- रमन बी ने शोभा डे की किताब का रोचक समीक्षानुमा विवरण दिया। जैसे किताब का सार ही निचोड़ दिया।
- लाइलाज आशावादी रमन कौल का संदेश है:-
"भविष्य की योजना ऐसी बनाओ जैसे सौ साल जीना हो, काम ऐसे करो जैसे कल मरना हो।" चलते चलते यह बता दूँ कि मेरे लिए आशा के बिना बिल्कुल जीवन नहीं है, चाहे लड़े, चाहे मरें, आशा के साथ अग्नि के सात फेरे जो लिए हैं।
- स्वामीजी ने बताया दिशा वो जिधर चल पड़ो। हेगेल के डायलेक्ट के अलावा एक खासियत इस पोस्ट की थी कि इसमें कमेंट सीधे हिंदी में किये गये। लगता है सजाने संवारने के लिये स्वामीजी ने इसे हटा लिया बाद में। हिंदी में लिखने के बारे में आलोक के लेख पर चौपाल में सिर्फ आलोक-स्वामी संवाद देखकर थोड़ा अचरज हुआ। आशा ही जीवन के बजाय स्वामीजी मानते हैं -प्रपंच ही जीवन है। हिंदी ब्लागर से सूचना अपेक्षाओं के बारे में कह रहे हैं स्वामी।
- मुनीश के कविता सागर में कुछ और नायाब मोती निकले।
- हिंदी के दिन कब बहुरेंगे पूछते हुये रवि रतलामी आशा ही जीवन है लिखते हुये बताते हैं अपना किस्सा जिसे सुनकर आशावाद बढ़ जाता है। इंटरनेटजालसाजी के बारे में बताया विस्तार से। हिंदी फान्ट दुनिया की सैर, जानकारी से भरी है।
- ज्ञानविज्ञान में लेखों की विविधता बढ़ती जा रही है। खड़कपुर आई.आई.टी के लोगों ने जूट की सड़कें विकसित की हैं जो भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल हैं तथा सस्ती हैं। इसके पहले शून्य की महत्ता तथा पुरुषों के लिये परिवार नियोजन पर आये।
- सूचना क्रान्ति के दौर में पत्र नदारद होते जा रहे हैं । विजय ठाकुर इसके बारे में पड़ताल करते हैं। यह भी कि सूचना क्रांति के क्या नकारात्मक पक्ष हैं।
- हाइकू की बहती गंगा में देवाशीष भी डुबकी लगाने से नहीं चूके।
- भारतीय लिपियों को देवानागरी में कैसे बदल बदल सकते हैं यह आलोकबताते हैं गिरगिट की बात करते हुये।
- अमेरिका की खुशी में भारत की खुशी खोजने वाले अनुनाद को आशा है कि भारतीय भाषाओं का सर्च इंजन जल्द ही आयेगा।
- अतुल अरोरा ने बकरमंडी से नई कहानी को टेम्पो पर बिठा दिया है। टेम्पोवाला कुछ नखरे कर रहा है। देखो कौन इसको आगे ले जाता है?
- विजय ठाकुर के स्कूल के बच्चे दिन पर दिन समझदार होते जा रहे हैं। असल में ब्लाग शायद यही लिख रहे हैं।
- तीन पीढ़ियों के सहित १००वां जन्म-दिवस मना रही महिला से मिलवाते हैं महावीर शर्मा। इसके पहले वे लंदन में वैसाखी उत्सव के बारे में बताते हैं।
दुआ मे तेरी असर हो कैसे
यह बात पूछते-पूछते मानोशी फुटपाथ पर पहुंच जाती हैं तथा उनके आराम से सो जाने के बारे में लिखती हैं।
सिर्फ़ फूलों का शहर हो कैसे- सरदार, जो दारु के पैसे बेहिचक मांगता है, की साफगोई से प्रभावित हो गये जीतेन्द्र। अपने पुराने लेख भी सहेज के रखे।
- रिश्तों की बारे में रति जी बताती हैं:-
रिश्ते
ऐसे भी होते हैं
चिनगारी बन
सुलगते रहतें हैं जो
जिंदगी भर - आउटसोर्सिंग की संभावनाओ का विस्तार तांत्रिकों -ओझाओं तक हो चुका है बताते हैं अतुल। अमेरिकी जीवन के अनुभव से रूबरू कराते हुये बता रहे हैं कि कैसे वहां गाड़ी 'टोटल' होती है।
- शंख सीपी रेत पानी में कमलेश भट्ट फिर-फिर अपनी जमी-जमी जमायी कवितायें पढ़ा रहे हैं:-
कौन मानेगा
लिखने का मन होता है:-
सबसे कठिन है
सरल होना.
फूल सी पली
ससुराल में बहू
फूस सी जलीकौन मानेगा
ज़रा सा कठिन है
नया लिखना। - पंकज मिले गुरुद्वारे में फिर कहते हैं - पूछो न कैसे रैन बिताई?
- हरीराम बता रहे हैं हिंदी में बोलकर लिखाने की तकनीक के बारे में।
- डा.जगदीश व्योम आवाहन करते हैं:-
बहते जल के साथ न बह
कोशिश करके मन की कह
कुछ तो खतरे होंगे ही
चाहे जहाँ कहीं भी रह। - मुंगेरीलाल के हसीन सपनों से आप परिचित होंगे। मुंगेरीलाल की कहानी सुना रहे हैं तरुण। जीवन-आशा पर भी हाथ साफ किया गया।
- फुरसतिया ने कानपुर में हुये कवि सम्मेलन के माध्यम से बताया कि कविता के पारखी अभी भी मौजूद हैं। जीवन में आशा ही सब कुछ नहीं नहीं है यह बताते हैं। इसके पहले कविताओं तथा हायकू पर भी हाथ आजमाये।
रविवार, मई 01, 2005
ज़रा सा कठिन है, नया लिखना
चर्चाकारः
debashish
बुधवार, मार्च 16, 2005
जिंदगी फिर जिंदगी होने लगी
चर्चाकारः
debashish
आपको पढ़कर खुशी होने लगी,
जिंदगी फिर जिंदगी होने लगी.
यह कहना है महावीर शर्मा की गजल को पढ़कर उनके प्रशंसक गुलदेहलवीजी का जो उनकी गजल के इस शेर पर खासतौर पर फिदा हुये:-
मन्ज़र जुदाईयों का देखा गया ना हम से
छुटता नहीं है दामन, अब ख्याल-ए-यार का।
जिंदगी फिर जिंदगी होने लगी का यह अंदाज हावी रहा हिंदीचिट्ठाजगत में पिछले पखवाड़े निरंतर के प्रकाशन के बाद. सब तरफ से चिट्ठाजगत की पहली ब्लागजीन का स्वागत हुआ.अगले अंक की तैयारियां शुरु हैं जोरशोर से.आशा है दूसरा अंक और बेहतर निकलेगा.
इस बीच हिंदीचिट्ठाजगत के धुरंधरों के सहयोग से ब्लागनाद की दुंदभी बजी.बोलते चिट्ठों की शुरुआत उन लोगों को ध्यान में रखते हुये की गयी है जो हिंदी बोल-समझ लेते हैं पर पढ़ने-लिखने में सहज नहीं हैं.जल्द ही ब्लागनाद की लोकप्रियता बढ़ेगी.
शैल का दर्द था कि हिंदी चिट्ठाजगत में महिलाओं की संख्या नगण्य है.वह दर्द दूर होना शुरु हो गया है.कनाडा से मानसी तथा त्रिवेन्द्रम से रति सक्सेना का सुखद आगाज हुआ हिंदी चिट्ठाजगत में.संयोगवश दोनो रचनाकार शिक्षा जगत से जुड़े हैं.आशीष के दिये विषय पर इनके लेख की प्रतीक्षा रहेगी.
अनुभवी रचनाकार रति सक्सेना कहतीं हैं:-
हलका सा टहोका काफी है
बिखरने को
सँवारे बाल, सजे घर, और
बने बनाए रिश्ते
बिगडते रिश्तों को
किसी भूकंप की दरकरार
नहीं होती
ब्लाग में पहला खत लिखते हुये मानसी कहती हैं:-
हम ज़िन्दगी के साथ चलते चले गये
जैसी मिली हम उसमें ढलते चले गये
छोडा था उसने हाथ एक उम्र हो चुकी
फिर भी ख्वाब जाने क्यूँ पलते चले गये
इक उफ़ भी ना निकली ज़ुबां से उनके
हँस के निगली आग और जलते चले गये
आखिर हम ने तोड ली यादों से दोस्ती
दुश्मनी मे खुद को हम छलते चले गये
अनुगूंज का पिछली बार का विषय था मेरेबचपन के मीत.लोगों ने लिखे अपने बचपन के अनुभव.अवलोकनी चिट्ठे का इंतजार है.इस बार मेजबानी कर रहे हैं शिक्षा जगत से जुड़े आशीष.विषय भी शिक्षा जगत से जुड़ा है--शिक्षा:आज के परिप्रक्ष्य में.
अनुगूंज में इस बार भी सबसे पहली प्रविष्टि रही प्रेमपीयूष की.जब सब लोग अपने बचपन के दोस्तों के किस्से कहानियां बयान कर रहे थे तब प्रेमपीयूष को अपनी अधकटी पेंसिल याद आ रही थी.इसके अलावामुर्गी औरमधुमक्खी पर खूबसूरत बाल कवितायें लिखीं.
अतुल को प्रेमपीयूष का लिखा पसंद आ गया तो जोड़ लिया नाम अपने ब्लागरोल में.मुन्नाकबाड़ी कथा के बाद अतुल नें चाकलेट फैक्ट्री का भ्रमण करते हुये अमेरिकी व्यापारिकता के दर्शन किये.अमेरिका का भ्रमण कराते हुये अतुल बताते हैं लाइसेंस लेने के अनुभव अमेरिका के.सहज रूप में स्वत:स्फूर्त तुलना भारत के तंत्र से करते हैं.
प्रवासी मित्रों के विवरण पढ़कर कभी-कभी मुझे लगता है कि जहां वह रह रहे हैं वह समाज या तो विसंगति विहीन है या फिर अभी वह दृष्टि नहीं पायी हमारे साथियों ने कि उस समाज की विसंगतियां वे देख सकें.बहरहाल उनका देश हमेशा उन्हें सहायता प्रदान करता है यह अहसास पुख्ता करने में कि जहां वे हैं वह हर हाल में उस जगह से बेहतर जहां से बन के वे आये हैं.यह स्वाभाविक भी है--ड्राइंगरूम हमेशा किचन से ज्यादा लकदक करता है.
होली अभी आयी नहीं कि आशीष को असुविधा होने लगी.असुविधा-अलाव से,जमाव से ,शोर से .उस पर तुर्रा यह कि कोई इनसे कहता नहीं कि असुविधा के लिये खेद है.ज्ञानविज्ञान में भी आशीष ने बहुत सरल भाषा में विस्तार से धुंआसूघक यंत्र के बारे में लिखा.ग्लेशियरों केपिघलने से चिंतित आशीष सौर ऊर्जा कैसे संचित करें-सोच रहे हैं.
पंकज कुछ दिन सुरा के साथ रहे फिर फिर सुंदरी(सहधर्मिणी ?) के साथ पाये गये.गुलाबी नजारा तो हम न देख पाये पर बसंतिया नजारा खूबसूरत है.निरंतर में फायरफाक्स पर पंकज का लेख ज्ञानवर्धक है.और उपयोगी बनाने के लिये यह मान कर चलना होगा कि पढ़ने वाले को कंप्यूटर की कोई जानकारी नहीं है.
देवाशीष का सारा समय लगता है कि निरंतर निकालने के लिये दौड़-धूप में चला गया .अलग से कुछ नहीं लिख पाये.निरंतर का संपादकीय बढ़िया लिखा.
बचपन की यादें टटोलते हुये इंद्र अवस्थी बताते हैंलल्लाबाबा के बारे में:-
लल्ला बाबा वह हर काम कर सकते थे जो कि हम पढ़ाई में तेज माने जाने की वजह से और अच्छे बच्चे होने की छवि का बोझ ढोने की वजह से नहीं कर सकते थे. इस तरह लल्ला बाबा हमलोगों के लिये वह खिड़की थे जो उस दुनिया की तरफ खुलती थी जो हमलोगों के लिये शायद निषिद्ध थी लेकिन लल्ला के स्वागत के लिये हमेशा पलक-पाँवड़े बिछाकर तैयार रहती थी.
स्वामीजी ने पहले लल्लू को माहौल उपलब्ध कराया फिर परेशान हो गये.मुझे लगता है कुछ सीख गये दोस्त को देखकर तो सोचने लगे ये टलें तो हम भी शुरु हों.बचपन में क्या देखने के आदी थे बताते हैं स्वामीजी.
कालीचरण ने भोपाली मित्रों की याद की .जब बचपन की याद करते नकल करने की यादें ताजा की रमन ने तो मुझे पुराना वाकया याद आया.हम लोग साइकिल यात्रा के दौरान बिहार के बगोदर हाईस्कूल में ठहरे थे.उन दिनों बिहार में सामूहिक नकल की बात चर्चा में थी.बातों बातों में गुरुजी बोले:-हमें यह चिंता नहीं है कि यहां लोग नकल करते हैं.हम यह सोच के परेशान हैं कि अगर यही चलता रहा तो अगली पीढ़ी को नकल कौन करायेगा?
भोलाराम नें सारी बातें क्रिकेट की कीं.इसी सिलसिले में रमन ने भारत में क्रिकेट के प्रति दीवानगी के कारणों की पड़ताल की .अपने बचपन को याद करते हुये कहते हैं रमन:-
प्रेम ग्रन्थ के पन्नों पर अपनी तकदीर तो ज़ीरो है, अपना वही हाल था। पर दूसरों की तकदीरें खूब बनाई हैं। सिर्फ मिलवाया ही नहीं, कितने ही दोस्तों के हम प्रेम पत्र लेखक थे। यह उन दिनों की बात है जब ईमेल और आइ-एम का ज़माना नहीं था और लिफाफा, काग़ज़, कलम, सियाही, लिखावट और तदबीर बहुत माने रखती थीं। खैर सुरेश और हमारी पड़ौसन का प्रेम प्रसंग पनपा भी और समाप्त भी हो गया पर अपनी दोस्ती कालेज के बाद भी बनी रही
आशीष तिवारी ने तीस हजारी अदालत और मेट्रो रेल के दो ध्रुवों की यात्रा की.अनुभव बताये.दोनों के बीच समय का अंतर है.देखना तीसहजारी मेट्रो की लाइन पर चलती है या फिर मेट्रो अपनाती है तीसहजारी का ढर्रा.
जाड़े में सूरज की तरह खुशनुमा अहसास सी कवितायें रहीं पूर्णिमा वर्मन की कवितायें.
अलसाई
इतराई
पेड़ों के पत्तों से
गिर गिर के छितराई
किरनों का गुलदस्ता
जाड़े की धूप
अरूण कुलकर्णी ने कवितायें प्रार्थना तथाअभीप्सा लिखीं.
कृपा करो ऐसी
कि यह क्षुद्रता का ज्ञान बने मेरा रथ
बने मेरी सच्ची प्रार्थना
और दिखा दे मुझे अपना पथ ॥
जापान से बुरा न मानो होली का रंगीन हल्ला मचाते हुये आये मत्सु.
हिंदी के आदिचिट्ठाकार आलोककूटभाषा में बात करते रहे हमेशा की तरह.परख के बारे में जानकारी दी.
अनुनाद सविधान की दुर्गति की आशंका सेपरेशान दिखे.इस बीच अनुनाद ने सभी चिट्ठों में टिप्पणियां करके लोगों का
उत्साह बढ़ाया.
छिछोरी हरकत के बाद जीतेंन्द्र ने अपने बचपन के दोस्तों के बारे में बताया तो दोस्त भला क्यों पीछे रहते.देवीप्रसाद के बयान को सार्थक करते हुये हम देख ही रहे हैं इनको पिछले काफी दिनों से.
रविरतलामी का लेखन पूरे शबाब पर है.सबसे बेहतरीन लेख रहा हिंदी में आफिस .इसके अलावा आयातित समय,संतों के लिये विवाद,संविधान के साथ धोखाधड़ी के साथ जहरीली होती गंगा की कहानी लिखी.
फुरसतिया में नारद जी के माध्यम से स्वर्ग की सेफ्टी पालिसी की कथा कही.मेरे बचपन के मीत के बहानेदोस्तों को याद किया.
posted by _ at १:१७ अपराह्न | 0 टिप्पणी |
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