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शुक्रवार, फ़रवरी 20, 2009

एक चोखेरचैट चर्चा: समरथ हमदरदी बांचें, बेचारे चरित्‍तरनाशी

शुक्रवार सुबह की शुरूआत ही ऐसे होती है कि नीलिमा से कहते हैं कि छोड़ो आज चाय मैं बनाता हूँ तुम  निश्चिंत होकर चर्चा करो पर न जी वे किसी झांसे में नहीं आतीं फिर फोन करके दूसरी चोखेरबाली सुजाता पर अपने बड़े होने का रौब गांठते हैं पर जो आराम से चर्चाशोषण सह जाए वो काहे की चोखेरबाली, प्रमाण स्‍वरूप पेश है आज सुबह की चैटचर्चा, दूसरी ओर सुजाता हैं तथा चर्चा चैटमई है अत: अनौपचारिक है इसलिए कई नामों के आगे संघी किस्म का 'जी' नही लगा है अत: सर्वश्री की तर्ज पर सर्वजी पहले ही स्‍वीकार करें।

chokher bali is online.
मसिजीवी: अरे वाह तुम कितनी अच्‍छी हो सुबह सुबह चिट्ठा चर्चा करने बैठ गईं
चोखेरबाली: नहीईईईईईईईईईईईईई
                   मै जा रही हूँ
                    ..बाय
                  मै आपको जानती तक नही
                   कौन मसिजीवी?
मसिजीवी: मसिजीवी इज ब्‍लॉक्‍ड
चोखेरबाली: आपके तो बड़े चर्चे हो रहे हैं बाबाओं के बीच
 मसिजीवी जी,अभी अभी आपके प्रोफाईल के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.जिसमे आपने अपने बारे में लिख रखा है कि ठेठ हिंदीवाला पढ़ने पढ़ाने लिखने और सोचने के अलावा कुछ सोचता तक नहीं बन्धुवर नवचिन्तक महोदय्! लगता है कि सोचने का काम आपके लिए नया-नया है, इसलिए आप बहुत जोर लगा कर सोच रहे है और लगातार सोचते ही चले जा रहे है. आप खुद भी नहीं जानते है कि इतना सोच कर आप करेंगे क्या और अपने इन ओजस्वी विचारों को रखेंगे कहां?.
 पंडित जी आपको यह पता नही है क्या कि मसीजीवी चोखेरबाली ब्लाग चलाने वाली सुजाता जी के पति है। सुजाता जी से पूरा ब्लाग जगत थर्र-थर्र काँपता है। अब आप ही सोचे मसिजीवी की क्या हालत होती होगी। इसलिये खुन्नस निकालने वे ब्लाग ब्लाग मे बक-बक करते है।
चोखेरबाली: हाँ
मसिजीवी: जिससे सब थर्राते है
चोखेरबाली: हा हा
मसिजीवी: मैं बेचारा
चोखेरबाली: मै बहुत देर तक हँसती रही
आपने अपनी क्या इमेज बना ली है
कुंठित मन है कितने सारे आजू बाजू
वैसे वह कमेंट बाबाजी का भी मज़ाक ही उड़ा रहा था
मसिजीवी: कुंठित मन अच्‍छा ब्‍लॉग नाम है
चोखेरबाली: बिल्कुल कठपिंगल जैसा
खैर तो  आप आज चर्चा मे क्या लिखोगे ?
मसिजीवी: जो चाहो लिख दो् फुल फ्रीडम है तुम्‍हें...चिंता नहीं
चोखेरबाली: ब बाय :) 
 
मसिजीवी: हॉं साइन आउट करके लिखो नहीं तो लोग डिस्‍टर्ब करते रहते हैं
चोखेरबाली: क्या है ???
मसिजीवी: गुड, सो नाइस आफ यू
ओह एम आई डिस्‍टर्बिंग यू
व्‍हाइल यू आर राइटिंग चर्चा
चोखेरबाली: बाय कह दिया न
मै आपको नहीं जानती
मसिजीवी:गुड हम इस तरह तो चर्चा कर रहे हैं
चोखेरबाली: ये तो बेईमानी है , मै अनूप से बोलूंगी ,हाँ
मसिजीवी:नहीं सही कह रहा हूँ
चोखेरबाली: ह्म्म
मसिजीवी: शुरू तो हो गई चर्चा

आदरणीय कालिया जी
जनवरी संपादकीय में आपने एक ही पत्थर से तीन निशाने साध लिये हैं। मीडियाकर, जीनियस और दाढ़ी वाले। आपने तीनों वर्गों में आपसी रिश्ते को भी उजागर करने की कोशिश की है और ये भी फतवा दे डाला है कि दाढ़ी चाहे जीनियस दिखने की चाह में मीडियाकर रखे या खास दिखने की चाह‍ में जीनियस, मूलत: आलसी होता है।

चोखेरबाली: यह तो कल की बात है
 
मसिजीवी: चर्चा भी तो कल की ही है
तुम चाहो तो ,खोज सकती हो कि कि प्रकृति का षडयंत्र है :))   कि स्‍त्री जीनियस नहीं हो सकती
दाड़ी = जीनियस
स्‍त्री = नो दाढ़ी
स्‍त्री कान्‍ट बी जीनियस
 
चोखेरबाली: हाँ बिलकुल
 
मसिजीवी: हेंस प्रूव्‍ड
अब समझ आया क्‍यों रवींद्र जीनियस हैं पर ममता मीडियोकर
 
चोखेरबाली: जैसे सिरे से सब कह रहे हैं कमेंट्स मे, मोहल्ला पर कि "लड़की तो बहाना है ", न वह जीनियस हो सकती , न ही षडयंत्र करने वाली , न दिमागदार
केवल बदचलन या बेवकूफ या मिडिय़ॉकर
लड़की मानो कोई चीज़ है या कोई है ही नही
 
मसिजीवी: जबकि सभी जीनियस अखबार वाले और चैनल वाले एमएमएस दिखाकर अपने जीनियस होने का प्रमाण दे ही रहे हैं
सवाल उठता है कि क्या ये खबर दिखाना उस लड़की के हित में है ....क्या इस खबर को दिखाना - छापना जरूरी है .....। खबर दिखा भी रहे हैं तो क्या चेहरा छिपाकर भी उस लड़की की तस्वीर दिखाना जरूरी है ....।
है न.. वो मसाला है, पटाखा है और एमएमएस है
वो कंटेंट है, एंकर है जिसे कापीराइटिंग की तमीज नहीं
चोखेरबाली: इस्तेमाल अविनाश करे या मैनेजमेंट , लड़की की बिसात ही कुछ नही यह साबित हो रहा है
मानो कोई प्रोडक्ट हो
मसिजीवी: हॉ तभी तो अविनाश के लिए सहानुभूति बटोरी जा रही है, बटोरी जा पा रही है
चोखेरबाली: अनाम भाई जाने कहाँ कहाँ से आकर
टिप्पणी देने में भी आप पलटी मार मारकर टिप्पणी देते हैं। ये नहीं समझ में आता है कि आप पक्ष में हैं या विपक्ष में। सबसे बड़ी बात तो ये है कि आप जो भी हैं, आपमें पोस्टों को पढ़ने की अद्भुत क्षमता है।
मसिजीवी: विनीत सहानुभूति की दुकान सजा रहे हैं
हद बात करते हैं जी। अविनाश हो चाहे कोई और। किसी के विरोध में बात करना जितना लोकतांत्रिक है उसके प्रति सहानुभूति रखना और जुटाना भी उतना ही है। इसे ऐब के तौर पर क्यों लिया जा रहा है। जिसको मन में आए सहानुभूति जताए औऱ जिसको मन में आए विरोध करे, जब किसी के दर्द से अपनी दुकान सजाने का मन बना ही लिया गया है तो इसमें इतना आगे-पीछे सोचने की जरुरत क्या है। ये अलग बात है कि ये देश हमेशा एकतरफा बातें सुनने का अभ्यस्त रहा है।
चोखेरबाली: ह्म्म
देखा
ह्म्म और सहानुभूति भी समर्थ से ही जताई जाती है
बेचारों से नही
इसका भी हमारा देश अभ्यस्त है
मसिजीवी: बेचारे, उन्‍हें सहानुभूति की क्‍या जरूरत,
बेचारे तो चरित्रहीन होते हैं
चोखेरबाली: जिसके पास शोहरत ,नाम , सम्पादकत्व, दोस्त, लॉबी, पैसा, ब्लॉग है
वह अभिव्यक्त नही कर पा रहा
उसके पास तो मौका ही नही है
इसलिए उसे सहानुभूति की सख्त ज़रूरत है
जैसे गरीब चोर होते है
वैसे बेचारे चरित्रहीन होते है
मसिजीवी: रांची में ब्‍लॉगर सम्‍मेलन हो रहा है, जिसमें ब्‍लॉगिंग का कारण बताएंगे सब
ऐसे ब्लॉगर जो ब्लॉगिंग में नियमित हैं, कम से कम वे सभी अधिकतम ५ मिनट में ब्लॉगिंग से जुड़ने का कारण और अब तक का अनुभव उपस्थित दर्शकों/श्रोताओं से बाँटें।
चोखेरबाली: माने ?
मसिजीवी: सवाल ये है कि असल कारण बताएंगे कि नहीं..मतलब जूतमपैजार।
चोखेरबाली: हा हा
मसिजीवी: पर फिर भी ये सवाल तो बनता ही है कि तुम्‍हारी पालिटिक्‍स क्‍या है कामरेड
चोखेरबाली: ह्म्म दूसरों के लिखे मे टांग अड़ाने का मौका नही छोडते लोग
मसिजीवी: शुएब ने पाकिस्तान के दृश्‍य दिखाए हैं
 
 
टांग अड़ाने की बात तो सही है
हॉं वो तो कल मिश्रजी ने कहा ही कि कहॉं कहॉं टांग अड़ाते हैं लोग मत पूछो
लेकिन देखा जाय तो इलाहाबाद के चतुर्वेदी जी को बेनेफिट ऑफ़ डाउट दे देना चाहिए. आए दिन कितना कुछ तो फटता रहता है. कोई कहाँ-कहाँ टांग घुसाता फिरेगा? चतुर्वेदी जी बेचारे अपनी दो टांगों को कहाँ-कहाँ घुसाते फिरेंगे?
चोखेरबाली: जो भी हो लेकिन क्रांति की बात मत करो
क्रांति आने वाली चीज़ नही
सोचने वाली चीज़ है
मसिजीवी: उन्‍हें पता रखना चाहिए कि स्‍वात कहॉं पड़ता है
क्‍योंकि बहुत दूर नहीं ये पिछवाड़े ही है
चोखेरबाली: न काहू से बैर की नीति ऐसे मे कारगर नही हो सकती
जो फिटेस्ट होगा वह सर्वाइव करेगा
तगड़ी जंग है
चोखेरबाली: उनके साथ होना चाहिए जो अपनी रीड़ सीधी रखते है
जिनके पास रीड़ नही?
मसिजीवी: चलो हो गई चर्चा... नहीं होती तो छ़ट्टी हो जाती... और छुट्टी लेना पाप है
चोखेरबाली: कोर्ट की रीढ है कि नही ?
शायद नही है
मसिजीवी: कोर्ट ... का पता नहीं पर भूतों के पास है वे बुढहा होते हैं पानी में खींच लेते हैं कीचड़ में धांस देते हैं।
चोखेरबाली: प्रशासन की भी नही वर्ना सेबी राजू को पकड़ सकती थी
अब जाऊँ ?
मसिजीवी: ओके बाय
चोखेरबाली: ब बाय
 

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रविवार, अगस्त 05, 2007

रविवारी मूड और चर्चा

रविवार छुट्टी का दिन है ,इसलिए सब मौज-मज़े के मूड में हों तो समझ आता है । पर चर्चा के लिए आज नारद देखा तो हैरानी हुई कि शनिवार को भी लोग संडे वाले मूड में थे [लिखने वाले नही,पढने वाले] लगभग 10-11 चिट्ठे शून्य हिट पर व इतने ही मात्र एक हिट पर थे । रोचक यह था कि ब्लॉगवाणी पर वे ही अनहिट चिट्ठे 14,21,25,31 बार पढे गये ।खैर ,यह क्रम किसी किसी चिट्ठे में उलट भी हो सकता है । स्वाभाविक है । कोई निष्कर्ष निकालना मकसद नही है । सिर्फ इतना भर कि पहले सोचा था कि शून्य और एक हिट वाले चिट्ठों की चरचा करने का विचार था , यह सोच कर कि चर्चा में ही उन्हे स्थान मिल जाए । पर् वे पढे गये हैं ,यह विश्वास होने के बाद पसन्द के चिट्ठे ही है ।
कल के सारे चिट्ठे यहाँ देख सकते हैं ।

भ्रूण हत्या पर एक सम्वेदनशील प्रस्तुति तस्वीर की आवाज़ में विपुल जैन द्वारा
।एक दिल दहलाने वाला चित्र ।




भारत में यौन शिक्षा पर एक स्वस्थ चर्चा ज़रूरी है । इस विषय पर विचार करते हुए शास्त्री जे सी फिलिप् निम्न निष्कर्ष पर पहुँचे हैं

यौन-शिक्षा पूरी तरह से असफल एक पश्चिमी अवधारणा है जिसने पश्चिम को बर्बाद कर दिया है अत: इसकी जरूरत हिन्दुस्तान को नहीं है ।
अंग्रेज़ी हिन्दी के बीच उत्पन्न वैमनस्य की दीवारें काल्पनिक है या वास्तविक यह सोव्हा जाए पर साथ ही ध्यान रखा जाए कि कमसे कम ब्लॉग जगत पर यह सह-अस्तित्व में दिखाई दें ।रचना जी की टिप्पणी-हिंदी को आगे लाए जाने के लिये इंग्लिश का बहिष्कार ना करके उसका उपयोग करें तो ज़्यादा बेहतर होगा-को उद्धृत करते हुए मसिजीवी विचार करते हैं-----

चिट्ठाकारी में इसकी शायद कोई जरूरत ही नहीं, क्‍योंकि यहॉं अंग्रेजी विरोध
कोई स्‍वाभाविक बीमारी की तरह लोगों के मन में जमा नहीं बैठा है, कम से कम उस तरह
तो नहीं ही जैसा कि अंग्रेजी के चिट्ठाकारों में इस 'फिल्‍थी' हिंदी जमात के लिए
रहा है। *** दरअसल प्रिंट या विश्‍वविद्यालयी दुनिया में जो भी हो पर अंतर्जाल की
दुनिया में हिंदी के लोग अंग्रेजी भाषा के प्रति दुराग्रह से पीडि़त नहीं है या कम
पीडित हैं इसलिए आपकी नेकनीयती सरमाथे पर कुछ सलाहें अंग्रेजी वालों को भी
दें।


लेकिन शासक और शासित की भाषा वाला फंडा भी है जो कई मनों में पैठा है ।भाषा और सत्ता के गहरे सम्बन्धों को हम भाषा की संरचना में ही देख सकते हैं । हाँ एक बडा पहलू यह भी है।भाषा भाव से नही शक्ति से चलती है । अनामदास अंग्रेज़ी के कुचक्र में फँसी हिन्दी के विषय् पर सवाल उठा रहे है और जवाब भी तलब कर रहे हैं-

कुचक्र है कि क्रयशक्ति बिना अँगरेज़ी के सिर्फ़ गुंडागर्दी से आती है. यह कुचक्र
कब और कैसे टूट सकता है इसके बारे कुछ सोचिए, बोलिए और बताइए

आप विचार करते हुए संडे के खाली वक़्त को सार्थक कीजिए और चूरमा के स्वादिष्ट लड्डू भी खाइए ,बशर्ते कि आपको उन्हे बनाने से भी परहेज़ न हो

और हाँ आज मै चिट्ठाचर्चा क्योँ ? तो यह जुर्माना है नीलिमा जी और मसिजीवी के यहाँ सप्ताहांत मनाने के लिए आने का :)

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शनिवार, मई 12, 2007

ये आज़माना है तो सताना किसको कहते है ....

पिछले शनिवार शनिदेव की किरपा से दुई चिट्ठाचर्चा हुई गयी। तब सोचे थे कि अगली बार देबू दा से पहिले ही बात कर लेंगे ताकि कंफूज़ ना हो। पर ब्लॉग जगत की माया देखो ,भूल गये और अब कोन्हू सा भी ऑनलाएन नही है। सो चलो कर ही दें चर्चा। वैसे ई-पन्ना प्रभो हमे गरिया के जने कहा लोप हुई गये और ई धुरविरोधी जी शानदार टिप्पनी चर्चा करिके हमारे किये धरे पर पानी फेर रहे हैं। सो हम सकुचा सकुचा के कुछ लिख रहे है

कमोडिटी मित्र बोले पीले हाथ ना होंगे हल्दी से [हमने जो सोचा उससे उलट पाया वे तो हल्दी के मार्केट की चिंता में हैं
घरेलू और निर्यात मांग के अभाव में हल्‍दी के दाम हाजिर बाजार में जहां घटते जा रहे हैं वहीं वायदा में यह अभी भी मजबूत बनी हुई है। इस विपरीत रुझान से कारोबारियों को समझ ही नहीं आ रहा है कि हल्‍दी में अब क्‍या होगा। फंडामेंटल्‍स के आधार पर बात की जाए तो हल्‍दी में अब तेजी के कोई आसार नहीं बनते क्‍योंकि 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया के बाद घरेलू बाजार में मांग लगभग बंद हो जाती है और बाजारों में आने वाली हल्‍दी केवल स्‍टॉकिस्‍टों के गोदामों में जाती है।

पर फुरसतिया जी भतीजी के हाथ पीले कर दिये है और बाली उमिर में श्वसुर हुई गये है। उनका बधाई! पर एक पोस्ट् से चार् सिकार कर लिये हैं। ब्लागर मीट भी उहां कानपुर मे कर लिये मसिजीवे और राजीव टंडन जी के साथ।
मसिजीवी की जब हमने पहले रेलवे ट्रैक के पास वाली फोटो देखी थी तब लगता था कि ये महाराज कोई लम्बे शरीर के मालिक होंगे। इसके अलावा जो अभी कुछ दिन पहले की फोटो देखी थी जो इन्होंने अपने ब्लाग में लगायी थी उससे लगता था कि मसिजीवी कुछ ज्यादा ही सांवले हैं! आवाज का भी अंदाज था कि शायद कुछ धीर-गम्भीर सी आवाज होगी। लेकिन मुलाकात होने पर हमारे तीनों अनुमान हवा हो गये। मसिजीवी सामान्य कद के स्लिम-ट्रिम टाइप के जिसे लम्बा तो नहीं कह सकते, अपनी फोटो से कहीं ज्यादा खूबसूरत और आवाज भी मधुरता की तरफ़ झुकी हुयी। मुलायम टाइप की।

सुआमी जी को कुछ समझा दिये। और दो तीर और भी। अब आगे स्वयं पढिये। सब हम बताएँ का? लो जी हमारी मिठाई मार के बैठे है मसिजीवी और ब्लॉगर मीट मे उसकी गन्ध भी नही आने दे रहे। उन्हे तो फुरसतिया जी के उबटन लगे गोदी की कंम्प्यूटर पर पोस्ट बनानी थी।ये सज्जन हर स्थान पर एक पोस्ट ढूंढते हैं।

ई देखिये पंगेबाज़ को भी कहिन नाही है। बिदेसी तरीका से भोजन करने के ढंग की ऐसी कम तैसी कर दी है।
१९.तरीका:-अपना एक हाथ साफ रखने की कोशिश करें, ताकि गिलास वग़ैरा उठाते समय उन पर निशान न पड़ेप्रयोग:-भाई हम खाना खा रहे है की कोई वारदात करने आये है काहे डरा रहे हो क्या बता रहे हो जरा साफ़ साफ़ बताओ ये इस तरह से खाना खाना कोई भारतीय संविधान की किसी धारा का उल्लंघन तो नही,जॊ यहा भी बाद मे फ़िंगर प्रिंट लेने पुलिस वाले आने का डर है
कल जब मुहल्ला वाले सोये रहे थे हम राजकिशोर जी के एक पुराने लेख के हवाले से पत्रकारिता की गैर ज़िम्मेदारी पर बाज़ार के सन्दर्भ मे बात कर रहे थे। सोचा था अविनाश जी जरूर अपने विचार बताएँगे पर वे नही आये अब चर्चा देखे तो जरूर टिपियायें। कमल जी भी गलत नीयत संपादको को कोस रहे हैं।

कुछ सुनदर ,सम्वेदंशील कविताएँ ,यहाँ जाकर टिपियाएँ ---शुभा की एक कविता, बूढी औरत का एकांत

बूढी औरत को
पानी भी रेत की तरह दिखाई देता है
कभी-कभी वह ठंडी सांस छोड़ती है
तो याद करती है
बचपन में उसे रेत
पानी की तरह दिखाई देती थी।

देवनागरी में पढिये गालिब के मेरे पसन्दीदा शेर यहाँ सच्चे मोती मिलते हैं। यही है आज़माना तो सताना किस को कह्‌ते हैं

अदू के हो लिये जब तुम तो मेरा इम्तिहां क्यूं हो (महबूब कभी कभी कहता है 'मैं तो तुम्हे आज़मा रहा था'. अगर वो रक़ीब का हो ही लिया, तो भला मेरा 'इम्तिहान' लेने का क्या मतलब?)

अंकित शायद अपने विवाह की आस में है और तीन कविताएँ लिख डाली है। मुलाहिज़ा फरमाएँ , पूरी पढने उनके ब्लॉग पर जाएँ----

है जुनून कि उनको मीत हम बनाएँगे....है यकीन वो मेरा गीत गुनगुनाएँगे....हर कदम
उनका साथ मिलने पायेगा....हर नज़र में विश्वास झिलमिलायेगा....माँ शादी का जोडा उनको
भिजवायेगी....उनकी रौशनी इस घर में जगमगायेगी....

आलोक पुराणिक अपने व्यंग्य लेख में पानीपत युद्ध मे मराठो की हार का करण समझा रहे हैं

पानीपत की तीसरी जंग की तैयारियां चल रही थी। सुपरटाप मोबाइल कंपनी के मोबाइल मराठा सरदारों को दिये गये थे। मराठा सरदारों को बता दिया गया था कि इस मोबाइल सर्विस में सब कुछ मिल जाता है। किसी भी किस्म की हेल्प चाहिए, तो 420 नंबर पर फोन करो। हेल्प फौरन हो जायेगी। आगे का किस्सा यूं है कि पानीपत में लंबे अरसे तक लड़ाई की तैयारी चल रही थी, लड़ाई नहीं हो रही थी। सैनिक बोर हो रहे थे। वो दिल्ली आ गये इंडियन टीम का कोई क्रिकेट मैच देखने, ताकि कुछ अलग तरह से बोर हो सकें।
उन्मुक्त एक पुस्तक के माध्यम से समझा रहे है प्रेम के मायने ---
इस कहानी को एक दूसरे रूप में, एरिक सीगल ने Love Story नामक पुस्तक में लिखा है। यह पुस्तक १९७० में छपी थी। यह ऑलिवर बैरेट और जेनी कैविलरी की प्रेम कहानी है। ऑलिवर अमीर, बहुत अच्छा खिलाड़ी, और हावर्ड में पढ़ता था। जैनी गरीब, संगीत से प्रेम रखने वाली, और रेडक्लिफ में पढ़ती थी।
प्रतीक टी वी सीरियलो पर कककककुपित है ---
ये सभी 'क' अक्षर से शुरू धारावाहिक वक़्त बर्बाद करने के लिए बेहतरीन ज़रिया हैं।
संजय बेंगाणी कहते है - अच्छे हिन्दी कैसे लिखु ।उनकी पोस्ट तो छोटी है टिप्पणियाँ 16 है।इससे पता लग्ता है -पर उपदेश कुशल बहुतेरे। वैसे उन्हे बिन्दास रहने की ही सलाह मिली है. ममता जी गोवा जा बैठीपर वहाँ भी गर्मी से राहत नही है -------
वैसे यहाँ का तापमान २८-३० डिगरी ही है पर उमस की वजह से ही सारी परेशानी होती है। और उस पर रोज सुबह बादल भी आ जाते है ,पर बरसते नही है। अंडमान मे भी गरमी ज्यादा होती है पर वहां बारिश हो जाती है जिस से गरमी का असर कुछ कम हो जाता है।
आसमान ने लोकोक्तियाँ अपने ब्लॉग पर छपी है। आपको जो भली लगे अपना लें----

पृथ्वी पर जनसंख्या का नहीं, पापियों का भार होता है। नम्रता सदगुणों की सुदृढ़ बुनियाद है। दुनिया में रहो,दुनिया को अपने में मत रहने दो।

सुरेश चिपलूनकर अनजान जी के गीत के माध्यम से कहते है---
मादकता भी पवित्र हो सकती है और अश्लील हुए बिना भी अपने मन की बात बेहद उत्तेजक शब्दों में कही जा सकती है
सत्य की वादी को बताएँ कि आप ब्लॉगिंग क्यो करते है। रामचरित मानस के कुछ अद्वितीय प्रसंग बत रहे है लक्ष्मी गुप्ता
।१। वाटिका प्रसंगः धनुषयज्ञ के पूर्व सीता जी गौरीपूजन के लिये पुष्पवाटिका में आती हैं और राम लक्ष्मण वहीं पूजा के लिये पुष्पचयन करने के लिये आते हैं। यहाँ पर वे दोनों ही एक दूसरे को देखते हैं और राम अपने विचलित मन के बारे में लक्ष्मण को बताते हैं। गोस्वामी जी ने बड़ी कुशलता से सीता और राम की मनोदशा के चित्र खींचे हैं।
अज़दक जी के विनम्र निवेदन के बाद भी वहाँ कोई टिपियाया नही। बुरी बात जाकर पढिये।

समीर जी ने 11 मई को नही लिखा है :) और किसी की जगा दी है बहन जी ने उम्मीदें --

ई पन्ना जी को यह ढंग ठीक लगा हो तो कृपया टिपियाएँ :)

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शनिवार, अप्रैल 21, 2007

जी का जंजाल मोरा बाजरा....जब मैं बैठी बाजरा सुखाने...

जब जनसत्ता वाले हमें छाप रहे थे हम पहाडों की हवा खा रहे थे। यहाँ दिल्ली की गर्मी मे हमारा कंपूटर बाबा प्राण त्याग गया । वापस आकर देखा तो समस्या गम्भीर थी। खैर जैसे तैसे कल शाम इन्हे जिला पाए, लॉगिन करते ही चिटठा चर्चा का आदेश मिला। तो प्रस्तुत है नारद के कल के चिट्ठों का ब्यौरा। सारे चिट्ठे यहाँ देखें {वैसे देख ही चुके होंगे ,फिर भी चिट्ठा चर्चा की रवायत के तकाज़े से कह रहे हैं, जो देखे उसका भला जो ना देखे उसका तो कल्याण निश्चित ही है :) }
कल नारद पर एक शादी ने बडा तंग किया भाई लोगों को,शादी थी ऐश- अभि की, उसमें बेगानो की तरह हमारा मीडिया -मुल्ला जाने क्यो दीवानों की तरह नाच रहा था।मीडिया की हरकतें देख कर बचपन का यह खेल/गाना याद आ गया -जी का जंजाल मोरा बाजरा.. जब मै बैठी बाजरा सुखाने, उड -उड जाए मोरा बाजरा।...क्या कहें बात का बतंगड बन गया। शादी हो तो ऐसी कि देस बिदेस सबे बौरा जाँय,और मीडिया हो तो ऐसा कि इत्ता बकबक कि लोगों के सर मे दर्द कर दे। संजय सही कहे हो प्रेम विवाह तो होते रहेंगे, इसमे बडी बात क्या है।एंग्री गणेशन भी इस मौके पर गुस्साने से बाज़ नही आए ,आखिर पकवान् इतने फीके जो थे।मोहल्ले वाले केटरिंग करेंगे तो पकवान तो तीखे होए चाहिए थे।,पर प्रमोद भाई गणेशन पर जो आप टिप्पणी दिए हैं वाकी टोन कया है ? मिश्रा जी ने नए जोडे के हनी मून के लिए मोहक स्थानों की तस्वीरे भिजवा दी है।।

आशीर्वाद तो हो गए अब कोई ऐश अभि को शादी का मर्म भी तो समझा दे भाई... ए भाई..पंगे बाज़ ही यह पंगा ले सकता है लो लिया लिया..



शादी:एक ऐसा समझोता जो आदमी से उसकी बैचुलर डिग्री छीन कर औरत को मास्टर डिग्री दे
तलाक: शादी का भविष्य
आंसू: दुनिया का सबसे बडा अहिसंक हतियार



थोडा गणित भी सीख लो ,शादी मे काम आएगा।





तेज बन्दा + तेज महिला = प्यार

तेज बन्दा + ढीली महिला = लफ़डा
ढीला बन्दा + तेज महिला = शादी
ढीला बन्दा + ढीली महिला = पंगे के अलावा कुछ नही




अब आप पंगा लोगे तो दामोदर दास को गुस्सा नही आएगा क्या? बोलो? उस पर गँवार थाना प्रभारी से पाला पडा। सुबाचन यादव ।रागदरबारी की याद करने वाले सबाचन यादव के पास इत्ता काम है कि सारा काम ही ठप्प पडा है।



"थाना प्रभारी सुबाचन यादव कुछ और सोच रहे थे. कुछ और सोचते हुए माचिस की तीली से (जबकि दांत में कुछ था नहीं) दांत खोद रहे थे."


उस पर किसी प्रेत का फोटू भी लगा दिया । पता है प्रत्यक्षा कितना डर गयीं।



इत्ता डरने के बाद कैसे कोई हत्या ,बलात्कार करने स्टूडियो मे जाएगा जी ! न्यायाधीश पर मिलकर शक करने से क्या वह डर जाएगा? अजी मोटी चमडी है। वैसे अविनाश तुम्हारी लगाई आग बुझाते बुझाते फुरसतिया जी का अग्नि शमन दस्ता थक गया है।समकाल चिंतित है । उसे थकना नहीं चाहिये। वैसे आग की खोज हुई हकैसे यह भी पता है किसी को इसलिए सोचो थोडी देर् कि





आखिर कब तक
सरकारों का बदल जाना
मौसम के बदल जाने की तरह
नहीं रहेगा याद





इत ना ही कर सकते हैं कि खुन्नस निकालकर जीने लगें और मज़बूत होकर।गुरनाम जीने का गुर बता रहे हैं कि ख्वाब देखो पर उसकी चर्चा मत करो। फिर वे पूछते हैं किस पर लिखूँ "इस बाहर की प्रकृति पर या अन्दर कुर्सी पर मुहँ फुलाए इस अन्जान प्रकृति पर"भैय्ये लिखना नही आता तभी तो पूछते फिर रहे हो। :)
कल की ताज़ा खबर{?} श्रीष को सर्वज्ञ पर लिखने को एक और टेकनोक्रेट मिल गया अंकुर गुप्ता के रूप में।


और हम ब्लॉगियों की क्या हस्ती ,हैं आज यहाँ कल वहाँ चले। अब दैनिक भास्कर पर भी झंडे गाड दिए।
भई प्रयास के उत्तम विचार"प्रशंसा से परोपकार" पदकर भले ही ई-पन्डित ने उनकी प्रशंसा की और 0 टिप्पनी से उबारकर परोपकार किया और भले ही रवि जी कहें कि





" स्वस्थ जीवन से अभिप्राय है कि हमारा जीवन चिन्ता, मानसिक तनाव, दु:ख, रोगों से
रहित हो, शरीर देदीप्यमान हो तथा युवा शक्ति से परिपूरित हो। हमारा अपनी निम्न
इच्छाओं, भावनाओं, विचारों पर नियंत्रण हो तथा जीवन दायिनी प्राण शक्ति को संचालन
करने की कला हमें आती हो।"






चाहे ई-स्वामी नया शगूफा लेकर हाज़िर हुए हों



तो भी हमे तो नोट दुगुने करने का आइडिया ही ज़्यादा भाया :) रमण जी भी जापानियों को हिन्दुस्तान पर लिखते देख हैरान ना होएँ। यह फार्मूला अपनाएँ।
आखिर पैसा बोलता है। तो सोचते हैं एडसेंस लगवा डालना चाहिए। क्यों क्या खयाल है ?
जी का जंजाल वैसे यह चर्चा भी थी। तकनीक मे हम पैदल हैं। इत्ता किया सम्झो मैदान मार लिया । रात भर सोचा लिंक कैसे लगेंगे ,वगैरह..। हो ही गया कुछ तो ।गलत लिंक हों तो मुआफ करना। वैसे भी नारद म्एं भाई चारा चलता है...आपका लिंक किसी और भाई पर लग गया हो तो बुरा ना मानना।:):):)




----नोटपैड की कलम .......से। तस्‍वीर अज़दक से

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