बुधवार, अक्टूबर 05, 2005
मंगलवार, अक्टूबर 04, 2005
क्या यही प्यार है?
चर्चाकारः
debashish
बचपन में "उठो लाल अब आंखे खोलो" कविता सुनकर जागने की आदत बना चुके स्वामीजी अब परेशान हैं अलार्म घड़ी की आवाजों से। अतुल कुछ तरीके बता रहे हैं दुल्हिन को बस में रखने के। हिंदिनी पर अपनी पोस्टों का शानदार सैंकड़ा पूरा करते हुये रवि रतलामी ने अपना प्यार का किस्सा जिस जगह लाकर लटकाया है उससे लोग पूछ रहे हैं, क्या यही प्यार है? नीरज और अनुनाद बता रहे हैं जाल के आगे क्या? देबाशीष पर लगता है आलोक का भूत सवार हो गया है, टेलीग्राफिक पोस्ट लिखने लगे हैं।
सुनीलजी जब बाहर जाते हैं पूछने लगते हैं, "हम कहां आ गये हैं?" कहकशां में संगदिल (पत्थर दिल) सनम से एकतरफा बात शुरु हुयी। शशि सुना रहे हैं भोजपुरी कविता और भजन। इधर योगीजी दिखा रहे हैं माया के खेल, उधर तरुण बता रहे हैं एक और चौपाल के बारे में। जब से जीतेन्द्र ने नारद पर कलाकारी शुरु की है नारद का रोज रूप परिवर्तन हो रहा है। कभी तो पोस्ट पूरी की पूरी ही दिख जती है और आज की खबर के अनुसार नारदजी हर पोस्ट के दो विवरण दे रहे हैं - सरकारी अंदाज में; एक मूल प्रति, एक कार्बन कापी। कोई बात नहीं मियां, लगे रहो!
सुनीलजी जब बाहर जाते हैं पूछने लगते हैं, "हम कहां आ गये हैं?" कहकशां में संगदिल (पत्थर दिल) सनम से एकतरफा बात शुरु हुयी। शशि सुना रहे हैं भोजपुरी कविता और भजन। इधर योगीजी दिखा रहे हैं माया के खेल, उधर तरुण बता रहे हैं एक और चौपाल के बारे में। जब से जीतेन्द्र ने नारद पर कलाकारी शुरु की है नारद का रोज रूप परिवर्तन हो रहा है। कभी तो पोस्ट पूरी की पूरी ही दिख जती है और आज की खबर के अनुसार नारदजी हर पोस्ट के दो विवरण दे रहे हैं - सरकारी अंदाज में; एक मूल प्रति, एक कार्बन कापी। कोई बात नहीं मियां, लगे रहो!
Post Comment
Post Comment
सदस्यता लें
संदेश (Atom)