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शुक्रवार, मई 28, 2010

देसी तबेले में गर्मी बहुत है

उफ्फ गर्मी बहुत है...आग लगी है...प्‍यास लगी है। बिजली है...पंखे हैं...एसी भी है पर गर्मी फिर भी है। कमरा ठंडा है पर एसी अंदर की गर्मी बाहर फेंके दे रहा है पर यहॉं से वहॉं चले जाने से गर्मी खत्‍म नहीं होती, बनी रहती है। इस भीतर बाहर गर्मी के माहौल में ब्‍लॉगजगत में झांकना शीतल अनुभव तो होने से रहा। माहौल यहॉं भी गर्म ही है पर चिपचिपाती गर्मी में तापमान बढ़ाती पोस्‍टों पर लोग कान नहीं दे रहे हैं...भला है। मीट में पहुँचने से हम चूक गए पर अजयजी भी अब खिन्‍‍न हो गए हैं... वे भी शायद अब ब्‍लॉगिंग को ब्‍लॉगिंग ही रहने देने का मन बना चुके हैं-

आखिर संगठन बनेगा किसके लिए । हमने क्या कोई प्रधानमंत्री चुनना है , क्या कोई आंदोलन खडा करना है , देश की स्थिति बदलनी है , या कि हमें इस संगठन बनाने से अपने अपने घरों की रसोई का जुगाड करना है भाई ?

तापमान दिल्‍ली-कोडरमा का ही नहीं बढ़ रहा काश्‍मीर का भी बढ़ रहा है, पंकज ने सूचना दी है कि हमारे काश्‍मीर के के बारे में बताया जा रहा है कि 95 प्रतिशत लोग आजादी चाहते हैं पर कहीं भी बहुमत 'आजादी' के पख में नहीं है। अरे भई हमारे गणितज्ञ दोस्‍त अभिषेक ओझा कहॉं हैं बताएं किस गणित से बीबीसी ऐसा कह रहा है।

एक तरफ लिखा है कि घाटी के 74% से 95% लोग आज़ादी चाहते हैं (इतना बड़ा फर्क?). चलो ठीक है मान लेते हैं. परंतु आगे लिखा है भारतीय प्रशासित कश्मीर के 43% लोग आज़ादी के पक्षधर हैं. कमाल है!

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अब आगे देखिए - कश्मीर के किसी भी हिस्से में (यानी कि घाटी भी) आज़ादी को लेकर बहुमत नज़र नहीं आया. तो पहली पंक्ति में ऐसा क्यों लिखा है कि 95% लोग आज़ादी चाहते हैं. क्या 95% बहुमत नहीं होता?

रही आजादी चाहने की बात तो चाहें न... आजादी चाहने की पूरी आजादी है भारत देश में। पड़ोस में एक देश है चीन वहॉं आजादी चाहने भर की आजादी नहीं है करो क्‍या कल्‍लोगे।

 

गंदा नाला, गर्म गड्ढा, डबरापारा, ढिबरापारा, गधा पारा.... सुनकर अगर आपका पारा गर्म हो रहा हो तो जान लें कि ये सब जगह के नाम हैं। जो टिप्‍पणी पूरित पोस्‍ट से निकले हैं। जब जगहों की बात हो ही रही है तो हमारी संस्तुति तो ये है कि आप राजजी के साथ उनके गॉंव की सैर पर निकलें ... अजी गॉंव काहे का हमें तो एम्‍यूजमेंट पार्क सा लगा... जहॉं सबकुछ इतना व्‍यवस्थित हो... न कोई खाप पंचायत न दलित उत्‍पीड़न...बहू जलाने की कोई व्‍यवस्‍था नहीं... ऑनर किलिंग के लिए स्पेस नहीं....  खेत में बंटाईधार के शोषण का इंतजाम नहीं... नो नो नो नाट गुड। आप खुद ही देखें राजजी के इस गुड फार नथिंग गॉंव को पहली किस्त, दूसरी किस्त अब तीसरी किस्‍त   हम सेंपल के लिए वहॉं के तबेले का अगाड़ी व पिछाड़ी दिखा रहे हैं। दूध (और मॉंस) का भरपूर स्रोत हैं ये तबेले।

 

नीरज की रोचक टिप्‍पणी -

आज अपने देसी गांव के बारे में कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि मुझे अपने गांव की धूल से, गांव की गन्दगी से, असुविधाओं से बेहद प्यार है।
हां, आपका गांव देखकर लगा कि तकनीकी इन्सान का काम कितना आसान कर देती है।
हम तो जी आज के समय में भी चिलम भरना, दूध दुहना, खाट बुनना, भैंस के ऊपर बैठकर जोहड में जाना जानते हैं

अब कहॉं ये सजे संवरे तबेले जहॉं पशुओं तक को सीवर सुविधा उपलब्‍ध है, कहॉं गर्मी से बेहाल हमारे पशु-पक्षी जिन्‍हें पीने का पानी भी मयस्‍सर नहीं

 

अगर हो सके तो अपने घर के आस पास कुछ मित्रो पड़ोसियों के साथ मिलकर किसी पेड़ के नीचे अथवा किस अन्य छायादार स्थान पर कुछ घड़े थोड़ी रेत ड़ालकर रखा दे . तथा उस पर किसी साफ़ बोरी को लपेट कर गीला करदे . आपका थोड़ा सा श्रम किसी के लिए जीवन दाई हो सकता है

 

इस संबंध में कुछ दिनों पुरानी इस पोस्‍ट को भी देखें-

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शुक्रवार, मई 07, 2010

कोसल में विचारों का अनादर है

पत्रकार व ब्‍लॉगर राजकिशोर के संपादन में एक नई पत्रिका शुरू हुई है 'विचार' इसका प्रवेशांक मेंरे हाथ में है, संपादकीय श्रीकांत वर्मा की इन पंक्तियों से शुरू होता- 'कोसल में विचारों की कमी है'   राजकिशोर अपने कोसल पर विचार करते हैं तथा इसमें तनिक सुधार करते हुए 'कोसल में विचारों का अनादर है'   हम अपने कोसल को देखते हैं पाते हैं कि ब्‍लॉगों के कोसलप्रदेश में विचारों का घनघोर अनादर है... मजे की बात है कि जिन बातों का इस प्रदेश में आदर है वे विचारों के लिए आदर की गुंजाइश छोड़ती ही नहीं। आह परिवार  वाह संस्‍कृति आह आह सनातन धर्म वाह वाह वर्ण व्‍यवस्‍था... और चूल्‍हे में गया विचार.. जला दो इसे..बाद में आत्‍महत्‍या लिखवा लेंगे...स्‍साला विचार बिना ब्‍याह के ही गाभिन हो चला था।

खापवादी पहले थोड़ा शरमाते थे अब वातावरण पूरा ही विचारविरोधी हो गया है इसलिए बेधड़क सारे सवालिया निशान खुद शिकार पर ही लगा रहे हैं। प्रवीण ने अपनी चर्चा में इन्‍हें उद्धृत किया ही था। हमारा मत ये है कि देह- शुचिता के सवाल घनघोर स्‍त्री विरोधी विचार हैं..पर छोडि़ए कोसल में विचारों का...

 

पर विचार इस अनादर के बावजूद है जरूर मसलन फौजिया रियाज अपनी देह पर स्‍त्री के हक के पक्ष में साहसी बात रखती हैं-

समाज, तुम कहते हो की औरत की असल आज़ादी उसके घर में है, उसके परिवार में है क्यूंकि वहीँ वो सुरक्षित है. मेरी आज़ादी क्या है ये मुझे तय करने दो. मेरी असल आज़ादी ये है की आज मैं अपने मन की बात कह सकती हूँ. मुझे शर्म के खोल में लिपटने की ज़रुरत नहीं है, मुझे इज्ज़त के लबादे उढ़ाने की कोशिश करोगे तो उतार फेंकूँगी. मेरे डरने के दिन गए, मेरे सहम कर छुप जाने के दिन लद गए. आज मैं सामने खड़ी हूँ सामना कर सकते हो तो करो

वैचारिक दिवालियापन की केवल एक मिसाल महफूज की टिप्‍पणी में देखें फ़ौजिया के लेखन की तारीफ करते हुए वे कहते हैं-

अब मैं क्या बोलूं..... हर टोपिक बहुत शानदार होता है.... और बर्निंग होता है... मैं बहुत ऐप्रेशिईट करता हूँ... लिखने के स्टाइल को.... तुम्हारे.... इस पोस्ट को क्या कहूँ.... लफ्ज़ नहीं नहीं मिल रहे हैं ....तारीफ़ करने को....
ग्रेट.....
रिगार्ड्स..

जबकि वाणी जब अपनी पोस्‍ट में कुछ और सवाल उठाती हैं तो ये ही महफूज जी भूल जाते हैं कि वे अभी स्‍त्री की देह पर स्‍त्री के (उसके परिवार/समाज..के नहीं) हक पर वाह वाह कर आए हैं और अचानक अनब्‍याही मॉंओं को मार देने का फतवा जारी करते हैं-

 

जबकि यह बात एकदम सही है.,... कि दुनिया का कोई भी माँ-बाप यह कभी नहीं बर्दाश्त करेगा... कि उसकी बेटी या बेटा भी.... सामाजिक बंधनों से पहले .... मातृत्व या पितृत्व ... सुख ले ले.... हो यह भी सकता है कि जब निरुपमा के माता-पिता ने उसके गर्भवती होने का सुना तो उसको मार दिया.... और अगर ऐसा है तो उन्होंने ठीक किया....

वेचारिक दरिद्रता कोई इन साहब को पेंटेंट नहीं है ब्‍यार ही ऐसी चल रही है।

 

ऐसे में नास्‍तिकों का ब्‍लॉग कम से कम अभी तक तो बेहद ताजगी का अहसास दे रहा है... वहॉं आप हे हे हे साधुवाद करके नहीं आ सकते बेविचार के लोग जाएं ज्‍योंतिष या धर्म बचाओ वालों की शरण में। नास्तिकता सहज है संजय की छोटी सी पोस्‍ट है जिस पर 65 टिप्‍पणियॉं हैं जो पोस्‍ट से ज्‍यादा कीमती हैं। विचार के बहिर्गमन की कोशिशों के बीच इसे देखना राहत देता है।

हर बच्चा जन्म से नास्तिक ही होता है। धर्म, ईश्वर और आस्तिकता से उसका परिचय इस दुनिया में आने के बाद कराया जाता है, इसी दुनिया के कुछ लोगों द्वारा। कल्पना कीजिए कि इस पृथ्वी पर कोई ऐसी जगह है जहां ईश्वर का नामो-निशान तक नहीं है। ईश्वर की कोई ख़बर तक उस देश में कहीं से नहीं आती। कोई मां-बाप, रिश्तेदार, पड़ोसी, समाज, बड़े होते बच्चों को ईश्वर की कैसी भी जानकारी देने में असमर्थ हैं, क्योंकि उन्हें ख़ुद ही नहीं पता। क़िस्सों और क़िताबों में ईश्वर का कोई ज़िक्र तक नहीं है। तब भी क्या वहां ईश्वर के अस्तित्व या जन्म की कोई संभावना हो सकती है !?

 

मेरे लिए सबसे बड़ी राहत की बात इस कल्‍पना में ये है कि इस ईश्‍वर निरपेक्ष समाज में खाप-ऑनर किंलिंग- निरुपमा के होने की कोई गुंजाइश नहीं...। खैर एक जीवंत बहस में से एक का आस्‍वादन करें-

सिरिल-

One cannot claim that the universe (atoms) were brought in order by a God who exists in a realm that is not a part of this existence. If the electrons or protons, or neutrons are in order that does not imply that somebody brought them into order. They could be order just because that's the way of the things (or we may discover the true reason later), not because they were created by God.

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नास्तिकता परंपरा का विरोध नहीं, परंपरा का न होना है. सोचिये अगर कोई परंपरा न हो तो जो बचेगा वही नास्तिकता है. आप उसका मूर्त रूप परंपरा के विरोध में देखते हैं क्योंकि परंपरा होने की वजह से विरोध होता है. अगर परंपरा नहीं होती तो विरोध भी नहीं होता.

अगर आप ईश्‍वर को मानते हैं (या ज्‍योतिष/रत्न/तंत्र मंत्र/) तो आपको इस ब्‍लॉग को जरूर देखना चाहिए कि कैसा कैसा कुफ्र हो रहा है भगवान (जैसा है जहॉं है के आधार पर) इनके कंप्‍यूटर पर बिजली क्‍यों नही गिराता। अगर नहीं मानते तो जरूर जाएं और देखें कि कैसे इस मुद्दे पर इस और उस धर्म के कट्टरपंथी एकसाथ बिलबिलाते हैं... आय एम लविंग इट।

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शुक्रवार, अप्रैल 30, 2010

नीतीश स्‍पीक्‍स- लफत्‍तू रीड्स

लफत्‍तू हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत के लिए नए नहीं हैं नीतीश जरूर हैं इसलिए लपूझन्‍ना के लफत्‍तू के सामने नीतीश जो बेचारे पहली पहली हिन्दी ब्लॉग पोस्ट लिख रहे हैं (दरअसल इतिहास की पहली मुख्‍यमंत्रीय हिन्‍दी पोस्‍ट) को इतने जमे हुए पात्र लफत्‍तू के सामने खड़ा कर देना, है तो नीतीश के साथ अन्‍याय ही पर सारा अन्‍याय जनता के ही खिलाफ क्‍यों हो थोड़ा बहुत नेता के साथ भी तो होना चाहिए :)। अपनी पोस्ट में नीतीश ने अपराध नियंत्रण पर अपने कामों को गिनाया है ठीक है एक सीएम टाईप बातचीत है (या कहें सीएम के पीआरओ टाईप) दूसरी ओर लपूझन्‍ना की अगली किस्त में 'नागड़ादंगल और दली को आग कैते ऐ'  इस कड़ी में वैदजी के भाषण पर अपने हीरो लफत्‍तू की कमेंटरी है अब इसे आप हमारी ब्‍लॉगरी खुराफात ही कहें कि हमें नीतीश के भाषण में वैदजी दिखे और लफत्‍तू में तो लफत्‍तू ही दिख सकता है। तो लीजिए नीतीश स्‍पीक्‍स और लफत्‍तू रीड्स हाजिर है ये केवल दो टेक्‍स्‍ट का एक साथ ब्‍लॉग पाठ है इसमें उतना ही पढें :)  -

नीतीश स्‍पीक्‍स

लफत्‍तू रीड्स

          ये कतई आसान न था । मुझे इस प्रयास में उस मिथक को तोड़ना था कि बिहार में अपराध नियंत्रण किसी के वश में नहीं है । मैं इसके लिये कृतसंकल्‍प था किन्‍तु मुझे इस बात का ख्‍याल रखना था‍ कि हमें इस उद्देश्‍य की प्रा‍प्ति कानून के दायरे में ही करनी थी । विगत में देश के विभिन्‍न भागों से आयी खबरों के कारण मुझे इस बात का इल्‍म था कि कानून-व्‍यवस्‍था के नियंत्रण के नाम पर अक्‍सर मानवाधिकारों का उल्‍लंघन होता है । इसी लिये मुझे यह सुनिश्चित करना था कि हमारी लक्ष्‍य प्राप्‍ति की दिशा में इस प्रकार की चूक न हो ऐते बोल्लिया जैते आप छमल्लें हम कोई दंगलात से आए हैं. थब को पता ए

          सन 2006 में मैंने लंबित मामलों के त्‍वरित निष्‍पादन हेतु एक मींटिग आहूत की ....मेरी जानकारी में भारत में ये अपने प्रकार की पहली पहल थी । ....हमने एक 'एक्‍शन प्‍लान' के तहत हजारों लंबित मामलों की सुनवाई हेतु 'स्‍पीडी ट्रायल' की व्‍यवस्‍‍था की, ...... हमारी सरकार अपराध नियंत्रण की दिशा में किसी तरह की कोताही बर्दाश्‍त नहीं करेगी । .....हमारे शासन काल में एक भी संप्रदायिक दंगे या जातीय संघर्ष की घटना नही हुई है । ..... हमारी सरकार ने थानों के रख-रखाब के लिये एक विशेष वार्षिक कोष का गठन किया ।

बली बली योजनाएं बन रई ऐं बच्चो देश के बिकास के लिए ... हमाले पैले पलधानमन्त्री नेरू जी ने दिश के बिकास के लिए बली बली योजनाएं बनाईं ... बली बली मशीनें बिदेस से मंगवाईं ... रेलगाड़ियां और मोटरें मंगवाईं ... पानी के औल हवा के जआज मंगवाए ... तब जा के हमाला बिकास हो रा ए ...
           वर्षों बाद लोग देर रात तक अपने परिवार के सदस्‍यों के साथ सड़क पर पु:न दिखने लगे । एक वक्‍त था जब समाज में भय इस कदर व्‍याप्‍त था कि पटना के रेस्‍त्ररां में बमुश्किल एक या दो ग्राहक रात्रि में देखे जाते थे । अब आलम यह है कि लोंगों को होटलों में प्रवेश के लिये कतार में लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है । यहॉं तक कि लोग परिवार सहित नाईट शो में भी सिनेमा हॉल में फिर से दिखने लगे हैं । मुझे यह कहने में लेशमात्र झिझक नहीं है कि यह परिवर्त्तन मूलत: अपराध पर नियंत्रण होने के कारण संभव हो पाया । इसका प्रभाव अन्‍य क्षेत्रों पर भी हुआ बली बली योदनाएं बन लई ऐं ... बले आए नेलू जी ... बले बले दाम बन लए ऐं ... तूतिया थाले नेलू जी ... जाज खलीद लए ऐं ... कूला खलीद लए ऐं ... मेले कद्दू में गए छाले बैदजी और नेलू जी ... तल तैलने तलते ऐं याल
       बिहार में यह अब संभव नही है कि कोई व्‍यक्ति जुर्म करके सजा से बचा रह सके ।---उन्‍हें अब इस बात का पता है कि कोई है जो उन पर नजर बनाये हुये है दली को आग कैते ऐं औल बेते बुदी को लाक ... और उछ आग से निकले बारूद को विछ्छनात कैते हैं
        अपनी काले शीशे चढ़े वाहनों की खिड़कियों से बंदूके दिखाने का शौक था या फिर उन्‍हें जिन्‍हें शादी-विवाह के अवसर पर शामियाने में अपनी गैर-लाईसेंसी हथियार से गोली दागकर शक्ति प्रदर्शन की अभिरूचि थी बन गया बेते थब का नागलादन्गल. तूतिया ऐं थब छाले.
आप छमल्लें काला तत्मा पैनने वाला आदमी कबी सई नईं हो सकता.

 

अन्‍य पोस्‍टों में रवीश की महानगर के कार्नर उद्यमों पर पोस्‍ट बेहद अहम है-

ऐसी दुकानें हर शहर की खासियत होती हैं। एक ऐसी जगह होती हैं जहां आपकी पहचान सबसे ज्यादा सुरक्षित होती है। कोई नहीं देख सकता और वहां कोई नहीं आ सकता। ये वो जगह होती हैं जहां आप वर्जनाओं को तोड़ने जाते हैं। सिगरेट पी लेते हैं। पान खा लेते हैं और कहीं कोने में निवृत्त भी हो लेते हैं।

जब अहम को खोजने की प्रक्रिया शुरू हो ही चुकी है तो गिरिजेशराव की पोस्‍ट पढ़े और अपने हिस्‍से के कुरूक्षेत्र को पहचानें-

पिछ्ले सप्ताह से निकलना प्रारम्भ किया तो देखा कि कुरुक्षेत्र फिर से तैयार है। गाजर घास के सफेद फूल अपने चरम पर हैं। यही समय है कि उन्हें नष्ट किया जाय। श्रीमती जी कहती रहती हैं - एक अकेला क्या कर लेगा? कोई पुरुष मेरी बैचैनी देखता तो कहता - अकेले क्या उखाड़ लोगे ?

 

इसी क्रम में दो खोजपूर्ण पोस्‍ट विनीत तथा सुरेश चिपलूनकर की हैं विनीत ने मीडिया हाउस में यौन शोषण तथा सुरेशजी ने बैरकपुर की खिलाड़ी छात्राओं के साथ दुर्व्‍यवहार को सामने लाने का काम किया है।

नाउ मसिजीवी लीव्‍स।।

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शुक्रवार, मार्च 19, 2010

लजाइए नहीं ... चिट्ठाईए - कठिन ब्‍लॉगिंग के हाफ बाल्‍ड प्रेत के लिए

एक पोस्‍ट पर चर्चा कई बार हुई है पर आज हम एक चिट्ठाकार पर चर्चा करना चाहते हैं। गजब खब्‍ती चिट्ठाकार है ये। वन कैननॉट ड्रेग हीम टू... ब्‍लडी कीचड़ आव चिट्ठाकारी, अगला वही रहेगा जो है पर यू कान्‍ट ड्राइव हीम अवे आइदर ... अगला बना रहेगा। आप टिपियाए या नहीं, पढें या नहीं (समझ पाएं या नहीं)यानि चिट्ठाकार परमोद बाबू

         

       

 

आज की उनकी पोस्‍ट  कुल जमा दो लाइन की पोस्‍ट है... पूरी की पेरी दे  देते हैं-

जीवन के ट्रैफिक में मैं कहीं उलझा रह गया था, मौका अभय बाबू ने मार लिया था, मेरे देखने का छींका आज टूटा, उसी मीठी जलेबी का एक छोटा सा मजमून है.

अपने दूसरे ब्‍लॉग सिलेमा पर उन्‍होंने घोर गैर सेंसेश्‍नल फिल्‍म दाएं या बाएं की एक समीक्षा पेश  की है, अभय पहले ही इस फिल्‍म पर लिख चुके हैं पर प्रमोद की समीक्षा उसमें कुछ जोड़ती ही है।

फ़ि‍ल्‍म देखने के बाद इस अहसास की खुशी होती है कि बतौर माध्‍यम सिनेमा अब भी अपने देश में एक संभावना है, और वह फ़ि‍ल्‍मकार के हित में सिर्फ़ यही दिखाने का जरिया नहीं कि वह कितना स्‍मार्ट है, या जिन जड़ों से आया है उसकी कितनी स्‍मार्ट, एक्‍ज़ॉटिक पैकेजिंग करने का उसने हूनर हासिल कर लिया है. बेला ने अपनी पहाड़ी पृष्‍ठभूमि और स्‍थानीयता को जो सिनेमाई अरमान और ऊंचाइयां दी हैं, उसके लिए जितनी भी उनकी तारीफ़ की जाए, कम है. भयानक शर्म की बात है कि फ़ि‍ल्‍म के तैयार होने के एक साल बाद भी फ़ि‍ल्‍म के निर्माता सुनील दोषी उसे रिलीज़ करने की दिशा में कोई भी कदम उठाते नहीं दिख रहे. इस दो कौड़ि‍या आचरण पर कोई उनसे जवाब तलब करेगा? मीडिया, कुछ करे

हमने आज परमोद बाबू को चर्चा के लिए चुना उसकी वजह केवल यही पोस्‍ट नहीं है वरन शायद खुद परमोद बाबू हैं।  लोग जब अकेले या ऐसोसिएशनों के बूते जगह बनाने और न बना पाने या कम बना पाने पर हिटत्‍व के नुस्‍खे लिखने पर उतारू हों तो ऐसे में प्रमोद का ब्‍लॉग व्‍यक्तित्‍व हैरान करता है। प्रमोद विरक्‍त ब्‍लॉगर नहीं हैं उनका आर्काइव खंगालने से सहज ही पता चलता है कि वे निरंतर लिखते रहने वाले ब्‍लॉगर हैं तथा एकाध किसी दुर्लभ प्रसंग को छोड़ दें तो ऐसा कोई अवसर याद नहीं पड़ता जहॉं वे किसी वाद विवाद संवाद में पड़े हों। टिप्‍पणियों का समीरानंद कभी उनकी पिछवाड़े नहीं बहा (यहॉं तक कि शायद यही ब्‍लॉग है जिस पर टिप्‍पणी करना खुद समीर तक भूल जाते हैं :))    पर मजाल है इससे प्रमोद के लिखने की शैली पर बित्‍ता भर फर्क पड़ता हो।

प्रमोद के लेखन की खास बात उनका परी तरह प्रोफेशनल किस्म की शैली तथा उनका डरा देने की हद तक बहुपठ  होना तथा वाइडली ट्रैवल्‍ड होना है। हमें तो वे कठिन ब्‍लॉगिंग के प्रेत नजर आते हैं। खैर चर्चा के लिए सलाह देते हैं कि उनकी चंद सीरिज पर नजर डालें मसलन पतनशील साहित्‍य की उनकी खिड़की में एक न दो पूरी दो सौ तेरह पोस्‍टें हैं हर एक को पढ़ना एक तकलीफदेह यात्रा से गुजरना है। इसी सीरिज ने बाद में पतनशीन औरतों वाले लेखन को प्रेरित किया था जो हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की ऐसी विरासत है कि संस्‍कृति के गदाधारियों का आज तक उसके सपने आते होंगे।  भर भर घर से एक हिस्‍सा-

चार दिनों से बंद हूं तंग हूं अलग बात है, सच्‍चाई यह है ग़लत शादी की तरह यह घर हमेशा से मेरी जान खाती रही है. पूछो क्‍यों हमारे हिस्‍से आई तो हरामख़ोर का चेहरा उतर जाता है! अबे, किसी और के गले जाकर नहीं बंध सकती थी, समूचे चॉल में ‘कथा’ के नसीर की तरह एक हमीं शरीफ़ मिले कि अपने मोह में उलझाकर हमारे कृशकाय पर लतरकुमारी होकर लटक लीं? चलो, एक मर्तबे हर किसी से ग़लती होती है, हमसे भी हुई हमने भाव दे दिया मगर बेहयाकुमारी अबतक लटकी हो?

  ऐसा नहीं कि प्रमोद किसी कोकून में दबे- छिपे लेखन करते हैं, खुद ब्‍लॉगिंग पर उन्‍होंने 166 पोस्‍टें लिखी हैं जो काम के लिंक्‍स व चिंतन से भरी हैं।

इन सबके अलावा प्रमोद के स्‍केच ... ओह गॉड हाउ टैंलेंटेड दिस हाफ बाल्‍ड मैन इज...

 

[manisha+mad.jpg]

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शुक्रवार, फ़रवरी 12, 2010

ब्‍लॉग शहर के घर, दुकानें और चिरकुट गलियॉं

ज्ञानजी ने घेटो-रूपक को आगे बढ़ाकर इसे पूरे शहर में तब्दील किया है। साईबर्बिया में नए बाशिंदे के आने बसने की पूरी प्रक्रिया-

नया ब्लॉगर आता है। अपना स्पेस तलाशता है। पुराने जमे लोग अपने में ही मगन रहते हैं। नया सोचता है कि वह कहीं ज्यादा टैलेण्टेड है। कहीं ज्यादा ऊर्जावान। स्थापित ब्लॉगर गोबर भी लिखते हैं तो बहुत तवज्जो मिलती है। उसे नायब लिखने पर भी कोई नोटिस नहीं करता। सो नया बन्दा अपने घेट्टो तलाशता है। हिंसा (गरियाने) का भी सहारा लेता है। डोमेन हथियाता (जमीन खरीदता) है। रीजनल आइडेण्टिटी की गुहार लगाता है। चिठ्ठाचर्चा के पर्याय बनाता है। सोशल नेटवर्किंग तेज करता है। कोई कोई बेनामी गन्द भी उछालता है। घर्षण बढ़ता है। स्थापित उनकी लैम्पूनिंग करते हैं और नये ब्लॉगर स्थापितों की। बस इसी गड्डमड्ड तरीके से साइबर्बिया आबाद होता है। बढ़ता है

वैसे किसी रूपक को ज्‍यादा खींचने और इसके हर अंग का साम्‍य खोजने की अपनी दिक्‍कतें हैं तथा मानविकी में रूपकों को केवल स्‍टाईल के महत्‍व का माना जाता है पर हम कौन सा इसपर थीसिस लिख रहे हैं एक चर्चा भर ही तो कर रहे हैं इसलिए हमने सोचा इसी कंटेप्‍रेरी भाषा में बात जारी रखी जाए और आज के ब्‍लॉगशहर की चिरकुट गलियों में घूमा जाए- तो पहले पहल तो साइबर्बिया की नई इमारत बज्‍़ज की बात करते हैं...उसके आते ही कईयों ने बज्‍़ज किया कि भई इससे गोपनीयता का बैंड बज सकता है फिर निजता प्रहरियों ने एक एक कर इससे बचने या इसे निष्क्रिय करने के तरीके खोजने शुरू किए। तो आप अपनी निजता के मानक तय करें। हम अभी फेंस सिटर हैं हमें लगता कि अभी तेल की धार देखने दो तब इलाज खोजेंगे।

इसी शहर की एक छोटी गली में चन्‍दन कुमार ढाका में फर्राटा जीत ले जाने वाली पाक धाविका की विजय पर जश्‍न कर रहे हैं-

जब नसीम पाकिस्तान वापस लौंटी तो उनका जोरदार तरीके से स्वागत हुआ। इन खेलो के 26 साल के इतिहास में नसीम पहली पाकिस्तानी महिला हैं, जिन्होंने 100 मीटर के दौड़ में गोल्ड मेडल जीतकर पाकिस्तान का नाम रोशन किया है. इस महिला खिलाड़ी ने आतंकवाद की चोट से घायल मुल्क के लोगों के लिए खुशी का जो अवसर दिया है, उसकी तुलना नहीं हो सकती है

अब शहर बसेगा तो मौसम बनेगा-बिगड़ेगा ही, फिलाडेल्फिया से मौसम की मार का नजारा पेश कर रहे हैं हरि प्रसाद

 

चलिए अब इस रीयल के घालमेल को छोड़कर साइबर्बिया की साइबरी दुनिया में ही सीमित रहें और पूछें कि सही गलत में सही रंग कौन सा है काला कि सफेद ? सवाल 'मोहतरमा' घुघुती बासूती ने पूछा है (विद नॉटी अपोलॉजी टू डीयर मिथिलेश) :)

जीवन में हम अधिकतर बातों को सही या गलत, काले या सफेद, अच्छे या बुरे के साँचे में डालने के यत्न में लगे रहते हैं। यह हमारे लिए सुविधाजनक होता है। इससे मस्तिष्क को कम से कम कष्ट होता है। सबसे बड़ा लाभ तो यह होता है कि हमें अधिक चिन्तन भी नहीं करना पड़ता । किसी अन्य के बनाए मूल्यों को हम जीवन भर अपना कहकर जीते चले जाते हैं, उनपर न विचार करते हैं, न प्रश्न करते हैं,

हमें खुद हमेशा से लगता है कि ब्‍लैक-व्‍हाइट में सोचने वाले जिंदगी में बहुत खुश रहते हैं उन्हें सब साफ दिखता है...मैं सही तू गलत...एक्स सही वाई गलत..पीरियड।  सारा कष्‍ट ग्रे मटेरियल वालों के ही लिए है।

शहर होगा तो घेटो बसेंगे जो बाहर से जाने वाले बसाएंगे अब ऐसे में बेचारे शिवसेनिकों को कितना काम करना पड़ेगा शहर को साफ रखने की कोशिश में। ये मेहनती शिवसैनिक तब तक 'काम पर' लगे रहने वाले हैं जब तक कि बोरियत गति को प्राप्‍त न हो जाएं, ऐसा किसी ऐरे गैरे ने नहीं खुद नाम में ही शिव ढो रहे शिवकुमार जी ने बाकायदा ठाकरे भाउसा से पूछकर बताया है-

ठाकरे जी : यही तो असली राजनीति है. अब तुम्ही बताओ. क्या तुम इस बात को स्योर होकर कह सकते हो कि शिव-सेना पत्रकारों का इस्तेमाल नहीं कर रही? नहीं न....यही असली राजनीति है. मीडिया शिव-सेना का इस्तेमाल कर रही है. शिव-सेना मीडिया का इस्तेमाल कर रही है. फिल्म प्रोड्यूसर शिव-सेना का इस्तेमाल कर रहा है. शिव-सेना प्रोड्यूसर का इस्तेमाल कर रही है. असल में यह इस्तेमाल करने का युग है.....

नाउ गैटिंग बैक टू ग्रेट घालमेल आफ रीयल एंड वर्चुअल, आपके पास दो विकल्‍प हैं या तो अजय से पिछले घालमेल का ब्‍यौरा (चौथी किस्‍त) हासिल करें या फिर बोरिया बिस्‍तर बांधें और सियाचिन में ऊँचे लोग ऊँची पसंद वाले घालमेल के लिए तैयार हो जाएं।

दिल्‍ली : सभी ब्लोग्गर्स का एक साथ मानना था कि यदि ऐसा संभव है तो सामूहिक रूप से इस दिशा में काम किया जाना चाहिए और एक आध को पकड कर बेकनकाब किया जाना चाहिए

सियाचिन : शाम को ४ बजे आपको नींबू की शिकंजी वितरीत की जायेगी. तदुपरांत आपकी मन मर्जी से दो घंटे आप बिता सकेंगे. इन दो घंटे मे आप चाहें तो किसी की बुराई करें...या संचार रूम में जाकर अनाम टिप्पणीयां करें...गरियाये प्रसंशियाये...आपकी मर्जी अनुसार कार्य करें...

चिरकुटर्बिया में ओर भी बहुत कुछ चल रहा है पर क्‍या करें रीयल दुनिया की चिल्‍ल पों ऐसी है कि बखत कम पड़ रहा है इसलिए फिलहाल हमें इजाजत दें।

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शुक्रवार, दिसंबर 25, 2009

नो लल्‍लो-चप्‍पो: एक वर्तनीदोष चर्चा.... मास्साब टाईप

कई लोगों को लगता है कि भई चिट्ठाचर्चा दोषों की उपेक्षा करती है तिस पर हम जैसे मास्‍साब को तो चाहिए कि वे जमकर छिद्रान्‍वेषण करें दोष दर्शन, परदोष प्रदर्शन करें। काहे नहीं करते... इसलिए कि खुद हमारे चिट्ठाकर्म में जितने वर्तनीदोष होते हैं उतने अगर कक्षा में ब्लैकबोर्ड पर हो जाएं तो बालक हड़ताल कर दें :) पर जो अपने दोष देखने लगे वो भी भला कोई ब्‍लॉगर है.

तो आज की चर्चा आज की पोस्‍टों में वर्तनी (बोले तो स्‍पैलिंग) की गलतियॉं खोजने वाली चर्चा है। अलग अलग पोस्‍टों में जो गलतियॉं हैं उन्‍हें बोल्‍ड भर कर रहे हैं आप उनके सही रूप को सुझा सकते हैं। पोस्‍टों के लेखक इसे शुद्धतावाद न मानें ज्‍यादा से ज्‍यादा हमारे अपने होने को जस्‍टीफाई करने की कोशिश मान सकते हैं :)। वैसे गलत स्पैलिंग कोई बहुत बड़ा दोष नहीं है तथा हम खुद पर्याप्‍त समर्थ दोषी व्‍यक्ति हैं पर हॉं इस तक में हम सबसे समर्थ नहीं हैं। इस हुनर के सबसे माहिर उस्‍ताद अपने कुन्‍नु भाई हैं.. हैं कि नहीं।

तो चलते हैं आज की पोस्‍टों की ओर-

मत विमत की अनुजा ने स्‍त्री प्रश्‍न के धर्म जैसी संस्‍थाओं के स्त्रीविरोध को पुन: कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया है...बहुत ही दमदार पोस्‍ट है जिसपर आस्था के मारे कई पाठक आ आ के सफाई सी दे रहे हैं ... धत्‍त हम तो पोस्‍ट की तारीफ करने लगे जबकि हमें तो गलती खोजनी हैं सो देखें

बाबजूद इसके स्त्रियां धर्म और ईश्वर के प्रति इस कदर प्रतिबद्ध नजर आती हैं

जहां से वो कभी बाहरर नहीं आ पाती।

उन लड़कियों को जो या तो परिक्षा देने जा रही होती हैं

इसे उनका एक महत्वपूर्ण क्रांतिकार कदम कहा-माना जाएगा

इस मामले में बतंगड़ के हर्षवर्धन एक दम बेकार पत्रकार हैं हम पूरा आलेख चाट गए पर वर्तनी की गलती न खोज पाए ... ये ठीक बात नहीं है... दूसरे की रोजी का भी ध्‍यान रखना चाहिए भई। भारतीय नागरिक ने भी पत्रकारीय लेख लिखा है पर कम से कम हमारे लिए थोड़ी गुंजाइश रखी है न-

शायद उन्हें यह पता नहीं होगा कि शाह बनो को गुजरा भत्ता न देने के लिए

चोखेरबाली पर एक अ-चोखेरबाली पोस्‍ट है जिसमें एक 'बेचारी' बहन की पीड़ा दिख रही है जिसमें अरैंज्‍ड विवाह के बेबात के तनावों पर बात की गई है...स्त्री विमर्श...वो पता नहीं-

बस उनके बोल बचन अच्छे नहीं लगे।

भाजपा नेत्री किरध महेश्‍वरी के ब्‍लॉग पर कश्‍मीर में सेना बनाए रखने के पक्ष में तर्क दिए गए हैं-

जम्मू कश्मीर राज्य में आंतरिक सुरक्षा की स्थिती भयावह बनी हुई है।

केन्द्र सरकार विस्थापित पंडितों के पुर्नवास के लिए कदम क्यों नही उठा रही है।

वंदना अवस्‍थी की कहानी अनिश्चितता में

मैंने भी अपना सूटकेस और बैग सम्हाला और एक डिब्बे की तरफ़ चल पड़ा

उसके जाते ही घर के माहौल में जिस तेज़ी के साथ परिवर्तन हुआ, उसे देखते, मह्सूते हुए घर में रह पाना बड़ा मुश्किल था,

एक लड़के को ट्यूशन पढ़ने लगा था

कहानी गिरीजेश राव की प्रिंटर की धूल और मोटी रोटियॉं भी है पर दोष वही है हर्षवर्धन वाला पूरी कहानी पढ़ लो एक गलती न मिले... कित्‍ता बुरा लगता है सोचो सुबह से शाम हो जाए कंटी डाले एक मछली न फंसे ... नो गुड।

घुघुतीजी की ऑक्‍टोपस प्रजाति की आदत पर पोस्‍ट

एक औक्टॉपस की प्रजाति तो ऐसा बिल्कुल नहीं सोचती

रवि रतलामीजी को मंथन पुरस्‍कार प्राप्‍त होने पर संजीव की पोस्‍ट

निश्चित ही रवि भईया के इस प्रयास से छत्‍तीसगढी भाषा का विकास संभव होगा एवं जमीनी स्‍तर पर अधिकाधिक लोगों को कम्‍प्‍यूटर तकनीकि का ज्ञान सहज रूप से प्राप्‍त हो सकेगा.

जसवीर की कविता यूनिफार्म

जो रिक्‍शे चला रहे हैं
जो चाय बना रहे हैं
और गुब्‍बारे बेच रहे हैं
तभी तो हौंसला बना है मुझमें
भीड़ की विपरीत दिशा में चलने का

वर्तनीदोष पराक्रम में गिरिजेश राव और हर्षवर्धन भाई जैसे त्रुटिकृपण लोग रंगनाथजी से शिक्षा ले सकते हैं जो शीर्षक से ही बोल्‍ड हैं-

दो व्यस्क स्त्री और पुरूष किन-किन शर्तों पर शारीरिक संबंध बना सकते हैं ?

जो औरतें या पुरूष संस्थागत रूप से वेश्यावृत्ति को अपनाते हैं

वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देने या देने की बहस का केन्द्रिय प्रश्न यह है

 

सुनीता सर्दी में स्‍नान पुराण लेकर आई हैं-

हर सुबह उस व1त उनका मूड उखड़ जाता है, जब पत्नी न नहाने पर बार-बार उलाहना देती है।

अरे भाभी जी, सर्दी में नहाना अति उत्तम है, और वह भी ठंडे पानी से तो समझो कि सो रोगों की दवा।

खैर शर्मा जी को विप8िा में देख मौजीराम ने दोस्त होने का फर्ज निभाया और उन्हें शीत स्नान का नुसखा बताया।

जिन पोस्‍टों का उल्‍लेख हम नहीं कर पाए हैं अनिवार्य नहीं कि उनमें वर्तनी की गलतियॉं हैं नहीं.. बस इतना समझें कि ग्‍लानि सर उठा रही है कि बस करो अगर किसी ने लौट कर आपके ब्‍लॉग से कापी पेस्‍ट शुरू कर दिया तो कहॉं जाओगे... सा हमारी ओर से भी शास्‍त्रीजी की ही तरह ईसा जयंती की शूभकामनाएं-

ईसा-जयंती के इस पावन पर्व पर

आप सब को ईश्वर की असीम आशिष प्राप्त हो

 

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मंगलवार, नवंबर 10, 2009

गर्व का हजारवाँ चरण : प्रत्येक ज्ञात- अज्ञात को बधाई


funny hindi Orkut scraps

आज का दिन बहुत विशेष है और इसे संयोग ही कहा जाएगा कि इस दिन की चर्चा का दायित्व अनायास ही मुझे करने का सुयोग मिला है | जिन कारणों से आज का दिन ऐतिहासिक है, उनमें से कुछेक का उल्लेख क्रमवार यहाँ किए जाने से पूर्व  इस चर्चा-मंच की परिकल्पना करने वाले संस्थापक, सभी चर्चाकार साथियों, इसकी साज सज्जा और रखरखाव आदि में प्रारंभ से आज तक अपने योगदान से निरंतर सहयोग देने वाले  हितैषी व अभिन्न शुभचिंतकों, मित्रों, सहृदय पाठकों, अपनी राय से अवगत कराने वाले बंधुओं व किसी भी रूप में इस से संबंद्ध प्रत्येक ज्ञात- अज्ञात व्यक्तित्व को आज मैं बधाई और धन्यवाद देना चाहती हूँ क्योंकि चर्चा के इस मंच पर आज मैं उपस्थित हुई हूँ चिट्ठाचर्चा की यह १००० वीं प्रस्तुति लेकर | इसका समस्त श्रेय इसके चर्चा मंडल के श्रम, समर्पण, निरंतरता, दायित्वबोध, पारस्परिकता, समयबद्धता, नूतनता के प्रति उत्साह, निरपेक्षता और निष्पक्षता को जाता है| प्रारंभ से व समय समय पर इसमें जो नए साथी जुड़ते गए, वे आज भी जुड़े हैं| भले ही वे आज नियमित रूप से चर्चा के लेखन से नहीं जुड़े हुए किन्तु वे आज भी इसकी चर्चा मंडली के स्थाई सदस्य हैं और चर्चा के इस मंच का मान हैं| उन सभी के प्रति यह मंच आभारी है, कृतज्ञ है, धन्यवादी है| .... और उस से भी बढ़ कर आभारी है  हिन्दी के नेट लेखन का तथा इस चर्चा मंच को जीवंत बनाए रखने वाले उन स्नेही साथियों का जिन्होंने  नित आकर इसे अपना दुलार, स्नेह सम्मान दिया|


आने वाले समय में कई और ऐसे मंचों की आवश्यकता अनुभव होगी, वे गठित होंगे, हो रहे हैं, स्वाभाविक है; किन्तु चर्चा के इस मंच की उपादेयता, ऐतिहासिकता व कालक्रम में इसकी सर्वांगीणता निस्संदेह है, प्रामाणिक है, सर्वविदित है,  चिरकालिक   और स्थाई है| इसमें कोई दो राय नहीं हो सकतीं| चर्चा के इस मंच के इतिहास को इन  अर्थों में बारम्बार दुहराना प्रासंगिक ही नहीं अवश्यम्भावी भी है कि आने वाले समय में इस नए इलेक्ट्रोनिक माध्यम को जनप्रिय बनाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपनी परम्परा ( भले ही वह चार-छह-आठ-दस वर्ष पुरानी ही क्यों न हो) विदित होनी चाहिए|  इन सन्दर्भों में  उस इतिहास  का खाका कुछ ऐसा है -





https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjLQcDog4OpLFAZHbtY-o1wQK1thvgZHoT38IPcEEXDql8c5c3WjjMg7-nEzNPcHLgp3LEdQkdaOfzTQDZcLVsol1oO7115huLA-e0OLSWC5Q07kTNbV7UUO7dMFXg0PtE5WG4y4A/(2)_thumb.jpgभारतीय ब्लाग मेला: सन २००४ के अखिरी दिन थे। उन दिनों हम लोगों को पता चला कि अंग्रेजी भाषा के चिट्ठाकार भारतीय ब्लाग मेला का आयोजन करते हैं। इसमें लोग बारी-बारी से ब्लागर ब्लागर ब्लाग मेला का आयोजन करते थे। जिस ब्लागर को आयोजन करना होता उसके ब्लाग पर लोग अपनी पोस्ट के लिंक दे देते और फ़िर वह उसके बारे में लिखता था। उदाहरण के लिये आप देखिये यजद का आयोजन जिसमें अतुल अरोरा, जीतेंन्द्र चौधरी के साथ-साथ मैंने भी अपनी पोस्ट के लिंक दिये थे। इसके बाद उसकी चर्चा की थी यजद ने अपने ब्लाग पर।

हम बड़े खुश हुये कि अंग्रेजी ब्लागर के मेले में हम भी अपनी दुकान चला रहे हैं। उन दिनों हिंदी के ब्लागर कम थे सो हम लोग भिड़ने के लिये अंगेजी ब्लागरों पर निर्भर थे। कोई न कोई बात हो जाती कि बहस करते रहते।

अंग्रेजी के ब्लागरों के अलावा एक बार (३७ वें संस्करण) ब्लाग मेला का आयोजन देबाशीष ने भी किया था। देबाशीष कुछ व्यक्तिगत चिट्ठे ब्लाग मेला के नियम के अनुसार शामिल नहीं किये थे।

सुनामी मेला और बहसबाजी: जनवरी २००५ का पहला ब्लाग मेला मैडमैन के जिम्मे था। सुनामी तूफ़ान हाल ही में आ के गया था। इसलिये मैडमैन ने सुनामी स्मृति ब्लाग मेला आयोजित किया। पहले की तरह हिंदी ब्लागर्स ने अपनी पोस्ट नामीनेट की। मैडमैन ने निम्नकारण बताते हुये हिंदी ब्लाग की चर्चा करने से मना कर दिया:-

That's it for this week, folks. I know some Hindi blog entries were nominated, but I've left them out of this mela, not because I'm a snobbish bastard, but because:


1) I studied Hindi for 10 years at school, and speak the language fluently, but haven't read any big chunks of Hindi since 1990. So my reading speed has reduced to a crawl.


2) The thin strokes of the text coupled with the low resolution of a PC monitor made it even harder to read the entries.


3) Some of the spelling mistakes (mostly misplaced matras) didn't help either.

करेले पर नीम चढ़ा कमेंट किया किसी सत्यवीर ने। उसने लिखा-
I agree that hindi blogs should have a different blog mela. It is better to keep regional languages at a different forum.

बस फ़िर क्या था। बमचक मच गई। हिंदी-अंग्रेजी बबाल मचा। देबाशीष(Indiblogger) जीतेंन्द्र चौधरी और इंद्र अवस्थी )
ने इसका विरोध किया। अंतत: खिसिया के मैंड्मैन ने अपना कमेंट का बक्सा बन्द कर दिया।

चिट्ठाचर्चा की शुरुआत :इसके बाद अतुल ने गुस्से से फ़नफ़नाती हुई पोस्ट लिखी- तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ? । मैंने मौज ली अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है । लेकिन हमें यह भी लगा कि हर समय हा हा, ही ही करना ठीक नहीं तो हम गम्भीर हो लिये। हमने चिट्ठाचर्चा ब्लाग शुरू किया। स्वागतम पोस्ट में हमने लिखा था-
भारतीय ब्लागमेला के सौजन्य से पता चला कि हिदी एक क्षेत्रीय भाषा है.यह भी सलाह मिली कि हिंदी वालों को अपनी चर्चा के लिये अलग मंच तलाशना चाहिये.इस जानकारी से हमारेमित्र कुछ खिन्न हुये.यह भी सोचा गया कि हम सभी भारतीय भाषाओं से जुड़ने का प्रयास करें.

इसी पोस्ट में हमने हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं के ब्लाग की चर्चा भी करने का मन बनाया था। कुछ दिन अंग्रेजी, सिंधी, गुजराती और मराठी के चिट्ठों की चर्चा करते भी रहे।

शुरुआती प्रतिक्रियायें: शुरुआत चिट्ठाचर्चा की अच्छी ही रही। हिंदी के अलावा अंग्रेजी के ब्लागरों ने इसमें रुचि दिखाई। प्रसेनजित ने अगले भारतीय ब्लाग मेले में इसका जिक्र किया। शायद आलोक ने कहा था कि वे तमिल चिट्ठों की चर्चा का काम देखेंगे।

शुरुआत के दिन: शुरू के दिनों में हम चर्चा एक माह में एक बार करते थे। फ़िर शायद पन्द्रह दिन में करते थे। सब मिलकर चर्चा करते थे। देबाशीष, अतुल, जीतेंद्र और मैं। आप शुरुआत के चिट्ठे देखें तो आपको हिदी ब्लाग जगत के साथ भारतीय ब्लाग जगत की तमाम बेहतरीन पोस्टें देखने को मिल जायेंगी।

मन उचट गया: शुरुआत के दिन अच्छे लगे। फ़िर जब संकलक आ गये तब लगा कि हम चर्चा करके कौन सा तोप चला रहे हैं। लोगों को ब्लागस के बारे में पता तो चल ही जाता है संकलकों से। इसके बाद धीरे-धीरे हमारे आलस्य ने हमारे उत्साह पर विजय पायी और चिट्ठाचर्चा हो गयी धरासायी।

फ़िर उछलकूद लेकिन गुप्त वाली: फ़िर देबाशीष ने कहा कि चिट्ठाविश्व के लिये चर्चा करो। चिट्ठाविश्व हिंदीब्लाग जगत का पहला संकलक है शायद जिसके बाद नारद , ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत आये। हम एक गुप्त ब्लाग में चर्चा करते और वह संक्षिप्त चर्चा चिट्ठाविश्व में पोस्ट हो जाती। अच्छा लगा कुछ दिन। फ़िर धीरे-धीरे वह भी बंद हो गया।

चिट्ठाचर्चा का अपहरण: इन्हीं दिनों शायद सितम्बर ,२००५ में किसी शहजादे ने चिट्ठाचर्चा का अपहरण कर लिया। बाद में मित्रों के प्रयासों से, शायद गूगल को भी लिखा गया था ,चिट्ठाचर्चा की वापसी हुई। लेकिन जब वापसी हुई तब तक........

पूरा वृत्तांत पढने के लिए आप को यहाँ जाना होगा, यहाँ आपको निम्न बिन्दुओं पर जानकारी मिलेगी -
  • दनादन चर्चा, महारथी चर्चाकार
  •  नारद की अनुपस्थिति में चर्चा
  • एक लाइना, आलोक पुराणिक और चिट्ठाचर्चा
  • नये चर्चाकार, विविधता 
  • बदलता समय और चिट्ठाचर्चा का स्वरूप  
  • फ़िलहाल की चिट्ठाचर्चा मेरी नजर में 



आप सभी से निवेदन है कि चर्चा के इस मंच को अपना स्नेह इसी अविचल  भाव से देते रहें व सद्भाव बनाए रहें|


 बधाई और धन्यवाद के क्रम से आगे बढ़ते हैं |





अभी अभी शलाका पुरुष प्रभाष जी हमारे मध्य नहीं रहे हैं| उन पर हिन्दी ब्लॉग जगत ने कई सुचिंतित व मार्मिक लेख लिखे| वह क्रम अभी भी चल रहा है| इसी कड़ी में जनसत्ता में प्रकाशित प्रभाष जी के सुपुत्र का यह आलेख मुझे पिताजी के माध्यम से पढने को मिला|










कल एक इमेल  सन्देश मुझे  वरिष्ठ व प्रख्यात भाषावैज्ञानिक प्रो. सुरेश कुमार जी का प्राप्त हुआ, जिसे पढ़ कर मुझे रोमांच हो आया| उसका अविकल पाठ यहीं दे रही हूँ -

प्रभाष जी नहीं रहे. उनके बिना हिन्दी पत्रकारिता पहले जैसी नहीं रहेगी. ’जनसत्ता’ के (मुख्यतया)7 नवम्बर के अंक में विभिन्न व्यक्तियों और संस्थाओं ने उन्हें जैसे याद किया उसकी रिपोर्टें छपी हैं. उनमें प्रभाष जी के लिए प्रयुक्त विशेष्य विशेषणों की एक सूची नीचे दी जा रही जिससे उनके केन्द्रीय व्यक्तित्व की एक झलक मिलती है. यह झलक उस बॄहत्तर प्रतिमा का अंश है जिसने ’जनसत्ता’ के 8 नवम्बर के अंक में (पृष्ठ 6-7 पर) उनके विषय में प्रकाशित लेखों में (जिन्हें ’विशेषण  डिस्कोर्स’ कहा जा सकता है) आकार ग्रहण किया है. सूची इस प्रकार है :

  • अभिभावक जैसा सम्पादक
  • हिन्दी पत्रकारिता का सूर्य
  • हिन्दी पत्रकारिता का शिखर पुरुष
  • हिन्दी पत्रकारिता का युग पुरुष
  • पत्रकारिता का शलाका पुरुष
  • पत्रकारिता का सशक्त स्तम्भ
  • निर्भीक पत्रकारिता का सशक्त स्तम्भ
  • पत्रकारिता का महान स्तम्भ
  • जनपक्षीय पत्रकारिता का महान और मज़बूत स्तम्भ
  • देश का वरिष्ठ पत्रकार
  • विलक्षण और प्रेरक पत्रकार
  • मूर्धन्य पत्रकार
  • उत्कृष्ट पत्रकार
  • निष्पक्ष पत्रकार
  • निष्पक्ष और बेबाक पत्रकार
  • हिन्दी पत्रकारिता का बडा हस्ताक्षर
  • खेल पत्रकारिता का भीष्म पितामह
  • हिन्दी पत्रकारिता के पुरोधाओं में से एक
  • उच्च कोटि का लेखक व चिन्तक
  • सुविख्यात, निडर व उत्कृष्ट लेखक
  • अपनी बेजोड लेखन शैली के लिए विख्यात
  • भाषा का जादूगर
  • शब्द और भाषा का जादूगर
  • लोकतन्त्र का सच्चा प्रहरी
  • असाधारण बौद्धिक और पेशेवर निष्ठा वाला
  • असाधारण बौद्धिक साहस का धनी
  • सर्वमान्य बुद्धिजीवी
  • बेलाग बोलने वाला बुद्धिजीवी
  • पत्रकारों की पूरी पीढी के लिए प्रेरणा स्रोत
  • प्रेरणा पुरुष
  • जन-पुरुख
 -     सुरेश कुमार
Prof Suresh Kumar
A-45, Welcome Apartments
Sector 9, रोहिणी
Delhi-110085




व्यक्तिगत रूप से प्रभाष जी पर केन्द्रित  जिन लेखों ने मुझे इन दिनों विशेष प्रभावित किया वे हैं -

प्रभाष जोशी  :  समय का सबसे समर्थ हस्ताक्षर

अभी न होगा मेरा अंत 

प्रभाष जोशी के न होने का अर्थ 

प्रभाष जोशी हिंदी के अंतिम समर्पित सेनानी




आज कवि सुदामा पाण्डेय धूमिल का जन्मदिवस है | रोचक (?) तथ्य यह है कि नेट पर तीन स्रोतों पर जाने से आप को जन्मतिथि को लेकर तीन अलग अलग स्थितियाँ दिखाई देंगी, जिन्हें मैंने नीचे सहेज दिया है | आप इस अवसर पर उनकी कुछ कविताओं की बानगी देखिए और फिर नीचे दी गयी वे प्रतिकृतियाँ भी |






(१)

मेरे सामने
तुम सूर्य - नमस्कार की मुद्रा में
खड़ी हो
और मैं लज्जित-सा तुम्हें
चुप-चाप देख रहा हूँ
(औरत : आँचल है,
जैसा कि लोग कहते हैं - स्नेह है,
किन्तु मुझे लगता है-
इन दोनों से बढ़कर
औरत एक देह है)


(२)

मेरी भुजाओं में कसी हुई
तुम मृत्यु कामना कर रही हो
और मैं हूँ-
कि इस रात के अंधेरे में
देखना चाहता हूँ - धूप का
एक टुकड़ा तुम्हारे चेहरे पर
(3)


रात की प्रतीक्षा में
हमने सारा दिन गुजार दिया है
और अब जब कि रात
आ चुकी है
हम इस गहरे सन्नाटे में
बीमार बिस्तर के सिरहाने बैठकर
किसी स्वस्थ क्षण की
प्रतीक्षा कर रहे हैं
(४)
न मैंने
न तुमने
ये सभी बच्चे
हमारी मुलाकातों ने जने हैं
हम दोनों तो केवल
इन अबोध जन्मों के
माध्यम बने हैं




धूमिल की कुछ कविताओं का अंग्रेजी रूपान्तर पढने का चाव रखने वालों के लिए भी नेट पर सामग्री है|




पुस्तकें खरीदने के लिए सुदूर बैठे पाठक अनुपलब्धता की बात नहीं कह सकते|




नेट पर जन्मतिथियों की स्थिति 



यहाँ (१) ....................................................        ................        .... (२)

जन्म: 09 नवम्बर 1936
निधन: 10 फरवरी 1975
उपनाम
धूमिल
जन्म स्थान
खेवली, जिला वाराणसी, उत्तरप्रदेश
कुछ प्रमुख
कृतियाँ

संसद से सड़क तक (1972), कल सुनना मुझे, सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र (1983)
विविध
कल सुनना मुझे काव्य संग्रह के लिये 1979 का साहित्य अकादमी पुरस्कार
जीवनी
धूमिल / परिच
Sudama Panday 'Dhoomil' (सुदामा पांडेय 'धूमिल') (November 7, 1936February 10, 1975, known mostly as Dhoomil, was a renowned Hindi poet from Varanasi, who is known for his revolutionary writings and his 'protest-poetry' [3][4], along with Muktibodh.
Known as the angry young man of Hindi poetry due to his rebellious writings [5], during his lifetime, he published just one collection of poems, 'Samsad se Sarak Tak', 'संसद से सड़क तक' (From the Parliament to the Street), but another collection of his work, titled "Kal Sunana Mujhe" 'कल सुनना मुझे' was released posthumously, which in 1979, went on to win the Sahitya Akademi Award in Hindi [6][7].




(३)
-   अब यहाँ हिन्दी पृष्ठ पर देखें | यहाँ अभी पृष्ठ बनने की प्रक्रिया में है, सो जन्मतिथि का उल्लेख नहीं है|


 

अस्तु, आगे बढ़ते हैं |







हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए आज का दिन कई अर्थों में महत्वपूर्ण है  क्योंकि आज लक्ष्मीमल्ल सिंघवी का भी जन्म दिवस है |





डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी ने हिंदी के वैश्वीकरण और हिंदी के उन्नयन की दिशा में सजग, सक्रिय और ईमानदार प्रयास किए। भारतीय राजदूत के रूप में उन्होंने ब्रिटेन में भारतीयता को पुष्पित करने का प्रयास तो किया ही, अपने देश की भाषा के माध्यम से न केवल प्रवासियों अपितु विदेशियों को भी भारतीयता से जोड़ने की कोशिश की। वे संस्कृतियों के मध्य सेतु की तरह अडिग और सदा सक्रिय रहे। वे भारतीय संस्कृति के राजदूत, ब्रिटेन में हिन्दी के प्रणेता और हिंदी-भाषियों के लिए प्रेरणा स्रोत थे। विश्व भर में फैले भारत वंशियों के लिए प्रवासी भारतीय दिवस मनाने की संकल्पना डॉ. सिंघवी की ही थी। वे साहित्य अमृत के संपादक रहे और अपने संपादन काल में उन्होने श्री विद्यानिवास मिश्र की स्वस्थ साहित्यिक परंपरा को गति प्रदान की। भारतीय ज्ञानपीठ को भी श्री सिंघवी की सेवाएँ सदैव स्मरण रहेंगी।[२]


कल का दिन हिन्दी के नाम पर कलंक लगाने वाले इतिहास का एक अन्यतम दिवस रहा| जब हिन्दी में शपथ लेने पर विधान सभा में हाथापाई और चाँटाबाजी  हो गयी| मन बार बार यही कहने का होता है ( जो बात निराला जी ने मुंशी प्रेमचंद  के अंतिम दिनों में हुई भेंट के संस्मरण लिखते समय कही थी) .... जाने दीजिए, निराला जी के शब्द क्या दुहराऊँ  .... अपने मुँह से क्या कहूँ अब!


  हिन्दी की इस दशा / दुर्दशा का सारा पाप हमारा है | हमने अपने स्वार्थपने, नीचता, आत्मकेंद्रिकता, छल प्रपंच और कलुष से माँ का चीर तार तार कर दिया है | कोई भी भाषा अपने बोलने वालों के चरित्र की वाहक होती है| किसी भी भाषा -समाज का चरित्र देखना हो तो उसकी भाषा की स्थिति को देख लीजिए....... |


यह धिक्कार हम पर है कि हमारी माँ बीच चौरस्ते निर्वस्त्र हुई जाती है और हम अपने अहम् पोसते केवल दूसरों की रेखाएँ छोटी करने की वितंडा में लीन हैं| ईश्वर हमें सद्बुद्धि दे |



इसी दुर्घटना पर आधारित एक लेख पढ़ा जाना चाहिए -


महाराष्ट्र विधानसभा के नये सत्र के पहले दिन मनसे के विधायकों ने मराठी भाषा के नाम पर ,हिन्दी में शपथ लेने वाले सपा विधायक अबू आजमी के साथ जो गुंडागर्दी की है. उसकी जितनी निन्दा की जाय कम है, ये न केवल भारतीय संविधान का अपमान है बल्कि हिन्दी भाषा के लिये यह बहुत बडा खतरा बन गया है.उस भाषा के लिए जो देश के लाखों- करोडो लोगो की अपनी भाषा है. आज जब अंग्रेजी हमारी भाषाओं के लिये खतरा बन गई है, उस समय सभी भारतीय भाषाओं को मिलकर इसके खिलाफ़ लड्ना चाहिये. इस तरह की हरकतें न केवल हमारी अखंडता और एकता में अनेकता को खत्म कर रही है. साथ ही जनसामान्य के बीच खाई भी पैदा कर रही है.



कुछेक पठनीय लेख और देखें -

 स्त्रियों को कु-पाठ पढाने की घिनौनी कोशिश...

एक-दूसरे के साथ जीने-मरने की कसमे क्या केवल कागजी बातें है...? सब मरे यह ज़रूरी नहीं लेकिन कुछ लोग ऐसे करते है तो उसकी आलोचना नहीं की जानी चाहिए. किसी को चिता में जबरन बिठाने का कोई अग्यानी ही समर्थन करेगा.  जोशी जी ने साथ-साथ जीने-मरने की उसी भावना का सम्मान किया था, जो अब लुप्त होती जा रही है. मै भी इस भावना का सम्मान करता हूँ. भविष्य में भी करता रहूँगा. शर्म तो उन नकली लोगो को आनी चाहिए जो समाज को-प्रगतिशील मूल्यों  के नाम पर-दिशाहीन कर रहे है. औरतो को गलत पाठ पढ़ा रहे है. मै ऐसे लोगो के खिलाफ लिखता रहूँगा और शर्मिंदा होता रहूँगा कि समाज का सत्यानाश करने वाले भी जिंदा है. वे लोग अपने स्टार पर मुझे भी गरियाते रहेंगे  कि 'ये पिछडा -गंवार कहाँ से आ गया, जो अनैतिकता के दौर में नैतिकता का कुपाठ पढा  रहा है? छिः...इसे तो मध्य युग में होना था', लेकिन मै हूँ aur अपनी मुहिम में लगा हुआ हूँ.



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सुकृति आर्ट गैलरी में कलाकारों की कृतियां डिस्प्ले की गयी थीं। उदघाटन की रस्म भंवरी देवी ने अदा की। पर ये रस्म अदायगी नहीं थी। पुरुष को समझने की कोशिश करते चित्रों की मुंहदिखाई की रस्म भंवरी से बेहतर कौन निभाता। वैसे भी, उन्होंने पुरुष की सत्ता को जिस क़दर महसूस किया है, शायद ही किसी और ने किया हो पर अफ़सोस… अगले दिन मीडिया ने उनका परिचय कुछ यूं दिया, फ़िल्म बवंडर से चर्चा में आयीं भंवरी…!
+++
इस मौक़े पर चर्चित संस्कृतिकर्मी हरीश करमचंदानी ने 15 साल पुरानी कविता सुनाई, मशाल उसके हाथ में। भंवरी देवी के संघर्ष की शब्द-यात्रा।
+++
 [[और अंत में... एक बड़े अधिकारी की पत्नी ने कहा, भंवरी देवी को प्रदर्शनी की शुरुआत करने के लिए क्यों बुलाया गया? मुझसे कहतीं, मैं किसी भी सेलिब्रिटी को बुला देती! अफ़सोस कि ऐसा कहने वाली खुद को कलाकार भी बताती हैं। (कानों सुनी)]]



कुछ दिन से कई ईमेल द्वारा एक आह्वान की सूचना मिल रही थी आज सोचा जा कर उसे देखा जाए| जो देखा वह यह पाया -





This message from the youth of the community should be read in its letter and spirit that while we want to go home we do not want to sit with the government who trivialises the issue of our return.It isnt as if we had merrily left one day only to return now because they will pay us 7.5 lac rupees.Make no mistake about it.Let the government first show some resolve.Let them fast track cases related to killing of Kashmiri Pandits.Let there atleast be one conviction.Let them de-encroach the land of our shrines.




कवि प्रियंकर की वैवाहिक वर्षगाँठ की सूचना मुझे उन्हीं द्वारा अपनी धर्मपत्नी के लिए जारी इस रोचक और स्नेह पूर्ण सन्देश से मिली

Priyankar PaliwalPriyankar Paliwal सहजीवन के शानदार बीस वर्ष और प्रमिला के लिये एक गीत :

Twenty years of conjugal bliss and a song for Pramila :




आप ने सबसे ऊपर लगा "चल-चित्र" देखा होगा उसका सम्बन्ध भी खोज रहे होंगे तो बात यह है कि वह अनिमेटेड चित्र  मानो इनकी भावना को ही व्यक्त कर रहा है जब ये कहते हैं कि -

अपने तमाम गुस्से के साथ मैं बाहर आया। बाहर आकर मैनें मन ही मन यह इच्छा जाहिर की कि काश यह एक सामान्य फिल्म निकल जाये। इस फिल्म मे वह सब वहो ही नहीं जिसकी इच्छा लिये मैं एक सौ चालीस – पचास किलोमीटर आया था। मैं सोचता रहा कि काश यह डॉक्युमेंट्री फिल्म निकल जाये। काश सीरी फोर्ट मे अजीबोगरीब नियम लगाने वाले का लैपटॉप खो जाये, तमाम।



स्वगत  पर कुछ दिन पूर्व आई प्रविष्टि पर भी एक दृष्टि डालें -



संदेह - दृष्टि
बोर्हेस ने ‘द रिडल ऑफ पोएट्री’ में कहा है- ‘सत्तर साल साहित्य में गुज़ारने के बाद मेरे पास आपको देने के लिए सिवाय संदेहों के और कुछ नहीं।‘ मैं बोर्हेस की इस बात को इस तरह लेता हूं कि संदेह करना कलाकार के बुनियादी गुणों में होना चाहिए। संदेह और उससे उपजे हुए सवालों से ही कथा की कलाकृतियों की रचना होती है। इक्कीसवीं सदी के इन बरसों में जब विश्वास मनुष्य के बजाय बाज़ार के एक मूल्य के रूप में स्थापित है, संदेह की महत्ता कहीं अधिक बढ़ जाती है। एक कलाकार को, निश्चित ही एक कथाकार को भी, अपनी पूरी परंपरा, इतिहास, मिथिहास, वर्तमान, कला के रूपों, औज़ारों और अपनी क्षमताओं को भी संदेह की दृष्टि से देखना चाहिए।





गत दिनों सुशांत सिंहल जी से उनकी साईट के माध्यम से परिचय हुआ| प्रो. योगेश छिब्बर जी की एक कविता ने उनसे परिचय करवाया |  पिछले दिनों  वन्दे मातरम्  को लेकर जिस प्रकार का अवांछनीय वातावरण निर्मित किए जाने की घटनाएँ हुई हैं, उन दिनों माँ, जननी, मातृ-भू, माता आदि  संकल्पनाओं को अनायास ही राष्ट्र व धरती के साथ जोड़ कर देखने वाली परम्परा का स्मरण हो आता रहा| वह परम्परा भले ही वेद की ऋचाओं में "माता भूमि: पुत्रोहम् पृथिव्या: " का आदेश हो अथवा लंका जय के पश्चात राम का लक्ष्मण को लंका के वैभव को धूल समझने का विमर्श देते समय कहा गया -


अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते |
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी || 



या आधुनिक हिन्दी साहित्य में भारतेंदु काल से काव्य में  राष्ट्रभक्ति और भारत माता की प्रतिष्ठा करने की परम्परा| सभी स्थानों पर जननी व जन्मभूमि एक शब्द युग्म की भांति आते हैं| मेरे  मन की डूबती उतराती संवेदनाओं पर जिस कविता ने मरहम रखा, उसे पढ़ कर एक बारगी तो आप भी दंग रह जाएँगे| यहाँ  उसका यथावत् पाठ देखिए -


दुःख थे पर्वत, राई अम्मा
हारी नहीं लड़ाई अम्मा ।

लेती नहीं दवाई अम्मा,
जोड़े पाई-पाई अम्मा ।

इस दुनियां में सब मैले हैं
किस दुनियां से आई अम्मा ।

दुनिया के सब रिश्ते ठंडे
गरमागर्म रजाई अम्मा ।

जब भी कोई रिश्ता उधड़े
करती है तुरपाई अम्मा ।

बाबू जी तनख़ा लाये बस
लेकिन बरक़त लाई अम्मा।

बाबूजी थे छड़ी बेंत की
माखन और मलाई अम्मा।

बाबूजी के पांव दबा कर
सब तीरथ हो आई अम्मा।

नाम सभी हैं गुड़ से मीठे
मां जी, मैया, माई, अम्मा।

सभी साड़ियां छीज गई थीं
मगर नहीं कह पाई अम्मा।

अम्मा में से थोड़ी - थोड़ी
सबने रोज़ चुराई अम्मा ।

अलग हो गये घर में चूल्हे
देती रही दुहाई अम्मा ।

बाबूजी बीमार पड़े जब
साथ-साथ मुरझाई अम्मा ।

रोती है लेकिन छुप-छुप कर
बड़े सब्र की जाई अम्मा ।

लड़ते-सहते, लड़ते-सहते,
रह गई एक तिहाई अम्मा।



अनंतिम
अब उसी  नगर का एक और चेहरा देखें और मुझे विदा दें | हाँ इतना ध्यान अवश्य रखें कि चर्चा की १००० वीं  प्रविष्टि  होने की या अन्य सूचनाओं पर बधाई आदि देने से बढ़कर कुछ अधिक भी कहें| चर्चा पर किए जाने वाले श्रम में किसी चर्चाकार का कोई स्वार्थ नहीं होता है अतः चर्चा के इस मंच पर जब जब आप को किसी भी प्रकार का श्रम और समर्पण दिखाई दे तो अपनी भावनाओं को अवश्य व्यक्त करें , ये भावनाएँ औपचारिक शाबाशी से जितनी इतर होती हैं उतनी सुखदाई होती हैं | आप के लिए सर्वमंगल की कामनाओं  सहित इस चित्र के साथ अब विराम लेती हूँ |







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सोमवार, अक्टूबर 12, 2009

टिप्पणियों के रूप में कड़ी भर्त्सना और आरोप झेलने को मिलने वाले हैं आज




गत सप्ताह की हमारी चर्चा को आप सभी स्नेही मित्रों का जो दुलार मिला, उसके लिए कृतज्ञ हूँ |

डा० अमर कुमार  जी ने कहा -


आपको पुनः अपने मध्य देखना ही सुखद है,बतायेंगी नहीं, इस बीच क्या क्या पढ़ड्डाला ?स्वस्थ, निष्पक्ष और सुरूचिपूर्ण चर्चा के लिए आभार
जय हिंद...

  
उनके लिए हमारा निवेदन है कि  बंधु! पढ़ डाला का हिसाब तो हमें स्वयं नहीं पता; क्योंकि रस परिपाक ही वास्तविक कसौटी है इसकी तो, और उसका पता तो समय ही बताएगा | क्योंकि  ` खाए कितना /क्या ' का असली हिसाब  तो `पचाए कितना /क्याही से लगाना चाहिए | सो, पचाए को चीन्हने में स्वयं हमीं लगे हैं अभी तो, क्या बताएँ ?....


अनूप शुक्ल   जी ने हमारी इक पुरानी कविता अंकित कर हमें विभोर कर दिया | धन्यवाद | यह देखिए उनकी वह टिप्पणी - 


अभी अभी सुबह सुबह आपके द्वारा की चर्चा देखी और संयोग कि कल ही पढ़ी आपकी ही कविता सामने रखी है: 

एक मछली सुनहरी
ताल के तल पर ठहरी
ताकती रही रात भर

दूर चमकते तारे को।

ब्राह्ममुहूर्त में
गिरी एक ओस बूँद
गिरा तारे का आँसू
मछली के मुँह में
पुखराज बन गया।


सप्ताह की शुरुआत आपकी सुरुचि पूर्ण चर्चा से हो यह अपने आप में खुशनुमा एहसास है। जय हो!




इनके अतिरिक्त अरविंद जी, लक्ष्मी एन .गुप्ता जी, वाणी गीत, सतीश सक्सेना जी, ताऊ रामपुरिया जी, खुशदीप सहगल जी, महेंद्र मिश्र जी, शारदा अरोड़ा जी, संगीता पुरी जी, चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी, हिमांशु जी, मीनू खरे जी, उड़न तश्तरी जी, लवली कुमारी जी, ऋषभदेव शर्मा जी  व कनिष्क कश्यप जी  प्रभृति सहृदयों ने अपना समय देकर प्रोत्साहन दिया | सबके प्रति आभारी हूँ|






आज की चर्चा के लिए दिन में कई बार संकलक खोले, तलाशे| हर बार कुछ नए लिंक सुपाठ्य लगते किन्तु अपनी सीमाओं की परिधि में जिन्हें आज की चर्चा के लिए अलग किया, वे मेरे तईं कई कारणों से महत्वपूर्ण हैं| इन कारकों का उल्लेख किए या न किए इन्हें आप से बाँट रही हूँ, जो निस्संदेह आप को भी महत्त्व के लगेंगे|


 इधर विवादों का मौसम गहराया हुआ है - ऐसा ब्लॉग जगत् के निर्णायक प्रवक्ता लोग कहते हैं/ लिखते हैं| वस्तुत: हमारे यहाँ इधर तर्क को विवाद कहने का प्रचलन होता चला गया है, जबकि तर्क भारतीय संस्कृति का प्राण है| तर्क को प्रमाण का आधार भी माना गया है| भारतीय दर्शन ईश्वर तक पर भी तर्क करता है, और प्रत्येक निर्णय पर पहुँचने के लिए तर्क को प्रमाण माना गया| तर्क का अर्थ ही है विवेक और बुद्धि से औचित्य की प्रामाणिकता|  सत्य की पक्षधरता का आग्रह|  न कि आपत्ति अथवा विरोध| पुनरपि तर्क से निरस्त हो जाने वाली अधिकाँश विचारधाराओं के लिए अतार्किक होना ही सर्वाधिक सबल आधार होते चले जाने के क्रम में अंधाधुध वृद्धि के चलते  तर्क को वाद और उस से भी बढ़ कर विवाद की संज्ञा दे दी गयी| अन्यथा खरे को कसौटी से भला क्या डर?


तर्क के विषय में लंबा तर्क हो गया| अस्तु ! चिट्ठा-लोक में मत -भेदों के बीच इधर महत्वपूर्ण शोध परक और  विचारणीय सामग्री जो आ रही है उस का लाभ पठन-लोभी अवश्य उठाएँ | इस क्रम में मैं  भाषा के नाम पर विवाद और कु -तर्क करने वालों की आँखें खोलने वाले  एक आलेख का उल्लेख सर्वप्रथम करना चाहूँगी| लेख का शीर्षक  है  - 




तूँ कहाँ का है, इस जागाँ तूँ क्यों आया? इस शहर को बाट तूँ क्यों पाया? तुझे कौन दिखलाया?’’ xxx ‘‘सो उस दिलरुबा नार कूँ, दीदियाँ के सिंघार कूँ, चतुर चैसार कूँ, एक सहेली थी,भौत छबीली थी, रात रंगीली थी। नाँव उसका ज़ुल्फ़ था, लट साँवली निपट, रंग कूँ काली, घूँगर वाली।’’
दक्खिनी हिंदी के लेखक वजही (1609) द्वारा रचित गद्य के ये अंश यह सोचने पर विवश करते हैं कि यदि दक्खिनी में 17वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में गद्य का यह रूप था तो उस समय के उत्तर के हिंदी रचनाकार ऐसा गद्य क्यों नहीं लिख पाए! स्मरणीय है कि यह समय महाकवि तुलसीदास का समय है। इस प्रश्न से टकराए बिना यदि हम हिंदी साहित्य के इतिहास में खड़ी बोली के गद्य का उदय 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से मानते हैं, तो बड़ी ऐतिहासिक भूल करते हैं। कोई कड़ी है जो बीच से निकल गई है या जानबूझ कर निकाल दी गई है! इस निकली हुई कड़ी का नाम है दक्खिनी’|
खड़ी बोली के साहित्य को भारतेंदु काल से आरंभ मानते हुए प्रायः यह याद कर लिया जाता है कि कभी अमीर खुसरो ने भी इस भाषा में काव्य रचना की थी परंतु उसकी कोई परंपरा न मिलने के कारण उन्हें किसी प्रवर्तन का श्रेय नहीं दिया जाता। गद्य में तो और भी खस्ता हालत है। ब्रज और राजस्थानी के गद्य की चर्चा तो मिलती है लेकिन खड़ी बोली के गद्य की कहीं गंध तक इतिहासकारों को नहीं मिल पाई है।






 

भाषा की इसी यात्रा को निरंतर अपना  लक्ष्य बना कर शब्दों का सफ़र गतिमान है| इस बार एक और रोचक  यात्रा है शब्द की - 



कीर और रेखा का अर्थ एक ही है। इन दोनों का मूल भी एक है। लिख् और रिष् धातुओं से इनका विकास हुआ है। इनसे बने लेख, लेखनी, लेखक, लीक, लेखक, लेखनी जैसे शब्द तो हिन्दी में खूब प्रचलित हैं। मगर एक खास बात है रेखा की गणित और हिसाब-किताब में मौजूदगी। स्पष्ट है कि लेखा, लेखा परीक्षक, लेखाकार, लेखापाल और लेखा जोखा जैसे शब्दों का प्रयोग करते वक्त यह अहसास नहीं रहता कि इनका रिश्ता भी लिख-रिष्-राईट की परम्परा से ही जुड़ता है। 







विचार- प्रधान चिट्ठों की शृंखला में इधर एक और चिट्ठा देखने में आया है सत्यार्थ प्रकाश | महर्षि दयानंद सरस्वती के क्रांतिकारी अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के नाम साम्य के कारण भी मुझे  अनायास भला लगना ही था|  सांख्य- दर्शन पर केन्द्रित एक लंबा आलेख आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रातीक्षा कर रहा है| अभी मुझे वहाँ केवल दिनेश राय द्विवेदी जी  की एक टिप्पणी ही दिखाई दे रही है| क्या इसे यही माना जाए कि गंभीर लेखों को पाठक नहीं मिलते ?


लेख का अंश देखें -

बहुत लोग साँख्ययोग को एक साथ जोड़ कर देखते हैं और उसको एक ही पुस्तक या दर्शन समझते हैं। साँख्य के साथ योग का नाम इसलिए लिया जाता है जैसे हम भौतिक-रसायन, जीव-वनस्पति विज्ञानं आदि विषयों को जोड़ी में रखते हैं अन्यथा साँख्य दर्शन एवं योग दर्शन दोनों अलग पुस्तकें हैं और एक दुसरे की पूरक हैं। इसी प्रकार हम न्याय-वैशेषिक (न्याय दर्शन , वैशेषिक दर्शन ) और वेदांत-मीमांसा (वेदांत दर्शन अथवा ब्रह्मसूत्र , मीमांसा दर्शन ) का नाम लेते हैं पर वो सभी हैं अलग -अलग पुस्तकें। साँख्य योग में जगत के उन मूल तत्वों की संख्यात्मक विवेचना की है जो नेत्रों से दिखाई नहीं देते किन्तु जगत के मूल कारण में वो ही तत्व मुख्य होते हैं। और मोक्ष क्या है और उसकी प्राप्ति कैसे होती है इन सब बातो का भी उसमें उत्तर है । साँख्य को पढने मात्र से ही यह तत्व भेद्ज्ञान नहीं होता जब तक योग दर्शन के अनुरूप सबीज और निर्बीज समाधि तक नहीं पंहुचा जाये। इन तत्वों, आत्मा और इश्वर का साक्षात्कार केवल पढने मात्र या साधारण ज्ञान प्राप्त करने से नहीं होता है इसके लिए उच्च कोटि का पुरषार्थ चाहिए।

इससे स्पष्ट है की वास्तविक सांख्य सिद्दांत अकाल में ही किस प्रकार भ्रान्ति-घटाओं में आच्छादित होते रहे हैं। आचार्य उदयवीर शास्त्री के भाष्य में उनको विच्छिन्न कर वास्तविकताओं को स्पष्ट किया गया है। विवेकशील पाठक मनन करने पर स्वयं अनुभव कर सत्य का निर्धारण कर सकते हैं ।



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रश्मि रविजा   मन का पाखी  पर अपने लेख में खिन्न हो कर लिखती हैं - 

  मानसिक विकलांगता से कहीं बेहतर है,शारीरिक विकलांगता 

 

आज ही टी.वी. पर देखा,उस लड़के के दोनों हाथ बहुत छोटे थे.पर वह पूरे लय और ताल में पूरे जोश के साथ नृत्य कर रहा था.नृत्य गुरु 'शाईमक डावर' भी जोश में उसके हर स्टेप पर सर हिलाकर दाद दे रहें थे.पर जब चुनाव करने का वक़्त आया तो दूसरे जज 'अरशद वारसी' ने जो कहा, उसे सुन शर्म से आँखें झुक गयीं.उनका कहना था ''अगर भगवान कहीं मिले तो मैं उस से पूछूँगा,उसने आपको ऐसा क्यूँ बनाया (अगर कहीं हमें भगवान मिले तो हम पूछना चाहेंगे ,उसने 'अरशद वारसी' को इतना कमअक्ल क्यूँ बनाया.??)तुम हमलोगों से अलग हो और यह हकीकत है,इसलिए तुम्हे दूसरे राउंड के लिए सेलेक्ट नहीं कर सकते." बाकी दोनों जजों की भी यही राय थी.शाईमक ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की पर नाकामयाब रहें.


गत दिनों रसायन के लिए संयुक्त रूप से दिए गए नोबल सम्मान में सम्मिलित भारतवंशी के नाम से भारतीय गद गद है|  किन्त्तु  इसका एक दूसरा पक्ष प्रस्तुत  कर रहे हैं अरविंद मिश्रा  -
 
 
आइये आज रसायन के नोबल २००९ की बात करते हैं   
 
उनके प्रश्न का उत्तर तलाशने का यत्न किया जाना चाहिए -


इस नोबेल पुरस्कार से भारत में जन्मे वेंकटरमण रामकृष्णन की बड़ी भूमिका है -मगर इसका श्रेय भारत को मिलने का कोई औचित्य नहीं है -बल्कि इन अवसरों पर भारतीय नियोजकों और नौकरशाही को आत्मचिंतन करना चाहिए कि ऐसे क्या कारण हैं कि जो भारतीय प्रतिभाएं यहाँ उपेक्षा का शिकार होती  हैं वही  अमेरिका में जाकर वैश्विक सम्मान का हकदार  बन जाती हैं ! क्या भारतीय परिवेश प्रतिभाओं के अनुकूल नहीं रह गया है ?



आज  एक प्रकरण पर मन जैसे अटक गया, कई सारे लिंक इधर से उधर क्लिकाते हुए खोजा तो पूरा प्रकरण समझ  में आया |  कुछ माह के मेरे अंतराल की अवधि में घटी घटनाएँ समझ में आईं| मुझे अनुमान है कि इस विषय पर अगला एक भी शब्द लिखते हुए मैं अपने लिए चिट्ठा लोक में कई शत्रु बना लूँगी, शत्रु न सही तो निंदक अथवा कन्नी काटने वाले ही सही , तैयार  हो जाएँगे; किन्तु अचाहे भी लिखने से स्वयं को रोक नहीं सकी| मन काफी खिन्न हुआ| रचना और पाबला जी के बीच ( और इस बहाने  रचना और ब्लॉग जगत् के कई  उसके विरोधियों के बीच एक द्वंद्व युद्ध- सा चल रहा प्रतीत हुआ| कुछ  घटनाएँ इतनी बड़ी नहीं होतीं,  जितना उन्हें रूप दे दिया जाता है| रचना के जन्मादिन पर पाबला जी ने बधाई दी, औरों ने भी बधाई दीं| रचना ने स्वीकार कीं| पश्चात रचना ने अपनी प्रोफाईल नेट से हटाने के क्रम में पाबला जी से उसके जन्मदिन वाली पोस्ट हटाने को कह दिया ताकि कोई व्यक्तिगत जानकारी नेट पर न रहे| पाबला जी ने वहाँ बधाई देने वालों के भी सम्मान का प्रश्न उठाते हुए उनसे राय देने को कहा कि पोस्ट हटाएँ या नहीं| राय न आनी थी न आई| इस  बीच रचना और पाबला जी के  बीच वितर्क  पूर्ण टिप्पणियों का इतिहास मिलता है| अब इस खींचतान ने इतना विकृत रूप ले लिया है कि बात सीधे सीधे एक दूसरे की अनुदारता के उदाहरण व अपने व्यवहार के पक्ष में खोद खोद तर्क देने के क्रम पर बढ़ निकली है या कह लें कि अपनी अपनी सफाई के चक्कर में लगभग एक दूसरे पर लांछन से लगाए जा रहे हैं. (क्षमा कीजिएगा किसी को मेरे शब्द बुरे लगें तो, मैं वास्तव में इस  प्रकरण से अत्यंत खिन्न हूँ और किसी का पक्ष नहीं लेना चाहती, इसलिए अपनी व्यथा इन आधे अधूरे शब्दों में व्यक्त कर रही हूँ)|

वस्तुतः यदि किसी कारण से , वे कारण स्त्री की सुरक्षा से भी जुड़े हो सकते हैं ( जिनका कारण  रचना के नारी को पढने वाले अनुमानित कर सकते हैं / या न भी कोई सुरक्षा कारण हो ) कोई व्यक्ति/ विशेषतः स्त्री, यदि अपने जीवन से सम्बंधित किसी पोस्ट को हटाने की बात कहे तो ( यदि वह पोस्ट किसी सार्वजनिक हित के प्रश्न से न जुडी हो ) तो उसे हटाने में कोई बड़ी आपत्ति किसी को भी नहीं होनी चाहिए| रही उस पर टिप्पणी कर्ताओं के सम्मान की बात , तो बधाई देने वाली टिप्पणियाँ इतना बड़ा प्रश्न नहीं हैं कि उनका निरस्त हो जाना किसी को भी खलता| ऐसी ऐसी घटनाएँ जीवन में होती  हैं कि आप किसी को बधाई देने गए और विवाह आदि मंगल कार्य के बीच में वहाँ आकस्मिक दुर्घटना हो जाती है, लोग भी समझदार होते हैं, ऐसे में भी समझदारी  दिखाते हैं,  न कि  अड़ते हैं कि हम तो बधाई देने और पार्टी खाने आए थे, अब बधाई तो देंगे ही देंगे| हमारी बधाई पलट नहीं सकती|  बड़प्पन इसी में था कि इस प्रकरण को एक इश्यु नहीं बनाया जाता| पर दोनों ओर से कोताही हुई, इसमें अपने अपने कारणों से लोग अपने मनोनुकूल टिप्पणियाँ करते रहे| आग में घी पड़ता रहा| बात बिगड़ती रही| रचना ने प्रथम अप्रैल पर केन्द्रित चर्चा का हवाला देते हुए पाबला जी पर आरोप/ ताना  लगाया और पाबला जी ने अपने पक्ष में तर्क लिखे|


पाबला जी का उद्देश्य मूलतः रचना को मान देना व खुशी देना ही था  और रचना ने भी सहर्ष उसे स्वीकारा  ही, किन्तु लम्बे अन्तराल के पश्चात यदि कोई घटना दोनों में से किसी भी  पक्ष के लिए उस रूप में सुखदाई न रह कर कष्ट दायक बन ने लगे तो मूल उद्देश्य और उसका औचित्य ही समाप्त हो गया | कोई एक तो बड़प्पन दिखाता !!   किसी को तो विचार करना चाहिए कि परस्पर व्यवहार में मृदुलता बनी रहे या मृदुलता नहीं तो कम से कम शत्रुता तो न हो| परन्तु खेद  कि ऐसा नहीं हुआ| पोस्ट को हटाना कोई बड़ा और सार्वजनिक मुद्दा था ही नहीं| बहुत व्यापक सरोकार वाली पोस्ट होती तो उस पर सार्वजनिक राय माँगने की बात उठती| परन्तु यह ऐसा मामला नहीं था| एक पक्ष यदि चूक कर भी रहा है तो दूसरे को अपना बड़प्पन व औदार्य दिखाते हुए बात को सम्हाल लेना चाहिए था| इन अर्थों में मैं पाबला जी से करबद्ध प्रार्थना करती हूँ कि वे इसे यहीं विराम दे कर बात को शांत करें ,  प्रकरण का पटाक्षेप करें और कुछ उदारता बरतें| दोनों को अपने अपने सन्दर्भ में समझना चाहिए कि सभी के अपने अपने कारण होते हैं अपनी अपनी `टची'   होने की अलग सीमा होती है, जैसे आप दोनों की अपने अपने किसी समय रही| दूसरों की भी वैसी ही कोई सीमा हो सकती है, उसे अनदेखा न करें plzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzz | लड़ने और विवाद करने के लिए जीवन में बहुत से विचारणीय प्रश्न है, व्यक्तिगत जीवन को इस विवाद का आधार न बनाइये कृपया|

मुझे टिप्पणियों के रूप में कड़ी भर्त्सना और आरोप झेलने को मिलने वाले हैं आज, किन्तु हमारी पीडा का अनुमान कर इसे आप दोनों अन्यथा नहीं लेंगे व न ही पक्ष विपक्ष में बँटे हुए अन्य ब्लॉगर बंधु |



अब और क्या लिखूँ? कुछ और ब्लॉग आप से बाँटना चाहती थी किन्तु अब मानसिकता उसकी अनुमति नहीं दे रही, इसलिए इतना ही कि -




वरना वो दिन दूर नही कि किसी नियमन आयोग का चौकीदार हमारे सर पर बैठा दिया जाएगा। तब सिवाए पछताने के कुछ हासिल नही होगा । उस से पहले ही हम चिट्ठाजगत के कचरे को साफ़ कर एक बेहतर माहौल बनाएं।शायद ये हम सभी के हित में है।

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