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सोमवार, अक्टूबर 20, 2008

नमस्कार ! यह चिट्ठा समाचार हैं !

ब्लॉगर भाई और भाभियाँ मम प्रणाम स्वीकारें ।
आप बजाते रहें तालियाँ हम गुरु नाम उचारें ॥

सर्वविदित हो शिव कुमार मिश्रा जी गुरु हमारे ।
धन्यवाद शुक्लाजी का हमको इस योग्य विचारे ॥

अरे तालियाँ बहुत हो गयीं चर्चा आगे पढिए ।
कुत्ते मिले निकलते ही बच बचकर आगे बढिए ॥

कविता प्रेमी एक नज़र तृष्णा की ओर घुमालें ।
नारी मुक्ति विषय पर यह दीपक का व्यंग्य सँभालें ।।

मुहिम चले फुटकर में यह कहते हैं करमाकर जी ।
नाच रहा रोबोट पढें मत पढें आपकी मरज़ी ।।

यहाँ लाभ के पद पर करें द्विवेदी जी कुछ चर्चा ।
जरा विचारें लाभ न हो तो चल सकता क्या खर्चा ?

मुसलमान जज्बाती ना हों यह शहरोज़ बताएं ।
बेशक है सलाह अच्छी सब हिन्दू भी अपनाएँ ॥

यह शब्दों का सफर तय करें अपना ज्ञान बढाएं ।
अजित
प्रथम ब्रह्माण्ड सुन्दरी से सबको मिलवाएँ ॥

ए टी एम गज़ब है इससे वोट निकलते जाते ।
बटला हाउस के बारे में क्यों न स्वयं पढ जाते ॥

पुरुष प्रधान सोच बदले यह अशोक जी का नारा ।
नारी का उत्थान करें तो बदलेगा जग सारा ॥


पहर तीसरे पोस्ट लिखी क्या खाक समझ आएगा ?
डाक्टर जी को खुद पढ लें तो निर्णय हो जाएगा ॥

ज्ञान दत्त पाण्डेय जी ने फिर नया शिगूफा छोडा ।
हिन्दी ब्लॉगिंग की कथा-व्यथा को
टॉल्स्टॉय से जोडा

सलाह मशविरा देने को जूतम पैजार बताया ।
कुछ लोगों की भावनाओं को शामोसहर सताया ॥

किन्तु छिड गयी बहस आगए योद्धा सभी निकल के ।

चाहें तो कुछ बहस करें इस बहस ब्लॉग पर चल के ॥

इस मंदी के बावजूद ये संडे यूँ ही आया ।
किन्तु यह नहीं व्यंग्य कहें आलोक पुराणिक भाया ॥

गीत पहेली श्रंखला की शुरुआत अब मानें ।
तरुण करें प्रस्तुत, होगी कब खत्म भला क्या जानें ॥

कवि यहाँ योगेन्द्र मौद्गिल हैं पानीपत वाले ।
है
उदास पानी...कहते आँखों में आँखें डाले ॥

सतीश पंचम को पढकर अब पाठक थोडा हँस लें ।
कविता वाचक्नवी पढें चिट्ठाचर्चा में रस लें ॥

कल के ब्लॉग अगर पढने हों स्वप्नलोक में जाएं ।
हिन्दू कैसा कट्टर पंथी रचना सिंह बताएं ॥

तथाकथित बुद्धिजीवी भी सावधान हो जाएं ।
जवाब माँगेंगे धीरू सिंह अब दरवार लगाएं ॥

पढे अलग सा तो गारण्टी अलग माल ही पाएं ।
कभी न करें
कुतर्क यही तो परमजीत फरमाएं ॥

बच्चों का भी ब्लॉगजगत पर काफी मटेरिअल है ।
बाल उद्यान लगा सीमा ने सपना किया रिअल है ॥

बर्बरीक की कथा सुनो मग्गा बाबा से सारे ।
देश है वीर जवानों का खुलकर अविनाश पुकारे ॥

अपने आशिक का सर्वर शटडाउन हुआ आप ही ।
प्लेटोनिक ही असल प्रेम है बाकी सडक छाप ही ॥

पुसादकर जी का सवाल टी वी का स्तर गिरता
श्रेष्ठ पुस्तकें रखीं यहाँ कहाँ मारा मारा फिरता ?

कार्ड खुरच कर मूर्ख बनो यह मसिजीवी बतलाते ।
ठीक-ठाक हैं तरुण आज क्यों इतना
प्यार जताते ?

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