महेन्द्र मिश्र said...
आपके विचारो से सहमत हूँ .पहिनावा से निश्चित ही सांस्कृतिक प्रदूषण काफी हद तक बढ़ रहा है . इस तरह के न्यून वस्त्र पहिनती हैं की बच्चे भी बहुत कुछ बड़े ध्यान से देखते है ....
March 4, 2010 7:27 PM
kunwarji's said...
मिथिलेश भाई एकदम सही बात है ये!नारी को अपनी एहमियत समझनी ही होगी!
वो कब तक पुरुषो के लिए खिलौना बनी रहेगी!लेकिन ये उसे अपनी मर्यादाओं में छुपी गरिमा को समझ कर
ही करना होगा!नारी पूजने योग्य सदा ही है यदि वो इस लायक स्वयं को समझे!जब भी वो दिखावे के लिए तैयार होती है तो लाखो पुजारी तब भी तैयार है,मगर वो कैसे पुजारी है वो नारी खुद भी जानती है!
Arvind Mishra said...
'कोमलता, शील, ममता, दया और करूणा संजोने वाली यह नारी अपनी प्रकृति और अपने उज्जवल इतिहास को भूल कर भ्रूण-हत्या, व्यसनग्रस्तता, अपराध और चरित्रहीनता के भोंडे प्रदर्शन द्वारा अपनी जननी और धारिणी की छवि को धूमिल कर रही है।'
इसमें और जोडिये मिथिलेश जी -
नारीवादी आधुनिकाएं बच्चों को उनके नैसर्गिक अधिकर मां के दूध से भी वंचित करती हैं -ताकि उनका दैहिक सौन्दर्य लम्बी अवधि तक बना रहे -अपनी फिजीक के प्रति सहसा इतनी जागरूक बन जाती हैं की गर्भपात से भी तनिक नहीं हिचकती -थू है इन आधुनिकताओं पर !
March 4, 2010 8:21 PM
विनोद कुमार पांडेय said...
मिथिलेश भाई लेखनी में दम है....आज के परिवेश में नारी के बदलते विचारधारा और खुलेपन पर चिंता जायज़ है..आधुनिकता की चकाचौंध में नारी-पुरुष सब अपने वास्तविक स्वरूप और उद्देश्य से विचलित होते जा रहे है और बस भौतिकता में डूब कर अपने इस अमूल्य जीवन को मूल्यहीन करने पर तुले है.....धन्यवाद भाई भारत के युवा नेतृत्व के रूप में आपकी इस प्रकार की विचारधारा प्रभावित करती है...
March 4, 2010 8:34 PM
अदा' said...
मिथिलेश,
एक बात बताओ...क्या सारा दारोमदार सिर्फ महिलाओं पर ही होना चाहिए...
क्या संस्कृति को बचाए रखना सिर्फ महिलाओं का ही काम है.....
क्यूँ ये पुरुष समाज हर बात के लिए महिलाओं की तरफ ही देखता है....कुछ संस्कृति का बोझ अपने सर पर भी ले लेवें तो अच्छा रहेगा.....ये आधुनिकता का जामा पुरुष पहन लेवें तो ठीक है अगर स्त्री पहने तो 'थू' ...क्यूँ भला ?
March 4, 2010 10:01 PM
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...
पहनावा किसी का भी यदि शालीन नहीं है तो वह प्रदूषण ही फैलेगा. इधर देखने में आया है कि आज़ादी के नाम पर नंगई दिखाई जा रही है. आप गानों में देखिये कितनी भीषण बर्फ का सीन हो हीरो तो पूरे कपडे पहने होगा और हीरोइन छोटे से छोटे कपड़ों में होगी.
यदि इसे दर्शकों की मांग कही जाए तो क्या दर्शकों में महिलायें नहीं होतीं? यदि होतीं हैं तो क्या वे कपडे पहने हुए मर्द ही पसंद करतीं हैं?
विचार अच्छे हैं.........लगे रहिये...........
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड
March 4, 2010 10:40 PM
अनामिका की सदाये...... said...
मिथलेश जी
इसमे कोई शक़ नही की लेख बहुत बढिया और असरदार है लेकिन मै अदा जी की बात से भी सहमत हू...कि क्या सिर्फ
नारी की ही जीम्मेवारी है...जबकी पुरुष ही नारी को expose करने के लिए मजबूर भी करता है..इसी तऱ्ह केवळ
नारी ही पर संस्कृती बचाने का सारा बोझ क्यू??
March 4, 2010 11:52 PM
mukti said...
अदा जी से सहमत हूँ. ज़रा स्वामी नित्यानन्द, भीमानन्द आदि पर भी प्रकाश डालिये. इन्हें निश्चित ही कुछ आधुनिकाओं ने बर्गला दिया होगा ? न.
@Arvind Mishra,
मुझे तो आज तक ऐसी औरत नहीं मिली, जो अपनी फिगर के लिये बच्चों का दूध छुड़वा दे. हॉस्टल में नौ साल रही हूँ. आज मेरी जितनी भी सीनियर्स, जूनियर्स और साथ की सहेलियाँ हैं, वे चाहे नौकरी कर रही हों या नहीं, चाहे देश में हों या विदेश में, माँएँ हैं. उनमें से कईयों ने तो अपना कैरियर छोड़कर फुलटाइम माँ बनना पसंद किया. आपलोगों द्वारा वर्णित भारतीय नारियाँ जाने कहाँ रहती हैं???? अपनी हॉस्टल लाइफ़ में मुझे एक भी ऐसी औरत नहीं मिली. और अगर आप उच्च वर्गीय नारियों की बात कर रहे हैं या सिने तारिकाओं की, तो उनकी संख्या कितनी है?
March 5, 2010 12:02 AM
'अदा' said...
मुझे एक बात कोई बताये कि नारी को नारी नहीं रहने देने में किसका हाथ है...
मेरा जवाब है ....सिर्फ और सिर्फ पुरुषों का.....नारी का शील हरण कौन करता है सिर्फ और सिर्फ पुरुष ....फिर भी इलज़ाम नारी पर कैसी विडंबना है यह...
कितनी अजीब बात है ..ये ब्यूटी कॉम्पिटिशन ...ये सारे नाप जोख ..का बाज़ार पुरुषों ने ही बनाया हुआ है....
अगर बीवी बच्चे होने के बाद ख़ूबसूरत न लगे तो यही पुरुष ...रोज पड़ोसन का उदहारण देने से बाज नहीं आयेंगे... किसी पोस्ट पर खूबसूरत लड़की की तस्वीर भी आ जाए तो सारे सारी दुश्मनी त्याग कर उस ब्लॉग से मधुमक्खी की तरह चिपक जायेंगे....और घूम कर नारी पर तोहमत लगा देते हैं....
मिथिलेश अब नारी कि बातें करना थोडा कम कर दो हम नारियों को भी आत्ममंथन का समय दो.....ऐसी दनादन पोस्ट पढ़-पढ़ कर अब थोड़ी परेशानी होने लगी है....
March 5, 2010 12:33 AM
mukti said...
मुझे तो नहीं लगता कि एक-दो प्रतिशत औरतों के पाश्चात्य संस्कृति अपना लेने से भारतीय संस्कृति नष्ट हो जायेगी. तुमसे कम औरतों से नहीं मिली हूँ मैं. मुझे तो नहीं लगता कि हमारी संस्कृति पर इतना बड़ा खतरा आन पड़ा है कि हम सारी समस्याओं को छोड़ बस यही राग आलापें.
और ये मिथिलेश भाई कल ही एक ब्लॉग पर एक नारी की फोटो की तारीफ़ करके आये हैं और आज नारी के बाज़ारीकरण का विरोध कर रहे हैं. अब बताइये मिथिलेश भाई औरतें बिकती हैं बाज़ार में तो खरीदता कौन है और बेचता कौन? कल एक पुरुष ने अपने ब्लॉग पर एक महिला का चित्र लगाया और दूसरे पुरुष वाह-वाह कर रहे थे. हम तो उस समय भी औरतों के बाज़ारीकरण का विरोध कर रहे थे और आज भी कर रहे हैं.
March 5, 2010 2:43 AM
वाणी गीत said...
अदाजी और मुक्ति से शत प्रतिशत सहमत ....
आप जिन नारियों की चिंता में घुले जा रहे हैं ...उन्हें बाजार में प्रतिष्ठापित करने वाले वही लोग है जो यौन कुंठाएं मिटाने निकले हैं ....जो नारियां ये सब कर रही हैं ...किसके लिए ...कौन देखता है उन्हें ...इस पर गौर करे तो आपके सारे प्रश्नों का जवाब मिल जाएगा ...
बेटा जी , फिर से कह रही हूँ अभी बहुत छोटे हो ...इस फिक्र में क्यों घुल रहे हो ...अभी पढने लिखने में ध्यान दो ...
March 5, 2010 5:36 AM
Dr. Smt. ajit gupta said...
मिथिलेश जी
आपकी बात से सौ प्रतिशत सहमत हूँ लेकिन यह सिक्के का एक पहलू है। नारी पर लेखनी तो सब कोई चला रहा है लेकिन कभी पुरुष पर भी तो लेखनी चलाओ। वे समाज को किस तरह दूषित कर रहे हैं, उस पर भी तुम्हारे जैसे चिंतक का लेख आना चाहिए। भारत में कभी भी स्त्री और पुरुष का चिंतन नहीं किया गया, हमेशा से ही परिवार प्रमुख रहा है। परिवार की मान्यता ही समाज को विकृत करती हैं। अत: आज जो भी हो रहा है उसमें स्त्री और पुरुष दोनों ही दोषी हैं। मुझे तो लगता है कि शायद समाज महिलाओं के सहारे ही खड़ा है, तभी तो केवल महिलाओं की ओर ही सब लोग देख रहे हैं। पुरुष को क्या इतना नाकारा समझ लिया गया है कि उस पर कुछ भी लिखा जाना व्यर्थ सिद्ध होगा?
March 5, 2010 9:18 AM
रचना said...
पिछले कई दशको से संस्कृति को संभालने का ठेका नारी के सिर पर रहा हैं और इस पोस्ट को पढ़ कर लगा कि गलती कि शुरुवात यही से हुई हैं । क्युकी एक बे पढ़ी लिखी नारी को बच्चो को यानी बेटे और बेटी को बड़ा करने का काम दिया गया उसने वो काम सही नहीं किया । उसी कि वजह से बेटे उदंड और बेटियाँ फैशन परस्त होगयी । इसका निवारण बहुत आसान हैं । ये काम नारी से वापस लेलिया जाए क्युकी वो इस को करने मे अक्षम रही हैं और उसको पढ़ने लिखने और नौकरी करके अपने मानसिक स्तर को सुधारने का काम दिया जाए । बच्चो को संस्कार देने का काम उनके पिता को दिया जाए ताकि भारतीये संस्कृति और सभ्यता सही दिशा मे चल सके । नौजवान लडको को इस दिशा मे सोचना चाहिये और अपनी पत्नियो से ये काम तुरंत वापस ले लेना चाहिये !!
March 5, 2010 11:25 AM
- सुजाता