
अब भाई लोग तरस खाएं,क्योंकि पारा 45 से ऊपर है पास रखा कूलर, हीटर हो गया लगता है। और माना कि चिट्ठा चर्चाकार हो जाना हमारे सद्य सशक्तिकरण का प्रमाण है पर फिर भी इससे ज्यादा इंक ब्लॉगिंग में हमारा दम फूल रहा है और वैसे भी कॉपी पेस्ट से उद्धरण देना अभी हमें इंक ब्लॉगिंग में आता नहीं हैं इसलिए कविताओं की चर्चा टाईप करके ही की जा रही है। ऊपर के हिस्से में भी यदि कोई लिंक गड़बडा गया तो हमें 'सशक्त अनाड़ी' समझ क्षमा करें।
हॉं तो काव्यचर्चा: गर्मी में कविताएं खूब लिखी जाती हैं और पढ़ भी ली जाती हैं- पढ़ें तो टिप्पणी भी करें कैसे ये बताया है हिंद-युग्म पर, सीखें और फिर तुषार की कविता दान पर टिप्पणी करें। अतीत की गहराईयों में खोना चाहें तो युनुस के साथ मेंहदी हसन व गुलाम अली या विजेंद्र के साथ जावेद अख्तर का आनंद लें।
मै बंजारा,
वक्त के कितने शहरो से गुजरा हूँ
लेकिन,
वक्त के इक शहर से जाते जाते
मुडके देख रहा हूँ
सोच रहा हूँ
तुमसे मेरा ये नाता भी टूट रहा है
तुमने मुझको छोडा था जिस शहर मे आके
वक्त का अब वो शहर भी मुझसे छूट रहा है..
या फिर सुनें गज़लें मुनीर न्याजी की, बहादुर शाह जफ़र की या निज़ाम रामपुरी की।
आज की चर्चा में बस इतना ही। भूल-चूक लेनी देनी।