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सोमवार, मार्च 23, 2009

बलिदान :बलिदानी : भारतमाता की जय


२५ मार्च १९३१ को लाहौर से प्रकाशित `द ट्रिब्यून' का मुखपृष्ठ


सर्वश्री क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को २४ मार्च 1931 को दी जाने वाली फाँसी को एक दिन पहले कर देने के परिणाम स्वरूप क्रांतिकारियों के बलिदान को आज ७८ वर्ष पूर्ण हो गए हैं। लगभग ८ दशक का यह समय आज तक कई प्रश्नों को सुलझा नहीं पाया है। यथा, क्या इन वीर बलिदानियों की फाँसी को टाला जा सकता था? क्या फाँसी अनिवार्य थी? क्या कोई ऐसा व्यक्तित्व/ व्यक्ति था जो फाँसी की इस घटना पर स्टैंड ले सकता था किंतु ऐसा करने को अनिवार्यता नहीं दी गयी ...आदि। पुनश्च इनके कारणों की मीमांसा भी .....|

आज का दिन भारतीय इतिहास का स्वर्णाक्षरों में अंकित किए जाने वाले क्रांतिकारियों से बिदाई का दिन है। प्राण न्यौछावर कर देने का दिन। आज के दिन उस कथा के अतिरिक्त किसी भारतीय मानस में कुछ भी और कहने -सुनने की ऊहा भला होती कहाँ है। चर्चा के मंच पर यदि हम उन्हें सामूहिक प्रणाम तक निवेदित न कर पाए, उस कथा की बारम्बारता में अपने को १५ मिनट भी डुबा न पाए तो अवश्य उस बलिदान की अवमानना के भागी हैं.



क्रांतिकारी बलिदानी <--सुखदेव/राजगुरु -->
बलिदानी सुखदेव का गांधी को लिखा पत्र बहुत चर्चा का विषय बना था!
उस राष्ट्रीय- सामाजिक क्षति ने ऐसा इतिहास बदला कि देश की सभ्यता, संस्कृति,भूगोल, इतिहास, राजनीति, आचार, मूल्य, समाज और जाने क्या चौथे, सब क्षत-विक्षत होने का क्रम तब से चल निकला। भारतेतिहास का भविष्य तक इस त्रयी का सर्वदा ऋणी रहेगा। २३ मार्च के क्षण- क्षण को दंडवत प्रणाम जो साक्षी रहा उस दारुण किंतु वीरता व ओज के साक्षात् रूप की हँसते हँसते फंदों को चूमने जाती पद ताल, उसकी अनुगूँज और फिर २४ मार्च को `भारतमाता' विद्यावती की हवा में बिखरी सिसकियों की भीगी चीत्कारों का.....



किंतु क्यों कोई भी रोक नहीं पाया फाँसी...

बिपिन चंद्र द्वारा लिखी गई भगत सिंह की जीवनी 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' में इस घटना पर तत्कालीन नेताओं और अखबारों द्वारा व्यक्त की गई तीखी टिप्पणियाँ सिलसिलेवार ढंग से दर्ज हैं:

  • '..यह काफी दुखद और आश्चर्यजनक घटना है कि भगत सिंह और उसके साथियों को समय से एक दिन पूर्व ही फांसी दे दी गई। 24 मार्च को कलकत्ता से कराची जाते हुए रास्ते में हमें यह दुखद समाचार मिला। भगत सिंह युवाओं में नई जागरूकता का प्रतीक बन गया है।' [सुभाष चंद्र बोस]

  • 'मैंने भगत सिंह को कई बार लाहौर में एक विद्यार्थी के रूप में देखा। मैं उसकी विशेषताओं को शब्दों में बयां नहीं कर सकता। उसकी देशभक्ति और भारत के लिए उसका अगाध प्रेम अतुलनीय है। लेकिन इस युवक ने अपने असाधारण साहस का दुरुपयोग किया। मैं भगत और उसके साथी देशभक्तों को पूरा सम्मान देता हूं। साथ ही देश के युवाओं को आगाह करता हूं कि वे उसके मार्ग पर न चलें।' [महात्मा गांधी]
  • 'हम सबके लाड़ले भगत सिंह को नहीं बचा सके। उसका साहस और बलिदान भारत के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।' [जवाहर लाल नेहरू]

  • 'अंग्रेजी कानून के अनुसार भगत सिंह को सांडर्स हत्याकांड में दोषी नहीं ठहराया जा सकता था। फिर भी उसे फांसी दे दी गई।' [वल्लभ भाई पटेल]


  • 'भगत सिंह ऐसे किसी अपराध का आरोपी नहीं था जिसके लिए उसे फांसी दे दी जाती।n हम इस घटना की कड़ी निंदा करते हैं।' [प्रसिद्ध वकील और केंद्रीय विधानसभा सदस्य डीबी रंगाचेरियार]


  • 'भगत सिंह एक किंवदंती बन गया है। देश के सबसे अच्छे फूल के चले जाने से हर कोई दुखी है। हालांकि भगत सिंह नहीं रहा लेकिन 'क्रांति अमर रहे' और 'भगत सिंह अमर रहे' जैसे नारे अब भी हर कहीं सुनाई देते हैं।' [अंग्रेजी अखबार द पीपुल]


  • 'पूरे देश के दिल में हमेशा भगत सिंह की मौत का दर्द रहेगा।' [उर्दू अखबार रियासत]


  • 'राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह की मौत से पूरे देश पर दुख का काला साया छा गया है।' [आनंद बाजार पत्रिका]


  • 'जिस व्यक्ति ने वायसराय को इन नौजवानों को फांसी पर लटकाने की सलाह दी, वह देश का गद्दार और शैतान था।' [पंजाब केसरी]


  • आज भगतसिंह से जुड़े कुछ चित्र ताज़ा किए जा सकते हैं


    लालाजी द्वारा असहयोग आंदोलन से जुड़े विद्यार्थियों केलिए स्थापित नैशनल कोंलेज, लाहौर के छात्रों व स्टाफ का एक दुर्लभ ऐतिहासिक चित्र/ दाहिने से चौथे (खड़े ) ------->>

    जेल में लिया गया चित्र नीचे


    Malwinderjit Singh Waraich with Bhagat Singh’smother at Khatkarkalan------>




















    पठनीय



    रुचि अनुसार चुन कर पढ़ने व एकत्र कर सहेजने के लिए निम्न लेखों को देखा जा सकता है

    1. क्रांतिकारी बलिदानी भगत सिंह : परिचय


    2. मैं नास्तिक क्यों हूँ


    3. भगत सिंह का पुश्तैनी घरः चिराग ७८ अंधेरा


    4. वामपंथियों का भगत सिंह पर दावा खोखला


    5. भगत का अनछुआ जगत


    6. क्रांतिकारी बलिदानी सुखदेव : परिचय


    7. सुखदेव


    8. क्रांतिकारी बलिदानी राजगुरु : परिचय


    9. राजगुरु की याद में..


    10. पाकिस्तान का आज भगतसिंह को खोज रहा है


    11. क्रांतिवीर भगत सिंह


    <----- भगतसिंह के दादाश्री अर्जुन सिंह जी












    इन्हीं
    को पढ़ने पर भगत सिंह के पैतृक गाँव के आज का विवरण कुछ इस प्रकार मिलता है
    -

    इस गाँव में आने से पहले जितने काल्पनिक बिंब बन रहे थे, यहाँ आने के बाद सब ध्वस्त होते चले गए. गाँव की तरक्की और समृद्धि की चमक भी शायद इसी वजह से फीकी लगने लगी.

    खट्करकलाँ भगत सिंह के विचारों और प्रभाव से परे यह गाँव आम भारतीय गाँवों का ही चेहरा है

    यह शायद भगत सिंह का गाँव नहीं है. यह वही गाँव है जो पंजाब का गाँव है, भारत का गाँव है. जिसके लिए विकास के मायने सामाजिक बदलाव नहीं, कंकरीट और स्टील है.

    यहाँ के युवा भगत सिंह की नहीं पंजाब के उसी युवा की बानगी हैं जो आज नशे का शिकार है, गाड़ियों पर सवार है और बदलते भारत की चकाचौंध में आगे बढ़ रहा है. उसके पास आज तरह-तरह के साधन, संसाधन हैं पर इनसे वो भारत की तस्वीर बदलने के सपने पता नहीं देखता भी है या नहीं पर हाँ, ज़िंदगी का मज़ा ज़रूर लेना चाहता है.

    यहाँ अमीर-ग़रीब, जाति-मज़हब, छोटा-बड़ा, समता-सम्मान.. इतिहास कई विशेषण आज भी विशेषण ही हैं, यहाँ की सच्चाई नहीं बन सके हैं.

    यहाँ सरकार को दोष नहीं, श्रेय देना चाहिए. देर से ही सही, भगत सिंह का कुछ तो इस गाँव में संजोया जा चुका है. ईंट-पत्थरों और लोहे-पीतल के सही, भगत सिंह कुछ दिखाई तो दे रहे हैं।


    भगतसिंह सुखदेव व राजगुरु के वालपेपर को प्राप्त कर अपना डेस्कटॉप सँवारें।

    कविता का मन


    युनेस्को द्वारा विश्व कविता - दिवस के रूप में घोषित तिथि भी अभी अभी गई है। इस अवसर पर चाहें तो बाबा नागार्जुन का एक संस्मरण यहाँ पढ़ सकते हैं-
    बाबा ने कहा-‘‘तिवारी जी अब इस रचना को बिना गाये फिर पढ़कर सुनाओ।’’

    तिवारी जी ने अपनी रचना पढ़ी। अब बाबा कहाँ चूकने वाले थे। बस डाँटना शुरू कर दिया और कहा- ‘‘तिवारी जी आपकी रचना को स्वर्ग में बैठे आपके अम्माँ-बाबू ठीक करने के लिए आयेंगे क्या? खड़ी बोली की कविता में पूर्वांचल-भोजपुरी के शब्दों की क्या जरूरत है।’’

    इसके आद बाबा ने विस्तार से व्याख्या करके अपनी सुप्रसिद्ध रचना-‘‘अमल-धवल गिरि के शिखरों पर, बादल को घिरते देखा है।’’ को सुनाया। उस दिन के बाद तिवारी जी इतने शर्मिन्दा हुए कि बाबा को मिलने के लिए ही नही आये।


    पदार्पण


    लोकसभा चुनावों की तिथियाँ घोषित हो चुकी है, आचारसंहिता लागू हो चुकी है और दल अपनी दलदल में खूब लोटमलोट हो रहे हैं। लोकतंत्र की असली स्वामी बेचारी जनता रँगे सियारों के असली चेहरे नहीं पहचानती, न उसके पास स्रोत हैं, न संसाधन, न समय है, न ऊर्जा। जो जितना है वह जीवन के जूए को गर्दन पर ढोने में लगा हुआ है। दूसरी ओर,वैसे भी इस देश के लोगों को अपने अतिरिक्त सभी मसले बेमानी लगते हैं। देश - वेश उसके एजेन्डे में कहीं है नहीं। इस देश में चुनाव, वर्चस्व के लिए होने वाले युद्ध का रूपानतरण-भर हैं, नवीकृत व्यूहरचना, नवीन अदृश्य मारक हथियार, नई नई गोपन रणनीतियों के अमोघ प्रयोग..... बस और क्या...!! फिर भी चुनाव लड़े जाते और जीते जाते हैं, एक ऐसे युद्ध की भाँति जिसे आयोजन पूर्वक व्यूहरचना से समन्वित किया जाता हो।

    जन जागृति के नितान्त अभाव, नेताओं व जनता के अधिकांश वर्ग का आत्मकेन्द्रित होना आदि कारणों से चुनावों द्वारा किसी बड़े परिवर्तन की आशा करना ठीक वैसा ही है, मानो वर्षा की बौछारों में आँगन के सूखा बचे रहने की कल्पना करना या दुष्काल में धरती से अँखुए फूटने का स्वप्न देखना।

    पुनरपि यत्न करने में जुटे लोगों को हार नहीं माननी है, व नित नए आते संसाधनों का सदुपयोग करते हुए उन्हें ऐसे विषयकेन्द्रित सामयिक उपयोग में लगाना प्रशंसनीय है। हिन्दी ब्लॊग जगत् में यद्यपि २% भी ऐसे विविध विषय केन्द्रित चिट्ठे नहीं है,पुनरपि जो हैं, उनमें लोकसभा चुनावों पर केन्द्रित सामयिक महत्व के मुद्दे पर हिन्दी में एक ब्लॊग सामने आया है - भारत का फ़ैसला -चुनाव २००९नाम से. नेट पर हिन्दी में इस घोषित विषय पर अद्यतन रहने की अपेक्षा सहित इसके लेखक के प्रति शुभकामनाएँ।

    आशा की जानी चाहिए कि कोई दिन ऐसा आएगा कि हिन्दी को केवल साहित्य और ह्यूमैनिटीज़् वाले बक्से से बाहर निकाल कर उसका प्रयोग ज्ञान-विज्ञान व सभी विद्याशाखाओं की भाषा के रूप में किया जाएगा।


    समकालीन दल - दलगत राजनीति पर केंद्रित एक सार्थक व्यंग्य पढने के लिए यहाँ चटका लगाइए तो आप पहुँच जाएंगे-कछु हमरी सुनि लीजै



    गांधी की गंध में सना हुआ देश है हमारा भारतवर्ष। करीब करीब पिछली एक सदी से यह गांधीमय है। गांधी इसकी पहचान है और गांधी ही इसकी जान है। बिना गांधी के यह देश तो नहीं, हां, देश की कुछ संस्थाएं मरी मरी सी लगती हैं। अब अपनी कांग्रेस को ही लो। जबसे है तबसे गांधी की धोती पकड़े है। धोती मर्दानी से जनानी हो गई पर कांग्रेस ने गांधी की धोती नहीं छोड़ी। धोती पाजामें में तब्दील हो गई तो कांग्रेस ने पाजामे का पांवचा पकड़ लिया। गांधी के प्रति सर्वथा समर्पित है कांग्रेस।

    और सिर्फ कांग्रेस ही क्‍यों, आजकल तो भाजपा भी गांधी को गोद में लिए घूम रही है। सत्ता में आई तो गांधीपूजन शुरू कर दिया। मक़तूल की तस्वीर पर हारफूल चढ़ाकर कातिलों की पीढि़यों ने श्रद्धांजलि दी और पाक़साफ हो गए। संतमना गांधी ने अपना क़त्ल भी माफ़ कर दिया और हिन्दुत्व के ठेकेदारों के मजे़ हो गए।

    भाजपावाले भी यह तथ्य मान चुके है कि गांधी इस देश का प्रतिपल-चर्चित-व्यक्तित्व है। गांधी के बगैर और कुछ भले हो जाए पर इस देश में राजनीति नहीं हो सकती है। देश की आधी राजनीति गांधी के पक्ष में है और आधी उसके विरोध में। हर बात गांधी से शुरू होकर गांधी पर ही समाप्त होती है। गांधीचर्चा और गांधी देश के लिये अपरिहार्य हैं।



    आधी आबादी




    इस खंड में भी आज एक ऐसी महिला और उनके ब्लॊग की चर्चा करने जा रही हूँ, जो उदयपुर, राजस्थान की भूतपूर्व एम.पी., राजसमन्द की एम. एल. ए. व भाजपा की महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं- श्रीमती किरण माहेश्वरी


    प्रशासन, समान नागरिक संहिता, राजस्थान की वर्तमान दशा, गाँधी जी क वस्तुओं की नीलामी आदि विषयों पर उनके लेख उनके स्वनाम ब्लॊग पर पढ़े जा सकते हैं। १७ जनवरी की पहली प्रविष्टि के रूप में पाकिस्तानी नीति अकर्मण्यता एवं दिशाहीनता की शिकार शीर्षक से है.

    एक झलक देखें:


    महात्मा गांधी नें अपना चश्मा, जेब घड़ी, एक जोड़ी चमड़े की चप्पलें, एक पीतल की थाली और कटोरी जैसी कुछ वस्तुएं अपने एक अमेरिकी प्रशंसक को उपहार में दे दी थी। उस प्रशंसक के उत्तराधिकारी जेम्स ओटिस ने इन वस्तुओ को नीलामी के द्वारा विक्रय करने का निर्णय किया। नीलामी की अंतिम बोली भारत के मदिरा उद्योगपति विजय माल्या के नाम पर 9 करोड़ रुपयों पर छूटी।

    कांग्रेस की प्रमुख नेता और पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री अंबिका सोनी ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहाकि इन अमूल्य वस्तुओं को एक भारतीय विजय माल्या की सेवाओं के माध्यम से लगभग दस करोड़ रूपए में क्रय किया गया है। उनके प्रतिनिधि न्यूयार्क में भारतीय वाणिज्य दूतावास के माध्यम से हमारे साथ संपर्क में थे। वहीं इस बात पर विजय माल्‍या ने कहा है कि सरकार गलत तर्क दे रही है। माल्‍या का कहना है कि सरकार और उनके बीच नीलामी को लेकर कोई ऐसी बात नहीं हुई।

    यह अति लज्जास्पद है कि केन्द्र सरकार गांधी स्मृति वस्तुओं को क्रय किए जाने का झूठा श्रेय लेने का प्रयास कर रही है। केन्द्र सरकार ने इस असत्य को सदा ही रहस्य बने रहने का भ्रम कैसे पाला? गांधी के नाम पर देश को भ्रमित करने यह एक घृणित दुःसाहस है। इसकी जितनी भी निंदा की जाए, वो कम होगी। सरकार के इस असत्य के शीघ्र सामने आने से देश एक भ्रम पूर्ण विश्वास से बच गया। नहीं तो जन साधारण यही समझता रहता कि केन्द्र सरकार गांधी स्मृतियों को प्राप्त करने और देश में लाने के लिए गम्भीर थी।


    अनंतिम




    २२ मार्च को अपने आवास पर जेड गुडी का सर्वाइकल कैंसर से हार कर देहांत हो गया| ईश्वर दिवंगतात्मा को सद्गति प्रदान करे।

    कीमोथेरेपी और सर्जरी के बावजूद जेड का कैंसर उनके जिगर, आँत और कमर तक फैल गया था।



    और यह है वह अमर गीत जिसने नए प्राण फूँके



    मेरा रंग दे बसंती चोला
    इस रंग में रंग के शिवा ने माँ का बन्धन खोला ।
    यही रंग हल्दीघाटी में खुल कर के था खेला ।
    नव बसन्त में भारत के हित वीरों का यह मेला ।
    मेरा रंग दे बसन्ती चोला ।


    भारतमाता की जय !!!

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    सोमवार, जनवरी 05, 2009

    कुझ रुख मैनूं पुत लगदे ने, कुझ रुख लगदे माँवाँ






    कल एक समाचार आ रहा था कि विश्व में जिस देश को अपनी सुरक्षा का खतरा जहाँ से हुआ उसने उसे तबाह कर दिया। उदाहरण के रूप में अमेरिका का लादेन की खोज में अफगानिस्तान, इजरायल को तो अभी अभी गाज़ापट्टी से भी जान सुन रहे ही हैं, श्रीलंका जैसे देश ने लिट्टे की तबाही की कमर कस ली है। इन उदाहरणों के बाद एक बड़ा प्रश्नवाचक भारत के नाम के साथ था कि भारत क्या कर रहा है? उत्तर था - बयानबाजी। यदि आप में से किसी के पास अतिरेकी हिंसा का हल बयानबाजी से निकलने का कोई यन्त्र-तंत्र हो तो वे इस देश की सरकार की कुण्डली का उपाय करके कुंडली मारे बैठे नाग का नाश करने की सिद्धि सुझाएँ। वरना ये लोग तो सही आदमी की सही बात को कान पर जूँ की तरह भी नहीं रेंगने देते।

    पर इस देश का हाल तो बुरा है, इसे अतिरेकी हिंसकों के समापन के उपाय भी इसके आक्रान्ता ही बता रहे हैं --

    क्योंकि अब भारत को ब्लैकमेल करने पर उतरा पाकिस्तान

    पाकिस्तान ने अपने इस प्रस्ताव में कई शर्ते शामिल की है। इन शर्तों में यह भी जुड़ा हुआ है कि जो अधिकारी पाकिस्तान में पूछताछ करने जाएंगे उनके बारे में पहले पाकिस्तान सरकार का गृह विभाग उनके चरित्र स्वभाव और व्यक्तित्व की पुष्टि करेगा और तभी उन्हें पाकिस्तानी नागरिकों से मिलने दिया जाएगा।

    xx
    अमेरिकी दबाव से बचने के लिए पाकिस्तान ने यह एक नया दाव खेला है। इस दाव का एक पैतरा यह भी है कि भारत उन्ही लोगों से पूछताछ कर सकेगा जो फिलहाल पाकिस्तान सरकार की हिरासत में है। सभी जानते हैं कि पाकिस्तान ने ज्यादातर उन अपराधियाें और अभियुक्तों को अपनी पहुंच से बाहर बताया है जिनकी तलाश भारत में हुई इस ऐतिहासिक हिंसा के सिलसिले में हैं।

    लश्कर ए तैयबा के ऑपरेशंस कमांडर जकीर उर रहमान लखावी और इसी संगठन के संचार विशेषज्ञ जरार शाह को एफबीआई के दबाव में पाकिस्तान सरकार ने हिरासत में लिया है। लेकिन इनसे भी पूछताछ की शर्त यही है कि पूछताछ के दौरान पाकिस्तानी अधिकारी भी मौजूद रहेंगे। इसके अलावा शर्त यह भी है कि इस पूछताछ की कोई वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की जाएगी और पूछताछ में जो तथ्य सामने आएंगे उनका दस्तावेज भारत के साथ पाकिस्तानी अधिकारियों के दस्तखत से ही प्रमाणित होगा।



    अन्य भारतीय भाषाओं से

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    अपने देश में जैसे कला आक्रमण करने की तैयारी में लगे हैं और वे वाद्य विस्फोटक बनाने की जानकारी भारतीय भाषाओं वाले भिन्न वर्गों को दे रहे हैं -


    अग्नीवाद्यांपैकी एक म्हणजेच स्फोटवाद्य (पायरोफोन) ! यांत ज्वलनशील वायुंचा एका भव्य कुपीत कमी-अधिक प्रमाणात स्फोट करून सूर निर्माण केले जातात. ज्याप्रमाणे संवादिनीवर सुरांसाठी विविध कळी असतात त्याप्रमाणे हा प्रकार असतो. मात्र, संवादिनीत एखादी कळ दाबली की त्या-त्या कळीच्या अनुषंगाने असलेली धातूची पट्टी हवा बाहेर जातांना कंप पावते आणि सूर येतो. स्फोटवाद्यामध्ये मात्र प्रत्येक सुराचे अनुषांगाने कळीचे काय वजन पडले असता स्फोटानंतर योग्य सूर येईल त्याचे गणित केलेले असते. त्यावरून पाश्चात्य पद्धतीचे पूर्ण सप्तक त्यात बसवलेले असते. काही उत्साही लोक निकामी झालेल्या गाड्यांचे भाग या स्फोटवाद्यात रूपांतरीत करतात. तर, काही वीर चक्क ठीकठाक असलेल्या गाडीच्या यंत्रभागाचे स्फोटवाद्यांस पोषक ते बदल करतात. म्हणजे, गाडीला इंधन जास्त लागते, परंतू ती चालू असतांना संगीत वाजवत-वाजवत जायचे. आपल्या गावाकडे बैलगाड्यांमध्ये बैलांच्या गळ्यात घंटा वापरण्यासारखा प्रकार म्हणायचा.



    यहाँ देश की विकट परिस्थिति का उत्तरदायी कौन है, यह आज के मत का विषय है -

    देशाच्या अशा परिस्थीतिला जबाबदार कोण ?

    कॉंग्रेस.
    सर्व राजकारणी.
    मिडीया.
    भाजप
    मुसलमान.
    हिंदू लोक.

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    स्व. शिव कुमार बटालवी पंजाबी के अमर कवि के रूप में ख्यातिप्राप्त कवि हैं, उनकी एक रचना जो वृक्षों और पौधों के मानवीकरण पर है, उसे पढ़वाने का सुख अवश्य लेना चाहती हूँ -



    कुझ रुख मैनूं
    --------------

    कुझ रुख मैनूं, पुत लगदे ने
    कुझ रुख लगदे मावां
    कुझ रुख नूंहां धीआं लगदे
    कुझ रुख वांग भरावां
    कुझ रुख मेरे बाबे वाकण
    पतर टावां टावां
    कुझ रुख मेरी दादी वरगे
    चूरी पावण कावां
    कुझ रुख यारां वरगे लगदे
    चुंमां ते गल लावां
    इक मेरी महिबूबा वाकण
    मिठा अते दुखावां
    कुझ रुख मेरा दिल करदा ए
    मोढे चुक खिडावां
    कुझ रुख मेरा दिल करदा ए
    चुंमां ते मर जावां
    कुझ रुख जद वी रल के झूमण
    तेज वगण जद वावां
    सावी बोली सभ रुखां दी
    दिल करदा लिख जावां
    मेरा वी इह दिल करदा ए
    रुख दी जूने आवां
    जे तुसां मेरा गीत है सुणना
    मैं रुखां विच गावां
    रुख तां मेरी मां वरगे ने
    जिउण रुखां दीआं छावां।
    -----------------------






    विश्व से
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    यदि किसी भिन्न भिन्न वर्ण या 'रेस' वाले दंपत्ति के जुडवाँ बच्चे हों व एक श्वेत व दूसरा अश्वेत हों तो अचरज होता है विधाता की लैबोरेट्री पर, पर यही जुड़वां बच्चे दूसरी बार व इसी प्रकार श्वेत-अश्वेत एक-एक हों तो इस आश्चर्य की बड़ी ख़बर बन जाती है।





    सेन्ट्रल पुर्तगाल की १० सितम्बर १८९३ को जन्मीं Maria de Jesus का यह चित्र ९ सितम्बर २००६ को लिया गया था। वे विश्व की सर्वाधिक आयु की व्यक्ति में रूप में ३ दिन पूर्व सिधार गयी हैं






    कोई व्यक्ति किसी दिन एक लाटरी का टिकट खरीदे व उसी दिन अकस्मात हृदयाघात से उसकी मृत्यु हो जाए और बाद में एक दिन पता चले कि उसी टिकट पर $१० मिलियन की लाटरी लग गयी है तो इस संयोग को आप क्या नाम देंगे ? शायद सोचें कि ये सारे अजूबे उन्हीं लोगों के साथ क्यों घटते हैं... ।





    अभिलेखागार से अंश
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    कुछ दिन पूर्व भय की उत्पादकता के सम्बन्ध में चर्चा चली थी, आज चर्चा के अभिलेखागार से उसी से मिलती जुलती चर्चा वाली २००५ की एक प्रविष्टि आप बाँचें -



    अगर आप किसी शहर में भटक गये हों तो परेशान न हों। किसी कैफे में जाकर नेट पर रोजनामचा पढ़ें। आपको पता चल जायेगा आप कहां हैं। अतुल ने खास प्रोग्राम बनाया है इसके लिये।अभी कुछ खास शहर से बात शुरु की गयी है। बाकी बाद में जुड़ेंगे।

    लेकिन किसी भी शहर में घुसने के पहले वंदना के सुरों में कुछ सुर जरूर मिला लें। लक्ष्मी गुप्ता जी सुना रहे हैं वंदना।

    जीतेंद्र चौधरी लगता है सबको भारत दर्शन करा के ही मानेंगे। फन वैली तथा पहाड़ी रास्तों के खूबसूरत नजारे देखिये। हां अगर कहीं देश की

    बात चली तो भ्रष्टाचार तो आयेगा ही रवि रतलामी के साथ।

    जो डरता है वही डराता है। आजका सबसे भयभीत समाज है वह जिसके पास सबसे ज्यादा ताकत है। यह मैं नहीं खाली-पीली वाले शीष श्रीवास्तव कह रहे हैं:-
    कहा जाता है की इस देश का इतिहास ही हिंसा से भरा हुआ है. वो रेड इंडियनों से संघर्ष हो, या उसके बाद का खूनी स्वतंत्रता संग्राम. विश्व युद्ध और उसके बाद शीत युद्ध्. और आंतक के खिलाफ युद्ध. ये सभी कारण है इस भय का.
    लेकिन क्या ये सच है ? पता नही. नियति कि विडंबना दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र और सबसे ज्यादा भयभीत जनता !



    स्त्रीलेखन

    -----------


    कानपुर में रहने वाली श्रीमती विमला तिवारी विभोर ७१ वर्षीया ब्लॉग हैं, जो कहती हैं-



    दर्शन तथा भावपूर्ण साहित्य पढ़ती हूँ। ज्योतिष और संगीत मेरे प्रिय विषय हैं। महादेवी और टैगोर मेरे प्रिय कवि।


    सन्नाटा निरन्तर आकर्षित करता था पर वहाँ रहने की इच्छा न थी, पर धीरे धीरे चल कर वे क्षण आ ही गए। मैं स्वागत को राजी न थी मगर भयभीत भी न थी। मुझे घेरकर वह गुनगुनाने लगा मैं चकित रह गई ठगी ठगी.. फिर उस अनुभूति को शब्द देना मेरा आनन्द बन गया। जहाँ मैं पीड़ा भूल गई और साक्षात्कार हो गया उस अनजान चितेरे का। अपने बारे में सोचने का कभी मौका नहीं मिला; जैसे कोई मेरा पीछा कर रहा है और मैं भागती जा रही हूँ। पर जब सोचा तो आश्चर्य से भर गई; ये जगत एक तीर्थ, एक उपवन, एक पाठशाला लगा। कुछ अपूर्व जानने की अदम्य इच्छा सदा से है। हर वस्तु मुझे विभोर कर देती है इसीलिए मेरे पति ने मुझे ‘विभोर’ उपनाम दिया। मेरी कविता ही मेरे मन के भेद खोलती है। मैं जो कहूँगी वह अभी की बात है, अगले क्षण मैं क्या सोचूँगी, मैं खुद नहीं जानती। नहीं तो जीवन बिलकुल बेकार हो जाता- व्यर्थ।



    उनकी अंतिम प्रविष्टि में निहित अपने अस्तित्व की प्रमाणिकता को स्थापित करने वाली स्त्री के मनोभावों को शब्द देने की जद्दोजहद ने मुझे प्रभावित किया था। पता नहीं उसके पश्चात् उनकी कोई प्रविष्टि नहीं आई. विमला जी निर्मल आनंद वाले जी की माताश्री हैं, सो वे इसे बता सकते हैं कि क्यों उन्होंने लिखना यकायक बंद कर दिया।

    आप उनकी वहाँ प्रकाशित इस कविता की स्वातंत्र्य-चेतना से प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे -

    Friday, 1 February, 2008

    पद चिह्नों पर नहीं चलूँगी


    पद-चिह्नों पर नहीं चलूँगी
    यह आदेश नहीं मानूँगी
    चरण-चिह्न हो अलग हमारे
    इतना ही अनुरोध करूँगी

    पद-चिह्न के साथ चलूँगी
    उनके चारों ओर चलूँगी
    पूजा भी उनकी कर दूँगी
    आदर-मान सदा मैं दूँगी
    पर इन पर मैं चलूँ प्रिये
    इतना तो कर नहीं सकूँगी

    तुम भी इसी जगत के वासी
    मेरा भी अस्तित्व अलग है
    अपने-अपने चिह्न के संग
    हम दोनों एक साथ चलेंगे
    तुम अपनी पहचान बनाओ
    मैं अपनी धुन में रम लूँगी

    पूज्य चरण पर चरण टिका कर
    क्यों अपमान करूँ मैं उनका
    मैं इनका अनुगमन करूँगी
    उनसे कुछ शिक्षा भी लूँगी

    पद-चिह्नो पर चलकर तुम भी
    कोई राह नहीं पाओगे
    चिह्न बनाकर आगे बढ़ते
    कोई राह ढूँढ पाओगे

    राह हमारी एक रहेगी
    लक्ष्य हमारा एक रहेगा
    चिह्न बनाते आगे बढ़ते
    हम दोनों एक साथ चलेंगे

    क्षितिज पार एक साथ करेंगे
    चरण-चिह्न पर अलग रहेंगे



    अंत में
    --------


    )

    संस्कृत में मेघदूत ( पूर्वमेघ भाग) (महाकवि कालिदास कृत) यहाँ पढ़ें
    व शैलेश खांडेकर कृत
    मराठी अनुवाद को यहाँ पाएँ



    )
    आज सामयिकी चिट्ठा वार्षिकी २००८ सर्वेक्षण का अन्तिम दिन है, आप सभी ने अपनी अपनी राय दे दी होगी, अन्यथा आज शाम ५ बजे से पूर्व अवश्य दे दें। इस सर्वेक्षण में एक प्रश्न है ब्लोगिंग से आय के सम्बन्ध में








    तभी मुझे मराठी ब्लॉग जगत के सर्वोत्तम मराठी विनोद पर इसी प्रसंग में एक हास्य दिखा, आप भी हँस लें -


    सोपा मार्ग.

    दोन भिकार्‍याचा संवाद
    पहिला भिकारी : अरे , मी एक पुस्तक लिहिल आहे.
    दुसरा : काय नाव आहे त्याच ?
    पहिला : सहज पैसा कमावण्याचे सोपे १००१ मार्ग.
    दुसरा : तर तु भिक का मागतोस ?
    पहिला : तो सर्वात सोपा मार्ग आहे.



    आपको इस धन कमाने के सरल मार्ग बताने वाली पुस्तक से दूर रहना है, यह तो आपको हँसाते हुए आप से विदा लेने का उपक्रम था बस।

    सब से ऊपर दिया बच्चे का चित्र यद्यपि बहुत ही पुराना है, किंतु बालसुलभता देखें कि ऐसी असंभव करामात कर सबको अतिचिंता व गंभीरता में डाल कर वे जनाब अभी भी कुछ चबाने में लगे हैं।

    २००९ का यह प्रथम रविवार है, आप खूब ठण्ड में खूब धूप का खूब मजा लें।

    वैसे आप को जाते जाते बता दूँ कि कल अर्थात ४ जन. को स्त्रीमुक्तिदिवस के रूप में मनाया जाता है क्योंकि सावित्रीबाई फुळे से इसका सम्बन्ध है। इन्हे नहीं जानते? तब तो सु्निए

    जे इतिहासापासून धडा घेण्याची तसदी घेत नाही त्यांना इतिहास क्षमा करत नाही

    यह एक इतनी महत्वपूर्ण व प्यारी पोस्ट है कि आप स्वयम् ही इसे यहाँ जाकर पूरा पढ़ें.

    इति वार्ता:॥

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    सोमवार, दिसंबर 01, 2008

    केवल एक गंभीर बात

    अभी कुछ ही मिनट पूर्व पान की दूकान ने इस करतूत को सार्वजनिक किया है, इसे हम तक पहुँचाने के लिए धन्यवाद।

    बहुत गम्भीर मुद्दा है, कृपया सभी बन्धु यू ट्यूब पर जा कर इस सीरिज पर अपना विरोध दर्ज़ कराएँ व प्रतिबंधित करवाएँ। इस सीरीज के कुल ५ वीडियो हैं।



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