आपको पुनः अपने मध्य देखना ही सुखद है,बतायेंगी नहीं, इस बीच क्या क्या पढ़ड्डाला ?स्वस्थ, निष्पक्ष और सुरूचिपूर्ण चर्चा के लिए आभार
जय हिंद...
उनके लिए हमारा निवेदन है कि बंधु! पढ़ डाला का हिसाब तो हमें स्वयं नहीं पता; क्योंकि रस परिपाक ही वास्तविक कसौटी है इसकी तो, और उसका पता तो समय ही बताएगा | क्योंकि ` खाए कितना /क्या ' का असली हिसाब तो `पचाए कितना /क्या' ही से लगाना चाहिए | सो, पचाए को चीन्हने में स्वयं हमीं लगे हैं अभी तो, क्या बताएँ ?....
अनूप शुक्ल जी ने हमारी इक पुरानी कविता अंकित कर हमें विभोर कर दिया | धन्यवाद | यह देखिए उनकी वह टिप्पणी -
अभी अभी सुबह सुबह आपके द्वारा की चर्चा देखी और संयोग कि कल ही पढ़ी आपकी ही कविता सामने रखी है:
एक मछली सुनहरी
ताल के तल पर ठहरी
ताकती रही रात भर
दूर चमकते तारे को।
ब्राह्ममुहूर्त में
गिरी एक ओस बूँद
गिरा तारे का आँसू
मछली के मुँह में
पुखराज बन गया।
सप्ताह की शुरुआत आपकी सुरुचि पूर्ण चर्चा से हो यह अपने आप में खुशनुमा एहसास है। जय हो!
इनके अतिरिक्त अरविंद जी, लक्ष्मी एन .गुप्ता जी, वाणी गीत, सतीश सक्सेना जी, ताऊ रामपुरिया जी, खुशदीप सहगल जी, महेंद्र मिश्र जी, शारदा अरोड़ा जी, संगीता पुरी जी, चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी, हिमांशु जी, मीनू खरे जी, उड़न तश्तरी जी, लवली कुमारी जी, ऋषभदेव शर्मा जी व कनिष्क कश्यप जी प्रभृति सहृदयों ने अपना समय देकर प्रोत्साहन दिया | सबके प्रति आभारी हूँ|
आज की चर्चा के लिए दिन में कई बार संकलक खोले, तलाशे| हर बार कुछ नए लिंक सुपाठ्य लगते किन्तु अपनी सीमाओं की परिधि में जिन्हें आज की चर्चा के लिए अलग किया, वे मेरे तईं कई कारणों से महत्वपूर्ण हैं| इन कारकों का उल्लेख किए या न किए इन्हें आप से बाँट रही हूँ, जो निस्संदेह आप को भी महत्त्व के लगेंगे|
इधर विवादों का मौसम गहराया हुआ है - ऐसा ब्लॉग जगत् के निर्णायक प्रवक्ता लोग कहते हैं/ लिखते हैं| वस्तुत: हमारे यहाँ इधर तर्क को विवाद कहने का प्रचलन होता चला गया है, जबकि तर्क भारतीय संस्कृति का प्राण है| तर्क को प्रमाण का आधार भी माना गया है| भारतीय दर्शन ईश्वर तक पर भी तर्क करता है, और प्रत्येक निर्णय पर पहुँचने के लिए तर्क को प्रमाण माना गया| तर्क का अर्थ ही है विवेक और बुद्धि से औचित्य की प्रामाणिकता| सत्य की पक्षधरता का आग्रह| न कि आपत्ति अथवा विरोध| पुनरपि तर्क से निरस्त हो जाने वाली अधिकाँश विचारधाराओं के लिए अतार्किक होना ही सर्वाधिक सबल आधार होते चले जाने के क्रम में अंधाधुध वृद्धि के चलते तर्क को वाद और उस से भी बढ़ कर विवाद की संज्ञा दे दी गयी| अन्यथा खरे को कसौटी से भला क्या डर?
तर्क के विषय में लंबा तर्क हो गया| अस्तु ! चिट्ठा-लोक में मत -भेदों के बीच इधर महत्वपूर्ण शोध परक और विचारणीय सामग्री जो आ रही है उस का लाभ पठन-लोभी अवश्य उठाएँ | इस क्रम में मैं भाषा के नाम पर विवाद और कु -तर्क करने वालों की आँखें खोलने वाले एक आलेख का उल्लेख सर्वप्रथम करना चाहूँगी| लेख का शीर्षक है -
‘‘तूँ कहाँ का है, इस जागाँ तूँ क्यों आया? इस शहर को बाट तूँ क्यों पाया? तुझे कौन दिखलाया?’’ xxx ‘‘सो उस दिलरुबा नार कूँ, दीदियाँ के सिंघार कूँ, चतुर चैसार कूँ, एक सहेली थी,भौत छबीली थी, रात रंगीली थी। नाँव उसका ज़ुल्फ़ था, लट साँवली निपट, रंग कूँ काली, घूँगर वाली।’’
दक्खिनी हिंदी के लेखक वजही (1609) द्वारा रचित गद्य के ये अंश यह सोचने पर विवश करते हैं कि यदि दक्खिनी में 17वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में गद्य का यह रूप था तो उस समय के उत्तर के हिंदी रचनाकार ऐसा गद्य क्यों नहीं लिख पाए! स्मरणीय है कि यह समय महाकवि तुलसीदास का समय है। इस प्रश्न से टकराए बिना यदि हम हिंदी साहित्य के इतिहास में खड़ी बोली के गद्य का उदय 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से मानते हैं, तो बड़ी ऐतिहासिक भूल करते हैं। कोई कड़ी है जो बीच से निकल गई है या जानबूझ कर निकाल दी गई है! इस निकली हुई कड़ी का नाम है ‘दक्खिनी’|
खड़ी बोली के साहित्य को भारतेंदु काल से आरंभ मानते हुए प्रायः यह याद कर लिया जाता है कि कभी अमीर खुसरो ने भी इस भाषा में काव्य रचना की थी परंतु उसकी कोई परंपरा न मिलने के कारण उन्हें किसी प्रवर्तन का श्रेय नहीं दिया जाता। गद्य में तो और भी खस्ता हालत है। ब्रज और राजस्थानी के गद्य की चर्चा तो मिलती है लेकिन खड़ी बोली के गद्य की कहीं गंध तक इतिहासकारों को नहीं मिल पाई है।
भाषा की इसी यात्रा को निरंतर अपना लक्ष्य बना कर शब्दों का सफ़र गतिमान है| इस बार एक और रोचक यात्रा है शब्द की -
ल कीर और रेखा का अर्थ एक ही है। इन दोनों का मूल भी एक है। लिख् और रिष् धातुओं से इनका विकास हुआ है। इनसे बने लेख, लेखनी, लेखक, लीक, लेखक, लेखनी जैसे शब्द तो हिन्दी में खूब प्रचलित हैं। मगर एक खास बात है रेखा की गणित और हिसाब-किताब में मौजूदगी। स्पष्ट है कि लेखा, लेखा परीक्षक, लेखाकार, लेखापाल और लेखा जोखा जैसे शब्दों का प्रयोग करते वक्त यह अहसास नहीं रहता कि इनका रिश्ता भी लिख-रिष्-राईट की परम्परा से ही जुड़ता है।
विचार- प्रधान चिट्ठों की शृंखला में इधर एक और चिट्ठा देखने में आया है सत्यार्थ प्रकाश |
महर्षि दयानंद सरस्वती के क्रांतिकारी अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के नाम साम्य के कारण भी मुझे अनायास भला लगना ही था| सांख्य- दर्शन पर केन्द्रित एक लंबा आलेख आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रातीक्षा कर रहा है| अभी मुझे वहाँ केवल दिनेश राय द्विवेदी जी की एक टिप्पणी ही दिखाई दे रही है| क्या इसे यही माना जाए कि गंभीर लेखों को पाठक नहीं मिलते ?
लेख का अंश देखें -
बहुत लोग साँख्ययोग को एक साथ जोड़ कर देखते हैं और उसको एक ही पुस्तक या दर्शन समझते हैं। साँख्य के साथ योग का नाम इसलिए लिया जाता है जैसे हम भौतिक-रसायन, जीव-वनस्पति विज्ञानं आदि विषयों को जोड़ी में रखते हैं अन्यथा साँख्य दर्शन एवं योग दर्शन दोनों अलग पुस्तकें हैं और एक दुसरे की पूरक हैं। इसी प्रकार हम न्याय-वैशेषिक (न्याय दर्शन , वैशेषिक दर्शन ) और वेदांत-मीमांसा (वेदांत दर्शन अथवा ब्रह्मसूत्र , मीमांसा दर्शन ) का नाम लेते हैं पर वो सभी हैं अलग -अलग पुस्तकें। साँख्य योग में जगत के उन मूल तत्वों की संख्यात्मक विवेचना की है जो नेत्रों से दिखाई नहीं देते किन्तु जगत के मूल कारण में वो ही तत्व मुख्य होते हैं। और मोक्ष क्या है और उसकी प्राप्ति कैसे होती है इन सब बातो का भी उसमें उत्तर है । साँख्य को पढने मात्र से ही यह तत्व भेद्ज्ञान नहीं होता जब तक योग दर्शन के अनुरूप सबीज और निर्बीज समाधि तक नहीं पंहुचा जाये। इन तत्वों, आत्मा और इश्वर का साक्षात्कार केवल पढने मात्र या साधारण ज्ञान प्राप्त करने से नहीं होता है इसके लिए उच्च कोटि का पुरषार्थ चाहिए।
इससे स्पष्ट है की वास्तविक सांख्य सिद्दांत अकाल में ही किस प्रकार भ्रान्ति-घटाओं में आच्छादित होते रहे हैं। आचार्य उदयवीर शास्त्री के भाष्य में उनको विच्छिन्न कर वास्तविकताओं को स्पष्ट किया गया है। विवेकशील पाठक मनन करने पर स्वयं अनुभव कर सत्य का निर्धारण कर सकते हैं ।
- रश्मि रविजा मन का पाखी पर अपने लेख में खिन्न हो कर लिखती हैं -
- मानसिक विकलांगता से कहीं बेहतर है,शारीरिक विकलांगता
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आज ही टी.वी. पर देखा,उस लड़के के दोनों हाथ बहुत छोटे थे.पर वह पूरे लय और ताल में पूरे जोश के साथ नृत्य कर रहा था.नृत्य गुरु 'शाईमक डावर' भी जोश में उसके हर स्टेप पर सर हिलाकर दाद दे रहें थे.पर जब चुनाव करने का वक़्त आया तो दूसरे जज 'अरशद वारसी' ने जो कहा, उसे सुन शर्म से आँखें झुक गयीं.उनका कहना था ''अगर भगवान कहीं मिले तो मैं उस से पूछूँगा,उसने आपको ऐसा क्यूँ बनाया (अगर कहीं हमें भगवान मिले तो हम पूछना चाहेंगे ,उसने 'अरशद वारसी' को इतना कमअक्ल क्यूँ बनाया.??)तुम हमलोगों से अलग हो और यह हकीकत है,इसलिए तुम्हे दूसरे राउंड के लिए सेलेक्ट नहीं कर सकते." बाकी दोनों जजों की भी यही राय थी.शाईमक ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की पर नाकामयाब रहें.
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- गत दिनों रसायन के लिए संयुक्त रूप से दिए गए नोबल सम्मान में सम्मिलित भारतवंशी के नाम से भारतीय गद गद है| किन्त्तु इसका एक दूसरा पक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं अरविंद मिश्रा -
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- आइये आज रसायन के नोबल २००९ की बात करते हैं
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- उनके प्रश्न का उत्तर तलाशने का यत्न किया जाना चाहिए -
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इस नोबेल पुरस्कार से भारत में जन्मे वेंकटरमण रामकृष्णन की बड़ी भूमिका है -मगर इसका श्रेय भारत को मिलने का कोई औचित्य नहीं है -बल्कि इन अवसरों पर भारतीय नियोजकों और नौकरशाही को आत्मचिंतन करना चाहिए कि ऐसे क्या कारण हैं कि जो भारतीय प्रतिभाएं यहाँ उपेक्षा का शिकार होती हैं वही अमेरिका में जाकर वैश्विक सम्मान का हकदार बन जाती हैं ! क्या भारतीय परिवेश प्रतिभाओं के अनुकूल नहीं रह गया है ?
आज एक प्रकरण पर मन जैसे अटक गया, कई सारे लिंक इधर से उधर क्लिकाते हुए खोजा तो पूरा प्रकरण समझ में आया | कुछ माह के मेरे अंतराल की अवधि में घटी घटनाएँ समझ में आईं| मुझे अनुमान है कि इस विषय पर अगला एक भी शब्द लिखते हुए मैं अपने लिए चिट्ठा लोक में कई शत्रु बना लूँगी, शत्रु न सही तो निंदक अथवा कन्नी काटने वाले ही सही , तैयार हो जाएँगे; किन्तु अचाहे भी लिखने से स्वयं को रोक नहीं सकी| मन काफी खिन्न हुआ| रचना और पाबला जी के बीच ( और इस बहाने रचना और ब्लॉग जगत् के कई उसके विरोधियों के बीच एक द्वंद्व युद्ध- सा चल रहा प्रतीत हुआ| कुछ घटनाएँ इतनी बड़ी नहीं होतीं, जितना उन्हें रूप दे दिया जाता है| रचना के जन्मादिन पर पाबला जी ने बधाई दी, औरों ने भी बधाई दीं| रचना ने स्वीकार कीं| पश्चात रचना ने अपनी प्रोफाईल नेट से हटाने के क्रम में पाबला जी से उसके जन्मदिन वाली पोस्ट हटाने को कह दिया ताकि कोई व्यक्तिगत जानकारी नेट पर न रहे| पाबला जी ने वहाँ बधाई देने वालों के भी सम्मान का प्रश्न उठाते हुए उनसे राय देने को कहा कि पोस्ट हटाएँ या नहीं| राय न आनी थी न आई| इस बीच रचना और पाबला जी के बीच वितर्क पूर्ण टिप्पणियों का इतिहास मिलता है| अब इस खींचतान ने इतना विकृत रूप ले लिया है कि बात सीधे सीधे एक दूसरे की अनुदारता के उदाहरण व अपने व्यवहार के पक्ष में खोद खोद तर्क देने के क्रम पर बढ़ निकली है या कह लें कि अपनी अपनी सफाई के चक्कर में लगभग एक दूसरे पर लांछन से लगाए जा रहे हैं. (क्षमा कीजिएगा किसी को मेरे शब्द बुरे लगें तो, मैं वास्तव में इस प्रकरण से अत्यंत खिन्न हूँ और किसी का पक्ष नहीं लेना चाहती, इसलिए अपनी व्यथा इन आधे अधूरे शब्दों में व्यक्त कर रही हूँ)|
वस्तुतः यदि किसी कारण से , वे कारण स्त्री की सुरक्षा से भी जुड़े हो सकते हैं ( जिनका कारण रचना के
नारी को पढने वाले अनुमानित कर सकते हैं / या न भी कोई सुरक्षा कारण हो ) कोई व्यक्ति/ विशेषतः स्त्री, यदि अपने जीवन से सम्बंधित किसी पोस्ट को हटाने की बात कहे तो ( यदि वह पोस्ट किसी सार्वजनिक हित के प्रश्न से न जुडी हो ) तो उसे हटाने में कोई बड़ी आपत्ति किसी को भी नहीं होनी चाहिए| रही उस पर टिप्पणी कर्ताओं के सम्मान की बात , तो बधाई देने वाली टिप्पणियाँ इतना बड़ा प्रश्न नहीं हैं कि उनका निरस्त हो जाना किसी को भी खलता| ऐसी ऐसी घटनाएँ जीवन में होती हैं कि आप किसी को बधाई देने गए और विवाह आदि मंगल कार्य के बीच में वहाँ आकस्मिक दुर्घटना हो जाती है, लोग भी समझदार होते हैं, ऐसे में भी समझदारी दिखाते हैं, न कि अड़ते हैं कि हम तो बधाई देने और पार्टी खाने आए थे, अब बधाई तो देंगे ही देंगे| हमारी बधाई पलट नहीं सकती| बड़प्पन इसी में था कि इस प्रकरण को एक इश्यु नहीं बनाया जाता| पर दोनों ओर से कोताही हुई, इसमें अपने अपने कारणों से लोग अपने मनोनुकूल टिप्पणियाँ करते रहे| आग में घी पड़ता रहा| बात बिगड़ती रही| रचना ने प्रथम अप्रैल पर केन्द्रित चर्चा का हवाला देते हुए पाबला जी पर आरोप/ ताना लगाया और पाबला जी ने अपने पक्ष में तर्क लिखे|
पाबला जी का उद्देश्य मूलतः रचना को मान देना व खुशी देना ही था और रचना ने भी सहर्ष उसे स्वीकारा ही, किन्तु लम्बे अन्तराल के पश्चात यदि कोई घटना दोनों में से किसी भी पक्ष के लिए उस रूप में सुखदाई न रह कर कष्ट दायक बन ने लगे तो मूल उद्देश्य और उसका औचित्य ही समाप्त हो गया | कोई एक तो बड़प्पन दिखाता !! किसी को तो विचार करना चाहिए कि परस्पर व्यवहार में मृदुलता बनी रहे या मृदुलता नहीं तो कम से कम शत्रुता तो न हो| परन्तु खेद कि ऐसा नहीं हुआ| पोस्ट को हटाना कोई बड़ा और सार्वजनिक मुद्दा था ही नहीं| बहुत व्यापक सरोकार वाली पोस्ट होती तो उस पर सार्वजनिक राय माँगने की बात उठती| परन्तु यह ऐसा मामला नहीं था| एक पक्ष यदि चूक कर भी रहा है तो दूसरे को अपना बड़प्पन व औदार्य दिखाते हुए बात को सम्हाल लेना चाहिए था| इन अर्थों में मैं पाबला जी से करबद्ध प्रार्थना करती हूँ कि वे इसे यहीं विराम दे कर बात को शांत करें , प्रकरण का पटाक्षेप करें और कुछ उदारता बरतें| दोनों को अपने अपने सन्दर्भ में समझना चाहिए कि सभी के अपने अपने कारण होते हैं अपनी अपनी `टची' होने की अलग सीमा होती है, जैसे आप दोनों की अपने अपने किसी समय रही| दूसरों की भी वैसी ही कोई सीमा हो सकती है, उसे अनदेखा न करें plzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzz | लड़ने और विवाद करने के लिए जीवन में बहुत से विचारणीय प्रश्न है, व्यक्तिगत जीवन को इस विवाद का आधार न बनाइये कृपया|
मुझे टिप्पणियों के रूप में कड़ी भर्त्सना और आरोप झेलने को मिलने वाले हैं आज, किन्तु हमारी पीडा का अनुमान कर इसे आप दोनों अन्यथा नहीं लेंगे व न ही पक्ष विपक्ष में बँटे हुए अन्य ब्लॉगर बंधु |
अब और क्या लिखूँ? कुछ और ब्लॉग आप से बाँटना चाहती थी किन्तु अब मानसिकता उसकी अनुमति नहीं दे रही, इसलिए इतना ही कि -
वरना वो दिन दूर नही कि किसी नियमन आयोग का चौकीदार हमारे सर पर बैठा दिया जाएगा। तब सिवाए पछताने के कुछ हासिल नही होगा । उस से पहले ही हम चिट्ठाजगत के कचरे को साफ़ कर एक बेहतर माहौल बनाएं।शायद ये हम सभी के हित में है।
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