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गुरुवार, जुलाई 12, 2012

कब तक सरमाए के धंधे, कब तक यह सरमायादारी

विष्णु बैरागी जी को मैं बहुत लम्बे अरसे से पढ़ता रहा हूँ। ब्लौग जगत की नियमित उठापटक और सरोकारी झंझटों से दूर रहके वे बहुत पठनीय पोस्टों का सृजन करते रहे हैं। इन दिनों उनके लेखन में बढ़िया तेजी भी देखने को मिली। उन्होंने सुबह-शाम लम्बी और बेहतरीन पोस्टें तो लिखीं ही, उत्तम कवितायेँ भी पोस्ट कीं। इधर चिदंबरम के हालिया बयान को लेकर जो प्रतिक्रिया हुई है उसपर बैरागी जी की नवीन पोस्ट कितनी भारी है यह कहना मुश्किल होगा लेकिन मुझे यह हाल में पढ़ी गयी सबसे अधिक सरोकारी और व्यक्तिगत पोस्ट लग रही है। ब्लौगजगत में बहुतों ने अपने अतीत से जुड़ी पोस्टें रची हैं और ईमानदारी से अपने पिछले जीवन की कड़वी-मीठी यादों को पोस्टों में संजोया है पर सच कहूं तो बैरागी जी के बाकलमखुद के आगे सब प्रसंग फीके हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि बैरागी के प्रसंग में कुछ रस है। इसे पढ़ने पर आपके मन में करुणा उत्पन्न न होना कठिन है। मैं जानता हूँ कि अपनी माँ का हाथ थामे घर-घर अन्न की याचना करने के लिए जानेवाला वह बालक अब वयोवृद्ध हो चुका है पर उसका लिखा पढ़कर मेरे सामने दसियों साल पहले की उन अनदेखी घटनाओं की फिल्म चलने लगती है। इसे फिल्म कहता हूँ तो लगता है कि मैं भी मंत्री की तरह असंवेदनशील और निर्मम हो चला हूँ। मैंने भी खुद की निर्मलता को बिसरा दिया। मैं अपने से कहीं कमतर सामाजिक व आर्थिक हैसियत के लोगों को हिकारत से देखता आया हूँ। मैं भी माफी के लायक नहीं हूँ।

बैरागी जी ने अपने बाल जीवन की जो झलक बताई उसे आप उनकी नवीनतम पोस्ट पर पढ़ें। उन्होंने हृदयहीनता के लिए मंत्रीजी को माफ़ कर दिया. वे लिखते हैं:

"हाँ! एक बात याद रखिएगा। यह गरीबों का अमीर देश है। गरीब ही इसकी परिसम्पत्तियाँ और सम्‍पदा हैं। आपकी अमीरी और यह ‘गुस्ताख अदा’ बनी रहे, इसके लिए गरीबों का बना रहना अनिवार्य और अपरिहार्य है। इसलिए, गरीबों की चिन्ता करना सीखिए। कोशिश कीजिए कि गरीब प्रसन्नतापूर्वक जी सकें। याद रखिए - गरीब के पास खोने के लिए अपनी गरीबी के सिवाय और कुछ नहीं है। यह भी याद रखिए कि भूखा आदमी कोई भी अपराध कर सकता है - यह हमारे धर्मशास्त्र कहते भी हैं और ऐसा करने को सहज स्वाभाविक भी मानते हैं।

आपकी शिक्षा-दीक्षा विदेश में हुई है। भारतीय साहित्य-वाहित्य की जानकारी तो आपको होगी नहीं। इसलिए तुलसी का एक दोहा लिख रहा हूँ। इसे लिखवा कर अपने टेबल के काँच के नीचे लगवा लीजिएगा -

तुलसी हाय गरीब की, कबहुँ व्यर्थ न जाय।
मरी खाल की स्वाँस से, लौह भसम हुई जाय।।"

तुलसी का यह दोहा अपनी नानी को कहते कई बार सुना। लोहे को भस्म होते कभी देखा हो, याद नहीं। भूखा आदमी कोई भी अपराध कर सकता है... पर खाया-पिया-अघाया आदमी क्या-क्या कर सकता है? खैर...

वर्षा मिर्ज़ा के ब्लौग 'लिख डाला' से खबर मिली की पिंकी प्रमाणिक के लिंग जांच के मसले पर रिपोर्ट आ गयी है। पोस्ट से किसी निष्कर्ष की जानकारी नहीं मिल रही। कहीं और (शायद फेसबुक पर) यह भी पढ़ने को मिला कि रिपोर्ट के अनुसार पिंकी बलात्कार नहीं कर सकती (?). यह सब पढ़-सुन कर मुझे बहुत असमंजस होता है। कुल मिलकर ये मसले अब इतने पेचीदा हो चले हैं कि आगे चलकर किसी भी व्यक्ति से बातचीत के पहले उसका जेंडर पूछना पड़ेगा। वर्षा लिखतीं हैं:

"स्त्री और पुरुष को सीधे-सीधे अलग करना इतना आसान नहीं। स्त्री कोमल और पुरुष सख्त  जैसा कोई खाका लिंग निर्धारण में मायने नहीं रखता। टॉम बॉइश लड़की और लता से नाजुक लड़के हम सबने देखें  हैं। जेंडर तो वैसे ही बदला जा सकता है जैसे लीवर, किडनी  या दिल। अर्जेंटीना एक ऐसा देश है जहां व्यक्ति  अपना जेंडर खुद चुनते हैं फिर चाहे वे खुद जो भी हों। वहां के नागरिक को अपना जेंडर अपनी मर्जी से चुनने का हक है। वह जो कहेगा वही माना जाएगा।"

कितना गड़बड़झाला है भाई। आखिर ये दुनिया जा कहाँ रही है? सोचिये ब्लौगजगत में ऐसा होने लगे तो क्या होगा? यदि मैं कोई स्त्रीविरोधी पोस्ट लिख दूं और घोर बवाल हो तो क्या मैं कह सकता हूँ की मैंने तो 'आत्मालोचना' की है, दफा हो जाओ पुरुषों!? 

अब जेंडर आइडेंटिटी का यह जो मसला है वह कहीं-न-कहीं समलैंगिकता और समकक्ष मुद्दों से भी जुदा दीखता है। इसे लन्दन में रह रहीं शिखा वार्ष्णेय ने अपनी ताज़ा पोस्ट में उठाया है। समलैंगिक युगल बेजान गुड्डे-गुड़ियों में अपने असंभव 'शिशुओं' का बिम्ब देखकर उन्हें 'पाल' रहे हैं। एक कदम आगे बढ़कर वे नवीन तकनीकों का सहारा लेकर 'अपने' बच्चों को जन्म भी दे रहे हैं। प्रगतिशील होते हुए भी मुझे तो यह सब स्वीकार करने में बड़ी हिचकिचाहट होती है। मैं दकियानूसी होने का आक्षेप सह सकता हूँ लेकिन उन बातों को स्वीकार नहीं कर सकता जिन्हें मैं प्राकृतिक नियमों के विपरीत मानता आया हूँ। मैं उसी ऊहापोह में हूँ जैसा शिखा ने लिखा है:

"कितना आसान लगता है ना सुनने में यह सब. कोई समस्या ही नहीं. बच्चा पैदा करने के लिए एक स्त्री एक पुरुष का होना जरुरी नहीं ..जैसे बस खाद लेकर आइये खेत में डालिए और आलू प्याज की तरह उगाइये. सभी को अपना जीवन अपनी तरह से जीने  का और हर तरह की खुशियाँ पाने अधिकार है.पर विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण नकारने वाले को आखिर ये शिशु जन्म और पालन जैसी इच्छा हो ही क्यों ?वो भी इस हद तक कि इन सब तरीकों में मुश्किल हो तो एक बेजान गुड्डे से पूरी की जाये.?  ऐसे जोड़ों की मानसिक स्थिति मेरी समझ में नहीं आती.क्या कभी वे उस बच्चे के भविष्य के बारे में सोचते हैं?"

इस पोस्ट पर आये कमेन्ट पढ़ने लायक हैं। महफूज़ अली अपने अंदाज़ में मेरे मन की बात कहते हैं:

"देखिये नेचर के खिलाफ जो भी काम होगा तो उसका रिज़ल्ट भी अच्छा नहीं होगा.. गेइज्म और लेस्बियनिज्म कुछ है नहीं.. यह एक टाईप का सेक्सुअल फ्रस्ट्रेशन है... जो चेंज के बहाने शुरू किया जाता है.. और फिर आदत में शुमार हो जाता है.. और कुछ सोशल एटमौसफेयेर का भी असर होता है.... जैसे घर में जब बच्चा छोटा होता है.. तो घर के चाचा ..मामा.. और भी ऐसे रिश्ते .. एक अलग तरह से शोषण करते हैं.. जिनके साथ होता है.. वो फिर मानसिक विकार के शिकार हो जाते हैं.. ऐसे ही बड़े होने पर जब कोई रिश्तों में खटास या रिश्ता टूटता है तो .. उसके बाद सेल्फ सैटिसफेक्शन के लिए लोग शुरू करते हैं.. और फिर उसी में धंसते चले जाते हैं.. इसीलिए तलाक /विधवा होने के बाद लेस्बियंस बहुत मिल जाती हैं.. अगर इस मानसिक विकार को दूर करना है.. तो सबसे पहले घर से ही शुरुआत करनी होगी.. और सामाजिक रूप से सुधार करना होगा.. क़ानून बनाना तो मजबूरी होती है.. जो चीज़ प्रिवेलेंट हो जाती है तो उसके लिए क़ानून ही एक ऑलटरनेटिव होता है... वैसे ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार होना ही चाहिए.. सोशल टैबू होने से भी चीज़ें सुधरतीं हैं.. "

सामाजिक बहिष्कार का उपाय मुझे ठीक नहीं लगता। समलैंगिकता के मसले पर मैंने कुछ दिन पहले समय को ईमेल भेजकर उनके विचार पूछे थे। उत्तर में समय ने अपने ब्लौग की एक लिंक का ज़िक्र किया था। उनसे मैंने यह प्रश्न किया था: "मुझे समलैंगिकता को समझने में भी समस्या है. मैं इसे अवांछित चारित्रिक विचलन (perversion) मानता हूँ जबकि मनोविज्ञान इसे स्वाभाविक व्यावहार मानने पर तुला हुआ है." समय ने अपने उत्तर में लिखा:

जैसा कि आप जानते ही हैं, कई सारे पहलू हुआ करते हैं चीज़ों के। परिघटनाओं के पीछे कई घटक काम कर रहे होते हैं, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष।  इसलिए कई असामान्य सी चीज़ों की तह में जाना थोड़ा मुश्किल होता जाता है।

आप इसकी असामान्यता की वज़ह से इसे अवांछित चारित्रिक विचलन कह रहे हैं, वहीं मनोविज्ञान की एक धारा ( क्योंकि यह वास्तविकता में अपनी उपस्थिति रखता है और कई लोगों के स्वभाव का सा ही अंग बन जाता है ) इसे स्वाभाविक व्यवहार मनवाने पर तुला हुआ है। हालांकि इसके पीछे कई दूसरे कारण, मसलन साधनसंपन्नों की कई व्यक्तिवादी, भोगवादी, पाशविक प्रवृत्तियों को जस्टीफाई करना भी होता है।

कई बार बचपन के कई अनुभवों के कारण जिसमें कि साथ के किशोरों या वयस्कों के द्वारा किए गये यौन-व्यवहारों की स्मृतियां शामिल होती हैं, यौनिकता के जोर मारने पर, और जबकि सामान्य अवसर उपलब्ध नहीं हुआ करते हैं, किशोर अवस्था में यह एक सामान्य सी प्रक्रिया हो जाती है जो कुछ किशोर इधर-उधर के मौके पर प्रयोग में ले लिया करते हैं। इसके साथ सामान्य सी यौन-जिज्ञासाओं की तुष्टि की आवश्यकता जुड़ी होती है। कई बार यह गाफ़िल बच्चों के साथ संपन्न होती है, कई बार हमउम्रों के साथ करने की हिमाकत भी कर ली जाती है। हमउम्रों के साथ, क्योंकि वे अधिक गाफ़िल नहीं हुआ करते, कुछ मामलों में ये सचेतन रूप से भी संपन्न होने लगती हैं, और उस जोड़े विशेष के लिए असहज नहीं रह जाया करती। सामान्यतः अधिकतर किशोर इससे मुक्त हो लिया करते हैं, कुछैकों में यह बाकी रह जाती है, लंबी खिंचती है और उनके लिए ये समलैंगिक संबंध अधिक सहज लगने लगते हैं। बाद में, यह हो सकता है कि वे इसके पक्ष में खुलकर खड़े होने की हिम्मत जुटा लें, इसके पक्ष में तर्क-कुतर्कों का झमेला बुन लें, विपक्ष खड़ा हो तो खुलकर पक्ष बना लें, एक संप्रदाय बन जाए। यह भी एक पहलू है।

हार्मोनिक विकारों की संभावनाओं का जिक्र उक्त लिंकित पोस्ट में किया ही जा चुका है। एक और पहलू देखिए। पुरुषसत्तात्मक समाज में, पुरुषत्व का, मर्दानगी का आभामंड़ल बचाए रखना पुरुष के लिए इतना आवश्यक हो जाता है कि वह यौनिक क्रिया में परफोरमेन्स के डर से, नामर्द साबित हो जाने के डर से इतना आक्रांत रहता है कि सभी तरह के एकांतिक यौन आनंद के मामले, जहां परफोरमेन्स की अनिवार्यता नहीं जुडी हो, अपनाने को इच्छुक रहता है। हस्तमैथुन, समलैंगिकता, पशुगमन, बच्चों-किशोरों के साथ छुटपुट क्रियाएं, कई अन्य तरह की यौन तृप्तिकारक क्रियाएं, जहां सिर्फ़ आनंद के साथ सिर्फ़ एकांतिक स्खलन से मुक्त हो लिया जाए, मर्दानगी भी कायम रह जाए, लिप्त रहने को उत्सुक रहता है। यह मनोविज्ञान कई सारे असामान्य यौन-व्यवहारों को समझा सकता है।


अब इससे आप जूझिए कि इसे कहां रखना चाहेंगे। :-)

आशा करता हूँ की समय उनकी मेल को सार्वजानिक करने को अन्यथा नहीं लेंगे क्योंकि यह इस पोस्ट के लिए बेहद उपयोगी है।

अपने ब्लौग में प्रवीण पांडेयजी हमारे जीवन और विश्व से पानी के सम्बन्ध को रेखांकित कर रहे हैं। पानी जीवन के लिए कितना ज़रूरी है यह बताना गैरज़रूरी सा है। 'जल ही जीवन है' यह छोटा सा जुमला ही सब कह देता है। पानी की महत्ता पर अपनी पोस्ट में प्रवीण जी कहते हैं:

"बड़ा जटिल संबंध है, तपन का सावन से, सावन का जल से, जल का जन से और जन का तपन से। त्राहि त्राहि मच उठती है जब सावन रूठता है, हम असहाय बैठ जाते हैं, अर्थव्यवस्था के मानक असहाय बैठ जाते हैं, गरीबों के चूल्हे असहाय बैठ जाते हैं। बड़ा ही गहरा संबंध है, सावन की बूँदों में और हमारे आँखों और पसीने की बूँदों में। सावन की बूँदें या तो सागर को भरती हैं या पृथ्वी के गर्भ के जल स्रोत को, एक खारा एक मीठा। एक सीधा सा सिद्धान्त तय मान कर चलिये, आप सावन की बूँदों को जितना खारापन देते हैं, सावन की बूँदें आपको उतना ही खारापन वापस करती हैं, पसीने के रूप में, आँसू के रूप में। आप सावन की बूँदों को जितना मीठापन देंगे या कहें जितना उसे पृथ्वी के गर्भ में जाने देंगे, उतनी ही मिठास आपके जीवन में भी आयेगी।"

ज़िंदगी बहुत जटिल होती जा रही है। पुराने मसले हल हुए नहीं कि नए मुद्दे सर उठा लेते हैं। बहरहाल, दुनिया का बदलना बदस्तूर जारी है। इसके साथ ही पुराने फ़ितने और नए फितूर अपनी मंजिल और अंजाम को बरक्स पाते रहेंगे। दुनिया बनी रहेगी, बची रहेगी। कुछ बिगड़ेगी, कुछ संवरेगी। पानी और रिश्तों में मिठास बनी रहे, हमारे और आपके दिल में सचाई और ईमान की प्यास बनी रहे, आत्मा की उजास बनी रहे... इसी उम्मीद के साथ... चलते-चलते...

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

बादल, बिजली, रैन अंधियारी, दुख की मारी परजा सारी
बूढ़े, बच्चे सब दुखिया हैं, दुखिया नर हैं, दुखिया नारी
बस्ती-बस्ती लूट मची है, सब बनिये हैं सब व्यापारी बोल !

अरी, ओ धरती बोल ! !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

कलजुग में जग के रखवाले चांदी वाले सोने वाले
देसी हों या परदेसी हों, नीले पीले गोरे काले
मक्खी भुनगे भिन-भिन करते ढूंढे हैं मकड़ी के जाले

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

क्या अफरंगी, क्या तातारी, आँख बची और बरछी मारी
कब तक जनता की बेचैनी, कब तक जनता की बेज़ारी
कब तक सरमाए के धंधे, कब तक यह सरमायादारी
बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

नामी और मशहूर नहीं हम, लेकिन क्या मज़दूर नहीं हम
धोखा और मज़दूरों को दें, ऐसे तो मजबूर नहीं हम
मंज़िल अपने पाँव के नीचे, मंज़िल से अब दूर नहीं हम
बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

बोल कि तेरी खिदमत की है, बोल कि तेरा काम किया है
बोल कि तेरे फल खाये हैं, बोल कि तेरा दूध पिया है
बोल कि हमने हश्र उठाया, बोल कि हमसे हश्र उठा है

बोल कि हमसे जागी दुनिया
बोल कि हमसे जागी धरती

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

उर्दू के महान शायर - मजाज़

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रविवार, जुलाई 08, 2012

काश कल्पनाएं ही पेट भर दिया करतीं!

"दुनिया में सबसे आसान काम होता है, अपने माता-पिता को गालियां देना। सबसे सोफ़्ट टार्गेट हैं, सबसे निकट भी, और इसलिए भी कि वे झेल भी जाते हैं। अधिकतर मां-बाप अपने पास उपलब्ध संसाधनों, परिस्थितियों और जैसी भी समझ है, उसके साथ अपने बच्चों को, उनके हिसाब से बेहतर या कहें श्रेष्ठ देने की कोशिश करते है।"


समय ने अपने ब्लॉग "समय के साए में" यह किन्हीं मानवश्रेष्ठ को लिखा है, जो अपनी कतिपय समस्याओं के समाधान के लिए उन्हें ईमेल भेजते हैं. समय कौन है, यह जानना महत्वपूर्ण नहीं है. संभव है वह हममें से ही कोई हो, या वह अपने क्षेत्र का कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति भी हो सकता है जो अपनी पहचान को सार्वजनिक नहीं करना चाहता. समय को पढ़ना परिवर्तनों की एक सतत प्रक्रिया से होते हुए गुज़रना है. इसमें आप यह भी जान लेते हैं कि आपने देखे-अनदेखे, चाहे-अनचाहे आप स्वयं को भीतर-ही-भीतर बुनते-उधेड़ते रहते हैं. आप स्वतः बदलते हों या बदलाव का शिकार बनते हों, इनके प्रति आपकी प्रतिक्रिया और आपकी व्याख्या ही समग्रता में आपको वह बना देती है जो आप शायद भूले-से भी न बनना चाहते हों. अपनी कुछ पोस्टों में समय ने कुछ व्यक्तियों द्वारा उन्हें भेजी गयी मेल्स में उनकी व्यक्तिगत समस्याओं का विश्लेषण किया है और उन्हें कुछ परामर्श दिया है. लेकिन यह पत्रिकाओं में छपनेवाला "पाठकों की समस्याएँ" या "ऐगोनी ऑंट" जैसा परामर्श नहीं है. यह उनकी समस्याओं के वर्णन का deconstruction है. समय लिखते हैं:


"एक बात तो हुई होगी, जब हम इस तरह से अपने दिमाग़ की वस्तुस्थिति को अभिव्यक्त करते हैं, और वह भी ख़ासकर लिखित रूप में, एक अनोखा सा सुकून मिलता है। दिमाग़ से एक बड़ा बोझ सा उतरता सा लगता है। आप अपनी इस कहानी या कहें संक्षिप्त सी आत्मकथा को लिखने में ही काफ़ी मज़ा सा लिए होंगे, समस्या की बात करते करते ऐसा लगा होगा कि जैसे आप किसी और की समस्या पर बात कर रहे हैं, उससे दूर सा हो रहे हैं।"



समय को भेजी गयी मेल्स पर आधारित पोस्टें उनके ब्लॉग पर "मेल के ज़रिये संवाद" लेबल में संकलित हैं. इन्हें पढ़ना एक विशेष अनुभव से होते हुए गुज़रना है. इसमें किसी की निजता के उदघाटन का वह चट्खारापन नहीं है जिसका ज़िक्र मैंने ऊपर किया. समय के इन संवादों में "आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।"


अपने पाठक की कतिपय भ्रांतियों का निराकरण करते हुए वे कहते हैं: "काश इच्छाएं करना ही पर्याप्त होता, काश कल्पनाएं ही पेट भर दिया करतीं। क्षमा कीजिएगा, आपने अपने गुरू जी, कुछ सीखा ही नहीं, सिर्फ़ पूजा करने से, विचार और गुण प्राप्त नहीं हो जाते। काश सभी को ऐसे प्रेरणास्रोत मिले होते, आपको सभी कुछ सहज सुलभ हो रहा है, आपके पिताजी की कृपा से, इसलिए आपको इनका मूल्य मालूम नहीं।"


समय को पढ़ते हुए मेरा ध्यान इस ओर भी चला जाता है कि यह संभवतः अपनी तरह का एकमात्र ब्लॉग है जिसमें मनोविज्ञान और संबंधित विषयों पर स्तरीय सामग्री है जिसे सतही संदाज़ में नहीं परोसा गया है. और यह भी कि ब्लौगर की विशेषज्ञता मनोविज्ञान के क्षेत्र में तो है ही परंतु उसमें विपरीत विषयों और विचारों को परस्पर जोड़ने की वह अंतर्दृष्टि है जो व्यक्ति के निज दर्शन का निर्माण करती है. कुछ व्यक्तियों को समय का लेखन कठिन और दुरूह लग सकता है पर उसे अधिक सहज बनाने से विषयवस्तु के छिछले होने का डर है.

इसी के साथ यह भी कहना उपयुक्त होगा कि अभी भी ऐसे कुछ विषय हैं जिनपर किसी ब्लॉग में समर्पणभाव से नहीं लिखा गया है. इनमें वे विषय भी शामिल हैं जिनपर लोग दबे-छिपे लिखते पढ़ते हैं, जैसे यौनता. इटली में रहनेवाले डॉ. सुनील दीपक ने अपने ब्लॉग "जो ना कह सके" में यौनता पर कुछ अच्छी पोस्टें लिखीं है पर उनका लेखन रैंडम है. कुछ विषयों पर पाठ को अश्लील और सतही बनाये बिना लिखना सरल नहीं है. इसके लिए लेखक को मेडिकल, क्लीनिकल, सोशल, और साइकोलॉजिकल लेवल्स पर जानकारियों से पुष्ट भी होना चाहिए ताकि वह तथ्यों का आकलन सही प्रकाश और दृष्टि से कर सके. ऐसा बहुतेरे जन नहीं कर पाते इसलिए इन विषयों पर कुछ लिखने के बाद उनकी धारा खंडित हो जाती है.

खैर... अब विषयांतर करते हुए हाल ही में आई कुछ पोस्टों की चर्चा की जाए. इस चर्चा को लिखने के दौरान लिंक टटोलने के लिए अंतरजाल पर भ्रमण करते समय अदा जी की एक री-पोस्ट पर निगाह गयी. इसमें उन्होंने ब्लॉग जगत में व्याप्त एक प्रवृत्ति पर अपने विचार व्यक्त किये हैं. इसी के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने यह भी लिखा है कि उनकी अनुमति के बिना उनके नाम और ब्लॉग एड्रेस लिंक आदि का उपयोग नहीं किया जाए. उन्होंने ऐसा क्यों कहा है वह आप उनकी पोस्ट पढ़कर विस्तार से समझ सकते हैं. बहरहाल, हम उनकी भावना का सम्मान करते हैं. हमें खेद है कि इस चर्चा में हम उनसे पूछे बिना उनके नाम और ब्लॉग पोस्ट का उल्लेख कर रहे हैं अन्यथा उनकी पोस्ट को चर्चा में संकलित करना कठिन होगा. अदा जी से निवेदन है कि वे चिटठा चर्चा में अपनी पोस्ट के संकलन के लिए पोस्ट-फैक्टो अप्रूवल या ब्लैंकेट परमीशन दें. अपनी पोस्ट में उन्होंने जिस प्रवृत्ति का वर्णन किया है उसके परिणामस्वरूप आयेदिन ब्लौगजगत में विवाद और छीछालेदर की स्थिति बनते देखी है अतः हम उनके विचारों का आदर और समर्थन करते हैं.

बाह्य जगत में जो कुछ भी घटित हो रहा होता है हम ब्लौगर उससे अछूते नहीं रहते बहुत से ब्लौगर उसे अपनी नयी पोस्ट का विषय बनाते हैं. कुछ दिन पहले गैंग्स ऑफ वासीपुर पर बहुत सी पोस्टें पढ़ने को मिलीं. इसी कड़ी में डॉ. अरविन्द मिश्र जी की ताज़ा पोस्ट यह रही. और दो-तीन दिन से हिग्स बोसोन की खोज पर आधारित अनेक बढ़िया पोस्टें आईं हैं. इनमें से मेरी पसंद की पोस्टों में शामिल है ललित कुमार की पोस्ट "हिग्स बोसोन: ईश्वरीय तत्व?". ललित बता रहे हैं कि " हिग्स बोसोन को गॉड पार्टीकल इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि यह कण सृष्टि के लिए उत्तरदायी है। इसी के कारण पदार्थ अस्तित्व में आया और आकाशगंगाएँ, सूरज, चांद, सितारे, धरती, पेड़, पौधे, और हम बने। हिग्स बोसोन के बारे में नतीजे आते ही ईश्वर में कट्टर आस्था रखने वाले लोगों ने प्रश्न उठाया कि यदि हिग्स बोसोन ही दूसरे कणों को भार देता है तो खुद हिग्स बोसोन में भार कहाँ से आता है? यह उसी तरह का प्रश्न है कि यदि ईश्वर ने हमें बनाया है तो ईश्वर को किसने बनाया? मेरा मानना यह है कि यदि हम ईश्वर को आदि अनंत, अजन्मा मान सकते हैं तो हिग्स बोसोन को क्यों नहीं?"

विज्ञान पर एकाग्र ब्लॉग वौयेजर पर इस खोज से जुड़ी डॉ. मीनाक्षी नटराजन के लेख का अनुवाद किया गया है. ताला लगी इस पोस्ट को आप वहीं जाकर पढ़िए. ऐसी पोस्टों पर लगे ताले को तोड़ने का उपाय हमें पता है पर इतनी फुर्सत किसे है!

चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी की प्रपौत्री माधवी शर्मा गुलेरी अपने ब्लॉग पर अपने परदादा को याद कर रहीं हैं. जहाँ तक मुझे याद उन्होंने अपने परदादा के बारे में पहले भी कुछ पोस्टें मनोयोग से लिखीं हैं. 

मेघनेट पर भारत भूषन जी की पोस्ट से ही मुझे यह पता चला कि प्रसिद्द ग़ज़ल "हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है" के शायर और कोई नहीं बल्कि मशहूर अकबर इलाहाबादी ही हैं. इस पोस्ट में उन्होंने अकबर इलाहाबादी के बारे में बताते हुए उनके कुछ बेहतरीन चुटीले शेर भी प्रस्तुत किये हैं. मुलाहिजा फरमाइए, "कभी “हट, क्लर्क कहीं का” एक चुभने वाली गाली थी. लेकिन आज 'सरकारी क्लर्क' ख़ानदानी चीज़ है. सुरक्षित नौकरी, बिना काम वेतन और ‘ऊपर की कमाई’. एमबीए वाली हाई-फाई नौकरियाँ ही अपने इकलौते भाई 'सरकारी क्लर्क' को हेय दृष्टि से देखती हैं. आपने कहा भी है–

चार दिन की ज़िंदगी है कोफ़्त से क्या फायदा
कर क्लर्की, खा डबल रोटी, खुशी से फूल जा.

अकबर इलाहाबादी को क्वोट करते हुए भारत भूषन जी यह भी लिखते हैं, "लीडरों के बारे में देश की राय आजकल अच्छी नहीं. कभी कोई भला ज़माना रहा होगा जब लीडर अच्छे थे. अब तो हर शाख़ पर बैठे हैं. आप ही ने बताया था-

कौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ


क्या बात है भाई! सुभान अल्लाह!

और बीते दो दिनों में विष्णु बैरागी जी ने अपने ब्लॉग में कई नयी पोस्टें लिख दीं. सब एक-से-बढ़कर एक. ताज़ा पोस्ट में उठावने जैसा दबा-सा विषय उठाया है. पोस्ट में कई चुटीले और तंज़ करते वाकये हैं पर बैरागी जी एक वाकये का ज़िक्र करते लिखते हैं: "एक सज्जन ने अपनी माँ का उठावना, सैलानावालों की हवेली (मोहन टॉकीज) में किया। खूब बड़ा सभागार है यहाँ। पूरा सभागार खचाखच भर गया। इन सज्जन ने व्यावहारिकता बरती और मन्दिर जाने-आने की परम्परा तोड़कर, वहीं शान्ति-पाठ करवा कर उठावने का समापन कर दिया। सबने राहत की साँस ली। समीक्षकों ने खूब तारीफ की। कहा, इनका मन्दिर दूर था, जाते तो सबको तकलीफ होती, बाजार में ट्राफिक जाम होता, जिनका उठावने से कोई लेना-देना नहीं, वे लोग भी परेशान होते। याने,  कुल मिलाकर प्रशंसनीय निर्णय घोषित किया गया। किन्तु समीक्षकों में से एक ने कहा - ‘यार! बाकी सारी बातें तो ठीक हैं लेकिन कुछ भी कहो, उठावने का मजा नहीं आया।"


कुछ समय पहले Pintarest नाम से एक नयी बुकमार्किंग सुविधा शुरू हुई जिसका उपयोग करके आप विविध विषयों पर वर्चुअल बोर्ड बनाकर उसमें कई चीज़ों, जैसे फोटो, वीडियो, ब्लॉग पोस्टों को पिन-अप कर सकते हैं. अपनी पसंद की हिंदी ब्लॉग पोस्टों को भूलने से बचाने के लिए मैंने भी एक बोर्ड बनाया है जिसे आप यहाँ देख सकते हैं. अपने ब्राउज़र में लिंक सहेजना या पोस्टों को ईमेल में मंगाकर इन्बौक्स भरने से बेहतर है इस सुविधा का उपयोग.

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मंगलवार, जुलाई 03, 2012

तकती आंखों को यूं नम ना कराओ बारिश

पिछली चर्चा की शुरुआत अनूप शुक्ल जी ने अनूप सेठी जी की ताज़ा पोस्ट से की थी. इत्तिफाकन मैं भी उस दिन उसी पोस्ट से चर्चा का आगाज़ करनेवाला था. किसी भी चिटठा चर्चा समूह में यदि एक से अधिक चर्चाकार हैं तो उनके सामने कभी-कभी यह स्थिति आ जाती है कि वे एक ही समय पर लगभग एक सी ही पोस्टों के बारे में लिखने का सोच रहे होते हैं.

चर्चाकारों के सामने चर्चा में विविधता लाने के लिए यह भी ज़रूरी होता है कि वे पिछली चर्चा में दी गयी लिंक्स से इतर नयी सामग्री ताज़ा चर्चा में लगाएं. ऐसा इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि चर्चाओं में कुछ ब्लौगों का रिपीटीशन आमतौर पर होने लगता है और अधिकांश पाठक इसे बहुधा ही पक्षपात मान लेते हैं. यह बात इस मंच पर हमेशा कही जाती रही है कि चर्चाकार अपनी अभिरुचियों, विचारधारा, और विवेकानुसार ही चर्चा प्रस्तुत करते हैं. उनके सामने यह समस्या भी होती है कि उन्हें पोस्ट के पुराने पड़ने से पहले ही अपनी चर्चा समय के भीतर ही पोस्ट करनी है. एक-दो दिन की देरी हो जाने पर वह पोस्ट चर्चा के नियमित पाठक दीगर तरीकों से पढ़ चुके होते हैं. इसीलिए हम चर्चाकार कभी-कभी पुरानी अनदेखी पोस्टों की ओर भी लौटते हैं. इस चर्चा में कुछ नयी लिंक्स के साथ भूली-बिसरी/पुरानी/अनदेखी पोस्टों का भी जायजा लिया है.

असम और पूर्वोत्तर में बाढ़ की स्थिति बनी हुई है और हम इधर दिन में कई बार बादलों की आस में आसमान तकते हैं. दिनोंदिन बढ़ती गर्मी में पसीना बेतरह चुचुआता है. बिना एसी के जीना मुहाल है. कूलर उमस फेंक रहे हैं. पशु, पक्षी, मनुष्य - सभी व्याकुल हैं. ऐसे में ब्लौगों पर भी बारिश नहीं होने की बातें आम हुईं. घुघूती बासूती जी ने अपने ब्लॉग में एक पुरानी कविता रीपोस्ट की. कविता की शुरुआत की कुछ पंक्तियाँ है:

वर्षा तुम जल्दी आना

फिर से काले बादल छाए हैं
जल गगरी भर भर लाए हैं,
बादल गरजे,बिजली चमके
अम्बर दमके,धरती महके ।



प्यासी धरती, प्यासी नदिया


सूखे तरू, सूखी बगिया,
सब तेरी राह ही तकते हैं
सब जल बिन आज सिसकते हैं ।


और कबाड़खाना पर अशोक पाण्डे ने जापानी कवि शुन्तारो तानीकावा की कविता का अनुवाद पोस्ट किया है रवीन्द्र व्यास द्वारा बनाये चित्र के साथ.

गिरो ना बारिश

उन बिना प्यार की गई स्त्री पर
गिरो ना बारिश
अनबहे आंसुओं के बदले
गिरो ना बारिश गुपचुप



गिरो ना बारिश


दरके हुए खेतों पर
गिरो ना बारिश 
सूखे कुंओं पर
गिरो ना बारिश जल्दी


रवीन्द्र व्यास बहुत बढ़िया चित्रकार हैं. लंबे अरसे से उन्होंने अपने ब्लॉग 'हरा कोना' में कुछ नया नहीं लिखा है. उनकी पुरानी  पोस्ट 'उड़ते हुई रुई के फाहे' मेरी सर्वकालिक पसंदीदा पोस्टों में शुमार है. इसमें भी बारिश का ज़िक्र आता है:

"बारिश का मौसम हमारे और हमारे घर के लिए यातनादायक होता था। (यह बात मुझे बहुत बाद में बड़ा होने पर पता लगी ) बारिश में हमारी छत टपकती। घर गीला न हो इसलिए मां जहां पानी टपकता, बर्तन रख देती। कहीं तपेली, कहीं बाल्टी, कहीं गिलास। घर में तब बर्तन भी ज्यादा नहीं थे। कई बार में नमक का डिब्बा खाली कर उसे कागज की पुड़िया में बांध देती और डिब्बा टपकती बूंदों के नीचे। तेज बारिश में हम भाई-बहनों की नींद खुल जाती और हमें मां-पिताजी के प्रार्थना के शब्द सुनाई पड़ते। मां-पिताजी अगली बार छत पर नए कवेलू लगवाने की बात करते। तेज बारिश में उनकी बातों से अजीब वातावरण बन जाता। बाहर पानी की बूंदें टपकती और घर में मां-पिताजी का दुःख। इसी के साथ हम भाई -बहन घर की दीवारों के पोपड़े गिरते सुनते।"

और बारिश होने/न होने पर केन्द्रित पोस्टों की श्रृंखला में एक और गीत/कविता है जयकृष्ण राय तुषार के ब्लॉग छान्दसिक अनुगायन में. 'मानसून कब लौटेगा बंगाल से' के कुछ अंश ये रहे:


आंखें पीली 
चेहरा झुलसा धान का ,
स्वाद न अच्छा लगता 
मघई पान का ,
खुशबू आती नहीं 
कँवल की ताल से |



नहीं पास से गुजरी कोई 


मेहँदी रची हथेली ,
दरपन मन की बात न बूझे 
मौसम हुआ पहेली ,
सिक्का कोई नहीं 
गिरा रूमाल से |


कमाल के बिम्ब हैं भाई. बहुत कुछ पढ़ते-पढ़ते अब अच्छी-बुरी कविता की पहचान तो हो चली है. जहाँ हम कुछ समझ नहीं पाते उसे अपने काव्यबोध की सीमा और कवि को प्रदत्त पोएटिक लाइसेंस की महिमा मान लेते हैं. 

अब बारिश पर केन्द्रित पोस्टों की बात समाप्त करेंगे डीहवारा पर आई नयी पोस्ट 'बरसो आषाढ़ बरसो' जिसे आप वहीं जाकर पढ़िए. पोस्ट पर ताला लगा है.

दुस्साहसी ब्लौगर नीरज जाट जी कई दिनों से अपनी पर्वतीय अंचल की यात्रा की पोस्टें पढवा रहे हैं. अपनी यात्रा के क्रम में वे संस्कृत के श्लोक "काकचेष्टा वकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च ... अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंचलक्षणः।" का रोचक विश्लेषण भी करते हैं. नीरज से रश्क होता है. काश मुझमें भी घुमक्कड़ी का ऐसा जज्बा होता.

अनुराग शर्मा जी की नयी पोस्ट में वे स्त्री-पुरुषों में सौन्दर्यप्रियता और श्रृंगारिकता के विषय को उठा रहे हैं. व्यक्तिगत विषयों और निर्णयों की बात करते हुए वे कहते है:

"स्त्रियाँ तो फिर भी साड़ी आदि के रूप में भारतीय परिधान को बचाकर रखे हुए हैं परंतु पुरुष न जाने कब के धोती छोड़ पजामा और फिर पतलून और जींस आदि में ऐसे लिपटे हैं कि एक औसत भारतीय मर्द को अचानक धोती बांधना पड़ जाये तो शायद वह उसे लुंगी की तरह लपेट लेगा। कौन क्या पहनता है इससे मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन जब खुद पतलून पहनने वाले साड़ी का, टाई लगाने वाले दाढी का, या ब्रेसलैट पहनने या न पहनने वाले बिछुए का आग्रह करते हैं तो अजीब ज़रूर लगता है। "

अभी इतना ही। पसीने से बनियाइन भीगी जा रही है और तबीयत भी कुछ गिरी-गिरी सी है। एक बारगी सोचा कि पोस्ट मुल्तवी कर दें पर... कुछ पुराने पसंदीदा लिंक्स आपको पढवाने के विचार के साथ यह पोस्ट लिखना तय किया था लेकिन अब उसकी चर्चा किसी और पोस्ट में. चलते-चलते जापान में काम कर रहे मुनीश के ब्लॉग में पोस्ट किये पाकिस्तानी वीडियो को देखकर कुछ हंसने और सोचने का मसाला:


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गुरुवार, जून 28, 2012

अति, अतिरेक, और अतिरंजनाओं के बीच ब्लौगिंग

इन दिनों बहुत से ब्लौगरों ने फेसबुक और ट्विटर की बढ़ती लोकप्रियता और सुविधाओं पर चर्चा की. सारी बातों का निचोड़ यह निकला कि फेसबुक और ट्विटर त्वरित और क्षणिक गतिविधि के रूप में अधिक उपयोगी हैं पर इनमें ब्लौगिंग जितनी व्यापकता और विमर्श की कमी है. यह सही है.  विधिवत ब्लौगिंग करने के लिए आपको कम्प्युटर की ज़रुरत होगी जबकि फेसबुक और ट्विटर का सञ्चालन मोबाईल पर भी भली-भांति किया जा सकता है. मेरे पास बाबा आदम के ज़माने का मोबाईल है जिसमें इंटरनेट नहीं आता इसीलिए मैं अभी तक फेसबुक और ट्विटर का उपयोग एक सीमा से अधिक नहीं कर पाया हूँ.  

मैं अक्सर ही बहुत विविध विषयों को इंटरनेट पर सर्च करता हूँ और सर्च के परिणाम स्वरूप मुझे अनेक  नए ब्लौगों के बारे में पता चलता है. यह भी देखने में आता है कि बहुतेरे ब्लौगर आइसोलेटेड होकर ब्लौगिंग कर रहे हैं और उनका कोई पाठक वर्ग नहीं है. यही कारण है कि ऐसे ब्लौगरों में से ज्यादातर ब्लौगर कुछ पोस्ट लिखने के बाद ब्लौगिंग करना छोड़ देते हैं. हिंदी में ऐसे अनेक बेजोड़ ब्लॉग हैं जिनमें पिछले चार-पांच सालों में एक भी पोस्ट नहीं लिखी गयी है. कल को ऐसा भी हो सकता है कि गूगल या अन्य ब्लॉग सेवा प्रदाता कम्पनियाँ ऐसे ब्लौगों को निष्क्रिय मानकर डिलीट कर दे. इसका एक ही समाधान है कि हम ऐसे ब्लौगरों से संपर्क साधकर उन्हें कभी-कभार एक पोस्ट लिखने के लिए प्रेरित करें. निष्क्रिय पड़े ब्लौगों के डिलीट हो जाने पर उनमें प्रस्तुत सामग्री हमेशा के लिए लुप्त हो जायेगी क्योंकि इन ब्लौगरों ने उसे संजो कर नहीं रखा होगा.

दो दिन पहले मैं संस्कृत साहित्य के एक आख्यान को याद करने का भरसक प्रयास कर रहा था और इसके लिए मैंने फेसबुक पर मित्रों की सहायता भी मांगी. स्मृति के आधार पर मैंने हिंदी में कुछ कीवर्ड गूगल पर डालकर सर्च किया तो मुझे एक ब्लॉग में संस्कृत का वह श्लोक मिल गया जो मैं खोज रहा था. वह श्लोक यह है:



विप्राअस्मिन् नगरे महान् कथय कस्तालद्रुमाणं गणः
को दाता रजको ददाति वसनं प्रातर्गृहीत्वा निशि
को  दक्षः  परवित्तदारहरणे सर्वोपि  दक्षो  जनः
कस्माज्जीवसि हे सखे! विषकृमिन्यायेनजीवाम्यहम्.
(चाणक्य नीति, अध्याय 12, श्लोक 9)
एक ब्राहमण से किसी ने पूछा, "हे विप्र ! इस नगर में बड़ा कौन है?" 
ब्राहमण बोला, "ताड़ के वृक्षों का समूह".
प्रश्नकर्ता ने पूछा, "दानी कौन है?" 
ब्राहमण ने कहा, "धोबी. वह प्रातः काल कपड़े ले जाता है और शाम को ले आता है."
प्रश्नकर्ता ने फिर पूछा, "यहाँ चतुर कौन है?" 
उत्तर मिला, "दूसरों की बीवी को चुराने में सभी चतुर हैं"
प्रश्नकर्ता ने आश्चर्य से पूछा, "तो मित्र ! फिर तुम यहाँ जीवित कैसे रहते हो?"
तो उत्तर मिला, "मैं तो ज़हर के कीड़ों की तरह बस किसी तरह जी ही रहा हूँ!"

कृपया हर कथा या आख्यान की भांति उपरोक्त श्लोक को ब्लॉग जगत की दशा/दिशा से जोड़कर नहीं देखें, अन्यथा इसकी गति भी लोमड़ी और शेर वाली निर्दोष कथाओं की भांति होगी. मैं यहाँ सिर्फ यह बताना चाह रहा हूँ कि जिस चीज़ को मैं यहाँ-वहां खोज रहा था वह सर्च करने पर मात्र पांच सैकंड में एक ब्लॉग पर मिल गयी. श्री अमित त्यागी के जिस पोस्ट में यह श्लोक उद्घृत है उसमें भारत की वर्तमान परिस्थितियों का खाका खींचा गया है. त्यागी जी लिखते हैं:


"एक सज्जन व्यक्ति बड़े से शोरूम के बाहर से गुज़रा। वह शोरूम को अंदर से देखना चाहता था। उसने गेट पर बैठे एक चौकीदार से पूछा क्या मैं अंदर जा सकता हू ? चौकीदार ने मना कर दिया। सज्जन व्यक्ति चुपचाप एक तरफ बैठ गया। तभी एक ‘कूल डूड’ आया और सीधा अंदर चला गया। सज्जन व्यक्ति ने चौकीदार से पूछा ? आपने उसको क्यों जाने दिया तो चौकीदार बोला उसने मुझसे पूछा ही कब था..?...  नियमों को मानने वालों की यही नियति होती है। संपूर्ण व्यवस्था में उनकी स्थिति एक एलियन से कम नही होती ? भ्रष्ट एवं कमज़ोर तंत्र की यह विचित्र विडंबना है कि ईमानदार एवं पाबंद व्यक्ति की गुजर यहॉ एक दिन भी संभव नही है। ...सब चलता है.... के कांसेप्ट ने ही आज हमें उस मुकाम पर ला खड़ा किया है जहॉ 121 करोड़ लोगों में अन्ना हजा़रे एंड पार्टी दूसरे ग्रह के प्राणी जैसे लगने लगे हैं।"


यहाँ यह स्पष्ट करना ज़रूरी होगा कि उपरोक्त श्लोक मुझे हिंदी व संस्कृत के अनेक ब्लौगों पर ही नहीं बल्कि मराठी और अंग्रेजी के ब्लौगों पर भी उद्घृत मिला. हिंदी और अंग्रेजी से इतर भी एक दुनिया है ब्लौगिंग की जो यकीनन समृद्ध होगी और शायद कई मामलों में बेहतर भी. इधर हम अपनी कूपमंडूकता में ही मस्त फन्ने खाँ बने जा रहे हैं.


बहरहाल, त्यागी जी की उपरोक्त पोस्ट का विषय है भ्रष्टाचार. इसपर अब इतनी बात हो चुकी है कि बहुतेरे लोग  उकता गए हैं. हम यह अपेक्षा करते हैं कि सभी का आचरण आदर्श हो जाए तो समस्या का समाधान हो जायेगा लेकिन यह होना मुश्किल है, जैसा फिल्म 'दीवार' के एक संवाद में कहा गया कि "आदर्श और उसूल... इनको गूंथकर दो वक़्त की रोटी नहीं बनती". फिर किया क्या जाए?


"हम भारतीय लोग कार्यो को अधूरा छोड़ देते हैं। कुछ समय काले धन एवं स्विस बैंक पर ध्यान लगाते हैं फिर खापों के तुगलकी फरमानों और अनावश्यक दिये जाने वाले फतवों का प्रतिकार करते हैं। कुछ समय महॅगाई पर भी चर्चा करते हैं। विश्व कप विजय का जश्न तो ऐसे मनाते हैं जैसे यह विजय हमारी समस्याओं के उपर समाधान की जीत हो। शायद हम कोई भी कार्य हाथ में लेकर एक सिरे से निपटाते नही हैं। समस्याए काफी उलझी हुयी हैं एवं रास्ता जटिल है। धरना प्रदर्शन करने वाले विपक्ष का कार्य भी सिर्फ सत्ता पक्ष का विरोध करना मात्र होता है मुद्दों को सुलझाना नही। मुद्दो के सुलझते ही सबकी राजनैतिक जमीन ही खिसक जायेगी।" (त्यागी जी की पोस्ट से)

डॉ. अरविन्द मिश्र जी ने भी अपनी ताज़ा पोस्ट भ्रष्टाचार के बिंदु पर लिखी है. इस समस्या का समाधान यद्यपि वह भी नहीं सुझा पाए. एक समाधान दिखता है सो उनकी ही पोस्ट में:


"गीता में कहा गया है - यद्यदाचरति श्रेष्ठः तद्देवो इतरो जनः स यतप्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते मतलब जैसा आचरण 'श्रेष्ठ ' लोग करते हैं वैसा लोग अनुसरण करते हैं। अगर ऊपर के लोगों का आचरण पारदर्शी निष्कलंक हो जाए तो नीचे तो अपने आप चीजें सुधर जाएं। ज्यादातर मुलाजिम ऊंचे ओहदों पर कार्यरत बॉस का ही तो अनुसरण करते हैं।"


भ्रष्टाचार रोग है, कोढ़ है, नासूर है, यह है, वह है... पिछले कुछ अरसे में यह सब पढ़-पढ़कर मन उकता गया है. फिर भी, मिश्र जी ने सरकारी सेवक होने के नाते अपनी दुविधा को भली प्रकार व्यक्त किया है. उनकी पोस्ट पर संजय अनेजा जी का बेहतरीन कमेन्ट पढ़िए. कमेन्ट की आखिरी लाइन अतिरोचक है:)


"मैं एक साधारण सा मुलाजिम हूँ और मैंने यह पहले दिन से तय कर रखा है कि मुझे घूस नहीं लेनी है, किसी से undue benefit नहीं लेना है और जब और जहां मौक़ा मिलता है अपने डीस्क्रीशन का अपनी समझ में जेनुईन जगह पर प्रयोग करता हूँ, उसके लिए नियमों को गीता-कुरआन नहीं मान लेता. ये वो बातें हैं जिन्हें मैं खुद पर लागू कर सकता हूँ और इस सबके लिए किसी अन्ना, केजरीवाल या किसी और मसीहा का इंतज़ार नहीं करता. सौ प्रतिशत ईमानदारी की गारंटी नहीं देता, सौ प्रतिशत प्रयास की गारंटी देता हूँ. घूस लेता नहीं हूँ लेकिन कई बार देनी जरूर पड जाती है :( 'सम्वेदना के स्वर' पर डा.पी.सी.चरक वाली कड़ियाँ आपने पढ़ी हैं? न पढ़ी हों तो पढ़ देखियेगा, जिस व्यवस्था के हम पुर्जे हैं उसका एक अलग ही नजरिये से अवलोकन है|
आपकी 'नारी देह नारी मन' विषय विशेषज्ञता से इतर यह पोस्ट पसंद आई|"


मुझे संजय भाई की कुछ दिन पुरानी वह पोस्ट याद आ गयी जिसमें उन्होंने ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने की प्रणाली का वर्णन किया था.

अनुराग शर्मा जी के ब्लॉग में फेसबुक और ब्लौगिंग में आयेदिन सामने आनेवाली परेशानियों का विमर्श किया गया है. ब्लौगिंग विषयक पोस्टों की यह विशेषता है कि उन्हें खूब पाठक और टिप्पणियां मिलतीं हैं, हांलांकि अनुराग शर्मा जी को पढ़ने और टिपियाने वाले कम नहीं हैं. उक्त पोस्ट पर बहुतेरे कमेन्ट भी पढ़ने लायक हैं. यदि सारे कमेंटों को निकालकर केवल डॉ. मिश्र के पहले कमेन्ट को ही रख दिया जाये तो भी बात वहीं रहेगी. बकौल मिश्र जी, "ग़म ही ग़म है मुई इस ब्लागिंग में".


कल की पोस्ट में अनूप जी ने फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' पर आई अनेक पोस्टों की खोजखबर ली थी. हर चर्चित फिल्म को देखने की ख्वाहिश करता हूँ पर उसके बारे में इतना पढ़ लेता हूँ कि उसके लगभग हर पक्ष से परिचित हो जाता हूँ. ऐसे में अगर फिल्म देखने जाऊं भी तो लगेगा कि यह फिल्म ना जाने कितनी बार देखी जा चुकी है. 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के साथ भी यही हुआ है. भिन्न-भिन्न अभिरुचियों और झुकाव वाले ब्लौगरों ने इसपर बहुत कुछ लिख दिया. इसी कड़ी में कबाड़खाना पर अनिल यादव का रिव्यू जैसा फेसबुक स्टेटस पोस्ट किया गया जो इस फिल्म की अतिरंजनाओं और अरुचिकर स्थापनाओं को बहुत अच्छे से बयान करता है. आश्चर्य है कि यह पोस्ट अधिकांश पाठकों की नज़र से चूक गयी. पोस्ट में अंत में जो कुछ कहा गया है उसे हम अच्छे/बुरे सिनेमा की स्तरीय परिभाषा भी मान सकते हैं: 


"हर बेहतर फिल्म निजी जिंदगियों की कहानी कहती है और इस तरह से विस्तार लेती है कि वह कहानी निजी न होकर सार्वभौमिक हो जाती है- कोई बड़ा सत्य उद्घाटित करती है (उदाहरण- रोमान पोलांस्की की पियानिस्ट, स्पाइडरमैन, बैटमैन सिरीज़ या फिर सलीम-जावेद की लिखी अमिताभ की फिल्में) यहां उल्टा है, इतिहास से चलती हुई कहानी अंत तक पहुंचते-पहुंचते एक व्यक्ति की निजी जिंदगी के फंदे में झूल जाती है.”

नारी ब्लॉग पर वंदना जी की एक कविता को लेकर विमर्श हुआ. वंदना जी की कविता में स्तन कैंसर से ग्रस्त स्त्री की शल्य चिकित्सा के बाद उसमें जनित अपूर्णता के विचार का अन्वेषण है  क्योंकि स्त्री के वक्ष उसके स्त्री होने और स्त्रीयोचित सौंदर्य का प्रतिमान हैं. वंदना जी की पोस्ट पर और नारी ब्लॉग पर इस तथाकथित अपूर्णता और सौन्दर्यबोध को लेकर खासा विमर्श हुआ जिसमें कई कमेंट्स पढ़ने लायक हैं. पोस्टों पर महत्वपूर्ण कमेन्ट करनेवाली ब्लौगर आर. अनुराधा कैंसर के इस प्रकार से पर विजय प्राप्त कर चुकी हैं. उन्होंने अपने अनुभवों पर एक किताब भी लिखी है जिसके बारे में डॉ. सुषमा नैथानी जी ने लिखा था. पूरी पोस्ट में मुझे अनुराधा और अदा जी के कमेंट्स बेजोड़ लगे:



अनुराधा - "दरअसल मुझे लगता है कि यह सारी समस्या महिमामंडन की, अतिरेक की है। मां का महिमामंडन, फिर इस बीमारी का और उससे होने वाले 'नुकसान' का। क्यों नहीं इसे भी एक बीमारी की तरह देखा जा सकता? इसका भी इलाज है, समस्याएं हैं और इसके साथ भी जीवन है। क्या दूसरी सैकड़ों बीमारियां इसी तरह अनिश्चित भविष्य वाली नहीं होती? क्या सिर्फ इसलिए कि पुरुषों को अपने खेल के 'खिलौने' में कुछ कमी हो गई लगती है, यह बीमारी इतनी बड़ी समस्या बन जाती है? 



अदा - "कोई उनसे जाकर पूछे जो इस दौर से गुजरतीं हैं, उन्हें अपना वक्ष प्रिय था या प्राण..

एक से एक सुन्दर इन्सान उम्र के साथ बन्दर हो जाता है, वो वक्ष जो प्राण लेने पर उतारू हो उसका नहीं होना ही ठीक है, और अगर इस कमी की वजह से कोई किसी को असुंदर दिखती है, तो देखने वाले के दिमाग ईलाज होना चाहिए, ख़ूबसूरती ३४-३२-३४ के इतर भी होती है...देखने वाली नज़र चाहिए..."

अंत में बेजोड़ चित्रकार और शानदार कवि रवि कुमार की कविता इस ब्लॉग से:

कोई यदि पूछेगा
सबसे बेहतर रंग कौनसा है
मैं कहूंगा मिट्टी का
यदि कोई पूछेगा
सबसे दिलकश गंध किसकी है
मैं कहूंगा पसीने की


कोई यदि पूछेगा
स्वाद किसका सबसे लज्जत है
मैं कहूंगा रोटी का


यदि कोई पूछेगा
स्पर्श किसका सबसे उत्तेजक है
मैं कहूंगा आग का
कोई यदि पूछेगा
किसकी आवाज़ में सबसे ज़्यादा खनक है
मैं कह उठूंगा मेरी ! तुम्हारी !

ज्ञानदत्त जी इस बीच अपने पुत्र का विवाह अत्यंत सादगी से संपन्न करा आये. उन्हें बहुत-बहुत बधाई. उनकी ताज़ा पोस्ट में सुशील और उसकी चाय की गुमठी का ज़िक्र है. पिछले कुछ समय से उनकी पोस्टों का क्रम कुछ टूटा था. उनके ब्लॉग पर इस बीच घटित हुई बातों का लेखाजोखा चित्रों के साथ पढ़ने को मिलेगा, इसी आशा के साथ. धन्यवाद.


पुनश्च: ज्ञानदत्त जी के फेसबुक स्टेटस से:



राजा ने दरवेश से पूछा, "मरने के बाद लोग कहां जाते हैं?" दरवेश बोला, "मुझे नहीं मालुम। मैं अभी मरा नहीं!"

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शनिवार, जून 23, 2012

ब्लॉग जगत में सैर-सपाटा और घुमक्कड़ी की चर्चा


ब्लौग की दुनिया में कुछ डॉक्टर भी बहुत बढ़िया पोस्ट लिखते हैं. डॉ. तारीफ दराल साब भी उनमें से एक हैं. बहुत आकर्षक कद-काठी और व्यक्तित्व के धनी डॉ दराल से मुलाकात सतीश सक्सेना जी की पुस्तक के विमोचन के दौरान हुई थी. घर लौटने की जल्दी और विमोचन के बाद की चहल-पहल में डॉ. साब से बात करने का मौका नहीं मिला. पिछले कुछ अरसे में उनके ब्लौग की तकरीबन हर पोस्ट पढ़ी है. उनका चुटकियाँ लेने का अंदाज़ बेहतरीन है. सैर सपाटे के शौक़ीन डॉ. साब हाल ही में पहाड़ों की सैर कर आये. काम भर के लायक ज़रूरी जानकारी देनेवाले ऐसे ट्रैवेलॉग ब्लौग में बहुत लोग नहीं लिखते. डॉ. साब के ट्रैवेलॉग में घुमक्कड़ी भी है और कुछ अनदेखी सी रह जानी वाली बातों का ज़िक्र भी.

मसूरी की किसी अनजान राह पर मिल गए एक अजनबी के पूछने पर डॉ. साब ने बताया, "बस यूँ ही छोटा सा जॉब करता हूँ". अजनबी ने कहा, "लगता तो नहीं है". सही भी है, डॉ. साब को देखकर कोई यह नहीं मान सकता कि वे मामूली जॉब करते होंगे. डॉ. साब से गुज़ारिश है कि वे एक ब्लौगर हैल्थ चेकअप कैम्प लगायें. इसी बहाने एक ब्लौगर मीट भी हो जायेगी और ब्लौगर जन अपनी सेहत का जायजा भी ले लेंगे. अगर इसमें डॉ. प्रवीण चोपड़ा को भी शामिल कर लें तो ब्लौगर दोस्तों के दांतों का मुआयना भी हो जायेगा.

घुमक्कड़ी पर उन्मुक्त जी ने भी बहुत सी पोस्ट लिखी हैं. वे कई दिनों के बाद लिखते हैं और उनकी पोस्टें छोटी होती हैं इसलिए मन नहीं भरता. यदि वे कहीं घूमने जाते हैं तो वहां देखी किसी छोटी सी बात पर अपनी पोस्ट की रचना करते हैं. उनकी पिछली पोस्ट में नैनीताल की यात्रा का वर्णन है. उन्मुक्त जी सैर करानेवाले गाइड और वाहन चालकों से बड़ी जल्दी घुलमिल जाते हैं और उनसे धंधे से जुड़ी बातें जान लेते हैं. उनकी पोस्टें लघु से लघुतम हो रही हैं. उन्मुक्त जी सुन रहे हैं?

इसी बीच गिरिजेश राव उड़ीसा (ओडिशा?) की यात्रा पर निकले. कोणार्क के गौरवशाली सूर्य मंदिर के उत्थान और ध्वंसन को वे उन्होंने सर्वथा नवीन दृष्टि और तथ्यों के प्रकाश में देखा है. मेरे लिए यह जानकारी अद्भुत है. उस विहंगम मंदिर के प्रस्तर खण्डों को गिराने की घटना पर होनेवाला खेद केवल कुछ सुन्दर उत्कीर्णित पत्थरों से होने वाला मोह मात्र ही नहीं है जैसा गिरिजेश ने अपने एक कमेन्ट में कहा है, "ज्ञान का वह स्तर जहाँ सभ्यता के चरमोत्कर्ष और संस्कृति उपलब्धि के प्रतीक पत्थर भर लगें, घटित होते हुये को यूँ साक्षी भाव से देखा जा सके कि बस समय का चक्र भर लगे; वहाँ नश्वर प्राणियों के जीवन भी माया मोह ही होते हैं। उस स्तर पर कुछ भी मायने नहीं रखता - इतिहास, विज्ञान, गणित, साहित्य, ब्लॉगरी सागरी सब माया! ब्रह्म सत्यं जगन्नमिथ्या...सीताराम सीताराम"

बात को बेहतर समझने के लिए इसी पोस्ट कमेंट्स में गिरिजेश और शिल्पा मेहता जी के बीच हुआ संक्षिप्त वार्तालाप पढ़ना ज़रूरी होगा.

बात घुमक्कड़ी की हुई है और अब मुल्क की सरहदों से हजारों मील दूर देशों के मुल्कों की पुलिस इस बात से अनजान अपनी गश्त में हलकान है कि किसी और दुनिया के लोग उनकी तारीफों के पर्चे बांच रहे हैं. पहले शिखा वार्ष्णेय जी ने बताया कि लन्दन की अपेक्षाकृत सभ्य पुलिस को देखकर वे अभी भी अकारण ही खौफज़दा हो जाती हैं मानो "जरुर इस डर के पीछे होगा "राज कोई पिछले जनम का". इन्हीं किसी की गोली से हुई होगी मेरी मौत." बाद में अदा जी ने भी कनाडा की पुलिस के बारे में अपना संस्मरण लिखा जिसमें उन्होंने बताया है कि वहां की पुलिस कित्ती भलीमानुस है. उनकी अगली पोस्टों में वे भारत की पुलिस को लेकर अपने सुखद अनुभव शेयर करेंगीं. अपनी पोस्ट की शुरुआत में उन्होंने जो बात लिखी है वह काबिल-ए-तारीफ है:
"जो इंसान अच्छा होता है वो बस अच्छा होता है । अच्छाई दिखाने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती है। अच्छाई कहीं भी, कैसे भी नज़र आ ही जाती है। आपको बार-बार बताने की ज़रुरत नहीं होती कि आप कितने अच्छे हैं। जैसे बुराई नहीं छुपती, वैसे ही अच्छाई नहीं छुपती। अगर आप अच्छे हैं तो, अच्छे ही रहेंगे चाहे परिस्थिति कैसी भी हो। अच्छाई बड़ी सरल सी चीज़ है, अगर आप उसे छुपायें तो छुपती नहीं है, और अगर दिखाना चाहें तो दिखती नहीं है। अच्छाई बैनर पर लिखी कोई तहरीर नहीं, जिसे कोई पढ़ कर जान जाएगा आप बहुत अच्छे हैं। अगर आप सचमुच अच्छे  हैं, तो आपकी चुप्पी भी बता देगी।"
इसलिए अब मैंने तय कर लिया है चुप रहूँगा क्योंकि एक चुप सौ बातों का जवाब होती है. लेकिन मैंने ऐसा किया क्या है जो मैं चुप रहूँ? खैर, ब्लौगिंग तो आदमी चुप रहकर भी कर सकता है.

सैरसपाटे विषयक पोस्ट के लिए श्रीमती आशा जोगलेकर की साल्ट लेक (अमेरिका) यात्रा का विवरण मिल गया. वे एक अल्पज्ञात ईसाई पंथ मोर्मोन्स का मंदिर देखने गयीं थी लेकिन जाने पर पता चला कि वहां तो साधारण ईसाइयों के लिए भी प्रवेश वर्जित है! लो जी! ये अमेरिका है! अब इस बारे में तो यही कहा जा सकता है कि अमेरिका में इतनी स्वतंत्रता है कि वहां एक पंथ को माननेवाले लोग अन्य पंथ को मानने वालों को अपने यहाँ प्रवेश नहीं देने के लिए स्वतन्त्र हैं. इसे कहते हैं निगेटिव में भी पौज़िटिव खोज लेना. लेकिन ये मोर्मोन्स तो मोरोंस निकले.

ब्लौगर विवेक रस्तोगी काम से जेद्दाह गए और उन्होंने खाने से पहले हर चीज़ का फोटो फेसबुक पर डालकर बहुतों का मन ललचाया. वहां पेट्रोल सस्ता होने की बात वे इतनी बार बता चुके हैं कि कई दोस्तों ने तो उनसे एक-दो जरीकेन भरके लाने की फरमाइशें भी कर दीं. उनके टैक्सी ड्राइवर ने बताया कि पाकिस्तान में मुशर्रफ़ के आने के पहले बिजली विभाग के 25% कर्मचारी चढ्ढी बनियान में बैठे रहते थे. इससे यह ज़ाहिर होता है कि पाकिस्तान में सरकारी नौकरी में महिलाओं की संख्या न के बराबर होगी. 

अब अपने देस में. दिलेर ब्लौगर ललित शर्मा लंबे अरसे से गाँव देहात में छुपे अल्पज्ञात रमणीय और पुरातात्विक महत्व के स्थलों का भ्रमण कर रहे हैं. इसी कड़ी में वह पहुंचे महाराष्ट्र में हिडिम्बा टेकरी. वहां बहुत कुछ देखने लायक तो था ही, अंत में उनकी मुलाकात गंजों के सर में शर्तिया बाल उगानेवाले सज्जन से हुई. बाल उगाने की शर्त और शुल्क के बारे में वहीं पढ़िएगा.

कुछ लिंक्स:

१. डॉ. अरविन्द मिश्र जी की पोस्ट - अब राम को कौन बताए कि वे कहां रहें? (मानस के रोचक प्रसंग -१). जिस प्रकार ज्ञानदत्त जी के लिए गंगा है उसी प्रकार मिश्र जी के लिए है मानस.

२. अली सैयद साब का 'लोक आख्यान' अनंत प्रेम. अब तो ब्लॉग में पुरस्कार की बात से ही रूह कांपती है लेकिन अगरचे किसी ब्लौगर को ओजमयी अलंकृत हिंदी के लिए पुरस्कार देना हो तो मेरी पहली पसंद अली साब होंगे.

३. बेचैन आत्मा श्री देवेन्द्र पाण्डेय की कविता 'पहली बारिश में...'. थाली भगौने की चिंता छोडो मांजी! बिटिया को भीग लेने दो. माटी का पुतला ऐसे न गलेगा!

४. रवीश कुमार - 'गैंग्स ऑफ वासेपुर है गुंडई की नवगाथा'. नो स्पॉइलर्स, नॉट एन ऑफिशियल रिव्यू, मस्ट रीड.

५. निखिल आनंद गिरी के सपने में कल रात आई थी पुलिस. और भी बहुत कुछ बीता इस कवि के साथ.

बस इतना ही. आगामी चर्चा के लिए देखते रहें 'चिटठा चर्चा'.

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मंगलवार, जून 19, 2012

पापा का ईमेल और कुछ और बातें


(फादर्स डे के मौके पर अनूप जी और मैं एक दुसरे से अनजान अपनी अपनी पोस्ट लिखते रहे. उनकी पोस्ट छपने के बाद इसे मुल्तवी करना पड़ा. अब कुछ अंतराल से इसे पोस्ट कर रहा हूँ. कुछ लिंक दोनों पोस्ट में मिल सकते हैं. पोस्ट में नीचे कुछ ताज़े लिंक भी जोड़ दिए हैं.)

पिछले साल पापा ने मुझसे कहा कि मैं उनका ईमेल एड्रेस बना दूं. मैंने बना दिया.

वे लिखने-पढ़ने वाले आदमी हैं. उनसे लोगबाग ईमेल पूछते रहते हैं. उनका ईमेल बना देने के बाद मैंने उन्हें लोगिन और पासवर्ड उन्हें बता दिया पर वह ईमेल शायद अब तक किसी काम नहीं आया है. और शायद आएगा भी नहीं. जब तक वे कम्प्यूटर पर हाथ नहीं आजमाएंगे तब तक कुछ सीख नहीं पायेंगे. वे स्वघोषित 'बूढ़ा तोता' हैं जो अब राम-राम नहीं सीख सकता.

पता नहीं किस तरह पापा भोपाल में मेरे बगैर अपना काम चलाते हैं. वे अशक्त नहीं हैं. रोज़ खूब चलते हैं. अपने सारे काम वे बखूबी कर लेते हैं लेकिन जहाँ तकनीक की ज़रुरत होती है वहां उनका हाथ तंग हो जाता है. रिमोट या घड़ी में सैल उल्टे-पुल्टे डाल देते हैं. मोबाईल में वे केवल कॉल सेंड-रिसीव ही कर सकते हैं. मैसेज पढ़कर वे भांप नहीं पाते कि कंपनी की चालाकी से उनके पैसे बिला वजह कट सकते हैं. स्कूटर पंचर हो जाए तो वे टायर नहीं बदलते. दूर तक खींच ले जायेंगे लेकिन औजारों को हाथ नहीं लगायेंगे. आधी रात को सिर्फ उनके ही घर की बत्ती गुल हो जाए तो वे मीटर बौक्स में झांकेंगे नहीं. सुबह तक पसीना पोंछते-पोंछते हलकान हो जायेंगे, फिर इलेक्ट्रीशियन  को बुलाकर लायेंगे.

पापा अपने स्वभाव में कठोरता का दिखावा करते हैं ताकि लोग उनकी उंगली पकड़ने की हिमाकत न करें. वो क्या है न, बहुतेरे लोग उनकी भलमनसाहत का फायदा उठा चुके हैं. वे उन लोगों से खुद को बचा नहीं पाते हैं जो मामूली से काम के लिए उनकी जेब से मोटी रकम निकलवा लेते हैं. किसी घरेलू मशीन में मामूली फॉल्ट को ठीक करने के लिए वे मैकेनिक को देते हैं लेकिन वह उनसे कह देता है कि उसमें बड़ी खराबी है. मैकेनिक मशीन दुकान में हफ्ते भर रखने के बाद उनसे दो-तीन सौ रुपये ऐंठ लेता है जबकि हकीकत में उसने सिर्फ एक तार को जोड़कर मशीन ठीक की थी.

वे नियम के पक्के हैं. किसी की नहीं सुनते. उनका नियम है कि बाथरूम सात-आठ दिन में साफ़ करना ज़रूरी है. दूसरी ओर मैं इस बात पर बहस करता हूँ कि सफाई तभी करनी चाहिए जब बाथरूम गन्दा लगने लगे. हम बहस करते हैं. वे यह कहकर मुझे चुप कर देते हैं कि 'यह काम मेरा है और मुझे मेरे तरीके से काम करने दो, मैंने तुमसे बाथरूम साफ़ करने के लिए कभी नहीं कहा'.

मुझे लगता है मैं उनमें बहुत नुख्स निकालता हूँ. मुझमें शायद इस बात की अकड़ भी है कि मुझे किसी भी आइटम को सीखने समझने के लिए वक़्त नहीं लगता.

यह सब मैं क्यों बता रहा हूँ? मैं आज पितृ दिवस के बहाने ही पापा को जी भरके याद कर रहा हूँ. मैं उन्हें वाकई मिस करता हूँ. आज मैं इस बात को मानना चाहता हूँ कि जब कभी हम दोनों किसी बात में उलझते हैं तो उनका दृष्टिकोण बहुधा सही होता है. वे अनुभवी हैं. उन्होंने दुनिया देखी है. ऐसे कस्बों में उन्होंने नौकरियां कीं हैं जहाँ आज भी बेतरह पिछड़ापन है. मैं समझ सकता हूँ कि वे मेट्रो स्टेशन पर घबराहट क्यों महसूस करते हैं. उनमें वही सीधापन और सहजता है जिसके बारे में मैंने अपने ब्लॉग में दसियों पोस्टें लिख दीं, लेकिन जिसे मैं बहुत देर से पहचान सका. वे लीक पर नहीं चलते, उन्होंने अपना रास्ता खुद बनाया है. वे दूसरों पर अपनी बात नहीं थोपते, लेकिन अपनी निजता को संजोकर रखते हैं.

पिछले साल मैंने उनकी कविताओं को लिपिबद्ध करने और एक स्थल पर रखने की मंशा से उनके नाम से एक ब्लॉग बनाया. उसमें मैंने उनकी कुछ ही कवितायेँ पोस्ट की हैं. उनमें से एक है 'पितृऋण'. उसी कविता से:
अभी-अभी कुछ ही दिन हुए हैं
कमरे की तस्वीर पर तुम्हारी तस्वीर टंगे
तुम्हारी चिरपरिचित मुस्कराहट में
अभी भी कितनी माया, कितना मोह है
मैं नहीं जानता
और यह भी कि जब तुम्हारी तस्वीर मात्र ही रह गयी है
मेरे आसपास
उस पर चढ़ाई गयी माला के फूल भी सूख चुके हैं
वक़्त के गुज़र जाने के एक तीखे अहसास की तरह
परिवर्तन की इस प्रक्रिया में
इसी तरह घूमता है कालचक्र
कोई एक दिन
मैं भी इस कमरे की दीवार पर
तस्वीर सा टांग दिया जाऊंगा
उस पर चढ़ा दी जायेगी कोई माला
फूल सूख गए होंगे
फिर भी चढ़े रहेंगे इसी तरह
और फिर किसी दिन
कोई वह तस्वीर उतार कबाड़ में रख देगा.
यह कविता उन्होंने दादाजी के निधन के कुछेक दिन के भीतर लिखी थी. उसे पढ़ता हूँ तो मन यह कहने को मजबूर हो जाता है कि मैं इतना अच्छा नहीं लिख सकता. लोग सच ही कहते हैं, बाप बाप ही रहता है, बेटा बेटा ही रहता है.

 देवेन्द्र जी की इस पोस्ट जिस पर कापी- ताला लगा हुआ का ये अंश देखें:
पिता जब साथ होते हैं
समझ में नहीं आते
जब नहीं होते हैं
महान होते हैं ।


मेरे प्यारे पापा जैसे हैं वैसे ही रहें. खुद को वे बदलें नहीं किसी भी शर्त पर. दुनिया को और किसी को भी खुद पर हावी न होने दें. मुझे भी नहीं.

यह सब मैंने गुस्ताख मंजीत के एक बेहद निजी-से पत्र को पढ़कर लिख दिया जो उन्होंने अपने दिवंगत पिता को लिखी है. मंजीत के पिता उन्हें तब हमेशा के लिए छोड़कर चल दिए जब मंजीत बमुश्किल दो बरस के थे.  बात पुरानी है, इसलिए घटना के आफ्टर-शॉक्स मन के रोलर पर सिलसिलेवार छपते जाते हैं. भवन का मुख्य स्तंभ जब धराशायी हो जाता है तो लोग बची खड़ी दीवारों की ईंटों को उखाड़ने से गुरेज़ नहीं करते. हर ज़िंदगी की कीमत होती है... बल्कि यह कहना चाहिए कि हर ज़िंदगी कीमती होती है. और उसकी कीमत का अंदाजा तब लगता है जब वह आँखों से ओझल हो जाती है.

अपने दिवंगत पिता को लिखी चिट्ठी में मंजीत के उलाहनों और शिकायतों के पुलिंदों के पीछे एक बच्चे की निर्दोष चाह है कि जेठ की तपती दुपहरी में उसके कोमल पैरों को जलने से बचाने के लिए पिता ने उसे गोदी में उठा लिया होता. और यह भी कि वे रहते तो कोई परिवार पर तरस नहीं खाता. एक जगह वे लिखते हैं:
"मां कहती है, कि आपके गुण जितने थे उसके आधे तो क्या एक चौथाई भी हममें नहीं हैं। आप ही कहिए बाबूजी कहां से आएंगे गुण। दो साल के लड़के को क्या पता कि घर के कोने में धूल खा रहे सामान दरअसल आपके सितार, हारमोनियम, तबले हैं, जिन्हें बजाने में आपको महारत थी। दो साल के लड़के को कैसे पता चलेगा बाबूजी की कागज़ों के पुलिंदे जो आपने बांध रख छोड़े हैं, उनमें आपने कहानियां, कविताएं और लेख लिख छोड़े हैं। और उन कागज़ों का दुनिया केलिए कोई आर्थिक मोल नहीं। दो साल के लड़के को कैसे पता चलेगा बाबूजी कि आपने सिर्फ रोशनाई से जो चित्र बनाए, उनकी कला का कोई जोड़ नहीं।"
'फादर्स डे' का चलन जब कुछेक साल पहले शुरू हुआ तब उसमें हमने भी बहुत मीनमेख निकाले. उन्हें बाजारवादी रुझान और मल्टीनेशनल्स की साजिशों से जोड़कर देखा. लेकिन अब यह ऐसे अवसर के रूप में दिख रहा है जब इस दिन के होने के कारण चाहे-अनचाहे ही ध्यान पिता की ओर चला जाता है.

ब्लॉग जगत में भी इस मौके पर हमारे साथी अपने पिता को गहराई से याद कर रहे हैं. अदाजी ने भी अपने ब्लॉग पर अपने प्यारे बाबा पर केन्द्रित कविता प्रस्तुत की. हम बड़े कितने ही बड़े क्यों न हो जाएँ, अपने माता-पिता को याद करते समय हम सदैव ही इतने बौने हो जाते हैं कि उनकी उंगली पकड़कर चलना सीखने लगें. इन रिश्तों की यही लिबर्टी है कि होश संभालने के बाद आप कभी लड़खड़ा जाएँ तो आसपास ताकते हुए कपड़े झाड़कर खड़े हो जाएँ, लेकिन जब कभी दुनिया आपको रौंदती हुई गुज़र जाए तो आप अपने बचपन में लौट जाएँ और याद करें कि गिरने पर जब आप चोटिल हो जाते थे तो आपके पिता रुलाई से आपका ध्यान हटाने के लिए किसी अभागी चींटी का किस्सा गढ़ देते थे जो किंचित आपके नीचे कुचल गयी होगी.

मेरे ब्लॉग में दो साल पहले मैंने अंग्रेजी के ब्लौगर लियो बबौटा द्वारा उनके तीन वर्षीय पुत्र को लिखा एक पत्र अनूदित किया था. वह ब्लॉग में सर्वाधिक पढ़ी गयी पोस्टों में शुमार है. पोस्ट में लियो ने अपने नन्हे बेटे को ज़िंदगी जीने की नसीहतें दी हैं. लियो ने लिखा है:
"तुम बहुत छोटे हो और अभी ज़िंदगी अपनी तमाम दुश्वारियों, नाकामियों, उदासी, अकेलेपन, बैचैनी, और जोखिमों को तुमपर उतारने के मौके तलाश रही है. अभी तुमने दिन-रात खटनेवाले कामों में खुद को नहीं झोंका है जिनके लिए कोई शुक्रिया का एक शब्द भी नहीं कहता. अभी तुमने रोज़मर्रा पड़नेवाले पत्थरों की बौछार को नहीं झेला है....
... आखिर में, तुम्हें यह पता होना चाहिए कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ और हमेशा करता रहूँगा. तुम्हारी जीवनयात्रा बहुत अपरिमित, अस्पष्ट, और दुरूह होने जा रही है पर यह बड़ी विहंगम यात्रा है. मैं इस यात्रा में सदैव तुम्हारे साथ रहने का प्रयास करूंगा. ईश्वर तुम्हारा मार्ग प्रशस्त करे. शुभाशीष."
और अब कुछ ताज़े लिंक्स:

हथकड़ वाले किशोर चौधरी की गद्य कविता 'बारिशें तुम्हारे लिए'. पता नहीं किशोर इसे गद्य कविता कहने पर ऐतराज़ न कर बैठें. गद्य कविता क्या है? उसका शिल्प/विन्यास क्या कहता है? इन सवालों से जूझने की बजाय ऐसे लेखन में रूचि लेने वालों को चाहिए कि वे कविता के मीटर और फुट्टे को एक कोने में टिकाकर कविता को पोर-पोर खुलते हुए देखें. इसके लिए आँख चाहिए या मन? दिल चाहिए या दिमाग? सवाल बेमानी हैं न? 

और अब हाइकू. इसे भी कविता मानने में कभी ऐतराज़ होने लगता है. मुझे शक है कि जापानी में हाइकू की तीन पंक्तियों में कुछ कहने की कला वह नहीं है जिसे हम हिंदी में आजमाते हैं. इसकी तफसील तो कोई जापानी जानने वाला ही कर सकता है. हिंदी में हाइकू लिखना कोई नया प्रयोग नहीं है. इसकी तीन पंक्तियों में कभी-कभी अनूठे बिम्ब उभर आते हैं. इंदु सिंह हृदयानुभूति ब्लॉग में लिखती हैं कि "कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…". उन्होंने प्रकृति विषयक कुछ हाइकू लिखे हैं. कुछ सपाट हैं तो कुछ कल्पनापूर्ण और रोचक. बानगी ये है:
१. जैसे जीवन
पोखर किनारे यूँ,
बैठे हैं हम।
२. जड़ है कहाँ
दिखती हैं लताएँ
चारों तरफ।
३. हमें बताती
सुबह हो गई है,
चीँ-चीँ गौरैया।
आपको जब नींद नहीं आती है तो क्या करते हैं आप? यकीनन कविता तो नहीं ही लिखते होंगे. अब कभी नींद न आये तो कागज़-कलम लेकर करवटें बदलते रहें और मन में हो रही हलचल को थामने की कोशिश करके देखिये. शरद कोकास जी ने तो ऐसे ही में कवितायेँ भी लिख दीं, आप एक अदद ब्लॉग पोस्ट का जुगाड़ तो कर ही लेंगे. हम शरद जी से आग्रह करते हैं कि वे नींद न आने पर लिखी उनकी और कवितायेँ पोस्ट करें ताकि हमारे इन्सोम्नियक ब्लौगर साथी अतिरिक्त समय का सदुपयोग करना सीख लें. शरद जी की कविता में नींद के स्थान पर और किसके आने की प्रतीक्षा है उसे जानने के लिए आपको उनकी ताज़ा पोस्ट तक जाना पड़ेगा. बड़ी कविताओं के कुछ अंश यहाँ पोस्ट किये जा सकते हैं पर छोटी कविताओं को तो पूरा ही उठाया जा सकता है जो ठीक नहीं होगा.

पूर्णता/अपूर्णता, शून्य/अशून्य का विचार ललित की पोस्ट में ईशावास्य उपनिषद के आदि श्लोक से उपजता है और वैज्ञानिक चेतना से पुष्ट होता हुआ मानव संबंधों में भी मुखरित होता है. ललित एक जगह कहते हैं,
"इस बात को आपसी संबंधो के ज़रिए भी समझा जा सकता है। दो व्यक्ति जब एक संबंध बनाते हैं तो उनका संबंध एक मिश्रण की भांति ही होता है। दो लोगों का एक मिश्रण। जैसा कि हम जानते हैं कि मिश्रण टूट सकता है –इसलिए संबंध भी टूट सकते हैं। केवल वही संबंध हमेशा के लिए बने रहते हैं जिनमें दोनों व्यक्ति मिलकर एक हो जाएँ। और ऐसा केवल तब हो सकता है जब दोनों व्यक्ति स्वयं को शून्य कर लें –यानी स्वार्थ, अहंकार और “मैं” की भावना को पूर्णत: त्याग दें। ऐसा करने से व्यक्ति शून्य हो जाएगा… पूर्ण हो जाएगा… और एक सम्पूर्ण संबंध में भागीदारी कर सकेगा."
घुघूती जी ने समुद्र किनारे रोजाना की सैर के दौरान हर तरफ बढ़ रहे कचरे से व्यथित होकर बढ़िया पोस्ट लिख दी. पोस्ट के अंत में लिखा:
"अब तो मन एक ही प्रश्न पूछता है कि हम भारतीय हर जगह, हर समय इतना खाते क्यों है? यदि खाते ही हैं तो खाना व पेय डालने के लिए अपने साथ अपना कटोरा व कमंडल क्यों नहीं रखते? तब कम से कम न खाने वालों को खाने वालों की जूठन लगे कागज, पॉलीथीन, प्लास्टिक व पेपर कप, गिलास, चम्मचों व बैठने के स्थानों से तो न जूझना पड़ेगा। अब डस्टबिन की अपेक्षा व उनके उपयोग की अपेक्षा तो हमसे की नहीं जा सकती।"
इसपर प्रवीण शाह में अपने कमेन्ट में कहा है:
"मुझे लगता है कभी-कभी कि मुल्क के कुछ भागों को छोड़कर देश के अधिकाँश भागों में हम लोग कचरे के प्रति सहिष्णु हैं... हम कचरे के साथ रहने-खाने-जीने के आदी हैं, यह हमें परेशान नहीं करता, बस यह हमारे घर की चारदीवारी के बाहर फैला रहे... यह कुछ ठीक उसी तरह है जैसे नैतिकता व सदाचार के लंबे चौड़े लेक्चर पेलते हम लोगों को चारों तरफ खुल कर लिया-दिया जाता दहेज, अपने बंधु-बांधवों की हराम की कमाई से बनाये महल आदि आदि परेशान नहीं करते...
और हाँ, हर जगह हर समय खाते ही रहने को यदि देखना हो तो रेल के सफर में देखिये... डब्बे में चढ़ते ही कईयों का खाने का डब्बा खुलता है और गंतव्य आने तक उनकी जीभ व जबड़े लगातार कसरत करते रहते हैं...."
प्रवीण मजेदार लिखते हैं. इस बीत लगता है कुछ व्यस्त हो गए हैं. जहाँ तार्किकता और वैज्ञानिक दृष्टि की बात आती है वहां उनका ज़िक्र हमेशा आएगा.

बाकी, साथीगण खुश हैं कि चिटठा चर्चा के दिन फिर गए हैं. दिन तो वैसे घूरे के भी फिरते हैं. अब कोशिश करेंगे कि हर दो दिन में एक बार चर्चिया सकें. अनेक ब्लौगर पूर्व में लिंक्स के चयन के बारे में शिकायत करते रहे हैं जिसके बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि हम अपने विवेक, अभिरुचियों, व्यस्तता, और सामर्थ्य के अनुसार यह कार्य करते हैं और कोशिश करेंगे कि यथासंभव सभी ब्लौगर इस प्लेटफोर्म से लाभान्वित हों.

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