मंगलवार, जुलाई 03, 2012

"अपनी उनकी सबकी बात" से "मेरे अनुभव" तक का सफ़र हैं ये चिट्ठा चर्चा

रश्मि रविजा का ब्लॉग हैं अपनी उनकी सबकी बात  . 
बैक 2 बैक दो पोस्ट हैं 
पहली पोस्ट में रश्मि ने 
"माताओं-पिताओं द्वारा अपने ही बच्चों के पालन-पोषण में विभेद पर आलेख लिखा"
और दूसरी पोस्ट में 
"जब  माताओं-पिताओं को  पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं होती और लक्ष्मी या लक्ष्मियाँ  ही उनके घर की रौनक बढ़ाती है तब वे  इस सच को ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर, अपनी बेटी को हर सुख-सुविधा ..आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करने का प्रयत्न करते हैं."
दोनों पोस्ट सोचने के लिये सामग्री लिये हैं पर एक प्रश्न अनुतरित रह गया है शायद रश्मि की अगली पोस्ट उस पर ही आये 
क्या जिनके सिर्फ बेटी हैं और वो उसको आगे बढने का अवसर देते हैं , मानसिक रूप से उसको वो आजादी  भी देते हैं जो बेटो को देते हैं यानी क्या वो बेटी की आय पर अपना अधिकार मानते हैं ? क्या वो बेटी की शादी को उसकी नियति मानते हैं और अविवाहित बेटी को लेकर परेशां रहते हैं .
समीर लाल की एक पुरानी पोस्ट  बिटिया का बाप पर आयी टिपण्णी और मंथन सहज याद आगये . देखिये 
समीर कहते हैं "आज न जाने कितने शिब्बू हमारे समाज में हैं जो कभी प्रगतिशील कहलाये मगर अपने स्वार्थवश बिटिया का जीवन नरक कर गये. इंसान की सोच कितनी पतनशील हो सकती है?"

पल्लवी सक्सेना का ब्लॉग हैं  मेरे अनुभव (Mere Anubhav) 
पोस्ट मे पल्लवी ने गृहणी और कामकाजी महिला के महत्व पर विमर्श आमंत्रित किया हैं . आज भी गृहणी और कामकाजी महिला को अलग अलग माना जाता हैं . क्या कामकाजी महिला गृहणी नहीं होती हैं . 
पल्लवी लिखती हैं "लेकिन फिर भी मुझे खुद कभी-कभी ऐसा लागने लगता है कि कामकाजी होना ज्यादा अच्छा है। अब जैसे उदहारण के तौर पर यदि मैं कहूँ तो मेरे बेटे की कक्षा में उसके जितने भी दोस्त हैं उन सभी दोस्तों की मम्मियाँ जॉब करती है जिसके चलते उसे भी ऐसा लगता है कि मेरी माँ को भी जॉब करनी चाहिए क्यूंकि उसे ऐसा लगता है कि यदि मैं जॉब नहीं करती तो मैं कुछ नहीं करती अर्थात मुझे बहारी दुनिया के विषय में कोई जानकारी नहीं जिसके चलते मैं यहाँ इंगलेंड में रहने लायक नहीं हूँ। दरअसल उसकी ऐसी भावना या ऐसी सोच उसके नज़रिये से गलत नहीं है, क्यूंकि उसकी पढ़ाई यही से शुरू हुई है और जब से उसे थोड़ी बहुत समझ आयी है, तब से उसने यही देखा है उसकी माँ के अलावा बाकी सभी बच्चों की माँयें यहाँ जॉब करती है। जबकि इंडिया में उसकी दादी, नानी चाचीयाँ कोई जॉब नहीं करता। तो स्वाभाविक है उसके मन में यही छवि बननी ही थी, कि इंडिया में सभी औरते ऐसी ही होती है जो केवल घर में रहती है। इसलिए उन्हें बाहर की दुनियाँ के विषय में कोई खास जानकारी नहीं होती है।"
विमर्श घूम कर फिर वही आजाता हैं की नौकरी क्यूँ करना हैं क्या महज ये दर्शाने के लिये की हम भी कुछ हैं ? गृहणियां इस शब्द को आज कि स्थितियों मे कैसे परिभाषित करेगे । इस लिंक पर आये कमेन्ट पढना ना भूले और राज किशोर की चोखेर बाली पर आयी पोस्ट  इन्हें चांद चाहिएपर हुई बहस भी सहज याद आ ही गयी ,

राज किशोर कहते हैं "लेकिन ऐसी स्त्रियों की उपस्थिति से कौन इनकार कर सकता है जो अपने स्त्रीत्व के आकर्षण का अवसरवादी लाभ उठाती हैं? वे जानती हैं कि पुरुष की नजर में वे काम्य हैं और इस काम्यता का लाभ उठाने की लालसा का दयनीय शिकार हो जाती हैं। किसी को एमए में र्फस्ट होना है, किसी को, अपात्र होने पर भी, लेक्चररशिप चाहिए, कोई चुनाव का टिकट पाने के लिए लालायित है तो किसी को, परिवार की आय कम होने के बावजूद, ऐयाशी और मौज-मस्ती का जीवन चाहिए। किसी को टीवी पर एंकर बनना है, कोई फिल्म में रोल पाने के लिए बेताब है, कोई अपनी कमजोर रचनाएं छपवाना चाहती हैं, किसी को जल्दी-जल्दी प्रमोशन चाहिए तो कोई लाइन तोड़ कर आगे बढ़ना चाहती है। कोई-कोई ऐसी भी होती है जो खुद पीएचडी का शोध प्रबंध नहीं लिख सकती और अपने प्रोफेसर-सुपरवाइजर से लिखवा कर अपने नाम के पहले डॉक्टर लिखना चाहती है।"
कितनी सहजता से नारी की उपलब्धि को महज उसके शरीर की उपलब्धि मान लिया जाता हैं 


Post Comment

Post Comment

24 टिप्‍पणियां:

  1. रचना जी सबसे पहले तो आपका बहुत-बहुत शुक्रिया की आपने मेरी पोस्ट को यहाँ स्थान दिया रही बात मैंने जो कामकाजी महिला या गृहणी की बात कही है उसे मेरा तात्पर्य यह नहीं था की कामकाजी महिलाएं गृहणीयाँ नहीं होती मैंने तो अपने बेटे की सोच के आधार पर इन शब्दों का प्रयोग किया की एक नौकरी पेशा महिला जो चाहे किसी भी वजह से नौकरी कर रही हो,मतलब चाहे अपनी काबिलियत सिद्ध करने के लिए या घर चलाने के लिए या अपने शौक पूरे करने के लिए अर्थात किसी भी कारण से उसमें और एक घर मे रह रही महिला मे, एक 8 साल के बच्चे को जो अंतर महसूस हो सकता है उसे ही मैंने इस शब्दों का प्रयोग कर लिखने का प्रयास किया था। ताकि हर एक व्यक्ति को मेरी बात समझ आसके हो सकता है मेरे लेखन बहुतों को confuse कर गया हो क्यूंकि यह विषय है ही अपने आप मेन confusing ऐसा मुझे लगता है। बाकी तो सभी एपीआई-अपनी जगह समझदार ही है। एवं सबका अपना-अपना नज़रिया है देखने का की "ग्लास आधा खाली है या आधा भरा है"

    उत्तर देंहटाएं
  2. नारीवादी चर्चा के लिए साधुवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुस्वागतम!
    एक अच्छी पहल। चिट्ठा चर्चा की टीम में शामिल करके ।
    चर्चा का अंदाज बदला, कुछ ऐसे स्वर यहां गूंजे जो प्रायः नहीं ही दिखते थे।
    चर्चा का स्तर भी अलग लगा। दोनों ही बेहतरीन रचना कार हैं। इनको पढ़ने के बाद सिर्फ़ पढ़ना नहीं होता है। विचार मंथन और बहुत सारे चिंतन होते हैं।
    रचनाकार और चर्चाकार को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  4. चर्चा टीम में आपको देखकर अच्छा लगा.नारी विमर्श पर आधारित चर्चा अच्छी रही.

    उत्तर देंहटाएं
  5. रश्मि जी और पल्लवी जी की पोस्ट तो पहले ही पढ़ चुकि हूं बाकि लिंक भी देख लेती हूं |

    उत्तर देंहटाएं
  6. एक बढ़िया पहल...मंथन चलता रहना चाहिए....

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ही अच्छी चर्चा.. विषय में परिवर्तन है और ये बात इस पोस्ट को स्टारस देती है .. सवाल तो बहुत है .. लेकिन उत्तर भी इसी समाज को देना है ..
    बधाई स्वीकार करे रचना जी .

    उत्तर देंहटाएं
  8. रचना जी
    नारी विमर्श की चर्चा की बेहतरीन कोशिश है... मुबारकबाद...

    उत्तर देंहटाएं
  9. रोचक चर्चा है।
    किसी एक लेख को लोग अपने-अपने नजरिये से ही देखते हैं। अब जैसे राजकिशोर जी का लेख है तो मुझे लगता है कि उनके लेख से निकाला गया निष्कर्ष-कितनी सहजता से नारी की उपलब्धि को महज उसके शरीर की उपलब्धि मान लिया जाता हैं उनके लेख की भावना का सामान्यीकरण है।

    राजकिशोर जी ने खुद लिखा है:
    कुल मिला कर स्थिति बहुत ही पेचीदा है। पुरुष की ओर से पेच ज्यादा हैं, पर कभी-कभी स्त्री भी पेच पैदा करती है। यह सच है कि अपने स्त्रीत्व का शोषण करनेवाली स्त्रियों की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं होगी, पर यह धारणा गलत नहीं है कि एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है। यहां मामला तालाब को गंदा बनाने की नहीं, उसकी छवि बिगाड़ने का है। इसलिए 'सब धान तेइस पसेरी' का सोच एकांगी है। फिर भी, स्त्रियों का दोष कम करके आंका जाना चाहिए, क्योंकि वे जन्म से ही अन्याय और भेदभाव का शिकार होती हैं तथा अनुचित तरीके से अवैध लाभ हासिल करने के लालच में पड़ जाती हैं। ये अगर चांद की कामना न करें, तो इनकी गरिमा को कौन ठेस पहुंचा सकता है?
    एक प्रतिशत से भी कम लोगों के लिये कही बात को पूरे समुदाय के लिये ग्रहण करके धारणा बनाना शायद जल्दबाजी है।

    बाकी तो अच्छा ही है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. bahut sundar charcha......chittha-charcha me ye vividhta ek pathak ke liye
    bahut achha anubhav hai...

    bakiye, vimarsh ke mukhya vindu par shreshth/vigya jan ke vichar grahya hain....

    pranam.

    उत्तर देंहटाएं
  11. चर्चा अच्छी लगी. हालांकि मैं काफी दिनों से ब्लॉग नहीं पढ़ पा रही हूँ, पर रश्मि दी को तो पढ़ा ही है. औरतें जब औरतों के बारे में लिखती हैं, तो उसमें उनका अपना अनुभव होता है, जो और लोगों को मजबूर करता है चीज़ों को उनके नज़रिए से देखने के लिए.
    राजकिशोर ने जिस प्रश्न को उठाया है, वह भी विचारणीय है, लेकिन ऐसा सिर्फ औरतें नहीं करतीं, बहुत से पुरुष भी चापलूसी, जी हुजूरी, चमचागिरी करके और रिश्तेदारियां निकालकर अपना मतलब साधते हैं. तो यदि कुछ औरतें ऐसा करती हैं, तो इसे स्त्रीविमर्श से जोड़ना ही नहीं चाहिए.

    उत्तर देंहटाएं
  12. चिट्ठाचर्चा के मंच पर आपको देख कर अच्छा लगा रचना जी. रश्मि और पल्लवी जी की चर्चा होनी ही चाहिए थी.
    रचना जी मुझे लगता है कि चर्चा पूर्वाग्रहग्रस्त नहीं होनी चाहिए. यहां भी चर्चा ने स्त्री विमर्श बल्कि बहस का रूप ले लिया है. उम्मीद है, आगे की चर्चाएं बहसमुक्त होंगीं. शुभकामनाएं.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. वंदना जी मैने चर्चा करके बहस को ही निमंत्रण दिया हैं और पुराने लिंक जोड़ कर पुरानी बहस को नयी बहस से जोड़ा हैं . चर्चा में पूर्वाग्रह नहीं हैं शायद नारी आधारित विषय पर लिखना और बहस करवाना "पूर्वाग्रह " कहा जाता हैं . मै केवल नारी आधरित विषयों पर ही चर्चा करुँगी , आप को लिंक भेजा था की शायद आप राय देगी ४ लिंक पर हुई बहस का और क़ोई नयी बहस होगी ताकि कुछ नया पढने और समझने को मिले .
      बहस मुक्त चर्चा मै मेरी क़ोई रूचि ही नहीं हैं क्युकी लिंकों को संकलन तो कहीं भी मिल जाता हैं
      सादर
      रचना

      हटाएं
    2. एक स्वस्थ बहस करने में समस्या क्या है? क्यों हम हर कचरे को कालीन के नीचे दबा छिपा देना चाहते हैं?
      रचना, मुझे तो आशा है कि यहाँ खूब संयत बहस होंगी।
      घुघूती बासूती

      हटाएं
  13. स्त्री विमर्श पर आधारित चर्चा वो भी संक्षिप्त लिंक्स के साथ ………रोचक है और ध्यान आकर्षित करती है । एकरसता को खत्म करती चर्चा कामयाब हो यही दुआ है।

    उत्तर देंहटाएं
  14. राजकिशोर जी की पोस्ट पहले कभी पढी थी और रश्मि जी की कल ही इसलिए अभी केवल इन दोनों से संबंधित आपके प्रश्नों पर ही कहूँगा.
    जहाँ तक बात हैं इकलौती बेटी के विवाह को ही नियती मानने की मानसिकता की तो अब धीरे धीरे ऐसे ही अभिभावकों की हीं संख्या बढने वाली हैं जिनके केवल एक ही संतान हो अत: भविष्य में एक नया सा ही समाज सामने आएगा और ऐसे इकलौती संतान के माता पिता विवाह या कैरियर जैसे मसलों पर बच्चे की इच्छा को ही आखिर में महत्तव देंगे इसकी संभावना ज्यादा हैं ये बात लडके और लडकी दोनों के मामले में लागू होती हैं पर अभी परिवर्तन आने में थोडा समय लगेगा.और बेटी की कमाई पर माता पिता अपना हक समझे या नहीं इससे ज्यादा फर्क नहीं पडता क्योंकि बेटों से भी ऐसी उम्मीद करके उन्हें क्या मिल गया?
    कई घरों में तो बुजुर्ग पिता को अपनी पेंशन ही बेटे के हवाले करनी पडती हैं.बस वो इस बात से ही संतोष कर लेते हैं कि बेटा हमें अपने पास रहने तो दे रहा हैं भले ही घर खुद पिता के ही पैसों से बना हो.लेकिन हाँ यदि लडकियाँ आत्मनिर्भर होती हैं तो वो खुद ही माता पिता का ध्यान रखेंगी वैसे ये तो जाहिर सी बात हैं कि संतान इकलौती हैं तो सारी उम्मीदें भी उसीसे ही होगी.
    राजकिशोर जी की पोस्ट पर मैं ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा बस इतना कि जो आपने निष्कर्ष निकाला हैं उससे मैं सहमत नहीं पर मुक्ति जी का कहना सही है कि यह स्त्री विमर्श का मुद्दा हैं ही नहीं.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. राजन
      आज भी हमारा समाज स्त्री की हर सफलता का क्रेडिट उसके स्त्री होने को देता हैं जबकि पुरुष की सफलता का उसके काम , उसकी मेहनत को देता हैं . मेरा निष्कर्ष बस इतना हैं .

      हटाएं
  15. मिरी निगाह बदन पे ठहर गई वर्ना
    वो अपनी रूह मेरे नाम करने वाला था

    एकरसता को खत्म करती कामयाब चर्चा .

    उत्तर देंहटाएं
  16. रचना चिटठा चर्चा पर इस विषय को देख कर लगा कि रश्मि और पल्लवी दोनों के ही विषय विचारणीय हें. वैसे चिटठा चर्चा को चर्चा मंच बनाया इसके लिए बधाई.
    राजकिशोर जी के आलेख पर मुझे भी मुक्ति जी की बात सही लगती है कि ये सब काम पुरुष करते हें तो चर्चा का विषय नहीं बनता लेकिन नारी को इसके साथ उसके शरीर से लेकर चरित्र तक जोड़ कर उसके स्तर को निम्न बना दिया जाता है. ये मानव स्वभाव है लेकिन नारी इस तरह के काम काम ही करती हें अपवाद सभी में होते हैं. अनूप जी ने इस बात को स्पष्ट किया है. चर्चा का विषय नारी के वर्तमान स्थिति को ही बनाया गया है और इस पर बहस होनी चाहिए.
    इस मंच पर तुम्हें देख बहुत ख़ुशी हुई. चिटठा चर्चा एक नए ट्रेक की ओर बढ़ रही है.

    उत्तर देंहटाएं
  17. बहुत बढ़िया चर्चा प्रस्तुति ..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  18. शुक्ल जी के कमेन्ट से इस चिट्ठे की विश्वसनीयता और भी बढ़ गई|

    उत्तर देंहटाएं

चिट्ठा चर्चा हिन्दी चिट्ठामंडल का अपना मंच है। कृपया अपनी प्रतिक्रिया देते समय इसका मान रखें। असभ्य भाषा व व्यक्तिगत आक्षेप करने वाली टिप्पणियाँ हटा दी जायेंगी।

नोट- चर्चा में अक्सर स्पैम टिप्पणियों की अधिकता से मोडरेशन लगाया जा सकता है और टिपण्णी प्रकशित होने में विलम्ब भी हो सकता है।

Google Analytics Alternative