिग्रहित करना चाहता है। उसका विरोध करना इजारेदार कंपनियों का विरोध नहीं बल्कि राज्य का विरोध है। इजारेदार कम्पनियां आपका घर, आपकी हवा, आपका पानी, सब कुछ ले लें आप विरोध न करें। यह देश टाटा का है, बिरला का है, अम्बानी का है। इनके मुनाफे में जो भी बाधक होगा वह डॉक्टर बिनायक सेन हो जायेगा।
यही सन्देश भारतीय राज्य, न्याय व्यवस्था ने दिया है।
यही सन्देश भारतीय राज्य, न्याय व्यवस्था ने दिया है।
...कुछ तटस्थताओ के लिए भी साहस चाहिए ..इस समाज के कई प्रवक्ता है ....कई स्वीकृत कई स्व घोषित .....जो सिद्धांतो की भी बड़ी तर्क पूर्ण व्याखाए देते है .....यूँ भी लिज़ लिजी देश भक्ति कभी कभी हमारे आदर्शो को भी धुंधला कर देती है ......विज़न को भी ...
इतिहास तीन स्तरों पर चलता है: पहला, जो सनातन है यानी अपने प्राकृतिक वातावरण के सम्बन्ध में मनुष्य का इतिहास। दूसरा, वह पारंपरिक सामाजिक इतिहास है जो समूह या छोटे समूहों से बनता है। तीसरा इतिहास मनुष्य का न होकर विशिष्ट तौर पर किसी एक मनुष्य का होता है। दूसरे शब्दों में, इतिहास प्रकृति की ताकतों, समाज के ढांचे और व्यक्तियों की भूमिकाओं से गढ़ा जाता है। यह सूत्रीकरण फ्रेंच चिंतकों द्वारा दिया गया है जो मानते हैं कि यह मॉडल ही सम्पूर्ण इतिहास का मॉडल है। सम्पूर्ण इतिहास की संरचना में आदिवासियों के तुलनात्मक संदर्भों को बेहतर ढंग से व्यवस्थित किया जा सकता है। मसलन, भारत और अमेरिका के आदिवासियों में आंशिक समानता इसलिए है क्योंकि दोनों देशों में शासक वर्ग द्वारा जतलाए गए अधिकारों के संदर्भ में इनकी सामाजिक व्यवस्था और अनुक्रम तुलनात्मक रहे हैं। यदि योरोपीय औपनिवेशिक ताकतों ने अमेरिकी नेटिवों पर अपना धर्म थोपा, तो भारत में मौर्य साम्राज्य की राजसत्ता ने शाही गांवों के श्रमिकों शिविरों में रहने वाले आदिवासियों के साथ भी तकरीबन यही किया।
.बैरंग भी अपनी प्रतिक्रिया देता है ...ये कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं है
डॉ सेन का जुर्म यह रहा कि उन्होने आदिवासियों के लिये काम करते हुए उनके अधिकारों की बात की, उन पर हो रहे जुल्मों का जिक्र किया। उन्होने हिंसा का हमेशा सख्त विरोध किया चाहे वह माओवादियों की हो या सरकारी बलों की! डॉ सेन पुलिस और पुलिस समर्थित गुटों द्वारा व्यापक पैमाने पर किये जा रहे भूमि-हरण, प्रताड़नाओं, बलात्कारों, हत्याओं को मीडिया की रोशनी मे लाये; पीडित तबके के लिये कानूनी लड़ाई मे शामिल हुए। उनका अपराध यह रहा कि वो उस ’पीपुल’स यूनियन फ़ॉर पब्लिक लिबर्टीज’ की छत्तीसगढ़ शाखा के सचिव रहे, जिसने मीडिया मे ’सलवा-जुडुम’ के सरकार-प्रायोजित अत्याचारों को सबसे पहले बेनकाब किया।
इतने गुनाह सरकार की नजर मे आपको कुसूरवार बनाने के लिये काफ़ी है। फिर तो औपचारिकता बाकी रह जाती है। इस लोकतांत्रिक देश की पुलिस ने पहले उन्हे बिना स्पष्ट आरोपों के महीनो जबरन हिरासत मे रखा। फिर कानूनी कार्यवाही का शातिर जाल बुना गया। सरकार तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी किसी हिंसात्मक गतिविधि मे संलग्नता को प्रमाणित नही कर पायी। सरकार के पास उनके माओवादियों से संबंध का कोई स्पष्ट साक्ष्य नही दे पायी। पुलिस का उनके खिलाफ़ सबसे संगीन आरोप यह था कि जेलबंद माओवादी कार्यकर्ता नरायन सान्याल के ख़तों को दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाने का काम उन्होने किया। मगर इस आरोप के पक्ष मे कोई तथ्यपरक सबूत पुलिस नही दे पायी। उनके खिलाफ़ बनाये केस की हास्यास्पदता का स्तर एक उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि सरकारी वकील अदालत मे उन पर यह आरोप लगाता है कि उनकी पत्नी इलिना सेन का ईमेल-व्यवहार ’आइ एस आइ’ से हुआ था। मगर बाद मे अदालत को पता चलता है कि यह आइ एस आइ कोई ’पाकिस्तानी एजेंसी’ नही वरन दिल्ली का सामाजिक-शोध संस्थान ’इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट’ था। फ़र्जी सबूतों और अप्रामाणिक आरोपों के द्वारा ही सही मगर पुलिस के द्वारा उनको शिकंजे मे लेने के पीछे अहम् वजह यह थी कि उनके पास तमाम पुलिसिया ज्यादतियों और फ़र्जी इन्काउंटर्स की तथ्यपरक जानकारियां थी जो सत्ता के लिये शर्म का सबब बन सकती थी।
उत्सव धर्मी इस समाज में साल के आखिरी दिन उम्मीदों ओर आशयो से इतर बिनायक सेन पर लिखना पढना शायद अजीब लगे पर उनकी मौजूदगी किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है ....ओर अपने भीतर सिमटे इस समाज के लिए भी .....वैचारिक असहमतिया ..उम्र कैद की हक़दार नहीं होती.....
सच मानिए आप शायद असहमत हो........पर वे मुझ ओर आपसे कई ज्यादा बड़े देशभक्त है
चाहूँगा कोई भी प्रतिक्रिया या विचार रखते वक़्त इस चर्चा ओर टिप्पणियों पर भी नज़र डाले .....
अरुंधति.....क्रान्ति....नक्सल वाद .आदिवासी ओर वेंटीलेटर पे ये देश
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बुधवार, दिसंबर 08, 2010
माचिस एक आग का घर है.....जिसमें बावन सिपाही रह्ते हैं.
चर्चाकारः
डॉ .अनुराग
लिखते रहना एक अच्छी जिद है ....किताबी पन्नो के बरक्स कंप्यूटर भी बड़ी सहूलियत से किसी भी वक़्त अपने स्क्रीन पर बहुत कुछ अच्छा लिखा दिखा सकता है .टेक्नो लोजी ने पाठको को न केवल बढाया है ..अलबत्ता परस्पर संवाद की एक गुंजाइश को पुख्ता भी किया है...संस्मरण लिखना दरअसल अपने तजुरबो को आज में देखना है ....एक अच्छा संस्मरण लिखने वाला संस्मरणों की न केवल अंगुली पकड़ कर चलता है ... बल्कि हमें भी उन गलियों के भीतर ले चलता है ..नवीन नैथानी जी ने लिखो यहाँ वहां पर ऐसे कई यादो को दोहराना शुरू किया है ....शीर्षक ब्लॉग से ली गयी कुछ पंक्तियों से लिया गया है
कुछ ऐसी ही बैचेनियो को एक केलिडोस्कोप में हथकड़ रखता है .....इस बैचेनी में याद आते कुछ किरदार भी है ....यहाँ नेरेटर संस्मरण का हिस्सा भी बनता है ...उसके फ्लो में .हस्तक्षेप नहीं करता ...मसलन
पूरी पोस्ट पढियेगा ....ओर इस नेरेशन में डूब जाइयेगा........
सागर अप्रत्याशित लेखक है ....थोड़े विद्रोही तेवर वाले कवि......उनकी कविता मुझे कई बार हतप्रभ करती है .....नंगे यथार्थ से उन्हें रोमानटीसाइज़ उनका फेवरेट शगल है ....उनकी कई प्रतिक्रियाये कई रेखाचित्रो के सामान्तर चलती है .कई बार आगे फलांग जाती है ...बतोर कवि .वे मुझे कभी हड़बड़ी में नहीं दिखते ... उनकी बैचेनिया बनी रहे ....
मसलन अपनी कविता पिता : मुंह फेरे हुए एक स्कूटर
में वे कुछ यूँ दिखते है
एक ओर कवि निखिल आनंद गिरि भी अपनी विशिष्ट मौलिकता के संग संबंधो के कई जटिल व्याकरणों पर अपनी माइक्रोस्कोप धरते है ....ओर आहिस्ता से आदमी के भीतर सेंध लगाते है .उनकी कविता "रात चाँद ओर आलपिन '..ऐसे एक शोट का क्लोज़ अप लेती है
इस कविता को पढ़ते हुए आप जान जाते है ....स्त्री को समझने का एक चौकन्नापन उनके भीतर मौजूद है ......
किशोर .......वे रचनात्मक निर्वासन की देहरी पर नहीं बैठते ..लिखकर अपने आप को एक्सटेंड करते है ..हिंदी ब्लॉग में उन जैसे लेखको की उपस्थिति को मै आवश्यक मानता हूँ ..जिनके विम्ब उनके भीतरी शोर को ख़ामोशी से अभिव्यक्त करते है
चौराहा भीड़ से ऊबा हुआ था. चिल्लपों से थक कर उसने अपने कानों में घने बाल उगा लिए थे. वह किसी स्थिर व्हेल मछली की तरह था. सम्भव है कि उसे सब रास्तों का सच मालूम हो गया था और वह सन्यस्थ जीवन जी रहा था. इस सन्यास में देह को कष्ट दिये जाने का भाव नहीं दिखाई पड़ता था. कई बार ऐसा लगता था कि चौराहा वलय में घूर्णन कर रहे मसखरों और कमसिन लड़कियों की कलाबाजियां देखने जैसा जीवन जी रहा था. उसको किसी नवीन और अप्रत्याशित घटना की आशा नहीं थी. सीढ़ियों को अपनी ओर आते देख कर भी कौतुहल नहीं जगा.
कहते है भीड़ की स्मरण शक्ति कम होती है .ओर भारतीय समाज एक भीड़ जैसा ही है ....हम अपने जमीर के मैले होने का अक्सर जिक्र करते है पर उसे दुरस्त करने का प्रयास नहीं.....हम दरअसल अपनी सहूलियत से असूलो को चुनने वाले समाज की ओर बढ़ रहे है ....जहाँ विरोध सैदान्तिक नहीं होता है ...व्यक्ति ओर उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को देख कर तय किया जाता है ....राडिया टेप काण्ड ओर विकिलीक्स के खुलासे आहिस्ता आहिस्ता धुंधले पड़ने लगेगे ... सच के भी कई मुगालते होते है .....प्रसून वाजपेयी उन्ही मुगालतो पर बात करते है
चलते चलते .
हमारी नैतिक बैचेनी अपनी लक्ष्मण रेखा बड़ी चतुराई से चुनती है .....हम उन्ही बहसों को हाईलाईट करते बुद्धिजीवियों के तर्कों को सुनते है जिन पर सार्वजानिक सहमति बन सके ...सवाल फफूंद लगे इस लोकतंत्र पर रेग्मार्क कर साफ़ करने का नहीं ....सवाल ये भी है के क्या कर्तव्यो को याद दिलाने की जिम्मेवारी इस देश में सिर्फ कोर्ट की है ?
क्या हम वाकई एक आदर्श विहीन समाज की ओर बढ़ रहे है ....? सोच कर देखिये
हम सभी को आत्म निरीक्षण की आवश्यकता है ....मीडिया को ही नहीं...आखिर समाज के विकास की भागेदारी सामूहिक ही होती है ..
खैर एक रोज दर्द साह्ब के साथ अजब वाकया पेश आया. वे टिप-टाप मे बैठे थे कि दो महिलायें एक सूर्ख गुलाब लिये दर्द साहब को पूछती चली आयीं.थोडा सकुचाते ,कुछ हिचकिचाते हुए उन्होंने वह गुलाब कुबूल किया - मेज के किनारे रखा और प्रदीप गुप्ता को उधार की चाय का आर्डर दिया.दर्द साहब सूर्ख गुलाब का सबब समझ नहीं पा रहे थे .तभी वहां हरजीत का आगमन हुआ.उसने मंजर देखा , प्रदीप गुप्ता से कुछ बात की और फिर उस सार्वजनिक पोस्टर -स्थल से अवधेश की पैरोडी हटाकर एक नया शे’र चस्पां कर दिया
शराबो- जाम के इस दर्जः वो करीब हुए
जो दर्द भोगपुरी थे गटर-नसीब हुए
इसे पढ़्कर दर्द भोगपुरी ने ,जाहिर है, राहत की सांस ली
कुछ ऐसी ही बैचेनियो को एक केलिडोस्कोप में हथकड़ रखता है .....इस बैचेनी में याद आते कुछ किरदार भी है ....यहाँ नेरेटर संस्मरण का हिस्सा भी बनता है ...उसके फ्लो में .हस्तक्षेप नहीं करता ...मसलन
दो महीने तक मैं रोज शाम को उनके पास जाता था. वे मुझसे पंजा, पांव, आँख, भोहें, कोहनी जैसे शरीर के अंग बनवाते रहे. उन्होंने अगले पायदान पर मुझे एक किताब दी जिसमें सब नंगे स्केच थे. उनको देखना और फिर उन पर काम करना बेहद मुश्किल था. मैं तब तक नौवीं कक्षा में आ चुका था और मेरी जिज्ञासाएं चरम पर थी. मैंने कुछ और महीने फिगर पर काम किया. वे मुझसे खुश तो होते लेकिन मुझमे ऐसी प्रतिभा नहीं देख पाए थे कि मेरे जैसा शिष्य पाकर खुद को भाग्यशाली समझ सकें. एक दिन मैंने कहा "मुझसे पेंसिलें खो जाती है शायद मुझे इनसे प्यार नहीं है." उन्होंने पीक से मुंह हल्का करके कहा "बेटा ये राज बब्बर फाइन आर्ट में मेरा क्लासफेलो था, इसने लिखित पर्चे नक़ल करके पास किये है मगर देखना एक दिन फिर से ये पेन्सिल जरुर पकड़ेगा."
पूरी पोस्ट पढियेगा ....ओर इस नेरेशन में डूब जाइयेगा........
सागर अप्रत्याशित लेखक है ....थोड़े विद्रोही तेवर वाले कवि......उनकी कविता मुझे कई बार हतप्रभ करती है .....नंगे यथार्थ से उन्हें रोमानटीसाइज़ उनका फेवरेट शगल है ....उनकी कई प्रतिक्रियाये कई रेखाचित्रो के सामान्तर चलती है .कई बार आगे फलांग जाती है ...बतोर कवि .वे मुझे कभी हड़बड़ी में नहीं दिखते ... उनकी बैचेनिया बनी रहे ....
मसलन अपनी कविता पिता : मुंह फेरे हुए एक स्कूटर
में वे कुछ यूँ दिखते है
आओ ग्लास में उडेलें थोड़ी सी शराब
कि अब तो तुम्हारे शर्ट भी मुझको होने लगे हैं, जूते भी
कि पड़ोस का बच्चा मुझे अंकल कह बुलाने लगा है
तुम खोलो ना राज़
कि किस लोहे ने तुम्हारी तर्जनी खायी थी
कि दादी के बाद वो कौन है जीवित गवाह
जिसने तुम्हें हँसते देखा था आखिरी बार
(अब तुम्हारा गिरेबान पकड़ कर पूछता हूँ)
बाकी साल तो रहने दिया
पर मुंह फेरने से पहले यह तो बता दो
कि पचहत्तर, चौरासी, इक्यानवे, सत्तानवे और निन्यानवे में कौन - कौन सा इंजन तुमपे गुज़रा ?
आओ ग्लास में उडेलें थोड़ी सी शराब
और करें बातें ऐसी कि जिससे खौल कर गिर जाए शराब.
एक ओर कवि निखिल आनंद गिरि भी अपनी विशिष्ट मौलिकता के संग संबंधो के कई जटिल व्याकरणों पर अपनी माइक्रोस्कोप धरते है ....ओर आहिस्ता से आदमी के भीतर सेंध लगाते है .उनकी कविता "रात चाँद ओर आलपिन '..ऐसे एक शोट का क्लोज़ अप लेती है
इस कविता को पढ़ते हुए आप जान जाते है ....स्त्री को समझने का एक चौकन्नापन उनके भीतर मौजूद है ......
अभी बाक़ी हैं रात के कई पहर,
अभी नहीं आया है सही वक्त
थकान के साथ नींद में बतियाने का....
उसने बर्तन रख दिए हैं किचन में,
धो-पोंछ कर...
(आ रही है आवाज़....)
अब वो मां के घुटनों पर करेगी मालिश,
जब तक मां को नींद न आ जाए..
अच्छी बहू को मारनी पड़ती हैं इच्छाएं...
चांदनी रातों में भी...
कमरे में दो बार पढ़ा जा चुका है अखबार....
उफ्फ! ये चांदनी, तन्हाई और ऊब...
पत्नी आती है दबे पांव,
कि कहीं सो न गए हों परमेश्वर...
पति सोया नहीं है,
तिरछी आंखों से कर रहा है इंतज़ार,
कि चांदनी भर जाएगी बांहों में....
थोड़ी देर में..
वो मुंह से पसीना पोंछती है,
खोलती है जूड़े के पेंच,
एक आलपिन फंस गई है कहीं,
वो जैसे-तैसे छुड़ाती है सब गांठें
और देखती है पति सो चुका है..
अब चुभी है आलपिन चांदनी में...
ये रात दर्द से बिलबिला उठी है....
सुबह जब अलार्म से उठेगा पति,
और पत्नी बनाकर लाएगी चाय,
रखेगी बैग में टिफिन (और उम्मीद)
एक मुस्कुराहट का भी वक्त नहीं होगा...
फिर भी, उसे रुकना है एक पल को,
इसलिए नहीं कि निहार रही है पत्नी,
खुल गए हैं फीते, चौखट पर..
वो झुंझला कर बांधेगा जूते...
और पत्नी को देखे बगैर,
भाग जाएगा धुआं फांकने..
आप कहते हैं शादी स्वर्ग है...
मैं कहता हूं जूता ज़रूरी है...
और रात में आलपिन...
किशोर .......वे रचनात्मक निर्वासन की देहरी पर नहीं बैठते ..लिखकर अपने आप को एक्सटेंड करते है ..हिंदी ब्लॉग में उन जैसे लेखको की उपस्थिति को मै आवश्यक मानता हूँ ..जिनके विम्ब उनके भीतरी शोर को ख़ामोशी से अभिव्यक्त करते है
चौराहा भीड़ से ऊबा हुआ था. चिल्लपों से थक कर उसने अपने कानों में घने बाल उगा लिए थे. वह किसी स्थिर व्हेल मछली की तरह था. सम्भव है कि उसे सब रास्तों का सच मालूम हो गया था और वह सन्यस्थ जीवन जी रहा था. इस सन्यास में देह को कष्ट दिये जाने का भाव नहीं दिखाई पड़ता था. कई बार ऐसा लगता था कि चौराहा वलय में घूर्णन कर रहे मसखरों और कमसिन लड़कियों की कलाबाजियां देखने जैसा जीवन जी रहा था. उसको किसी नवीन और अप्रत्याशित घटना की आशा नहीं थी. सीढ़ियों को अपनी ओर आते देख कर भी कौतुहल नहीं जगा.
चौराहे ने एक लम्बी साँस भरी और खुद का पेट सीने में छुपा लिया. चौराहों और सीढ़ियों का भी सदियों पुराना रिश्ता था. चौराहों के माथे को खुजाने के लिए कनखजूरे इन्हीं सीढ़ियों पर चढ़ कर आया करते थे.
चौराहे ने पीपल की ओर देखा. पीपल ने दलदल के पानी सोखू युक्लीप्टिस पेड़ों की ओर देखा. युक्लीप्टिस ने कौवों के पांखों में खुजली की. कौवों ने देखा कि बिना सीढ़ियों की छतें बहुत सुरक्षित दिखने लगी थी. मुंडेरों तक पहुँचने के लिए अब आदमी को आदमी के ऊपर खड़ा होना होगा.
कहते है भीड़ की स्मरण शक्ति कम होती है .ओर भारतीय समाज एक भीड़ जैसा ही है ....हम अपने जमीर के मैले होने का अक्सर जिक्र करते है पर उसे दुरस्त करने का प्रयास नहीं.....हम दरअसल अपनी सहूलियत से असूलो को चुनने वाले समाज की ओर बढ़ रहे है ....जहाँ विरोध सैदान्तिक नहीं होता है ...व्यक्ति ओर उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को देख कर तय किया जाता है ....राडिया टेप काण्ड ओर विकिलीक्स के खुलासे आहिस्ता आहिस्ता धुंधले पड़ने लगेगे ... सच के भी कई मुगालते होते है .....प्रसून वाजपेयी उन्ही मुगालतो पर बात करते है
असल में राडिया के फोन टैप से सामने आये सच ने पहली बार बडा सवाल यही खड़ा किया है कि अपराध का पैमाना देश में होना क्या चाहिये। लोकतंत्र का चौथा खम्भा, जिसकी पहचान ही ईमानदारी और भरोसे पर टिकी है उसके एथिक्स क्या बदल चुके हैं। या फिर विकास की जो अर्थव्यवस्था कल तक करोड़ों का सवाल खड़ा करती थी अगर अब वह सूचना तकनालाजी , खनन या स्पेक्ट्रम के जरीये अरबो-खरबो का खेल सिर्फ एक कागज के एनओसी के जरीये हो जाता है तो क्या लाईसेंस से आगे महालाइसेंस का यह दौर है। लेकिन इन सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस तमाम सवालो पर फैसला लेगा कौन। लोकतंत्र के आइने में यह कहा जा सकता है कि न्यायपालिका और संसद दोनो को मिलकर कर यह फैसला लेना होगा। लेकिन इसी दौर में जरा भ्रष्टाचार के सवाल पर न्यायापालिका और संसद की स्थिति देखें। देश के सीवीसी पर सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल उठाया कि भ्रष्टाचार का कोई आरोपी भ्रष्टाचार पर नकेल कसने वाले पद सीवीसी पर कैसे नियुक्त हो सकता है। तब एटार्नी जनरल का जबाव यही आया कि ऐसे में तो न्यायधिशो की नियुक्ति पर भी सवाल उठ सकते हैं। क्योकि ऐसे किसी को खोजना मुश्किल है जिसका दामन पूरी तरह पाक-साफ हो। वही संसद में 198 सांसद ऐसे हैं, जिनपर भ्रष्टाचार के आरोप बकायदा दर्ज हैं और देश के विधानसभाओ में 2198 विधायक ऐसे हैं, जो भ्रष्टाचार के आरोपी हैं। जबकि छह राज्यो के मुख्यमंत्री और तीन प्रमुख पार्टियो के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और मायावती ऐसी हैं, जिन पर आय से ज्यादा संपत्ति का मामला चल रहा है। वहीं लोकतंत्र के आईने में इन सब पर फैसला लेने में मदद एक भूमिका मीडिया की भी है। लेकिन मीडिया निगरानी की जगह अगर सत्ता और कारपोरेट के बीच फिक्सर की भूमिका में आ जाये या फिर अपनी अपनी जरुरत के मुताबिक अपना अपना लाभ बनाने में लग जाये तो सवाल खड़ा कहां होगा कि निगरानी भी कही सौदेबाजी के दायरे में नहीं आ गई। यानी लोकतंत्र के खम्भे ही अपनी भूमिका की सौदेबाजी करने में जुट जाये और इस सौदेबाजी को ही मुख्यधारा मान लिया जाये तो क्या होगा।
चलते चलते .
हमारी नैतिक बैचेनी अपनी लक्ष्मण रेखा बड़ी चतुराई से चुनती है .....हम उन्ही बहसों को हाईलाईट करते बुद्धिजीवियों के तर्कों को सुनते है जिन पर सार्वजानिक सहमति बन सके ...सवाल फफूंद लगे इस लोकतंत्र पर रेग्मार्क कर साफ़ करने का नहीं ....सवाल ये भी है के क्या कर्तव्यो को याद दिलाने की जिम्मेवारी इस देश में सिर्फ कोर्ट की है ?
क्या हम वाकई एक आदर्श विहीन समाज की ओर बढ़ रहे है ....? सोच कर देखिये
हम सभी को आत्म निरीक्षण की आवश्यकता है ....मीडिया को ही नहीं...आखिर समाज के विकास की भागेदारी सामूहिक ही होती है ..
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गुरुवार, अक्टूबर 21, 2010
सस्ते पैनो से भी लिखी जा सकती है अच्छी कविता.......
चर्चाकारः
डॉ .अनुराग
प्लेटफोर्म पर किताबो में सर गडाए बैठी है कुछ .ये कवियों के प्रेम की शिकार महिलाए है जो खूब किताबे पढ़ती है ओर रोते रोते कवियों को गालिया दिया करती है ....................
अच्छी चीजों से जुड़ा सबसे बड़ा विकार है की उन्हें इतना बार दोहराया जाता है की उनका होना एक मामूली सा हो जाता है कि उनकी अच्छाई एक उबाऊ अच्छाई में बदल जाती है .........
कथा देश में गीत चतुर्वेदी........ अच्छी चीजों से जुड़ा सबसे बड़ा विकार है की उन्हें इतना बार दोहराया जाता है की उनका होना एक मामूली सा हो जाता है कि उनकी अच्छाई एक उबाऊ अच्छाई में बदल जाती है .........
पढना भी एक सतत प्रक्रिया है .जो कभी ख़त्म नहीं होती ..उम्र बीतते बीते अक्सर आप पुरानी किताबों को उठाकर दोबारा पढ़ते है ओर उनके भीतर नए अर्थो को पाते है ...ओर कभी ..कभी किसी लेखक को बरसो बाद उसकी वेव लेंथ में जाकर पकड़ पाते है ....ओर लिखना ? एक लेखक कभी कभी लिखने के बारे में भी लिखता है .....
जब आप नहीं लिख रहे होते, तब आप क्या कर रहे होते हैं? मैं ज़्यादातर समय नहीं लिख रहा होता। ज़्यादातर मैं पढ़ रहा होता हूं, संगीत सुन रहा होता हूं, कोई फिल्म देख रहा होता हूं या यूं ही नेट सर्फ कर रहा होता हूं। मैंने पाया है, ईमानदारी से, कि जिन वक्तों में मैं नहीं लिख रहा होता, वह मेरे लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि असल में मैं उन्हीं वक्तों में लिख रहा होता हूं।
अच्छी चीज़ों का सबसे बड़ा गुण या अवगुण यह है कि आप पर उसका कोई भी असर पड़े, उससे पहले वह आपको भरमा देती है। अच्छी कविता तो सबसे पहले भरमाती है। वह आपके फैसला करने की क्षमता को कुंद करती है और फैसला देने की इच्छा के लिए उत्प्रेरक बन जाती है। वह तुरत आपके मुंह से यह निकलवाती है- यह क्या बला है भला? ऐसा कैसे हो सकता है? फिर वह धीरे-धीरे आपमें प्रविष्ट होती है। यही समय है, जब आपकी ग्रहण-क्षमता की परीक्षा होनी होती है। आप उसे अपने भीतर कितना लेते हैं, इसमें अच्छी रचना का कम, आपका गौरव ज़्यादा होता है।
गीत जी को किसी औपचारिक परिचय की जरुरत नहीं है ..यदि आप कंप्यूटर का एक इस्तेमाल कुछ अच्छी चीजों को पढने के लिए करने वाले में से एक है तो उनका ब्लॉग भाषा शब्दों ओर संवेदनाओं के कई नये स्तरों को अपनी तरह से परिभाषित करता है .उनके पास विचारो की एक नैसर्गिक जमीन है...पूरा लेख पढने के उनके ब्लॉग बैतागवाडी पर यहाँ क्लिक करिए
साहिर से बरसो पहले एक नज़्म लिखी थी ".वो सुबह कभी तो आएगी.."....उम्मीद से लबालब.भरी हुई....पर आजकल की नौजवान पीढ़ी सपनो को भी खुरच कर उसके नीचे की तहों को जांचना चाहती है ...उसे फतांसी से गुरेज नहीं है ...पर इस दुनिया में कुछ विलक्षण होने की उम्मीद भी नहीं....
श्रीश यथार्थ से सीधे भिड़ते है ...
मुझे उम्मीद नही है,
कि वे अपनी सोच बदलेंगे..
जिन्हें पीढ़ियों की सोच सँवारने का काम सौपा है..!
वे यूँ ही बकबक करेंगे विषयांतर.. सिलेबस आप उलट लेना..!
उम्मीद नही करता उनसे,
कि वे अपने काम को धंधा नही समझेंगे..
जो प्राइवेट नर्सिंग होम खोलना चाहते हैं..!
लिख देंगे फिर एक लम्बी जांच, ...पैसे आप खरच लेना.
दुर्भाग्य से हकीक़त का कोई वैकल्पिक स्रोत नहीं होता ….सो सीधी मुठभेड़ अनिवार्य है ..बौदिक मुहावरों की परत उतारे बगैर ....पोलिटिकली अन करेक्ट होने का खतरा उठाते हुए .....तल्खी के थोडा नजदीक ........
दर्पण अपना हस्तक्षेप जारी रखते है
पास्ट -परफेक्ट ,प्रेजेंट -टेस
वो क्रांतियों के दिन थे.
और हम,
मार दिए जाने तक जिया करते थे.
सिक्कों में चमक थी.
उंगलियाँ थक जाने के बाद चटकती भी थीं.
हवाएं बहती थीं,
और उसमें पसीने की गंध थी.
पथरीले रास्तों में भी छालों की गिनतियाँ रोज़ होती थी.
रोटियां,
तोड़के के खाए जाने के लिए हुआ करती थीं.
रात बहुत ज्यादा काली थी,
जिसमें,
सोने भर की जगह शेष थी.
और सपने डराते भी थे.
अस्तु डर जाने से प्रेम स्व-जनित था.
ओम जिंदगी की हकीक़तो को कोमल तरीके से टटोलने वाले कवि है .वे बिना पेचीदा हुए .....रिश्तो पर अपना फ़िल्टर रखते है ...ओर उनकी जटिलताओ आसानी से बयां .....उनके पास कई रंग है कुछ ठहरे हुए ...कुछ मिले जुले ..इच्छाओ के अँधेरे में ये रंग अलग चमकते है
यह बिलकुल हीं रात है
और इसकी परिधि के भीतर
ठीक चाँद इतनी खाली जगह है
और बाकी सभी जगह अमावस बिछी हुई है
इस वक्त उस खाली जगह को महसूसना हीं
मेरी कविता है
और उसे लिख देना
तुम्हें पा लेने जैसा है
पर तुमने जाते हुए
वक्त को दो हिस्सों में बाँट दिया था
और वक्त का वो हिस्सा जिसमें कवितायेँ
लिखी जानी थी,
अतीत में गिर गया है
महेन भी एक युवा कवि है ...उनकी अपनी अलग संवेदनाये है ....अपनी अलग बैचेनिया ......अपने नजरिये ........वे मानवीय जिजीविषाओ की रोजमर्रा की कुछ साधारण घटनाओं में से उम्मीद तलाशते है ....ओर अपने सपने बचाए रखते है.......उनका पता है हलंत
कविताओ से गुजरते हुए ये भी सवाल उठता है के इसकी कितनी आवश्यकता है ?....दरअसल कविता है क्या ....इस सवाल का एक जवाब प्रियंकर जी कुछ यूँ देते है
थोड़ी सी उद्दिग्नता बची रहेगी ह्रदय मेंआँखों मे बची रहेगी सुंदरता देखने की थोड़ी बहुत समझशब्दों में अर्थ खोजने की हिम्मत बची रहेगीबची रहेगी अभी कुछ दिन और जीने की इच्छाथोड़ी सी उदासी बची रहेगी हँसी के साथउष्णता बची रहेगी स्पर्श में थोड़ी बहुतशिशु की मुस्कान में बची रहेगी थोड़ी उम्मीदऔर पुलक बची रहेगी एक लड़की की चुप्पी मेंजब हम जानेंगे अभी बचा हुआ हैथोड़ा बहुत प्रेम हमारे आसपास
कविताओ से गुजरते हुए ये भी सवाल उठता है के इसकी कितनी आवश्यकता है ?....दरअसल कविता है क्या ....इस सवाल का एक जवाब प्रियंकर जी कुछ यूँ देते है
कविता हमारे अंतर्जगत को आलोकित करती है । वह भाषा की स्मृति है । खांटी दुनियादार लोगों की जीवन-परिधि में कविता कदाचित विजातीय तत्व हो सकती है, पर कविता के लोकतंत्र में रहने वाले सहृदय सामाजिकों के लिये कविता – सोशल इंजीनियरिंग का — प्रबोधन का मार्ग है । कविता मनुष्यता की पुकार है । प्रार्थना का सबसे बेहतर तरीका । जीवन में जो कुछ सुघड़ और सुन्दर है कविता उसे बचाने का सबसे सशक्त माध्यम है । कठिन से कठिन दौर में भी कविता हमें प्राणवान रखती है और सीख देती है कि कल्पना और सपनों का संसार अनंत है ।कविता एक किस्म का सामाजिक संवाद है ।
उपरोक्त पंक्तिया उनके ब्लॉग पर ६ अगस्त की पोस्ट से ली गयी है .......बिना उनका शुक्रिया अदा किये हुए .....मुझे लगा कविता का इतना बेहतर परिचय बांटना उचित है.......ओर आखिर में अपने फेवरेट शायर को याद करते हुए उनकी एक नज़्म के साथ.......
दिल्ली - पुरानी दिल्ली की दोपहर
लू से झुलसी दिल्ली की दोपहर में अक्सर
चारपाई बुनने वाला जब
घंटा घर वाले नुक्कड़ से, कान पे हाथ रख कर
इक हांक लगता था - ’चार पाई. बनवा लो...’
खसखस कि टट्यों में सोये लोग अन्दाज़ा लगा लेते थे.. डेढ़ बजा है..
दो बजते बजते जामुन वाला गुजरेगा
’जामुन.. ठन्डे.. काले जामुन’
-गुलज़ार
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बुधवार, मार्च 17, 2010
ओ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दुस्तां, देखते ये मुल्क सारा ये टशन में थ्रिल में है
चर्चाकारः
डॉ .अनुराग
| प्रेम मेरे सबसे जिम्मेदार चोले मुझे नाचना सिखला दे चाह! मुझे छुपा सत्य बतला दे मैंने जो प्रेम बांटे हैं उसमें कितने कांटे हैं ? मैंने लिफाफों से कहा है; खत, खुलो मेरे पास जला कर राख करना है तुम्हें अभी अपनी विनम्रता की आग में |
| कुछ लोग जब कम लिखते है....तो मन करता है .....उन्हें मसरूफियत से खींच कर बाहर निकाले .....महेन ऐसे ही है....पूरी कविता ...पढने के लिए .. भाई…….पर चटका लगाये……….. तुम अगर होते तो शायद झगड़कर घुन्ना बने बैठे होते हम एक दूसरे से लेकिन तुम मर चुके बरसों पहले और मेरे लिए तुम अब बस एक विषय रह गए हो क्या कुछ और भी संभव था जबकि न मैं तुमसे कभी मिला न देखा तुम्हें? मुझे तो अट्ठारहवें जन्मदिन पर उपहार की तरह दी गई तुम्हारे होने और होकर मरने की ख़बर उन अट्ठारह-बीस सालों में किसी ने बात नहीं की तुम्हारी |
काले कौव्वे अब कहीं नहीं दिखते । अब छत की मुँडेर नहीं होती । आसमान अब सिर्फ खिड़की के फ्रेम में जड़ा एक चौकोर पेंटिंग है , धूसर , फीका और उदास । काले कौव्वे सब कहाँ गये ? मैं पूछना चाहती हूँ पर मुझे उनकी भाषा नहीं आती । सपने में बूढ़ा कौव्वा कहता है गंभीरता से , एक रात और बीत गई। सुबह मैं डीकोड करती हूँ सपना , भाषा , समय । |
| ओर ऐसा ब्लोगर जो दौड़ता बहुत है ...हिंदी फिल्मो का दीवाना है ...मस्त मस्त पोस्ट लिखता है .उसके पास कोई गंभीर भाषा नहीं है ...बस अंतर्ध्वनि है ....कैसी है एक झलक देखिये .... १) मैं हूँ जुर्म से नफ़रत करने वाला, शरीफ़ों के लिये ज्योति और तुम जैसे गुंडो के लिये ज्वाला। नाम है शंकर और हूँ मैं गुंडा नम्बर वन...प्रभुजी फ़िल्म गुंडा में. २) तुम्हारी ये गोली लोहे के इस शरीर के पार नहीं जा सकती (वीडियो भी देखें): फ़िल्म: लोहा ३) इफ़ यू कैन गिब मी बोट, एंड आई कैन गिब यू...क्लास आन टाईम, एक्जामेनेसन आन टाईम, नीट एंड क्लीन उनिबस्टी (इसको जरूर देखें): फ़िल्म: हासिल ४) आज हमने पहली बार आपको इतने करीब से देखा है, आपको भरपूर पहरेदारी की जरूरत है। फ़िल्म: हासिल कन्फ्यूजिया गये ..... वहां एक लिंक ओर है .....हिंदी वाले भले ही इलज़ाम दे ....पर हम इसे हिंगलिश की पोस्ट कहेगे .....बांचिये तो ...... For a long time I very clearly remembered how worried a girl can get about “how she looks” on her big day…… Then came my turn on the 6th day of February this year and i realised that my memory had failed me big time.... Before my wedding, I zeroed down on a parlor, based on same good reviews and a aankhon dekhi bride…a friend told..shes good…aunty thora pakati hain, किसी की सुनती नहीं हैं पर ठीक हैं चलो भाई..सही है, इन्ही के पास चले जाते हैं...वैसे भी I always felt, that सारी दुल्हन १ जैसे ही दिखती हैं, red कपडे, same makeup….और शादी में दुल्हन को कौन देखता है....:D -yes, I use to think that…:O…sab khane peene naachne gaane mein mast/ vyast hote hain…..I completely missed the fact, that शादी में कोई और देखे न देखे, शादी की एल्बम जीवन भर साथ रहती है, aur re-create nahi ki jaa sakti...:( What followed was a sequence of events which would soon result in the images in my Shaadi ki Album...:) |
जैसे आप पिछवाड़े बरामदे की बत्ती बुझाना भूल जाएं ऐसा होता है किसी को भूलना सो वह जली रहती है अगले दिन भर लेकिन फिर रौशनी ही आपको दिलाती है याद ****************************************************************** मेरे पिता ने युद्धों में बिताए चार वर्ष और अपने शत्रुओं से घृणा नहीं की, प्यार भी नहीं किया और तब मैं भी जानता हूँ कि किसी तरह वहां भी वे मेरे निर्माण में लगे हुए थे, अपनी शान्तियों में से जो इतनी विरल और बिखरी हुई थीं, जिन्हें उन्हों ने बम-विस्फोटों और धुंए के बावजूद चमके रखा और अपनी माँ के दिए हुए कड़े होते केक के बीच, उन्हें अपने झोले में रख लिया और अपनी आँखों में उन्होंने रख लिया बेनाम मृतकों को उन्हों ने सम्हाल लिया उनको, ताकि किसी दिन उनकी दृष्टि से मैं उन्हें देख सकूँ और प्यार कर सकूँ --ताकि मैं भय से भर न जाऊं जैसे वे सारे मर गए... उन्होंने अपनी आँखों को उनसे भर लिया, लेकिन तब भी वह बेकार रहा अपने सारे युद्धों में न चाहकर भी मुझे जाना ही होगा ~~~~ |
| पल्लवी बहुत दिनों बाद बदले हुए मूड में नज़र आई है……… कौन सी होगी वो आंच जो इस सर्द ख़ामोशी को पिघला देगी....क्या एक शापित की तरह मुझे जन्मों तक इंतज़ार करना होगा! दोनों हथेलियों को आपस में जोर से रगड़ता हूँ....बदले में मुझे एक चीखती हुई हंसी सुनाई देती है! ख़ामोशी हंस रही है मुझ पर!हंसी की आवाज़ तेज़ होती जा रही है....और तेज़! रेलवे स्टेशन की और भागता हूँ मैं बदहवास सा! ट्रेन ने सीटी दी है...मैं पास जाता हूँ उसे सुनने! पर सीटी में भी एक भयानक अट्टहास सुनाई देता है! मैं हार चूका हूँ! घटने के बल बैठकर मौत को बुला रहा हूँ! रोना चाहता हूँ जार जार मगर आंसू बर्फ बन कर आँखों के अन्दर ही कहीं चुभ रहे हैं! |
रास्ते…….. रास्ते अपने आप में मुकाम होते हैं। पीले पड़ते पन्नों में,कुछ जानी पहचानी नज़्म की आधी अधूरी याद में, बहुत चाव से बैठे बतियाये बरामदे के कोने में.....थोड़ी थोड़ी सी पहचान छूट जाती है। अपने हिस्से की पहचान ना जाने कब कहाँ कहाँ गिरकर पनप जाती है। बहुत दूर निकलकर पीछे मुड़कर देखो तो एक जंगल नज़र आता है। पुराने सब पड़ाव कहीं किसी पेड़ के साये के नीचे दबे पड़े मिलते हैं। रास्ता फिर भी रास्ता ही होता है। एक उम्मीद की तरह बहुत दूर तक ओझल नहीं होता। पीछे छूटे और आगे आने वाले पड़ाव को पाटता एक और पड़ाव। कुछ बहुत आगे निकल जाने का डर और कुछ कहीं ना पहुँच पाने की झुँझलाहट.......कई बार दौड़कर गुजरे पड़ावों की गोद में सिमट जाने को जी चाहता है। छोड़ी पहचान के सुराग का पीछा करना हमेशा मुमकिन नहीं होता...पहचान पनप कर कभी पेड़ तो कभी सूख कर ठूठ बनी दिखती है। |
'अजन्मे किरदार' गिर चुका है रंगमच का पर्दा ख़त्म हो चुका है मेरा और तुम्हारा "रोल" शुरू हो गई है 'जिंदगी' पहने गए हैं पुराने libas किन्तु मंच पर अब भी जीवित हैं 'अजन्मे किरदार' जिनकी जुबा पर स्वाद ही नहीं जीवन का वह भी बिलख रहें हैं इनकी भूख में यूँ स्नेह से न देखो इन्हें त्याग दो इनका मोह तुम करो इनकी मुक्ति का कुछ योग कहो अलविदा दे दो इन्हें "मुक्ति की विदाई" ताकि फिर जन्म ले सके नया किरदार सजता रहे यूँ ही रंगमंच और फैलती रहे जीवन की आभा भी. |
उसने निर्वासन झेला, विस्थापन की पीड़ा थी उसकी आँखों में... उसने अपने शब्दों को उस चित्र में तलाशने की कोशिश की... एक हल्की सी मुस्कराहट उसके चहरे के विस्तार को नाप गयी... -अलीसिया पारटोनी की कविता पर पेंटिंग बनाने के बाद लिखी... जुगलबंदी की दूसरी कई कवितायों को यहाँ पढ़ सकते है |
वह रोती मैं हंसता हूं मैं उसके हिस्से में सोता वह मेरे हिस्से में जगती है बेटी तो बरसों से तेरी चप्पल खोंस ले जाती है बेटे की कमीज में देख मुझे ऐ जी क्यों आज नैन मटकाती है. |
| पहले सबकुछ भला दीखता था अब सब बुरा लगता है छोटी घंटी वाला पुराना टेलीफोन आविष्कार की कुतूहल भरी खुशियां देने को काफी होता था एक आराम कुर्सी - कोई भी चीज इतवार की सुबहों में मैं जाता था पारसी बाजार और लौटता था एक दीवार घड़ी के साथ -या कह लें कि घड़ी के बक्से के साथ - और मकड़ी के जाले सरीखा जर्जर सा विक्तोर्ला (फोनोग्राम) लेकर अपने छोटे से 'रानी के घरौंदे' में जहां मेरा इंतजार करता था वह छोटा बच्चा और उसकी वयस्क मां, वहां की खुशियों के थे वे दिन या कम से कम रातें बिना तकलीफ की। श्रीकांत का अनुवाद |
| इस दौर में जब जिंदगी की कुछ भौतिक जरूरते आत्मा पर बेताल की तरह काबिज हो गयी है ...आदमी के कई विभाज़न है .कुछ उससे सीधी मुठभेड़ करते है ....कुछ उसके भीतर मौजूद आदमियत को निष्क्रिय करते है ......ऐसे में कविता से कोई उम्मीद करना किसी जटिल प्रमेय को दोबारा" हेंस प्रूवड" करने जैसा है पर श्रीश की ये कविता सच मायने में एक कन्फेशन सा मालूम होती है .......जिसमे विद्रोह भी है .हताशा भी .ओर पलायन भी.... पागल का आर्तनाद, मायने नहीं रखता और सेकेण्ड की सुई को कोई फरक नहीं पड़ता. नए जूतों ने कदम बाँध दिए हैं,,,सभ्यता की चाल बासी है..पालिश होते रहते हैं चमड़े..! सांस चलती जाती है..कुहरे में नहीं दिखता ट्रेन को स्टेशन या फिर सिग्नल भी. रीढ़ टेढी होती जा रही है, पन्नों पे बुकमार्क्स..मुद्दे कभी सुलझते नहीं. भयानक साजिश ओढ़े सिस्टम मतवाला है, जवान देह ने सरेशाम आग लगा ली है. इतना कुछ दिखता है...मौला. दिखाता-सुनाता है इतना कुछ इतनी गाड़ियां, इतने हार्न..! चाह...गरम उच्छ्वासें, ट्रैफिक जाम है. हांफते इंजनों को इतनी जल्दी है कि सिग्नल-मिनट्स बढ़ते जा रहे. सिक्के चमकदार, चिकने , अंधा पशोपेश में. गिने-समझे नही जा रहे रुपये. स्कालर लोग लिख रहे, गन्ना जल रहा. वैलेंटाइन पे प्रेमिका पूछना चाह रही-उमर भर चीनी खरीद पाओगे..? अनुलोम-विलोम, बाबा अब किंगमेकर बनेंगे. डायबिटीज मर्ज, चर्बी का मर्ज है. सांस गहरी-गहरी खींचनी होगी. आँख मीचे रहना होगा..कहीं कोई क्रांति आग बुझा रही होगी, कहीं कोई कुत्ता पूंछ हिलाए जा रहा होगा. मुझे तत्काल कुछ करना होगा. नींद की दवाई नहीं खानी है मुझे...!!! |
| कविता भी कभी कभी किसी सार्थक बहस के रास्ते खोल देती है ....कभी कभी दो विचारधाराओ को एक ही चीज को अलग तरीके से देखने की दृष्टि का विस्तार करती है ....सहमति ओर असहमति के कई आयाम जब अपना बिंदु तलाशते है .....तो कई बार कविता के कई अर्थ निकलकर सामने आते है .....आप भी अपनी यहाँ राय जाहिर कीजिये .... तुम्हारी इस पेंटिंग से मुझे संतोष मिला कि अधर्म का मुंह देखने से धर्म का पिछवाडा देखना बेहतर है मेरी आस्था के लिए ये नवजीवन था मैंने सोचा था कि एक दिन उस अधर्म को कहूँगी तुम अंधे कायर हो और डर के बूते चलना चाहते हो इस खूबसूरत दुनिया को और सुनों ये दुनिया दो ही भागों में बंटी है धर्म और अधर्म के... अगर समाज इन प्रयोगों से परिचित होता तो वह शायद बहस कर पाता कि ये चित्र अच्छे हैं या नहीं. हुसेन के अपने कृतित्व में सीता, सरस्वती या भारत माता जैसे चित्रों की जगह कितनी है. तब शायद उसे यह भी मालूम होता कि हुसेन ने सिर्फ ऐसे चित्र ही नहीं बनाए हैं; इनसे कई गुना ज्यादा ऐसे देवी-देवताओं को चित्रित किया है जो हमारी परंपरा का सुरुचिपूर्ण और कलात्मक विस्तार करते हैं. उन्होंने ऐसे गणेश बनाए हैं जो लुभाते हैं, ऐसी सरस्वती भी चित्रित की है जो श्रद्धा जगाती है, अपनी मां की तलाश करते-करते हुसेन मदर टेरेसा तक पहुंच गए हैं और नीली कोर वाली उजली साड़ी में उन्होंने करुणा की ऐसी मूरतें बनाई हैं जिनके सामने सिर झुकाने की इच्छा होती है. यह सब मालूम होता तो समाज अपने कलाकार का ज्यादा सम्मान करता. जिन चित्रों को वह आपत्तिजनक मानता उनके प्रति भी क्षमाशील होता. लेकिन कलाकार और उसका समाज एक-दूसरे से अजनबी हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि यह सिर्फ एक कलाकार की स्थिति नहीं, हमारे पूरे सांस्कृतिक संसार की नियति है. यह स्थिति किसी मकबूल फिदा हुसेन को कतर जाने के लिए मजबूर करती है. राजनीतिक व्यवस्था बताती है कि हुसेन भारत लौटने के लिए स्वतंत्र हैं और उन्हें यहां पूरी सुरक्षा दी जाएगी. वह व्यवस्था यह नहीं समझती कि मामला किसी खास नागरिक को सुरक्षा मुहैया कराने का नहीं, स्वतंत्रता का एक ऐसा माहौल बनाने का है जिसमें कोई आदमी आजादी से घुम-फिर सके, लिख-पढ़ सके, सोच-विचार सके. जहां उसे यह डर न हो कि उसकी किताबें जलाई जाएंगी, उसकी तस्वीरें नष्ट की जाएंगी, उसकी फिल्मों के प्रदशर्न रोके जाएंगे, उसके रंगमंच के दौरान हंगामा होगा. राज्य या समाज से यह न्यूनतम अपेक्षा है जो कोई लेखक या कलाकार कर सकता है, वरना राज्य के फर्ज कहीं ज्यादा दूर तक जाते हैं; उसे कला और साहित्य को संरक्षण देने की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है.
|
माजिद मजीदी का नाम सुना है आपने ....नहीं तो बहुत कुछ मिस करे बैठे है ....एक नज़र कबाड़ख़ाने के रास्ते डालिए ..इरानियन फिल्मो की बाबत आपकी सोच बदल जायेगी ...... चलते चलते ........एक शेर बकोल अर्श ......भी... बात रिश्तो की हो मगर उनमे जामुनी लडकिया नहीं आती |
पुनश्च : कंप्यूटर खंगालते एक ओर कविता दिख गयी...इसकी विवेचना ओर अर्थ अपने आप तलाशिये ......
आकाशगंगा तुम्हारी पहुँच से
बहुत दूर है वरना...
तुम उसे पकड़ कर
अपने नाप के कपड़े पहना देते...
लेकिन, याद करो-
जब-जब तुमने ऐसी संगठित ज़िद की
हर देवी ने उधेड़ कर रख दिया तुम्हें
और तुम्हारा ही लिबास बना दिया...
क्या कहा ?
कि कोई कलाकार
मेरे कपड़े उतार ले गया?
कि तूलिका की नाज़ुक नोक
तुम्हारी मोटी खाल में दर्द करती है?
और मैं सुरों की देवी होकर भी
खामोश क्यों हूँ?
मैं जानती हूँ
काम उसका भी चल जाएगा
और तुम्हारा भी...
तुम भीड़ के आदमी हो
और वो बाज़ार का!
फ़र्क इतना है कि वो अकेला है
और तुम्हारे तो बाप का ही राज है
फिर भी...
मुझे तुम दोनों से बचना है
खुद को खुद से रचना है...
और ये बिस्मिल की सरफरोशी की तम्मना का रिडीफाईन्ड वर्जन.. पियूष मिश्र द्वारा उन्ही की आवाज़ में.. फिल्म गुलाल से
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