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रविवार, जून 14, 2009

टैगलाइन चर्चा 2

tagline charcha

 

तो, जैसा कि पिछले हफ़्ते वादा था, प्रस्तुत है टैगलाइन चर्चा - दूसरा व अंतिम भाग. पर पहले, थोड़ा इतिहास.

समीर जी से टैगलाइन का दूसरा भाग लिखने का निवेदन किया  गया तो हत्थे से उखड़ गए. बोले, ये कोई होरियाना मौसम तो है नहीं. लोग बाग़ बुरा मान गए तो बुरा न मानो होली है भी नहीं कह पाएंगे. बारंबार निवेदन करने पर इस शर्त पर तैयार हुए कि हमारी भी जुगल-बंदी रहेगी – लोगों का गरियाना अकेले क्यों झेलें? तो लीजिए पेश है टैगलाइन जुगलबंदी - बुरा न मानो, क्या हुआ कि होली नहीं है!

आदित्य:

मेरे बारे मे चटपटी खबरें (The Indian Baby Blogger)

मीर-कभी हमारे बारे में भी कुछ चटपटी खबर सुनाओ, you Indian baby. :)

रवि: सुनाओ सुनाओ, ये तो कनेडियन बेबी हैं..इनकी खबर तो चटपटी बनेगी ही!!

 

पराया देश 

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

समीर: बाकी सब क्या जलूस लेकर निकले थे जो इत्ता जोर से चिल्ला रहे हैं..

रवि: इत्ते में ही कारवाँ-बड़े संतोषी जीव हैं आप!!

 

मोहन का मन  

मुझे लिखने का बहुत शौक है लेकिन लिखना नहीं आता हिंदी ब्लाग् पढे, तो लगा यह है वो जगह जहां खुल सकता है मोहन का मन...

मीर: क्या समझें कि आपको लगा यहाँ किसी को लिखना नहीं आता फिर भी लिख रहे हैं.इसलिये आपको कान्फिडेन्स आ गया.

रवि: शौक तो हमारे भी कई ऐसे है जो हमें नहीं आता-मसलन गाना गाना-हिन्दी ब्लॉगजगत ने ही हमें भी यह सहूलियत दी.

 

मुझे कुछ कहना है

कुछ बातें हैं जिन्हें कहना है...

समीर: ओह, येस, येस, सर्टेनली प्लीज...

रवि:  बट देयर आलवेज वेयर मोर दैट केनॉट बी सैड...?

 

कवि योगेन्द्र मौदगिल

-व्यंग्य-कवि एवं ग़ज़लकार

समीर- ओह!! सॉरी!! पढ़्कर तो लगा था विरह गीतकार हैं...

रवि: और हम कहानीकार समझ रहे थे..अच्छा किया..बता दिया.

 

 

 

नीरज

ायरी मेरी तुम्हारे जिक्र से मोगरे की डाली हो गई...

समीर: हमारी वाली यहीं से शुरु कर लिखती है कि शायरी मेरी तुम्हारे जिक्र से बजबजाती नाली हो गई.. (बहर में तो है न?)

रवि: तसव्वुर अपना अपना!!

 

क्वचिदन्यतोअपि..........!

यहाँ इस ब्लॉग पर मैं उन्मुक्त होकर मुक्त और स्फुट विचार व्यक्त कर सकूंगा ,अस्तु ....

मीर: इसी उन्मुक्त और मुक्त और स्फुट विचार ने कैसा लफड़ा मचवाया था, भूले तो नहीं हैं.

रवि: भूल जायेंगे तो फिर याद दिलाया जायेगा. :)

 

वो कुछ पल

दुनिया के रंग सब कच्चे हैं, इन्हें उतर जाने दो....

समीर: और, ब्लॉग रंग चढ़ जाने दो...

रवि: बेरंगी दुनिया आपको ही मुबारक हो…

 

 

अनवरत 

 हम बतलाएँ दुनिया वालों, क्या-क्या देखा है हमने।

 समीर: बिना देखे मत ठेलने लग जाईयेगा जैसा बाकी लोग कर रहे हैं.

रवि: सारा कुछ न बताने लगियेगा अति उत्साह में.

 

कुछ भी...कभी भी.. 

ये मन जो कुछ भी ...कभी भी कहता ही रहता है उसे आपके सामने रख दिया है...

समीर: कुछ तो बचाये रखें अपने लिए..काम आयेगा.

रवि: कुछ भी..कभी भी?? तभी सोचते थे कि क्या लिख रहे हैं आखिर?

 

 

ताऊ डॉट इन 

रामपुरिया का हरियाणवी ताऊनामा

समीर: कपड़े का पजामा वैसे ही जैसे हरियाणवी ताऊनामा--अरे, ताऊनामा तो हरियाणवी के सिवा होवे ही कहाँ है!!

रवि: मन्ने तो पहेली भी खालिस हरयाणवी ही लगे है - कड़क.

 

 

कुछ इधर की, कुछ उधर की

कुछ कल्पनाऐं, थोड़ा चिन्तन ओर बहुत सारी बकवास......बस यही कुछ

समीर: हर पोस्ट के साथ लेबल लगाया करिये कि यह कल्पना है, यह चिन्तन और यह बकवास...बहुत सारी के चक्कर में हर बार कन्फ्यूज हो जाते हैं.

रवि: बकवास में भी तो कल्पना और चिन्तन की जरुरत होती होगी?

 

शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग

उन्होंने निश्चय किया है कि हल्का लिखकर हलके हो लेंगे..

समीर: इतने हल्के न हो लेना कि उड़ने लगें, उड़न तश्तरी की तरह..अब कुछ भारी लिखें.

रवि: अब पता चला लिखकर भी ... ओह.. हे भगवान...

 

स्वपन मेरे

स्वप्न स्वप्न स्वप्न, सपनों के बिना भी कोई जीवन है ..

समीर: नींद में बड़बड़ा रहे हैं क्या? सोते में तो वाकई इसके बिना कुछ भी नहीं..बड़ी नीरस सी नींद हो जायेगी.

रवि: आज क्या देखा सपने में? वही लिखे हैं क्या?

 

 

मुसाफिर हूँ यारों

घुमक्कडी जिन्दाबाद.

समीर: और ब्लॉगरी?? मुर्दाबाद?

रवि: साथ में लिख्खड़ी भी जिन्दाबाद!!

 

आशाएँ

उठना है और भी ऊपर, ऊँचाइयां पुकारती हैं.

समीर: उतना मत ऊँचा उठ जाइएगा जहां से फिर नीचे आना मुश्किल हो जाए.

रवि:  और नीचे टांग खींचने वाले पुकारते हैं.

भारतीय नागरिक -

 

दिक्कत मुझे तब होती है, जब बराबरी का पैमाना सब के लिए अलग- अलग होता है.

समीर: नापने की क्या व्यवस्था धरे हैं?

रवि: सचमुच बहुत दिक्कत में होगे आप तो?

 

 

अमीर धरती गरीब लोग

लंबे अरसे तक प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करने के बाद महसूस हुआ कि नौकरों की कलम आजाद नहीं रहती ..

समीर: बहुत समय लगा दिया समझने में..लोग तो बिना प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम किये यह सब जानते हैं.

रवि: और मालिकों की?

 

मानसिक हलचल

 मेरे होने का दस्तावेजी प्रमाण बन रहा है यह ब्लॉग|

समीर: नोटराईज़ और करा लें इस दस्तावेज को ताकि बाद में लफड़ा न मचे कि थे कि नहीं.

रवि: बैकअप रखते जाईयेगा...आखिर प्रमाण है. कहीं डिलीट या करप्ट हो गया तब?

 

कुछ मेरी कलम से

अभी तो आई है मेरे दर पर ख़ुशी कही यह तेरी तेज़ रफ़्तार से डर ना जाए!

समीर: रफ्तार तो कम करना मुश्किल है-उसे ही जरा अपने पास छिपा लें.

रवि: तेज रफ्तार की आदत डलवाएं-आज दुनिया बड़ी तेज भाग रही है.

 

कुछ एहसास

जब कलम उठाई,एहसासों को कागज़ पर उकेरा तब जाकर तसल्ली हुई...

समीर: चोर को भी तसल्ली हुई होगी कि मैडम ने डंडा रखकर कलम उठा ली.

रवि: और, अपराधी के पीठ पर डंडे की मार उकेरा तब कानून व्यवस्था की तसल्ली हुई?

 

दिल की बात

पेशे से डरमेटोलोजिस्ट हूँ. ओर ग़ैरपेशेवर थोड़ा सा इंसान.कब तक रहूँगा कह नहीं सकता ?

 समीर: एक्सपायरी डेट पढ़ लीजिए न भई, पता लगा जायेगा कब तक इंसान रहेंगे. दवाई तो है नहीं कि एक्सपायरी के बाद भी बिक जाये.

रवि: जब तक भी रहें, वर्ल्ड रिकार्ड ही कहलायेगा, क्योंकि आजकल तो जन्मते ही इंसान इंसान नहीं रह जाता.

 

कुश की कलम 

जो कुछ भी दिल से लिखा गया...

समीर: कभी कलम भी इस्तेमाल करें लिखने को..शायद कुछ बन पड़े.

रवि: दिल की स्याही बचाना भई..बहुत महँगी है रीफिल!!

 

 

सच्चा शरणम् 

 अभी कुछ और डूबो मन!

 समीर: कितना डुबाओगे भई..सांस भर आई है.

रवि: एक बार में बताएं-कितना डूबना है..कुछ और कुछ और नहीं चलेगा!!

 

ज़िंदगी के मेले 

ये ज़िंदगी के मेले दुनिया में कम होंगे, अफ़सोस हम होंगे

समीर: यही अफसोस तो हमें भी खाये जा रहा है.

रवि: सभी को ये ही टेंशन है. आपने नाहक कह दिया.

 

 

नारी

जिसने घुटन से अपनी आजादी खुद अर्जित की

समीर: क्या वाकई?

रवि: वैसे ही जैसे खुद चाय बना के पी, खुद खरीद के गोलगप्पे खाए?

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गुरुवार, अक्टूबर 16, 2008

पूरा विश्वास उठ चुका है!!!

फुरसतिया जी का हम पर से पूरा विश्वास उठ चुका है. उठ भी जाना चाहिये. ऐसी हरकत बार बार कि अभी चर्चा कर रहे हैं, करते हैं, करेंगे और फिर नहीं कर पायेंगे कब तक कोई झेले. मगर हमारी भी मजबूरी..करें क्या?

पिछले तीन सप्ताह से तो कायदे से टिपिया भी नहीं रहे हैं, जो सामने पड़ गया. टिपिया दिया..और बस!!!
होता है ऐसा फेज भी. हम तो यही मानते हैं कि चलता है.

विवेक के अति आभारी हैं कि फुरसतिया महाराज को रोज चर्चवाने को मना लिए हैं.
अच्छा ही है, हमारे लिए कुछ बचा ही नहीं.

बस, हमारी लवली जी ने अपनी ब्लॉगिंग का एक साल पूरा किया और सबको धन्यवाद दिया, वो बताने के सिवा थोड़ा ही बचा है. न जाने किस भयवश उन्होंने अपनी प्रोफाईल ही अलग कर ली अपने ब्लॉग से और फोटो भी. एक वो कि अच्छी सी फोटो हटा ली और एक हम, कि अपनी नई नई टांके जा रहे हैं.

फिर उनके सिवाय, वकील साहब द्विवेदी साहेब ने अजब ही खुलासा किया. हमारे लिए तो वाकई जानकारी ही के समान थी:

मैं जानता था कि इस वास्तविकता को जान कर कुछ लोगों को दुख होगा। लेकिन यह वास्तविकता है। मैं ने यह कदापि नहीं कहा था कि 65% रिश्ते ऐसे हैं। मैं कह रहा था कि इतने लोग इन रिश्तों को मान्यता देते हैं।

वैसे दिनेशराय द्विवेदी जी हमेशा ही कुछ नया सा संदेश लाते हैं जो विस्मित कर देता है. वो गुणों की खान हैं, अतः बलवान हैं हमारी नजरों में. आपकी आप जानों.

आज जो सबसे सालिड पोस्ट लगी वो थी शिव कुमार मिश्रा जी की. आज उन्होंने साबित कर दिया कि वो हमारे ही अनुज हैं. स्नेहवश आशीष कहने को जी चाहता है. सोचता हूँ कि पास होता तो सर पर हाथ फेर देता और कहता कि वाह!! क्या बात है. क्या दोहे लिखे हैं!!!

आज तो अरूणा राय जी कुछ अलग रंग में ही आईं...और समझिये कि छा गईं. कहती हैं:

जब वे सबसे ज्‍यादा
निश्चिंत और बेपरवाह होते हैं
उसी समय जाने कहां से
आ टपकता है
एक चूजा
भविष्‍यपात की सारी तरकीबें
रखी रह जाती हैं
और कृष्‍णबाहर आ जाता है...
बहुत जबरदस्त प्रस्तुति!!!


मीडिया नारद ने सूचित किया कि आज याने १५ अक्टूबर को माननीत भू.राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम जी की जन्म दिन है मगर कहीं कोई चर्चा नहीं. आज असल संतो की यही हालत है..मगर नकल वाले संत अपने बेटों को कानून से बचा ऐश कर रहे हैं. आप भूलना भी चाह उनका जन्म दिन तो वो भूलने न देंगे.

शब्दों का सफर आज तिल का ताड़ बनाये दे रहा है..वो तो खैर हमेशा ऐसा ही करते हैं. जिस शब्द को हम तिल समझते हैं, उसकी ऐसी व्याख्या करते हैं कि ताड़ ही बन जाता है. अजित भाई को साधुवाद.

आज आलोक जी जैसे व्यंग्यकार और हर बात आराम से हजम कर जाने वाले हमारे मित्र भी भावुक हो लिए:

सर आपको कैसा फील हो रहा है-वह टीवी रिपोर्टर फिर एक बदहवास बाप से पूछ रही है।

यह सुनकर मुझे जो फील हो रहा है, वह बताने योग्य नहीं है क्योंकि वह छपनीय नहीं है।


आज उनका हृदय बोला जो मुझमें धड़का एक अपनापा सा लगता है इस शख्स से..शायद सबको लगता हो.

अभी तो बस इतना ही...बाकी देखी जायेगी. फुरसतिया जी तो आने ही वाले हैं फिर से.

एक निवेदन, भाई विवेक, आप मेरा वाला दिन ले लो...बड़ी मुश्किलें चल रही हैं..और फिर अब चार हफ्ते में भारत भी निकलना है. ये ज्यादा भारी लफड़ा है.

अंत में:

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बायें से दायें:

घनश्याम गुप्ता जी, रजनी भार्गव जी, अनूप भार्गव जी, राकेश जी, समीर लाल...राकेश जी किताब ’अंधेरी रात का सूरज’ के विमोचन के अवसर पर.

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गुरुवार, सितंबर 18, 2008

मैडम आपको क्या परेशानी है??

शीर्षक देखकर भागे चले आये मानो कि बम फूटा हो. अरे महाराज, संदर्भ तो समझ लो कि दौड़ते ही रहोगे? यह ब्रह्म वाक्य नीलिमा जी की उस पोस्ट का हिस्सा है जिसमें वो बुजुर्गों के और नई पीढ़ी के बीच बढ़ती संवादहीनता की वजह से बुजुर्गों की हालत पर दुखी हैं एवं कहती हैं कि :

पीढियों के बीच बढती संवादहीनता हमारे अतीत और जडों को सुखा रही है !! अपनी वृद्ध पीढी के प्रति हमारा यह रवैया बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब विद्यालयों में बच्चे "वृद्धों की उपयोगिता" पर निबंध लिख रहे होंगे !


-वाकई, बहुत अहम मुद्दा उठाया है. पठनीय पोस्ट. हमारी खास रेकमेन्डेशन इसलिए भी कि हम खुद उसी बुजुर्गियत की दिशा में अग्रसर हैं.

वैसे बम फूटा की बात पर एक बात याद आई. जब न्यूयार्क में ९/११ अटैक हुआ या लन्दन में बम फटा और उसकी तस्वीर टीवी पर देखी, लोगों को घटना स्थल से उल्टी दिशा में भागते देखा मगर जब दिल्ली की तस्वीरें देखी तो लोग उसी दिशा में भाग रहे थे जहाँ बम फूटा..देखने कि क्या फूटा?? जैसे, सब टिप्पणी पर चली चर्चा जब खत्म हो गई. शांति छा गई तब राज भाटिया जी निकले आजादी की लड़ाई का बिगुल सधाते:

आप सब से निवेदन हे की इस जगह ऎसी बाते करके किसी का अपमान ना करे, क्योकि यहां हम ने किसी को नही देखा ना ही किसी के बारे जानते हे फ़िर क्यो दुशमनी करे, अगर दोस्ती नही कर सकते तो चुप रहॊ, उन से दुर रहो, आप भी मस्त रहो , दुसरो को भी मस्त रहने दो, मैं भी ९०% टिपण्णीयो मे बहुत कम शव्द लिखता हु, और कभी कभी सिर्फ़ :) से ही काम चलता है,
आप सब आजाद हैं ओर दुसरो को भी आजाद रहने दो यही मेरी शिकायत है और आप सब से प्राथना भी कि अब और नही, सब अपनी अपनी मस्ती मे रहॊ.


वैसे बात तो १०० टके सही है..आभार भाटिया जी.


आज शायदा जी ने कहा:

चुप के बियाबान में आवाज़ का बूटा रोप भी दें, तो सुबहोशाम उसे पानी कौन देगा? अनमनी उदारता के किसी क्षण में ईश्‍वर ने अगर अधर में लटकी दुआ को ज़मीन पर जाने का हुक्‍म भी दे दिया, तो तारे की तरह टूटकर गिरती उस दुआ को हथेलियां फैलाकर लोकेगा कौन?


शुरुवात में कहती हैं:.

"टूटी पलक को यूं ही ज़मीन पर गिरने नहीं दिया जाता... रोक लिया जाता है गाल पर ही। उल्टी हथेली पर रख, आंख बंद करके एक दुआ मांगी जाती है और कभी किसी को बताया नहीं जाता कि मांगा क्या गया। "


यही मंतर कालेज के समय हमारे एक मित्र भी हमें दे गये थे. विश्वास मानिये, पूरी पलक के बाल गिरा गिरा कर हथेली पर उल्टी धर के उड़ा दिये मगर बात नहीं बनी. उसकी तो शादी भी हो गई और हम बिना बाल की पलक लिये बहुत दिनों तक डोलते रहे बिना किसी को बताये, इसमें मंतर में बताना मना है. :) मगर यहाँ मसला दूसरा है. एक बेहतरीन लेखन का नमूना है, पढ़िये और आनन्द उठाईये.


वैसे, न जाने क्यूँ, क्या लफड़ा हुआ है कि भाई शिव कुमार मिश्र अपनी ईमेज बनाने के गुर सीखने में लग लिए हैं. लिखते तो हमेशा से क्लासिक व्यंग्य हैं, आज जरा अल्ट्रा क्लासिक टाईप लिख गये- और अपने मित्र कम गुरु से जिनकी ईमेज कबीर की है (गुमान ही होगा- वरना डॉ अनुराग ने उनके पोस्ट पर टीपते हुए कही दिया: सिर्फ़ गरियाने से अगर कोई कबीर बन जाता तो देखना यहाँ....इत्ते कबीर होते की उनके सरनेम से पहचानना पड़ता....) जितना गुरु से मूँह बाये सीखे, सब बता मारे.

ये गुरु को सुनने के चक्कर में लगे हैं और उधर सचिन मिश्रा बता रहे हैं कि गुरु कैसे कैसे!! ..

वैसे अनिल पुसडकर जी ने जैसे ही सचिन मिश्रा जी से शब्द पुष्टिकरण (वर्ड वेरीफिकेशन) हटाने की मांग की उन्होंने तुरंत उसे हटा कर टिप्पणी की कि :

"आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है. आगे से आपको यह दिक्कत नहीं होगी, आभार. " (लगा कहीं टेलीफोन लग गया है)

काश, सभी वर्ड वेरीफिकेशन धारी इस भावना को समझ हम टिप्पणीकारों पर रहम करते. :) कई ईमेल आते हैं कि वर्ड वेरीफिकेशन गुगल के साथ आया है, कैसे हटाये. बात तो सही है. डिफॉल्ट सेटिंग यही है और गुगल है भी दमदार आईटम. अब कोई उसके साथ आये तो हटायें कैसे-मगर उसने इसकी सुविधा दी है:

डेश बोर्ड से सेटिंग में जायें फिर सेटिंग से कमेंट में और सबसे नीचे- शो वर्ड वेरीफिकेशन में ’नहीं’ चुन लें, बस!!!


गुगल बुरा नहीं मानेगा, हमने कह दिया है. :)

आज एक विशेष चिट्ठे ’ओशो चिन्तन’ के बारे में जानकारी देना चाहूँगा जिसकी की कम ही चर्चा होती है. यह चिट्ठा नियमित रुप से राजेन्द्र त्यागी जी द्वारा संचालित है एवं इस पर रोज आचार्य रजनीश जो कि बाद में ओशो के नाम से जाने गये, का एक प्रवचन रहता है. जीवन के विभिन्न आयामों पर उनके चिन्तन और दर्शन पर उनके प्रवचन अति प्रभावी हैं.

आज एस बी सिंह जी ने रंग-ए-सुखन पर ब्रज का लोक गीत पंडित जसराज की आवाज में सुनवाया : मृगनयनी के यार. आनन्द आ गया.

मग्गा बाबा के प्रवचन सुन हमेशा की तरह मन प्रसन्न हुआ. आज उन्होंने गौतमबुद्ध और यशोधरा के मिलन की कथा सुनाई. हम मग्गा बाबा की जयकारा लगा आये. आप भी सुन आईये, अच्छा लगेगा.


आज कविताओं में:

आज कविताओं में स्वाति जी की प्रस्तुति उस त्वेष का योवन गजब की रही. वहाँ कट पेस्ट की सुविधा नहीं है वरना कुछ हिस्सा तो आपको यहीं पढ़वा देते.

कभी भाई वीनस केसरी स्कूल के दिनों में खीज उतारते एक कविता डायरी में लिख लिए थे. कुछ नया विचार दिमाग में नहीं आया तो वहीं खिजियाई कविता चिपका दिये, कुकडू कू $$$$$$$ -के नाम से. मस्त है!!!

आजकल पर ओमकार चौधरी जी को पढ़ें ’तेरे मेरे बीच की ये दीवार’ :

कई दिन की बारिश में
दरकी हैं कई दीवारें
भरे पड़े हैं पानी से रास्ते
भरी पड़ी हैं गलियां सारी
.... आगे पढ़िये ..


आज आये नये चिट्ठे:

आप सभी का हार्दिक स्वागत है. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाऐं:


1. आवाज़


2. कालापानी


3. मेरी कलम


4. श्री प्रह्लाद नारायण मित्तल (स्वर्गीय)


5. The S60 Blog


6. आपका दोस्त


7. Homoeopathy....Beyond Horizons


8. समीर

चिट्ठाकार: FIGHT AGAINST TERRORISM ...एक सालह- महाराज-ब्लॉग का नाम फाईट अगेन्सट टेरोरिज़म कर लो और चिट्ठाकार समीर.. सलाह बस है-हमारी नाम राशि हो, इसलिए स्नेह फूट पड़ा, मानना, न मानना, तुम्हारी इच्छा. :)

9. जाहिर है...


10. रंगीला मित्र मंडल


11. News36


12. गुरुवाणी


13. महाकौशल


14. MEDIA STUDENTS OF INDIA


15. चेतन पंचाल



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और भी ढ़ेर सारा लिखे थे, पता नहीं कैसे उड़ गया...यही लफड़ा है उड़न तश्तरी का. कब न उड़ जाये..चलते चलते बवाल के दो शेर:

कौन कहता के, मौत आई तो मर जाऊंगा ?
मैं तो दरिया हूँ, समंदर में उतर जाऊंगा !!

ख़ुद पुकारेगी जो मंज़िल, तो ठहर जाऊंगा !
वरना खु़द्दार मुसाफ़िर हूँ, गुज़र जाऊँगा !!


-बहुत खूब (छोटी टिप्पणी-जबकि पढ़े भी हैं दोनों शेर और कंठस्थ भी कर लिए हैं, फिर भी)

आज की तस्वीर: (चित्र एवं पंक्तियाँ दोनों समीर लाल द्वारा) :)

(निम्न पंक्तियाँ वीनस केसरी की कविता में कुकडू कू और ओमकार चौधरी जी कविता में टर्र-टर्र टुर्र-टुर्र के प्रयोग से उत्साहित होकर)

जिन्दगी की कांव कांव,
कहीं धूप तो कहीं छांव!!


p1

अब चलते हैं-जय हो!!!

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गुरुवार, सितंबर 11, 2008

और भी काम हैं जमाने में...

जब दो तीन महिने भारत से ठकुरासी करके लौटते हैं तो पहले दिन ऒफिस जाते ही दस मिनट हालचाल पूछने का शिष्टाचार निभाने के बाद ऐसा काम लादा जाता है कि प्राण ही निकल आते हैं. लगता है कि गये ही क्यूं इतने दिनों के लिए भारत और गये थे तो लौटे क्यूं? बॉस को देखकर लगता है कि बस चले तो यहीं दबोच कर मारें.

कुछ ऐसे ही भाव, माफ करियेगा, फुरसतिया जी के लिए इस समय मेरे मन में मचल रहे हैं. आज ही इत्ती ऊँची टंकी से ४८ घंटे आराम करके उतरे हैं और ये हैं कि हालचाल तो दूर, पहले ही घोषणा किये चाय सिडुक रहे हैं कि आज समीर लाल चर्चा करेंगे.

क्या खाक चर्चा करें? हाथ तो चले की बोर्ड पर. अभी दिन भर ऒफिस करके लौटे हैं. आज तो पूरी टिप्पणियां भी नहीं निपटा पाये इनके चलते.

कहते हैं आज प्रलय आने वाला था. सब छुप छुपा गये, किसी ने कुछ नहीं लिखा, बस हो गई चर्चा. वैसे अगर प्रलय आ जाता तो बचता सिर्फ मैं. इत्ती ऊँची टंकी पर चढ़ा था कि बच ही जाता पक्का. और सबसे पहले लिपटाते वो जो धरती पर बैठे आँख बंद किये चाय पी रहे थे.

सब टीवी चैनल कांव कांव मचाते रहे तो प्रमोद भाई रांची मोहल्ला वाले बोले कि जबरदस्ती डरवाते हैं. वैसे ऐसा कह भर देने से भी कई बार डर जाता रहता है. वैसे अगर नीशु भाई की कविता चाहे जिस पर लिखी हो, इस प्रलय से जोड़ कर उसके इन्तजार में माना जाये तो भी फिट हो जा रही है.

वो नहीं आये,
जाने क्या बात हुई,
वादा तो किया था ,
निभाने के ही लिए,
फिर क्यों साथ नहीं आये,
राह तकते रहे उस गली का,
जिससे गुजरना था उनको,..........


ये बिल्कुल वैसा ही वाकया है जैसा कि एक बेहतरीन गज़लकार, ब्लॉगजगत के नये चेहरे वीनस केसरी गरिमा जी की कविता को हमें टंकी से उतारने का मनुहार मान कर देख रहे हैं. कहते हैं कि एक दिन पहले लिख देती तो पहला शेर समीर जी की पोस्ट पर काम आ जाता.

लौट आओ कि अंधरी ये रात हुई
अब तक खफ़ा हो, ये क्या बात हुई.......

मजाक अलग, लेकिन गरिमा जी की गज़ल ऊँचाई पर है, जरुर पढ़िये. वैसे जब गीत गज़ल की दिशा में पठन हेतु निकल ही पड़े हैं तो श्रृद्धा जी को भी जरुर पढ़ियेगा, बड़ी मर्मस्पर्शी गजल है:

मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए


मगर जब प्रलय आने ही वाला था तो थोड़ा तो आशावादी रहतीं. कपड़े अपने आप ही धुल जाते, जबरदस्ती मेहनत की. हम तो इस चक्कर में नहाये तक नहीं, कि उसी में छपाक छपाक नहा लेंगे, काहे पानी खराब करें. यूँ भी नहाने से इतने सालों में कोई फायदा तो हुआ नहीं. जिस रंग पैदा हुए थे, वही रंग बने रहे-पानी गया नाली में. साबुन ब्याज में.


ऐसा नहीं कि प्रलय प्रलय ही हाहाकार मचा है. ऐसे में ज्ञानचक्षु खोलने विवेक गुप्ता जी आये कहे कि उस मशीन के प्रयोग से प्रलय नहीं, सृजन की ओर पहला कदम बढ़ेगा. बात समझाई भी, मगर टीवी एतन चिल्ला चिल्ला कर बोला कि हम तो डरे हुए रहे.

प्रलय टाईप ही एक समाचार कविता वाचक्नवी जी कहने लगीं कि गुजारा भत्ता के लिए शादी जरुरी नहीं . है तो अच्छी बात मगर ये क्या, शादी भी नहीं भई और हर्जाना भर रहे हैं. अरे नाराज मत होईये, बिल्कुल सही है, ऐसा ही होना चाहिये.

एक नर समर्थक मोर्चा खोले हमारे ई-गुरु राजीव भी बैठे हैं. उनकी चाहत है कि जो भी उनके साथ आना चाहे, ध्यान रहे वो योद्धा हैं, वो यह लोगो अपने यहाँ लगा ले:

Blogs Pundit इस पर क्लिक करके

क्या पता, कौन सा प्रलय आयेगा. हम तो बस राम राम जप रहे हैं.

बिहार वाली बाढ़ भी तो लगभग प्रलय ही थी. इस दुखद त्रासदी पर प्रभात रंजन जी का नजरिया देखिये:

ये जो मंज़र-ऐ विकराल है ,क्या है
हर तरफ़ हश्र है,काल है ,क्या है ?
पानी-ही-पानी है उफ़ ,हर जगह ,
कोशी क्यूँ बेकरार है ,क्या है ?.......

ऐसे सब माहौल में मेहन भाई ने अमीर खुसरो रचित गीत ’मोहे सुहागिन कीनी रे’ सुनवाया, बहुत आनन्द आ गया. आप भी आनन्द ले लें.

रोहित जैन जी न जाने कहीं व्यस्त हैं, कहते हैं ’और भी काम हैं जमाने में’ और अपने मन के भाव कहने फैज साहब के बेहतरीन शेरों की लड़ी लगा दी. बढ़िया है व्यस्त रहो और ऐसे ही शेर सुनवाते रहो. भगवान भला करेगा.

प्रलय सामने खड़ा हो तो अच्छे अच्छों की यादों की पोटली खुल जाती है इसलिये शोभा जी यादों की पोटली खोली, तो कतई अचरज नहीं हुआ.

शौकीन लोगों को इन सब से कुछ अंतर नहीं पड़ता. अब देखिये, अमित खान-पान के शौकीन, लगे चाकलेट गाथा सुनाने.

महेन्द्र मिश्रा जी भी सोचे होगें सृष्टि खत्म हो ही रही है तो क्यूँ न हंसते हंसते चला जाये, बस लगे हंसाने.

अब आप लोग हंसते रहिये. हम तो कुश की चिट्ठाचर्चा जहाँ पर आई उसके बाद जितना बांच सके, लिख मारे. अब ये बंद हो तो आगे बांचे और फिर नये चिट्ठाकारों को ढ़ूंढ़ें. हमे मालूम है लगभग सभी छूट गये हैं. मगर पहला दिन है, आप समझ सकते हैं. शायद कोई भला मानस बैलेन्स चर्चा मध्ययान चर्चा के नाम से कर दे, जिसमे कभी संजय बैंगाणी की महारथ थी.

अच्छा नहीं लग रहा, मगर बंद करना ही होगा. कृप्या अन्यथा न लें. बस अनुराग वत्स की यह पेशकश और देख लें.

चित्र साभार: अनुराग वत्स :


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बुधवार, जुलाई 04, 2007

आज की भड़भड़िया चर्चा

आज अनजाने में ही एक चिट्ठाचर्चा , हमारी चर्चाकारी से बेहतर, वैसे ही हो चुकी है जो कि हमारे मित्र जगदीश भाटिया ने अपने अनोखे और निराले अंदाज में की है. हम तो उसे ही कट पेस्ट कर देते. परमिशन भी मांगे थे. मालूम भी है वो दे देंगे मगर भारत है, क्या करें. जब तक परमिशन आयेगी-दिन सरक जायेगा, बातें महत्ता खो देंगी. इस लिये बस लिंक दिये दे रहे हैं तो वहाँ तक की चर्चा इस लिंक पर देखें. मजा आने की गारंटी, जगदीश भाई की तरफ से हमारी.

अब आगे बढ़ना ही जिन्दगी है तो हम भी बढ़ें. क्या आपको पता है कि ब्लॉगर पर आप अपने पोल और सर्वे करवा सकते हैं जैसा कि नारद करता है कि आप स्त्री हैं कि पुरुष. बिना इसका ध्यान रखे कि एक वर्ग और है. चुनाव तक लड़ने का अधिकार है मगर नारद पढ़ने का नहीं. खैर, उसे छोड़ें. हरि इच्छा के आगे क्या कहें. मगर ऐसे पोल आप कैसे कर सकते हैं बता रहे हैं अंकुर भाई . सीख गये और आसमान पर नजर दौडाई और रोज की तरह आज भी आज की शायरी और सामान्य ज्ञान प्राप्त किया. आज, आज के विचार की कमी खली, आदत जो पड़ गई है. वैसे, यह मात्र प्रस्ताव है कि अगर यह तीन दैनिक पोस्टों को एक कर दिया जाये और शीर्षक रहे-आज का विचार, शायरी और सामान्य ज्ञान. तो एक ही क्लिक में काम चल जाये और नारद के संसाधनों का भी उपयोग सभी के द्वारा बराबरी से हो सके. यह मात्र आज का हमारा विचार है, बाकि जैसा आप उचित समझें.

अनिल जी की रचना विड्म्बना देखें-सव, एक सुन्दर रचना है. और भी दुर्लभ चीज देखना हो तो सागर भाई हेमंत दा का दुर्लभ गीत सुना रहे हैं और अमित दुर्लभ चित्र दिखा रहे हैं. चाहे कुछ देख दिखा लो, मगर कमलेश भाई का डिक्लेरेशन कि मैं भी इंसान हूँ देखना न भूलना. हमने न सिर्फ देखा बल्कि टिपियाया भी है. :) अब ध्यान रखते हैं.

अनिल रघुराज जी की लेखनी के तो हम व्यक्तिगत तौर पर कायल हैं और आज उस पर और मुहर लग गई जब उन्होंने क्यूबा के कास्त्रो के विचार हिन्दी में लिखे यह कहते हुये कि आत्मा जैसे होते हैं विचार . आज पहली बार पढ़ा और दिनेश पारते जी ने तो मानो लुट ही लिया-क्या रचना है!! हम तो पूछने वाले थे कि क्या भाई, आपने ही लिखी है?? गजब भाई गजब- आकांक्षा मानकर चले कि उन्होंने ही लिखी है तो उसका कुछ भाग यहाँ न दें तो पाप कहलायेगा, सच में:

हे कृष्ण मुझे उन्माद नहीं, उर में उपजा उत्थान चाहियेअब रास न आता रास मुझे, मुझको
गीता का ज्ञान चाहियेनिर्विकार निर्वाक रहे तुम, मानवनिहित् संशयों परकिंचित
प्रश्नचिन्ह हैं अब तक, अर्धसत्य आशयों परकब चाह रही है सुदर्शन की, कब माँगा है
कुरुक्षेत्र विजयमैने तो तुमसे माँगा, वरदान विजय का विषयों परमन कलुषित न हो,
विचलित न हो, ऐसा एक वरदान चाहियेमुझको गीता का ज्ञान चाहिये



.....पूरी रचना यहाँ पढ़ें . वाह, बधाई, मित्र. उनकी पुरानी रचनायें भी पढ़ें.

लिखे तो राजीव रंजन जी भी चाँद पर बेहतरीन क्षणिकायें हैं मगर कोशिश करके भी हम टिपिया नहीं पाये, पता नहीं क्या समस्या है.

रचनाकार ने बेहद नाजुक कहानी विजय शर्मा जी की सुहागन सुनाई, हम तो ऐसा खोये कि टिपियाना ही भूल गये, जो अभी देख पाये. माफ कर देना भाई, चर्चा के बाद कोशिश करते हैं.

राजेश पुरकैफ भाई
से बारिश के मंजर की एक अलग तस्वीर देखें-हमने कह दिया है: किसी की मस्ती, किसी की उजड़ी बस्ती चन्द्र भूषण जी ने कहा लट्ठलट्ठे का सूत कपास-शीर्षक देख कर पढ़ना शुरु किया और पहली लाईन देख कर बंद-आपका दिल करे तो पढ़ें . मेरी मंद बुद्धि है, गहराई समझ नहीं पाता. मगर अधिकतर चंद्र भूषण जी लिखा पसंद करता हूँ तो बता दिया.

सब चुप रह जायें तो भी मेरे भाई मसिजीवी न चुप रहेंगे, तो उनकी सुनो चिट्ठाजगत की गोपनियता पर ....


अभी यही रुकते हैं, वादा है कि कल सुबह आगे की कवरेज दूंगा बिना नागा.....जरा, हड़बड़ी में भागना पड़ रहा है....कोई भी कुछ न सोचे मैं वापस आ रह हूँ...क्षमा मित्रों.

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बुधवार, मई 16, 2007

आप गदहा लेखक नहीं हैं

आज रचना जी ने प्रण किया है कि कोई भी चिट्ठा छूटने न पाये चर्चा से और वो भी पद्य में. हमने सोचा कि यह तो बहुते उत्तम विचार है उत्तम प्रदेश की तरह. तो हमने सारी सत्ता उन्हें सौंप दी यूपी की जनता की तरह. मगर अंत तो देखो, आखिर में हमें आना ही पड़ा. मगर उनकी चर्चा में कोई कमी नहीं निकाल पाये, भले ही जहाँ तक की हो, की बेहतरीन है. उत्तम विचार. पढिये: यह रचना जी हैं, वरिष्ट महिला चिट्ठाकारा:

सबसे पहले करूं प्रणाम,
अब करती चर्चा का काम!
चिट्ठो‍ की मै सैर कराऊं,
इसकी, उसकी बात बताऊं!
दुखी कौन है, खुश है कौन?
कौन है बोला, कौन है मौन?
गीतकार की करते बात,
मुक्तक से करते शुरुवात!

आप की प्रीत ने होके चंदन मुझे इस तरह से छुआ मैं महकने लगा
एक सँवरे हुए स्वप्न का गुलमोहर, फिर ओपलाशों सरीखा दहकने लगा
गंध में डूब मधुमास की इक छुअन मेरे पहलू में आ गुनगुनाने लगी
करके बासंती अंबर के विस्तार को मन पखेरू मेरा अब चहकने लगा


ख्यालो‍ मे सवाल की मार,
यहां लिखे है‍ सत्यविचार!

न तकनीक, न ही कानून,
न ही गा रहे "लिनक्स" के गुण!
उन्मुक जी आज कुछ भटके!
मोक्ष की चिन्ता मे है‍ अटके!!
न इतिहासविद न आलोचक
फ़िर् भी बात की है रोचक!

जहाँ एक ओर विद्वान हैं जो मानते हैं कि हिन्दू धर्म लाखों करोडों वर्ष पुराना है तो वहीं दूसरी ओर के लोग सभी धार्मिक ग्रन्थों को मात्र कल्पना की उडान से अधिक नहीं समझते। मेरी समझ में सत्य इन दोनों रास्तों के कहीं बीच में है पर विडम्बना है इस बीच के रास्ते पर कोई चलना ही नहीं चाहता। यहाँ तक तो ठीक था लेकिन इस अंतर्जाल ने सब गडबड कर दिया है। अब तो हर कोई इतिहासकार बन सकता है, आपकी योग्यता भले ही कुछ भी न हो लेकिन एक वेबसाईट बनाइये और अपना सारा अधकचरा ज्ञान वहाँ पटक दीजिये।


आंख की देखे‍ एक् झलक भर
तीन किस्तो‍ की कथा यहां पर्!

जाने आज क्यों वो सब याद आ रहा है, हमारा घर, उससे बस 3 गलियाँ दूर तुम्हारा घर, मिताली दीदी, तुम, चाचा जी, चाची, माँ, पिता जी, बुआ और भी बाकी सारे भी। और हाँ वो मैथ के सर क्या नाम था. . .हाँ, मिश्रा जी, वो जाने कैसे होंगे। सच पूछो तो ऐसे कितने लोग हैं जिनकी याद आनी चाहिए पर नहीं आती। मिश्रा सर का वो चेहरा तो अभी तक याद है, जब कितनी खुशी से वो पिता जी को बता रहे थे कि मैं मैथ्स में बहुत तेज़ हो गई हूँ और मुझे बी.एस.सी. करनी ही चाहिए, पर पिता जी का कहना था क्या करेगी, इसकी तो शादी की बात भी चल ही रही है।

पुराणिक जी से सीखिये कुछ नये धन्धे,
जानिये सुदर्शन जी कहते है‍ हिदू जिन्हे!

अभी कल पड़ोस में शादी हुई, श्रीवास्तवजी के यहां।
बड़ी-बड़ी किरकिरी हुई उनकी, कोई भी रिश्तेदार नहीं पहुंचा। ना साला, ना जीजा, ना बड़ा भाई, ना छोटा भाई।
श्रीवास्तवजी भी नहीं पहुंच पाये थे, किसी रिश्तेदार के परिवार में शादी में।
हर शादी में श्रीवास्तवजी को कोई काम पड़ गया था, सो जब श्रीवास्तवजी के यहां शादी हुई, तो सबने मिलकर श्रीवास्तवजी का काम लगा दिया।
बहुत परेशान थे। उनकी परेशानी में मुझे एक नये धंधे की संभावनाएं नजर आयीं-रिश्तेदार प्रोवाइडिंग सर्विस।



उच्च वर्ण के लोगों द्वारा बनाए गए ऐसे ही जानवरों की समानता के लिए ही बुद्ध ने अपनी पदयात्रा शुरू की थी। उद्देश्य था एक समतामूलक समाज की स्थापना। और फिर एक समय तो ऐसा आया जब भारत के अधिकांश भूभागों पर बौद्ध राजाओं का शासन था। जिसे जे.सी.मिल ने हिंदू काल कहा है उसमे से ज्यादातर बौध्ध्काल ही है और मिल ने जानबूझकर इसे हिंदुकाल कहा जिससे भारत मे यह स्थापित हो सके कि यहाँ पहले तो हिंदू थे और बाद में उन्हें भगाकर मुस्लिम शासक बन गए।

मामले एक नही! है‍ पूरे तीन दर्जन!
हिन्दी हो ललित तो पढने को करे मन!!

इस रचनात्मक आंदोलन से जुड जाईये. आम अंग्रेजी शब्दों के लिये सहज हिन्दी शब्द सुझाईये. हम हर दिन एक नया शब्द आपसे मांगेगे, लेकिन उसका इंतजार किये बिना भी ई-पत्र द्वारा आप पाणिनि को सुझाव भेज सकते हैं. अगली पीढी आपका ऋणी होगी. हिन्दी के प्रचार-प्रसार में यह एक और कदम होगा. – शास्त्री जे सी फिलिप

सारथी जी को हिन्दी सुझाईये,
इन शब्दो‍ के अर्थ बताइये!

Software
Frustration
Netizen
Net-culture
Surfing

अच्छे दिन नही रहे तो बुरे भी नही रहे‍गे

आपने ये कहा है, तो हम भी यही कहे‍गे!!
कही एसा न हो जाये
चमचा महात्म्य कोई गाये !!
क्या ये खजुराहो को उडाये‍गे?
या फ़िर् कान्क्रीट का दरख्त गिराये‍गे??

बड़ी मुश्किल हो गयी है। जिसे देखिये वही खजुराहो, अजंता एलोरा, कोनार्क या फिर काम सूत्र का हवाला दिये जा रहा है। हुसैन का मामला हो या फिर बडौदा के एमएस यूनिवर्सिटी के कला विद्यार्थी चन्‍द्रमोहन की गिरफ्तारी का ... तर्क देने वाले जब देखो, यह बात उठा दे रहे हैं। यह तो हिन्‍दुत्‍ववादियों (हिन्‍दू मजहब मानने वाले नहीं) के गले की फांस बन गया है। भई, उस वक्‍त तो ये शक्तिमान थे नहीं, तो कलाकारों के मन में जो आया, बना डाला। जिंदगी के जो खूबसूरत तजर्बे थे, उनकी अभिव्‍यक्ति अपने कला माध्‍यमों के ज़रिये कर डाली। उनकी नीयत क्‍या थी, वो तो वही जाने लेकिन ये पंगेबाज उस वक्‍त रहते तो यकीन जानिये न तो खजुराहो के कलाकार बचते और न ही वात्स्यायन साहब।

हर तरफ़् अब् यही अफ़साने है‍!
मां के और् भी गीत गुनगुनाने है‍!!

दौर-ए-जुनू मे....

कवियो‍ को भी लग जाता है रोग्!

जिसे लिखना नही आता वो क्या कहता है!
यही कि अब् वो भी कुछ लिखता रहता है!!
रचनाकार लेकर आये है‍'मुझे कुछ याद नही
पढिये हरिसि‍ह जी ने जो कथा कही!

"संभावना व संघर्ष" दोनों में है जबर्दस्त दम
यही तो मानते है ना आप और हम?


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अब रचना जी थक गई. कोई भी थक जायेगा, इतने सारे चिट्ठों की चर्चा करके. तो आगे का कार्य जो थोड़ा सा बचा है रचना जी की नजर में, वो हम करना शुरु करते हैं. अब हम उनकी और हमरे गुरु राकेश भाई की तरह पद्य में करने की काबिलियत नहीं रखते तो गद्य में ही लिखे देते हैं. :) उसमें तो हम हमेशा ही लिखते आये हैं.

विनय पत्रिका में बोधिसत्व जी लाये हैं अपनी निराला जी पा लिखी एक बहुत बेहतरीन कविता:

जितना नहीं मरा था मैं
भूख और प्यास से
उससे कहीं ज्यादा मरा था मैं
अपनों के उपहास से ।

जरुर पढ़े यहाँ पर .

अब जब हम खुद को गदहा लेखक घोषित कर चुके हैं तो उस आलेख पर अभी भी जारी टिप्पणी महायज्ञ में भाई पंगेबाज अरुण जी दो बार आहूति डाल गये. बस फिर क्या था, गदहों ने आकर उनको घेर लिया है और कल मिटिंग के लिये बुलवाया है. काकेश भी साथ जायेंगे, ऐसी सूचना मिली है. इसी लिये काकेश नें आज कुछ नहीं लिखा.वहीं जाने की तैयारी में सज रहे हैं. :)

बात करामात में विशेष सोशल इंजीनियरिंग का सच: ज्ञानेन्द्र दद्दा से प्रेरणा लेकर लिख रहे हैं और बिना किसी से प्रेरणा लिये महाशक्ति प्रमेन्द्र बता रहे हैं कि बेहतरीन टेनिस प्लेयर किम क्लाइस्टर्स पर क्या गुजरी और अब उनका क्या प्लान है. यह होता है बड़ी जगह पहचान रखने का नतीजा, अंदर की खबर लाये हैं जो किसी को नहीं मालूम थी. साधुवाद प्रमेन्द्र को. जब पढ़ लो तो पढ़ने का आभार व्यक्त करने के लिये आपको मुफ्त दिखायेंगे हमारे महाशक्ति स्पाईडर मेन ३ .

गद्य गद्य-काहे बोर हो रहे हो भाई. लो सुनो दो दो बेहतरीन मुक्तक मालायें: एक तो भाई परमजीत बाली जी से और एक हमारे गीत सम्राट और मेरे गुरु राकेश खंडेलवाल जी से. दिव्याभ भाई तो खैर जब भी लिखते हैं, ऐसा लिखते हैं कि हम बिछ बिछ जाते हैं. भाई की लेखनी है ही ऐसी गजब की. तो उन्हें पढ़ें डिवाईन इंडिया पर...तू ही मेरी प्रतीक्षा है . कविताओं में हाशिया पर देखिये राजेश जोशी जी की एक से एक रचनायें

अब वापस, वाह मनी ने बताया कि फिलिप्स कार्बन ब्लैक में पैसा ही पैसा . मगर अपना संयम बनाये रखना भाई, उतना ही खेलो या अटकाओ कि डूब जाये तो उबर पाओ. मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि कमल भाई को भी इस तरह की कोई चेतावनी हर पोस्ट के साथ लगाना चाहिये ताकि लोग भ्रमित न हो जायें. :) मात्र मेरी सोच है बाकि कमल भाई जानकारी अच्छी दे रहे हैं और ब्लॉग में साईड में फोटू भी, हा हा!!!.

आज हमारे भतीजे जी उत्कर्ष महाराज की भी छुट्टी शुरु हो गई. अब वो आपको रोज चुटकुले सुनाया करेंगे. आज भी सुनाया है. अरे भाई जाओ और बालक का उत्साह बढ़ाओ. आज के इस परेशान जमाने में इससे बड़ी कौन सी समाज सेवा हो सकती है कि कोई आपके चेहरे पर मुस्कान ले आये. आप मुस्करायें. बच्चे को क्या चाहिये, बस आपका उत्साहवर्धन. जरुर करें. मेरा निवेदन है. भले ही उसके चाचा पंकज को टोना टोटका जादू मंतर पर न टिपियाओ, चलेगा. वो तो टिप्पणी प्रूफ हो चुका है. :)

अभय भाई निर्मल आनन्द पर बिल्लू भाग ३ ले आये हैं-कहानी सही जा रही है और हर बार कुछ प्रश्न छोड़ जाती है अगली कड़ी के लिये. पढ़िये. सुषमा कौल जी टेलिग्राफिक पोस्टों का दौर चालू है, यह एक समाचार माना जाये.

अनिल रघुराज जी से सुनिये जिसकी जितनी संख्या भारी और खैरात या हिस्सेदारी, क्या देंगी बहनजी . दोनों ही विचारोत्तेजक लेख है मगर हमारे पास तो जबाब नहीं है. आप लोग देखें, हम थोड़े दूर देश में रहते हैं न!!

बरसाती रिमझिम का संस्मरण सुन लें प्रमोद भाई से और हनुमान जी काहे वापस नहीं आये, जानने के लिये लक्ष्मी गुप्त जी का आलेख हरि अनंत हरि कथा अनंता पढ़ें. बड़ी रोचक कथा है. अब चलते चलते इसे काहे छोडे दे रहे हैं: धर्म के नाम पर फिर बवाल मचने के प्रयास जिसे लाये हैं शब्द लेख सारथी. बढ़िया है. :)

अब चलते हैं. आज प्रयास रहा कि कोई न छूटे हमेशा कि तरह. अगर कोई छूटा हो तो रचना जी गल्ती. अगर कोई कवरेज से खुश हुआ, तो धन्यवाद के लिये मैं हाजिर हूँ, मैने ही रचना जी को कहा था कि आपको कवर जरुर कर लें. अब चलें राम राम. वैसे चिट्ठों की संख्या बढ़ती जा रही है. हर रोज दो चर्चा की जरुरत है. आगे आओ न चिट्ठाकारों. बनो न चर्चाकार, आप तो बेहतरीन लिखते हैं, यहाँ भी लिखो न!!!

सूचना: मुक्तक माहोत्सव चालू है, यहां देखिये

टिप्पणी दें ताकि रचना जी अपनी चर्चा जारी रखें. :)

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बुधवार, मई 09, 2007

आ जा मेरी गाड़ी में बैठ जा

एक बार कुछ समय पहले महाशक्ति प्रमेन्द्र प्रताप सिंग ने एक तस्वीर पेश की थी आ जा मेरी गाड़ी में बैठ जा .बड़े लोग गाड़ी में चढ़ने को उत्सुक थे मगर गाड़ी रुकी ही नहीं, वो तो अपनी गति से भागती रही. जो भी दिखा, बस कह दिया आ जा मेरी गाड़ी में बैठ जा. अरे, जब रोकोगे नहीं तो बैठेंगे कैसे और किसी ने भी उसकी रफ्तार से रफ्तार मिलाकर भाग कर उसे पकड़ने की कोशिश नहीं करता, बस एक ही रोना, गाड़ी रुकी नहीं तो चढ़ें कैसे.

वैसी ही गाड़ी चिट्ठा चर्चा भी बन गई. अपनी गति और अपने रंग रुप में भागी चली जा रही है. सबसे कह रही है, आओ, चर्चा करो. मगर लोग हैं कि बस चढ़ना ही नहीं चाहते. रफ्तार से रफ्तार कोई मिलाता ही नहीं. बस कहते है कि बस रुकी ही नहीं, कैसे चढ़ें. लेकिन बस की चाल ठीक नहीं दिखती. लोग अपनी खुद की गाड़ी लेकर उसी दिशा में निकल पड़े मगर चलती गाड़ी में रफ्तार मिला कर बैठे नहीं. पहली गाड़ी में जगह है मगर फिर भी अपनी गाड़ी लेकर निकले. राष्ट्रीय संसाधनों का कितना बड़ा दुरुपयोग. मगर क्या करना यह सब सोच कर. चल पड़ो किसी भी दिशा में. खैर, हम इस विषय में क्या कहें, बस यही कह सकते हैं कि भईया, आप आमंत्रित हैं, आप युवा हैं. आप की नई सोच है. आप में बदलाव लाने की क्षमता है. हमें आपका चिट्ठाचर्चा मंडली में इंतजार है और आपका स्वागत है. ट्रेन में बैठकर मच्छर के काटे को भी भारत सरकार का दोष मानकर कोसना तो अब आदत सी बात हो गई है, मगर चलो, इसमें कोइ बदलाव लायें. थोड़ा फ्लिट हमीं छिड़क दें अगर सरकार नहीं छिड़क रही है तो.

अरे, मैं भी इतने खुशनुमा दिन पर ऐसी बात लेकर बैठ गया.

आज फुरसतिया जी बाली उमर में (बकौल ई-स्वामी) ससुर हो गये. आज उनकी भतीजी स्वाति चि. निष्काम के साथ परिणय बंधन में बंध गई. उन्होने समस्त चिट्ठाकारों को खुला निमंत्रण दिया और अमिताभ की तरह का कोइ बंधन नहीं डाला. अब सब को निमंत्रित किया है तो सब की तरफ से स्वाति और निष्काम को अनेकोम शुभकामनायें.


एक और खुशखबरी: आज से पॉडभारती की शुरुवात हुई है. जैसे मानो कि आप सुनते थे विविध भारती, वैसी ही. शशि सिंह कहते हैं:

पॉडपत्रिका पॉडभारती का पहला अंक जारी कर दिया गया है। कार्यक्रम का संचालन किया है देबाशीष चक्रवर्ती ने और परिकल्पना है देबाशीष और शशि सिंह की।


इसमें आपको फुरसतिया, रवि रतलामी, देवाशीष, शशि सिंह, संजय बेंगाणी, रविश और यहाँ तक कि अविनाश की, सबकी आवाज सुनाई देगी फिर भी आपको खेद रहेगा कि आप हमारी आवाज नहीं सुन पाये. शायद हमारी किस्मत ही खराब है जो शशि भाई ने हमें इस लायक नहीं समझा कि हमारी एक कविता ही डाल देते इस अंक में. मगर मैं नाराज नहीं हूँ इसीलिये तो कवर कर रहा हूँ यहाँ पर. :) मेरी किस्मत कि मैं इतिहास का हिस्सा बन ही नहीं पाता.


सब छोडो, यह देखो कि डॉ. प्रभात टंडन जी, कुछ दोहे लेकर जिन्हें आवाज़ दी है जगजीत सिंग ने, हमारी खिदमत में लेकर हाजिर हुये हैं, यह तो शशि सिंह से बेहतर कहलाये कि हमारी पसंद लाये.

कवि बड़ा या कविता के बारे में घघूति बसुति जी ने बात क्या की और साथ ही अभय तिवारी मंत्र कविता..लेकर आये ...कहते हुये कि सदी की सबसे महान कविता जिसे लिखा है बाबा नागार्जुन नें. हमें तो बहुत पसंद आई, यह अभय की आदत खराब है कि हमेशा हमें पसंद आने वाली ही बात करते हैं. मगर इस पर काकेश को सुनें, कविता तो बेहतरीन है: कवि कविता और इन्ची टेप..सदी की सबसे बरबाद कविता

और ममता जी को सुनें, माँ बुरा न मान गई हों, उस पर दुखी हैं. अरे माँ भी कभी बच्चों की बात पर बुरा मानती है क्या. हद कर दी:. भूल जाओ ये सब. कह भी रही हैं:

ये एक ऐसा शब्द है जिसकी महत्ता ना तो कभी कोई आंक सका है और ना ही कभी कोई आंक सकता है। इस शब्द मे जितना प्यार है उतना प्यार शायद ही किसी और शब्द मे होगा। माँ जो अपने बच्चों को प्यार और दुलार से बड़ा करती है। अपनी परवाह ना करते हुए बच्चों की खुशियों के लिए हमेशा प्रयत्न और प्रार्थना करती है और जिसके लिए अपने बच्चों की ख़ुशी से बढकर दुनिया मे और कोई चीज नही है।


शहाबुद्दीन को सजा मिल गई जो सबकी इच्छा थी, इस पर बिहारी बाबू कहिन कहते है कि शहाबुद्दीन को सजा: कानून नहीं, सत्ता की जीत है. अब उनकी मरजी, जो कह दें.

अमित चल गई...चल गई चिल्लाये. हम समझे कि गोली वगैरह चल गई. भागे देखने तब मालूम चला कि मोबाईल पर हिन्दी चल गई. वाह भई, शीर्षक महात्म.

अच्छा अब मन भर गया हो तो ऐसे ही बहलावे के लिये कविता नुमा रीतेश की बात सुनो. बेचारे, हमेशा मेहनत कर आपके लिये कुछ न कुछ लाते रहते हैं. आज ला्ये हैं श्रीमान श्रीमती...

ऐसा और कहाँ.... अतुल श्रीवास्तव (लखनऊ वासी..अब अमेरीका में..) अब लिखें हैं दिल्ली से वो भी बहुत दिन बाद.


सिरफिरा है वक्त सजीव सराठे की रचना भी जरुर पढ़ियेगा.

उदासी की नर्म दस्तक ,
होती है दिल पे हर शाम ,
और गम की गहरी परछाईयाँ ,
तनहाईयों का हाथ थामे ,
चली आती है -
किसी की भीगी याद ,
आखों मे आती है ,
अश्कों मे बिखर जाती है ।


पुरकैफ-ए-मंजर की रचना भी हम यहॉ पेश कर रहे हैं: एक बाप की मौत

राकेश खंडेलवाल गीत कलश पर : दो कदम जो चले तुम मेरे साथ में...यह तो जरुर ही जरुर पढ़ें, हम भी पढ़ेंगे:


ये जो दीवार पर है कलेंडर टँगा
आज भी बस दिवस वो ही दिखला रहा
तुमने मुझसे कहा था कि"मैं प्रीत के
कुछ नये अर्थ तुमको हूँ सिखला रहा"
वह दिवस वह निमिष अब शिलालेख हैं
मेरी सुधियों के रंगीन इतिहास में
मेरी परछाईयों में घुल हर घड़ी
तुम रहो दूर या मेरे भुजपाश में

अब समझने लगा, अर्थ सारे छुपे
और अभिप्राय, हर अनकही बात में........


आगे वहीं जाकर पढ़िये.

प्रगीत कुँअर जी का संस्मरणात्मक आलेख जोशी जी पेश किया है भावना कुँवर जी ने. मजा आ जायेगा पढ़कर.

अभिनव को सुनो, लो जी पतले हो जाओ. यह वही हैं जो कभी मोटों की शान में कशीदे कसा करते थे मुट्टम मन्त्र सुना कर. कवि हैं कि नेता. बस पलट गये बात से. अब पतलम मंत्र दे रहे हैं. कहीं रामदेव टाईप कुछ बनने के जुगाड में तो नहीं.

नापोली की चित्रमय झलकियाँ देखिये राम चन्द्र मिश्र जी के ब्लॉग पर.

इंडिया टीवी की खिचडी हिन्दी से परेशान पंकज बेंगाणी अपनी गाथा का बखान कर रहे हैं.

हमारे रवि रतलामी जी बबली तेरो मोबाइल की टिप्पणियों की संख्या गिनाते गिनाते इतने छ्त्तीसगढ़ी यूट्यूब पेश किये बस उसी में सारा वक्त निकल गया और अभी भी दो बाकी हैं, फिर भी झूठ ही टिपिया आये कि सब देख लिये, मजा आया. मजा फिर कभी समय मिलते ही ले लेंगे. आज जिनके भी चिट्ठे छूटें वो रवि भाई को पकड़ें, उन्होंने ही फंसा कर रखा था यूट्यूब में, वरना तो हम सोचे थे कि आज एक भी नहीं छोड़ेंगे.

मनीषा किसी सर्वेक्षण की रिपोर्ट पा गई हैं और कहती है कि व्यभिचार में आगे हैं पुरुष. पता नहीं इस पर सर्वेक्षण की आवश्यता किस भद्र पुरुष को हुई. उम्मीद करता हूँ कि कुछ ऐसा ही कदम कोई महिला सर्वेक्षण कर्ता भी उठायेंगी, दूसरे पक्ष की भूमिका दर्शाने को.

मस्ती की बस्ती पर राजेन्द्र त्यागी का व्यंग्य : बुद्धिजीवी बनाम बुद्धूजीवी और हमारे प्रिय व्यंग्यकार आलोक पुराणिक जी का सद्दाम और चार कट्टे यहाँ पढ़ें.

रमा जी की रचना क्या खोया? क्या पाया? का दर्शन देखना न भूलें और साथ ही मोहिन्दर जी रचना भी: तेरा खत हम पर इनायत होगी.

अब चला जाये, आवश्यकतानुरुप कवरेज हो गई है बाकि गाड़ी चल रही है, रफ्तार मिलाओ और लद लो और टिपियाते चलो...सिर्फ पढ़्ना बस काफी नहीं है, बताओ भी तो कि पढ़ लिया है.

पता नहीं अपने गुट का कोई छूट तो नहीं गया?? बताना जरा!!!

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बुधवार, अप्रैल 25, 2007

एक चिट्ठे की चर्चा!!!

आज तो मैने ठान लिया है. आज मैं बस एक चिट्ठे की चर्चा करुँगा. ये जो रोज रोज ५० पोस्टें आ रही हैं, किस किस की बात करुँ. यह चिट्ठाजगत के लिये तो अच्छी बात है और मेरी शुभकामनायें हैं कि ५० की जगह ५०० हो जायें. भाँति भाँति के विषय पर पढ़ने मिलेगा. जितना पसंद आये पढ़ो, नहीं तो बत्ती बुता के सो जाओ. मगर जब चर्चा करने बैठो, तो इतनी तो नहीं की जा सकती है न!! कहीं तो सीमा निर्धारित करनी होगी कि एक बंदा इतनी ही चर्चा करेगा. सो हमने सीमा निर्धारित कर ली है कि एक चिट्ठे पर चर्चा करेंगे बस.

अब झंझट ये फंसी है कि वो एक कौन?

क्या मैं फुरसतिया जी का चयन करुँ, जो रिचर्ड गियर के द्वारा शिल्पा शेट्टी को लिये चुंबन का पोस्ट मार्टम कर रहे हैं.


क्या नज़ाकत है, कि फुरसतिया पीले पड़ गये
उसने तो बोसा लिया था रजामंद जागीर का.


अरे, भाई जी, दोनों की रजामंदी मे हो गया अह्हा, आनन्दम आनन्दम. अब आप लाख पोस्टमार्टम करेंगे अपने बेहतरीन अंदाज में तो हमें तो दो बार मजा आ जायेगा. एक बार जब उसने चूमा और एक बार जब आपने उस चुंबन को अपनी कलम से चूमा.

मगर फुरसतिया जी को तो सब नारद पर देखते ही पढ़ लेते हैं तो उनकी चर्चा क्या करना. किसी और को ही देखता हूँ.

एक बार दिल में आता है कि किसी कविता पर बात कर देता हूँ. आज तो कविता की तादाद भी ठीक ठाक है, उसी में से एक उठाता हूँ.

शैलेश भारतवासी को सुनाऊँ :


ज़िंदगी बस मौत का इंतज़ार है, और कुछ नहीं।
हर शख़्स हुस्न का बीमार है, और कुछ नहीं।।



या फिर मोहिन्दर भाई की रचना तो कोई बात नहीं हिन्द युग्म पर या कि फिर राजेश चेतन जी की दादा बी और उन्हीं की राहुल जी :



अपनी कॉपी खुद ही अब तो जांच रहे हैं राहुल जी
निज पुरखों की गरिमा को ही बांच रहे हैं राहुल जी
अटल बिहारी के शासन में रोड़ बने जो भारत में
अब उन पर क्यूं झूम झूम कर नाच रहे हैं राहुल जी


वैसे तो बात ही करना है तो मोहिन्दर जी अपने खुद के ब्लॉग पर भी कविता लिखें हैं:

छोड दुनिया के काम बखेडे,
आ बैठ, कुछ बात करें

उसी पर कर लें. मगर फिर लगता है कि नेता और नरक का द्वार भी तो बढ़िया कविता है और टू फेसेस जब धर्म वीर भारती जी सुनवा रहे हैं तो उन्हीं को सुनवा दें.

वैसे तो नये नये पधारे अरविंद चतुर्वेदी की कवरेज की बनती है इनकी पहली कविता के साथ: स्वर बदलना चाहिये मगर इसके चक्कर में रमा जी की हास्य रचना 'चमचे का कमाल' भी तो नहीं छोड़ी जा सकती. और जब एक हास्य रचना नहीं छोड़ी जा सकती तो दूसरे ने क्या पाप किया है. प्रॉमिस कि खतरनाक गोली को कैसे छोड़ दें. इनको नहीं छोड़ रहे तो दीपक बाबू कहिन को कैसे छोड़ सकते हो. क्या लिखे हैं: दर्द का व्यापार यहाँ होता है . वैसे, एक बात ज्ञान की बताता हूँ, आपने हर चीज में आत्म निर्भरता देखी होगी , मगर अगर टिप्पणी पाने मे आत्म निर्भरता का रिकार्ड देखना हो तो दीपक बाबू के चिट्ठे पर जरुर जायें. हर पोस्ट पर पहली टिप्पणी खुद की...जिन पर भी सिर्फ़ एक टिप्पणी है. इत्मिनान से मान लें कि इनकी खुद की है. अरे, कुछ तो सीखो बंदे से....फाल्तू ईमेल भेजते हो कि भईया टिपिया दिजियेगा.....अरे, खुद काहे नहीं टिपिया लेते, दीपक की तरह. मुझे उम्मीद है कि यह कृत चिट्ठा समाज में एक नई अलख जलायेगा---जय अलख निरंजन!!!


चलो, हिम्मत करके इनकी भी न बात करे, जब एक ही करनी है और वो भी कविता में तो हाशिये की करते हैं...अपना देश एक खस्सी है और अगर वो भी न जमती हो तो फिर तो कोई और कविता है नहीं, गद्य पर ही जाना होगा.

मगर गद्य में भी कौन..कोई एक..बड़ा मुश्किल है फिर भी कोशिश तो करते हैं: कमल कहते है NTPC खरीद लो. गारंटी शून्य है तो इनको छोड़ देते हैं. रेल्वे स्टेशन पर पलते बच्चे पर ज्ञानदत्त जी का आख्यान भी बेहतरीन है, काहे छोडूं मगर फिर क्या विकास की मजनूँ पुराण न कवर करूँ. बड़ा डूब कर आत्ममंथन करते हुए लिखा गया है. यह मेरे बस में नहीं है.

मेरे बस में तो यह भी नहीं कि राजलेख जी अपना दर्द सुनाने चले तो उन्हें छोड़ दें. मगर क्या करें जब एक ही पोस्ट की बात करना है तो अरुण को कवर कर लें जो कह रहे हैं कि आओ माफी माफी खेलें. अरे, इनको नहीं पहचाना, यही तो पंगेबाज हैं. इनसे पंगा नहीं-वरना!!! अब इनसे नहीं तो उनसे भी नहीं...वो तो हमारे खास हैं भाई मसीजिवी- कहते हैं कि सागर अविनाश से नाराज है तो मसीजिवी क्या करे. हम समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इनसे कुछ करने को किसने कहा?? हा हा!!! मगर ई करेंगे जरुर. बहुत खूब, महाराज!!

लोकमंच तो खैर हमेशा से अपनी बात कहता रहा है अलग अंदाज में सो आज भी कह गया कि ये पत्रकार नहीं...चारण भाट हैं, अब इस पर क्या बात करें. मजबूरी है न!! एक ही पर बात करना है.

तो जब एक ही पर बात करना है तो हमारे प्रिय अभय तिवारी का आख्यान सुनें कि मुम्बई की किताबी दुनिया कैसी है या फिर मनीष भाई की नजरों से देखें कि हिन्दी चिट्ठा का वर्तमान और भविष्य कैसा है.

मैं तो उलझ कर रह गया हूँ. अब महावीर जी की बात न करुँ तो यह कैसे हो सकता है जबकि वो बता रहे हैं कि अनिद्रा से विष्णु जी परेशान हैं , क्या हास्य व्यंग्य में बात कही है. वैसे हो तो यह भी नहीं सकता कि दीपक जी जिक्र न किया जाये जो बता रहे हैं कि गर्मी में पंगा, गले से पंगा... अगर आपको समझने में तकलीफ हो तो उन्होंने शीर्षक में ही बता दिया है कि यह व्यंग्य है वरना कहीं आप इसे आप इसे कहानी न मान लें.

अब ऐसा है, जब ठान ही ली है कि एक की बात करेंगे तो क्या सोचना. चाहे रवि रतलामी का बेहतरीन अति लम्ब आलेख ऑटो के पीछे क्या है , जो कि गजब का है, वो छूटे या हर्षवर्धन का कि चीनी विकास का SEZ मॉडल भारत में काम का नहीं , क्या करें. छोड़ तो हम सुनील दीपक जी जैसे उच्च स्तरीय लेखक का आलेख भी दे रहे हैं मानव शरीरों की आमूर्त कला , मगर आप जरुर देखना और इसे भी, जो राजेश भाई ने लिखा है कि क्या चंद्रयान वाकई चाँद पर जायेगा.....इसी बहाने आप पंकज बैगाणी का आलेख भी वही की लिंक से पढ़ लेंगे, यह हुई न एक पंथ दो काज वाली बात. मगर यह सब तो हम छोडे दे रह हैं और हम तो प्रत्यक्षा जी के गन्ने के खेत और गुड निर्माण तक की बात नहीं कर रहे. हम तो नोट पैड की लैंस डाउन
की यात्रा वृतांत
तक नहीं कवर कर रहे..क्या चित्र पर्दशनी लगाई है, मगर हमारी मजबूरी है.

हम तो आज पद्य गद्य का मिलावड़ा- बेजी की प्रस्तुति गांधी के तीन बंदर बस कवर करेंगे और कुछ नहीं. चाहे वो यह ही क्यूँ न हो कि गाँधी बिकाऊ है या जीतू के आलसी लोगों के लिये उपाय ..हमें तो रेडियो सिलोन तक नहीं सुनना .

चलो अब चला जाये, यह एक की तरफदारी करना लफडे का काम है, अपने बस का नहीं..आगे से ऐसा नहीं करेंगे. और ऐसा करने में जो छूट गये हो, वो निश्चिंत रहें, रचना जी, जिन्हें आज चर्चा करनी थी, घूमने निकल गईं, शायद कल आ कर आप लोगों को कवर कर दें. यह मेरी आप लोगों के प्रति हितैशी भावना बोल रही है.जबकि ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है..बाकि सब चंगा..आप लोग टिप्पणियां करें वरना बुरा लगता है.

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बुधवार, अप्रैल 04, 2007

ये भी हो ही गया!!!!

कल चर्चा राकेश खंडेलवाल जी करनी थी, नहीं कर पाये. इस न करने पाने से इतना व्यथित हुये कि न कर पाने की ही कथा ही सुनाने लगे कविता, कम्प्यूटर और चर्चा.
फिर उनकी चर्चा उनके अंदाज में करने की १ बटा ८ कोशिश हमने की. कर दी. आज की चर्चा हमें करनी थी मगर रोज रोज क्या करें तो रचना जी को पकड़े कि आज की चर्चा जितनी आप कर पायें कर दिजिये बाकि की हमारे निवेदन किये बगैर संजय कल मध्यान चर्चा में करेंगे जो फुल चर्चा टाईप दिखेगी. बहुत दिन गैर हाजिर रहने का कुछ तो जुरमाना लगता ही है. तो आज की चर्चा अपने अलग अंदाज में लेकर आई हैं रचना जी. हालांकि हमने उनसे वादा किया था कि उनसे बचे चिट्ठे हम कवर कर लेंगे मगर उनकी बेहतरीन चर्चा को आगे बढ़ा पाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं तो आप बस उनको सुनें, आगे देखते हैं.


रचना जी की कलम से:

मित्रों नमस्कार!

कई महिनों की ना-नुकुर के बाद, थोडा आत्म विश्वास लेकर नीलिमा के प्रतिनिधित्व के समर्थन के लिये आपके समक्ष हाजिर हूँ...मेरा ये प्रयास मेरे उन अनजान चिट्ठा-मित्रों को धन्यवाद स्वरूप समर्पित है जिनकी सहायता से मेरे जैसी नितान्त घरेलू जीव एक साल मे यहाँ थोडा सा स्थान बना पाई हूँ ....तो पहले ये दृश्य देखें---

चर्चा की ट्रेन से समीर जी आवाज लगा रहे थे आओ तुम भी कर लो चर्चा!

मैने कहा- यहाँ पहले ही तमाम भीड़ है जगह कहाँ है इस चर्चा के डिब्बे मे? कोई 'महाब्लागर' है तो कोई 'ब्लाग के पितामह', कोई 'तकनीकी विशेषज्ञ' और व्यंजलकार तो कोई 'जुगाडी' कोई गीत सम्राट तो कोई तरकशी तीरंदाज, तो कोई कविराज और आप तो पुरुस्कारों से लदे खड़े ही हैं!

वे बोले- अरे!! कितनी जगह चाहिये तुम्हे? देखो "हम सब भारतीय हैं!" जब तक भीड न हो हमे किसी काम मे मजा ही नही आता है! 'एमएटी' पर तीन लोग और स्कूटर और मोटर साइकिल पर कम से कम चार लोग बैठते हैं और मारुति कार मे छह लोग...

और मै अभी सारे ब्लाग लेखको की लेखन शैली जान भी नही पाई हूँ...उनके लेखन को एक पोस्ट पढकर कैसे जान सकती हूँ?

समीर जी: क्या कहा? एक पोस्ट पढकर समझ नही पाओगी तो क्या दस पोस्ट पढ लोगी तो समझने लगोगी? अपने आप को बहुत समझदार समझती हो? अरे यहाँ लोग तीन तीन साल से एक दूसरे को जानते हैं, फिर भी आपस मे उलझ जाते हैं कभी कभी...

लेकिन आपने मुझे ही क्यूँ चुन लिया?

समीर जी: तुम्हे हमने बिल्कुल "रेन्डमली सेलेक्ट" किया है, भारत मे ऐसे चुनाव भी होते हैं, बिना किसी 'क्राइटेरिया' के!!

लेकिन फिर भी...

समीर जी:देखो अन्तर्जाल अमर होने की जगह है. मौके के का फायदा उठाओ वरना 'शब्दों के भूचाल' और 'विचारों के बवंडर' मे कहाँ गुम हो जाओगी पता भी नही चलेगा!जाओ नारद वाले रास्ते से जाना और जो दिखे उसका वर्णन ऐसा करना कि चर्चा पढने वाला उस पोस्ट को पढे, जिसकी चर्चा तुमने की है..और हाँ जो दिखे उतना ही बताना..समीक्षा जैसा नही लगना चाहिये. आज तुम्हे हम अपने 'चर्चाकार पास' पर लिये चलते हैं...हर हफ्ते आना हो तो बताना, देबाशीष से कहकर नया पास बनवा देंगे..ठीक है..

कोशिश करती हूँ---

आईये रजनी जी के साथ बसन्त की ताजगी से शुरुआत करें और फिर नयी तकनीक से सन्देश ले लें शैलेश जी से.

ग्लोबल वार्मिंग पर विश्व में चर्चा चल रही है...वन प्रबन्धन मे जन भागिदारी के बारे मे जाने...

एक्‍टर से एक्टिविस्‍ट हुए इरफान से मुलाकात:


तीसरी बीड़ी सुलगाकर ज़ेमाल मियां मुझे कंप्‍यूटरों के बीच और आगे ले गए. अनुभवी गाईड वाला लेक्‍चर बदस्‍तूर जारी रहा- नये ब्‍लॉग्‍स से अलग काम के बाकी बिलाग भी हमने क्‍लेम कर लिया है जिनका सोसायटी और ज़माने में कोई रोल था. तुम्‍हारे अज़दक में भी कोई उपयोगिता, थोड़ी सामाजिकता होती तो बच्‍चे उसको लौटाल लाते.. मगर तुम अकेले नहीं थे.. तुम्‍हारी तरह ढेरों लोग बिलाग को खिलौना बनाकर खेलते रहे.. खास तौर पर कनपुरिया, उड़नतश्‍तरिया, अनामदसिया.. बुरा मानने की बात नहीं, बच्‍चा.. There is nothing personal about it. Everyone here is working in a wider interest. For History. For betterment of the world, of our planet!



प्रमोद सिंह के उक्त कथन के बाद भी मोहिन्दर जी को नाउम्मीदी सता रही है..

प्रियदर्शन जी एक पते की बात बता रहे हैं कि भ्रष्टाचार कैसा दिखता हैऔर वर्षा की नजर से देखे जिन्दगी और पावर मे है कितना दम है ये जानिये-


कुछ लोग यह कहते हैं कि लंबे निवेश के लिए बढि़या स्‍टॉक कौन सा है। मेरी राय में सबसे सुरक्षित और बेहतर स्‍टॉक एनटीपीसी है, जिसमें शेयर निवेश की जानकारी न रखने वाला भी निवेश कर सकता है। हां, यह जरुर है कि यह शेयर रोज रोज की घटबढ़ से खासा प्रभावित नहीं होता लेकिन टूटता भी नहीं है।


अहा! ये तो कमाल हो गया इस सूची मे मै भी! जिसके टॉप पर है उड़न तश्तरी. जीतू 'भाई' नारद की कथा सुना रहे हैं कृपया "रिसर्चर" और "रिपोर्टर" ध्यान से सुने!!


हिन्दी लिखने के लिए भी काफी तकलीफ़ें थी, कोई कुछ प्रयोग करता था कोई कुछ। मैने तख्ती चुना, हालांकि कुछ दिक्कतें थी, लेकिन फिर भी काम चल जाता था। अच्छा प्रोग्राम था, बस कोई भी एक यूनिकोड फोन्ट चाहिए होता था इसको, विन्डोज के हर तरह के वर्जन पर चलता था। इस बीच रमण कौल ने आनलाइन टूल यूनिनागिरी विकसित किया, जिसमे पहले हिन्दी,कश्मीरी फिर गुरमुखी(पंजाबी) और अन्य भाषाएं विकसित की गयी। रमण के पेज पर सारे एडीटर्स का लिंक है, जरुर देखिएगा। इधर ईस्वामी ने हग टूल विकसित किया (इसने नाम भी किसी विशेष जगह पर बैठकर सोचा होगा) फिर उस टूल को वर्डप्रेस मे डाला गया। ईस्वामी भी काफी जुगाड़ी बन्दा है, लेकिन सबसे भिड़ता बहुत जल्दी है, बस किसी ने लाल कपड़ा दिखाया नही कि टक्कर मारने को उतावला हो जाता है। वैसे भी इसका सांड प्रेम किसी से छिपा नही है। इसने भी काफी रातें काली की और हिन्दी के लिए टूल बनाया, ब्लॉग नाद के प्रोजेक्ट के लिए काफी काम किया इसने। बाद मे ईस्वामी के इस टूल मे आशीष ने इसमे वर्तनी जाँच (Spell checker) लगाया था। मैने शुरुवात तख्ती से जरुर की थी, लेकिन बाराहा के आने के बाद तो पूरा नज़ारा ही बदल गया.



यहाँ पढिये छठी पुतली रविभामा की कथा.

अभय जी 'स्त्री' पर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के विचार के हिन्दी अनुवाद की पहली किस्त लेकर हाजिर हैं और हम उनकी अगली किस्तों के लिये उनके निवेदन को मानते हुए धर्य से इन्तजार करेंगे!


क्योंकि स्त्री की भूमिका मिट्टी की ग्रहणशील, समावेशी भूमिका है जो न केवल पेड़ को बढने में मदद देती है बल्कि उसकी वृद्धि की सीमायें भी तय करती है। जीवन के जीवट के लिये पेड़ अपनी शाखाएं ऊपर की दिशा में सभी ओर फैलाता है मगर उसके सारे गहरे बन्धन ज़मीन के नीचे मिट्टी में जकड़े हुये छिपे हुए हैं और उसे जीने में सहायक होते हैं। हमारी सभ्यता के भी अपने समावेशी तत्व चौड़े, गहरे और स्थिर होने चाहिये। केवल वृद्धि नहीं, वृद्धि का एक समन्वय होना चाहिये। सिर्फ़ सुर नहीं ताल भी होना चाहिये। ताल कोई बाधा नहीं है, ये वैसे ही जैसे नदी के किनारे होते हैं, वो धारा को सततशील बनाते हैं वरना वह दलदल के अनियतता में खो जायेगी। ये लय है ताल है, जो संसार की गति को रोकती नहीं बल्कि उसे एक सत्य और सौन्दर्य प्रदान करती है।


चोला बदलते खबरिया चैनल से चिन्तित हैं सन्जीत जी.

अभय जी के इतने अच्छे लेख के बाद फिर दिखी उनकी अनाम टिप्पणी के लिये व्यथा
और अब आप नेता राम लुभाया को जाने.

कमल जी जानकारी दे रहें हैं एक नये डॉन की-


खुन सा एक अरबपति है। विश्‍व के प्रमुख माफियाओं, तस्‍करों के साथ वह अपने 'गोल्‍डन ट्रायंगल' नामक जंगल से संपर्क में रहता है। अलग-अलग अंतरराष्‍ट्रीय भाषाओं के जानकार खुन सा की फोन डायरी में पांच नंबर हैं और ये पांचों विश्‍व के ड्रग साम्राज्‍य के मुख्‍य संचालक हैं। खुन सा छिपने के लिए जंगलों में नहीं रहता, अपितु गहरे जंगलों में उसकी विशाल जमीन पर दुनिया भर के लिए पर्याप्‍त हेरोइन का उत्‍पादन होता है, प्रक्रिया होती है। इसके अलावा अन्‍य नशीली दवांए तैयार की जाती है। खुन सा यदा-कदा ही दिखाई देता है लेकिन उसके तहत 20 हजार आधुनिक शस्‍त्रधारी मारफाड कमांडो की टुकड़ी है। यह टुकड़ी उत्‍पादन प्रक्रिया या नशीले पदार्थों की जंगल में खेती भी करती है। कई साल पहले जॉन गूनस्‍टोन नामक पत्रकार कड़ी मेहनत और कितनी ही सिफारिशों के बाद खुन सा के साम्राज्‍य में जा पाया।



-----------यहाँ पर रचना जी की चर्चा खत्म होती है-------------

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अब उड़न तश्तरी की कलम...

विश्वास मानिये, मैं हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था कि रचना जी की बेहतरीन चर्चा को आगे बढ़ाऊँ मगर छूटे हुये चिट्ठों की संख्या देख मन नहीं माना.

उफ्फ!! कैसे छोड दूँ पीयूष का पियक्क्ड़ों से पंगा या फिर राजेश चेतन जी का साप्ताहिक कालम, वो भी इस चुनाव के महौल में.

कैसे छोड़ दूँ हमारे ई-स्वामी का झन्नाटेदार प्रश्न करता लेख: देसी क्रिकेट प्रशंसक या स्यापाग्रस्त रुदालियाँ:


मेरा क्रिकेट का स्यापा करने वालों से सवाल है की हमारी संस्कृति में खेल-कूद और व्यायाम पर कितना ज़ोर है? जिस देश में कोई खेल खेलना ही समय की बर्बादी माना जाता हो, बच्चे बस्तों के बोझ तले दबे रहते हों उस देश में किसी खेल को व्यवसाय बनाना क्या कम जोखिम का काम है? गरीब देश की भ्रष्ट सरकारें प्रतिव्यक्ति २ पैसे से भी कम खर्च करती हो खेल-कूद पर, ३० प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा के नीचे हो, वहां कितने चैंपियन बनेंगे और कैसे? हम किस गणित से उम्मीद करते है की हमारे खिलाडी विश्वस्तरीय होंगे?


न भई, हम नहीं छोड़ पायेंगे वो भी तब जब हमारे शुऐब भाई रात के खेल और दोस्त के बिछोह से दुखी हों और पूनम मिश्रा जी भोर भ्रमण की सरगम छेड़ रही हों और दोपहर की कैफी आज़मी साहब की नज़्म हो.

छोड़ तो देता मगर बेजी का आग्रह कैसे छोड़ दूँ. रवि भाई विश्व प्रसिद्ध चुटकुले सुनाते हों और प्रतीक फिटनेस का उपाय बतायें, तो कैसे चला जाऊँ.

जानते हैं लोग कि बीच में भाग सकता हूँ तो पंकज भी लुभाने का अलग ही तरीका ले आये पांडा के लिये पोर्न फिल्म और संजय भाई अपने सर सारा चर्चा का बोझ पड़ता देख कहने लगे कि दूसरे के सर फोड़ो ठीकरा, यह आसान है.

क्या कोई महाशक्ति के संवेदनशील हृदय की छोड़ सकता है या उनके विभाग में हुये पुरुस्कार वितरण के दौरान हुई मजेदार घटना की चित्रमय जानकारी.

वैसे भी हम काहे जायें जब ज्ञानदत्त पांडे जी राम राम कह कर भी नहीं गये और सोमेश शरद जोशी की उपदेश-कथाएँ सुना रहे हों.

आशीष कहते रहें कि जी हाँ मुझे कोई हक नहीं है सपने देखने का और अरुणिमा जी इतनी उम्दा गज़ल सुनायें कि उस महफिल में जाना क्या ..... ठीक है नहीं जायेंगे!!

अब किसी को शिकायत हो तो हुआ करे. हम तो नहीं जायेंगे उस महफिल. बस यहीं से लौट जायेंगे. अब बाकि संजय भाई जानें और उनके कॉफी के कप.

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मंगलवार, अप्रैल 03, 2007

जूते की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा

आज गीत सम्राट राकेश भाई की पारी थी, मगर उनके कंप्यूटर की हार्ड डिस्क बोल गई और वो हमें कविता में चर्चा लगे सुनाने फोन पर कि आप लिखते जाईये. हम कहे, सुन लिये हैं..और जैसा समझ में और याद आयेगा, कर देंगे, आप निश्चिंत रहें. हम दोस्ती बहुत अच्छी निभाते हैं. फुरसतिया जी हमसे कुछ नहीं कहे कि आप चर्चा करें जबकि उन्हें भी मालूम था कि राकेश भाई के साथ समस्या है. शायद हमारी जूता पुराण से डर गये..तो लें राकेश भाई की चर्चा के बदले कविता में ही चर्चा:


अप्रेल फूल का खेल, अब खत्म हो ही है चला
केतु बन के शक कहीं, आज तक भी है पला
इस देश में रहना है तो बेटा पैदा करना होगा
हर मुसलमां आतंकवादी, यह कौन सी है बला.

प्रत्यक्षा की रसोई और कालिखजीवी की कुरुपता
सोमवार आज काला होगा, ये पहले से उन्हें पता
राजनीतिक संन्यासी पर व्यंग्य में वो कहते रहे
सिक्कों में संप्रदायिकता, किसकी मानें यह खता.

यमराज का इस्तीफा या नारद का हो इतिहास
विद्रोही जी की एक कविता, बनी हुई है खास
मुंबई ब्लॉग ने जारी की है ब्लॉगबस्टर की रेंक
माँ के आँचल का पसरा, वही अजब अहसास.

चरसी युवा न जाने क्यूँ, अपना धीरज खोते जाते
अमित देख खजुराहो-ओरछा, फोटो सबको दिखलाते
तुझे तोड़ देगा यही मौन तेरा, पीर भी गाती नहीं,
कौन सा मौसम लगा है? दर्द सगे से होते जाते

कोई झामपटाखा खबर नहीं है, होमोनिम्स का पता नहीं है
अजदक की सोच अलग, औ' मुलायम मेरा ताकिया नहीं है
हिन्दी में नहीं रहा और फिर गंगा के बचने की बात कैसी
क्या आपको मालूम चला कि कत्ल करना गुनाह नहीं है.

बदली दुनिया दस मिनट में, गुगल एप्स एक अच्छा सौदा,
आप कितने किलो की हैं, यही तो है आज का बना मसौदा
जानो राजनीति में मूल्य और जनसंचार माध्यमों की दंतकथा
मुलायम मेरी पाठशाला, या कि अजदक के ठीकठाक का हौदा.

आज की चर्चा पर, अब लगा लेते है एक छोटा सा विराम,
डेनियल और मैक कंप्यूटर के संग, तब तक करें आराम.

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बुधवार, मार्च 28, 2007

कहाँ रहें राम?

सभी पाठकों को रामनवमीं की शुभकामनायें. इस अवसर पर संबंधित लेखन लेकर आये हमारे संजय भाई, कहते हैं हैप्पी बर्थ डे, रामजी, अभय तिवारी जी कहते हैं कहाँ रहें राम? और इसी अवसर पर यह भी खुब रही पर प्रयास अनुठे रामभक्त हनुमान के विषय में.

खैर, यह उत्सव तो पूरा हुआ, मगर दूसरा उत्सव, गीतकार का मुक्तक महोत्सव के रुकने से उड़न तश्तरी दुखी हो गई और पूछ रही है कि क्या भाई!! अकेला देख हड़काते हो? समर्थन में साथी टिप्पणियों के माध्यम से गीतकार जी को उत्सव नये फारमेट में फिर से शुरु करने की गुहार कर रहे हैं. इस पर गीतकार जी ने कहा- मुक्तक नहीं, एक प्रश्न और फिर गीत कलश पर हम किसको परिचित कह पाते :


हम अधरों पर छंद गीत के गज़लों के अशआर लिये हैं
स्वर न तुम्हारा मिला, इन्हें हम गाते भी तो कैसे गाते

अक्षर की कलियां चुन चुन कर पिरो रखी शब्दों की माला
भावों की कोमल अँगड़ाई से उसको सुरभित कर डाला
वनफूलों की मोहक छवियों वाली मलयज के टाँके से
पिघल रही पुरबा की मस्ती को पाँखुर पाँखुर में ढाला....................


खैर, मुझे लगता है (वैसे तो मालूम है) कि कल से गीतकार जी रुका महोत्सव नये फार्मेट में फिर से शुरू होगा मगर उनका नैतिकता के आधार पर लिया गया निर्णय चिठ्ठा जगत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज किया जायेगा, यह मेरा विश्वास है.

माना सब इसी तरह के बनाये गये मानकों से सीखेंगे मगर यह भी तय है, बकौल अभिनव, कि ज़िन्दगी भी बहुत से दाँव सिखा देती है :


हर सबक कैद नहीं होता है किताबों में,
ज़िन्दगी भी बहुत से दाँव सिखा देती है।


वैसे भी अभिनव इतनी सुंदर कविता रचता है कि अगर वो लिखे और हम जिक्र न करें, यह संभव नहीं. लिखते तो और भी लोग बहुत प्यारा है और हम उन्हें पुनः न प्रस्तुत कर सुन सुना चुके हैं मगर भईया, मान जाओ, बिना कट पेस्ट के हम कोशिश कर भी उनके अंश नहीं पेश कर पाते, जैसे कि आज हिन्द युग्म पर :

आमचो बस्तर, किमचो सुन्दर था...राजीव रंजन

देश निकाला- मोहिन्दर कुमार

यह कवि महोदय, चर्चा के लिये अपनी साईट पर इन्हें कट एण्ड पेस्ट के लिये खुला छोड़ दें तो हम वहाँ से ले लेंगे. अच्छा बुरा जो लगे लगा करे, मगर यार, हम फिर से टाईप न कर पायेंगे...और जो हमसे इस उम्मीद को लगाये बैठे हैं वो खुद चर्चा लिखने के आग्रह से शरमाये बैठे हैं और आगे आते ही नहीं और गुनाहों पे लज्जत कि सलाह हजारों हैं.

आज बहुत अंतराल के बाद अनामदास को इत्मिनान से पढ़ा...बिना इसके मजा भी तो नहीं. वाकई आनन्द आ गया. नियती और कर्मठता को आंकता उनका आलेख काबिले तारिफ है, इसी को तौलते.. वो बताते है कि कैसे निबू खरीदकर वो पत्रकार बन गये, वाह भाई, ऐसी साफगोई तो शायद ही आगे भी देखने को मिले, पहले भी नहीं देखी.. बहुत खूब. उनको सुन, बेजी भी अपनी एक पुरानी रचना सुना रहीं हैं, जो कि एक पोस्ट होने की काबिलियत रखती है. बेजी से उम्मीद है कि वो इसे एक अलग पोस्ट के माध्यम से भी प्रेषित करें:


गुब्बारे में भरी हवा का भार क्या है ?
माँ की साँसो की गुनगुन का सुरताल क्या है ?
वो आँसू जो आँखों मे सूखा उसका माप क्या है ?
मिट्टी की सौंधी खुशबू का नाम क्या है ?
बुलबुले के जीवन का अर्थ क्या है ?
उसमें तैरते इन्द्रधनुष की जरूरत क्या है


चलो, अब बेजी की जो इच्छा हो मगर आजकल लावण्या जी बड़ी सक्रियता से लिख रही हैं: आज उन्होंने मानवता के बारे में लिखा और हमारे निठल्ला चिंतक ले कर बैठे है अपने द्वारा निर्मित शो..प्रेटी वूमेन ...सृजनता और कल्पनाशीलता बहुत खूब है.

मगर उससे क्या होता है, यूँ तो सीमा जी भी निफ्ट की तस्वीरें दिन भर बदल बदल कर दिखाती रहीं और हमारे मनीष भाई, फैज की कल्पनाजगत की सैर कराते रहे मनीष भाई को बहुत बधाई, उनकी प्रस्तुति क्षमता अपने आप में अनोखी है और हम उसके कायल.

उपमा जैसे व्यंजन को मां के प्यार और मम्त्व से बांध देने का सफल प्रयास किया भाई रितेश ने और हमारी घघुती बसुती जी एक अलग अंदाज में अपनी दुख भरी दास्तां सुना रहीं हैं.

इन सब से बेखबर, हमारे प्रतीक भाई लाये हैं, लॉफ्टर चैलेंज वाली पारिजाद की तस्वीरें :)

अभी कोई जरुरी समाचार आ गया और मुझे जाना होगा....आना होगा में वादा करके संजय नहीं आये तो जाने में हम काहे शरमाये मगर जाते जाते एक जरुरी बात बता जायें:

तरकश हाटलाईन पर इस बार पेश हैं कटघरे में रवि रतलामी और साथ ही सुनिये उनकी पत्नी रेखा रतलामी से अंतरंग बातचीत.

मै संजय भाई से आग्रह करुंगा कि वो बचा और छुटा हुआ हिस्सा सुबह कवर कर लें..ताकि अगला चर्चाकर निश्चिंत हो उसका हिस्सा कवर करे.

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